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| == अष्टमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C08]] |
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| | title = अष्टमोऽध्यायः
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| मरणकालकर्तव्यगत्याद्यस्मिन्नध्याये उपदिशति-
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| उक्तव्याख्यानपूर्वकं ब्रह्मप्राप्तिरुच्यते ।
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| | verse_line1 = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
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| | verse_line2 = अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥
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| | verse_line1 = अधियज्ञः कथं कोत्र देहेस्मिन्मधुसूदन ।
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| | verse_line2 = प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोसि नियतात्मभिः॥२ ॥
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| | verse_line1 = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोध्यात्ममुच्यते ।
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| | verse_line2 = भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः॥३ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| | text =
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| तदिति विशेषणात् ब्रह्मेत्युक्तमन्यदेव प्रकृत्यादीनां मध्ये किञ्चित्; उपरि 'साधियज्ञं च'' इति चशब्दादधिभूतादिसहितत्वेन विष्णुज्ञानमन्यदेवेति संशयः 'किं तद् ब्रह्म'' इति प्रश्नकारणम् ॥ १,२ ॥
| |
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| | verse_line1 = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥
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| | verse_line2 = अधियज्ञोहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| }}
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| | text =
| |
| परमाक्षरं विष्णुरेव मुख्यत इति प्रसिद्धत्वात् तथैव (परिहार इति) परिहरति । अज्ञानां तदपि ज्ञापयितुं तथैव परिहारः । पुनरहमिति नोक्तमित्याशङ्का 'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नम्" इति विष्णावेव प्रयुक्तेनाव्यक्तशब्देन 'अव्यक्तोक्षर इत्युक्तः'' इति परिह्रियते । 'ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्'' इत्यत्र तु पृथक् प्रश्नादुपासकयोः फलतारतम्यकथनात् 'कूटस्थोक्षर उच्यते'' इत्युक्ताक्षरादपि चोत्तमः इति विष्णोरुत्तमत्वकथनाच्चान्यदेवेत्यवसीयते । 'अधियज्ञोहमेव'' इति साधियज्ञमित्युक्त्या प्राप्तभेदनिवृत्त्यर्थम् । तस्यैव सर्वप्राणिदेहस्थित-रूपान्तरापेक्षया सहितत्वं युज्यते ।'प्राणिनां देहगो विष्णुरधियज्ञ इतीरितः ।स एव व्याप्तरूपेण ब्रह्मेति परिकीर्त्यते ।तैस्तैरधिकयाज्यत्वाद् बृंहितत्वाच्च हेतुतः ।अध्यात्मं तत्स्वभावो यदधिकः परमात्मगः ।पुंसां सजडभावानां सर्गः कर्म हरेः स्मृऽतम् ।भूताधिकत्वतो जीवा अधिभूतमितीरिताः ।अधिको दैवतं विष्णुरेव यस्यास्तु सा रमा ।पुरुप्राणाधिदैवाख्या त्विति ज्ञेयमिदं नरैः'' ॥ इति तत्त्वविवेके ।कथंरूपोधियज्ञ इति प्रश्नस्तु 'अहमेव'' इत्युक्तत्वात् तल्लक्षणोक्त्यैव परिहृतः ॥॥ ३,४ ॥
| |
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| | verse_line1 = अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
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| | verse_line2 = यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥
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| | verse_line1 = यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
| |
| | verse_line2 = तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥
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| | verse_line1 = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च ।
| |
| | verse_line2 = मय्यर्पितमनोबुदि्धर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७ ॥
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| | verse_line1 = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
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| | verse_line2 = परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥
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| | text =
| |
| मद्भावं मयि भावम् । सदा तद्भावभावितानामेव स्मरंस्त्यजतीति केवलतत्कालस्मरणं भवति । न चेत् स्मरतोपि समाधिस्थस्खलनवत् पूर्वकर्मानुसारिस्मृऽत्या तत्प्राप्तिरेव भवति । अपरोक्षज्ञानिनां प्रारब्धकर्मावसाने स्मरंस्त्यजतीति भवत्येव । 'प्रयाणकालेपि च मां ते विदुः'' इत्युक्तत्वात् । 'युक्तचेतसः'' इति विशेषणान्नित्यं स्मरतामेवापरोक्षज्ञानं जायते ।
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| 'भक्त्या ज्ञानान्निषिद्धानां त्यागान्नित्यहरिस्मृऽतेः ।
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| अरागाद् विहितात्यागादित्येतैरेव संयुतैः ।
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| अपरोक्षदर्शनं विष्णोर्जायते नान्यथा क्वचित्'' ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ ५-८ ॥
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| | verse_line1 = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
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| | verse_line2 = सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥॥ ९ ॥
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| | verse_line1 = प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
| |
| | verse_line2 = भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥॥ १० ॥
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| तमसः परस्तात् अप्राकृतदेहम् ॥ ९, १० ॥
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| | verse_line1 = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
| |
| | verse_line2 = यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥॥ ११ ॥
| |
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| मन आदीनां ब्रह्मणि चरणं ब्रह्मचर्यम् ॥ ११ ॥
