Bhagavadgitabhashya: Difference between revisions
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उपोद्घातः | उपोद्घातः | ||
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वेदव्यासावतारे बीजम् | वेदव्यासावतारे बीजम् | ||
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महाभारतस्य सर्वशास्त्रोत्तमत्वे प्रमाणानि | महाभारतस्य सर्वशास्त्रोत्तमत्वे प्रमाणानि | ||
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महाभारतं दशार्थकम् | महाभारतं दशार्थकम् | ||
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महाभारतार्थस्य त्रैविध्यम् | महाभारतार्थस्य त्रैविध्यम् | ||
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महाभारतस्य निर्णेयता निर्णायकता च | महाभारतस्य निर्णेयता निर्णायकता च | ||
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(युक्त्या भारतस्य सर्वोत्तमत्वसमर्थनम् ) | (युक्त्या भारतस्य सर्वोत्तमत्वसमर्थनम् ) | ||
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गीता महाभारतादप्यधिका | गीता महाभारतादप्यधिका | ||
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गीतोक्तधर्मानुष्ठानं मुक्तिहेतुः | गीतोक्तधर्मानुष्ठानं मुक्तिहेतुः | ||
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( द्रोणाचार्यं प्रति दुर्योधनवचनम् ) | ( द्रोणाचार्यं प्रति दुर्योधनवचनम् ) | ||
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( दुर्योधनपक्षीया महारथाः ) | ( दुर्योधनपक्षीया महारथाः ) | ||
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( भीष्मादिभिः शङ्खनादः ) | ( भीष्मादिभिः शङ्खनादः ) | ||
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( भगवता गीतोपदेशारम्भः ) | ( भगवता गीतोपदेशारम्भः ) | ||
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ज्ञानिनो अर्जुनस्येषन्मोहप्रकारनिरूपणम् | ज्ञानिनो अर्जुनस्येषन्मोहप्रकारनिरूपणम् | ||
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प्रज्ञावादान् स्वमनीषोत्थवचनानि । कथमशोच्याः? | <span class="gr-moola">प्रज्ञावादान्</span> स्वमनीषोत्थवचनानि । कथमशोच्याः? <span class="gr-moola">गतासून्</span>॥११ ॥ | ||
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( ईश्वरनित्यत्वसमर्थनम् ) | ( ईश्वरनित्यत्वसमर्थनम् ) | ||
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किमिति? न त्वेवाहम् ॥ ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद् दृष्टान्तत्वेनाह | किमिति? <span class="gr-moola">न त्वेवाहम्</span> ॥ ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद् दृष्टान्तत्वेनाह –<span class="gr-prateeka">न त्वेति ॥</span> यथाऽहं नित्यः सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धः; एवं त्वमेते जनाधिपाश्च नित्याः ॥ १२ ॥ | ||
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( देहातिरिक्तात्मसद्भावे अनुभवप्रमाणम् ) | ( देहातिरिक्तात्मसद्भावे अनुभवप्रमाणम् ) | ||
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( जडस्य, सङ्गात-प्राणादिचैतन्ययोश्च ईक्षितृत्वनिषेधः ) | ( जडस्य, सङ्गात-प्राणादिचैतन्ययोश्च ईक्षितृत्वनिषेधः ) | ||
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(मनो न ज्ञाता, किन्त्वात्मैव ) | (मनो न ज्ञाता, किन्त्वात्मैव ) | ||
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(बौद्ध-चार्वाकौ प्रति वेदप्रामाण्यसमर्थनम् ) | (बौद्ध-चार्वाकौ प्रति वेदप्रामाण्यसमर्थनम् ) | ||
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( धर्मादिसिद्धावपौरुषेयवाक्यमेव मानम् ) | ( धर्मादिसिद्धावपौरुषेयवाक्यमेव मानम् ) | ||
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(धर्मादौ सर्वाभिमतिरेव प्रमाणम् ) | (धर्मादौ सर्वाभिमतिरेव प्रमाणम् ) | ||
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(अनुमानस्याप्रामाणिकत्वे वाचनिकव्यवहारासिद्धिः ) | (अनुमानस्याप्रामाणिकत्वे वाचनिकव्यवहारासिद्धिः ) | ||
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( चार्वाकशास्त्रस्य प्रयोजनादिनिराकरणम् ) | ( चार्वाकशास्त्रस्य प्रयोजनादिनिराकरणम् ) | ||
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(न पौरुषेयवाक्येण धर्मादिसिद्धिः ) | (न पौरुषेयवाक्येण धर्मादिसिद्धिः ) | ||
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(मरणे शोकः न कार्यः ) | (मरणे शोकः न कार्यः ) | ||
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देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- देहिनोऽस्मिन् ॥ यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् । | देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- <span class="gr-prateeka">देहिनोऽस्मिन् ॥</span> यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् । | ||
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न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ | न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः <span class="gr-moola">धीरस्तत्र न मुह्यति</span> ॥ | ||
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अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह | अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह –<span class="gr-prateeka">न त्वेवेति ॥</span> | ||
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| Line 877: | Line 905: | ||
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नापि देहनाशमित्याह – देहिन इति ॥ यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥ | नापि देहनाशमित्याह – <span class="gr-prateeka">देहिन इति ॥</span> यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥ | ||
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( सुखदुःखादौ मनसो विषयसम्बन्ध एव कारणम् ) | ( सुखदुःखादौ मनसो विषयसम्बन्ध एव कारणम् ) | ||
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( आत्मनो विषयेन्द्रियसन्निकर्षमात्रेण दुःखादिर्नास्ति ) | ( आत्मनो विषयेन्द्रियसन्निकर्षमात्रेण दुःखादिर्नास्ति ) | ||
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( अभिमान एव सुखदुःखादिकारणम् ) | ( अभिमान एव सुखदुःखादिकारणम् ) | ||
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(आत्मनः सुखादीनां च विषयविषयिभावसम्बन्धः ) | (आत्मनः सुखादीनां च विषयविषयिभावसम्बन्धः ) | ||
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( द्विविधम् आगमापायित्वम् ) | ( द्विविधम् आगमापायित्वम् ) | ||
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( देहाद्यात्मभ्रम एव दुःखकारणम् ) | ( देहाद्यात्मभ्रम एव दुःखकारणम् ) | ||
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तथाऽपि तद्दर्शनाभावादिना शोक इति चेद्? नेत्याह – मात्रास्पर्शा इति ॥ मीयन्त इति मात्राः = विषयाः, तेषां स्पर्शाः = सम्बन्धाः । त एव | तथाऽपि तद्दर्शनाभावादिना शोक इति चेद्? नेत्याह – <span class="gr-prateeka">मात्रास्पर्शा इति ॥</span> मीयन्त इति मात्राः = विषयाः, तेषां स्पर्शाः = सम्बन्धाः । त एव <span class="gr-moola">शीतोष्णसुखदुःखदाः</span>। देहे शीतोष्णादिसम्बन्धाद्धि शीतोष्णाद्यनुभव आत्मनः। ततश्च सुखदुःखे । नह्यात्मनः स्वतो दुःखादिः सम्भवति । कुतः? आगमापायित्वात् । यद्यात्मनः स्वतः स्युः सुप्तावपि स्युः । अतो ‘यतो मात्रास्पर्शा जाग्रदादावेव ते सन्ति; नान्यदा’ इति तदन्वयव्यतिरेकित्वात् तन्निमित्ता एव, नात्मनः स्वतः । | ||
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आत्मनश्च तैर्विषयविषयिभावसम्बन्धाद् अन्यः सम्बन्धो नास्ति । न चाऽगमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणापि नित्यत्वमस्ति । सुप्तिप्रलयादावभावाद् इत्याह – अनित्या इति ॥ | आत्मनश्च तैर्विषयविषयिभावसम्बन्धाद् अन्यः सम्बन्धो नास्ति । न चाऽगमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणापि नित्यत्वमस्ति । सुप्तिप्रलयादावभावाद् इत्याह – <span class="gr-prateeka">अनित्या इति ॥</span> | ||
}} | }} | ||
| Line 950: | Line 984: | ||
| id = BGB_C02_V14_B03 | | id = BGB_C02_V14_B03 | ||
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अत आत्मनो देहाद्यात्मभ्रम एव सुखदुःखकारणम् । अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं न संभवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य तान् शीतोष्णादीन् तितिक्षस्व ॥ १४ ॥ | अत आत्मनो देहाद्यात्मभ्रम एव सुखदुःखकारणम् । अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं न संभवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य <span class="gr-moola">तान्</span> शीतोष्णादीन् <span class="gr-moola">तितिक्षस्व</span> ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 967: | Line 1,001: | ||
| id = BGB_C02_V15_B01 | | id = BGB_C02_V15_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अतः प्रयोजनमाह – यं हीति ॥ यम् एते मात्रास्पर्शा न | अतः प्रयोजनमाह – <span class="gr-prateeka">यं हीति ॥</span> <span class="gr-moola">यम् एते</span> मात्रास्पर्शा <span class="gr-moola">न व्यथयन्ति</span>। पुरि शयमेव सन्तम् । शरीरसम्बन्धाभावे सर्वेषामपि व्यथाभावात् पुरुषम् इति विशेषणम् । कथं न व्यथयन्ति? समदुःखसुखत्वात् । तत् कथम् ? धैर्येण ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – नासत इति ॥ असतः कारणस्य सतः ब्रह्मणश्च अभावो न | ‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – <span class="gr-prateeka">नासत इति ॥</span> <span class="gr-moola">असतः</span> कारणस्य <span class="gr-moola">सतः</span> ब्रह्मणश्च <span class="gr-moola">अभावो न विद्यते</span>। | ||
}} | }} | ||
| Line 991: | Line 1,025: | ||
| id = BGB_C02_V16_B02 | | id = BGB_C02_V16_B02 | ||
| text = | | text = | ||
‘प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।’ इति वचनात् श्रीविष्णुपुराणे । पृथग् ‘विद्यते’ इत्यादरार्थः ॥ | ‘प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।’ इति वचनात् श्रीविष्णुपुराणे । पृथग् <span class="gr-moola">‘विद्यते’</span> इत्यादरार्थः ॥ | ||
}} | }} | ||
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असतः कारणत्वं च – ‘सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः’ (भाग.१.२.३१) इति भागवते । ‘असतः सदजायत’ (ऋ.१०.७२.२) इति च । अव्यक्तेश्च । सम्प्रदायतश्चैतत् सिद्धम् इत्याह – उभयोरपीति ॥ अन्तो निर्णयः॥१६ ॥ | असतः कारणत्वं च – ‘सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः’ (भाग.१.२.३१) इति भागवते । ‘असतः सदजायत’ (ऋ.१०.७२.२) इति च । अव्यक्तेश्च । सम्प्रदायतश्चैतत् सिद्धम् इत्याह – <span class="gr-prateeka">उभयोरपीति ॥</span> <span class="gr-moola">अन्तो</span> निर्णयः॥१६ ॥ | ||
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| Line 1,015: | Line 1,049: | ||
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किं बहुना ! यद् देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव, वेदाद्यन्यदपीत्याह – अविनाशीति ॥ नापि शापादिना विनाश इत्याह – विनाशमिति ॥ अव्ययं च तद् ॥ १७ ॥ | किं बहुना ! यद् देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव, वेदाद्यन्यदपीत्याह – <span class="gr-prateeka">अविनाशीति ॥</span> नापि शापादिना विनाश इत्याह – <span class="gr-prateeka">विनाशमिति ॥</span> अव्ययं च तद् ॥ १७ ॥ | ||
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( देहः अनित्यः ) | ( देहः अनित्यः ) | ||
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भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वम् इति । नेत्याह – अन्तवन्त इति | भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वम् इति । नेत्याह – <span class="gr-prateeka">अन्तवन्त इति ॥</span>अस्तु तर्हि दर्पणनाशात् प्रतिबिम्बनाशवत् आत्मनाशः ? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">नित्यस्येति ॥</span> <span class="gr-moola">‘शरीरिणः’</span> इति ईश्वरव्यावृत्तये । न च नैमित्तिकनाश इत्याह – <span class="gr-prateeka">अनाशिन इति ॥</span> कुतः ? अप्रमेयेश्वरसरूपत्वात् । न ह्युपाधिबिम्बसन्निध्यनाशे प्रतिबिम्बनाशः, सति च प्रदर्शके । स्वयमेवात्र प्रदर्शकः, चित्त्वात् । नित्यश्चोपाधिः कश्चिदस्ति ॥ | ||
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( आत्मनाशव्यवहारः भ्रान्तिमूलः ) | ( आत्मनाशव्यवहारः भ्रान्तिमूलः ) | ||
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( प्रतिबिम्बस्य न स्वतः क्रिया ) | ( प्रतिबिम्बस्य न स्वतः क्रिया ) | ||
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व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह – य एनमिति ॥ कुतः? उक्तहेतुभ्यो नायं हन्ति, न हन्यते । | व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह – <span class="gr-prateeka">य एनमिति ॥</span> कुतः? उक्तहेतुभ्यो <span class="gr-prateeka">नायं हन्ति, न हन्यते ।</span> | ||
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( जीवनित्यत्वे मन्त्रवर्णः ) | ( जीवनित्यत्वे मन्त्रवर्णः ) | ||
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अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – न जायत इति ॥ न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – ‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३) । ‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् । | अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – <span class="gr-prateeka">न जायत इति ॥</span> न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – ‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३) । ‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् । | ||
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कुतः? अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात् । शाश्वतः सदैकरूपः । पुरं = देहम् अणतीति | कुतः? अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात् । <span class="gr-moola">शाश्वतः</span> सदैकरूपः । पुरं = देहम् अणतीति <span class="gr-moola">पुराणः</span>। तथाऽपि <span class="gr-moola">न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे</span> ॥२० ॥ | ||
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अतो य एवं वेद स कथं कं घातयति, हन्ति वा ? अविनाशिनं नैमित्तिकनाशरहितम् । नित्यं स्वाभाविकनाशरहितम् । अथवा- अविनाशिनं दोषयोगरहितम्, नित्यं सदा भाविनम् इति सर्वत्र विवेकः । दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात् ॥ २१ ॥ | अतो य एवं वेद स कथं कं घातयति, हन्ति वा ? <span class="gr-moola">अविनाशिनं</span> नैमित्तिकनाशरहितम् । <span class="gr-moola">नित्यं</span> स्वाभाविकनाशरहितम् । अथवा- <span class="gr-moola">अविनाशिनं</span> दोषयोगरहितम्, <span class="gr-moola">नित्यं</span> सदा भाविनम् इति सर्वत्र विवेकः । दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात् ॥ २१ ॥ | ||
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देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह – वासांसीति ॥ २२ ॥ | देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह – <span class="gr-prateeka">वासांसीति ॥ २२ ॥</span> | ||
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( विशेषनिमित्तैरपि जीवो न विनश्यति ) | ( विशेषनिमित्तैरपि जीवो न विनश्यति ) | ||
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स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिद् निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदवत्, इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति – नैनमिति ॥२३ ॥ | स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिद् निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदवत्, इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति – <span class="gr-prateeka">नैनमिति ॥२३ ॥</span> | ||
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(सर्वागमानां भगवद्गुणोत्कर्षे महातात्पर्यम् ) | (सर्वागमानां भगवद्गुणोत्कर्षे महातात्पर्यम् ) | ||
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( भगवत इन्द्रादीनां च विद्यमानाऽन्तर्यवर्णनम्) | ( भगवत इन्द्रादीनां च विद्यमानाऽन्तर्यवर्णनम्) | ||
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( वेदव्याख्या इतिहासानुरोधेन कर्तव्या ) | ( वेदव्याख्या इतिहासानुरोधेन कर्तव्या ) | ||
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(ईश्वरधर्मा न मायामयाः ) | (ईश्वरधर्मा न मायामयाः ) | ||
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वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – अच्छेद्य इति ॥ वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । ‘शाश्वतः’ इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे । | वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">अच्छेद्य इति ॥</span> वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । <span class="gr-prateeka">‘शाश्वतः’</span> इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे । | ||
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अस्त्वेवम् आत्मनो नित्यत्वम्; तथाऽपि देहसंयोगवियोगात्मक-जनिमृती स्त एव? इत्यत आह – अथ चेति | अस्त्वेवम् आत्मनो नित्यत्वम्; तथाऽपि देहसंयोगवियोगात्मक-जनिमृती स्त एव? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">अथ चेति ॥</span>२६ ॥ | ||
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कुतोऽशोकः ? नियतत्वादित्याह – जातस्येति | कुतोऽशोकः ? नियतत्वादित्याह – <span class="gr-prateeka">जातस्येति ॥</span>२७ ॥ | ||
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तदेव स्पष्टयति – अव्यक्तादीनीति ॥ २८ ॥ | तदेव स्पष्टयति – <span class="gr-prateeka">अव्यक्तादीनीति ॥</span> २८ ॥ | ||
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‘देहयोगवियोगस्य नियतत्वाद्, आत्मनश्चेश्वरसरूपत्वात्, सर्वथाऽनाशाद् न शोकः कार्यः’ इत्युपसंहर्तुम् ऐश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति – आश्चर्यवदिति ॥ दुर्लभत्वेनेत्यर्थः । तद्धि आश्चर्यं लोके । दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चाऽऽत्मनस्तद्द्रष्टा॥२९-३० ॥ | ‘देहयोगवियोगस्य नियतत्वाद्, आत्मनश्चेश्वरसरूपत्वात्, सर्वथाऽनाशाद् न शोकः कार्यः’ इत्युपसंहर्तुम् ऐश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति – <span class="gr-prateeka">आश्चर्यवदिति ॥</span> दुर्लभत्वेनेत्यर्थः । तद्धि आश्चर्यं लोके । दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चाऽऽत्मनस्तद्द्रष्टा॥२९-३० ॥ | ||
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साङ्ख्यम् ज्ञानम् । ‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’ इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । योग उपायः । ‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३)इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति बुद्धिः । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् अभिहिता इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥ | <span class="gr-moola">साङ्ख्यम्</span> ज्ञानम् । ‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’ इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । <span class="gr-moola">योग</span> उपायः । ‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३)इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति <span class="gr-moola">बुद्धिः</span> । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् <span class="gr-moola">अभिहिता</span> इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥ | ||
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‘योग इमां बुद्धिं शृणु’ इत्युक्तम्; बह्व्यो हि बुद्धयो मतभेदात्; तत् कथम् एकत्र निष्ठां करोमि ? इत्यत आह – व्यवसायात्मिकेति ॥ सम्यग् युक्तिनिर्णीतानां मतानाम् ऐक्यमेव इत्यर्थः ॥ ४१ ॥ | ‘योग इमां बुद्धिं शृणु’ इत्युक्तम्; बह्व्यो हि बुद्धयो मतभेदात्; तत् कथम् एकत्र निष्ठां करोमि ? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">व्यवसायात्मिकेति ॥</span> सम्यग् युक्तिनिर्णीतानां मतानाम् ऐक्यमेव इत्यर्थः ॥ ४१ ॥ | ||
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स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – यामिमामिति ॥ ‘यामाहुस्तया’ इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं | स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">यामिमामिति ॥</span> <span class="gr-moola">‘यामाहुस्तया’</span> इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां <span class="gr-moola">वाचं प्रवदन्ति</span>। <span class="gr-moola">वेदवादरताः</span> कर्मादिवाचकवेदवादरताः; वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः । <span class="gr-moola">नान्यदस्तीति वादिनः ।</span> >,‘परोक्षविषया वेदाः’,‘परोक्षप्रिया इव हि देवाः’(ऐ.उ.३.१४), ‘मां विधत्तेऽभिधत्ते’(भाग.११.२१.४३) इत्यादिभिः पारोक्ष्येण हि प्रायो भगवन्तं वदन्ति । <span class="gr-moola">भोगैश्वर्यगतिं प्रति</span> तत्प्राप्तिं प्रति । तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः । तेषां सम्यग् युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः <span class="gr-moola">समाधौ</span> समाध्यर्थे <span class="gr-moola">न विधीयते</span> । सम्यङ् निर्णीतार्थानां हीश्वरे मनःसमाधानं सम्यग् भवति । तद्धि मोक्षसाधनम् । उक्तं चैतदन्यत्र– >, ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३) इति ॥ ४२-४४ ॥ | ||
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तां योगबुद्धिमाह - त्रैगुण्यविषया इत्यादिना इतरद् अपोद्य । वेदानां परोक्षार्थत्वात् त्रिगुणसम्बन्धि स्वर्गादि प्रतीतितोऽर्थ इव भाति (भवति) । ‘परोक्षवादी वेदोऽयम्’ इति ह्युक्तम् । अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुरु इत्यर्थः । ‘वादो विषयकत्वं (विषयकृत्त्वं) च मुखतो वचनं स्मृतम् ।’ इत्यभिधानम् । न तु वेदपक्षो निषिध्यते । ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते॥’(कल्कि.३५.३२), ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति.......।’(कठ.१.२.१५), ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥’(मनु.२.६), ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।(भाग.६.१.४०)’ इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेः । तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मत्वोक्तेः ॥ ४५ ॥ | तां योगबुद्धिमाह - <span class="gr-prateeka">त्रैगुण्यविषया इत्यादिना</span> इतरद् अपोद्य । वेदानां परोक्षार्थत्वात् त्रिगुणसम्बन्धि स्वर्गादि प्रतीतितोऽर्थ इव भाति (भवति) । ‘परोक्षवादी वेदोऽयम्’ इति ह्युक्तम् । अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुरु इत्यर्थः । ‘वादो विषयकत्वं (विषयकृत्त्वं) च मुखतो वचनं स्मृतम् ।’ इत्यभिधानम् । न तु वेदपक्षो निषिध्यते । ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते॥’(कल्कि.३५.३२), ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति.......।’(कठ.१.२.१५), ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥’(मनु.२.६), ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।(भाग.६.१.४०)’ इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेः । तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मत्वोक्तेः ॥ ४५ ॥ | ||
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तथाऽपि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेव? इत्यत आह – यावानर्थ इति ॥ यथा यावान् अर्थः प्रयोजनम् उदपाने कूपे भवति, तावान् सर्वतः सम्प्लुतोदके अन्तर्भवत्येव, एवं सर्वेषु वेदेषु यत् फलं तद् | तथाऽपि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेव? इत्यत आह – <span class="gr-prateeka">यावानर्थ इति ॥</span> यथा <span class="gr-moola">यावान् अर्थः</span> प्रयोजनम् <span class="gr-moola">उदपाने</span> कूपे भवति, <span class="gr-moola">तावान् सर्वतः सम्प्लुतोदके</span> अन्तर्भवत्येव, एवं सर्वेषु वेदेषु यत् फलं तद् <span class="gr-moola">विजानतो</span>ऽपि ज्ञानिनो <span class="gr-moola">ब्राह्मणस्य</span> फलेऽन्तर्भवति । ‘ब्रह्म अणति’ इति ब्राह्मणः =अपरोक्षज्ञानी । स हि ब्रह्म गच्छति । ‘विजानतः’ इति ज्ञानफलत्वं तस्य दर्शयति ॥ ४६ ॥ | ||
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कामात्मनां निन्दा कृता कथमेषाम् ? ‘स्वर्गकामो यजेत’इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वाद् इत्यत आह - कर्मण्येवेति ॥ ‘ते’ इत्युपलक्षणार्थम् । तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता; किम्वन्येषाम् ! न ‘त्वस्ति केषाञ्चिद्, न तेऽस्ति’ इति । स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च । मोहादिस्त्वभिभवादेः । यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानम्, क्व अन्येषाम् ? उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम् । ‘....पार्थार्ष्टिषेण....।’(भाग.२.७.४५)इत्यादिज्ञानिगणनाच्च । कामनिषेध एवात्र । फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति । न हि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतोऽपि भवन्ति । भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽपि अविरोधे । | कामात्मनां निन्दा कृता कथमेषाम् ? ‘स्वर्गकामो यजेत’इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वाद् इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">कर्मण्येवेति ॥</span> <span class="gr-moola">‘ते’</span> इत्युपलक्षणार्थम् । तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता; किम्वन्येषाम् ! न ‘त्वस्ति केषाञ्चिद्, न तेऽस्ति’ इति । स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च । मोहादिस्त्वभिभवादेः । यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानम्, क्व अन्येषाम् ? उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम् । ‘....पार्थार्ष्टिषेण....।’(भाग.२.७.४५)इत्यादिज्ञानिगणनाच्च । कामनिषेध एवात्र । फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति । न हि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतोऽपि भवन्ति । भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽपि अविरोधे । | ||
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अतः कर्माकरणे एव प्रत्यवायः, न तु ज्ञानादिनाऽकामनया वा फलाप्राप्तौ । अतः कर्मण्येवाधिकारः । अतस्तदेव कार्यम्; न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः । कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम्- ‘रोचनार्थं फलश्रुतिः’(भाग.११.३.४७), ‘यथा भैषज्यरोचनम्’(भाग.११.२१.२३) इत्यादौ भागवते । अत एव ‘कामी यजेत’ इत्यर्थः; न तु ‘कामी भूत्वा’ इत्यर्थः । ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं च’(मनु.१२.८९) इति वचनात्, वक्ष्यमाणेभ्यश्च । ‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादिभ्यश्च । अतो मा कर्मफलहेतुर्भूः । कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः, स मा भूः । तर्हि न करोमि? इत्यत आह– मा त इति ॥ कर्माकरणे च स्नेहो माऽस्त्वित्यर्थः । अन्य(था)फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात् । इच्छा च तस्य युक्ता ‘वृणीमहे ते परितोषणाय’(भाग.४.३०.४०) इत्यादिमहदाचारात् । अनिन्दनात्, विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्– ‘सर्वान् आनय, नैकं मैत्रम्’ इत्यादौ । अतः - ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिद्.....’(भाग.३.२६.३४), ‘भक्तिमन्विच्छन्तः’, ‘ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र,सू.१.१.१), ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत.....’,(बृ.उ.६.४.२१), ‘द्रष्टव्यः.....’ इत्यादिवचनेभ्यः, स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः, ‘किं ददामि’ इत्युक्ते सेवादियाचकं प्रति बहुतरः स्नेह इति लौकिकन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिप्रार्थना कार्येति सिद्धम् ॥४७ ॥ | अतः कर्माकरणे एव प्रत्यवायः, न तु ज्ञानादिनाऽकामनया वा फलाप्राप्तौ । अतः कर्मण्येवाधिकारः । अतस्तदेव कार्यम्; न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः । कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम्- ‘रोचनार्थं फलश्रुतिः’(भाग.११.३.४७), ‘यथा भैषज्यरोचनम्’(भाग.११.२१.२३) इत्यादौ भागवते । अत एव ‘कामी यजेत’ इत्यर्थः; न तु ‘कामी भूत्वा’ इत्यर्थः । ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं च’(मनु.१२.८९) इति वचनात्, वक्ष्यमाणेभ्यश्च । ‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादिभ्यश्च । अतो <span class="gr-moola">मा कर्मफलहेतुर्भूः</span> । कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः, स मा भूः । तर्हि न करोमि? इत्यत आह– <span class="gr-prateeka">मा त इति ॥</span> कर्माकरणे च स्नेहो माऽस्त्वित्यर्थः । अन्य(था)फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात् । इच्छा च तस्य युक्ता ‘वृणीमहे ते परितोषणाय’(भाग.४.३०.४०) इत्यादिमहदाचारात् । अनिन्दनात्, विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्– ‘सर्वान् आनय, नैकं मैत्रम्’ इत्यादौ । अतः - ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिद्.....’(भाग.३.२६.३४), ‘भक्तिमन्विच्छन्तः’, ‘ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र,सू.१.१.१), ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत.....’,(बृ.उ.६.४.२१), ‘द्रष्टव्यः.....’ इत्यादिवचनेभ्यः, स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः, ‘किं ददामि’ इत्युक्ते सेवादियाचकं प्रति बहुतरः स्नेह इति लौकिकन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिप्रार्थना कार्येति सिद्धम् ॥४७ ॥ | ||
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पूर्वश्लोकोक्तं स्पष्टयति – योगस्थ इति ॥ योगस्थः उपायस्थः । सङ्गं फलस्नेहं त्यक्त्वा । तत एव सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा । स एव च मयोक्तो योगः ॥ ४८ ॥ | पूर्वश्लोकोक्तं स्पष्टयति – <span class="gr-prateeka">योगस्थ इति ॥</span> <span class="gr-moola">योगस्थः</span> उपायस्थः । <span class="gr-moola">सङ्गं</span> फलस्नेहं <span class="gr-moola">त्यक्त्वा</span> । तत एव <span class="gr-moola">सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा</span> । स एव च मयोक्तो <span class="gr-moola">योगः</span> ॥ ४८ ॥ | ||
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इतश्च योगाय युज्यस्व इत्याह – दूरेणेति ॥ बुद्धियोगाद् ज्ञानलक्षणाद् उपायाद् । दूरेण अतीव । अतो बुद्धौ शरणं ज्ञाने स्थितिम् । फलं कर्मकृतौ हेतुर्येषां ते फलहेतवः ॥ ४९ ॥ | इतश्च योगाय युज्यस्व इत्याह – <span class="gr-prateeka">दूरेणेति ॥</span> <span class="gr-moola">बुद्धियोगाद्</span> ज्ञानलक्षणाद् उपायाद् । <span class="gr-moola">दूरेण</span> अतीव । अतो <span class="gr-moola">बुद्धौ शरणं</span> ज्ञाने स्थितिम् । फलं कर्मकृतौ हेतुर्येषां ते <span class="gr-moola">फलहेतवः</span> ॥ ४९ ॥ | ||
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ज्ञानफलमाह – बुद्धियुक्त इति ॥ सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति, न बृहत्फलमपि उपासनादिनिमित्तम् । ‘न हास्य (न तस्य)कर्म क्षीयते’(बृ.१.४.१५) , ‘अविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद् भवति’(बृ.३.८.१०)इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र । उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया । नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित् प्रयोजनम् । न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः । इष्टाश्च केचिद्विषयाः - ‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छां.उ.८.२.१), ‘प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम्’(छां.उ.८.४.१),‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’(छां.उ.८.१२.३), ‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृह. १.४.१५), ‘कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन्’(तै.उ. ३.१०.५),‘स एकधा भवति’(छां.उ.७.२६.२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात् कर्मसुखे न विरोधः । अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् । श्रुतेश्च । न च शरीरपातात् पूर्वमेतत् - ‘स तत्र पर्येति’(छां.८.१२.३), ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य’(तै.उ. ३.१०.५) इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात् । | ज्ञानफलमाह – <span class="gr-prateeka">बुद्धियुक्त इति ॥</span> सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति, न बृहत्फलमपि उपासनादिनिमित्तम् । ‘न हास्य (न तस्य)कर्म क्षीयते’(बृ.१.४.१५) , ‘अविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद् भवति’(बृ.३.८.१०)इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र । उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया । नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित् प्रयोजनम् । न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः । इष्टाश्च केचिद्विषयाः - ‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छां.उ.८.२.१), ‘प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम्’(छां.उ.८.४.१),‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’(छां.उ.८.१२.३), ‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृह. १.४.१५), ‘कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन्’(तै.उ. ३.१०.५),‘स एकधा भवति’(छां.उ.७.२६.२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात् कर्मसुखे न विरोधः । अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् । श्रुतेश्च । न च शरीरपातात् पूर्वमेतत् - ‘स तत्र पर्येति’(छां.८.१२.३), ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य’(तै.उ. ३.१०.५) इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात् । | ||
