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| == षोडशोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S16]] |
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| | verse_line1 = अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वरः ।
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| | verse_line2 = अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्भवाप्ययः ॥ ९ ॥
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| |
| 'सृष्टिस्थित्यादिहेतुत्वाद्भूतानि हरिरुच्यते ।
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| न तु भूतस्वरूपत्वात्स हि सर्वेश्वरेश्वरः''॥ इति वस्तुतत्त्वे ॥ ९ ॥
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| | verse_line1 = अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम् ।
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| | verse_line2 = गुणानामप्यहं सौम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुणः ॥ १० ॥
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| | verse_line1 = गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम् । सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः ॥ ११ ॥
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| |
| 'स्वस्वजात्युत्तमत्वं तु भवेद्यद्रूपसन्निधेः ।
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| विभूतिरूपं तत्प्रोक्तमिन्दिरादिषु संस्थितम् ॥
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| तथा बहिः स्थितं रूपं विभूतीत्येव शब्दितम् ।
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| सर्वसाधारणं रूपमन्तर्यामीति चोच्यते ॥
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| यथा कृष्णात्मना दुष्टहन्ता व्यासात्मना समः ।
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| असमोऽप्येकरूपोऽपि सामर्थ्यात्पुरुषोत्तमः''॥ इति च ॥
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| 'ब््राह्मरुद्रेन्द्रजीवेभ्यः पृथगेव व्यवस्थितम् ।
| |
| विभूतिरूपं विष्णोस्तु तद्गश्रेष्ठ्यैककारणम् ॥
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| तदेव ब््राह्मरुद्रादिनामभिर्वाच्यमञ्जसा ।
| |
| तदेव देवेष्विन्द्रोऽस्मि तथा रुद्रेषु शङ्करः ॥
| |
| इत्यादिनोक्तं कृष्णेन नेन्द्राद्या जीवसञ्चयाः''॥ इति गीताकल्पे ॥
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| गतिः ज्ञानम् ।
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| 'प्रधानो ज्ञानिनां ब््राह्मा ज्ञानमानी हृदि स्थितः ।
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| स एव कालमानी तु संहर्तॄणां प्रभुः स्मृतः''॥ इति विभूतौ ॥
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| 'आनन्दानुभवस्तूम उत्कृष्टानुभवात्स्मृतः ।
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| तद्युक्तत्वं तथा सौम्यं गुणानामधिकं हि तत् ॥
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| भक्त्यादिगुणपूगोऽपि दुःखहेतुत्वभावनात् ।
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| निष्फलो भवति ह्यद्धा प्रीतस्य सफलो भवेत् ॥
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| तस्मादानन्दमानं तु गुणेषूत्कृष्टमुच्यते ।
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| तस्याभिमानी ब््राह्मैको भक्तिज्ञानादिकस्यः च ॥
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| श्रद्धाभिमानिनी देवी तथैव तु सरस्वती ।
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| तदन्येषां गुणानां तु तदन्ये विबुधाः स्मृताः ॥
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| गुणानां तु प्रभुबर्््राह्मा तस्मादेकश्चतुर्मुखः ।
