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| == पञ्चमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C05]] |
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| | title = पञ्चमोऽध्यायः
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| तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन -'यदृच्छालाभसन्तुष्टः'' इत्यादि सन्न्यासम् ; 'कुरु कर्म'' इत्यादि कर्मयोगं च-
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| | verse_line1 = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
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| | verse_line2 = यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| {{Uvacha|अर्जुन उवाच}}
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| | text =
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| योगसंन्यासयोर्लक्षणं स्पष्टयत्यनेनाध्यायेन । योगसंन्यस्तकर्माणमित्यादौ न्यासशब्दः सर्वकर्मत्यागविषयः इत्याशङ्क्य योगसंन्यासयोर्भिन्नपुन्निष्ठत्वाभिप्रायेण पृच्छति । संन्यासमिति ॥१॥
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| | verse_line1 = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
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| | verse_line2 = तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| {{Uvacha|श्री भगवानुवाच}}
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| | text =
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| एकपुंयोग्यावेतौ तयोर्मध्ये योग एव विशिष्ट इति परिहाराभिप्रायः । उभौ समुच्चितौ । 'संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगत'' इति वक्ष्यमाणत्वात् ॥ २ ॥
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| | verse_line1 = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
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| | verse_line2 = निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥
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| | text =
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| द्वेषादिवर्जनमेव संन्यासशब्दार्थो न यत्याश्रमोत्राभिप्रेत इत्याह ज्ञेय इति । न च 'काम्यानां कर्मणां न्यासम्'' इत्यनेन विरोधः । तेनापि सहितस्य न्यासत्वात् । न च त्यागस्य पृथग्वचनाद्विरोधः । कुरुपाण्डववत् न्यासावान्तरभेदत्वात्त्यागस्य ॥ ३ ॥
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| | verse_line1 = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
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| | verse_line2 = एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥
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| }}
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| | text =
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| बालास्तु न्यासशब्देन यत्याश्रममेव स्वीकृत्य तत्स्थानामेव साङ्ख्य-शब्दोदितज्ञानाधिकारो गृहस्थानामेव योगशब्दोदितकर्माधिकार इति मन्यन्ते । तन्न पण्डिता मन्यन्ते । कुतः ? यस्माज्ज्ञानमार्गं कर्ममार्गं च सम्यगास्थितः उभयोरपि फलं प्राप्नोति ॥ ४ ॥
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| | verse_line1 = यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
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| | verse_line2 = एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| | text =
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| तस्माज्ज्ञानिनां कर्माप्यनुष्ठेयम् । कर्मिणामपि गृहस्थानां ज्ञातव्यो भगवान् । न हि ज्ञानं विना कर्मणः सम्यगनुष्ठानं भवति ।'निष्कामं ज्ञानपूर्वं च निवृत्तमिह चोच्यते ।निवृत्तं सेवामानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ।बुद्ध्याविहिंसन् पुष्पैर्वा प्रणवेन समर्चयेत् ।वासुदेवात्मकं ब्रह्म मूलमन्त्रेण वा यतिः ।मुक्तिरस्तीति नियमो ब्रह्मदृग्यस्य विद्यते ।तस्याप्यानन्दवृदि्धः स्याद्वैष्णवं कर्म कुर्वतः ।कर्म ब्रह्मदृशा हीनं न मुख्यमिति कीर्तितम् ।तस्मात्कर्मेति तत्प्राहुर्यत्कृतं ब्रह्मदर्शिना ।एतस्मान्न्यासिनां लोकं संयान्ति गृहिणोपि हि ।ज्ञानमार्गः कर्ममार्ग इति भेदस्ततो न हि ।तस्मादाश्रमभेदोयं कर्मसङ्कोचसम्भवः'' ॥ इति व्यासस्मृऽतेः ॥५ ॥
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| | verse_line1 = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
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| | verse_line2 = योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६ ॥
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| | text =
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| 'मोक्षोपायो योग इति तद्रूपो न्यास एव तु ।
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| विष्ण्वर्पिततया भद्रो नान्यो न्यासः कथञ्चन'' । इत्याग्नेये । विष्ण्वर्पितत्वादियोगरूपत्वं विना केवलकर्मत्यागो नरकफल एव । 'यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव'' । इति वक्ष्यमाणत्वात् । योगविशेषत्वान्न्यासस्य पृथगुक्तिः ॥६ ॥