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सोऽस्त्येव सर्वात्मना– ‘अदुःखम्’, ‘सर्वदुःखविवर्जिताः’, ‘अशोकमहिमम्’,‘यत्र गत्वा न शोचति’(ब्राह्म.२३७.११) इत्यादिभ्यः । विशेषवचनाभावाच्च । येषां त्वीषद् दृश्यते ते न सायुज्यं प्राप्ताः । सामीप्याद्येव तेषाम् । अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात् तद् भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति । तच्चोक्तम्- ‘सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकाराद् अनन्तरम् ।प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति व्यासयोगे । अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः । ‘परब्रह्मत्वमिच्छामि परमात्मन् (परब्रह्मन्)जनार्दन’। इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात् । ‘न मोक्षसदृशं किञ्चिद् अधिकं वा सुखं क्वचित् । ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् ॥’ इत्यादेश्च ब्रह्मादिपदादपि अधिकतमं सुखं च मोक्ष इति सिद्धम् । अतो योगाय युज्यस्व । ज्ञानोपायाय । तद्धि कर्मकौशलम् ॥ ५० ॥ | सोऽस्त्येव सर्वात्मना– ‘अदुःखम्’, ‘सर्वदुःखविवर्जिताः’, ‘अशोकमहिमम्’,‘यत्र गत्वा न शोचति’(ब्राह्म.२३७.११) इत्यादिभ्यः । विशेषवचनाभावाच्च । येषां त्वीषद् दृश्यते ते न सायुज्यं प्राप्ताः । सामीप्याद्येव तेषाम् । अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात् तद् भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति । तच्चोक्तम्- ‘सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकाराद् अनन्तरम् ।प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति व्यासयोगे । अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः । ‘परब्रह्मत्वमिच्छामि परमात्मन् (परब्रह्मन्)जनार्दन’। इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात् । ‘न मोक्षसदृशं किञ्चिद् अधिकं वा सुखं क्वचित् । ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् ॥’ इत्यादेश्च ब्रह्मादिपदादपि अधिकतमं सुखं च मोक्ष इति सिद्धम् । <span class="gr-moola">अतो योगाय युज्यस्व</span> । ज्ञानोपायाय । तद्धि कर्मकौशलम् ॥ ५० ॥ | ||
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तदुपायमाह -कर्मजमिति ॥ कर्मजं फलं त्यक्त्वा, अकामनया ईश्वराय समर्प्य, बुद्धियुक्ताः सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा पदं गच्छन्ति । सयोगकर्म ज्ञानसाधनम् ; तन्मोक्षसाधनमिति भावः ॥ ५१ ॥ | तदुपायमाह -<span class="gr-prateeka">कर्मजमिति ॥</span> <span class="gr-moola">कर्मजं फलं त्यक्त्वा</span>, अकामनया ईश्वराय समर्प्य, बुद्धियुक्ताः सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा <span class="gr-moola">पदं गच्छन्ति</span> । सयोगकर्म ज्ञानसाधनम् ; तन्मोक्षसाधनमिति भावः ॥ ५१ ॥ | ||
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कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- यदेति ॥ निर्वेदं नितरां लाभम् । प्रयोगात् - ‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१) इत्यादि ।न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति ।‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे ।कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’ इति वचनात् ।अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्-‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०) इत्यादिवचनात् ।तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् । | कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- <span class="gr-prateeka">यदेति ॥</span> <span class="gr-moola">निर्वेदं</span> नितरां लाभम् । प्रयोगात् - ‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१) इत्यादि ।न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति ।‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे ।कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’ इति वचनात् ।अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्-‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०) इत्यादिवचनात् ।तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् । | ||
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तदेव स्पष्टयति - श्रुतिविप्रतिपन्नेति ॥ पूर्वं श्रुतिभिः= वेदैर्विप्रतिपन्ना= विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि निश्चला भवति; ततश्च समाधावचला, ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्; तदा योगमवाप्स्यसि उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ॥ ५३ ॥ | तदेव स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">श्रुतिविप्रतिपन्नेति ॥</span> पूर्वं श्रुतिभिः= वेदैर्विप्रतिपन्ना= विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि <span class="gr-moola">निश्चला</span> भवति; ततश्च <span class="gr-moola">समाधावचला</span>, ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्; <span class="gr-moola">तदा योगमवाप्स्यसि</span> उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ॥ ५३ ॥ | ||
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स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति भाषा, लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - समाधिस्थस्येति ॥ कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् । ‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च ।सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ इति वचनान्तराच्च | स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति <span class="gr-moola">भाषा</span>, लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - <span class="gr-prateeka">समाधिस्थस्येति ॥</span> कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् । ‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च ।सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ इति वचनान्तराच्च ।<span class="gr-moola">किमासीत ?</span> किं प्रत्यासीत ? न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम् -‘जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव हि ।तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये ।न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’ इति वचनात् ॥५४ ॥ | ||
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गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति ‘या निशा’ इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - प्रजहातीति ॥ एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् कामान् प्रजहाति । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । ‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्- ‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’ इति । अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् । | गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति <span class="gr-moola">‘या निशा’</span> इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - <span class="gr-prateeka">प्रजहातीति ॥</span> एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् <span class="gr-moola">कामान् प्रजहाति</span> । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । ‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्- ‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’ इति । अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् । | ||
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न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । ‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् । ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’ इति स्मृतेः । मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति -मनोगतानिति ॥ विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । आत्मना परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति ।‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः । देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’ इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥ | न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । ‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् । ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’ इति स्मृतेः । मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति -<span class="gr-prateeka">मनोगतानिति ॥</span> विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । <span class="gr-moola">आत्मना</span> परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति ।‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः । देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’ इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥ | ||
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सर्वत्रानभिस्नेहत्वात् शुभाशुभं प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि ॥५७, ५८॥ | सर्वत्रानभिस्नेहत्वात् शुभाशुभं प्राप्य <span class="gr-moola">नाभिनन्दति न द्वेष्टि</span> ॥५७, ५८॥ | ||
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न चैतल्लक्षणं ज्ञानम् अयत्नतोऽपि भवतीत्याहोत्तर(त्तरैः)श्लोकैः । निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति । इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा । रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते । स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह - विषया इति ॥ | न चैतल्लक्षणं ज्ञानम् अयत्नतोऽपि भवतीत्याहोत्तर(त्तरैः)श्लोकैः । निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति । इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा । रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते । स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह - <span class="gr-prateeka">विषया इति ॥</span> | ||
‘इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः ।वर्जयित्वा तु रसनाम् असौ रस्ये च वर्धते’॥(भाग.११.८.१९) इति वचनाद् भागवते । रसशब्दस्य रागवाचकत्वाच्च ॥५९ ॥ | ‘इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः ।वर्जयित्वा तु रसनाम् असौ रस्ये च वर्धते’॥(भाग.११.८.१९) इति वचनाद् भागवते । रसशब्दस्य रागवाचकत्वाच्च ॥५९ ॥ | ||
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अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्ति इन्द्रियाणि । पुरुषस्य शरीराभिमानिनः । को दोषस्ततः ? प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि पुरुषस्य ॥ ६० ॥ | अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्ति इन्द्रियाणि । <span class="gr-moola">पुरुषस्य</span> शरीराभिमानिनः । को दोषस्ततः ? <span class="gr-moola">प्रमाथीनि</span> प्रमथनशीलानि पुरुषस्य ॥ ६० ॥ | ||
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तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह - तानीति ॥ बहुयत्नवतः शक्यानि । अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः । युक्तो मयि मनोयुक्तः । अहमेव परः= सर्वस्माद् उत्कृष्टो यस्य स मत्परः । फलमाह - वशे हीति ॥६१॥ | तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह - <span class="gr-prateeka">तानीति ॥</span> बहुयत्नवतः शक्यानि । अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः । <span class="gr-moola">युक्तो</span> मयि मनोयुक्तः । अहमेव परः= सर्वस्माद् उत्कृष्टो यस्य स <span class="gr-moola">मत्परः</span> । फलमाह - <span class="gr-prateeka">वशे हीति ॥६१॥</span> | ||
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सम्मोहः अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - ‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’ इति । तथा चान्यत्र - ‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’ इति । स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् -‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा ।दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’ इति ॥ ६२, ६३ ॥ | <span class="gr-moola">सम्मोहः</span> अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - ‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’ इति । तथा चान्यत्र - ‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’ इति । <span class="gr-moola">स्मृतिविभ्रमः</span> प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । <span class="gr-moola">बुद्धिनाशः</span> सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । <span class="gr-moola">विनश्यति</span> नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् -‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा ।दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’ इति ॥ ६२, ६३ ॥ | ||
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विषयान् अनुभवन्नपि विधेय आत्मा= मनो यस्य सः, जितात्मेत्यर्थः । प्रसादं मनःप्रसादम् ॥ ६४ ॥ | विषयान् अनुभवन्नपि विधेय आत्मा= मनो यस्य सः, जितात्मेत्यर्थः । <span class="gr-moola">प्रसादं</span> मनःप्रसादम् ॥ ६४ ॥ | ||
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कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥ | कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? <span class="gr-moola">प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति</span> । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥ | ||
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न हि प्रसादाभावे युक्तिः = चित्तनिरोधः । अयुक्तस्य च बुद्धिः सम्यग्ज्ञानं नास्ति । तदेवोपपादयति - न चायुक्तस्येति ॥ शान्तिः मुक्तिः । ‘शान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम्’ इत्यभिधानात् ॥ ६६ ॥ | न हि प्रसादाभावे युक्तिः = चित्तनिरोधः । <span class="gr-moola">अयुक्तस्य च बुद्धिः</span> सम्यग्ज्ञानं <span class="gr-moola">नास्ति</span> । तदेवोपपादयति - <span class="gr-prateeka">न चायुक्तस्येति ॥</span> <span class="gr-moola">शान्तिः</span> मुक्तिः । ‘शान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम्’ इत्यभिधानात् ॥ ६६ ॥ | ||
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कथम् अयुक्तस्य भावना न भवति ? आह - इन्द्रियाणामिति ॥ अनुविधीयते क्रियते ननु ; ईश्वरेण इन्द्रियाणाम् अनु ! ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’ इत्यादि वक्ष्यमाणत्वात् । प्रज्ञां प्रज्ञानम् । उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः । उत्पन्नस्याऽप्यभिभवो भवति ॥ ६७ ॥ | कथम् अयुक्तस्य भावना न भवति ? आह - <span class="gr-prateeka">इन्द्रियाणामिति ॥</span> <span class="gr-moola">अनुविधीयते</span> क्रियते ननु ; ईश्वरेण इन्द्रियाणाम् अनु ! ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’ इत्यादि वक्ष्यमाणत्वात् । <span class="gr-moola">प्रज्ञां</span> प्रज्ञानम् । उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः । उत्पन्नस्याऽप्यभिभवो भवति ॥ ६७ ॥ | ||
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तस्मात् सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति - तस्मादिति ॥ ६८ ॥ | तस्मात् सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति - <span class="gr-prateeka">तस्मादिति ॥ ६८ ॥</span> | ||
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उक्तलक्षणं पिण्डीकृत्याऽह - या निशेति ॥ या सर्वभूतानां निशा परमेश्वरस्वरूपलक्षणा, यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति, तस्याम् इन्द्रियसंयमयुक्तो ज्ञानी जागर्ति । सम्यग्= आपरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः । यस्यां विषयलक्षणायां भूतानि जाग्रति तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति । मत्तादिवत् गमनादिप्रवृत्तिः । तदुक्तम् - ‘देहं तु तं न चरमम्’, ‘देहोऽपि दैववशगः’(भाग.३.२९.३७) इति श्लोकाभ्याम् । मननयुक्तो मुनिः । ‘पश्यत’ इति अस्य साधनमाह ॥ ६९ ॥ | उक्तलक्षणं पिण्डीकृत्याऽह - <span class="gr-prateeka">या निशेति ॥</span> <span class="gr-moola">या सर्वभूतानां निशा</span> परमेश्वरस्वरूपलक्षणा, यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति, <span class="gr-moola">तस्याम्</span> इन्द्रियसंयमयुक्तो ज्ञानी <span class="gr-moola">जागर्ति</span> । सम्यग्= आपरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः । <span class="gr-moola">यस्यां</span> विषयलक्षणायां <span class="gr-moola">भूतानि जाग्रति</span> तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति । मत्तादिवत् गमनादिप्रवृत्तिः । तदुक्तम् - ‘देहं तु तं न चरमम्’, ‘देहोऽपि दैववशगः’(भाग.३.२९.३७) इति श्लोकाभ्याम् । मननयुक्तो मुनिः । ‘पश्यत’ इति अस्य साधनमाह ॥ ६९ ॥ | ||
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| Line 2,052: | Line 2,101: | ||
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तेन विषयानुभवप्रकारमाह - आपूर्यमाणमिति ॥ यो विषयैरापूर्यमाणोऽपि अचलप्रतिष्ठो भवति= नोत्सेकं प्राप्नोति, न च प्रयत्नं करोति, न चाभावे शुष्यति । न हि समुद्रः सरित्प्रवेश-अप्रवेशनिमित्तवृद्धि-शोषौ बहुतरौ प्राप्नोति, प्रयत्नं वा करोति, स मुक्तिम् आप्नोति इत्यर्थः ॥ ७० ॥ | तेन विषयानुभवप्रकारमाह - <span class="gr-prateeka">आपूर्यमाणमिति ॥</span> यो विषयैरापूर्यमाणोऽपि अचलप्रतिष्ठो भवति= नोत्सेकं प्राप्नोति, न च प्रयत्नं करोति, न चाभावे शुष्यति । न हि समुद्रः सरित्प्रवेश-अप्रवेशनिमित्तवृद्धि-शोषौ बहुतरौ प्राप्नोति, प्रयत्नं वा करोति, स मुक्तिम् <span class="gr-moola">आप्नोति</span> इत्यर्थः ॥ ७० ॥ | ||
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एतदेव प्रपञ्चयति - विहायेति ॥ कामान् विषयान् निःस्पृहतया विहाय यश्चरति भक्षयति । ‘भक्षयामि’इत्य(त्याद्य)हङ्कारममकारवर्जितश्च । स हि पुमान् । स एव च मुक्तिम् अधिगच्छति इत्यर्थः ॥ ७१ ॥ | एतदेव प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">विहायेति ॥</span> <span class="gr-moola">कामान्</span> विषयान् निःस्पृहतया <span class="gr-moola">विहाय</span> <span class="gr-moola">यश्चरति</span> भक्षयति । ‘भक्षयामि’इत्य(त्याद्य)हङ्कारममकारवर्जितश्च । स हि पुमान् । स एव च मुक्तिम् <span class="gr-moola">अधिगच्छति</span> इत्यर्थः ॥ ७१ ॥ | ||
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उपसंहरति - एषेति ॥ ब्राह्मी स्थितिः ब्रह्मविषया स्थितिः = लक्षणम् । अन्तकालेऽपि अस्यां स्थित्वा एव ब्रह्म गच्छति । अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति । ‘यं यं वाऽपि’(भ.गी.८.६) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम् । ‘भोगेन त्वितरे’(ब्र.सू.४.१.१९) इति ह्युक्तम् । सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित् । ‘सप्तजन्मनि विप्रः स्याद्’ इत्यादेः । दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः । तथा ह्युक्तम् - ‘स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं ततः ।साङ्कर्षणं ततो मुक्तिम् अगाद् विष्णुप्रसादतः॥’ इति गारुडे । ‘महादेव परे जन्मंस्तव मुक्तिर्निरूप्यते’। इति नारदीये ।निश्चितफलं च ज्ञानम् - ‘तस्य तावदेव चिरम्’(छां.उ.६.१४.२), ‘यदु(दि) च नार्चिषमेवाभिसम्भवति’(छां.उ.४.१५.५) इत्यादिश्रुतिभ्यः । | उपसंहरति - <span class="gr-prateeka">एषेति ॥</span> <span class="gr-moola">ब्राह्मी स्थितिः</span> ब्रह्मविषया स्थितिः = लक्षणम् । <span class="gr-moola">अन्तकालेऽपि अस्यां स्थित्वा</span> एव <span class="gr-moola">ब्रह्म</span> गच्छति । अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति । ‘यं यं वाऽपि’(भ.गी.८.६) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम् । ‘भोगेन त्वितरे’(ब्र.सू.४.१.१९) इति ह्युक्तम् । सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित् । ‘सप्तजन्मनि विप्रः स्याद्’ इत्यादेः । दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः । तथा ह्युक्तम् - ‘स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं ततः ।साङ्कर्षणं ततो मुक्तिम् अगाद् विष्णुप्रसादतः॥’ इति गारुडे । ‘महादेव परे जन्मंस्तव मुक्तिर्निरूप्यते’। इति नारदीये ।निश्चितफलं च ज्ञानम् - ‘तस्य तावदेव चिरम्’(छां.उ.६.१४.२), ‘यदु(दि) च नार्चिषमेवाभिसम्भवति’(छां.उ.४.१५.५) इत्यादिश्रुतिभ्यः । | ||
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निर्बाणम् अशरीरम् । ‘कायो बाणं शरीरं च’ इत्यभिधानात् । ‘एतद्बाणमवष्टभ्य’इति प्रयोगाच्च । निर्बाणशब्दप्रतिपादनम्- ‘अनिन्द्रियाः’ इत्यादिवत् । कथम् अन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाकृतिर्भगवत उपपद्येत ? न चान्यद् भगवत उत्तमं ब्रह्म - ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११) इति भागवते । ‘भगवन्तं परं ब्रह्म’(भाग.३.२५.१०), ‘परं ब्रह्म जनार्दनः’, ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(म.भा.१३..९), ‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः’(१५.१८), ‘योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः’(म.स्मृ.१.१), ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति’(गरुड.३,१.१८), ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(११.४३) इत्यादिभ्यः । न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वाद् एतत् कल्प्यम् । तस्यापि शरीरश्रवणात्- ‘आनन्दरूपममृतम्’(आथ.४.१०,मु.उ.२.२.८), ‘सुवर्णज्योतीः’(भृगुवल्लि.१५,तै.उ.३.१०.६), ‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’(छां.उ.८.१.२) इत्यादिषु । यदि रूपं न स्यात्, ‘आनन्दम्’ इत्येव स्यात् ; न तु ‘आनन्दरूपम्’ इति । कथं च सुवर्णरूपत्वं स्याद् अरूपस्य ? कथं च दहरत्वम्? दहरस्थश्च- ‘केचित् स्वदेहे’ इत्यादौ रूपवान् उच्यते । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’(ऋ.सं,मं.१०.सू.९०.मं.१), ‘रुग्मवर्णं कर्तारम्’(मु.उ.३.१.३), ‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’(श्वे.उ.३.८), ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(श्वे.उ.३.१६), ‘विश्वतश्चक्षुरुत’(श्वे.उ.३.३)इत्यादिवचनाद्, विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवान् अवसीयते। | <span class="gr-moola">निर्बाणम्</span> अशरीरम् । ‘कायो बाणं शरीरं च’ इत्यभिधानात् । ‘एतद्बाणमवष्टभ्य’इति प्रयोगाच्च । निर्बाणशब्दप्रतिपादनम्- ‘अनिन्द्रियाः’ इत्यादिवत् । कथम् अन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाकृतिर्भगवत उपपद्येत ? न चान्यद् भगवत उत्तमं ब्रह्म - ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११) इति भागवते । ‘भगवन्तं परं ब्रह्म’(भाग.३.२५.१०), ‘परं ब्रह्म जनार्दनः’, ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(म.भा.१३..९), ‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः’(१५.१८), ‘योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः’(म.स्मृ.१.१), ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति’(गरुड.३,१.१८), ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(११.४३) इत्यादिभ्यः । न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वाद् एतत् कल्प्यम् । तस्यापि शरीरश्रवणात्- ‘आनन्दरूपममृतम्’(आथ.४.१०,मु.उ.२.२.८), ‘सुवर्णज्योतीः’(भृगुवल्लि.१५,तै.उ.३.१०.६), ‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’(छां.उ.८.१.२) इत्यादिषु । यदि रूपं न स्यात्, ‘आनन्दम्’ इत्येव स्यात् ; न तु ‘आनन्दरूपम्’ इति । कथं च सुवर्णरूपत्वं स्याद् अरूपस्य ? कथं च दहरत्वम्? दहरस्थश्च- ‘केचित् स्वदेहे’ इत्यादौ रूपवान् उच्यते । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’(ऋ.सं,मं.१०.सू.९०.मं.१), ‘रुग्मवर्णं कर्तारम्’(मु.उ.३.१.३), ‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’(श्वे.उ.३.८), ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(श्वे.उ.३.१६), ‘विश्वतश्चक्षुरुत’(श्वे.उ.३.३)इत्यादिवचनाद्, विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवान् अवसीयते। | ||
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| id = BGB_C02_V72_B05 | | id = BGB_C02_V72_B05 | ||
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तानि च सर्वाण्यन्योन्यस्वरूपाणि -‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५),‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६.१,भृगुवल्लि.२), ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२), ‘यस्य ज्ञानमयं तपः’(आथ.१.९), ‘समा भग प्रविश स्वाहा’(तै.उ.१.४.२,शिक्षावल्लि.११) ।‘न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥’, ‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः ॥’इति पैङ्गिखिलेषु ।‘देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः ।परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते ।तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया । ‘न च गर्भेऽवसद् देव्या न चापि वसुदेवतः ।न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः ।नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडतेऽमोघदर्शनः ॥’ इति पाद्मे ।‘न वै स आत्माऽऽत्मवताम् अधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः’ ।‘सर्गादेरीशिताऽजः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽप्यबोधम् । लोकानां दर्शयन् यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम॥’ ‘स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय (नरवत् प्रलापी) स्त्रीसङ्गिनाम् इति रतिं प्रथयंश्चचार।’ ‘पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम् ।रुद्रवाक्यम् ऋतं कर्तुम् अजितो जितवत् स्थितः ॥योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह ।न चाम्बा ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः ॥’ इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे ।न तत्र संसारसमानधर्मा निरूप्याः ।यत्र च परावरभेदोऽवगम्यते तत्र अज्ञबुद्धिम् अपेक्ष्य अवरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र ।तच्चोक्तम् - ‘परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः ।तथाऽप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वाम् ऋषयोऽपि हि ।परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् (ने) ॥’ इति गारुडे ।न चात्र किञ्चिदुपचारादिति(चरितादि) वाच्यम् । अचिन्त्यशक्तेः, पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम् ।‘कृष्णरामादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा ।न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाऽप्यस्मान् विमोहसि ॥’ इत्यादेश्च नारदीये ।तस्मात् सर्वदा सर्वरूपेषु अपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्म अपरोक्षज्ञानी ऋच्छति इति सिद्धम् ॥७२ ॥ | तानि च सर्वाण्यन्योन्यस्वरूपाणि -‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५),‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६.१,भृगुवल्लि.२), ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२), ‘यस्य ज्ञानमयं तपः’(आथ.१.९), ‘समा भग प्रविश स्वाहा’(तै.उ.१.४.२,शिक्षावल्लि.११) ।‘न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥’, ‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः ॥’इति पैङ्गिखिलेषु ।‘देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः ।परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते ।तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया । ‘न च गर्भेऽवसद् देव्या न चापि वसुदेवतः ।न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः ।नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडतेऽमोघदर्शनः ॥’ इति पाद्मे ।‘न वै स आत्माऽऽत्मवताम् अधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः’ ।‘सर्गादेरीशिताऽजः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽप्यबोधम् । लोकानां दर्शयन् यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम॥’ ‘स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय (नरवत् प्रलापी) स्त्रीसङ्गिनाम् इति रतिं प्रथयंश्चचार।’ ‘पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम् ।रुद्रवाक्यम् ऋतं कर्तुम् अजितो जितवत् स्थितः ॥योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह ।न चाम्बा ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः ॥’ इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे ।न तत्र संसारसमानधर्मा निरूप्याः ।यत्र च परावरभेदोऽवगम्यते तत्र अज्ञबुद्धिम् अपेक्ष्य अवरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र ।तच्चोक्तम् - ‘परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः ।तथाऽप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वाम् ऋषयोऽपि हि ।परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् (ने) ॥’ इति गारुडे ।न चात्र किञ्चिदुपचारादिति(चरितादि) वाच्यम् । अचिन्त्यशक्तेः, पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम् ।‘कृष्णरामादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा ।न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाऽप्यस्मान् विमोहसि ॥’ इत्यादेश्च नारदीये ।तस्मात् सर्वदा सर्वरूपेषु अपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्म अपरोक्षज्ञानी <span class="gr-moola">ऋच्छति</span> इति सिद्धम् ॥७२ ॥ | ||
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कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् | कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् किमिति<span class="gr-prateeka">कर्मणि घोरे</span> युद्धाख्ये नियोजयसि निवृत्तधर्मान् विनेत्याह-<span class="gr-prateeka">ज्यायसीति ॥ कर्मणः</span> सकाशाद् <span class="gr-prateeka">बुद्धिर्ज्यायसी चेत् ते</span> तव मता<span class="gr-prateeka">तत्</span> तर्हि ॥ १-२ ॥ | ||
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‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह-लोक इति ॥ | ‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह-<span class="gr-prateeka">लोक इति ॥</span> | ||
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द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः | द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः ।<span class="gr-prateeka">सांख्यानां</span> ज्ञानिनां सनकादीनाम् ।<span class="gr-prateeka">योगिनाम्</span> उपायिनां जनकादीनाम् । ज्ञाननिष्ठा अप्याधिकारिकत्वाद् ईश्वरेच्छया लोकसंग्रहार्थत्वाच्च ये कर्मयोग्या भवन्ति तेऽपि योगिनः ।<span class="gr-prateeka">निष्ठा</span> स्थितिः । त्वं तु जनकादिवत् सकर्मैव ज्ञानयोग्यः, न तु सनकादिवत् तत्त्यागेनेत्यर्थः। सन्ति हीश्वरेच्छयैव कर्मकृतः प्रियव्रतादयोऽपि ज्ञानिन एव । तथा ह्युक्तम् ‘ईश्वरेच्छया विनिवेशितकर्माधिकारः’ इति ॥ ३ ॥ | ||
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इतश्च नियोक्ष्यामीत्याह-न कर्मणामिति ॥ कर्मणां युद्धादीनाम् | इतश्च नियोक्ष्यामीत्याह-<span class="gr-prateeka">न कर्मणामिति ॥ कर्मणां</span> युद्धादीनाम् अनारम्भेण<span class="gr-prateeka">नैष्कर्म्यं</span> निष्कर्मतया काम्यकर्मपरित्यागेन प्राप्यत इति मोक्षं, <span class="gr-prateeka">नाश्नुते</span> । ज्ञानमेव तत्साधनं, न तु कर्माकरणमित्यर्थः । कुतः ? पुरुषत्वात् । सर्वदा स्थूलेन सूक्ष्मेण वा पुरेण युक्तो ननु जीवः ! यदि कर्माकरणेन मुक्तिः स्यात् स्थावराणां च । | ||
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ननु निष्कामकर्मणः फलाभावान्मोक्षः स्मृतः -‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिति चोच्यते ।निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥’ इति मानवे ।अतस्तत्साम्याद् अकरणेऽपि भवति इत्यत आह-न चेति | ननु निष्कामकर्मणः फलाभावान्मोक्षः स्मृतः -‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिति चोच्यते ।निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥’ इति मानवे ।अतस्तत्साम्याद् अकरणेऽपि भवति इत्यत आह-<span class="gr-prateeka">न चेति ॥</span><span class="gr-prateeka">सन्न्यासः</span> काम्यकर्मपरित्यागः । ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ (१८.२) इति वक्ष्यमाणत्वात् । अकामकर्मणाम् अन्तःकरणशुध्या ज्ञानान्मोक्षो भवति । तच्चोक्तम्- ‘कर्मभिश्शुद्धसत्त्वस्य वैराग्यं जायते हृदि ।’ इति भागवते । विरक्तानामेव च ज्ञानमित्युक्तम् । -‘न तस्य तत्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचस्समासन् ।स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेध(धि)सौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’ (भाग. ५-११-३) इति । न तु फलाभावात् । कर्माभावात् । अतो न कर्मत्याग एव मोक्षसाधनम् । | ||
