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| == सर्वशास्त्रतात्पर्यनिर्णयः ==
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| | title = सर्वशास्त्रतात्पर्यनिर्णयः
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| | verse_line1 = औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् ।कृष्णादवाप्य वर्षत्रितयात् पुरं स्वमाजग्मतुर्हरिसुतेन विशोकनाम्ना ॥ १॥
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| | verse_line1 = सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता ।या पिङ्गलाऽन्यभव आत्मनि संस्थितं तं संस्मृत्य कान्तमुरुगायमभूत् त्रिवक्रा ॥ २॥
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| | verse_line1 = तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् ।व्यासात् परात्मत उवाच च फल्गुनादिदैवेषु(फल्गुणादिदैवेषु) सर्वविजयी परविद्ययैषः ॥ ३॥
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| | verse_line1 = सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् ।क्रीडार्थमेव विजिगाय तथोभयात्मयुद्धे बलं च करवाक्प्रभवेऽमितात्मा ॥ ४॥
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| | verse_line1 = नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप ।को नाम विष्ण्वनुपजीवक आस यस्य नित्याश्रयादभिहिताऽपि रमा सदा श्रीः ॥ ५॥
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| | verse_line1 = व्यासादवाप परमात्मसतत्त्वविद्यां धर्मात्मजोऽपि सततं भगवत्प्रपन्नाः ।ते पञ्च पाण्डुतनया मुमुदुर्नितान्तं सद्धर्मचारिण उरुक्रमशिक्षितार्थाः ॥ ६॥
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| | verse_line1 = यदा भरद्वाजसुतस्त्वसञ्चयी प्रतिग्रहोज्झो निजधर्मवर्ती ।द्रौणिस्तदा धार्तराष्ट्रैः समेत्य क्रीडन् पयः पातुमुपैति सद्म ॥ ७॥
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| | verse_line1 = तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् ।पीतक्षीरान् धार्तराष्ट्रान् समेत्य मया पीतं क्षीरमित्याह नित्यम् ॥ ८॥
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| | verse_line1 = नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् ।पुनः कदाचित् स तु मातृदत्ते पिष्टे नेदं क्षीरमित्यारुराव ॥ ९॥
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| | verse_line1 = दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य ।सम्प्रेरितः कृपया चाऽर्तरूपो द्रोणो ययावार्जयितुं तदा गाम् ॥ १०॥
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| | verse_line1 = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः ।दोषाय यस्मात् स पिताऽखिलस्य स्वामी गुरुः परमं दैवतं च ॥ ११॥
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| | verse_line1 = दृष्ट्वैवैनं जामदग्न्योऽप्यचिन्तयद् द्रोणं कर्तुं क्षितिभारापनोदे ।हेतुं सुराणां नरयोनिजानां हन्ता चायं स्यात् सह पुत्रेण चेति ॥ १२॥
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| | verse_line1 = तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च ।योग्या सुराणां कलिजा सुपापाः प्रायो यस्मात् कलिजाः सम्भवन्ति ॥ १३॥
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| | verse_line1 = न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः ।नाकारणात् सन्ततेरप्यभावो योग्यः सुराणां सदमोघरेतसाम् ॥ १४॥
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| | verse_line1 = अव्युच्छिन्ने सकलानां सुराणां तन्तौ कलिर्नो भविता कथञ्चित् ।तस्मादुत्साद्याः सर्व एते सुरांशा एतेन साकं तनयेन वीराः ॥ १५॥
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| | verse_line1 = एवं विचिन्त्याप्रतिमः स भार्गवो बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा ।अनन्तशक्तिः सकलेश्वरोऽपि त्यक्तं सर्वं नाद्य वित्तं ममास्ति ॥ १६॥