| |
| औत्पत्तिकगुणो नाम शुभप्राप्त्यैकयोग्यता ॥
| |
| तस्याभिमानी प्राणस्तु स हि सर्वगुणाधिकः''॥ इति च ।
| |
| गुणिनां मध्ये गुणिनि स्थितमौत्पत्तिकगुणरूपं सूत्रमित्यर्थः ।
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| 'गुणिनां गुणयोग्यत्वं यत्सर्वगुणिषु स्थितम् ।
| |
| वायुस्तदभिमान्येकः सर्वगुण्यधिकस्ततः''॥ इति प्रभञ्जने ।
| |
| रूपान्तरत्वादेकस्यापि बहुस्थानेषु प्राधान्योक्तिर्नो विरुध्यते । गुणान्तरोक्तेश्च 'रामः शस्त्रभृतां वृष्णीनां वासुदेव''इत्यादिवत् ॥ १०,११ ॥
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| | verse_line1 = हिरण्यगर्भो देवानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत् ।
| |
| | verse_line2 = अक्षराणामकारोऽस्मि पदानि च्छन्दसामहम् ॥ १२ ॥
| |
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| | text =
| |
| पदानि वाच्यानि छन्दसाम् ।
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| 'स्वयूथानामथाधिक्ये स्वजातीनामथापि वा ।
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| यत्कारणं विभूत्याख्यं विष्णोस्तद्रूपमुच्यते''॥ इति प्राधान्ये ॥
| |
| 'वर्णेशानि पदान्याहुः पादाश्चापि तदीश्वराः ।
| |
| पादानामीश्वरार्धर्चा तदीशा ऋच एव च ॥
| |
| ऋचामधीशा वर्गाश्च तेषां सूक्तमधीश्वरम् ।
| |
| सूक्ताधीशास्तथाध्यायास्तदधीशास्तथाष्टकाः ॥
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| तदधीशास्तथा शाखा वेदाश्चापि तदीश्वराः ।
| |
| वेदानामीश्वरा वाच्या वाच्यानामीश्वरो हरिः ॥
| |
| न हरेरीश्वरः कश्चित्कदाचित्क्वापि विद्यते''इति च ॥
| |
| पद्यन्त इति पदानि वाच्यानि । 'पदं पदसहस्रेण यश्चरन्नापराध्यते''इतिवत् ।
| |
| 'पदं तु वाचकं प्रोक्तं क्वचिद्वाच्यमपीष्यते''॥ इति शब्दनिर्णये ॥
| |
| 'सर्ववेदाभिमानिन्यो देव्यो लक्ष्मीस्ततोऽधिका ।
| |
| वेदाभिमानिनी साक्षात्सा विष्णोर्दूरतः स्थिता ॥
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| यज्ञाख्या सैव विष्णोस्तु या तूरःस्थलमाश्रिता ।
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| हरिणा रतियोगस्था दक्षिणाख्यापि सैव तु ॥
| |
| उत्तरोत्तरतः साऽपि विशिष्टा दक्षिणा सुखे ।
| |
| एवं वेदाभिमानिभ्यो देवीभ्यः सर्व एव तु ॥
| |
| तदर्थरूपाः पतयस्तस्यास्तस्यास्तथोत्तमाः ।
| |
| शच्या इन्द्रस्ततश्चोमा तस्या रुद्रस्ततस्तथा ॥
| |
| भारती प्राण एवास्यास्ततः श्रीस्तद्वरो हरिः''॥ इति वैशेष्ये ॥ १२ ॥
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| | verse_line1 = इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट् ।
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| | verse_line2 = आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहितः ॥ १३ ॥
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| | verse_line1 = उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम् ।
| |
| | verse_line2 = यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १८ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'ऋते रुद्रादिकानिन्द्रः सर्वदेवाधिकः स्मृतः ।
| |
| ऋते भीमं फाल्गुनश्च पाण्डवेभ्यो वरस्तथा ॥
| |
| तथा शुक्रः कवीशस्तु बृहस्पत्यादिकानृते ।
| |
| यमः संयमतामीशः शङ्करादीन्विनैव तु''॥ इति गीताकल्पे ॥ १३,१८ ॥
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| | verse_line1 = नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृङ्गिदंष्ट्रिणाम् ।
| |
| | verse_line2 = आश्रमाणां तुरीयोऽहं वर्णानां प्रथमोऽनघ ॥१९॥
| |
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| }}
| |
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| | text =