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न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह-न हीति ॥५॥ | न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह-<span class="gr-prateeka">न हीति</span> ॥५॥ | ||
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तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह-कर्मेन्द्रियाणीति ॥ | तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह-<span class="gr-prateeka">कर्मेन्द्रियाणीति ॥</span> | ||
मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह-मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति ॥ कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्, न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः । सन्न्यासादिविधानात्, सामान्यवचनाच्च ॥ ६-७ ॥ | मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह-<span class="gr-prateeka">मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति ॥ कर्मयोगं</span> स्ववर्णाश्रमोचितम्, न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः । सन्न्यासादिविधानात्, सामान्यवचनाच्च ॥ ६-७ ॥ | ||
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‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह-यज्ञार्थादिति ॥ कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य | ‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह-<span class="gr-prateeka">यज्ञार्थादिति ॥</span> कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य स<span class="gr-prateeka">कर्मबन्धनः</span> ।<span class="gr-prateeka">यज्ञो</span> विष्णुः । यज्ञार्थं सङ्गरहितं कर्म न बन्धकमित्यर्थः ।<span class="gr-prateeka">‘मुक्तसङ्गः’</span> इति विशेषणात् । ‘कामान् यः कामयते’ (मुं. ४. १-२) इति श्रुतेश्च । ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति वक्ष्यमाणत्वाच्च । ‘एतान्यपि तु कर्माणि’ (१८.६) इति च । ‘तस्मान्नेष्टि-याजुकः स्यात्’ (बृ.१.५.२) इति च । विशेषवचनत्वे समेऽपि विशेषणं परिशिष्यते ॥ ९ ॥ | ||
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अत्रार्थवादमाह-सहयज्ञा इति ॥ १०-१३ ॥ | अत्रार्थवादमाह-<span class="gr-prateeka">सहयज्ञा इति</span> ॥ १०-१३ ॥ | ||
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हेत्वन्तरमाह-अन्नादिति ॥ यज्ञः पर्जन्यान्नत्वात् तत्कारणमुच्यते । पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति । तद्धि आपाद्यं कर्मविधये । न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम् । | हेत्वन्तरमाह-<span class="gr-prateeka">अन्नादिति ॥</span> यज्ञः पर्जन्यान्नत्वात् तत्कारणमुच्यते । पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति । तद्धि आपाद्यं कर्मविधये । न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम् । | ||
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मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । | मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । तच्च<span class="gr-prateeka">यज्ञाद् भवति</span> । | ||
‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) । | ‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) । | ||
उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति | उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति ।<span class="gr-prateeka">यज्ञो</span> देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः,<span class="gr-prateeka">कर्म</span> इतरक्रिया ॥ १४ ॥ | ||
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तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह -यस्त्विति ॥ रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः । सन्तोषस्तज्जनकं सुखम् । ‘सन्तोषस्तृप्तिकारणम्’ इत्यभिधानात् । परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः । अन्यत्र सर्वात्मनालम्बुद्धिं च । | तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह -<span class="gr-prateeka">यस्त्विति ॥</span> रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः । सन्तोषस्तज्जनकं सुखम् । ‘सन्तोषस्तृप्तिकारणम्’ इत्यभिधानात् । परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः । अन्यत्र सर्वात्मनालम्बुद्धिं च । | ||
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न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति | न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थ<span class="gr-prateeka">व्यपाश्रयः</span> । | ||
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आचारोऽप्यस्तीत्याह-कर्मणैवेति | आचारोऽप्यस्तीत्याह-<span class="gr-prateeka">कर्मणैवेति ॥</span><span class="gr-prateeka">कर्मणा</span> सह कर्म कुवन्त एवेत्यर्थः । कर्म कृत्वैव ततो ज्ञानं प्राप्य वा । | ||
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स यद् वाक्यादिकं प्रमाणं कुरुते, यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः ॥ २१ ॥ | <span class="gr-prateeka">स यद्</span> वाक्यादिकं <span class="gr-prateeka">प्रमाणं कुरुते</span>, यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः ॥ २१ ॥ | ||
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विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह-प्रकृतेरिति॥ प्रकृतेर्गुणैः इन्द्रियादिभिः । प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि । तत्सम्बन्धीनि च । न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया ॥ २७ ॥ | विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह-<span class="gr-prateeka">प्रकृतेरिति॥</span> <span class="gr-prateeka">प्रकृतेर्गुणैः</span> इन्द्रियादिभिः । प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि । तत्सम्बन्धीनि च । न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया ॥ २७ ॥ | ||
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कर्मभेदस्य गुणभेदस्य | कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च<span class="gr-prateeka">तत्त्ववित् । गुणा</span> इन्द्रियादीनि ।<span class="gr-prateeka">गुणेषु</span> विषयेषु ॥ २८ ॥ | ||
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अतः सर्वाणि | अतः सर्वाणि कर्माणि<span class="gr-prateeka">मय्येव सन्न्यस्य</span> भ्रान्त्या जीवेऽध्यारोपितानि मय्येव विसृज्य ‘भगवानेव सर्वाणि कर्माणि करोति’ इति, मत्पूजेति च । आत्मानं मामधिकृत्य यच्चेतः तद् अध्यात्मचेतः । सन्न्यासस्तु भगवान् करोतीति । निर्ममत्वं नाहं करोमीति ॥ ३० ॥ | ||
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फलमाह-ये म इति ॥ ये त्वेवं निवृत्तकमिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा । किमु अपरोक्षज्ञानिनः ? न तु साधनान्तरमुच्यते ।‘निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये । अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते । सर्वं तदन्तराधाय मुक्तये साधनं भवेत् । न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् ॥’ | फलमाह-<span class="gr-prateeka">ये म इति ॥</span> ये त्वेवं निवृत्तकमिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा । किमु अपरोक्षज्ञानिनः ? न तु साधनान्तरमुच्यते ।‘निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये । अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते । सर्वं तदन्तराधाय मुक्तये साधनं भवेत् । न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् ॥’ | ||
इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । | इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । | ||
अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥ | अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥ | ||
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तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह-इन्द्रियस्येति | तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह-<span class="gr-prateeka">इन्द्रियस्येति ॥</span>तथा ह्युक्तम् - ‘संस्कारो बलवानेव ब्रह्माद्या अपि तद्वशाः । तथाऽपि सोऽन्यथाकर्तुं शक्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥’ इति ॥ ३४ ॥ | ||
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तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह-श्रेयानिति ॥ ३५ ॥ | तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह-<span class="gr-prateeka">श्रेयानिति</span> ॥ ३५ ॥ | ||
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बहवः कर्मकारणाः सन्ति, क्रोधादयः कामश्च । तत्र को बलवान् ? इति पृच्छति-अथेति ॥ अथेत्यर्थान्तरं ‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ इति प्रश्नप्रापकम् ॥ ३६ ॥ | बहवः कर्मकारणाः सन्ति, क्रोधादयः कामश्च । तत्र को बलवान् ? इति पृच्छति-<span class="gr-prateeka">अथेति ॥</span> अथेत्यर्थान्तरं ‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ इति प्रश्नप्रापकम् ॥ ३६ ॥ | ||
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यस्तु बलवान् प्रवर्तकः | यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स<span class="gr-prateeka">एष कामः</span> ।<span class="gr-prateeka">क्रोधो</span> ऽप्येष एव तज्जन्यत्वात् । ‘कामात् क्रोधोऽभिजायते’ (२.६२) इति ह्युक्तम् । यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधस्तत्रापि भक्तिनिमित्त-अनिन्दा-कामनिमित्त एव । ये त्वन्यथा वदन्ति ते शङ्करान्न सूक्ष्मं जानन्ति । उक्तं च ‘ऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते हि कथञ्चन’ इति ।<span class="gr-prateeka">महाशनः</span> । महद्धि कामभोग्यम् । महाब्रह्महत्यादिकारणत्वान् <span class="gr-prateeka">महापाप्मा</span> । सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद् वैरी ॥ ३७ ॥ | ||
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शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! | शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! <span class="gr-prateeka">कामरूपेण</span>कामाख्येन नित्यवैरिणा ।<span class="gr-prateeka">दुष्पूरेण</span> दुःखेन हि कामः पूर्यते । न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते । यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तम्, पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलम्बुद्धिर्नास्तीती <span class="gr-prateeka">अनलः</span>। उक्तं च- ‘ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा । आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भोल्बोपि हि कामकः ॥’ इति ॥३९ ॥ | ||
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वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह-इन्द्रियाणीति ॥ एतैर्ज्ञानमावृत्य बुध्यादिभिर्हि विषयैः ज्ञानमावृतं भवति ॥ ४० ॥ | वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह-<span class="gr-prateeka">इन्द्रियाणीति ॥</span> <span class="gr-prateeka">एतैर्ज्ञानमावृत्य</span> बुध्यादिभिर्हि विषयैः ज्ञानमावृतं भवति ॥ ४० ॥ | ||
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शत्रुहनन आयुधरूपं ज्ञानं वक्तुं ज्ञेयमाह-इन्द्रियाणीति ॥ ‘असङ्गज्ञानासिमादाय तराति पारम्’ इति ह्युक्तम् । | शत्रुहनन आयुधरूपं ज्ञानं वक्तुं ज्ञेयमाह-<span class="gr-prateeka">इन्द्रियाणीति ॥</span> ‘असङ्गज्ञानासिमादाय तराति पारम्’ इति ह्युक्तम् । शरीराद्<span class="gr-prateeka">इन्द्रियाणि पराणि</span> उत्कृष्टानि । न केवलं बुद्धेः परः । श्रुत्युक्त-प्रकारेणाव्यक्तादपि । ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इति हि श्रुतिः । न च तत्रतत्रोक्तैकदेशज्ञानमात्रेण भवति मुक्तिः । सार्वत्रिक-गुणोपसंहारो हि भगवता गुणोपसंहारपादेऽभिहितः । ‘आनन्दादयः प्रधानस्य’ (ब्र.सू. ३-३-१२) इत्यादिना । तथा चान्यत्र- ‘अपौरुषेयवेदेषु विष्णुवेदेषु चैव हि ।सर्वत्र ये गुणाः प्रोक्ताः सम्प्रदायागताश्च ये ॥सर्वैस्तैः सह विज्ञाय ये पश्यन्ति परं हरिम् ।तेषामेव भवेन्मुक्तिर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति गारुडे ।तस्मादव्यक्तादपि परत्वेन ज्ञेयः । न चात्र जीव उच्यते । ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’(२.५९) इत्युक्तत्वात् । ‘अविहाय परं मत्तो जयः कामस्य वै कुतः’ इति च । अतः परमात्मज्ञानमेवात्र विवक्षितम् ।<span class="gr-prateeka">आत्मानं</span> मनः ।<span class="gr-prateeka">आत्मना</span> बुध्या ॥ ४२-४३ ॥ | ||
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पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह -इममिति ॥ १-३ ॥ | पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह -<span class="gr-prateeka">इममिति ॥</span> १-३ ॥ | ||
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‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति -अपरमिति ॥ ४-५ ॥ | ‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति -<span class="gr-prateeka">अपरमिति ॥</span> ४-५ ॥ | ||
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न तर्ह्यनादिर्भवान् ? इत्यत आह -अजोऽपीति ॥ अव्यय आत्मा= देहोऽपीति अव्ययात्मा । ‘अनन्तं विश्वतो मुखम्’(११.११) इति हि रूपविशेषणमुत्तरत्र । ‘एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्’ (भाग.१.३.५) इति च । ‘जगृहे.....’(भाग.१.३.१) इति तु व्यक्तिः । युक्तयस्तूक्ताः । आत्मानादित्वं तु सर्वसमम् । | न तर्ह्यनादिर्भवान् ? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">अजोऽपीति ॥</span> अव्यय आत्मा= देहोऽपीति <span class="gr-moola">अव्ययात्मा</span> । ‘अनन्तं विश्वतो मुखम्’(११.११) इति हि रूपविशेषणमुत्तरत्र । ‘एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्’ (भाग.१.३.५) इति च । ‘जगृहे.....’(भाग.१.३.१) इति तु व्यक्तिः । युक्तयस्तूक्ताः । आत्मानादित्वं तु सर्वसमम् । | ||
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कथमनादिनित्यस्य जनिः? प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय । प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु । तथैव (तयैव) तेषां जात इव प्रतीयत इत्यर्थः । न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह -स्वामिति ॥ ‘द्रव्यं कर्म च...’ (भाग.२.५.१४) इति ह्युक्तम् । सा हि तत्रोक्ता । ततः सर्वसृष्टेः । आत्ममायया आत्मज्ञानेन । प्रकृतेः पृथगभिधानात् । ‘केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया’ इति ह्यभिधानम् । सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकयाऽजात एव जात इव प्रतीयते वा । उक्तं च– ‘महदादेस्तु माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता । विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि ।जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् ॥’ इति । ईश्वरः ईशेभ्योऽपि वरः । तच्चोक्तम्- ‘ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान् ।वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।‘समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः’ इति च॥ ६,७ ॥ | कथमनादिनित्यस्य जनिः? <span class="gr-moola">प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय</span> । प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु । तथैव (तयैव) तेषां जात इव प्रतीयत इत्यर्थः । न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह -<span class="gr-prateeka">स्वामिति ॥</span> ‘द्रव्यं कर्म च...’ (भाग.२.५.१४) इति ह्युक्तम् । सा हि तत्रोक्ता । ततः सर्वसृष्टेः । <span class="gr-moola">आत्ममायया</span> आत्मज्ञानेन । प्रकृतेः पृथगभिधानात् । ‘केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया’ इति ह्यभिधानम् । सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकयाऽजात एव जात इव प्रतीयते वा । उक्तं च– ‘महदादेस्तु माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता । विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि ।जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् ॥’ इति । <span class="gr-moola">ईश्वरः</span> ईशेभ्योऽपि वरः । तच्चोक्तम्- ‘ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान् ।वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।‘समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः’ इति च॥ ६,७ ॥ | ||
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सन्ति च तथा मुक्ता | सन्ति च तथा मुक्ता इत्याह–<span class="gr-prateeka">वीतरागेति ॥</span> <span class="gr-moola">मन्मयाः</span> मत्प्रचुराः । सर्वत्र मां विना न किञ्चित् पश्यन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥ | ||
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न च मद्भजनमात्रेण मुक्तिर्भवत्यन्यदेवतादिरूपेण । तथाऽपि सर्वेषामानुरूप्येण फलं ददामीत्याह -ये यथेति ॥ भजामि सेवयामि फलदानेन; न तु गुणभावेन । कथमयं विशेषः? इत्यत आह -मम वर्त्मेति ॥ अन्यदेवता यजन्तोऽपि मम वर्त्मैवानुवर्तन्ते । सर्वकर्मकर्तृत्वाद् भोक्तृत्वाच्च मम । | न च मद्भजनमात्रेण मुक्तिर्भवत्यन्यदेवतादिरूपेण । तथाऽपि सर्वेषामानुरूप्येण फलं ददामीत्याह -<span class="gr-prateeka">ये यथेति ॥</span> <span class="gr-moola">भजामि</span> सेवयामि फलदानेन; न तु गुणभावेन । कथमयं विशेषः? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">मम वर्त्मेति ॥</span> अन्यदेवता यजन्तोऽपि <span class="gr-moola">मम वर्त्मैवानुवर्तन्ते</span> । सर्वकर्मकर्तृत्वाद् भोक्तृत्वाच्च मम । | ||
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| Line 3,114: | Line 3,163: | ||
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कुतो मम वर्त्मानुवर्तन्ते ? क्षिप्रं हि ॥ अत एव हि फलप्राप्तिः । ‘तस्मात्ते धनसनयः’(छा.१.३.९) इति हि श्रुतिः ॥ १२ ॥ | कुतो मम वर्त्मानुवर्तन्ते ? <span class="gr-moola">क्षिप्रं हि ॥</span> अत एव हि फलप्राप्तिः । ‘तस्मात्ते धनसनयः’(छा.१.३.९) इति हि श्रुतिः ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 3,131: | Line 3,180: | ||
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अहमेव हि कर्तेत्याह -चातुर्वर्ण्यमिति ॥ चतुर्वर्णसमुदायः । सात्त्विको हि ब्राह्मणः । सात्त्विकराजसः क्षत्रियः । राजसतामसो वैश्यः । तामसः शूद्रः इति गुणविभागः । कर्मविभागस्तु ‘शमो दमः’(१८.४२) इत्यादिना वक्ष्यते । क्रियाया वैलक्षण्यात् कर्ताऽप्यकर्ता । तथाहि श्रुतिः– ‘विश्वकर्मा विमनाः...’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१५ व,८२ सू) इत्यादि । ‘.....तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः।’(भाग.६.४.४६) इत्यादि च । साधितं चैतत् पुरस्तात् ॥ १३ ॥ | अहमेव हि कर्तेत्याह -<span class="gr-prateeka">चातुर्वर्ण्यमिति ॥</span> चतुर्वर्णसमुदायः । सात्त्विको हि ब्राह्मणः । सात्त्विकराजसः क्षत्रियः । राजसतामसो वैश्यः । तामसः शूद्रः इति गुणविभागः । कर्मविभागस्तु ‘शमो दमः’(१८.४२) इत्यादिना वक्ष्यते । क्रियाया वैलक्षण्यात् कर्ताऽप्यकर्ता । तथाहि श्रुतिः– ‘विश्वकर्मा विमनाः...’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१५ व,८२ सू) इत्यादि । ‘.....तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः।’(भाग.६.४.४६) इत्यादि च । साधितं चैतत् पुरस्तात् ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 3,148: | Line 3,197: | ||
| id = BGB_C04_V14_B01 | | id = BGB_C04_V14_B01 | ||
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अत एव न मां कर्माणि लिम्पन्ति । इतश्च न लिम्पन्तीत्याह - न मे कर्मफले स्पृहा ॥ इच्छामात्रं त्वस्ति; न तु तत्राभिनिवेशः । तच्चोक्तम्– ‘आकाङ्क्षन्नपि देवोऽसौ नेच्छते लोकवत् परः ।नह्याग्रहस्तस्य विष्णोर्ज्ञानं कामो हि तस्य तु ॥’ इति । न च केचिन्मुक्ता भवन्तीति क्रमेण सर्वमुक्तिः । तथाहि श्रुतिः- ‘ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो न मृत्युमुपयाति विद्वान्’ इति, ‘कथं वा इति, अनन्ता वा इत्यनन्तवत् इति होवाच’ इति ॥ १४ ॥ | अत एव न मां कर्माणि लिम्पन्ति । इतश्च न लिम्पन्तीत्याह - <span class="gr-prateeka">न मे कर्मफले स्पृहा ॥</span> इच्छामात्रं त्वस्ति; न तु तत्राभिनिवेशः । तच्चोक्तम्– ‘आकाङ्क्षन्नपि देवोऽसौ नेच्छते लोकवत् परः ।नह्याग्रहस्तस्य विष्णोर्ज्ञानं कामो हि तस्य तु ॥’ इति । न च केचिन्मुक्ता भवन्तीति क्रमेण सर्वमुक्तिः । तथाहि श्रुतिः- ‘ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो न मृत्युमुपयाति विद्वान्’ इति, ‘कथं वा इति, अनन्ता वा इत्यनन्तवत् इति होवाच’ इति ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 3,165: | Line 3,214: | ||
| id = BGB_C04_V15_B01 | | id = BGB_C04_V15_B01 | ||
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एवं ज्ञात्वा कर्मकरण आचारोऽप्यस्तीत्याह -एवमिति ॥ पूर्वतरं कर्म पूर्वभावीत्यर्थः ॥ १५ ॥ | एवं ज्ञात्वा कर्मकरण आचारोऽप्यस्तीत्याह -<span class="gr-prateeka">एवमिति ॥</span> <span class="gr-moola">पूर्वतरं कर्म</span> पूर्वभावीत्यर्थः ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 3,182: | Line 3,231: | ||
| id = BGB_C04_V16_B01 | | id = BGB_C04_V16_B01 | ||
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कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् -किं कर्मेति ॥ १६ ॥ | कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् -<span class="gr-prateeka">किं कर्मेति ॥</span> १६ ॥ | ||
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| Line 3,199: | Line 3,248: | ||
| id = BGB_C04_V17_B01 | | id = BGB_C04_V17_B01 | ||
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न केवलं तज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे, ज्ञात्वैवेत्याशयवानाह -कर्मण इति ॥ तच्चोक्तम्– ‘अज्ञात्वा भगवान् कस्य कर्माकर्मविकर्मकम् । दर्शनं याति हि मुने कुतो मुक्तिश्च तद् विना ॥’ इति । अकर्म कर्माकरणम् । कर्माकर्मान्यद् विकर्म । निषिद्धम् । बन्धकत्वात् । ततो विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमित्यादि । न च शापादिना । कवयोऽप्यत्र मोहिताः । अशक्यं चैतज्ज्ञातुमित्याह -गहनेति ॥ १७ ॥ | न केवलं तज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे, ज्ञात्वैवेत्याशयवानाह -<span class="gr-prateeka">कर्मण इति ॥</span> तच्चोक्तम्– ‘अज्ञात्वा भगवान् कस्य कर्माकर्मविकर्मकम् । दर्शनं याति हि मुने कुतो मुक्तिश्च तद् विना ॥’ इति । <span class="gr-moola">अकर्म</span> कर्माकरणम् । कर्माकर्मान्यद् <span class="gr-moola">विकर्म</span> । निषिद्धम् । बन्धकत्वात् । ततो विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमित्यादि । न च शापादिना । कवयोऽप्यत्र मोहिताः । अशक्यं चैतज्ज्ञातुमित्याह -<span class="gr-prateeka">गहनेति ॥</span> १७ ॥ | ||
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| Line 3,216: | Line 3,265: | ||
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कर्मादिस्वरूपमाह -कर्मणीति ॥ कर्मणि क्रियमाणे सति अकर्म यः पश्येत् - विष्णोरेव कर्म, नाहं चित्प्रतिबिम्बः किञ्चित् करोमि इति । अकर्मणि सुप्त्यादावकरणावस्थायां परमेश्वरस्य यः कर्म पश्यति- ‘अयमेव परमेश्वरः सर्वदा सर्वसृष्ट्यादि करोति’ इति । स बुद्धिमान् ज्ञानी । स एव च युक्तो योगयुक्तः । सर्वाकरणात् स एव च कृत्स्नकर्मकृत् कृत्स्नफलत्वात् ॥ १८ ॥ | कर्मादिस्वरूपमाह -<span class="gr-prateeka">कर्मणीति ॥</span> <span class="gr-moola">कर्मणि</span> क्रियमाणे सति <span class="gr-moola">अकर्म यः पश्येत्</span> - विष्णोरेव कर्म, नाहं चित्प्रतिबिम्बः किञ्चित् करोमि इति । <span class="gr-moola">अकर्मणि</span> सुप्त्यादावकरणावस्थायां परमेश्वरस्य यः कर्म पश्यति- ‘अयमेव परमेश्वरः सर्वदा सर्वसृष्ट्यादि करोति’ इति । <span class="gr-moola">स बुद्धिमान्</span> ज्ञानी । स एव च <span class="gr-moola">युक्तो</span> योगयुक्तः । सर्वाकरणात् स एव च कृत्स्नकर्मकृत् कृत्स्नफलत्वात् ॥ १८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,233: | Line 3,282: | ||
| id = BGB_C04_V19_B01 | | id = BGB_C04_V19_B01 | ||
| text = | | text = | ||
एतदेव प्रपञ्चयति - यस्य इत्यादिना श्लोकपञ्चकेन । उक्तप्रकारेण | एतदेव प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">यस्य</span> इत्यादिना श्लोकपञ्चकेन । उक्तप्रकारेण <span class="gr-moola">ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्</span>॥ १९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,250: | Line 3,299: | ||
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| text = | | text = | ||
न च कामसङ्कल्पाभावेनालम् । आसङ्गं स्नेहं च | न च कामसङ्कल्पाभावेनालम् । <span class="gr-moola">आसङ्गं</span> स्नेहं च <span class="gr-moola">त्यक्त्वा</span>। ज्ञानस्वरूपमाह पुनः - <span class="gr-prateeka">नित्यतृप्त इति ॥</span> नित्यतृप्तनिराश्रयेश्वरसरूपोऽस्मीति तथाविधः ॥ २० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,267: | Line 3,316: | ||
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कामादित्यागोपायमाह -निराशीरिति ॥ यतचित्तात्मा भूत्वा निराशीः इत्यर्थः । आत्मा मनः । परिग्रहत्यागः अनभिमानम् । ‘नैव किञ्चित् करोति’(४.२०) इत्यस्याभिप्रायमाह - नाऽप्नोति किल्बिषमिति ॥ २१॥ | कामादित्यागोपायमाह -<span class="gr-prateeka">निराशीरिति ॥</span> <span class="gr-moola">यतचित्तात्मा</span> भूत्वा <span class="gr-moola">निराशीः</span> इत्यर्थः । <span class="gr-moola">आत्मा</span> मनः । <span class="gr-moola">परिग्रहत्यागः</span> अनभिमानम् । ‘नैव किञ्चित् करोति’(४.२०) इत्यस्याभिप्रायमाह - <span class="gr-prateeka">नाऽप्नोति किल्बिषमिति ॥</span> २१॥ | ||
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यतचित्तात्मनो लक्षणमाह -यदृच्छालाभेति ॥ कथं द्वन्द्वातीतत्वमित्यत आह -समः सिद्धाविति ॥ २२ ॥ | यतचित्तात्मनो लक्षणमाह -<span class="gr-prateeka">यदृच्छालाभेति ॥</span> कथं द्वन्द्वातीतत्वमित्यत आह -<span class="gr-prateeka">समः सिद्धाविति ॥</span> २२ ॥ | ||
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उपसंहरति- गतसङ्गस्येति ॥ गतसङ्गस्य फलस्नेहरहितस्य । मुक्तस्य शरीराद्यनभिमानिनः । ज्ञानावस्थितचेतसः परमेश्वरज्ञानिनः ॥ २३ ॥ | उपसंहरति- <span class="gr-prateeka">गतसङ्गस्येति ॥</span> <span class="gr-moola">गतसङ्गस्य</span> फलस्नेहरहितस्य । <span class="gr-moola">मुक्तस्य</span> शरीराद्यनभिमानिनः । <span class="gr-moola">ज्ञानावस्थितचेतसः</span> परमेश्वरज्ञानिनः ॥ २३ ॥ | ||
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ज्ञानावस्थितचेतस्त्वं स्पष्टयति -ब्रह्मार्पणमिति ॥ सर्वमेतद् ब्रह्मेत्युच्यते । तदधीनसत्ताप्रतीतित्वात् । न तु तत्स्वरूपत्वात् । उक्तं हि- ‘त्वदधीनं यतः सर्वमतः सर्वो भवानिति ।वदन्ति मुनयः सर्वे न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति पाद्मे ।‘सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्’ (ऐत.२.५.३) इति च । ‘एतं ह्येव बह्वृचाः..’(ऐत.२.७.३.७) इत्यादि च । समाधिना सह ब्रह्मैव कर्म ॥२४ ॥ | ज्ञानावस्थितचेतस्त्वं स्पष्टयति -<span class="gr-prateeka">ब्रह्मार्पणमिति ॥</span> सर्वमेतद् ब्रह्मेत्युच्यते । तदधीनसत्ताप्रतीतित्वात् । न तु तत्स्वरूपत्वात् । उक्तं हि- ‘त्वदधीनं यतः सर्वमतः सर्वो भवानिति ।वदन्ति मुनयः सर्वे न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति पाद्मे ।‘सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्’ (ऐत.२.५.३) इति च । ‘एतं ह्येव बह्वृचाः..’(ऐत.२.७.३.७) इत्यादि च । <span class="gr-moola">समाधिना</span> सह ब्रह्मैव <span class="gr-moola">कर्म</span> ॥२४ ॥ | ||
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यज्ञभेदानाह -दैवमित्यादिना ॥ दैवं भगवन्तम् । स एव तेषां यज्ञः । भगवदुपासनं यज्ञमिति क्रियाविशेषणम् । नान्यत् तेषामस्ति यतीनां केषाञ्चित् । यज्ञं भगवन्तम् । ‘यज्ञेन यज्ञम्.....’(ऋ.८अ.४अ.१९व. ९०सू.१६मं) , ‘यज्ञो विष्णुर्देवता..’ इत्यादिश्रुतिभ्यः । यज्ञेन प्रसिद्धेनैव । यज्ञं प्रति यज्ञेन जुह्वतीति सर्वत्र समम्- ‘तं यज्ञम्....’(ऋ.८अ.४अ.१८व.) इत्यादौ । उक्तं च- ‘विष्णुं रुद्रेण पशुना ब्रह्मा ज्येष्ठेन सूनुना । अयजन्मानसे यज्ञे पितरं प्रपितामहः ॥’ इति ॥ २५,२६ ॥ | यज्ञभेदानाह -<span class="gr-prateeka">दैवमित्यादिना ॥</span> <span class="gr-moola">दैवं</span> भगवन्तम् । स एव तेषां यज्ञः । भगवदुपासनं यज्ञमिति क्रियाविशेषणम् । नान्यत् तेषामस्ति यतीनां केषाञ्चित् । <span class="gr-moola">यज्ञं</span> भगवन्तम् । ‘यज्ञेन यज्ञम्.....’(ऋ.८अ.४अ.१९व. ९०सू.१६मं) , ‘यज्ञो विष्णुर्देवता..’ इत्यादिश्रुतिभ्यः । यज्ञेन प्रसिद्धेनैव । यज्ञं प्रति यज्ञेन जुह्वतीति सर्वत्र समम्- ‘तं यज्ञम्....’(ऋ.८अ.४अ.१८व.) इत्यादौ । उक्तं च- ‘विष्णुं रुद्रेण पशुना ब्रह्मा ज्येष्ठेन सूनुना । अयजन्मानसे यज्ञे पितरं प्रपितामहः ॥’ इति ॥ २५,२६ ॥ | ||
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| Line 3,378: | Line 3,427: | ||
| id = BGB_C04_V28_B01 | | id = BGB_C04_V28_B01 | ||
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द्रव्यं जुह्वतीति द्रव्ययज्ञाः । तपः परमेश्वरार्पणबुध्या तत्र जुह्वतीति तपोयज्ञा इत्यादि । ‘इदं तपो हविः तद् ब्रह्माग्नौ जुहोमि तत्पूजार्थम्’ इति होमः । तदर्पण एव च होमबुद्धिः ॥ २८ ॥ | द्रव्यं जुह्वतीति <span class="gr-moola">द्रव्ययज्ञाः</span> । तपः परमेश्वरार्पणबुध्या तत्र जुह्वतीति <span class="gr-moola">तपोयज्ञा</span> इत्यादि । ‘इदं तपो हविः तद् ब्रह्माग्नौ जुहोमि तत्पूजार्थम्’ इति होमः । तदर्पण एव च होमबुद्धिः ॥ २८ ॥ | ||
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| id = BGB_C04_V29_B01 | | id = BGB_C04_V29_B01 | ||
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अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणम् अपाने जुह्वति, अपानं च प्राणे । कुम्भकस्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥ | <span class="gr-moola">अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणम् अपाने जुह्वति, अपानं</span> च <span class="gr-moola">प्राणे</span> । कुम्भकस्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥ | ||
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ब्रह्मणः परमात्मनो मुखे । ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च’(९.२४) इति हि वक्ष्यति । मानसवाचिककायिककर्मजा एव हि ते सर्वे । एवं ज्ञात्वा तानि कर्माणि कृत्वा विमोक्ष्यसे । युद्धं परित्यज्य यद् मोक्षार्थं करिष्यसि तदपि कर्म । अतो विहितं न त्याज्यमिति भावः ॥ ३२ ॥ | <span class="gr-moola">ब्रह्मणः</span> परमात्मनो <span class="gr-moola">मुखे</span> । ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च’(९.२४) इति हि वक्ष्यति । मानसवाचिककायिककर्मजा एव हि ते सर्वे । <span class="gr-moola">एवं ज्ञात्वा</span> तानि कर्माणि कृत्वा <span class="gr-moola">विमोक्ष्यसे</span> । युद्धं परित्यज्य यद् मोक्षार्थं करिष्यसि तदपि कर्म । अतो विहितं न त्याज्यमिति भावः ॥ ३२ ॥ | ||
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| Line 3,455: | Line 3,504: | ||
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अखिलम् उपासनाद्यङ्गयुक्तम् । ज्ञानफलमेवेत्यर्थः ॥ ३३ ॥ | <span class="gr-moola">अखिलम्</span> उपासनाद्यङ्गयुक्तम् । ज्ञानफलमेवेत्यर्थः ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 3,489: | Line 3,538: | ||
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येन ज्ञानेन मय्यात्मभूते सर्वभूतानि अथो तस्मादेव मोहनाशात् पश्यसि॥ ३५ ॥ | येन ज्ञानेन मय्यात्मभूते सर्वभूतानि <span class="gr-moola">अथो</span> तस्मादेव मोहनाशात् पश्यसि॥ ३५ ॥ | ||
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नियमनादिना सकललोककर्षणात् कृष्णः ।तच्चोक्तम्- | नियमनादिना सकललोककर्षणात् कृष्णः ।तच्चोक्तम्- | ||
‘यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत् ।अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः ॥’ इति महाकौर्मे । संन्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति । अयं प्रश्नाभिप्रायः(शयः) - ‘यदि संन्यासः श्रेयः अधिकः स्यात्, तर्हि संन्यासस्येेषद्(स्यैतद्)विरोधि युद्धम्’ इति ॥१ ॥ | ‘यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत् ।अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः ॥’ इति महाकौर्मे । संन्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति । अयं प्रश्नाभिप्रायः(शयः) - ‘यदि संन्यासः <span class="gr-moola">श्रेयः</span> अधिकः स्यात्, तर्हि संन्यासस्येेषद्(स्यैतद्)विरोधि युद्धम्’ इति ॥१ ॥ | ||
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| Line 3,648: | Line 3,697: | ||
| id = BGB_C05_V03_B01 | | id = BGB_C05_V03_B01 | ||
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संन्यासशब्दार्थमाह - ज्ञेय इति ॥ संन्यासस्य निःश्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थं स्मारयति - ज्ञेय इति ॥ ३ ॥ | संन्यासशब्दार्थमाह - <span class="gr-prateeka">ज्ञेय इति ॥</span> संन्यासस्य निःश्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थं स्मारयति - <span class="gr-prateeka">ज्ञेय इति ॥</span> ३ ॥ | ||