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| | verse_line1 = आत्मा विद्या शस्त्रमेतावदस्ति तेषां मध्ये रुचितं त्वं गृहाण ।उक्तः स इत्थं प्रविचिन्त्य विप्रो जगाद कस्त्वद्ग्रहणे समर्थः ॥ १७॥
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| | verse_line1 = सर्वेशिता सर्वपरः स्वतन्त्रस्त्वमेव कोऽन्यः सदृशस्तवेश ।स्वाम्यं तवेच्छन् प्रतियात्यधो हि यस्मान्न चोत्थातुमलं कदाचित् ॥ १८॥
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| | verse_line1 = सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)।विद्यैव देया भवता ततोऽज सर्वप्रकाशिन्यचला सुसूक्ष्मा ॥ १९॥
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| | verse_line1 = इतीरितस्तत्त्वविद्यादिकाः स विद्याः सर्वाः प्रददौ सास्त्रशस्त्राः ।अब्दद्विषट्केन समाप्य ताः स ययौ सखायं द्रुपदं महात्मा ॥ २०॥
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| | verse_line1 = दानेऽर्द्धराज्यस्य हि तत्प्रतिज्ञां संस्मृत्य पूर्वामुपयातं सखायम् ।सखा तवास्मीति तदोदितोऽपि जगाद वाक्यं द्रुपदोऽतिदर्पात् ॥ २१॥
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| | verse_line1 = न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् ।इतीरितस्याऽशु बभूव कोपो जितेन्द्रियस्यापि मुनेर्हरीच्छया ॥ २२॥
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| | verse_line1 = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् ।पितुः शिष्यो ह्यात्मशिष्यो भवेत शिष्यस्यार्थः स्वीय एवेति मत्वा ॥ २३॥
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| | verse_line1 = सोऽयं पापो मामवज्ञाय मूढो दुष्टं वचोऽश्रावयदस्य दर्पम् ।हनिष्य इत्येव मतिं निधाय ययौ कुरूञ्छिष्यतां नेतुमेतान् ॥ २४॥
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| | verse_line1 = प्रतिग्रहाद् विनिवृत्तस्य चार्थः स्याच्छिष्येभ्यः कौरवेभ्यो ममात्र ।एवं मन्वानः क्रीडतः पाण्डवेयान् सधार्तराष्ट्रान् पुरबाह्यतोऽख्यत् ॥ २५॥
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| | verse_line1 = विक्रीडतो धर्मसूनोस्तदैव सहाङ्गुलीयेन च कन्दुकोऽपतत् ।कूपे न शेकुः सहिताः कुमारा उद्धर्तुमेतं पवनात्मजोऽवदत् ॥ २६॥
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| | verse_line1 = निष्पत्य चोद्धृत्य समुत्पतिष्ये कूपादमुष्माद् भृशनीचादपि स्म ।सकन्दुकां मुद्रिकां पश्यताद्य सर्वे कुमारा इति वीर्यसंश्रयात् ॥ २७॥
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| | verse_line1 = तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् ।जाताः कुले भरतानां न वित्थ दिव्यानि चास्त्राणि सुरार्चितानि ॥ २८॥
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| | verse_line1 = इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) ।सम्प्रार्थयामासुरथोद्धृतिं प्रति प्रधानमुद्रायुतकन्दुकस्य ॥ २९॥
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| | verse_line1 = स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् ।उद्धृत्य मुद्रोद्धरणार्थिनः पुनर्जगाद भुक्तिर्मम कल्प्यतामिति ॥ ३०॥
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| | verse_line1 = यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् ।तथैव तेनोद्धृतमङ्गुलीयं त्रिवर्गमुख्यात्मजवाक्यतोऽनु ॥ ३१॥
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| | verse_line1 = पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः ।वक्तेति ते दुद्रुवुराशु भीष्मं द्रोणोऽयमित्येव स तांस्तदोचे ॥ ३२॥
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| | verse_line1 = न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः ।भीष्मो विद्यास्तेन सहैव चिन्तयन्नस्त्रप्राप्तिं तस्य शुश्राव रामात् ॥ ३३॥
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| | verse_line1 = न बुद्धिपूर्वं वर इन्दिरापतेरन्यत्र मे ग्राह्य इतश्च जिष्णुः ।करोतु गुर्वर्थमिति स्म चिन्तयन् भीमः प्रतिज्ञां न चकार तत्र ॥ ३८॥