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| | verse_line1 = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रियः
| |
| | verse_line2 = सर्वभूतात्मभूतात्माकुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ७ ॥
| |
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| | text =
| |
| सर्वभूतात्मभूतात्मेति मुख्ययोगः ।
| |
| 'आदानात्सर्वभूतानां विष्णुरात्मा प्रकीर्तितः ।
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| सर्वभूतात्मभूतात्मा तत्र भूतमनाः पुमान्'' ॥ इति च ॥७ ॥
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| | verse_line1 = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
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| | verse_line2 = पश्यन् शृृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥
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| | verse_line1 = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अपि ।
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| | verse_line2 = इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥
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| | text =
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| यथा न्यासस्य योगरूपत्वं तथाह नैव किञ्चिदित्यादिना ।
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| 'विष्णुनार्थेष्वीरितानि मन आदीनि सर्वशः ।
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| वर्तन्तेन्यो न स्वतन्त्र इति जानन् हि तत्ववित्'' ॥ इति च ॥ ८, ९ ॥
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| | verse_line1 = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
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| | verse_line2 = लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥
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| | verse_line1 = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।
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| | verse_line2 = योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥११ ॥
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| | verse_line1 = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
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| | verse_line2 = अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥
| |
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| | verse_line1 = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
| |
| | verse_line2 = नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥
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| | text =
| |
| तत्पूजात्मकानि तत्कृतानि मम शुभार्थमिति ब्रह्मण्याधानम् । स्वातन्त्र्याभावापेक्षयैव जीवस्याकर्तृत्वम् ।
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| 'स्ववन्दनं यथा पित्रा कारितं शिशुकर्तृकम् ।
| |
| एवं पूजा विष्ण्वधीना भवेज्जीवकृतेत्यपि'' ॥ इति प्रवृत्ते ।
| |
| अतो मनसैव कर्मन्यासोस्वातन्त्र्यापेक्षया ॥ १०-१३ ॥
| |
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| | verse_line1 = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
| |
| | verse_line2 = न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥
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| | verse_line1 = नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
| |
| | verse_line2 = अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥
| |
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| | verse_line1 = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
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| | verse_line2 = तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥
| |
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| | verse_line1 = तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
| |
| | verse_line2 = गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥
| |
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| यथा पितॄदत्तं पालकत्वं राजपुत्राणाम् एवं परमात्मदत्तं क्रियास्वातन्त्र्य-लक्षणं कर्तृत्वम् । क्रियानिष्पन्नधर्मादिरूपकर्मणि स्वातन्त्र्यं च जीवानामप्यस्तीत्याशङ्कां परिहरति । न कर्तृत्वमित्यादिना । क्रियायामदृष्टोत्पादने फले च स्वातन्त्र्यं लोकस्य न सृजतीश्वर इत्यर्थः । अन्यथा लोकस्येति विशेषणं व्यर्थम् । जनपदे निवसतां तद्वित्त-भोजिनामप्याधिपत्यादानान्न दत्ता जनपदा राज्ञा स्वपुत्राणामितिवत्कर्मफलादिसंयोगिनामपि तत्स्वातन्त्र्यादानान्न सृजतीति युज्यते । स्वयमेव भवति भावयति चेति स्वभावो भगवान् । स्वभावत्वात्स्वयमेव कर्तृत्वादिषु प्रवर्तते ।'स्वातन्त्र्याद्भगवान्विष्णुः स्वभाव इति कीर्तितः ।तत्स्वातन्त्र्यं कदाप्येष नान्यस्य सृजति क्वचित् ।स्वातन्त्र्यादेव पापादिसम्बन्धः कुर्वतोपि न ।अज्ञानावृतबुदि्धत्वादीदृशं तं न जानते'' ॥ इति महावाराहे । 'अहं सर्वस्य प्रभवः'' । 'तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णामि'' ।'