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| Line 3,665: | Line 3,714: | ||
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संन्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तः- ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय’(भाग.५.११.३) इत्यादौ । अतः कथं सोऽवमः? इत्यत आह - साङ्ख्ययोगाविति ॥ उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः । ‘अग्निमुग्धो हवै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति’(तै.), ‘मा वः पदव्यः पितरस्मदाश्रिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम्’(भाग.४.४.२१) इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः । ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः ॥ ४ ॥ | संन्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तः- ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय’(भाग.५.११.३) इत्यादौ । अतः कथं सोऽवमः? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">साङ्ख्ययोगाविति ॥</span> उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः । ‘अग्निमुग्धो हवै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति’(तै.), ‘मा वः पदव्यः पितरस्मदाश्रिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम्’(भाग.४.४.२१) इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः । ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 3,682: | Line 3,731: | ||
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‘एकमपि’(५.४) इत्यस्याभिप्रायमाह - यत् साङ्ख्यैरिति ॥ योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥ | ‘एकमपि’(५.४) इत्यस्याभिप्रायमाह - <span class="gr-prateeka">यत् साङ्ख्यैरिति ॥</span> योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥ | ||
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इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - संन्यासस्त्विति ॥ योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- ‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ । इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - योगयुक्त इति ॥ मुनिः संन्यासी । तथाचोक्तम्- ‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’ इति ॥ ६ ॥ | इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - <span class="gr-prateeka">संन्यासस्त्विति ॥</span> योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- ‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ । इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - <span class="gr-prateeka">योगयुक्त इति ॥</span> <span class="gr-moola">मुनिः</span> संन्यासी । तथाचोक्तम्- ‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’ इति ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 3,716: | Line 3,765: | ||
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एतदेव प्रपञ्चयति - योगयुक्त इति ॥ सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः । ‘यच्चाऽप्नोति’(म.भा) इत्यादेः । स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रति आदानादिकर्ता यस्य सः सर्वभूतात्मभूतात्मा ॥ ७ ॥ | एतदेव प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">योगयुक्त इति ॥</span> सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः । ‘यच्चाऽप्नोति’(म.भा) इत्यादेः । स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रति आदानादिकर्ता यस्य सः <span class="gr-moola">सर्वभूतात्मभूतात्मा</span> ॥ ७ ॥ | ||
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संन्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह- ब्रह्मणीति ॥ साधननियमोपचारत्वनिवृत्त्यर्थं पुनःपुनः फलकथनम् ॥ १० ॥ | संन्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह- <span class="gr-prateeka">ब्रह्मणीति ॥</span> साधननियमोपचारत्वनिवृत्त्यर्थं पुनःपुनः फलकथनम् ॥ १० ॥ | ||
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| id = BGB_C05_V11_B01 | | id = BGB_C05_V11_B01 | ||
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एवं चाऽचार इत्याह - कायेनेति ॥ ११ ॥ | एवं चाऽचार इत्याह - <span class="gr-prateeka">कायेनेति ॥</span> ११ ॥ | ||
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| id = BGB_C05_V12_B01 | | id = BGB_C05_V12_B01 | ||
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पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह - युक्त इति ॥ युक्तो योगयुक्तः॥ १२ ॥ | पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह - <span class="gr-prateeka">युक्त इति ॥</span> <span class="gr-moola">युक्तो</span> योगयुक्तः॥ १२ ॥ | ||
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पुनः संन्यासशब्दार्थं स्पष्टयति - सर्वकर्माणीति ॥ ‘मनसा’ इति विशेषणाद् अभिमानत्यागः ॥ १३ ॥ | पुनः संन्यासशब्दार्थं स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">सर्वकर्माणीति ॥</span> ‘मनसा’ इति विशेषणाद् अभिमानत्यागः ॥ १३ ॥ | ||
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न च करोति वस्तुत इत्याह - न कर्तृत्वमिति ॥ प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य ॥ १४, १५ ॥ | न च करोति वस्तुत इत्याह - <span class="gr-moola">न कर्तृत्वमिति ॥</span> प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य ॥ १४, १५ ॥ | ||
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| Line 3,853: | Line 3,902: | ||
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ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह - ज्ञानेनेति ॥ प्रथमज्ञानं परोक्षम् ॥ १६ ॥ | ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह - <span class="gr-prateeka">ज्ञानेनेति ॥</span> प्रथमज्ञानं परोक्षम् ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 3,870: | Line 3,919: | ||
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अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह - तद्बुद्धय इति ॥ १७ ॥ | अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह - <span class="gr-prateeka">तद्बुद्धय इति ॥</span> १७ ॥ | ||
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| Line 3,887: | Line 3,936: | ||
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परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह - विद्येति ॥ १८ ॥ | परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह - <span class="gr-prateeka">विद्येति ॥</span> १८ ॥ | ||
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तदेव स्तौति - इहैवेति ॥ १९ ॥ | तदेव स्तौति - <span class="gr-prateeka">इहैवेति ॥</span> १९ ॥ | ||
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पुनर्योगस्याऽधिक्यं स्पष्टयति - बाह्यस्पर्शेष्विति ॥ कामरहित आत्मनि यत् सुखं विन्दति स एव ब्रह्मयोगयुक्तात्मा चेत् तदेव अक्षयं सुखं | पुनर्योगस्याऽधिक्यं स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">बाह्यस्पर्शेष्विति ॥</span> कामरहित आत्मनि यत् सुखं विन्दति स एव <span class="gr-moola">ब्रह्मयोगयुक्तात्मा</span> चेत् तदेव <span class="gr-moola">अक्षयं सुखं विन्दति</span>। ब्रह्मविषयो योगो= ब्रह्मयोगः । ध्यानादियुक्तस्यैव आत्मसुखमक्षयम् । अन्यथा नेत्यर्थः ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 3,955: | Line 4,004: | ||
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संन्यासार्थं कामभोगं निन्दयति - ये हीति ॥ २२ ॥ | संन्यासार्थं कामभोगं निन्दयति - <span class="gr-prateeka">ये हीति ॥</span> २२ ॥ | ||
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| Line 3,972: | Line 4,021: | ||
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तत्परित्यागं प्रशंसयति - शक्नोतीति ॥ कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति, शरीरविमोक्षणात् प्राक्, यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुकरं तथा नान्यत्रेति भावः । ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति ॥ २३ ॥ | तत्परित्यागं प्रशंसयति - <span class="gr-prateeka">शक्नोतीति</span> ॥ <span class="gr-moola">कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति, शरीरविमोक्षणात् प्राक्,</span> यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुकरं तथा नान्यत्रेति भावः । ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 3,996: | Line 4,045: | ||
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आरामः परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत् । सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम् । अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद् भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः । सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः । असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात् । दर्शनेऽप्यकिञ्चित्करादेवशब्दः । उक्तं चैतत्- ‘दर्शनस्पर्शसम्भाषाद् यत् सुखं जायते नृणाम् ।आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् ॥’इति नारदीये ।‘स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः’ । इति च ।अन्तःसुखत्वादेः कारणमाह - ब्रह्मणि भूत इति ॥ २४ ॥ | <span class="gr-moola">आरामः</span> परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत् । सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम् । अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद् भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः । सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः । असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात् । दर्शनेऽप्यकिञ्चित्करादेवशब्दः । उक्तं चैतत्- ‘दर्शनस्पर्शसम्भाषाद् यत् सुखं जायते नृणाम् ।आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् ॥’इति नारदीये ।‘स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः’ । इति च ।अन्तःसुखत्वादेः कारणमाह - <span class="gr-prateeka">ब्रह्मणि भूत इति ॥</span> २४ ॥ | ||
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| Line 4,013: | Line 4,062: | ||
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पापक्षयाच्चैतद् भवतीत्याह - लभन्त इति ॥ क्षीणकल्मषा भूत्वा छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः । द्वेधा भावो = द्वैधम् । संशयो विपर्ययो वा तच्चोक्तम्- ‘विपर्ययः संशयो वा यद् द्वैधं त्वकृतात्मनाम् । ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥’इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः = दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः । तत एव छिन्नद्वैधाः । तच्चोक्तम्- ‘क्षीणपापा माहाज्ञाना (महद् ज्ञात्वा) जायन्ते गतसंशयाः’ । इति । छिन्नद्वैधाः, यतात्मान इति वा ॥२५ ॥ | पापक्षयाच्चैतद् भवतीत्याह - <span class="gr-prateeka">लभन्त इति ॥</span> <span class="gr-moola">क्षीणकल्मषा</span> भूत्वा <span class="gr-moola">छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः</span> । द्वेधा भावो = द्वैधम् । संशयो विपर्ययो वा तच्चोक्तम्- ‘विपर्ययः संशयो वा यद् द्वैधं त्वकृतात्मनाम् । ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥’इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः = दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः । तत एव छिन्नद्वैधाः । तच्चोक्तम्- ‘क्षीणपापा माहाज्ञाना (महद् ज्ञात्वा) जायन्ते गतसंशयाः’ । इति । छिन्नद्वैधाः, यतात्मान इति वा ॥२५ ॥ | ||
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सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह - कामक्रोधेति ॥ अभितः सर्वतः ॥ २६ ॥ | सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह - <span class="gr-prateeka">कामक्रोधेति ॥</span> <span class="gr-moola">अभितः</span> सर्वतः ॥ २६ ॥ | ||
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ध्यानप्रकारमाह - स्पर्शानित्यादिना ॥ बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा = श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः । चक्षुः भ्रुवोरन्तरे कृत्वा = भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन् इत्यर्थः । उक्तं च -‘नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये DfyanI (ज्ञानी) चक्षुर्निधापयेत्’। इति । प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थित्वेत्यर्थः ॥ २७, २८ ॥ | ध्यानप्रकारमाह - <span class="gr-prateeka">स्पर्शानित्यादिना ॥</span> बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा = श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः । चक्षुः भ्रुवोरन्तरे कृत्वा = भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन् इत्यर्थः । उक्तं च -‘नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये DfyanI (ज्ञानी) चक्षुर्निधापयेत्’। इति । <span class="gr-moola">प्राणापानौ समौ कृत्वा</span> कुम्भके स्थित्वेत्यर्थः ॥ २७, २८ ॥ | ||
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ध्येयमाह - भोक्तारमिति ॥ २९ ॥ | ध्येयमाह - <span class="gr-prateeka">भोक्तारमिति ॥</span> २९ ॥ | ||
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विवक्षितं संन्यासमाह योगेन सह - अनाश्रित इति ॥ चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्ता ‘दैवमेव’(४.२५) इत्यादौ । ‘अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता’ । इति च । तस्माद् निरग्निरक्रियः संन्यासी योगी च न भवत्येव ॥१ ॥ | विवक्षितं संन्यासमाह योगेन सह - <span class="gr-prateeka">अनाश्रित इति ॥</span> चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्ता ‘दैवमेव’(४.२५) इत्यादौ । ‘अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता’ । इति च । तस्माद् <span class="gr-moola">निरग्निरक्रियः संन्यासी योगी च न</span> भवत्येव ॥१ ॥ | ||
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संन्यासोऽपि योगान्तर्भूत इत्याह - यं संन्यासमिति ॥ कामसङ्कल्पाद्यपरित्यागे कथमुपायवान् स्यादित्याशयः ॥ २ ॥ | संन्यासोऽपि योगान्तर्भूत इत्याह - <span class="gr-prateeka">यं संन्यासमिति ॥</span> कामसङ्कल्पाद्यपरित्यागे कथमुपायवान् स्यादित्याशयः ॥ २ ॥ | ||
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कियत्कालं कर्म कर्तव्यम् ? इत्यत आह - आरुरुक्षोर्मुनेरिति ॥ योगमारुरुक्षोः उपायसम्पूर्तिमिच्छोः । योगारूढस्य सम्पूर्णोपायस्य । अपरोक्षज्ञानिन इत्यर्थः । कारणं परमसुखकारणम् । अपरोक्षज्ञानिनोऽपि समाध्यादिफलमुक्तम् । तस्य सर्वोपशमेन समाधिरेव कारणं प्राधान्येनेत्यर्थः । तथाऽपि यदा भोक्तव्योपरमः तदैव सम्यगसम्प्रज्ञातसमाधिर्जायते । अन्यदा तु भगवच्चरितादौ स्थितिः । तच्चोक्तम्-‘ये त्वां पश्यन्ति भगवंस्त एव सुखिनः परम् । तेषामेव तु(च) सम्यक् च(तु) समाधिर्जायते नृणाम् । भोक्तव्यकर्मण्यक्षीणे जपेन कथयाऽपि वा । वर्तयन्ति महात्मानसः त्वद्भक्ताः तत्परायणाः ॥’ इति ॥३ ॥ | कियत्कालं कर्म कर्तव्यम् ? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">आरुरुक्षोर्मुनेरिति ॥</span> <span class="gr-moola">योगमारुरुक्षोः</span> उपायसम्पूर्तिमिच्छोः । <span class="gr-moola">योगारूढस्य</span> सम्पूर्णोपायस्य । अपरोक्षज्ञानिन इत्यर्थः । <span class="gr-moola">कारणं</span> परमसुखकारणम् । अपरोक्षज्ञानिनोऽपि समाध्यादिफलमुक्तम् । तस्य सर्वोपशमेन समाधिरेव कारणं प्राधान्येनेत्यर्थः । तथाऽपि यदा भोक्तव्योपरमः तदैव सम्यगसम्प्रज्ञातसमाधिर्जायते । अन्यदा तु भगवच्चरितादौ स्थितिः । तच्चोक्तम्-‘ये त्वां पश्यन्ति भगवंस्त एव सुखिनः परम् । तेषामेव तु(च) सम्यक् च(तु) समाधिर्जायते नृणाम् । भोक्तव्यकर्मण्यक्षीणे जपेन कथयाऽपि वा । वर्तयन्ति महात्मानसः त्वद्भक्ताः तत्परायणाः ॥’ इति ॥३ ॥ | ||
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योगारूढस्य लक्षणमाह - यदेति ॥ सम्यगननुषङ्गः तस्यैव भवति । उक्तं च -‘स्वतो दोषलयो दृष्ट्या त्वितरेषां प्रयत्नतः’ । इति ॥ ४ ॥ | योगारूढस्य लक्षणमाह - <span class="gr-prateeka">यदेति ॥</span> सम्यगननुषङ्गः तस्यैव भवति । उक्तं च -‘स्वतो दोषलयो दृष्ट्या त्वितरेषां प्रयत्नतः’ । इति ॥ ४ ॥ | ||
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स च योगारोहः प्रयत्नेन कर्तव्य इत्याह - उद्धरेदित्यादिना ॥ ५ ॥ | स च योगारोहः प्रयत्नेन कर्तव्य इत्याह - <span class="gr-prateeka">उद्धरेदित्यादिना ॥ ५ ॥</span> | ||
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कस्य बन्धुरात्मा इत्यत आह- बन्धुरात्मेति ॥ आत्मा मनः । आत्मनः जीवस्य । आत्मना मनसा । आत्मानं जीवम् । आत्मैव मनः । आत्मना बुद्ध्या, जीवेनैव वा । स हि बुद्ध्या विजयति । उक्तं च- ‘मनः परं कारणमामनन्ति’(भाग.११.२३.४३), ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’(वि.पु.६.७.२८) ‘उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत् ।जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः ॥’ ‘जीवेन बुध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य ।ततो जयेद् बुद्धिबलो नरस्तद् देवे च भक्त्या मधुकैटभारौ ॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । अनात्मनः अजितात्मनः पुरुषस्य, अजितमनस्कस्य । सदपि मनोऽनुपकारि इत्यनात्मा । सन्नपि भृत्यो यस्य न भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः । तस्यात्मा= मन एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तते ॥ ६ ॥ | कस्य बन्धुरात्मा इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">बन्धुरात्मेति ॥</span> <span class="gr-moola">आत्मा</span> मनः । <span class="gr-moola">आत्मनः</span> जीवस्य । <span class="gr-moola">आत्मना</span> मनसा । <span class="gr-moola">आत्मानं</span> जीवम् । <span class="gr-moola">आत्मैव</span> मनः । <span class="gr-moola">आत्मना</span> बुद्ध्या, जीवेनैव वा । स हि बुद्ध्या विजयति । उक्तं च- ‘मनः परं कारणमामनन्ति’(भाग.११.२३.४३), ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’(वि.पु.६.७.२८) ‘उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत् ।जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः ॥’ ‘जीवेन बुध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य ।ततो जयेद् बुद्धिबलो नरस्तद् देवे च भक्त्या मधुकैटभारौ ॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । <span class="gr-moola">अनात्मनः</span> अजितात्मनः पुरुषस्य, अजितमनस्कस्य । सदपि मनोऽनुपकारि इत्यनात्मा । सन्नपि भृत्यो यस्य न भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः । तस्यात्मा= मन एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तते ॥ ६ ॥ | ||
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जितात्मनः फलमाह - जितात्मन इति ॥ जितात्मा हि प्रशान्तो भवति । न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति । तदा च परमात्मा सम्यग् हृदि आहितः सन्निहितो भवति, अपरोक्षज्ञानी स भवतीत्यर्थः । अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति - शीतोष्णेत्यादिना ॥ शीतोष्णादिषु कूटस्थः । ‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’, ‘विजितेन्द्रियः’ इति कूटस्थत्वे हेतुः । विज्ञानं विशेषज्ञानम् । अपरोक्षज्ञानं वा । तच्चोक्तम्- ‘सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः ।देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ॥’ ‘श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते । तज्ज्ञानं, दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत् । विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा ॥’ इत्यादि । कूटस्थः निर्विकारः । कूटवत् स्थित इति व्युत्पत्तेः । कूटम् = आकाशः । ‘कूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते’ । इत्यभिधानात् । योगी योगं कुर्वन् । युक्तः योगसम्पूर्णः । एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥ | जितात्मनः फलमाह - <span class="gr-prateeka">जितात्मन इति ॥</span> जितात्मा हि प्रशान्तो भवति । न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति । तदा च परमात्मा सम्यग् हृदि <span class="gr-moola">आहितः</span> सन्निहितो भवति, अपरोक्षज्ञानी स भवतीत्यर्थः । अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">शीतोष्णेत्यादिना ॥</span> शीतोष्णादिषु कूटस्थः । ‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’, ‘विजितेन्द्रियः’ इति कूटस्थत्वे हेतुः । <span class="gr-moola">विज्ञानं</span> विशेषज्ञानम् । अपरोक्षज्ञानं वा । तच्चोक्तम्- ‘सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः ।देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ॥’ ‘श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते । तज्ज्ञानं, दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत् । विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा ॥’ इत्यादि । <span class="gr-moola">कूटस्थः</span> निर्विकारः । कूटवत् स्थित इति व्युत्पत्तेः । कूटम् = आकाशः । ‘कूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते’ । इत्यभिधानात् । <span class="gr-moola">योगी</span> योगं कुर्वन् । <span class="gr-moola">युक्तः</span> योगसम्पूर्णः । एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥ | ||
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प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत् सुहृत् । क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति स मित्रम् । अरिः वधादिकर्ता(कृत्) । कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स उदासीनः । कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स मध्यमः(स्थः) । अवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) द्वेष्यः । आह चैतत्- ‘द्वेष्योऽवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) कार्यमात्रकारी तु मध्यमः ।प्रियकृत् प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति ।स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत् ।यस्ततः स सुहृत् प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिति(कृत्) ॥’ इति ॥९ ॥ | प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत् <span class="gr-moola">सुहृत्</span> । क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति स <span class="gr-moola">मित्रम्</span> । अरिः वधादिकर्ता(कृत्) । कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स <span class="gr-moola">उदासीनः</span> । कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स <span class="gr-moola">मध्यमः(स्थः)</span> । अवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) <span class="gr-moola">द्वेष्यः</span> । आह चैतत्- ‘द्वेष्योऽवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) कार्यमात्रकारी तु मध्यमः ।प्रियकृत् प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति ।स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत् ।यस्ततः स सुहृत् प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिति(कृत्) ॥’ इति ॥९ ॥ | ||
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समाधियोगप्रकारमाह - योगी युञ्जीत इत्यादिना ॥ युञ्जीत समाधियोगयुक्तं कुर्यात् । आत्मानं मनः ॥ १०-११ ॥ | समाधियोगप्रकारमाह - <span class="gr-prateeka">योगी युञ्जीत इत्यादिना ॥</span> <span class="gr-moola">युञ्जीत</span> समाधियोगयुक्तं कुर्यात् । <span class="gr-moola">आत्मानं</span> मनः ॥ १०-११ ॥ | ||
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योगं समाधियोगं युञ्ज्यात् ॥ १२-१४ ॥ | <span class="gr-moola">योगं</span> समाधियोगं <span class="gr-moola">युञ्ज्यात् ॥</span> १२-१४ ॥ | ||
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| Line 4,332: | Line 4,381: | ||
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निर्वाणपरमां शरीरत्यागोत्तरकालीनाम् ॥ १५ ॥ | <span class="gr-moola">निर्वाणपरमां</span> शरीरत्यागोत्तरकालीनाम् ॥ १५ ॥ | ||
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युक्ताहारविहारस्य सोपायाहारादेः । यावता श्रमाद्यभावो भवति तावदाहारादेः इत्यर्थः ॥ १७ ॥ | <span class="gr-moola">युक्ताहारविहारस्य</span> सोपायाहारादेः । यावता श्रमाद्यभावो भवति तावदाहारादेः इत्यर्थः ॥ १७ ॥ | ||
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आत्मनि भगवति ॥ १८ ॥ | <span class="gr-moola">आत्मनि</span> भगवति ॥ १८ ॥ | ||
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आत्मनो योगं भगवद्विषयं योगम् ॥ १९ ॥ | <span class="gr-moola">आत्मनो योगं</span> भगवद्विषयं योगम् ॥ १९ ॥ | ||
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आत्मना मनसा । आत्मनि देहे । आत्मानं भगवन्तं पश्यन् ॥२०॥ | <span class="gr-moola">आत्मना</span> मनसा । <span class="gr-moola">आत्मनि</span> देहे । <span class="gr-moola">आत्मानं</span> भगवन्तं पश्यन् ॥२०॥ | ||
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तत्त्वतो भगवद्रूपात् ॥ २१ ॥ | <span class="gr-moola">तत्त्वतो</span> भगवद्रूपात् ॥ २१ ॥ | ||
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दुःखसंयोगो येन वियुज्यते स दुःखसंयोगवियोगः । न केवलमुत्पन्नं दुःखं नाशयति, उत्पत्तिमेव निवारयतीति दर्शयति संयोगशब्देन । निश्चयेन योक्तव्यः योक्तव्य एव (तद्) बुभूषुणेत्यर्थः ॥ २३ ॥ | दुःखसंयोगो येन वियुज्यते स <span class="gr-moola">दुःखसंयोगवियोगः</span> । न केवलमुत्पन्नं दुःखं नाशयति, उत्पत्तिमेव निवारयतीति दर्शयति संयोगशब्देन । <span class="gr-moola">निश्चयेन योक्तव्यः</span> योक्तव्य एव (तद्) बुभूषुणेत्यर्थः ॥ २३ ॥ | ||
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| Line 4,477: | Line 4,526: | ||
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सर्वान् सर्वविषयान् । अशेषतः, एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्य इत्यर्थः । मनसैव नियन्तुं शक्यते न अन्येन इति ‘एव’शब्दः ॥ २४ ॥ | <span class="gr-moola">सर्वान्</span> सर्वविषयान् । अशेषतः, एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्य इत्यर्थः । मनसैव नियन्तुं शक्यते न अन्येन इति ‘एव’शब्दः ॥ २४ ॥ | ||
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यतो यतः यत्र यत्र ।‘यतो यतो धावति’(भाग.१०.१.४२) इत्यादिप्रयोगात् । आत्मन्येव वशं नयेत् आत्मविषय एव वशीकुर्यादित्यर्थः ॥ २६ ॥ | <span class="gr-moola">यतो यतः</span> यत्र यत्र ।‘यतो यतो धावति’(भाग.१०.१.४२) इत्यादिप्रयोगात् । <span class="gr-moola">आत्मन्येव वशं नयेत्</span> आत्मविषय एव वशीकुर्यादित्यर्थः ॥ २६ ॥ | ||
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पूर्वश्लोकोक्तं प्रपञ्चयति - एवं युञ्जन्निति ॥ २८ ॥ | पूर्वश्लोकोक्तं प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">एवं युञ्जन्निति ॥</span> २८ ॥ | ||
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| Line 4,554: | Line 4,603: | ||
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ध्येयमाह - सर्वभूतस्थमिति ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं परमेश्वरम् । सर्वभूतानि चाऽत्मनि परमेश्वरे । तं च परमेश्वरं ब्रह्म तृणादौ ऐश्वर्यादिना साम्येन पश्यति । तच्चोक्तम्- ‘आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चाऽत्मनि ॥’(भाग.३.२५.४७) इति ।‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।’(१३.२८) इति च ॥२९ ॥ | ध्येयमाह - <span class="gr-prateeka">सर्वभूतस्थमिति ॥</span> <span class="gr-moola">सर्वभूतस्थमात्मानं</span> परमेश्वरम् । <span class="gr-moola">सर्वभूतानि चाऽत्मनि</span> परमेश्वरे । तं च परमेश्वरं ब्रह्म तृणादौ ऐश्वर्यादिना साम्येन पश्यति । तच्चोक्तम्- ‘आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चाऽत्मनि ॥’(भाग.३.२५.४७) इति ।‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।’(१३.२८) इति च ॥२९ ॥ | ||
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फलमाह - यो मामिति॥ तस्याहं न प्रणश्यामीति॥ सर्वदा योगक्षेमवहः स्यामित्यर्थः । स च मे न प्रणश्यति सर्वदा मद्भक्तो भवति । सत्यपि स्वामिनि अरक्षति अनाथः, एवं भृत्येऽप्यभजति अभृत्य इति हि प्रसिद्धिः । उक्तं च-‘सर्वदा सर्वभूतेषु समं मां यः प्रपश्यति ।अचला तस्य भक्तिस्स्याद् योगक्षेमवहोप्यहम्’ । इति गारुडे ॥३० ॥ | फलमाह - <span class="gr-prateeka">यो मामिति॥</span> <span class="gr-prateeka">तस्याहं न प्रणश्यामीति॥</span> सर्वदा योगक्षेमवहः स्यामित्यर्थः । <span class="gr-moola">स च मे न प्रणश्यति</span> सर्वदा मद्भक्तो भवति । सत्यपि स्वामिनि अरक्षति अनाथः, एवं भृत्येऽप्यभजति अभृत्य इति हि प्रसिद्धिः । उक्तं च-‘सर्वदा सर्वभूतेषु समं मां यः प्रपश्यति ।अचला तस्य भक्तिस्स्याद् योगक्षेमवहोप्यहम्’ । इति गारुडे ॥३० ॥ | ||
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एतदेव स्पष्टयति - सर्वभूतस्थितमिति ॥ एकत्वमास्थितः सर्वत्रैक एवेश्वर इति स्थितः । सर्वप्रकारेण वर्तमानोऽपि मय्येव वर्तते । एवमपरोक्षं पश्यतो ज्ञानफलं नियतमित्यर्थः । तथाऽपि प्रायो नाधर्मं करोति । कुर्वतस्तु महच्चेद् दुःखसूचकं भवतीत्युक्तं पुरस्तात्(गी.भा.३.१८) । आह च- ‘कदाचिदपि नाधर्मे बुद्धिर्विष्णुदृशां भवेत् ।प्रमादात्तु कृतं पापं स्वल्पं भस्मीभविष्यति ।आदिराजैः तथा देवैर्ऋषिभिः क्रियते कियत् ।बाहुल्यात् कर्मणस्तेषां दुःखसूचकमेव तत् ॥’ इति ॥३१ ॥ | एतदेव स्पष्टयति - <span class="gr-prateeka">सर्वभूतस्थितमिति ॥</span> <span class="gr-moola">एकत्वमास्थितः</span> सर्वत्रैक एवेश्वर इति स्थितः । सर्वप्रकारेण वर्तमानोऽपि मय्येव वर्तते । एवमपरोक्षं पश्यतो ज्ञानफलं नियतमित्यर्थः । तथाऽपि प्रायो नाधर्मं करोति । कुर्वतस्तु महच्चेद् दुःखसूचकं भवतीत्युक्तं पुरस्तात्(गी.भा.३.१८) । आह च- ‘कदाचिदपि नाधर्मे बुद्धिर्विष्णुदृशां भवेत् ।प्रमादात्तु कृतं पापं स्वल्पं भस्मीभविष्यति ।आदिराजैः तथा देवैर्ऋषिभिः क्रियते कियत् ।बाहुल्यात् कर्मणस्तेषां दुःखसूचकमेव तत् ॥’ इति ॥३१ ॥ | ||
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साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे - आत्मौपम्येनेति ॥ ३२ ॥ | साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे - <span class="gr-prateeka">आत्मौपम्येनेति ॥</span> ३२ ॥ | ||
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एतस्य योगस्य स्थिरां स्थितिं न पश्यामि । मनसः चञ्चलत्वात् । उक्तं च -‘मनसश्चञ्चलत्वाद्धि स्थितिर्योगस्य वै स्थिरा । विनाऽभ्यासं न शक्या स्याद् वैराग्याद्वा न संशयः ॥’ इति व्यासयोगे ॥ ३३, ३५ ॥ | <span class="gr-moola">एतस्य</span> योगस्य स्थिरां स्थितिं न पश्यामि । मनसः चञ्चलत्वात् । उक्तं च -‘मनसश्चञ्चलत्वाद्धि स्थितिर्योगस्य वै स्थिरा । विनाऽभ्यासं न शक्या स्याद् वैराग्याद्वा न संशयः ॥’ इति व्यासयोगे ॥ ३३, ३५ ॥ | ||
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अयतिः अप्रयत्नः ॥ ३७ ॥ | <span class="gr-moola">अयतिः</span> अप्रयत्नः ॥ ३७ ॥ | ||
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योगस्य जिज्ञासुरपि, ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि । शब्दब्रह्मातिवर्तते परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४४ ॥ | योगस्य जिज्ञासुरपि, ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि । <span class="gr-moola">शब्दब्रह्मातिवर्तते</span> परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४४ ॥ | ||
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नैकजन्मनीत्याह - प्रयत्नादिति ॥ जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्नं करोति । एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति । आह च- ‘अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः ।ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान् ।विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन॥’ इति नारदीये ॥४५ ॥ | नैकजन्मनीत्याह - <span class="gr-prateeka">प्रयत्नादिति ॥</span> जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्नं करोति । एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति । आह च- ‘अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः ।ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान् ।विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन॥’ इति नारदीये ॥४५ ॥ | ||
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ज्ञानिभ्यः योगज्ञानिभ्यः । तपस्विभ्यः कृच्छ्रादिचारिभ्यः ।उक्तं च-‘कृच्छ्रादेरपि यज्ञादेर्ध्यानयोगो विशिष्यते ।तत्रापि शेषश्रीब्रह्मशिवादिध्यानतो हरेः ।ध्यानं कोटिगुणं प्रोक्तमधिकं वा मुमुक्षुणाम् ॥’ इति गारुडे ।‘अज्ञात्वा ध्यायिनो ध्यानात् ज्ञानमेव विशिष्यते ।ज्ञात्वा ध्यानं ज्ञानमात्राद् ध्यानादपि तु दर्शनम् ।दर्शनाच्चैव भक्तेश्च न किञ्चित् साधनाधिकम् ॥’ इति नारदीये ॥ ४६, ४७ ॥ | <span class="gr-moola">ज्ञानिभ्यः</span> योगज्ञानिभ्यः । <span class="gr-moola">तपस्विभ्यः</span> कृच्छ्रादिचारिभ्यः ।उक्तं च-‘कृच्छ्रादेरपि यज्ञादेर्ध्यानयोगो विशिष्यते ।तत्रापि शेषश्रीब्रह्मशिवादिध्यानतो हरेः ।ध्यानं कोटिगुणं प्रोक्तमधिकं वा मुमुक्षुणाम् ॥’ इति गारुडे ।‘अज्ञात्वा ध्यायिनो ध्यानात् ज्ञानमेव विशिष्यते ।ज्ञात्वा ध्यानं ज्ञानमात्राद् ध्यानादपि तु दर्शनम् ।दर्शनाच्चैव भक्तेश्च न किञ्चित् साधनाधिकम् ॥’ इति नारदीये ॥ ४६, ४७ ॥ | ||