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| | verse_line1 = तत्प्रेरितेनार्जुनेन प्रतिज्ञा कृता यदा विप्रवरस्ततः परम् ।स्नेहं नितान्तं सुरराजसूनौ कृत्वा महास्त्राणि ददौ स तस्य ॥ ३९॥
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| | verse_line1 = स पक्षपातं च चकार तस्मिन् करोति चास्योरुतरां प्रशंसाम् ।रहस्यविद्याश्च ददाति तस्य नान्यस्य कस्यापि तथा कथञ्चित् ॥ ४०॥
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| | verse_line1 = भीमः समस्तं प्रतिभाबलेन जानन् स्नेहं त्वद्वितीयं कनिष्ठे ।द्रोणस्य कृत्वा सकलास्त्रवेदिनं कर्तुं पार्थं नार्जुनवच्चकार ॥ ४१॥
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| | verse_line1 = कर्णोऽनवाप्य निजमीप्सितमुच्चमानो यस्मादवाप पुरुषोत्तमतोऽस्त्रवृन्दम् ।विप्रोऽप्ययं तमजमेमि भृगोः कुलोत्थमित्थं विचिन्त्य स ययौ भृगुपाश्रमाय ॥ ४७॥
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| | verse_line1 = स सर्ववेत्तुश्च विभोर्भयेन विप्रोऽहमित्यवददस्त्रवरातिलोभात् ।जानन्नपि प्रददावस्य रामो दिव्यान्यस्त्राण्यखिलान्यव्ययात्मा(अव्यथात्मा) ॥ ४८॥
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| | verse_line1 = अस्त्रज्ञचूळामणिमिन्द्रसूनुं विश्वस्य हन्तुं धृतराष्ट्रपुत्रः ।एनं समाश्रित्य दृढो भवेतेत्यदाज्ज्ञात्वैवास्त्रमस्मै रमेशः ॥ ४९॥
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| | verse_line1 = ज्ञानं च भागवतमप्यपराश्च विद्या रामादवाप्य विजयं धनुरग्र्ययानम् ।अब्दैश्चतुर्भिरथ च न्यवसत् तदन्ते हातुं न शक्त उरुगायमिमं स कर्णः ॥ ५०॥
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| | verse_line1 = तत्राऽस राक्षसवरः स तु हेतिनामा काले महेन्द्रमनुपास्य हि शापतोऽस्य ।कीटस्तमिन्द्र उत तत्र समाविवेश कर्णस्य शापमुपपादयितुं सुतार्थे ॥ ५२॥
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| | verse_line1 = कर्णः स कीटतनुगेन किरीटिनैव ह्यूरोरधस्तनत (ओपरिगात्वचः)औपरिगात्वचश्च ।विद्धः शरेण स यथा रुधिरस्य धारां सुस्राव तं विगतनिद्र इवाऽह रामः ॥ ५३॥
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| | verse_line1 = जात्याऽस्मि सूत उत ते तनयोऽस्मि सत्यं तेनास्मि विप्र इति भार्गववंशजोऽहम् ।अग्रेऽब्रुवं भवत ईश नहि त्वदन्यो माता पिता गुरुतरो जगतोऽपि मुख्यः ॥ ५५॥
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| | verse_line1 = अस्पर्धमानं न कथञ्चन त्वां जेता कश्चित् स्पर्धमानस्तु यासि ।पराभूतिं नात्र विचार्यमस्ति प्रमादी त्वं भविता चास्त्रसङ्घे (अस्त्रसङ्ख्ये)॥ ५८॥
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| | verse_line1 = याहीति तेनोक्त उदारकर्मणा कर्णो ययौ तं प्रणम्येशितारम् ।तथैकलव्योऽपि निराकृतोऽमुना द्रोणेन तस्य प्रतिमां वनेऽर्चयत् ॥ ५९॥
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| | verse_line1 = ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः ।अग्रे गच्छन् सारमेयो रुराव धर्मात्मजस्यात्र वने मृगार्थी ॥ ६०॥
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| | verse_line1 = पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः ।दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुमेतां च शिक्षां द्रोणं सदा पूजयति स्म भक्त्या ॥ ६३॥
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| | verse_line1 = तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै ।ततः परं नास्य बभूव शिक्षा सन्मुष्टिहीनस्य समाऽर्जुनेन ॥ ६५॥
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| | verse_line1 = पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै ।एकान्त एवास्य भक्त्या सुतुष्टो धन्विश्रेष्ठं कृतवानर्जुनं च ॥ ६६॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पञ्चदशोऽध्यायः
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| [[Category:Mahabharatatatparyanirnaya]] | |