| |
| 'गार्हस्थ्यं च यतित्वं च देवेष्वेकत्वमागतम् ।
| |
| प्राधान्योक्तिर्यतित्वस्य गार्हस्थ्यस्य क्वचित्क्वचित्''॥ इत्याश्रमविवेके ॥ १९ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब््राह्मिष्ठानां बृहस्पतिः ।
| |
| | verse_line2 = स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग््राण्यां भगवानजः ॥ २२ ॥
| |
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| 'वसिष्ठोऽभ्यधिकस्तेषु मानुषाणां पुरोधसाम्''॥ इति त्रैकाल्ये ॥
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| | verse_line1 = योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम् ।
| |
| | verse_line2 = आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्पः ख्यातिवादिनाम् ॥ २४ ॥
| |
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| |
| जीवेशादिभेदवादी विकल्पः । ख्यातिवादिनां ज्ञानवादिनाम् ।
| |
| 'जीवेशादिविशेषं यो याथार्थ्येन प्रकल्पयेत् ।
| |
| कलिमारभ्य चाविष्णोराधिक्यादुत्तरोत्तरम् ॥
| |
| नियमेनैव केनापि न हेयः स विकल्पकः ।
| |
| सर्वज्ञानिविशेषेभ्यः स ज्ञानी सर्वथाऽधिकः''॥ इति विज्ञाने ॥
| |
| 'भेददृष्ट्याऽभिमानेन''। इत्युक्तम् । 'विद्याऽऽत्मनि भिदा बोधः''इति च वक्ष्यति ॥ २४ ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = स्त्रीणां तु शतरूपाऽहं पुंसां स्वायम्भुवो मनुः ।
| |
| | verse_line2 = नारायणो मुनीनां च कुमारो ब््राह्मचारिणाम् ॥ २५ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'शतरूपा वरा स्त्रीणां पुंसामभ्यधिको मनुः ।
| |
| तयोरप्यधिकौ नित्यमिन्द्राणीन्द्रौ शुभैर्गुणैः''॥ इति वैशेष्ये ॥२५॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम् ।
| |
| | verse_line2 = किम्पुरुषाणां च हनुमान् विद्याध््र•णां सुदर्शनः ॥ २९ ॥
| |
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| |
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| |
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| | verse_id = BTN_C11_S16_V29
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| | id = BTN_C11_S16_V29_B1
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| | text =
| |
| 'ऐश्वर्यादिगुणैः षड्भिः सामग्य््र•त्सर्वदेवताः ।
| |
| भगवच्छब्दवाच्याश्च साक्षात्तु भगवान्हरिः ॥
| |
| निरपेक्षं तु सामग्य््रां तस्य सर्वाधिकं यतः''॥ इति च ।
| |
| अतो भगवतां देवानाम् ।
| |
| 'सर्वभागवताधीश उद्धवो भगवत्प््रिायः ।
| |
| तस्मादभ्यधिको जिष्णुः प््रिायत्वे भक्तितो हरेः ॥
| |
| तस्मादभ्यधिको रामः कृष्णा त्वभ्यधिका ततः ।
| |
| तस्या अभ्यधिको भीमो न तु तत्सदृशः क्वचित्''॥ इति च ।
| |
| 'यत्किञ्चाऽत्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव ।
| |
| सहस्रगुणमप्येतत्त्वयि सम्भावयाम्यहम् ॥
| |
| धर्मो ज्ञानं तथा मोक्षो यशः कीर्तिस्तथैव च ।
| |
| त्वय्यायत्तमिदं सर्वं लोकस्यापि न संशयः''॥ इति भारते ॥ २९ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = ओजः सहोबलवतां कर्माहं विद्धि सात्वताम् ।
| |
| | verse_line2 = सात्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं पुरा ॥ ३२ ॥
| |
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| }}
| |
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| | text =
| |
| 'विष्णोः श्रियो ब््राह्मणश्च वायोः सङ्कर्षणस्य च ।
| |
| सुपर्णस्य च सम्प्रोक्ताः प्रत्येकं नवमूर्तयः ॥
| |
| पूज्याः सात्वततन्त्रेषु तत्राद्या मूर्तयो हरेः ।
| |
| प्रधानास्ता हि सर्वासां मूर्तीनां हरिमूर्तयः ॥
| |
| अभेदादेव मूर्तीनामेकमूर्तिश्च सा स्मृता''॥ इति सहस्रावरणे ।
| |
| श्रियादिनवमूर्तीनां मध्ये स्वकीयनवमूर्तिरहमित्यर्थः ।