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आसक्तमनाः अतीव स्नेहयुक्तमनाः । मदाश्रयः ‘भगवानेव मया सर्वं कारयति, स एव च मे शरणम्, तस्मिन्नेव चाहं स्थितः’ इति स्थितः । ‘असंशयम्’, ‘समग्रम्’ इति क्रियाविशेषणम् ॥ १ ॥ | <span class="gr-moola">आसक्तमनाः</span> अतीव स्नेहयुक्तमनाः । <span class="gr-moola">मदाश्रयः</span> ‘भगवानेव मया सर्वं कारयति, स एव च मे शरणम्, तस्मिन्नेव चाहं स्थितः’ इति स्थितः । ‘असंशयम्’, ‘समग्रम्’ इति क्रियाविशेषणम् ॥ १ ॥ | ||
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इदं मद्विषयं ज्ञानम् । विज्ञानं विशेषज्ञानम् ॥ २ ॥ | <span class="gr-moola">इदं</span> मद्विषयं ज्ञानम् । <span class="gr-moola">विज्ञानं</span> विशेषज्ञानम् ॥ २ ॥ | ||
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दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह -मनुष्याणामिति ॥ ३ ॥ | दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह -<span class="gr-prateeka">मनुष्याणामिति ॥</span> ३ ॥ | ||
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प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - भूमिरित्यदिना ॥ | प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - <span class="gr-prateeka">भूमिरित्यदिना ॥</span> महतो<span class="gr-moola">हङ्कार एवान्तर्भावः ।</span>॥४ ॥ | ||
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अपरा अनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य । जीवभूता श्रीः । जीवानां प्राणधारिणी । चिद्रूपभूता सर्वदा सती । ‘एतन्महद्भूतम्’ इति श्रुतेः । जगाद च- ‘प्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा । अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाऽष्टधा पुनः ।महान् बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति हि ।अव(प)रा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तया ।चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा ।यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः ।नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि ।ता(आ)भ्यामिदं जगत् सर्वं हरिः सृजति भूतरा ॥’ इतिनारदीये ॥५॥ | <span class="gr-moola">अपरा</span> अनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य । जीवभूता श्रीः । जीवानां प्राणधारिणी । चिद्रूपभूता सर्वदा सती । ‘एतन्महद्भूतम्’ इति श्रुतेः । जगाद च- ‘प्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा । अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाऽष्टधा पुनः ।महान् बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति हि ।अव(प)रा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तया ।चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा ।यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः ।नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि ।ता(आ)भ्यामिदं जगत् सर्वं हरिः सृजति भूतरा ॥’ इतिनारदीये ॥५॥ | ||
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न केवलं ते जगत् प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह -अहमिति ॥ प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादिकारणत्वात्, तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि । तथा च श्रुतिः- ‘सर्वमकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः’(छा.३.२.९) इति । आह च - ‘स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता ।यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽसीत्यृषिभिः स्तुतः ।सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः ।आगमिष्यत् सुखं चापि तस्यास्त्येव सदाऽपि तु ।तथाऽप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमि(म)तीव च’ ॥ इति नारदीये ॥६॥ | न केवलं ते जगत् प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह -<span class="gr-prateeka">अहमिति ॥</span> प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादिकारणत्वात्, तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि । तथा च श्रुतिः- ‘सर्वमकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः’(छा.३.२.९) इति । आह च - ‘स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता ।यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽसीत्यृषिभिः स्तुतः ।सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः ।आगमिष्यत् सुखं चापि तस्यास्त्येव सदाऽपि तु ।तथाऽप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमि(म)तीव च’ ॥ इति नारदीये ॥६॥ | ||
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अहमेव परतरः । मत्तोऽन्यत् परतरं न किञ्चिद् अपि । (इदं ज्ञानम्) ॥ ७ ॥ | अहमेव परतरः । <span class="gr-moola">मत्तोऽन्यत् परतरं न किञ्चिद्</span> अपि । (<span class="gr-moola">इदं</span> ज्ञानम्) ॥ ७ ॥ | ||
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तर्हि कथमेवं न ज्ञायसे ? इत्यत आह -त्रिभिरिति ॥ तादात्म्यार्थे मयट् । तच्चोक्तम्- ‘तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा’। इति । नहि गुणकार्यभूता माया । ‘गुणमयी’ इति च वक्ष्यति । सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्- ‘तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः’ । इति व्यासयोगे । | तर्हि कथमेवं न ज्ञायसे ? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">त्रिभिरिति ॥</span> तादात्म्यार्थे मयट् । तच्चोक्तम्- ‘तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा’। इति । नहि गुणकार्यभूता माया । ‘गुणमयी’ इति च वक्ष्यति । सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्- ‘तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः’ । इति व्यासयोगे । | ||
भावैः पदार्थैः । सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत इति दर्शयति- एभिरिति | ज्ञानिव्यावृत्त्यर्थम् ‘इदम्’ इति । गुणमयदेहादिकं दृष्ट्वा ईश्वरदेहोऽपि तादृश इति मायामोहित इत्यर्थः । जगाद च व्यासयोगे- ‘गौणान् ब्रह्मादिदेहादीन् दृष्ट्वा विष्णोरपीदृशः । देहादिरिति मन्वानो मोहितोऽज्ञो जनो भृशम् ॥’ इति । एभ्यः गुणमयेभ्यः । ‘गुणेभ्यः परम्’(१४.१९) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ‘केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.६.११) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । ‘त्रैगुण्यवर्जितम्’(म.भा.म.श्लोक) इति चोक्तम् ॥१३ ॥ | <span class="gr-moola">भावैः</span> पदार्थैः । सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत इति दर्शयति- <span class="gr-prateeka">एभिरिति |</span> ज्ञानिव्यावृत्त्यर्थम् ‘इदम्’ इति । गुणमयदेहादिकं दृष्ट्वा ईश्वरदेहोऽपि तादृश इति मायामोहित इत्यर्थः । जगाद च व्यासयोगे- ‘गौणान् ब्रह्मादिदेहादीन् दृष्ट्वा विष्णोरपीदृशः । देहादिरिति मन्वानो मोहितोऽज्ञो जनो भृशम् ॥’ इति । <span class="gr-moola">एभ्यः</span> गुणमयेभ्यः । ‘गुणेभ्यः परम्’(१४.१९) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ‘केवलो निर्गुणश्च’(श्वे.६.११) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । ‘त्रैगुण्यवर्जितम्’(म.भा.म.श्लोक) इति चोक्तम् ॥१३ ॥ | ||
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कथमनादिकाले मोहानत्ययो बहूनाम्? इत्यत आह- दैवीति ॥ अयमाशयः - माया हि एषा मोहिका । सा च सृष्ट्यादिक्रीडादि- मद्देवसम्बन्धित्वाद् अतिशक्तेर्दुरत्यया । तथाहि देवशब्दार्थं पठन्ति- ‘दिवु=क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति-मद-मोद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इति । कथं दैवी ? मदीयत्वात् । अहं हि देव इति । अब्रवीच्च- ‘श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी । तच्छक्त्यनन्तांशहीनाऽथापि तस्याश्रयात् प्रभोः ।अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलाऽपि हि ।तेषां दुरत्ययाऽप्येषा विना विष्णुप्रसादतः ॥’ इति व्यासयोगे । तर्हि न कथञ्चिदत्येतुं शक्यते? इत्यत आह- मामेवेति ॥ अन्यत् सर्वं परित्यज्य मामेव ये प्रपद्यन्ते, गुर्वादिवन्दनं च मय्येव समर्पयन्ति । स एव च तत्र स्थित्वा गुर्वादिर्भवतीत्यादि पश्यन्ति । आह च नारदीये- ‘मत्सम्पत्त्या तु गुर्वादीन् भजन्ते मध्यमा नराः । मदुपाधितया तांश्च सर्वभूतानि चोत्तमाः ॥’इति । ‘आचार्यचैत्यवपुषा स्वग(तं)तिं व्यनङ्क्षि’(भाग.११.२९.६)। इति च ॥१४ ॥ | कथमनादिकाले मोहानत्ययो बहूनाम्? इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">दैवीति ॥</span> अयमाशयः - माया हि <span class="gr-moola">एषा</span> मोहिका । सा च सृष्ट्यादिक्रीडादि- मद्देवसम्बन्धित्वाद् अतिशक्तेर्दुरत्यया । तथाहि देवशब्दार्थं पठन्ति- ‘दिवु=क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति-मद-मोद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इति । कथं दैवी ? मदीयत्वात् । अहं हि देव इति । अब्रवीच्च- ‘श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी । तच्छक्त्यनन्तांशहीनाऽथापि तस्याश्रयात् प्रभोः ।अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलाऽपि हि ।तेषां दुरत्ययाऽप्येषा विना विष्णुप्रसादतः ॥’ इति व्यासयोगे । तर्हि न कथञ्चिदत्येतुं शक्यते? इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">मामेवेति ॥</span> अन्यत् सर्वं परित्यज्य <span class="gr-moola">मामेव ये प्रपद्यन्ते</span>, गुर्वादिवन्दनं च मय्येव समर्पयन्ति । स एव च तत्र स्थित्वा गुर्वादिर्भवतीत्यादि पश्यन्ति । आह च नारदीये- ‘मत्सम्पत्त्या तु गुर्वादीन् भजन्ते मध्यमा नराः । मदुपाधितया तांश्च सर्वभूतानि चोत्तमाः ॥’इति । ‘आचार्यचैत्यवपुषा स्वग(तं)तिं व्यनङ्क्षि’(भाग.११.२९.६)। इति च ॥१४ ॥ | ||
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तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - न मामिति ॥ दुष्कृतित्वात् मूढाः । अत एव | तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">न मामिति ॥</span> दुष्कृतित्वात् <span class="gr-moola">मूढाः</span> । अत एव <span class="gr-moola">नराधमाः</span>। अपहृतज्ञानत्वाच्च <span class="gr-moola">मूढाः</span> । अत एव <span class="gr-moola">आसुरं भावमाश्रिताः</span> । स च वक्ष्यते- ‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’(१६.७) इत्यादिना । अपहारः= अभिभवः । उक्तं चैतद् व्यासयोगे- ‘ज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यभिभूयते’। इति । असुषु रता असुराः । तच्चोक्तं नारदीये- ‘ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ’ ।। इति ॥ १५, १६ ॥ | ||
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| Line 5,111: | Line 5,160: | ||
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बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । तच्चोक्तं ब्राह्मे- ‘जन्मभिर्बहुभिः ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते’। इति ॥ १९ ॥ | <span class="gr-moola">बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्</span> भवति । तच्चोक्तं ब्राह्मे- ‘जन्मभिर्बहुभिः ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते’। इति ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 5,128: | Line 5,177: | ||
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प्रकृत्या स्वभावेन,- ‘स्वभावः प्रकृतिश्चैव संस्कारो वासनेति च’। इत्यभिधानात् ॥ २० ॥ | <span class="gr-moola">प्रकृत्या</span> स्वभावेन,- ‘स्वभावः प्रकृतिश्चैव संस्कारो वासनेति च’। इत्यभिधानात् ॥ २० ॥ | ||
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| Line 5,163: | Line 5,212: | ||
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यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम् । उक्तं च नारदीये-‘अन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता’। इति ।‘मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः’।(म.भा.शां.प.३४२.३) इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु ।‘अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते’ । इत्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते ॥॥ २१-२३ ॥ | <span class="gr-moola">यां यां</span> ब्रह्मादिरूपां तनुम् । उक्तं च नारदीये-‘अन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता’। इति ।‘मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः’।(म.भा.शां.प.३४२.३) इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु ।‘अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते’ । इत्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते ॥॥ २१-२३ ॥ | ||
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| Line 5,180: | Line 5,229: | ||
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को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह -अव्यक्तमिति ॥ कार्यदेहादिवर्जितः(तम्) । तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह -व्यक्तिमापन्नमिति ॥ कार्यदेहाद्यापन्नम् । तच्चोक्तम्- ‘सदसतः परम्’ ,‘न तस्य कार्यम्(श्वे.उ.६,८)’ ,‘अपाणिपादः’(श्वे.उ.३,१९) ,‘आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदेहिकम्’ इत्यादौ । भावं याथार्थ्यम् । (तच्चा)तथाऽब्रवीत्-‘याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः’ । इति ॥ २४ ॥ | को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">अव्यक्तमिति ॥</span> कार्यदेहादिवर्जितः(तम्) । तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">व्यक्तिमापन्नमिति ॥</span> कार्यदेहाद्यापन्नम् । तच्चोक्तम्- ‘सदसतः परम्’ ,‘न तस्य कार्यम्(श्वे.उ.६,८)’ ,‘अपाणिपादः’(श्वे.उ.३,१९) ,‘आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदेहिकम्’ इत्यादौ । <span class="gr-moola">भावं</span> याथार्थ्यम् । (तच्चा)तथाऽब्रवीत्-‘याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः’ । इति ॥ २४ ॥ | ||
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अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह -नाहमिति ॥ योगेन= सामर्थ्योपायेन, मायया च । मयैव मूढो नाभिजानाति । तथाऽऽह पाद्मे-‘आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम् ।स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’ इति ॥२५ ॥ | अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह -<span class="gr-prateeka">नाहमिति ॥</span> योगेन= सामर्थ्योपायेन, मायया च । मयैव <span class="gr-moola">मूढो नाभिजानाति</span> । तथाऽऽह पाद्मे-‘आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम् ।स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’ इति ॥२५ ॥ | ||
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न च मां माया बध्नातीत्याह -वेदेति ॥ न कश्चन अतिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात् ॥ २६ ॥ | न च मां माया बध्नातीत्याह -<span class="gr-prateeka">वेदेति ॥</span> न <span class="gr-moola">कश्चन</span> अतिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात् ॥ २६ ॥ | ||
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द्वन्द्वमोहेन सुखदुःखादिविषयमोहेन । इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम् । कारणान्तरमेतत् । सर्गे सर्गकालं आरभ्यैव । शरीरे हि सति (सन्ति) इच्छादयः । पूर्वं त्वज्ञानमात्रम् ॥ २७ ॥ | <span class="gr-moola">द्वन्द्वमोहेन</span> सुखदुःखादिविषयमोहेन । इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम् । कारणान्तरमेतत् । <span class="gr-moola">सर्गे</span> सर्गकालं आरभ्यैव । शरीरे हि सति (सन्ति) इच्छादयः । पूर्वं त्वज्ञानमात्रम् ॥ २७ ॥ | ||
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विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - येषामिति ॥ २८ ॥ | विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - <span class="gr-prateeka">येषामिति ॥</span> २८ ॥ | ||
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परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् अध्यात्मम् । आत्माऽधिकारे यत् तदिति वा । तथा हि- जैवस्वभावः । स्वाख्यो भाव इति व्युत्पत्त्या जीवो वा स्वभावः । सर्वदा अस्त्येवैकप्रकारेणेति भावः । अन्तःकरणादिव्यावृत्त्यर्थो ‘भाव’शब्दः । न ह्येकप्रकारेण स्थितिरन्तःकरणादेः, विकारित्वात् । स्वशब्दः ईश्वरव्यावृत्त्यर्थः । भूतानाम्= जीवानाम्, भावानाम्= जडपदार्थानां चोद्भवकरेश्वरक्रिया विसर्गः । विशेषेण सर्जनम् = विसर्ग इत्यर्थः ॥ १-३ ॥ | परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् <span class="gr-moola">अध्यात्मम्</span> । आत्माऽधिकारे यत् तदिति वा । तथा हि- जैवस्वभावः । स्वाख्यो भाव इति व्युत्पत्त्या जीवो वा <span class="gr-moola">स्वभावः</span> । सर्वदा अस्त्येवैकप्रकारेणेति भावः । अन्तःकरणादिव्यावृत्त्यर्थो ‘भाव’शब्दः । न ह्येकप्रकारेण स्थितिरन्तःकरणादेः, विकारित्वात् । स्वशब्दः ईश्वरव्यावृत्त्यर्थः । भूतानाम्= जीवानाम्, भावानाम्= जडपदार्थानां चोद्भवकरेश्वरक्रिया <span class="gr-moola">विसर्गः</span> । विशेषेण सर्जनम् = विसर्ग इत्यर्थः ॥ १-३ ॥ | ||
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भूतानि = सशरीरान् जीवान् अधिकृत्य यत् तद् अधिभूतम् । क्षरो भावः विनाशी कार्यः पदार्थः । अव्यक्तान्तर्भावेऽपि तस्याप्यन्यथाभावाख्यो विनाशोऽस्त्येव । तच्चोक्तम्- ‘अव्यक्तं परमे व्योम्नि (व्योमन्) निष्क्रिये सम्प्रलीयते।’ इति ।‘तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।’ इति च ।‘विकारोऽव्यक्तजन्म हि’ इति च स्कान्दे ।पुरि शयनात् पुरुषो जीवः । स च सङ्कर्षणो ब्रह्मा वा । स सर्वदेवानधिकृत्य वर्तते पतिरिति अधिदैवतम् । देवाधिकारस्थ इति वा । देवान् इन्द्रियाण्यपेक्ष्य(भावरत्नकोशे स्वीकृतं भाष्यवाक्यम्)। | भूतानि = सशरीरान् जीवान् अधिकृत्य यत् तद् <span class="gr-moola">अधिभूतम्</span> । <span class="gr-moola">क्षरो भावः</span> विनाशी कार्यः पदार्थः । अव्यक्तान्तर्भावेऽपि तस्याप्यन्यथाभावाख्यो विनाशोऽस्त्येव । तच्चोक्तम्- ‘अव्यक्तं परमे व्योम्नि (व्योमन्) निष्क्रिये सम्प्रलीयते।’ इति ।‘तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।’ इति च ।‘विकारोऽव्यक्तजन्म हि’ इति च स्कान्दे ।पुरि शयनात् <span class="gr-moola">पुरुषो</span> जीवः । स च सङ्कर्षणो ब्रह्मा वा । स सर्वदेवानधिकृत्य वर्तते पतिरिति अधिदैवतम् । देवाधिकारस्थ इति वा । देवान् इन्द्रियाण्यपेक्ष्य(भावरत्नकोशे स्वीकृतं भाष्यवाक्यम्)। | ||
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सर्वयज्ञभोक्तृत्वादेः अधियज्ञः । अन्योऽधियज्ञोऽग्न्यादिः प्रसिद्धः इति ‘देहे’ इति विशेषणम् ।‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’(५.२९), ‘त्रैविद्या माम्’(९.२०), ‘येऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३), ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवाः।’(बृ.५.८.९) इत्यादेः ।‘कुतो ह्यस्य ध्रुवः(वं) स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम्।’(म.भा.शां.प.३४२.२) इत्यादिपरिहाराच्च मोक्षधर्मे ॥ भगवान् चेत्, तद्भोक्तृत्वादेरधियज्ञत्वं सिद्धमिति ‘कथम्’ इत्यस्य परिहारः पृथङ् नोक्तः । सर्वप्राणिदेहस्थरूपेण | सर्वयज्ञभोक्तृत्वादेः <span class="gr-moola">अधियज्ञः</span> । अन्योऽधियज्ञोऽग्न्यादिः प्रसिद्धः इति ‘देहे’ इति विशेषणम् ।‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’(५.२९), ‘त्रैविद्या माम्’(९.२०), ‘येऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३), ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवाः।’(बृ.५.८.९) इत्यादेः ।‘कुतो ह्यस्य ध्रुवः(वं) स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम्।’(म.भा.शां.प.३४२.२) इत्यादिपरिहाराच्च मोक्षधर्मे ॥ भगवान् चेत्, तद्भोक्तृत्वादेरधियज्ञत्वं सिद्धमिति ‘कथम्’ इत्यस्य परिहारः पृथङ् नोक्तः । सर्वप्राणिदेहस्थरूपेण <span class="gr-moola">अधियज्ञः</span>। | ||
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मद्भावं मयि सत्ताम् । निर्दुःखनिरतिशयानन्दात्मिकाम् । तच्चोक्तम्-‘मुक्तानां च गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः।’(म.भा.शां.प.३४२.४२) इति मोक्षधर्मे ॥ ५ ॥ | <span class="gr-moola">मद्भावं</span> मयि सत्ताम् । निर्दुःखनिरतिशयानन्दात्मिकाम् । तच्चोक्तम्-‘मुक्तानां च गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः।’(म.भा.शां.प.३४२.४२) इति मोक्षधर्मे ॥ ५ ॥ | ||
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स्मरन् त्यजतीति भिन्नकालीनत्वेऽप्यविरोध इति मन्दमतेः शङ्का मा भूदिति ‘अन्ते’ इति विशेषणम् । सुमतेर्नैव शङ्काऽवकाशः । ‘स्मरन् त्यजति’ इत्येककालीनत्वप्रतीतेः । दुर्मतेः दुःखान्न स्मरन् त्यजतीति भविष्यति शङ्का ।‘त्यजन् देहं न कश्चित्तु मोहमाप्नोत्यसंशयम्’ ।इति स्कान्दे । | <span class="gr-moola">स्मरन्</span> त्यजतीति भिन्नकालीनत्वेऽप्यविरोध इति मन्दमतेः शङ्का मा भूदिति ‘अन्ते’ इति विशेषणम् । सुमतेर्नैव शङ्काऽवकाशः । ‘स्मरन् त्यजति’ इत्येककालीनत्वप्रतीतेः । दुर्मतेः दुःखान्न स्मरन् त्यजतीति भविष्यति शङ्का ।‘त्यजन् देहं न कश्चित्तु मोहमाप्नोत्यसंशयम्’ ।इति स्कान्दे । | ||
‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति॥’(बृ.६.४.२) इति हि श्रुतिः । | ‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति॥’(बृ.६.४.२) इति हि श्रुतिः । | ||
‘सदा तद्भावभावितः’ इति अन्तकालस्मरणोपायमाह । भावः= अन्तर्गतं मनः । तथाऽभिधानात् । भावितत्वम्= तिवासितत्वम् । ‘भावना त्वतिवासना’ इत्यभिधानात् ॥ ६, ७ ॥ | ‘सदा तद्भावभावितः’ इति अन्तकालस्मरणोपायमाह । भावः= अन्तर्गतं मनः । तथाऽभिधानात् । भावितत्वम्= तिवासितत्वम् । ‘भावना त्वतिवासना’ इत्यभिधानात् ॥ ६, ७ ॥ | ||
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सदा तद्भावभावितत्वं स्पष्टयति -अभ्यासेति ॥ अभ्यास एव योगो अभ्यासयोगः । दिव्यं पुरुषं पुरिशयं पूर्णं च । | सदा तद्भावभावितत्वं स्पष्टयति -<span class="gr-prateeka">अभ्यासेति ॥</span> अभ्यास एव योगो <span class="gr-moola">अभ्यासयोगः</span> । <span class="gr-moola">दिव्यं पुरुषं</span> पुरिशयं पूर्णं च । | ||
‘स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो। नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥’(बृ.४.५.१८) इति श्रुतेः ।दिव्यं सृष्ट्यादिक्रीडादियुक्तम् । ‘दिवु = क्रीडा-.......’ इति धातोः ॥८ ॥ | ‘स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो। नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥’(बृ.४.५.१८) इति श्रुतेः ।दिव्यं सृष्ट्यादिक्रीडादियुक्तम् । ‘दिवु = क्रीडा-.......’ इति धातोः ॥८ ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
ध्येयमाह- कविमिति ॥ कविं सर्वज्ञम् ,‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.१०) इति श्रुतिः । ‘त्वं कविः सर्ववेदनात्’ इति च ब्राह्मे । धातारं धारणपोषणकर्तारम् । ‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’ इति धातोः । ‘धाता विधाता परमोत सन्दृक्’(कृ.य.का.५.प्र.७.अनु.४) इति च श्रुतिः ।‘ब्रह्मा स्थाणुः’ इत्यारभ्य ‘तस्य प्रसादादिच्छन्ति तदादिष्टफलं गतिम्।’(म.भा.शां.प.३३४.३४-३९) इति च मोक्षधर्मे । तमसः अव्यक्तात् परतः स्थितम्- तमसः परस्तादिति ॥ अव्यक्तं वै तमः, परस्ताद्धि स ततः’ इति पिप्पलादशाखायाम् । ‘मृत्युर्वा व तमः’ , मृत्युर्वै ज्योतिरमृतम्’(बृ.३.३.२९) इति श्रुतेः ॥९ ॥ | ध्येयमाह- <span class="gr-prateeka">कविमिति ॥</span> <span class="gr-moola">कविं</span> सर्वज्ञम् ,‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.१०) इति श्रुतिः । ‘त्वं कविः सर्ववेदनात्’ इति च ब्राह्मे । <span class="gr-moola">धातारं</span> धारणपोषणकर्तारम् । ‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’ इति धातोः । ‘धाता विधाता परमोत सन्दृक्’(कृ.य.का.५.प्र.७.अनु.४) इति च श्रुतिः ।‘ब्रह्मा स्थाणुः’ इत्यारभ्य ‘तस्य प्रसादादिच्छन्ति तदादिष्टफलं गतिम्।’(म.भा.शां.प.३३४.३४-३९) इति च मोक्षधर्मे । <span class="gr-moola">तमसः</span> अव्यक्तात् परतः स्थितम्- <span class="gr-prateeka">तमसः परस्तादिति ॥</span> अव्यक्तं वै तमः, परस्ताद्धि स ततः’ इति पिप्पलादशाखायाम् । ‘मृत्युर्वा व तमः’ , मृत्युर्वै ज्योतिरमृतम्’(बृ.३.३.२९) इति श्रुतेः ॥९ ॥ | ||
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वायुजयादियोगयुक्तानां मृतिकालकर्तव्यमाह विशेषतः - प्रयाणकाल इति ॥ वायुजयादिरहितानामपि ज्ञानभक्तिवैराग्यसम्पूर्णानां भवत्येव मुक्तिः । तद्वतां तु ईषज्ज्ञानाद्यसम्पूर्णानामपि निपुणानां तद्बलात् कथञ्चिद् भवतीति विशेषः । उक्तं च भागवते- ‘पानेन ते देवकथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये ।वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाऽञ्जसा त्वाऽऽपुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथाऽपरे (परे) त्वात्मसमाधियोगबलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्नतु सेवया ते।’(भाग.३.६.२४-२५)इति ॥ ‘ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं (तत् तेजः) प्रविशन्त्युत ॥’(म.भा.शां.प.३४२.४५) इति च मोक्षधर्मे ।‘सम्पूर्णानां भवेन्मोक्षो विरक्तिज्ञानभक्तिभिः ।नियमेन तथाऽपीरजयादियुतयोगिनाम् ।वश्यत्वान्मनसस्त्वीषत् पूर्वमप्याप्यते ध्रुवम् ॥’ इति च व्यासयोगे ।॥१० ॥ | वायुजयादियोगयुक्तानां मृतिकालकर्तव्यमाह विशेषतः - <span class="gr-prateeka">प्रयाणकाल इति ॥</span> वायुजयादिरहितानामपि ज्ञानभक्तिवैराग्यसम्पूर्णानां भवत्येव मुक्तिः । तद्वतां तु ईषज्ज्ञानाद्यसम्पूर्णानामपि निपुणानां तद्बलात् कथञ्चिद् भवतीति विशेषः । उक्तं च भागवते- ‘पानेन ते देवकथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये ।वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाऽञ्जसा त्वाऽऽपुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथाऽपरे (परे) त्वात्मसमाधियोगबलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्नतु सेवया ते।’(भाग.३.६.२४-२५)इति ॥ ‘ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं (तत् तेजः) प्रविशन्त्युत ॥’(म.भा.शां.प.३४२.४५) इति च मोक्षधर्मे ।‘सम्पूर्णानां भवेन्मोक्षो विरक्तिज्ञानभक्तिभिः ।नियमेन तथाऽपीरजयादियुतयोगिनाम् ।वश्यत्वान्मनसस्त्वीषत् पूर्वमप्याप्यते ध्रुवम् ॥’ इति च व्यासयोगे ।॥१० ॥ | ||
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तदेव सध्येयं प्रपञ्चयति -यदक्षरमित्यादिना ॥ प्राप्यते मुमुक्षुभिरिति पदं स्वरूपम् । ‘पद= गतौ’ इति धातोः ।‘तद् विष्णोः परमं पदम्’(ऋ.मं.१.सू.२२.मं.७) इति श्रुतेश्च ।‘गीयसे पदमित्येव मुनिभिः पद्यसे यतः।’ इति वचनान्नारदीये ॥११ ॥ | तदेव सध्येयं प्रपञ्चयति -<span class="gr-prateeka">यदक्षरमित्यादिना ॥</span> प्राप्यते मुमुक्षुभिरिति <span class="gr-moola">पदं</span> स्वरूपम् । ‘पद= गतौ’ इति धातोः ।‘तद् विष्णोः परमं पदम्’(ऋ.मं.१.सू.२२.मं.७) इति श्रुतेश्च ।‘गीयसे पदमित्येव मुनिभिः पद्यसे यतः।’ इति वचनान्नारदीये ॥११ ॥ | ||
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ब्रह्मनाडीं विना यद्यन्यत्र गच्छति तर्हि विना मोक्षं स्थानान्तरं प्राप्नोतीति सर्वद्वाराणि | ब्रह्मनाडीं विना यद्यन्यत्र गच्छति तर्हि विना मोक्षं स्थानान्तरं प्राप्नोतीति <span class="gr-moola">सर्वद्वाराणि संयम्य</span>। ‘निर्गच्छन् चक्षुषा सूर्यं दिशः श्रोत्रेण चैव हि’ इत्यादिवचनात् व्यासयोगे, मोक्षधर्मे च । <span class="gr-moola">हृदि</span> नारायणे ।‘ह्रियते त्वया जगद् यस्माद्धृदित्येव प्रभाष्यसे’इति हि पाद्मे। न हि <span class="gr-moola">मूर्ध्नि</span> प्राणे (प्राणस्थितेः) <span class="gr-moola">हृदि</span> मनसः स्थितिः सम्भवति । ‘यत्र प्राणो मनस्तत्र तत्र जीवः परस्तथा।’ इति व्यासयोगे । <span class="gr-moola">योगधारणामास्थितः</span> योगभरण एवाभियुक्त इत्यर्थः ॥ १२, १३ ॥ | ||
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नित्ययुक्तस्य नित्योपायवतः । योगिनः परिपूर्णयोगस्य ॥ १४ ॥ | <span class="gr-moola">नित्ययुक्तस्य</span> नित्योपायवतः । <span class="gr-moola">योगिनः</span> परिपूर्णयोगस्य ॥ १४ ॥ | ||
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तत्प्राप्तिं स्तौति - माम् इति ॥ ‘परमां (सं)सिद्धिं गता हि ते’ इति तत्र हेतुः ॥ १५ ॥ | तत्प्राप्तिं स्तौति - <span class="gr-prateeka">माम् इति ॥</span> ‘परमां (सं)सिद्धिं गता हि ते’ इति तत्र हेतुः ॥ १५ ॥ | ||
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‘मां प्राप्य न पुनरावृत्तिः’ इति स्थापयितुम् अव्यक्ताख्यात्मसामर्थ्यं दर्शयितुं प्रलयादि दर्शयति - सहस्रयुगेत्यादिना ॥ सहस्रशब्दोऽत्रानेकवाची । ब्रह्म परम् । ‘सा विश्वरूपस्य रजनी’ इति हि श्रुतिः । द्विपरार्धप्रलय एवात्र विवक्षितः । ‘अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः’(८.१८) इत्युक्तेः । उक्तं च महाकौर्मे- ‘अनेकयुगपर्यन्तम् अहर्विष्णोस्तथा निशा ।रात्र्यादौ लीयते सर्वमहरादौ च जायते ॥’ इति ।‘यः स सर्वेषु भूतेषु’ इति वाक्यशेषाच्च ॥ १७-२० ॥ | ‘मां प्राप्य न पुनरावृत्तिः’ इति स्थापयितुम् अव्यक्ताख्यात्मसामर्थ्यं दर्शयितुं प्रलयादि दर्शयति - <span class="gr-prateeka">सहस्रयुगेत्यादिना ॥</span> सहस्रशब्दोऽत्रानेकवाची । ब्रह्म परम् । ‘सा विश्वरूपस्य रजनी’ इति हि श्रुतिः । द्विपरार्धप्रलय एवात्र विवक्षितः । ‘अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः’(८.१८) इत्युक्तेः । उक्तं च महाकौर्मे- ‘अनेकयुगपर्यन्तम् अहर्विष्णोस्तथा निशा ।रात्र्यादौ लीयते सर्वमहरादौ च जायते ॥’ इति ।‘यः स सर्वेषु भूतेषु’ इति वाक्यशेषाच्च ॥ १७-२० ॥ | ||
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अव्यक्तः भगवान् । ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते’ इति ‘मामुपेत्य’(८.१६) इत्युक्तस्य परामर्शात् । ‘अव्यक्तं परमं विष्णुः’ इति प्रयोगाच्च गारुडे । धाम स्वरूपम् । ‘तेजः स्वरूपं च गृहं प्राज्ञैर्धामेति गीयते’ इत्यभिधानात्॥ २१ ॥ | <span class="gr-moola">अव्यक्तः</span> भगवान् । ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते’ इति ‘मामुपेत्य’(८.१६) इत्युक्तस्य परामर्शात् । ‘अव्यक्तं परमं विष्णुः’ इति प्रयोगाच्च गारुडे । <span class="gr-moola">धाम</span> स्वरूपम् । ‘तेजः स्वरूपं च गृहं प्राज्ञैर्धामेति गीयते’ इत्यभिधानात्॥ २१ ॥ | ||
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परमसाधनमाह- पुरुष इति ॥ २२ ॥ | परमसाधनमाह- <span class="gr-prateeka">पुरुष इति ॥</span> २२ ॥ | ||
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यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - यत्रेत्यादिना ॥ ‘काले’ इत्युपलक्षणम् । अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात् ॥२३ ॥ | यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - <span class="gr-prateeka">यत्रेत्यादिना ॥</span> ‘काले’ इत्युपलक्षणम् । अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात् ॥२३ ॥ | ||
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ज्योतिः अर्चिः । ‘ते अर्चिषमभिसम्भवन्ति’(छा.५.४.१)इति हि श्रुतिः । तथा च नारदीये- ‘अग्निं प्राप्य ततश्चार्चिः ततश्चाप्यहरादिकम्।’ इति ।अभिमानिदेवताश्च अग्न्यादयः । कथमन्यथा ‘अह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति युज्येत । | <span class="gr-moola">ज्योतिः</span> अर्चिः । ‘ते अर्चिषमभिसम्भवन्ति’(छा.५.४.१)इति हि श्रुतिः । तथा च नारदीये- ‘अग्निं प्राप्य ततश्चार्चिः ततश्चाप्यहरादिकम्।’ इति ।अभिमानिदेवताश्च अग्न्यादयः । कथमन्यथा ‘अह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति युज्येत । | ||
‘दिवादिदेवताभिस्तु पूजितो ब्रह्म याति हि।’ इति च ब्राह्मे ।मासाभिमानिभ्यो अयनाभिमानिनी च पृथक् । तच्चोक्तं गारुडे- ‘पूजितस्त्वयनेनासौ मासैः परिवृतेन हि’ इति ।तच्चोक्तं ब्रह्मवैवर्ते- ‘साह्ना मध्यन्दिनेनाथ शुक्लेन च स पूर्णिमा ।सविष्वा चायनेनासौ पूजितः केशवं व्रजेत् ॥’ इति ॥ २४-२६ ॥ | ‘दिवादिदेवताभिस्तु पूजितो ब्रह्म याति हि।’ इति च ब्राह्मे ।मासाभिमानिभ्यो अयनाभिमानिनी च पृथक् । तच्चोक्तं गारुडे- ‘पूजितस्त्वयनेनासौ मासैः परिवृतेन हि’ इति ।तच्चोक्तं ब्रह्मवैवर्ते- ‘साह्ना मध्यन्दिनेनाथ शुक्लेन च स पूर्णिमा ।सविष्वा चायनेनासौ पूजितः केशवं व्रजेत् ॥’ इति ॥ २४-२६ ॥ | ||
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राजविद्या प्रधानविद्या । प्रत्यक्षं ब्रह्म अवगम्यते येन तत् प्रत्यक्षावगमम् । अक्षेषु = इन्द्रियेषु प्रति प्रति स्थित इति प्रत्यक्षः । तथा च श्रुतिः- ‘यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरम्, यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.५.७.१६) ।‘यो वाचि (विज्ञाने) तिष्ठन्’(बृ.५.७.१७), ‘यः चक्षुषि तिष्ठन्’(बृ.५.७.१८) इत्यादेः ।‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते’(छा.४.१५.१)इति च ।‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः अङ्गुष्ठं च समाश्रितः’(म.ना.१६(१५).५) इति च । ‘त्वं मनस्त्वं चन्द्रमास्त्वं चक्षुरादित्यः(त्यम्)’(गी.प्रे. म.भा.शां.प.३३८.४)इत्यादेश्च मोक्षधर्मे ।‘स प्रत्यक्षः, प्रति प्रति हि सोऽक्षेष्वक्षवान् स भवति हि, य एवं विद्वान् प्रत्यक्षं वेद’इति सामवेदे (वारुणशाखायाम्) बाभ्रव्यशाखायाम् ।धर्मो=भगवान्, तद्विषयं | <span class="gr-moola">राजविद्या</span> प्रधानविद्या । प्रत्यक्षं ब्रह्म अवगम्यते येन तत् <span class="gr-moola">प्रत्यक्षावगमम्</span> । अक्षेषु = इन्द्रियेषु प्रति प्रति स्थित इति प्रत्यक्षः । तथा च श्रुतिः- ‘यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरम्, यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.५.७.१६) ।‘यो वाचि (विज्ञाने) तिष्ठन्’(बृ.५.७.१७), ‘यः चक्षुषि तिष्ठन्’(बृ.५.७.१८) इत्यादेः ।‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते’(छा.४.१५.१)इति च ।‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः अङ्गुष्ठं च समाश्रितः’(म.ना.१६(१५).५) इति च । ‘त्वं मनस्त्वं चन्द्रमास्त्वं चक्षुरादित्यः(त्यम्)’(गी.प्रे. म.भा.शां.प.३३८.४)इत्यादेश्च मोक्षधर्मे ।‘स प्रत्यक्षः, प्रति प्रति हि सोऽक्षेष्वक्षवान् स भवति हि, य एवं विद्वान् प्रत्यक्षं वेद’इति सामवेदे (वारुणशाखायाम्) बाभ्रव्यशाखायाम् ।धर्मो=भगवान्, तद्विषयं <span class="gr-moola">धर्म्यम्</span>। सर्वं जगद् धत्त इति धर्मः । ‘पृथिवी (धरणी) धर्ममूर्धनि’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१२) इति प्रयोगान्मोक्षधर्मे । ‘भारभृत् कथितो योगी’ इति च । ‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति’(तै.आ.३.१४)इति च श्रुतिः । ‘धर्मो वा इदमग्र आसीन्न पृथिवी न वायुर्नाकाशो न ब्रह्मा न रुद्रो (नेन्द्रो) न देवा न ऋषयः सोऽध्यायत्’ इति च सामवेदे बाभ्रव्यशाखायाम् । ‘प्रत्यक्षावगम’शब्देन अपरोक्षज्ञानसाधनत्वमुक्तम् ॥ १-३ ॥ | ||
