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| | page_title = Nakha | | | page_title = Nakha |
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| | verse_text = पान्त्वस्मान् पुरुहूतवैरिबलवन्मातङ्गमाद्यद्घटाकुम्भोच्चाद्रिविपाटनाधिकपटुप्रत्येकवज्रायिताः ।<br/> | | | verse_text = पान्त्वस्मान् पुरुहूतवैरिबलवन्मातङ्गमाद्यद्घटाकुम्भोच्चाद्रिविपाटनाधिकपटुप्रत्येकवज्रायिताः ।<br/> |
| श्रीमत्कण्ठीरवास्यप्रततसुनखरादारितारातिदूरप्रध्वस्तध्वान्तशान्तप्रविततमनसा भाविता (नाकिवृन्दैः) भूरिभागैः ॥१॥ | | श्रीमत्कण्ठीरवास्यप्रततसुनखरादारितारातिदूरप्रध्वस्तध्वान्तशान्तप्रविततमनसा भाविता (नाकिवृन्दैः) भूरिभागैः ॥१॥ |
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| | name = balabodhini
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| | text = <div style="font-family:'Adishila',serif;text-align:center;margin-bottom:8px;">'''[Invocation]'''</div>
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| {{CommentaryShloka|text=त्रैलोक्यस्तम्भशम्भ्वादिहृद्गुहावासिनं सदा ।<br/>षड्वर्गदन्तिसन्दोहकृन्तनं नृहरिं भजे ।। १ ।।}}
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| परमकारुणिकः श्रीमदानन्दतीर्थमुनिः सर्वारिष्टाटवीदावानलं भक्तेष्टचिन्तामणिं नखरस्तवं भक्तानुजिघृक्षया विधित्सुः श्रीनृसिंहनखराणां संसारकारणीभूतदुर्ज्ञान दुष्कर्माभिमानिसर्वदैत्यहन्तृत्वेन तन्मूलकसकलानिष्टनिवर्तकत्वमत एव ब्रह्मेशाद्यखिललेखाद्युत्तमाधिकार्युपास्यत्वं च प्रतिपादयन् स्वोपलक्षितसकलसत्पुरुषसंरक्षणं प्रार्थयते — पन्त्विति ।
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| पुरुहूतवैरिबलवन् मातङ्गमाद्यद्घटाकुम्भोच्चाद्रिविपाटनाधिकपटुप्रत्येकवज्रायिताः — पुरु भूयिष्ठं हूयते यज्ञेष्विति पुरुहूतः पुरन्दरस्तस्य। वैरमेषामस्तीति वैरिणो दैत्याः। बलमेषामस्तीति बलवन्तः। बलवन्तश्च ते मातङ्गाश्च बलवन्मातङ्गा महागजा इत्यर्थः। तेषां माद्यन्ती मदं प्राप्ता घटा। येकुम्भाः कुम्भस्थलानि ते उच्चाद्रय इव उन्नतपर्वता इव तेषां विपाटनं विदारणं तस्मिन्नधिकमत्यन्तं पटवः। प्रत्येकं वज्रवदाचरन्तीति वज्रायिताः।
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| भूरिभागैः — भूरि बहु भागो भाग्यं येषां ते भूरिभागा ब्रह्मादयस्तैः। दारितारातिदूरप्रध्वस्तध्वान्तशान्तप्रविततमनसा — दारिता विदारिता अरातयः कामादिषड्वर्गा येन। दूरात्प्रध्वस्तं निरस्तम्। अनादितोऽविद्यामानमित्यर्थः। तादृशं ध्वान्तं अज्ञानलक्षणान्धकारो यस्य, तत् दूरप्रध्वस्तध्वान्तम्। अत एव शान्तं रागादिदोषाकलुषितं भगवन्निष्ठं वा प्रविततं विस्तृतम्।
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| भाविता ध्याताः। श्रीमत्कण्ठीरवास्यप्रततसुनखराः — श्रिया महालक्ष्म्या नित्ययुक्तः श्रीमान्। कण्ठीरवस्य सिंहस्यास्यमिव मुखमिव आस्यं मुखं यस्य। प्रतताः व्याप्ताः प्रख्याता इति वा ये सुनखराः शोभननखराः। अस्मान् पान्तु रक्षन्तु। ।। १ ।।