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| | verse_line1 = सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
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| | verse_line2 = मूध््नर्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥
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| | verse_line1 = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
| |
| | verse_line2 = यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥
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| एकाक्षरवाच्यत्वादेकाक्षरं परं ब्रह्म ॥ १३ ॥
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| | verse_line1 = अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
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| | verse_line2 = तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥
| |
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| | verse_line1 = मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
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| | verse_line2 = नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिदि्धं परमां गताः॥१५ ॥
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| | verse_line1 = आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोर्जुन ।
| |
| | verse_line2 = मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥
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| |
| 'नियमाज्जन्मनोभावो मुक्तस्यैव तथापि तु ।महर्लोकमतीतानां न जन्मांशलयौ विना ।तत्राप्यवश्यं तत् स्थानं तैः क्षिप्रं पुनराप्यते'' ॥ इति पाद्मे ॥१६ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
| |
| | verse_line2 = रात्रिं युगसहस्रान्तां तेहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥
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| | text =
| |
| सहस्रमिति बह्वेव । ब्रह्मणः परब्रह्मणः ।
| |
| 'अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके'' ॥ इति वाक्यशेषात् ।
| |
| नहि विरिञ्चाहन्येव सर्वव्यक्तलयः ।
| |
| 'नित्यस्यापि हरेः कालो द्विपरार्धात्मकस्त्वयम् ।
| |
| अहःश्चासौ(श्वासो) निमेषश्चेत्यप्रवृत्त्योपचर्यते'' ॥ इति च ॥१७ ॥
| |
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| | verse_line1 = अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
| |
| | verse_line2 = रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥
| |
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| | verse_line1 = भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
| |
| | verse_line2 = रात्र्यागमेवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = परस्तस्मात्तुभावोन्योव्यक्तोव्यक्तात्सनातनः ।
| |
| | verse_line2 = यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥
| |
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| | verse_line1 = अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
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| | verse_line2 = यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥
| |
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| | verse_line1 = पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
| |
| | verse_line2 = यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२ ॥
| |
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| | verse_line1 = यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
| |
| | verse_line2 = प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥
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| | text =
| |
| यत्र कालाभिमानिदेवतासु मृत्यनन्तरं प्रयाताः । अग्निर्ज्योतिर्धूमानामकालाभिमानित्वेपि कालप्राचुर्यात् काल इत्युच्यते ॥ २३ ॥
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| | verse_line1 = अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
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| | verse_line2 = तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥
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| | verse_line1 = धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
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| | verse_line2 = तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥
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| | verse_line1 = शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
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| | verse_line2 = एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥२६ ॥
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| 'अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधा वह्नेः पुत्रो व्यवस्थितः ।तं प्राप्य याति ब्रह्मिष्ठो दिवसाद्यभिमानिनः'' ॥ इति सत्तत्त्वे ।तत्कालमरणविवक्षायामग्निज्योतिर्धूमानामयोगः । 'अथ यो दक्षिणे प्रमीयते पितॄणामेव महिमानं गत्वा चन्द्रमसः सायुज्यं गच्छत्येतौ वै सूर्याचन्द्रमसोर्महिमानौ ब्राह्मणो विद्वानभिजयति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति'' इति विदुषो दक्षिणायनमरणेप्यपुनरावृत्त्या ब्रह्मप्राप्तिश्रुतेः । 'विद्वान् ब्रह्म समाप्नोति यत्र तत्र मृतोपि सन्'' इति च पाद्मे ॥ २४-२६ ॥
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| | verse_line1 = नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।
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| | verse_line2 = तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥
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| | verse_line1 = वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोध्यायः ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये अष्टमोध्यायः ॥
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| 'मार्गौ ब्रह्म च यः पश्येत् साक्षादेवापरोक्षतः ।
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| सर्वपुण्यातिगोमुह्यन् यात्यसौ ब्रह्म तत् परम्'' ॥ इति च ।॥ २७-२८ ॥
| |
| }}
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| [[Category:Bhagavadgitatatparya]] | |