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तज्ज्ञानाद्याह- मयेति ॥ तर्हि किमिति न दृश्यत इत्यत आह- अव्यक्तमूर्तिनेति ॥ ४ ॥ | तज्ज्ञानाद्याह- <span class="gr-prateeka">मयेति ॥</span> तर्हि किमिति न दृश्यत इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">अव्यक्तमूर्तिनेति ॥</span> ४ ॥ | ||
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मत्स्थत्वेऽपि यथा पृथिव्यां स्पृष्ट्वा स्थितानि, न तथा मयीत्याह- न चेति | मत्स्थत्वेऽपि यथा पृथिव्यां स्पृष्ट्वा स्थितानि, न तथा मयीत्याह- <span class="gr-prateeka">न चेति ॥</span>‘न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च।’(कुम्भ-म.भा.१२.३४७.२१) इति मोक्षधर्मे । ‘सञ्ज्ञासञ्ज्ञ’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति च । <span class="gr-moola">ममाऽत्मा</span> देह एव <span class="gr-moola">भूतभावनः</span> । ‘महाविभूते माहात्म्यशरीर’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति हि मोक्षधर्मे ॥५ ॥ | ||
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‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- यथाऽऽकाशस्थित इति ॥ न हि आकाशस्थितो(ऽपि) वायुः स्पर्शाद्याप्नोति ॥ ६ ॥ | ‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- <span class="gr-prateeka">यथाऽऽकाशस्थित इति ॥</span> न हि आकाशस्थितो(ऽपि) वायुः स्पर्शाद्याप्नोति ॥ ६ ॥ | ||
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ज्ञानप्रदर्शनार्थं प्रलयादि प्रपञ्चयति- सर्वभूतानीत्यादिना | ज्ञानप्रदर्शनार्थं प्रलयादि प्रपञ्चयति- <span class="gr-prateeka">सर्वभूतानीत्यादिना ॥</span>७॥ | ||
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उदासीनवत्, न तु उदासीनः । तदर्थमाह- असक्तमिति ॥ ‘अवाक्यनादरः’(छा.३.३४.२) इति (हि) श्रुतिः । | उदासीनवत्, न तु उदासीनः । तदर्थमाह- <span class="gr-prateeka">असक्तमिति ॥</span> ‘अवाक्यनादरः’(छा.३.३४.२) इति (हि) श्रुतिः । | ||
‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥’(भाग.२.१०.११) इति भागवते ।यस्य असक्त्यैव सर्वकर्मशक्तिः कुतस्तस्य सर्वकर्मबन्ध इति भावः । ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’इति श्रुतिः। | ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥’(भाग.२.१०.११) इति भागवते ।यस्य असक्त्यैव सर्वकर्मशक्तिः कुतस्तस्य सर्वकर्मबन्ध इति भावः । ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’इति श्रुतिः। | ||
यः कर्माणि(पि) निया(य)मयति कथं च (तत्) तं कर्म बध्नाति ॥९ ॥ | यः कर्माणि(पि) निया(य)मयति कथं च (तत्) तं कर्म बध्नाति ॥९ ॥ | ||
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उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- मयेति ॥ प्रकृतिसूतिद्रष्टा कर्ता (च) अहमेवेत्यर्थः । तथा च श्रुतिः- ‘यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम्।’(म.ना.१.४)इति ॥१० ॥ | उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">मयेति ॥</span> प्रकृतिसूतिद्रष्टा कर्ता (च) अहमेवेत्यर्थः । तथा च श्रुतिः- ‘यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम्।’(म.ना.१.४)इति ॥१० ॥ | ||
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तर्हि कथं केचित् त्वामवजानन्ति ? का च तेषां गतिः ? इत्यत आह -अवजानन्तीत्यादिना ॥ मानुषीं तनुं मूढानां मानुषवत् प्रतीताम् तनुं, न तु मनुष्यरूपाम् । उक्तं च मोक्षधर्मे- ‘यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते ।सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ।भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च ।भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’।(कुम्भ-म.भा.१२.३५७.११-१३) इति ।अवतारप्रसङ्गे चैतदुक्तम् । अतो नावताराः (च) पृथक् शङ्क्याः ।‘रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावभवाय सः ।वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५९.३६-३७) इति तत्रैव प्रथमसर्गकाल एवावताररूपविभक्त्युक्तेश्च । अतो न तेषां मानुषत्वादिर्विना भ्रान्तिम् । ‘भूतं महद् ईश्वरं च’ इति भूतमहेश्वरम् । तथा हि (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं परिपूर्णरूपम् ईशं वराणामपि देववीर्यम्।’ इति ।‘अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्।’(बृ.४.४.१०) इति च ।‘ब्रह्म पुरोहित ब्रह्म कायिक महाराजिक।’(गी.प्रे-म.भा.१२.३३८.४) इति च मोक्षधर्मे ॥११ ॥ | तर्हि कथं केचित् त्वामवजानन्ति ? का च तेषां गतिः ? इत्यत आह -<span class="gr-prateeka">अवजानन्तीत्यादिना ॥</span> <span class="gr-moola">मानुषीं तनुं</span> मूढानां मानुषवत् प्रतीताम् तनुं, न तु मनुष्यरूपाम् । उक्तं च मोक्षधर्मे- ‘यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते ।सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ।भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च ।भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’।(कुम्भ-म.भा.१२.३५७.११-१३) इति ।अवतारप्रसङ्गे चैतदुक्तम् । अतो नावताराः (च) पृथक् शङ्क्याः ।‘रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावभवाय सः ।वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५९.३६-३७) इति तत्रैव प्रथमसर्गकाल एवावताररूपविभक्त्युक्तेश्च । अतो न तेषां मानुषत्वादिर्विना भ्रान्तिम् । ‘भूतं महद् ईश्वरं च’ इति <span class="gr-moola">भूतमहेश्वरम्</span> । तथा हि (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं परिपूर्णरूपम् ईशं वराणामपि देववीर्यम्।’ इति ।‘अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्।’(बृ.४.४.१०) इति च ।‘ब्रह्म पुरोहित ब्रह्म कायिक महाराजिक।’(गी.प्रे-म.भा.१२.३३८.४) इति च मोक्षधर्मे ॥११ ॥ | ||
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तेषां फलमाह - मोघाशा इति ॥ वृथाशाः । भगवद्द्वेषिभिः आशासितं(आमुष्मिकम्) न किञ्चिदाप्यते । यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां, ज्ञानं च । केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकः तैराप्यत इत्यर्थः । वक्ष्यति च - ‘तानहं द्विषतः क्रूरान्’(१६.१९) इत्यादि । मोक्षधर्मे च -‘कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् ।मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः ।यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) ।कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७) इति । | तेषां फलमाह - <span class="gr-prateeka">मोघाशा इति ॥</span> वृथाशाः । भगवद्द्वेषिभिः आशासितं(आमुष्मिकम्) न किञ्चिदाप्यते । यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां, ज्ञानं च । केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकः तैराप्यत इत्यर्थः । वक्ष्यति च - ‘तानहं द्विषतः क्रूरान्’(१६.१९) इत्यादि । मोक्षधर्मे च -‘कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् ।मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः ।यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) ।कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७) इति । | ||
‘सर्वोत्कृष्टो(ष्टे) ज्ञानभक्ती ह(हि) यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये ।सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’ इति च सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम् । | ‘सर्वोत्कृष्टो(ष्टे) ज्ञानभक्ती ह(हि) यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये ।सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’ इति च सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम् । | ||
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भक्ता एव हि ते पूर्वं शिशुपालादयः । शापबलादेव च द्वेषिणः । तत्प्रश्नपूर्वं पार्षदत्वादिकथनाच्च(तत्प्रश्ने पूर्वपार्षदत्वशापादिकथनाच्च) एतज्ज्ञायते । अन्यथा किमिति तदप्रस्तुतमुच्यते । भगवतः साम्यकथनं तु द्वेषिणामपि द्वेषमनिरूप्य पूर्वतनभक्तिफलमेव ददातीति ज्ञापयितुम् । ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’(९.३१) इति च वक्ष्यति । न च‘भावो (हि) भव(भाव)कारणम्’ (भाग.१०.८४.४७) इत्यादिविरोधः । द्वेषभाविनां द्वेष एव भवतीति हि युक्तम् । अन्यथा गुरुद्वेषिणामपि गुरुत्वं भवतीत्याद्यनिष्टम् आपद्येत । न च आकृतधीत्वेऽविशेषः । तेषामेव हिरण्यकशिप्वादीनां पापप्रतीतेः- ‘हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः । विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥’(भाग.४.२१.४६) इति ।‘यदनिन्दत् पिता मह्यम्’(भाग.७.१०.१६) इत्यारभ्य‘तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्’ (भाग.७.१०.१८) इति प्रह्लादेन भगवतो वरयाचनाच्च । बहुषु ग्रन्थेषु च निषेधः, कुत्रचिदेव तदुक्तिरिति विशेषः । यस्मिन् तदुच्यते तत्रैव निषेध उक्तः । महातात्पर्यविरोधश्चोक्तः पुरस्तात् । अयुक्तिमद्भ्यो युक्त्तिमन्त्येव बलवन्ति वाक्यानि । युक्तयश्चोक्ता अन्येषाम् । न चैषां काचिद् गतिः । साम्येऽपि वाक्ययोर्लोकानुकूलाननुकूलयोर्लोकानुकूलमेव बलवत् । लोकानुकूलं च भक्तप्रियत्वम्, नेतरत् । उक्तं च तेषां पूर्वभक्तत्वम्- ‘मन्येसुरान् भागवतान् त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।’(भाग.३.२.२४) इत्यादि । अतो न भगवद्द्वेषिणां काचिद् गतिरिति सिद्धम् । द्वेषकारणमाह-राक्षसीमिति ॥ १२ ॥ | भक्ता एव हि ते पूर्वं शिशुपालादयः । शापबलादेव च द्वेषिणः । तत्प्रश्नपूर्वं पार्षदत्वादिकथनाच्च(तत्प्रश्ने पूर्वपार्षदत्वशापादिकथनाच्च) एतज्ज्ञायते । अन्यथा किमिति तदप्रस्तुतमुच्यते । भगवतः साम्यकथनं तु द्वेषिणामपि द्वेषमनिरूप्य पूर्वतनभक्तिफलमेव ददातीति ज्ञापयितुम् । ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’(९.३१) इति च वक्ष्यति । न च‘भावो (हि) भव(भाव)कारणम्’ (भाग.१०.८४.४७) इत्यादिविरोधः । द्वेषभाविनां द्वेष एव भवतीति हि युक्तम् । अन्यथा गुरुद्वेषिणामपि गुरुत्वं भवतीत्याद्यनिष्टम् आपद्येत । न च आकृतधीत्वेऽविशेषः । तेषामेव हिरण्यकशिप्वादीनां पापप्रतीतेः- ‘हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः । विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥’(भाग.४.२१.४६) इति ।‘यदनिन्दत् पिता मह्यम्’(भाग.७.१०.१६) इत्यारभ्य‘तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्’ (भाग.७.१०.१८) इति प्रह्लादेन भगवतो वरयाचनाच्च । बहुषु ग्रन्थेषु च निषेधः, कुत्रचिदेव तदुक्तिरिति विशेषः । यस्मिन् तदुच्यते तत्रैव निषेध उक्तः । महातात्पर्यविरोधश्चोक्तः पुरस्तात् । अयुक्तिमद्भ्यो युक्त्तिमन्त्येव बलवन्ति वाक्यानि । युक्तयश्चोक्ता अन्येषाम् । न चैषां काचिद् गतिः । साम्येऽपि वाक्ययोर्लोकानुकूलाननुकूलयोर्लोकानुकूलमेव बलवत् । लोकानुकूलं च भक्तप्रियत्वम्, नेतरत् । उक्तं च तेषां पूर्वभक्तत्वम्- ‘मन्येसुरान् भागवतान् त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।’(भाग.३.२.२४) इत्यादि । अतो न भगवद्द्वेषिणां काचिद् गतिरिति सिद्धम् । द्वेषकारणमाह-<span class="gr-prateeka">राक्षसीमिति ॥</span> १२ ॥ | ||
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नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - महात्मान इति ॥ १३, १४ ॥ | नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - <span class="gr-prateeka">महात्मान इति ॥</span> १३, १४ ॥ | ||
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सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति एकत्वेन । पृथक्त्वेन सर्वतो वैलक्षण्येन । बहुधा तस्य रूपम् ।‘आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो नीलमथार्जुनम्’(आभाति शुक्लमिव लोहितमिव अथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् इति कुम्भ-म.भा.५.४४.२६)इति हि सनत्सुजा(तीये)ते । ‘दैवमेवापरे’(४.२५) इत्युक्तप्रकारेण बहवो वा बहुधा ॥१५ ॥ | सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति <span class="gr-moola">एकत्वेन । पृथक्त्वेन</span> सर्वतो वैलक्षण्येन । <span class="gr-moola">बहुधा</span> तस्य रूपम् ।‘आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो नीलमथार्जुनम्’(आभाति शुक्लमिव लोहितमिव अथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् इति कुम्भ-म.भा.५.४४.२६)इति हि सनत्सुजा(तीये)ते । ‘दैवमेवापरे’(४.२५) इत्युक्तप्रकारेण बहवो वा बहुधा ॥१५ ॥ | ||
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प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - अहं क्रतुरित्यादिना ॥ क्रतवोऽग्निष्टोमादयः । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः । ‘उद्दिश्य देवान् द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः’ इत्यभिधानात् ॥ १६ ॥ | प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - <span class="gr-prateeka">अहं क्रतुरित्यादिना ॥</span> क्रतवोऽग्निष्टोमादयः । <span class="gr-moola">यज्ञो</span> देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः । ‘उद्दिश्य देवान् द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः’ इत्यभिधानात् ॥ १६ ॥ | ||
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| id = BGB_C09_V18_B01 | | id = BGB_C09_V18_B01 | ||
| text = | | text = | ||
गम्यते मुमुक्षुभिरिति गतिः । तथाहि सामवेदेषु वसिष्ठशाखायाम्- ‘अथ कस्मादुच्यते गतिरिति । ब्रह्मैव गतिः, तद्धि गम्यते पापविमुक्तैः’ इति । साक्षादीक्षत इति साक्षी । तथाहि बाष्कलशाखायाम्- ‘स साक्षादिदमद्राक्षीद् यदद्राक्षीत् तत् साक्षिणः साक्षित्वम्’ इति ।शरणम् आश्रयः संसारभीतस्य । ‘परमं यः परायणम्’ इति ह्युक्तम् ।‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ इति च । संहारकाले प्रकृत्या जगदत्र निधीयत इति निधानम् ।तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अपश्यमप्यये मायया विश्वकर्मण्यदो जगन्निहितं शुभ्रचक्षुः’ इति ॥१८ ॥ | गम्यते मुमुक्षुभिरिति <span class="gr-moola">गतिः</span> । तथाहि सामवेदेषु वसिष्ठशाखायाम्- ‘अथ कस्मादुच्यते गतिरिति । ब्रह्मैव गतिः, तद्धि गम्यते पापविमुक्तैः’ इति । साक्षादीक्षत इति <span class="gr-moola">साक्षी</span> । तथाहि बाष्कलशाखायाम्- ‘स साक्षादिदमद्राक्षीद् यदद्राक्षीत् तत् साक्षिणः साक्षित्वम्’ इति ।शरणम् आश्रयः संसारभीतस्य । ‘परमं यः परायणम्’ इति ह्युक्तम् ।‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ इति च । संहारकाले प्रकृत्या जगदत्र निधीयत इति <span class="gr-moola">निधानम्</span> ।तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अपश्यमप्यये मायया विश्वकर्मण्यदो जगन्निहितं शुभ्रचक्षुः’ इति ॥१८ ॥ | ||
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| Line 6,058: | Line 6,107: | ||
| id = BGB_C09_V19_B01 | | id = BGB_C09_V19_B01 | ||
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सत् कार्यम् । असत् कारणम् । ‘सदभिव्यक्तरूपत्वात् कार्यमित्युच्यते बुधैः ।असदव्यक्तरूपत्वात् कारणं चापि शब्दितम्॥’ ॥ इति ह्यभिधानम् । | <span class="gr-moola">सत्</span> कार्यम् । <span class="gr-moola">असत्</span> कारणम् । ‘सदभिव्यक्तरूपत्वात् कार्यमित्युच्यते बुधैः ।असदव्यक्तरूपत्वात् कारणं चापि शब्दितम्॥’ ॥ इति ह्यभिधानम् । | ||
‘असच्च सच्चैव यद् विश्वं सदसतः परम्’(गी.प्रे.म.भा.१.१.२३) इति च भारते ॥१९ ॥ | ‘असच्च सच्चैव यद् विश्वं सदसतः परम्’(गी.प्रे.म.भा.१.१.२३) इति च भारते ॥१९ ॥ | ||
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| Line 6,089: | Line 6,138: | ||
| id = BGB_C09_V20_B01 | | id = BGB_C09_V20_B01 | ||
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तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- त्रैविद्या इत्यादिना ॥ २०-२१ ॥ | तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- <span class="gr-prateeka">त्रैविद्या इत्यादिना ॥</span> २०-२१ ॥ | ||
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अनन्याः अन्यदचिन्तयित्वा । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘सर्वं परित्यज्य मनोगतं यद् विना देवं केवलं शुद्धमाद्यम् ।ये चिन्तयन्तीह तमेव धीरा अनन्यास्ते देवमेवाविशन्ति ॥’ इति ।‘कामं कालेन महता एकान्तित्वात् समाहितैः ।शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभासन्दृश्यमण्डलः॥’ ॥ इति मोक्षधर्मे ।नित्यमभितः= सर्वतो युक्तानाम् ॥२२ ॥ | <span class="gr-moola">अनन्याः</span> अन्यदचिन्तयित्वा । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘सर्वं परित्यज्य मनोगतं यद् विना देवं केवलं शुद्धमाद्यम् ।ये चिन्तयन्तीह तमेव धीरा अनन्यास्ते देवमेवाविशन्ति ॥’ इति ।‘कामं कालेन महता एकान्तित्वात् समाहितैः ।शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभासन्दृश्यमण्डलः॥’ ॥ इति मोक्षधर्मे ।नित्यमभितः= सर्वतो युक्तानाम् ॥२२ ॥ | ||
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| Line 6,123: | Line 6,172: | ||
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तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - येऽपीति ॥ २३ ॥ | तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - <span class="gr-prateeka">येऽपीति ॥</span> २३ ॥ | ||
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| Line 6,140: | Line 6,189: | ||
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कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - अहं हीति ॥ २४ ॥ | कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - <span class="gr-prateeka">अहं हीति ॥</span> २४ ॥ | ||
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फलं विविच्याह - यान्तीति ॥ २५ ॥ | फलं विविच्याह - <span class="gr-prateeka">यान्तीति ॥</span> २५ ॥ | ||
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दुर्बलैस्त्वं पूजयितुमशक्यः ? महत्त्वाद्, इत्याशङ्क्याह - पत्रमिति ॥ न त्वविहितपत्रादि । तस्यापराधत्वोक्तेर्वाराहादौ । भक्त्यैवाहं (तुष्ट) तृप्य इति भावः । | दुर्बलैस्त्वं पूजयितुमशक्यः ? महत्त्वाद्, इत्याशङ्क्याह - <span class="gr-prateeka">पत्रमिति ॥</span> न त्वविहितपत्रादि । तस्यापराधत्वोक्तेर्वाराहादौ । भक्त्यैवाहं (तुष्ट) तृप्य इति भावः । | ||
‘भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च’(म.भा.१११) इति च भारते | ‘भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च’(म.भा.१११) इति च भारते | ||
‘एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः ।एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत् सर्वत्रात्मदर्शनम्॥’(एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥भाग.६.३.२२ ) (इति भागवते) ॥२६ ॥ | ‘एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः ।एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत् सर्वत्रात्मदर्शनम्॥’(एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥भाग.६.३.२२ ) (इति भागवते) ॥२६ ॥ | ||
| Line 6,219: | Line 6,268: | ||
| id = BGB_C09_V28_B01 | | id = BGB_C09_V28_B01 | ||
| text = | | text = | ||
तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - समोऽहमिति ॥ तर्हि न भक्तिप्रयोजनम् ? इत्यत आह - ये भजन्तीति ॥ मयि ते तेषु चाप्यहम् इति । मम ते वशाः, तेषामहं वश इति । उक्तं च पैङ्गिखिलेषु- ‘ये वै भजन्ते परमं पुमांसं तेषां वशः स तु ते तद्वशाश्च ।’ इति । तद्वशा एव ते सर्वदा । तथाऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाबुद्धिपूर्वकत्वेन भेदः । उद्धवादिवत्, शिशुपालादिवच्च । तच्चोक्तं तत्रैव-‘अबुद्धिपूर्वाद् यो वशस्तस्य ध्यानात् पुनर्वशो भवते बुद्धिपूर्वम्’ इति ॥ २९ ॥ | तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">समोऽहमिति ॥</span> तर्हि न भक्तिप्रयोजनम् ? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">ये भजन्तीति ॥</span> <span class="gr-moola">मयि ते तेषु चाप्यहम्</span> इति । मम ते वशाः, तेषामहं वश इति । उक्तं च पैङ्गिखिलेषु- ‘ये वै भजन्ते परमं पुमांसं तेषां वशः स तु ते तद्वशाश्च ।’ इति । तद्वशा एव ते सर्वदा । तथाऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाबुद्धिपूर्वकत्वेन भेदः । उद्धवादिवत्, शिशुपालादिवच्च । तच्चोक्तं तत्रैव-‘अबुद्धिपूर्वाद् यो वशस्तस्य ध्यानात् पुनर्वशो भवते बुद्धिपूर्वम्’ इति ॥ २९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,287: | Line 6,336: | ||
| id = BGB_C09_V33_B01 | | id = BGB_C09_V33_B01 | ||
| text = | | text = | ||
कुतः ? क्षिप्रं भवति धर्मात्मा । देवदेवांशादिष्वेव च (ए)तद् भवति । उक्तं च (सामवेदे)शाण्डिल्यशाखायाम्- ‘नाविरतो दुश्चरितान्नाभक्तो नासमाहितः ।सम्यग् भक्तो भवेत् कश्चिद् वासुदेवेऽमलाशयः ।देवर्षयस्तदंशाश्च भवन्ति क्व च ज्ञानतः ॥’ इति ।अतोन्यः कश्चिद् भवति चेत्, डाम्भिकत्वेन सोऽनुमेयः । साधारणपापानां तु सत्सङ्गात् महत्यपि कथञ्चिद् भक्तिर्भवति । साधारणभक्तिर्वेतरेषाम् ।‘शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवैहि नास्य(भक्तम्)भक्तिः’। इति हि श्रीविष्णुपुराणे । | कुतः ? <span class="gr-moola">क्षिप्रं भवति धर्मात्मा</span> । देवदेवांशादिष्वेव च (ए)तद् भवति । उक्तं च (सामवेदे)शाण्डिल्यशाखायाम्- ‘नाविरतो दुश्चरितान्नाभक्तो नासमाहितः ।सम्यग् भक्तो भवेत् कश्चिद् वासुदेवेऽमलाशयः ।देवर्षयस्तदंशाश्च भवन्ति क्व च ज्ञानतः ॥’ इति ।अतोन्यः कश्चिद् भवति चेत्, डाम्भिकत्वेन सोऽनुमेयः । साधारणपापानां तु सत्सङ्गात् महत्यपि कथञ्चिद् भक्तिर्भवति । साधारणभक्तिर्वेतरेषाम् ।‘शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवैहि नास्य(भक्तम्)भक्तिः’। इति हि श्रीविष्णुपुराणे । | ||
‘सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसाम्’ इति च । ‘वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् ।पूजां गुरूणां सततं करोमि परस्य गुह्यं न च भिन्नपूर्वम् ।गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् ।तं चापि देवं शरणं प्रपन्नः एकान्तभावेन भजाम्यजस्रम् ।एतैरुपायैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमेनम् ॥’ इति मोक्षधर्मे। आचारस्य ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च । ज्ञानाभावे च सम्यग्भक्त्यभावात् । तथाहि गौतमखिलेषु-‘विना ज्ञानं कुतो भक्तिः कुतो भक्तिं विना च तत्।’ इति ।‘भक्तिः परे स्वेऽनुभवो विरक्तिरन्यत्र चैतत् त्रिक एककालम्’(भाग.११.२.४२) इति च भागवते ॥ ३१-३४ ॥ | ‘सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसाम्’ इति च । ‘वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् ।पूजां गुरूणां सततं करोमि परस्य गुह्यं न च भिन्नपूर्वम् ।गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् ।तं चापि देवं शरणं प्रपन्नः एकान्तभावेन भजाम्यजस्रम् ।एतैरुपायैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमेनम् ॥’ इति मोक्षधर्मे। आचारस्य ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च । ज्ञानाभावे च सम्यग्भक्त्यभावात् । तथाहि गौतमखिलेषु-‘विना ज्ञानं कुतो भक्तिः कुतो भक्तिं विना च तत्।’ इति ।‘भक्तिः परे स्वेऽनुभवो विरक्तिरन्यत्र चैतत् त्रिक एककालम्’(भाग.११.२.४२) इति च भागवते ॥ ३१-३४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,318: | Line 6,367: | ||
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प्रीयमाणाय श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते ॥ १ ॥ | <span class="gr-moola">प्रीयमाणाय</span> श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते ॥ १ ॥ | ||
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| Line 6,335: | Line 6,384: | ||
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प्रभवं प्रभावम् । मदीयां जगदुत्पत्तिं वा । तद्वशत्वात् तस्येत्युच्यते । यद्यस्ति तर्हि देवादयोऽपि जानन्ति सर्वज्ञत्वात्, अतो नास्तीति भावः । ‘अहमादिर्हि’ इति तु उत्पत्तिरपि यस्य वशा, कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम् । ‘अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः’(७.३) इति चोक्तम् । उक्तं चैतत् सर्वमन्यत्रापि- ‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः ।अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६) इति । | <span class="gr-moola">प्रभवं</span> प्रभावम् । <span class="gr-moola">मदीयां</span> जगदुत्पत्तिं वा । तद्वशत्वात् तस्येत्युच्यते । यद्यस्ति तर्हि देवादयोऽपि जानन्ति सर्वज्ञत्वात्, अतो नास्तीति भावः । ‘अहमादिर्हि’ इति तु उत्पत्तिरपि यस्य वशा, कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम् । ‘अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः’(७.३) इति चोक्तम् । उक्तं चैतत् सर्वमन्यत्रापि- ‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः ।अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६) इति । | ||
‘न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः।’ इति ऋग्वेदखिलेषु । अन्यस्तु अर्थो ‘यो मामजम्’(१०.०३) इति वाक्यादेव ज्ञायते ॥२ ॥ | ‘न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः।’ इति ऋग्वेदखिलेषु । अन्यस्तु अर्थो ‘यो मामजम्’(१०.०३) इति वाक्यादेव ज्ञायते ॥२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,353: | Line 6,402: | ||
| id = BGB_C10_V03_B01 | | id = BGB_C10_V03_B01 | ||
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अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति अनादिः । अजत्वेन सिद्धेः इतरस्य । | अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति <span class="gr-moola">अनादिः</span> । अजत्वेन सिद्धेः इतरस्य । | ||
॥३ ॥ | ॥३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,380: | Line 6,429: | ||
| id = BGB_C10_V05_B01 | | id = BGB_C10_V05_B01 | ||
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तत् प्रथयति- बुद्धिरित्यादिना॥ कार्याकार्यविनिश्चयो बुद्धिः । ज्ञानं प्रतीतिः । ‘ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः(विनिर्णयः)।’ इत्यभिधानम् | तत् प्रथयति- <span class="gr-prateeka">बुद्धिरित्यादिना॥</span> कार्याकार्यविनिश्चयो <span class="gr-moola">बुद्धिः</span> । <span class="gr-moola">ज्ञानं</span> प्रतीतिः । ‘ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः(विनिर्णयः)।’ इत्यभिधानम् ।<span class="gr-moola">दमः</span> इन्द्रियनिग्रहः । <span class="gr-moola">शमः</span> परमात्मनि निष्ठा- ‘शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियनिग्रहः ।’(भाग.११.१९.३५)इति हि भागवते । <span class="gr-moola">तुष्टिः</span> अलम्बुद्धिः- ‘अलम्बुद्धिस्तथा तुष्टिः’ इत्यभिधानात् ॥ ४-५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,397: | Line 6,446: | ||
| id = BGB_C10_V06_B01 | | id = BGB_C10_V06_B01 | ||
| text = | | text = | ||
पूर्वे सप्तर्षयः - ‘मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।वसिष्ठश्च महातेजाः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४३.३०) इति मोक्षधर्मोक्ताः ।ते हि (सर्वे)सर्वपुराणेषूच्यन्ते । चत्वारः प्रथमाः स्वायम्भुवाद्याः । तेषां हि इमाः प्रजाः । न हि भविष्यताम् ‘इमाः प्रजाः’ इति युक्तम् । विभागः प्राधान्यं च प्राथमिकत्वादेव भवति ।तच्चोक्तं गौतमखिलेषु- ‘स्वायम्भुवं स्वारोचिषं रैवतं च तथोत्तमम् । वेद यः स प्रजावान्’ इति ।पूर्वेभ्यो ह्युत्तरा जायन्त इत्येषां (तेषां) प्राधान्यम् । अजातेषु (च) ज्यैष्ठ्यम् । | <span class="gr-moola">पूर्वे सप्तर्षयः</span> - ‘मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।वसिष्ठश्च महातेजाः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४३.३०) इति मोक्षधर्मोक्ताः ।ते हि (सर्वे)सर्वपुराणेषूच्यन्ते । <span class="gr-moola">चत्वारः</span> प्रथमाः स्वायम्भुवाद्याः । तेषां हि इमाः प्रजाः । न हि भविष्यताम् ‘इमाः प्रजाः’ इति युक्तम् । विभागः प्राधान्यं च प्राथमिकत्वादेव भवति ।तच्चोक्तं गौतमखिलेषु- ‘स्वायम्भुवं स्वारोचिषं रैवतं च तथोत्तमम् । वेद यः स प्रजावान्’ इति ।पूर्वेभ्यो ह्युत्तरा जायन्त इत्येषां (तेषां) प्राधान्यम् । अजातेषु (च) ज्यैष्ठ्यम् । | ||
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| Line 6,404: | Line 6,453: | ||
| id = BGB_C10_V06_B02 | | id = BGB_C10_V06_B02 | ||
| text = | | text = | ||
तापसस्य भगवदवतारत्वाद् अनुक्तिः । तच्च भागवते प्रसिद्धम् । मानसत्वं च सर्वेषां मनूनामुक्तं भागवते-‘ततो मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्।(भाग.३.२१.४९)’ इति ।अन्यपुत्रत्वं तु अपरित्यज्यापि शरीरं तद् भवति । प्रमाणं चोभयविधवाक्यान्यथाऽनुपपत्तिरेव । ‘पूर्वे’ इति विशेणाच्च एतत्सिद्धिः । मत्तो भावो येषां ते मद्भावाः । ये ते ‘ब्रह्मणो मनसा जाताः’ ते मत्त एव जाताः इति भावः ॥६ ॥ | तापसस्य भगवदवतारत्वाद् अनुक्तिः । तच्च भागवते प्रसिद्धम् । मानसत्वं च सर्वेषां मनूनामुक्तं भागवते-‘ततो मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्।(भाग.३.२१.४९)’ इति ।अन्यपुत्रत्वं तु अपरित्यज्यापि शरीरं तद् भवति । प्रमाणं चोभयविधवाक्यान्यथाऽनुपपत्तिरेव । ‘पूर्वे’ इति विशेणाच्च एतत्सिद्धिः । मत्तो भावो येषां ते <span class="gr-moola">मद्भावाः</span> । ये ते ‘ब्रह्मणो मनसा जाताः’ ते मत्त एव जाताः इति भावः ॥६ ॥ | ||
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| Line 6,457: | Line 6,506: | ||
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सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- अहमित्यादिना ॥ ८-११ ॥ | सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- <span class="gr-prateeka">अहमित्यादिना ॥</span> ८-११ ॥ | ||
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| Line 6,503: | Line 6,552: | ||
| id = BGB_C10_V15_B01 | | id = BGB_C10_V15_B01 | ||
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ब्रह्म परिपूर्णम्-‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म । बृहति(बृंहति) बृंहयति च’ इति च श्रुतिः । ‘बृह (बृंह) बृहि = वृद्धौ’ इति च पठन्ति ।‘परमं यो महद् ब्रह्म’(कुम्भ-म.भा.१३.२५४.९) इति च । विविधमासीदिति विभुः । तथाहि वारुणशाखायाम्- ‘विभु प्रभु प्रथमं मेहनावत इति । स ह्येव प्राभवद् विविधोऽभवत्’ इति ।‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’(तै.उ.२.६.) इत्यादेश्च ॥ १२-१५ ॥ | <span class="gr-moola">ब्रह्म</span> परिपूर्णम्-‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म । बृहति(बृंहति) बृंहयति च’ इति च श्रुतिः । ‘बृह (बृंह) बृहि = वृद्धौ’ इति च पठन्ति ।‘परमं यो महद् ब्रह्म’(कुम्भ-म.भा.१३.२५४.९) इति च । विविधमासीदिति <span class="gr-moola">विभुः</span> । तथाहि वारुणशाखायाम्- ‘विभु प्रभु प्रथमं मेहनावत इति । स ह्येव प्राभवद् विविधोऽभवत्’ इति ।‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’(तै.उ.२.६.) इत्यादेश्च ॥ १२-१५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 6,520: | Line 6,569: | ||
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विभूतयः विविधभूतयः ॥ १६ ॥ | <span class="gr-moola">विभूतयः</span> विविधभूतयः ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 6,546: | Line 6,595: | ||
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न जायते, अर्दयति च संसारम् इति जनार्दनः । तथा च बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘स भूतः स जनार्दन इति स ह्यासीत् स नासीत् सोऽर्दयति’ इति ॥१८ ॥ | न जायते, अर्दयति च संसारम् इति <span class="gr-moola">जनार्दनः</span> । तथा च बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘स भूतः स जनार्दन इति स ह्यासीत् स नासीत् सोऽर्दयति’ इति ॥१८ ॥ | ||
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| Line 6,583: | Line 6,632: | ||
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विष्णुः सर्वव्यापित्व-प्रवेशित्वादेः ।‘विष्लृ= व्याप्तौ’, ‘विश= प्रवेशने’ इति हि पठन्ति । ‘गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत ।व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम ।अधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चास्मि(पि) भारत ।क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसञ्ज्ञितः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४२-४३) इति मोक्षधर्मे ॥२१ ॥ | <span class="gr-moola">विष्णुः</span> सर्वव्यापित्व-प्रवेशित्वादेः ।‘विष्लृ= व्याप्तौ’, ‘विश= प्रवेशने’ इति हि पठन्ति । ‘गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत ।व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम ।अधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चास्मि(पि) भारत ।क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसञ्ज्ञितः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४२-४३) इति मोक्षधर्मे ॥२१ ॥ | ||