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| | name = mandabodhini
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| | label = मन्दबोधिनी
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| | text = <div style="font-family:'Adishila',serif;text-align:center;margin-bottom:8px;">'''[Invocation]'''</div>
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| {{CommentaryShloka|text=।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।<br/>
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| लक्ष्मीनारायणं देवं व्यासमध्वजयादिकान् ।।<br/>
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| गुरून् मूलादिपरमान् वन्दे विद्यागुरूंश्च मे ।। १ ।।}}
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| {{CommentaryShloka|text=छलारिनरसिंहार्यशिष्यः शेषाभिधो बुधः । नरसिंहनखस्तोत्रपञ्चिकां कुरुतेञ्जसा ।। २ ।।}}
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| अत्र किल कथां कथयन्ति। कदाचित् त्रिविक्रमपण्डिताचार्यवर्यः श्रीमध्वाचार्यैः सह बदरिकाश्रमं प्रति जगाम। तत्र देवालयकवाटं पिधाय नरनारायणं श्रीमध्वाचार्ये पूजयति सति, इदानी श्रीमध्वाचार्याः किं कुर्वन्ति इति जिज्ञासायां कवाटविवरेण निरीक्षमाणः सन् जाम्बवान् श्रीकृष्णरूपे रामाकारमिव श्रीमध्वरूपे हनुमदाकारं दृष्ट्वा तदा तेषां वायुत्वं विश्वस्य मूलरूपस्य वायोस्तदवताराणां स्तुतिं प्रणिनाय।
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| ततः श्रीमध्वाचार्याः सर्वपण्डितप्रवरेण त्रिविक्रमपण्डिताचार्येण शिष्यभावेन प्रदर्शितवायुस्तुतिरूपग्रन्थं दृष्ट्वा प्रसन्नाः सन्तः एकैकश्लोकस्यैकैकाभीष्टप्रदत्वरूपं वरं दत्वा विष्णुस्तुतिं विना केवलमात्मस्तुतिमसहमानाः सर्वानिष्टनिवर्तकश्रीनृसिंहनखस्तुतिप्रतिपादकश्लोकद्वयं विरचय्य मङ्गलाचरणरूपत्वेन तदादौ निबन्धनं कुरु — सम्पुटाकारेण आदावन्ते च पठतां फलं भविष्यतीत्युक्त्वा श्लोकद्वयं ददुरिति।
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| तत्रायमाद्यश्लोकः — पान्त्वस्मानिति। हे प्रतत स्तम्भादिसर्वत्र व्याप्त। श्रीमत्कण्ठीरवास्यः — श्रीः लक्ष्मीः कान्तिर्वा। कण्ठीरवः सिंहः तस्य आस्यमिव आस्यं मुखं यस्य सः। सुनखराः — शोभननखाः। पान्तु — रक्षन्तु।
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| पुरुहूतः इन्द्रः। बलवन्तश्च ते मातङ्गाश्च गजाश्च बलवन्मातङ्गाः मत्तगजा इति यावत्। घटाशब्दः करिसमूहादिवाचकः। विशिष्टवाचकानां शब्दानां पृथग्विशेषणवाचकपदसन्निधाने विशेष्यमात्रपरत्वमिति न्यायात् केवलं समूहवाचक एव।
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| विशेषणद्वयेन — सिंहस्य सर्वे नखा मिलित्वा एकैकगजविदारणे समर्थाः; श्रीनरसिंहस्य एकैकोऽपि नखो युगपदनेकदैत्यगजसंहरणे समर्थ इति महावैलक्षण्यं द्योतयति।
