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| {{Adhyaya
| | #REDIRECT [[Aitareya#AIT_C02_S07]] |
| | document_id = AIT
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| | chapter_id = AIT_C02
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| | chapter_num = 2
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| | chapter_name = द्वितीयारण्यके
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| | title = सप्तमोऽध्यायः
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| == सप्तमोऽध्यायः ==
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| | verse_id = AIT_C02_S07_V01
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| | adhikarana =
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| | verse_type = mantra
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| | verse_line1 = ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥
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| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके सप्तमोऽध्यायः ॥ ॥ इति द्वितीयारण्यकः समाप्तः॥}}
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| {{Commentary
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| | verse_id = AIT_C02_S07_V01
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| | name = Bhashyam
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| | text =
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| वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता । अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद्धृदयं मनश्चेति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि हे विष्णो ममाविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो इति सम्बोधनम् ।
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| }}
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| {{Commentary
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| | id = AIT_C02_S07_V01_B01
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| | name = Bhashyam
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| | label = Bhashyam
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| | text =
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| आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते ।
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| तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यमाणीस्थ इति गीयते ॥
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| इति शब्दतत्त्वे ।
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| }}
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| {{Commentary
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| | name = Bhashyam
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| | text =
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| आविरावीरिति दैर्घ्यमतिशयार्थे । आधिक्येऽधिकमिति सूत्रात् । अणशब्दस्य गतिवाचित्वाच्चलमाणमुच्यते । तस्य धारणेन तद्वानाणी । स्थापक इत्यर्थः । मे श्रुतं मा प्रहासीः मम विद्यागोचर एव सर्वदा भव । विस्मृतो मा भव । हे विष्णो अनेन त्वद्विषयेणैवाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावदवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवत्विति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् ।
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| }}
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| {{Commentary
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| | id = AIT_C02_S07_V01_B01
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| | label = Bhashyam
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| | text =
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| वाङ्म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् ।
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| अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥ इति च ॥
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| [[Category:Aitareya]] | |