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सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति कपिलः । ‘प्रीतिः सुखं कम् आनन्दः’ इत्याद्यभिधानात् । ‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छा.४.१०.५) इति च ।‘ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ।सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’ इति च (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम् ॥२६ ॥ | सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति <span class="gr-moola">कपिलः</span> । ‘प्रीतिः सुखं कम् आनन्दः’ इत्याद्यभिधानात् । ‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छा.४.१०.५) इति च ।‘ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ।सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’ इति च (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम् ॥२६ ॥ | ||
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आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च रामः । ‘आनन्दरूपो निष्परीमाण एष लोकश्चैतस्माद् रमते तेन रामः ।’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् । रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः ॥३१ ॥ | आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च <span class="gr-moola">रामः</span> । ‘आनन्दरूपो निष्परीमाण एष लोकश्चैतस्माद् रमते तेन रामः ।’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् । रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः ॥३१ ॥ | ||
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आच्छादयति सर्वम्, वासयति, वसति च सर्वत्र इति वासुः । देवशब्दार्थ उक्तः पुरस्तात् (गी.भा.७.१४)।‘छादयामि जगत् सर्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः ।सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४१) इति मोक्षधर्मे ।विशिष्टः सर्वस्मात्, आ= समन्तात् स एव इति व्यासः । तथा च- (अग्निवेश्य)अग्नेयीशाखायाम्- ‘स व्यासो वीति तमप् वै विः, सोऽधस्तात् स उत्तरतः स पश्चात् स पूर्वस्मात् स दक्षिणतः स उत्तरत इति।’ इति ।‘यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेपि वा ।अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥’ इति च ॥३७ ॥ | आच्छादयति सर्वम्, वासयति, वसति च सर्वत्र इति <span class="gr-moola">वासुः</span> । देवशब्दार्थ उक्तः पुरस्तात् (गी.भा.७.१४)।‘छादयामि जगत् सर्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः ।सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४१) इति मोक्षधर्मे ।विशिष्टः सर्वस्मात्, आ= समन्तात् स एव इति <span class="gr-moola">व्यासः</span> । तथा च- (अग्निवेश्य)अग्नेयीशाखायाम्- ‘स व्यासो वीति तमप् वै विः, सोऽधस्तात् स उत्तरतः स पश्चात् स पूर्वस्मात् स दक्षिणतः स उत्तरत इति।’ इति ।‘यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेपि वा ।अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥’ इति च ॥३७ ॥ | ||
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प्रभुः समर्थः । ‘नास्ति तस्मात् परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात्।’(कुम्भ.म.भा.१२.३४७.३१) इति हि मोक्षधर्मे । ‘प्रभुरीशः समर्थश्च’ इत्यादि चाभिधानम् ॥ १-४ ॥ | <span class="gr-moola">प्रभुः</span> समर्थः । ‘नास्ति तस्मात् परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात्।’(कुम्भ.म.भा.१२.३४७.३१) इति हि मोक्षधर्मे । ‘प्रभुरीशः समर्थश्च’ इत्यादि चाभिधानम् ॥ १-४ ॥ | ||
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हरिः सर्वयज्ञभागहारित्वात्-‘इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम् ।वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः’॥इति हि मोक्षधर्मे ।॥९ ॥ | <span class="gr-moola">हरिः</span> सर्वयज्ञभागहारित्वात्-‘इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम् ।वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः’॥इति हि मोक्षधर्मे ।॥९ ॥ | ||
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सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥ | <span class="gr-moola">सर्वाश्चर्यमयं</span> सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥ | ||
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न चैतदयुक्तम् । अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य । ‘अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्’ ।इति श्रीविष्णुपुराणे । | न चैतदयुक्तम् । अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य । ‘अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्’ ।इति श्रीविष्णुपुराणे । | ||
‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’(कठ.१.२.९)इति च श्रुतिः ।अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशाद् वाक्यबलाच्चापनेयः । न हि घटवत् कश्चिदपि पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन् निराक्रियते । केषुचित् पदार्थेषु वाक्यव्यवस्थाऽचिन्त्यशक्तित्वाभावाद् अङ्गीक्रियते ।‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥ एवं परे, अन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद् व्यवस्था ॥’ इति जाबालखिलश्रुतेश्च । उपचारत्वपरिहाराय ‘न मध्यम्’ इति । अन्यथा आद्यन्ताभावेनैव तत्सिद्धेः । विश्वरूपः पूर्णरूपः- ‘स विश्वरूपोऽनूनरूपोऽतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् ॥ १६ ॥ | ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’(कठ.१.२.९)इति च श्रुतिः ।अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशाद् वाक्यबलाच्चापनेयः । न हि घटवत् कश्चिदपि पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन् निराक्रियते । केषुचित् पदार्थेषु वाक्यव्यवस्थाऽचिन्त्यशक्तित्वाभावाद् अङ्गीक्रियते ।‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥ एवं परे, अन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद् व्यवस्था ॥’ इति जाबालखिलश्रुतेश्च । उपचारत्वपरिहाराय ‘न मध्यम्’ इति । अन्यथा आद्यन्ताभावेनैव तत्सिद्धेः । <span class="gr-moola">विश्वरूपः</span> पूर्णरूपः- ‘स विश्वरूपोऽनूनरूपोऽतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् ॥ १६ ॥ | ||
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‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - अप्रमेयमिति ॥ १७ ॥ | ‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - <span class="gr-prateeka">अप्रमेयमिति ॥</span> १७ ॥ | ||
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यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च ‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६) इत्यादौ सिद्धम् । ‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३) इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः । ‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः ।बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् ।बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् ।अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन ।हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति ॥ ३६ ॥ | यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् <span class="gr-moola">स्थाने</span> युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च ‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६) इत्यादौ सिद्धम् । ‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३) इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः । ‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः ।बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् ।बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् ।अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन ।हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति ॥ ३६ ॥ | ||
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कथं ‘स्थाने’ इति ? तदाह - कस्मादित्यादिना ॥ पूर्णश्चासौ आत्मा च इति महात्मा । आत्मशब्दश्चोक्तो भारते-‘यच्चाऽप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति भण्यते ॥’ इति | कथं ‘स्थाने’ इति ? तदाह - <span class="gr-prateeka">कस्मादित्यादिना ॥</span> पूर्णश्चासौ आत्मा च इति महात्मा । आत्मशब्दश्चोक्तो भारते-‘यच्चाऽप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति भण्यते ॥’ इति ।<span class="gr-moola">तत्परं</span> सदसतः परम् ।‘असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्’(म.भा.१.१.२३) इति च भागवते ।॥३७ ॥ | ||
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महच्च माहात्म्यं तस्याः वेदेषूच्यते ।‘चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते ।तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुः यत्र देवा दधिरे भागधेयम् ’(ऋ.मं.१०.सू.११४.मं.३) इति ।‘चतुःशिखण्डा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते ।(तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्)’(काठकसंहिता.३१.१४,तै.ब्रा.१.२.१.२७) इति च ।‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः’इत्यारभ्य ‘अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ।मया सो अन्नमत्ति यो वि पश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् ।अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ।अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वाउ।अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वान्तः समुद्रे ।परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव’(ऋ.मं.१०.सू.१२४.मं.१-८) इत्यादि च ।‘त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्मागतश्रीरुत(ब्रह्मा गतश्रीः) त्वया’(म.ना.१३.२) इति च ।इति शङ्का कस्यचिद् भवति । अतो जानन्नपि सूक्ष्मयुक्तिज्ञानार्थं पृच्छति- एवमिति ॥ एवं शब्देन दृष्टश्रुतरूपं ‘मत्कर्मकृत्’(११.५५) इत्यादिप्रकारश्च परामृश्यते । | महच्च माहात्म्यं तस्याः वेदेषूच्यते ।‘चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते ।तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुः यत्र देवा दधिरे भागधेयम् ’(ऋ.मं.१०.सू.११४.मं.३) इति ।‘चतुःशिखण्डा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते ।(तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्)’(काठकसंहिता.३१.१४,तै.ब्रा.१.२.१.२७) इति च ।‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः’इत्यारभ्य ‘अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ।मया सो अन्नमत्ति यो वि पश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् ।अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ।अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वाउ।अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वान्तः समुद्रे ।परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव’(ऋ.मं.१०.सू.१२४.मं.१-८) इत्यादि च ।‘त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्मागतश्रीरुत(ब्रह्मा गतश्रीः) त्वया’(म.ना.१३.२) इति च ।इति शङ्का कस्यचिद् भवति । अतो जानन्नपि सूक्ष्मयुक्तिज्ञानार्थं पृच्छति- <span class="gr-prateeka">एवमिति ॥</span> एवं शब्देन दृष्टश्रुतरूपं ‘मत्कर्मकृत्’(११.५५) इत्यादिप्रकारश्च परामृश्यते । | ||
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अव्यक्तं प्रकृतिः ‘महतः परमव्यक्तम्’(कठ.१.३.१२) इति प्रयोगात् । ‘यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥’(भाग.३.२७.११)इति च भागवते । अक्षरं च तत् । ‘अक्षरात् परतः परः’(आथ.२.१.२) इति श्रुतेः । | <span class="gr-moola">अव्यक्तं</span> प्रकृतिः ‘महतः परमव्यक्तम्’(कठ.१.३.१२) इति प्रयोगात् । ‘यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥’(भाग.३.२७.११)इति च भागवते । अक्षरं च तत् । ‘अक्षरात् परतः परः’(आथ.२.१.२) इति श्रुतेः । | ||
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भवन्तु त्वदुपासका एवोत्तमाः । इतरेषां तु किं फलम् ? इत्यत आह- ये त्वित्यादिना ॥ अनिर्देश्यत्वं चोक्तं भागवते मायायाः- ‘अप्रतर्क्याद् अनिर्देश्याद्(अनिर्वाच्यात्) इति केष्वपि निश्चयः’(भाग.१.१७.१९) इति । ईश्वरस्तु (दे)दैवशब्देनोक्तः ‘दैवमन्येपरे’(भाग.१.१७.१८) इत्यत्र । उक्तं च सामवेदे काषायणश्रुतौ ‘नासदासीन्नो सदासीत् तदानीम्’ (ऋ.मं.१०.सू.१२९. मं.१,शत.ब्रा.१०.५.३.२, तै.ब्रा.२.८९.३) इति ।‘न महाभूतं नोपभूतं तदासीत्’ इत्यारभ्य ‘तम आसीत् तमसा गूहमग्रे’ इति । ‘तमो ह्यव्यक्तमजरम- निर्देश्यमेषा ह्येव प्रकृतिः’ इति । सर्वगाचिन्त्यादिलक्षणा च सा ।तथाहि मोक्षधर्मे- ‘नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवतः(असम्भवात्)। असत्याद् अहिंस्रात् ललामाद् द्वितीयप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अक्षराद् अमूर्तितः सर्वस्याः सर्वकर्तुः शाश्वततमसः।’(नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अमराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवात्। सत्याद् अहिंस्यात् लवादिभिरद्वितीयाद् अप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अजराद् अमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतात् तमसः। कुम्भ-म.भा.१२.३५१.६) । इति ।‘आसीदिदं तमोऽभूतम् अप्रज्ञातमलक्षणम् ।अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥’(म.स्मृ.१.५) इति (च) मानवे ।‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(१५.१६) इति च वक्ष्यति । कूटे= आकाशे स्थिता कूटस्था । ‘(आकाशसंस्थिता) आकाशे संस्थिता त्वेषा ततः कूटस्थिता मता’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘सा सर्वगा निश्चला लोकयोनिः सा चाक्षरा विश्वगा (वी)विरजस्का’इति च सामवेदे (गौतम)गौपवनशाखायाम् ॥ ३-४ ॥ | भवन्तु त्वदुपासका एवोत्तमाः । इतरेषां तु किं फलम् ? इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">ये त्वित्यादिना ॥</span> अनिर्देश्यत्वं चोक्तं भागवते मायायाः- ‘अप्रतर्क्याद् अनिर्देश्याद्(अनिर्वाच्यात्) इति केष्वपि निश्चयः’(भाग.१.१७.१९) इति । ईश्वरस्तु (दे)दैवशब्देनोक्तः ‘दैवमन्येपरे’(भाग.१.१७.१८) इत्यत्र । उक्तं च सामवेदे काषायणश्रुतौ ‘नासदासीन्नो सदासीत् तदानीम्’ (ऋ.मं.१०.सू.१२९. मं.१,शत.ब्रा.१०.५.३.२, तै.ब्रा.२.८९.३) इति ।‘न महाभूतं नोपभूतं तदासीत्’ इत्यारभ्य ‘तम आसीत् तमसा गूहमग्रे’ इति । ‘तमो ह्यव्यक्तमजरम- निर्देश्यमेषा ह्येव प्रकृतिः’ इति । सर्वगाचिन्त्यादिलक्षणा च सा ।तथाहि मोक्षधर्मे- ‘नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवतः(असम्भवात्)। असत्याद् अहिंस्रात् ललामाद् द्वितीयप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अक्षराद् अमूर्तितः सर्वस्याः सर्वकर्तुः शाश्वततमसः।’(नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अमराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवात्। सत्याद् अहिंस्यात् लवादिभिरद्वितीयाद् अप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अजराद् अमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतात् तमसः। कुम्भ-म.भा.१२.३५१.६) । इति ।‘आसीदिदं तमोऽभूतम् अप्रज्ञातमलक्षणम् ।अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥’(म.स्मृ.१.५) इति (च) मानवे ।‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(१५.१६) इति च वक्ष्यति । कूटे= आकाशे स्थिता कूटस्था । ‘(आकाशसंस्थिता) आकाशे संस्थिता त्वेषा ततः कूटस्थिता मता’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘सा सर्वगा निश्चला लोकयोनिः सा चाक्षरा विश्वगा (वी)विरजस्का’इति च सामवेदे (गौतम)गौपवनशाखायाम् ॥ ३-४ ॥ | ||
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कथं तर्हि त्वदुपासकानामुत्तमत्वम् ? इत्यत आह - क्लेश इति ॥ अव्यक्ता गतिर्दुःखं ह्यवाप्यते । गतिः मार्गः । अव्यक्तोपासनद्वारको मत्प्राप्तिमार्गो दुःखमाप्यत इत्यर्थः । अतिशयोपासन-सर्वेन्द्रियातिनियमन-सर्वसमबुद्धि- सर्वभूतहितेरतत्व-अतिसुष्ठ्वाचार-सम्यग्विष्णुभक्त्यादिसाधनसन्दर्भम् ऋते नाव्यक्तापरोक्ष्यम् । तदृते च न विष्णुप्रसादः । सत्यपि तस्मिन् न सम्यग् भगवदुपासनम् ऋते । नर्ते च तं मोक्षः । विनाऽप्यव्यक्तोपासनं भवत्येव भगवदुपासकानां मोक्ष इति क्लेशिष्ठोऽयं मार्ग इति भावः । तथाऽप्यपरोक्षीकृताव्यक्तानां सुकरं भगवदुपासनम् इत्येव(तावत्) प्रयोजनम् । तत्रापि योऽव्यक्तापरोक्ष्ये प्रयाससः तावता प्रयासेन यदि भगवन्तमुपास्ते ऊनेन वा तदा भगवदपरोक्षमेव (भगदापरोक्ष्यमेव) भवतीति द्वितीयमधिकम् । इन्द्रियसंयमनाद्यूनभावेऽत्युपासकस्यापि देवी नातिप्रसादमेति । देवस्तु तानि साधनानि भक्तिमतः स्वयमेवाप्रयत्नेन ददातीति (चाति) सौकर्यमिति भक्तानां भगवदुपासने । इतरत्र च क्लेशोऽधिकतरः । तदेतत् सर्वं ‘पर्युपासते’(१२.३) ‘सन्नियम्य’(१२.४) ‘अधिकतरः’(१२.४) इति परि सन् तरप्शब्दैः प्रतीयते । | कथं तर्हि त्वदुपासकानामुत्तमत्वम् ? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">क्लेश इति ॥</span> अव्यक्ता गतिर्दुःखं ह्यवाप्यते । <span class="gr-moola">गतिः</span> मार्गः । अव्यक्तोपासनद्वारको मत्प्राप्तिमार्गो दुःखमाप्यत इत्यर्थः । अतिशयोपासन-सर्वेन्द्रियातिनियमन-सर्वसमबुद्धि- सर्वभूतहितेरतत्व-अतिसुष्ठ्वाचार-सम्यग्विष्णुभक्त्यादिसाधनसन्दर्भम् ऋते नाव्यक्तापरोक्ष्यम् । तदृते च न विष्णुप्रसादः । सत्यपि तस्मिन् न सम्यग् भगवदुपासनम् ऋते । नर्ते च तं मोक्षः । विनाऽप्यव्यक्तोपासनं भवत्येव भगवदुपासकानां मोक्ष इति क्लेशिष्ठोऽयं मार्ग इति भावः । तथाऽप्यपरोक्षीकृताव्यक्तानां सुकरं भगवदुपासनम् इत्येव(तावत्) प्रयोजनम् । तत्रापि योऽव्यक्तापरोक्ष्ये प्रयाससः तावता प्रयासेन यदि भगवन्तमुपास्ते ऊनेन वा तदा भगवदपरोक्षमेव (भगदापरोक्ष्यमेव) भवतीति द्वितीयमधिकम् । इन्द्रियसंयमनाद्यूनभावेऽत्युपासकस्यापि देवी नातिप्रसादमेति । देवस्तु तानि साधनानि भक्तिमतः स्वयमेवाप्रयत्नेन ददातीति (चाति) सौकर्यमिति भक्तानां भगवदुपासने । इतरत्र च क्लेशोऽधिकतरः । तदेतत् सर्वं ‘पर्युपासते’(१२.३) ‘सन्नियम्य’(१२.४) ‘अधिकतरः’(१२.४) इति परि सन् तरप्शब्दैः प्रतीयते । | ||
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मदुपासकानां भक्तानां न कश्चित् क्लेश इति दर्शयति- ये त्वित्यादिना ॥ उक्तं च सौकरायणश्रुतौ- ‘उपासते ये पुरुषं वासुदेवम् अव्यक्तादेरीप्सितं किं नु तेषाम् ।’ इति ।‘तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठाः ते(ये) चैवानन्यदेवताः ।अहमेव गतिस्तेषां निराशीःकर्मकारिणाम्’॥(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.३४) इति च मोक्षधर्मे ।॥ ६-११ ॥ | मदुपासकानां भक्तानां न कश्चित् क्लेश इति दर्शयति- <span class="gr-prateeka">ये त्वित्यादिना ॥</span> उक्तं च सौकरायणश्रुतौ- ‘उपासते ये पुरुषं वासुदेवम् अव्यक्तादेरीप्सितं किं नु तेषाम् ।’ इति ।‘तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठाः ते(ये) चैवानन्यदेवताः ।अहमेव गतिस्तेषां निराशीःकर्मकारिणाम्’॥(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.३४) इति च मोक्षधर्मे ।॥ ६-११ ॥ | ||
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अज्ञानपूर्वादभ्यासाद् ज्ञान(मात्र)मेव विशिष्यते । ज्ञानमात्रात् सज्ञानं ध्यानम् । तथा च सामवेदेऽनभिम्लान(त)शाखायाम्- ‘अधिकं केवलाभ्यासाद् ज्ञानं तत्सहितं ततः ।ध्यानं ततश्चापरोक्ष्यं(क्षं) ततः शान्तिर्भविष्यति ॥’ इति | अज्ञानपूर्वादभ्यासाद् ज्ञान(मात्र)मेव विशिष्यते । ज्ञानमात्रात् सज्ञानं ध्यानम् । तथा च सामवेदेऽनभिम्लान(त)शाखायाम्- ‘अधिकं केवलाभ्यासाद् ज्ञानं तत्सहितं ततः ।ध्यानं ततश्चापरोक्ष्यं(क्षं) ततः शान्तिर्भविष्यति ॥’ इति ।<span class="gr-moola">ध्यानात् कर्मफलत्यागः</span> इति तु स्तुतिः । अन्यथा कथम् ‘असमर्थोऽसि’(१२.१०) इत्युच्यते । ‘तयोस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते’(५.२) इति चोक्तम् । ‘सर्वाधिकं (ज्ञानं)ध्यानमुदाहरन्ति ध्यानाधिके ज्ञानभक्ती परात्मन् । कर्माफलाकाङ्क्षमथो विरागः त्यागश्च न ध्यानकलाफलार्हः ॥’ इति च काषायणशाखायाम् ।वाक्यसाम्येऽप्यसमर्थविषयत्वोक्तेः तात्पर्याभाव इतरत्र प्रतीयते । ध्यानादिप्राप्तिकारणत्वाच्च(कारणेन) त्यागस्तुतिर्युक्ता । (केवलाद्) केवलध्यानात् फलत्यागयुक्तं ध्यानमधिकम् । ध्यानयुक्तत्याग एव चात्रोक्तः । अन्यथा कथम्- ‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ इत्युच्येत ? कथं च ध्यानादाधिक्यम् ? तथा च गौपवनशाखायाम्- ‘ध्यानात्तु केवलात् त्यागयुक्तं तदधिकं भवेत्॥’ इति । न हि त्यागमात्रानन्तरमेव मुक्तिर्भवति । भवति च ध्यानयुक्तात् । केवलत्यागस्तुतिरेवमपि भवति । यथा ‘अनेन युक्तो जेता, नान्यथा’ इत्युक्ते ॥१२ ॥ | ||
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पिण्डीकृत्योपसंहरति- ये तु धर्म्यामृतमिति ॥ धर्मः= विष्णुः, तद्विषयं च धर्म्यम् । ‘धर्म्यम् अमृतम्= मृत्यादिसंसारनाशकं च’ इति धर्म्यामृतम् । श्रत्= आस्तिक्यम् । ‘श्रन्नामास्तिक्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । तद् दधानाः श्रद्दधानाः ॥२० ॥ | पिण्डीकृत्योपसंहरति- <span class="gr-prateeka">ये तु धर्म्यामृतमिति ॥</span> धर्मः= विष्णुः, तद्विषयं च धर्म्यम् । ‘धर्म्यम् अमृतम्= मृत्यादिसंसारनाशकं च’ इति <span class="gr-moola">धर्म्यामृतम्</span> । श्रत्= आस्तिक्यम् । ‘श्रन्नामास्तिक्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । तद् दधानाः <span class="gr-moola">श्रद्दधानाः</span> ॥२० ॥ | ||
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‘यद्विकारि’ येन विकारेण युक्तम् । यतश्च यत् यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । यतश्च यत् इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । स च य इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥ | <span class="gr-moola">‘यद्विकारि’</span> येन विकारेण युक्तम् । <span class="gr-moola">यतश्च यत्</span> यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । <span class="gr-moola">यतश्च यत्</span> इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । <span class="gr-moola">स च य</span> इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥ | ||
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‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- अमानित्वमित्यादिना ॥ आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः ।‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् । आर्जवं मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥ | ‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- <span class="gr-prateeka">अमानित्वमित्यादिना ॥</span> आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः ।‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् । <span class="gr-moola">आर्जवं</span> मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥ | ||
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तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥ | <span class="gr-moola">तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्</span> अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥ | ||
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‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् अनादिमत् । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् । | ‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् <span class="gr-moola">अनादिमत्</span> । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् । | ||
॥ १३ ॥ | ॥ १३ ॥ | ||
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सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति सर्वेन्द्रियगुणाभासम् । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् । | सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति <span class="gr-moola">सर्वेन्द्रियगुणाभासम्</span> । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् । | ||
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‘यतश्च यत्’ इति वक्तुं प्रकृति-विकार-पुरुषान् सङ्क्षिप्याह- प्रकृतिमिति ॥ गुणाः सत्त्वादयः । तेषामत्यल्पो(ऽपि) विशेषो लयात् सर्गे इति विकाराः पृथगुक्ताः ।‘कार्याकार्यगुणास्तिस्रः यतः स्वल्पोद्भवो जनौ’ ।इति (हि) माधुच्छन्दसशाखायाम् ॥२० ॥ | ‘यतश्च यत्’ इति वक्तुं प्रकृति-विकार-पुरुषान् सङ्क्षिप्याह- <span class="gr-prateeka">प्रकृतिमिति ॥</span> <span class="gr-moola">गुणाः</span> सत्त्वादयः । तेषामत्यल्पो(ऽपि) विशेषो लयात् सर्गे इति विकाराः पृथगुक्ताः ।‘कार्याकार्यगुणास्तिस्रः यतः स्वल्पोद्भवो जनौ’ ।इति (हि) माधुच्छन्दसशाखायाम् ॥२० ॥ | ||
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कार्यं शरीरम् । ‘शरीरं कार्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । करणानि इन्द्रियाणि । भोगः अनुभवः । स हि चिद्रूपत्वाद् अनुभवति । प्रकृतिश्च जडत्वात् परिणामिनी । ‘कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥’(भाग.३.२७.९)इति (हि) भागवते ॥२१ ॥ | <span class="gr-moola">कार्यं</span> शरीरम् । ‘शरीरं कार्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । <span class="gr-moola">करणानि</span> इन्द्रियाणि । <span class="gr-moola">भोगः</span> अनुभवः । स हि चिद्रूपत्वाद् अनुभवति । प्रकृतिश्च जडत्वात् परिणामिनी । ‘कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥’(भाग.३.२७.९)इति (हि) भागवते ॥२१ ॥ | ||
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‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - उपद्रष्टेति ॥ अनुमन्ता अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥ | ‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - <span class="gr-prateeka">उपद्रष्टेति ॥</span> <span class="gr-moola">अनुमन्ता</span> अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥ | ||
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‘पुरुषः सुखदुःखानाम्’(१३.२१) इति जीव उक्तः । ‘पुरुषं प्रकृतिं च’ इति जीवेश्वरौ सहैवोच्येते । अन्यत्र महातात्पर्यविरोधः । उत्कर्षे हि महातात्पर्यम् । । तथाहि सौकरायणश्रुतिः- ‘अवाच्योत्कर्षे महत्त्वात् सर्ववाचां सर्वन्यायानां च महत्तत्परत्वम् । विष्णोरनन्तस्य परात्परस्य तच्चापि ह्यस्त्येव न चात्र शङ्का ।अतो विरुद्धं तु यदत्र मानं तदक्षजादावथवाऽपि युक्तिः ।न तत् प्रमाणं कवयो वदन्ति न चापि युक्तिर्ह्यूनमतिर्हि दृष्टेः ॥’ इति ।अतो युक्तिभिरप्येतदपलापो न युक्तः । अतो यया युक्त्याऽविद्यमानत्वादि कल्पयति साऽप्याभासरूपेति सदेव माहात्म्यं वेदैरुच्यत इति सिध्यति । | ‘पुरुषः सुखदुःखानाम्’(१३.२१) इति जीव उक्तः । <span class="gr-moola">‘पुरुषं प्रकृतिं च’</span> इति जीवेश्वरौ सहैवोच्येते । अन्यत्र महातात्पर्यविरोधः । उत्कर्षे हि महातात्पर्यम् । । तथाहि सौकरायणश्रुतिः- ‘अवाच्योत्कर्षे महत्त्वात् सर्ववाचां सर्वन्यायानां च महत्तत्परत्वम् । विष्णोरनन्तस्य परात्परस्य तच्चापि ह्यस्त्येव न चात्र शङ्का ।अतो विरुद्धं तु यदत्र मानं तदक्षजादावथवाऽपि युक्तिः ।न तत् प्रमाणं कवयो वदन्ति न चापि युक्तिर्ह्यूनमतिर्हि दृष्टेः ॥’ इति ।अतो युक्तिभिरप्येतदपलापो न युक्तः । अतो यया युक्त्याऽविद्यमानत्वादि कल्पयति साऽप्याभासरूपेति सदेव माहात्म्यं वेदैरुच्यत इति सिध्यति । | ||
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साङ्ख्येन वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- ‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति ।श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति ।अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’ इति ।‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥ | <span class="gr-moola">साङ्ख्येन</span> वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- ‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति ।श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति ।अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’ इति ।‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥ | ||
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| Line 8,228: | Line 8,277: | ||
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पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- यावदित्यादिना ॥ २७-२९ ॥ | पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- <span class="gr-prateeka">यावदित्यादिना ॥</span> २७-२९ ॥ | ||
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| Line 8,262: | Line 8,311: | ||
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एकस्थम् एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । तत एव च विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥ | <span class="gr-moola">एकस्थम्</span> एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । <span class="gr-moola">तत एव च</span> विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥ | ||
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न च व्ययादिस्तस्येत्याह - अनादित्वादिति ॥ सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो ‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१) इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥ | न च व्ययादिस्तस्येत्याह - <span class="gr-prateeka">अनादित्वादिति ॥</span> सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो ‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१) इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥ | ||
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महद् ब्रह्म प्रकृतिः । सा च ‘श्रीः-भूः-दुर्गा’ इति भिन्ना । उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः । तथा च काषायणश्रुतिः-‘श्रीर्भूमिर्दुर्गा महती तु माया सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिक च ।उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’ इति ।‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ- ‘विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना ।तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’ इति । | <span class="gr-moola">महद् ब्रह्म</span> प्रकृतिः । सा च ‘श्रीः-भूः-दुर्गा’ इति भिन्ना । उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः । तथा च काषायणश्रुतिः-‘श्रीर्भूमिर्दुर्गा महती तु माया सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिक च ।उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’ इति ।‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ- ‘विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना ।तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’ इति । | ||
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बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - सत्त्वमित्यादिना ॥ ४,५, ६ ॥ | बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - <span class="gr-prateeka">सत्त्वमित्यादिना ॥</span> ४,५, ६ ॥ | ||
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अज्ञानं जायते यतः तद् अज्ञानजम् । ‘प्रमादमोहौ तमसः’(१४.१७) इति वाक्यशेषात् ॥८ ॥ | अज्ञानं जायते यतः तद् <span class="gr-moola">अज्ञानजम्</span> । ‘प्रमादमोहौ तमसः’(१४.१७) इति वाक्यशेषात् ॥८ ॥ | ||
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| Line 8,528: | Line 8,577: | ||
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रजसस्तु फलं दुःखमिति ॥ अल्पसुखं दुःखम् । तथाहि शार्कराक्षशाखायाम्- ‘रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखम्, तस्मात् तान् सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते ।’ इति । अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात् तमोऽधिकत्वं रजसो न स्यात् ॥ ९-१६ ॥ | <span class="gr-prateeka">रजसस्तु फलं दुःखमिति ॥</span> अल्पसुखं <span class="gr-moola">दुःखम्</span> । तथाहि शार्कराक्षशाखायाम्- ‘रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखम्, तस्मात् तान् सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते ।’ इति । अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात् तमोऽधिकत्वं रजसो न स्यात् ॥ ९-१६ ॥ | ||
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| Line 8,563: | Line 8,612: | ||
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परिणामिकर्तारं गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति । अन्यथा ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।’ इति श्रुतिविरोधः । | परिणामिकर्तारं <span class="gr-moola">गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति</span> । अन्यथा ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।’ इति श्रुतिविरोधः । | ||
‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८४) इति मोक्षधर्मे ।॥ १९-२१ ॥ | ‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८४) इति मोक्षधर्मे ।॥ १९-२१ ॥ | ||
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| Line 8,603: | Line 8,652: | ||