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ।'' 'न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चिनारे'' । 'देवस्यैष स्वभावोयम्'' ।'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'' । इत्यादेर्नास्यास्वाभाविकं कर्तृत्वमकर्तृत्वं वा । विपरीतप्रमाणाभावाच्च । अनिर्वाच्यनिरासादेव च निरस्तोयं पक्षः । न च सर्वविशेषराहित्यवादिनां शून्यवादात्कश्चिद्विशेषः । न हि सर्वविशेषरहितमित्युक्ते तदस्तीति सिद्ध्यति । वाच्यत्वलक्ष्यत्वास्तित्वादीनामपि विशेषत्वात् । अन्यथास्ति ब्रह्मेत्यादीनां शब्दानामपि पर्यायत्वादयो दोषाः । व्यावर्त्यविशेषश्च व्यावृत्तविशेषनिबन्धन एव । अन्यथा वैयर्थ्यमेव स्यात् । न च सर्वशब्दावाच्यस्य लक्ष्यत्वम् । न च सर्वप्रमाणागोचरमस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । नास्तित्वं तु सप्तमरसादिवददर्शनात्सिद्ध्यति ।स्वप्रकाशत्वं च न अमानं सिद्ध्यति । स्वयम्प्रकाशत्वं च ततोतिरिक्तं चेद्विशेषाङ्गीकारः । न चेत्तदेव प्रमाणगोचरम् । तत्प्रमाणाभावे परप्रकाशत्वमात्रनिरासे स्वप्रकाशत्वे प्रमाणाभावादप्रकाशत्वमेव स्यात् । अर्थतः सिदि्धरित्यर्थापत्तितः सिदि्धस्तत्प्रमाणतः सिदि्धर्वा । उभयथापि प्रमेयत्वमेव स्यात् ।स्वप्रकाशशब्देन स्वमितत्वानङ्गीकारात्परमितत्वानङ्गीकाराच्चासिदि्धरेव । प्रकाश इत्युक्तेपि स्वमन्यं वा किञ्चित्प्रकाश्यं विना न दृष्ट एव भोजनादिवत् । कर्तृकर्मविरोधश्चानुभवविरुद्धः । ज्ञानं च ज्ञेयं ज्ञातारं च विना न दृष्टम् । अतः शून्यवादान्न कश्चिद्विशेषः । अतोनन्तदोषदुष्टत्वादुपरम्यते ।हरिः स्वभावतः कर्ता सर्वमन्यत्तदीरितम् ।अतः सा कर्तृता तस्य न कदाचिद्विनश्यति ॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ १४-१७ ॥
| |
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| | verse_line1 = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
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| | verse_line2 = शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥१८ ॥
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| |
| 'विषमेष्वपि जीवेषु समो विष्णुः सदैव तु ।
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| यत्तृणादिगतस्यापि गुणाः पूर्णा हरेः सदा'' ॥ इति च ॥१८ ॥
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| | verse_line1 = इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
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| | verse_line2 = निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥
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| | verse_line1 = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
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| | verse_line2 = स्थिरबुदि्धरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥
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| संन्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्चयत्यध्यायशेषेण-
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| | verse_line1 = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
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| इदानीमपि परमात्मनि स्मृऽतमात्रे सुखं विन्दतीति यत्तदा स एव सम्यगुक्तः किमु ॥ २१-२३ ॥
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| ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरश्लोकैः-
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| ब्रह्मणि भूतः । अन्यथा पुनर्ब्रह्म गच्छतीति विरोधाच्च । अन्तस्सुखादिकं च ब्रह्मदर्शनात् ॥ २४ ॥
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| | verse_line1 = लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
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| | verse_line2 = छिन्नद्वैधायतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥
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| | verse_line1 = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
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| | verse_line1 = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
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| | verse_line1 = यतेंद्रियमनोबुदि्धर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
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| | verse_line2 = विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये पञ्चमोध्यायः ॥
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| 'अमुक्तो मुक्तसादृश्यान्मुक्त एव हि तत्त्वदृक् ।
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| किमु मुक्तिगतस्तस्माज्ज्ञानमेवाधिकं नरे'' ॥ इति नारदीये ॥ २७, २८ ॥
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| | verse_line1 = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
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| | verse_line2 = सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम पञ्चमोध्यायः ॥
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