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| नाकिवृन्दैर्भाविता इत्यनेन — किमु ऋष्यादिभिरिति कैमुत्यं सूचितम्। लक्ष्मीनरसिंहस्य नखध्यानेनैव सर्वाभीष्टप्राप्तिः किमु सर्वावयवध्यानेनेति कैमुत्यसूचनार्थं नखानां स्तुतिः कृतेति विद्वद्भिर्बोध्यम्। ।। १ ।।
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| | verse_text = लक्ष्मीकान्त समन्ततोऽपि(वि)कलयन्नैवेशितुस्ते समं पश्याम्युत्तमवस्तु दूरतरतोऽपास्तं रसो योऽष्टमः ।<br/> | | | verse_text = लक्ष्मीकान्त समन्ततोऽपि(वि)कलयन्नैवेशितुस्ते समं पश्याम्युत्तमवस्तु दूरतरतोऽपास्तं रसो योऽष्टमः ।<br/> |
| यद्रोषोत्करदक्षनेत्रकुटलिप्रान्तोत्थिताग्निस्फुरत्खद्योतोपमविस्फुलिङ्गभसिता ब्रह्मेशशक्रोत्कराः ॥२॥ | | यद्रोषोत्करदक्षनेत्रकुटलिप्रान्तोत्थिताग्निस्फुरत्खद्योतोपमविस्फुलिङ्गभसिता ब्रह्मेशशक्रोत्कराः ॥२॥ |
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| | label = बालबोधिनी
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| | text = ''सर्वोत्कर्षे देवदेवस्य विष्णोर्महातात्पर्यं नैवचान्यत्र सत्यम्'' इति श्रुतेः सकलसच्छास्त्रमुख्यतात्पर्यार्थभूतं श्रीनृहरेः समाभ्यधिकराहित्यलक्षणं सर्वोत्तमत्वं मुमुक्षुणा सर्वावस्थास्ववश्यं प्रतिपत्तव्यमित्यतः सप्रमाणं तत्प्रतिपादयंस्तौति — लक्ष्मीकान्तेति।
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| हे लक्ष्मीकान्त लक्ष्म्या वल्लभ श्रीनृसिंह। ईशितुः सर्वस्वामिनः ते तव सदृशं वस्तु समन्ततोऽपि सर्वत्र जगतीत्यर्थः। कलयन् मनसा प्रमाणैर्वा विचारयन्नहं न पश्याम्येव।
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| उत्तमवस्तु — योऽत्यन्तासत्त्वेन प्रसिद्धः अष्टानां पूरणोऽष्टमः रस इव। उत्तमं च तत् वस्तु श्रीनृसिंहादुत्तमपदार्थ इत्यर्थः। अतिशयेन दूरं दूरतरं तस्मात् अपास्तं निरस्तम्। मधुरलवणतिक्ताम्लकटुकषायभेदेन षड्रसा एव प्रसिद्धा लोकवेदयोः। सप्तमो रसो नास्त्येव, अष्टमस्तु सुतरामेवाप्रसिद्धः — तथा श्रीनृसिंहसदृश देवो नास्ति, तदुत्तमो देवस्तु सुतरां नास्तीति।
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| यद्रोषोत्करदक्षनेत्रकुटिलप्रान्तोत्थिताग्निस्फुरत्खद्योतोपमविस्फुलिङ्गभसिताः — यस्य नृसिंहस्य रोषोत्करदक्षनेत्रस्य कुटिलः प्रान्तः तस्मादुत्थितस्य अग्नेः स्फुरन्तः खद्योतोपमाः विस्फुलिङ्गाः तैः भसिताः भस्मीकृताः ब्रह्मेशशक्रोत्कराः।
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| ब्रह्मादिदेवानामुत्पत्तिस्थितिसंहृत्यादेः श्रीनृसिंहकटाक्षावलोकनमात्राधीनत्वेन तदधीनत्वात् तेषां न तद्दास्यं तदसमत्वं वेति सर्वोत्तमत्वात् स एव सर्वदा श्रेयोऽर्थिभिर्ध्येय इत्यशेषमतिमङ्गलम्।
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| इति श्रीनखस्तुतिव्याख्या श्रीविश्वपतितीर्थविरचिता बालबोधिनी सम्पूर्णा ।।
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| | name = mandabodhini
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| | text = ननु सतीष्वन्यासु देवतासु अस्यैव प्रार्थने को हेतुरित्यतः लक्ष्मीनरसिंहं विना अन्यः सर्वोत्तमो नास्तीति भावेन लक्ष्मीनरसिंहं स्तौति — लक्ष्मीकान्तेति।
