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| == मैत्रेयीब्राह्मणम् ==
| | #REDIRECT [[Bruhadaranyaka#BR_C04_S05]] |
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| | verse_line1 = अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुः मैत्रेयी च कात्यायनी च । तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद् वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥
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| | verse_line1 = मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ २ ॥
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| | verse_line1 = सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां न्वहं तेनामृताऽहो नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यादमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ ३ ॥
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| | verse_line1 = सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेत्थ तदेव मे ब्रूहीति ॥ ४ ॥
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| | verse_line1 = स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियामवृद्धं तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥
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| प्रियां वाचमवर्धयद्भवती ॥
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| | verse_line1 = स होवाच न वा ओ पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा ओ जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा ओ पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा ओ वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा ओ पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा ओ ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा ओ क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा ओ लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति । न वा ओ वेदानां कामाय वेदाः प्रियाः भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा ओ भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा ओ सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा ओ द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥
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| | verse_line1 = ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद । लोकास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो लोकान् । वेद देवास्तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
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| | verse_line1 = स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दान् शक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
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| | verse_line1 = स यथा शंखस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शंखस्य तु ग्रहणेन शंखध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
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| | verse_line1 = स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥
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| | verse_line1 = स यथाऽऽर्द्रेन्धाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि इष्टं हुतमशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ११ ॥
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| | verse_line1 = स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तमेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् । स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा ओऽयमात्माऽनन्तरो बाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥
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| बाह्याभ्यन्तरविशेषाभावेन सर्वत्र लवणरसघन एव ।
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| न वा अहमिमं विजानातीति । ओयमिमं परमात्मानं जीवो न विजानातीत्यत्रैव भगवान् मोहान्तं मोहाख्यं नाशमापीपिपत् प्रापयामास । अतोऽहं ब्रह्मास्मीत्यादिष्वप्यहंशब्दोऽहेयत्ववाचीति सिद्धम् । अन्यथा कथमहं विजानातीति युज्येत ।
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| | verse_line1 = यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत् केन कं जिघ्रेत् केन कं रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते अशीर्यो न हि शीर्यते असंगो न हि सज्जते असितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनाऽसि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १४ ॥
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| ॥ इति मैत्रेयी ब्राह्मणम् ॥
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| ॥ इति मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ६५ ॥
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| एतावद्विज्ञातुः परमात्मनो विज्ञानादिकमेव ह्यमृतत्वं मोक्षः ।
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| विष्णोर्ज्ञानादिकं मोक्षस्तदभावे कुतः सुखम् ।
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| ज्ञेयाभावान्न हि ज्ञानं ज्ञानाभावे हि शून्यता ।
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| तस्माज्ज्ञेययुतो मोक्षः सुखरूपत्वतः सदा ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥
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