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प्रायो<span class="gr-moola">न द्वेष्टि न काङ्क्षति</span> । तथाहि सामवेदे भाल्लवेयशाखायाम्- ‘रजस्तमःसत्त्वगुणान् प्रवृत्तान् प्रायो न च द्वेष्टि न चापि काङ्क्षते ।तथाऽपि सूक्ष्मं सत्त्वगुणं च काङ्क्षेद् यदि प्रविष्टं सुतमश्च जह्यात् ॥’ इति। ‘न हि देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम ।हीनास्सत्त्वेन सूक्ष्मेण ततो वैकारिकाः स्मृताः ।कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७८-७९) इति हि मोक्षधर्मे ।‘सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षार्थनिश्चितः’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.६९) । इति च ॥ २०-२२ ॥ | |||
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ब्रह्मवत् = प्रकृतिवत् भगवत्प्रियत्वं ब्रह्मभूयम् । नतु तावत् प्रियत्वम् । किन्तु प्रियत्वमात्रम् ।‘बद्धा वाऽपि तु मुक्ता वा न रमावत् प्रिया हरेः’ ।इति पाद्मे | ब्रह्मवत् = प्रकृतिवत् भगवत्प्रियत्वं ब्रह्मभूयम् । नतु तावत् प्रियत्वम् । किन्तु प्रियत्वमात्रम् ।‘बद्धा वाऽपि तु मुक्ता वा न रमावत् प्रिया हरेः’ ।इति पाद्मे ।<span class="gr-moola">भूयाय</span> भावाय ॥२६ ॥ | ||
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ब्रह्मणः मायायाः ॥ २७ ॥ | <span class="gr-moola">ब्रह्मणः</span> मायायाः ॥ २७ ॥ | ||
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अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति अधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः । गुणैः सत्त्वादिभिः । प्रतीतिमात्रसुखत्वात् प्रवाला विषयाः । मूलानि भगवद्रूपादीनि । भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति । तथाहि भाल्लवेयशाखायाम्-‘ब्रह्म वा अस्य पृथङ् मूलम्, प्रकृतिः समूलम्, सत्त्वादयो अर्वाचीनमूलम् । भूतानि शाखाः, छन्दांसि पर्णा(त्रा)णि, देवनृतिर्यञ्चश्च शाखाः । पत्रेभ्यो हि फलं जायते । मात्राः शिफाः । मुक्तिः फलम्, अमुक्तिः फलम् । मोक्षो रसः, अमोक्षो रसः । अव्यक्ते च शाखाः, व्यक्ते च शाखा । अव्यक्ते च मूलम्, व्यक्ते च मूलम् । एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न न स्थीयते ; न ह्येष कदाचनान्यथा जायते, नान्यथा जायते ’ इति ॥ २ ॥ | अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति <span class="gr-moola">अधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः</span> । गुणैः सत्त्वादिभिः । प्रतीतिमात्रसुखत्वात् प्रवाला विषयाः । <span class="gr-moola">मूलानि</span> भगवद्रूपादीनि । भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति । तथाहि भाल्लवेयशाखायाम्-‘ब्रह्म वा अस्य पृथङ् मूलम्, प्रकृतिः समूलम्, सत्त्वादयो अर्वाचीनमूलम् । भूतानि शाखाः, छन्दांसि पर्णा(त्रा)णि, देवनृतिर्यञ्चश्च शाखाः । पत्रेभ्यो हि फलं जायते । मात्राः शिफाः । मुक्तिः फलम्, अमुक्तिः फलम् । मोक्षो रसः, अमोक्षो रसः । अव्यक्ते च शाखाः, व्यक्ते च शाखा । अव्यक्ते च मूलम्, व्यक्ते च मूलम् । एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न न स्थीयते ; न ह्येष कदाचनान्यथा जायते, नान्यथा जायते ’ इति ॥ २ ॥ | ||
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| id = BGB_C15_V03_B01 | | id = BGB_C15_V03_B01 | ||
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यथा स्थितिः तथा नोपलभ्यते । अन्तादिर्विष्णुः । ‘त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यम्’(भा.ग.८.३.१०)इति भागवते । ‘अनाद्यनन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः’(कुम्भ-म.भा.१२.४३.१९) इति च मोक्षधर्मे । असङ्गशस्त्रेण सङ्गराहित्यसहितेन ज्ञानेन । ‘ज्ञानासिनोपासनया शितेन’(भाग.११.२८.१८) इति हि भागवते । छेदश्च विमर्श एव । ततश्च तस्यैवाबन्धकं भवति । तथा हि मूलस्थं ब्रह्म प्रतीयते । तच्चोक्तं तच्छ्रुतावेव- ‘विमर्शो ह्यस्य च्छेदः । स तं न बध्नाति, बध्नाति चान्यान्’ इति । | यथा स्थितिः तथा नोपलभ्यते । अन्तादिर्विष्णुः । ‘त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यम्’(भा.ग.८.३.१०)इति भागवते । ‘अनाद्यनन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः’(कुम्भ-म.भा.१२.४३.१९) इति च मोक्षधर्मे । <span class="gr-moola">असङ्गशस्त्रेण</span> सङ्गराहित्यसहितेन ज्ञानेन । ‘ज्ञानासिनोपासनया शितेन’(भाग.११.२८.१८) इति हि भागवते । छेदश्च विमर्श एव । ततश्च तस्यैवाबन्धकं भवति । तथा हि मूलस्थं ब्रह्म प्रतीयते । तच्चोक्तं तच्छ्रुतावेव- ‘विमर्शो ह्यस्य च्छेदः । स तं न बध्नाति, बध्नाति चान्यान्’ इति । | ||
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| id = BGB_C15_V04_B01 | | id = BGB_C15_V04_B01 | ||
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तदर्थं च तमेव प्रपद्ये प्रपद्येत । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘तं वै प्रपद्येत यं वै प्रपद्य न शोचति न हृष्यति न जायते न म्रियते तद् ब्रह्म मूलम्, तत् छित्सुः’ इति ।‘नारायणेन दृष्टश्च प्रतिबुद्धो(प्रतिबद्धः) भवेत् पुमान्’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७५) ।इति च मोक्षधर्मे । छेदनोपायो ह्यत्राकाङ्क्षितः । न च भगवतोऽन्यः शरण्योऽस्ति ॥ ३, ४ ॥ | तदर्थं च <span class="gr-moola">तमेव प्रपद्ये</span> प्रपद्येत । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘तं वै प्रपद्येत यं वै प्रपद्य न शोचति न हृष्यति न जायते न म्रियते तद् ब्रह्म मूलम्, तत् छित्सुः’ इति ।‘नारायणेन दृष्टश्च प्रतिबुद्धो(प्रतिबद्धः) भवेत् पुमान्’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७५) ।इति च मोक्षधर्मे । छेदनोपायो ह्यत्राकाङ्क्षितः । न च भगवतोऽन्यः शरण्योऽस्ति ॥ ३, ४ ॥ | ||
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साधनान्तरमाह - निर्मानेति ॥ ५ ॥ | साधनान्तरमाह - <span class="gr-prateeka">निर्मानेति ॥</span> ५ ॥ | ||
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स्वरूपं कथयति- न तदित्यादिना ॥ ६॥ | स्वरूपं कथयति- <span class="gr-moola">न तदित्यादिना ॥</span> ६॥ | ||
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‘कर्षति’इत्युक्ते जीवस्य स्वातन्त्र्यं प्रतीतम् । तन्निवारयति- शरीरमित्यादिना ॥ यद् यदा शरीरमवाप्नोति उत्क्रामति च जीवः तदा ईश्वरः एव एतानि गृहीत्वा संयाति ।‘यत्रयत्र च संयुक्त्तो धाता गर्भं पुनः पुनः ।तत्रतत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१२) इति हि मोक्षधर्मे ।‘भावाभावावपि जानन् गरीयो जानामि श्रेयो न तु तत् करोमि ।आशासु हर्म्यासु ह्रदासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१०) इति च ।‘हत्वा जित्वाऽपि मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते ।अकर्ता त्वेव भवति कर्ता त्वेव करोति तत् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३१.१७) इति च । ‘तद्यथाऽनः सुसमाहितम् उत्सर्जद्यायात् । एवमेवायं (श)शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’(बृ.४.३.३५) इति च श्रुतिः। ‘वाङ् मनसि सम्पद्यते, मनः प्राणे, प्राणस्तेजसि, तेजः परस्यां देवतायाम् ’(छां.६.८.६) इति च । गन्धानिव सूक्ष्माणि ॥८ ॥ | ‘कर्षति’इत्युक्ते जीवस्य स्वातन्त्र्यं प्रतीतम् । तन्निवारयति- <span class="gr-prateeka">शरीरमित्यादिना ॥</span> <span class="gr-moola">यद्</span> यदा <span class="gr-moola">शरीरमवाप्नोति उत्क्रामति च</span> जीवः तदा <span class="gr-moola">ईश्वरः</span> एव <span class="gr-moola">एतानि गृहीत्वा संयाति</span> ।‘यत्रयत्र च संयुक्त्तो धाता गर्भं पुनः पुनः ।तत्रतत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१२) इति हि मोक्षधर्मे ।‘भावाभावावपि जानन् गरीयो जानामि श्रेयो न तु तत् करोमि ।आशासु हर्म्यासु ह्रदासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१०) इति च ।‘हत्वा जित्वाऽपि मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते ।अकर्ता त्वेव भवति कर्ता त्वेव करोति तत् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३१.१७) इति च । ‘तद्यथाऽनः सुसमाहितम् उत्सर्जद्यायात् । एवमेवायं (श)शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’(बृ.४.३.३५) इति च श्रुतिः। ‘वाङ् मनसि सम्पद्यते, मनः प्राणे, प्राणस्तेजसि, तेजः परस्यां देवतायाम् ’(छां.६.८.६) इति च । गन्धानिव सूक्ष्माणि ॥८ ॥ | ||
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| Line 8,859: | Line 8,908: | ||
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तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - उत्क्रामन्तमित्यादि ॥ १० ॥ | तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - <span class="gr-prateeka">उत्क्रामन्तमित्यादि ॥</span> १० ॥ | ||
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| Line 8,876: | Line 8,925: | ||
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यतन्तः ज्ञानं प्राप्य । अकृतात्मानः अशुद्धबुद्धयः ॥ ११ ॥ | <span class="gr-moola">यतन्तः</span> ज्ञानं प्राप्य । <span class="gr-moola">अकृतात्मानः</span> अशुद्धबुद्धयः ॥ ११ ॥ | ||
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पूर्वोक्तमेव ज्ञानं प्रपञ्चयति - यदादित्यगतमित्यादिना ॥ १२ ॥ | पूर्वोक्तमेव ज्ञानं प्रपञ्चयति - <span class="gr-prateeka">यदादित्यगतमित्यादिना ॥</span> १२ ॥ | ||
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गां भूमिम् ॥ १३ ॥ | <span class="gr-moola">गां</span> भूमिम् ॥ १३ ॥ | ||
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क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । कूटस्थः प्रकृतिः । तथा च शार्कराक्ष्यश्रुतिः- ‘प्रजापतिप्रमुखाः सर्वजीवाः क्षरोऽक्षरः पुरुषो वै प्रधानम् ।तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’ इति॥ १६-२० ॥ | क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । <span class="gr-moola">कूटस्थः</span> प्रकृतिः । तथा च शार्कराक्ष्यश्रुतिः- ‘प्रजापतिप्रमुखाः सर्वजीवाः क्षरोऽक्षरः पुरुषो वै प्रधानम् ।तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’ इति॥ १६-२० ॥ | ||
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तपः ब्रह्मचर्यादि । ‘ब्रह्मचर्यादिकं तपः’ इति ह्यभिधानम् ॥ १ ॥ | <span class="gr-moola">तपः</span> ब्रह्मचर्यादि । ‘ब्रह्मचर्यादिकं तपः’ इति ह्यभिधानम् ॥ १ ॥ | ||
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पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् ।‘परोपद्रवहेतूनां दोषाणां पैशुनं वचः । राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’ इति ह्यभिधानम् । लौल्यं= रागः । ‘रागो लौल्यं तथा रक्तिः’ इत्यभिधानात् | पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् ।‘परोपद्रवहेतूनां दोषाणां पैशुनं वचः । राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’ इति ह्यभिधानम् । लौल्यं= रागः । ‘रागो लौल्यं तथा रक्तिः’ इत्यभिधानात् ।<span class="gr-moola">अचापलं</span> स्थैर्यम् । ‘चपलश्चञ्चलोऽस्थिरः’ इत्यभिधानात् ॥२ ॥ | ||
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क्षमा तु क्रोधाभावेन सहापकर्तुरनपकृतिः । ‘अक्रोधोदोषकृच्छत्रोः क्षमावान् स निगद्यते’ इत्यभिधानात् । दैवीं सम्पदम् अभि जातः प्रति जातः॥३-७॥ | <span class="gr-moola">क्षमा</span> तु क्रोधाभावेन सहापकर्तुरनपकृतिः । ‘अक्रोधोदोषकृच्छत्रोः क्षमावान् स निगद्यते’ इत्यभिधानात् । <span class="gr-moola">दैवीं सम्पदम् अभि जातः</span> प्रति जातः॥३-७॥ | ||
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| Line 9,221: | Line 9,270: | ||
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मामात्मपरदेहेष्विति ॥ ‘न कस्यचिद् विष्णुः कारयिता । यदि स्यान्मामपी(न्ममापी)दानीं कारयतु’इत्यादि ।‘ईश्वरो यदि सर्वस्य कारकः कारयीत माम् ।अद्येति वादिनं ब्रूयात् सदाऽधो यास्यसीति तु ॥’ इति हि सामवेदे यास्कश्रुतिः ॥ १८ ॥ | <span class="gr-prateeka">मामात्मपरदेहेष्विति ॥</span> ‘न कस्यचिद् विष्णुः कारयिता । यदि स्यान्मामपी(न्ममापी)दानीं कारयतु’इत्यादि ।‘ईश्वरो यदि सर्वस्य कारकः कारयीत माम् ।अद्येति वादिनं ब्रूयात् सदाऽधो यास्यसीति तु ॥’ इति हि सामवेदे यास्कश्रुतिः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 9,334: | Line 9,383: | ||
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अतो विभज्याह- त्रिविधेत्यादिना ॥ २ ॥ | अतो विभज्याह- <span class="gr-prateeka">त्रिविधेत्यादिना ॥</span> २ ॥ | ||
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सत्त्वानुरूपा चित्तानुरूपा । यो यच्छ्रद्धः स एव स सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥ | <span class="gr-moola">सत्त्वानुरूपा</span> चित्तानुरूपा । <span class="gr-moola">यो यच्छ्रद्धः स एव स</span> सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥ | ||
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कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - यजन्त इत्यादिना | कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - <span class="gr-prateeka">यजन्त इत्यादिना ॥</span>४॥ | ||
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| Line 9,501: | Line 9,550: | ||
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सौम्यत्वम् अक्रौर्यम् । ‘अक्रूरः सौम्य उच्यते’इति ह्यभिधानम् । मौनं मननशीलत्वम् । ‘बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः’(बृ.अ.५,ब्रा.५.१) इति हि श्रुतिः । | <span class="gr-moola">सौम्यत्वम्</span> अक्रौर्यम् । ‘अक्रूरः सौम्य उच्यते’इति ह्यभिधानम् । <span class="gr-moola">मौनं</span> मननशीलत्वम् । ‘बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः’(बृ.अ.५,ब्रा.५.१) इति हि श्रुतिः । | ||
‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ ।इति हि भाल्लवेयश्रुतिः । | ‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ ।इति हि भाल्लवेयश्रुतिः । | ||
कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥ | कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥ | ||
| Line 9,583: | Line 9,632: | ||
| id = BGB_C17_V24_B01 | | id = BGB_C17_V24_B01 | ||
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पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- ओं तत् सत् इत्यादिना ॥ परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि- ‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च ।सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु ।द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः । | पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- <span class="gr-prateeka">ओं तत् सत् इत्यादिना ॥</span> परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि- ‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च ।सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु ।द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः । | ||
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| Line 9,590: | Line 9,639: | ||
| id = BGB_C17_V24_B02 | | id = BGB_C17_V24_B02 | ||
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‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१) इति च । ‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१) इति च । तेन ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥ | ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१) इति च । ‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१) इति च । <span class="gr-moola">तेन</span> ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 9,607: | Line 9,656: | ||
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‘तत् फलं मे स्यात्’ इत्यनभिसन्धाय ॥ २५ ॥ | ‘तत् फलं मे स्यात्’ <span class="gr-moola">इत्यनभिसन्धाय</span> ॥ २५ ॥ | ||
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तत्प्रकारं चाह -निश्चयमित्यादिना ॥ ४ ॥ | तत्प्रकारं चाह -<span class="gr-prateeka">निश्चयमित्यादिना ॥</span> ४ ॥ | ||
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| Line 9,805: | Line 9,854: | ||
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अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- न हीति ॥ ११ ॥ | अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- <span class="gr-prateeka">न हीति ॥</span> ११ ॥ | ||
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त्यागं स्तौति- अनिष्टमिति | त्यागं स्तौति- <span class="gr-prateeka">अनिष्टमिति ॥</span>१२ ॥ | ||
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पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - पञ्चेत्यादिना ॥ साङ्ख्यकृतान्ते ज्ञानसिद्धान्ते ॥ १३ ॥ | पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - <span class="gr-prateeka">पञ्चेत्यादिना ॥</span> <span class="gr-moola">साङ्ख्यकृतान्ते</span> ज्ञानसिद्धान्ते ॥ १३ ॥ | ||
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अधिष्ठानं देहादिः । कर्ता विष्णुः । स हि ‘सर्वस्य कर्ता’ इत्युक्तम् । जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम् । करणम् इन्द्रियादि च । चेष्टाः क्रियाः । हस्तादिक्रियाभिः होमादिकर्माणि जायन्ते । ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम् । पूर्वतनचेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति । दैवम् अदृष्टम् । तथाचायास्यश्रुतिः- ‘देहो ब्रह्माथेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः’ । इति ॥ १४, १५ ॥ | <span class="gr-moola">अधिष्ठानं</span> देहादिः । <span class="gr-moola">कर्ता</span> विष्णुः । स हि ‘सर्वस्य कर्ता’ इत्युक्तम् । जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम् । <span class="gr-moola">करणम्</span> इन्द्रियादि च । <span class="gr-moola">चेष्टाः</span> क्रियाः । हस्तादिक्रियाभिः होमादिकर्माणि जायन्ते । ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम् । पूर्वतनचेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति । <span class="gr-moola">दैवम्</span> अदृष्टम् । तथाचायास्यश्रुतिः- ‘देहो ब्रह्माथेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः’ । इति ॥ १४, १५ ॥ | ||
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केवलं निष्क्रियम् । ‘एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद् वदन्ति हि।’ इति तत्रैव ॥१६ ॥ | <span class="gr-moola">केवलं</span> निष्क्रियम् । ‘एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद् वदन्ति हि।’ इति तत्रैव ॥१६ ॥ | ||
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तज्ज्ञानं स्तौति- यस्येति ॥ यस्त्वीषद् बध्यते स ईषदहङ्कारी च ॥१७ ॥ | तज्ज्ञानं स्तौति- <span class="gr-prateeka">यस्येति ॥</span> यस्त्वीषद् बध्यते स ईषदहङ्कारी च ॥१७ ॥ | ||
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एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- ज्ञानमिति ॥ त्रिविधा कर्मचोदना । एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति त्रिविधा इत्युच्यते । कारणानि सङ्क्षिप्याऽह- करणमिति ॥ कर्मसङ्ग्रहः कर्मकारणसङ्क्षेपः । अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतम् । | एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- <span class="gr-prateeka">ज्ञानमिति ॥</span> <span class="gr-moola">त्रिविधा कर्मचोदना</span> । एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति <span class="gr-moola">त्रिविधा</span> इत्युच्यते । कारणानि सङ्क्षिप्याऽह- <span class="gr-prateeka">करणमिति ॥</span> <span class="gr-moola">कर्मसङ्ग्रहः</span> कर्मकारणसङ्क्षेपः । अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतम् । | ||
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पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- ज्ञानमित्यादिना ॥ गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे ॥ १९ ॥ | पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- <span class="gr-prateeka">ज्ञानमित्यादिना ॥</span> गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे ॥ १९ ॥ | ||
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एकं भावं विष्णुम् ॥ २० ॥ | <span class="gr-moola">एकं भावं</span> विष्णुम् ॥ २० ॥ | ||
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परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स | परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स <span class="gr-moola">दीर्घसूत्री</span>। परेण यः कृतो दोषो दीर्घकालकृतोऽपि वा ।यस्तस्य सूचको दोषाद् दीर्घसूत्री स उच्यते ॥’ इत्यभिधानात् ॥२८ ॥ | ||
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नैष्कर्म्यसिद्धिं नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम् ॥ ४९ ॥ | <span class="gr-moola">नैष्कर्म्यसिद्धिं</span> नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम् ॥ ४९ ॥ | ||
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यथा येनोपायेन सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध । या सिद्धिः ज्ञानस्य परा | <span class="gr-moola">यथा</span> येनोपायेन <span class="gr-moola">सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध</span> । <span class="gr-moola">या</span> सिद्धिः <span class="gr-moola">ज्ञानस्य परा निष्ठा</span>॥ ५० ॥ | ||
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ब्रह्मभूयाय | <span class="gr-moola">ब्रह्मभूयाय कल्पते</span>। ब्रह्मणि भावो ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मणि स्थितिः सर्वदा तन्मनस्कतेत्यर्थः ॥ ५३ ॥ | ||
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पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- सर्वकर्माणीत्यादिना ॥ ५६ ॥ | पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- <span class="gr-prateeka">सर्वकर्माणीत्यादिना ॥</span> ५६ ॥ | ||
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Revision as of 09:45, 15 April 2026
प्रथमोऽध्यायः
श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितम् श्रीमद्भगवद्गीताभाष्यम्
देवं नारायणं नत्वा सर्वदोषविवर्जितम् । परिपूर्णं गुरूंश्चाऽन् गीतार्थं वक्ष्यामि लेशतः ॥
नष्टधर्मज्ञानलोककृपालुभिर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो ज्ञानप्रदर्शनाय भगवान् व्यासोऽवततार ।
ततश्चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारसाधनादर्शनाद् वेदार्थाज्ञानाच्च संसारे क्लिश्यमानानां वेदानधिकारिणां स्त्रीशूद्रादीनां च धर्मज्ञानद्वारा मोक्षो भवेदिति कृपालुः सर्ववेदार्थोपबृंहितां तदनुक्तकेवलेश्वरज्ञानदृष्टार्थयुक्तां च सर्वप्राणिनाम् अवगाह्यानवगाह्यरूपां केवलभगवत्स्वरूपपरां परोक्षार्थां महाभारतसंहिताम् अचीक्लृपत् ॥
तच्चोक्तम् -
‘लोकेशा ब्रह्मरुद्राद्याः संसारे क्लेशिनं जनम् ।
वेदार्थाज्ञमधीकारवर्जितं च स्त्रियादिकम् ॥अवेक्ष्य प्रार्थयामासुर्देवेशं पुरुषोत्तमम् ।ततः प्रसन्नो भगवान् व्यासो भूत्वा च तेन च ॥अन्यावताररूपैश्च वेदानुक्तार्थभूषितम् ।केवलेनात्मबोधेन दृष्टं वेदार्थसंयुतम् ॥वेदादपि परं चक्रे पञ्चमं वेदमुत्तमम् ।भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥पुराणं भागवतं चेति सम्भिन्नः शास्त्रपुङ्गवः॥’इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।
‘ब्रह्माऽपि तन्न जानाति ईषत् सर्वोऽपि जानति(ते)।बह्वर्थमृषयस्तत्तु भारतं प्रवदन्ति हि ॥’ इत्युपनारदीये। ‘ब्रह्माद्यैः प्रार्थितो विष्णुर्भारतं स चकार ह ।यस्मिन् दशार्थाः सर्वत्र न ज्ञेयाः सर्वजन्तुभिः ॥’इति नारदीये ।‘भारतं चापि कृतवान् पञ्चमं वेदमुत्तमम् ।दशावरार्थं सर्वत्र केवलं विष्णुबोधकम् ॥ परोक्षार्थं तु सर्वत्र वेदादप्युत्तमं तु यत् ॥’ इति स्कान्दे । ‘यदि विद्याच्चतुर्वेदान् साङ्गोपनिषदान् द्विजः । न चेत् पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥’(म.भा.१.१.२६८)’ ‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रचलिष्यति ।’( म.भा.आदि.१.२९३)
मन्वादि केचिद् ब्रुवते ह्यास्तीकादि तथाऽपरे ।तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते ॥(म.भा.आदि.१.६६)
भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ।देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैः ऋषिभिश्च समन्वितैः ।व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ॥(ब्रह्माण्डपुराणे) ‘महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ।निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ (म.भा.१.३००) ‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ’( म.भा.आदि ५.५०),‘विराटोद्योगसारवान्’ ( म भा.१.८९) इत्यादितद्वाक्यपर्यालोचनया, ऋषिसम्प्रदायात्, ‘को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ ( वायुप्रोक्तवचनम्) इत्यादिपुराणग्रन्थान्तरगतवाक्यान्यथानुपपत्त्या, नारदाध्ययनादिलिङ्गैश्चावसीयते ।
कथमन्यथा भारतनिरुक्तिज्ञानमात्रेण सर्वपापक्षयः ? प्रसिद्धश्च सोऽर्थः । कथं चान्यस्य न कर्तुं शक्यते? ग्रन्थान्तरगतत्वाच्च नाविद्यमानस्तुतिः । न च कर्तुरेव । इतरत्रापि साम्यात् । तत्र च सर्वभारतार्थसंग्रहां वासुदेवार्जुनसंवादरूपां भारतपारिजातमधुभूतां गीताम् उपनिबबन्ध ।
तच्चोक्तम्– ‘भारतं सर्वशास्त्रेषु भारते गीतिका वरा ।विष्णोः सहस्रनामापि ज्ञेयं पाठ्यं च तद् द्वयम् ॥’ इति महाकौर्मे ।
‘स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने।’(म.भा.१३.१६.१२.) इत्यादि च । तत्र सेनयोर्मध्ये बान्धवादिमोहजालसंवृतं विषीदन्तम् अर्जुनं भगवानुवाच ।
द्वितीयोऽध्यायः
रागादिदोषकारणमाह परिहाराय श्लोकद्वयेन
इन्द्रियजयफलमाहोत्तराभ्यां श्लोकाभ्याम् ।
प्रसादाभावे दोषमाहोत्तरश्लोकाभ्याम् ।
तृतीयोऽध्यायः
आत्मस्वरूपं ज्ञानसाधनं चोक्तं पूर्वत्र । ज्ञानसाधनत्वेन अकर्म विनिन्द्य कर्म विधीयत उत्तराध्याये ।
‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) ।
उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति ।यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः,कर्म इतरक्रिया ॥ १४ ॥
‘स्थितप्रज्ञस्यापि कार्यो देहादिर्दृश्यते यदा ।स्वधर्मो मम तुष्ट्यर्थः सा हि सर्वैरपेक्षिता ॥’ इति वचनाच्च पञ्चरात्रे ।
अन्यदाऽन्यरतिरपीषत् सर्वस्य भवति । न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् । ‘आत्मतृप्तः’ इति पृथगभिधानात् । कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धो ‘यो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात्’ इत्यादौ ।परमात्मरतिश्चात्र विवक्षिता ।
‘विष्णावेव रतिर्यस्य क्रिया तस्यैव नास्ति हि ।’इति वचनात् ॥ १७ ॥
इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।
अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
बुद्धेः परस्य माहात्म्यम्, कर्मभेदः, ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन् अध्याये ।
पञ्चमोऽध्यायः
तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन -‘यदृच्छालाभसन्तुष्टः’(४.२२) इत्यादि संन्यासम् , ‘कुरु कर्मैव’(४.१५) इत्यादि कर्मयोगं च।
‘संन्यासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः ।न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते ॥तद्भक्तोऽपि हि यद् गच्छेत् तद्गृहस्थो न धार्मिकः ।मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते ।यदाऽधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् ॥’ इति नारदीये ।
‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’ । ‘यदहरेव विरजेत्’(जा.उ.४.१) इति च ।
‘संन्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम गरीयसी (महीयसी) ।येषामत्राधिकारो न, तेषां कर्मेति निश्चयः ॥’इत्यादेश्च ब्राह्मे ।अतो नात्राऽश्रमः संन्यास उक्तः ॥२ ॥
षष्ठोऽध्यायः
ज्ञानान्तरङ्गं समाधियोगमाहानेनाऽध्यायेन ।
सप्तमोऽध्यायः
साधनं प्राधान्येनोक्तम् अतीतैरध्यायैः । उत्तरैस्तु षड्भिः भगवन्माहात्म्यं प्राधान्येनाह- भगवन्महिमा विशेषत उच्यते ।
‘देवानां गुणलिङ्गानाम् आनुश्राविककर्मणाम् । सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या ।अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी । जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥’(भाग.३.२६.३२-३३)इति भागवते लक्षणाच्च ।
आह च- ‘सर्वे वेदास्तु देवार्था देवा नारायणार्थकाः ।नारायणस्तु मोक्षार्थे मोक्षो नान्यार्थ इष्यते ।एवं मध्यमभक्तानाम् एकान्तानां न कस्यचित् ।अर्थे नारायणो देवस्त्वन्यत् सर्वं तदर्थकम् ॥’ इति गीताकल्पे ।
त एव च विदुः । ‘यमेवैष वृणुते’(आथ.४.१.३)इति श्रुतेः ॥ २९, ३० ॥अष्टमोऽध्यायः
मरणकालकर्तव्य-गत्याद्यस्मिन्नध्याये उपदिशति- उक्तव्याख्यानपूर्वकं ब्रह्मप्राप्तिरुच्यते ।
‘यथाप्रतीतं वा सर्वमत्र वै न विरुध्यते ॥’ इति च । स्कान्दे च - ‘आत्माभिमानाधिकारस्थितमध्यात्ममुच्यते ।देहाद् बाह्यं विनाऽतीव बाह्यत्वादधिदैवतम् ।देवाधिकारगं सर्वं महाभूताधिकारगम् ।तत्कारणं तथा कार्यमधिभूतं तदन्तिकात्’॥ इति । महाकौर्मे च - ‘अध्यात्मं देहपर्यन्तं केवलात्मोपकारकम् ।‘सदेहजीवभूतानि यत् तेषामुपकारकृत् ।अधिभूतं तु मायान्तं देवानामधिदैवतम् ॥’ इति ॥४ ॥
‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति॥’(बृ.६.४.२) इति हि श्रुतिः ।‘सदा तद्भावभावितः’ इति अन्तकालस्मरणोपायमाह । भावः= अन्तर्गतं मनः । तथाऽभिधानात् । भावितत्वम्= तिवासितत्वम् । ‘भावना त्वतिवासना’ इत्यभिधानात् ॥ ६, ७ ॥
नवमोऽध्यायः
सप्तमाध्यायोक्तं स्पष्टयत्यस्मिन्नध्याये- सप्तमोक्तं प्रपञ्चयति ।
‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं दैवं मां (त्वं) ज्ञातुमर्हसि।’(मोक्षधर्मे) इति च । ‘विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्(त्वां च मूर्तितः) ।प्रधानविनियोगस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति(त्वामेव विशते बुधः) ॥’(कुम्भ-म.भा.१३.४५.४११) इति च । ‘न कुत्रचिच्छक्तिरनन्तरूपा विहन्यते तस्य महेश्वरस्य ।तथाऽपि मायामधिरुह्य देवः प्रवर्तते सृष्टिविलापनेषु ॥’ इति ऋग्वेदखिलेषु । ‘मय्यनन्तगुणेनन्ते गुणतोनन्तविग्रहे।’ इति भागवते । ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म इति, (बृ)बृंहति (बृ)बृंहयति ।’ इति च आथर्वणे । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते।’ इति च । ‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि’(ऋ.मं.१.अनु.१५४.मं.१), ‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.मं.७.अनु.९९.मं.२) इत्यादेश्च ।
प्रकृतेर्वशादवशम् ।‘त्वमेवैतत्सर्जने सर्वकर्मण्यनन्तशक्तोऽपि स्वमाययैव ।मायावशं चावशं लोकमेतत् तस्मात् स्रक्ष्यस्यत्सि पासीश विष्णो ॥’ इति गौतमखिलेषु ॥ ८ ॥
‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥’(भाग.२.१०.११) इति भागवते ।यस्य असक्त्यैव सर्वकर्मशक्तिः कुतस्तस्य सर्वकर्मबन्ध इति भावः । ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’इति श्रुतिः।यः कर्माणि(पि) निया(य)मयति कथं च (तत्) तं कर्म बध्नाति ॥९ ॥
‘भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च’(म.भा.१११) इति च भारते‘एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः ।एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत् सर्वत्रात्मदर्शनम्॥’(एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥भाग.६.३.२२ ) (इति भागवते) ॥२६ ॥
दशमोऽध्यायः
उपासनार्थं विभूतीर्विशेषकारणत्वं च केषाञ्चिदनेन अध्यायेनाह-
एकादशोऽध्यायः
यथा श्रुते ध्यानं (कर्तुं) शक्यं तथा स्वरूपस्थितिरनेनाध्यायेनोच्यते ।
‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वतस्पात् ।सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः ॥’ इति यजुर्वेदे च । विश्वशब्दश्चानन्तवाची-‘सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्णमेव च।’ इत्यभिधानात् ।‘अनन्तबाहुमनन्तपादम् अनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् ॥’ इति च बाभ्रव्यशाखायाम् ।
महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति । अन्यथा ‘अनादिमत् परं ब्रह्म’(१३.१३) इत्याद्ययुक्तं स्यात् ।अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वेऽपरिमेयत्वं सिध्यति ।‘महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम् ।अनन्तस्य न तस्यान्तः सङ्ख्यानं चापि विद्यते ॥’इत्यादित्यपुराणे । तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवन्ति(भवति) ।‘असङ्ख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परीमाणविवर्जिताश्च’ ।इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘यावान् वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः ।उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते ।उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ ॥’(छा.८.१.३) इति च ।
‘कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नपार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम् ।’(भाग.१०.१४.३१)इति च भागवते ।
द्वादशोऽध्यायः
अव्यक्तोपासनाद् भगवदुपासनस्योत्तमत्वं प्रदर्श्य तदुपायं प्रदर्शयत्यस्मिन्नध्याये-
त्रयोदशोऽध्यायः
पूर्वोक्तज्ञान-ज्ञेय-क्षेत्र-पुरुषान् पिण्डीकृत्य विविच्य दर्शयत्यनेनाध्यायेन । (सर्वार्थसङ्क्षेपोऽयम् )॥ १ -३॥
चतुर्दशोऽध्यायः
साधनं प्राधान्येनोत्तरैरध्यायैर्वक्ति-
पञ्चदशोऽध्यायः
संसारस्वरूपतदत्ययोपायविज्ञानान्यस्मिन्नध्याये दर्शयति- त्रयोदशोक्तं विविच्य दर्शयति-
षोडशोऽध्यायः
पुमर्थसाधनविरोधीनि अनेनाध्यायेन दर्शयति-
सप्तदशोऽध्यायः
गुणभेदान् प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन ।
‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ ।इति हि भाल्लवेयश्रुतिः ।कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥
अष्टादशोऽध्यायः
पूर्वोक्तं साधनं सर्वं सङ्क्षिप्योपसंहरति अनेनाध्यायेन ।