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| पश्यामीत्युत्तमपुरुषप्रयोगबलात् अहमिति कर्ता लभ्यते। हे लक्ष्मीकान्त — लक्ष्म्याः कान्तः पतिः। लक्ष्म्याः कान्त मनोहरेति वा। समन्ततः — सर्वदेशकालेषु, सर्ववेदेषु शास्त्रेषु च। ते समं वस्तु विकलयन् विचारयन् ईशितुः सर्वोत्तमस्य ते समं सर्वोत्तमत्वेन समं वस्तु नैव पश्यामि।
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| उत्तमवस्तु दूरतरतोऽपास्तम् — यदा समं वस्तु नास्ति तदा उत्तमं वस्तु नास्तीति किमु वक्तव्यमिति कैमुत्यं सूचयितुं उत्तमवस्तु दूरतरतोऽपास्तमित्युक्तम्।
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| रसो योऽष्टमः — छान्दोग्योपनिषदि ''परमः पराध्योऽष्टमी रस'' इति भाष्यानुसारेण। अष्टमः पृथिव्यपेक्षयाष्टमत्वेनोक्तः। रसः वरः सर्वोत्तम इत्यर्थः। यथा लोके षड्रसाः प्रसिद्धाः, सप्तमरसस्तु नास्त्येव, अष्टमरसस्तु दूरतरतोऽपास्तः — तथा ईशितुः समं वस्तु नास्ति, उत्तमं वस्तु दूरतरतोऽपास्तमिति।
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| ब्रह्मेशशक्रोत्कराः — ब्रह्मा चतुर्मुखः, ईशो रुद्रः, शक्रः इन्द्रः, तेषामुत्कराः राशयः। उत्करशब्देन अतीतानागताः सर्वेऽपि देवा ग्राह्याः।
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| यद्रोषोत्करदक्षनेत्रकुटिलप्रान्तोत्थिताग्नि — यस्य श्रीलक्ष्मीनृसिंहस्य रोषेण उत्कृष्टदक्षिणनेत्रस्य कुटिलः प्रान्तभागः तस्मादुत्थितः अग्निः। स्फुरत्खद्योतोपमविस्फुलिङ्गभसिताः — खद्योताः कीटविशेषाः अथवा खद्योतः सूर्यः तत्सदृशैः विस्फुलिङ्गैः भस्मीकृताः।
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| ''यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते'' इत्यादिप्रमाणात् त्वमेव सर्वोत्तमो नान्यः इति सिद्धम्। तस्मात् सकलकल्याणगुणपूर्णत्वेन भगवान् श्रीलक्ष्मीनरसिंह एव स्वस्य प्रेमास्पद इति तमेव श्लोकद्वयेन प्रार्थितवानानन्दतीर्थमुनिरित्यशेषमतिमङ्गलम्।
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| {{CommentaryShloka|text=नरसिंहनखस्तोत्रगूढभावार्थवर्णनात् । लक्ष्मीनृसिंहः प्रीयतामस्मदाचार्यहृद्गतः ।।}}
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| {{CommentaryShloka|text=छलारीनरसिंहार्यशिष्यस्य कृतिमुत्तमम् । विदां कुर्वन्तु विद्वांसः किमन्यैः कितवैरिह ।।}}
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Nakha
पान्त्वस्मान् पुरुहूतवैरिबलवन्मातङ्गमाद्यद्घटाकुम्भोच्चाद्रिविपाटनाधिकपटुप्रत्येकवज्रायिताः ।
श्रीमत्कण्ठीरवास्यप्रततसुनखरादारितारातिदूरप्रध्वस्तध्वान्तशान्तप्रविततमनसा भाविता (नाकिवृन्दैः) भूरिभागैः ॥१॥
लक्ष्मीकान्त समन्ततोऽपि(वि)कलयन्नैवेशितुस्ते समं पश्याम्युत्तमवस्तु दूरतरतोऽपास्तं रसो योऽष्टमः ।
यद्रोषोत्करदक्षनेत्रकुटलिप्रान्तोत्थिताग्निस्फुरत्खद्योतोपमविस्फुलिङ्गभसिता ब्रह्मेशशक्रोत्कराः ॥२॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं Nakha ॥