| |
| 'स्वरूपतश्च गुणतो न विशेषः कथञ्चन ।
| |
| विष्णोस्तु नवमूर्तीनां पूजा च नवधेष्यते''॥ इति च ।
| |
| अतो न स्वनवमूर्तीनाम् । अन्येभ्योऽन्यनवमूर्तीनामपि प्राधान्यकारणं सन्निधानमात्मनस्तास्वप्यस्तीति पुरेतिविशेषणम् । प्रथमपूज्यास्ता इत्यर्थः।
| |
| 'नारायणः परं ब््राह्म वासुदेवादिकास्तथा ।
| |
| नरसिंहवराहौ च परञ्ज्योतिर्हरेर्नव ॥
| |
| इन्दिरा च रमा लक्ष्मीर्हिरण्या गगना तथा ।
| |
| रक्ता रक्ततरा भूतिर्विभूतिश्च श्रियो नव ॥
| |
| ब््राह्मा चतुर्मुखो धाता विधाता विधिरेव च ।
| |
| कर्ता विरिञ्चो भूतेशः शतानन्दश्च ता नव ॥
| |
| धनञ्जयमृते चैव वायोस्तु नवमूर्तयः ।
| |
| शेषोऽनन्तो नरश्चैव लक्ष्मणो बल एव च ॥
| |
| सङ्कर्षणो नीलवासा जगद्रक्षो जलेशयः ।
| |
| सुपर्णो गरुडश्चैव वैनतेयो महाशनः ॥
| |
| नववर्णः पञ्चवर्णः पन्नगाशोऽमृताकरः ।
| |
| तथैव सर्ववेदात्मा सुपर्णो नवधा स्मृतः''॥ इति च ॥ ३२ ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_line1 = विश्वावसुः पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम् ।
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| | verse_line2 = भूधराणामहं स्थैर्यं गन्धमात्रमहं भुवः ॥ ३३ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसुः ।
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| | verse_line2 = प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोऽहं नभसः परः ॥ ३४ ॥
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| |
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| |
| 'यस्य यस्य स्वभावो यस्तत्तन्नामा हरिः परः ।
| |
| नियामकः स्वभावस्य तत्तच्छब्दादिनामवान् ॥
| |
| वैशेष्याख्या विभूतिश्च विभूतिश्च स्वभावजा ।
| |
| द्विधा विभूतिर्विज्ञेया विष्णोस्तु परमात्मनः''॥ इति च ॥३३,३४॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान् ।
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| | verse_line2 = विकारः पुरुषोऽव्यक्तं रजः सत्वं तमः परः । अहमेतत्प्रसङ्ख्यानं ज्ञानं तत्वविनिश्चयः ॥ ३७ ॥
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| | verse_line1 = मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना ।
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| | verse_line2 = सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित् ॥ ३८ ॥
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| |
| 'सत्वादिनाम विष्णोस्तु सत्वादिस्थस्य केवलम् ।
| |
| जीवस्थस्य च तन्नाम जीवादेरुपचारतः''॥ इति च ॥ ३७,३८ ॥
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| | verse_line1 = सङ्ख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया ।
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| | verse_line2 = न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ ३९ ॥
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| |
| कालेन सर्वगुणात्मकेन मया । असङ्ख्यत्वात्तथा न क्रियते । नाविज्ञानात् ।
| |
| 'अनन्तमिति वेत्तीशस्त्वनन्तं त्वन्तवत्तथा ।
| |
| अनन्तस्य हि सङ्ख्याने न तु सर्वज्ञता भवेत् ॥
| |
| अनन्तमपि वेत्तीशः प्रत्येकं च विशेषतः ।
| |
| सर्वज्ञत्वान्न सङ्ख्यानमसङ्ख्यस्य कुतो हि सा''॥ इति च ॥ ३९ ॥
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| | verse_line1 = एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः ।
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| यथा वाचाऽभिधीयते अन्यैः । नामादिकं जीवादीनां ते सर्वे शब्दा मनोविकाराः ॥ स्वतो मय्येव सर्वशब्दास्तस्मान्मय्येव वाचं यच्छ । आत्मानं परमात्मानं मय्येव लक्ष्यत्वेन यच्छ ॥ ४१,४२ ॥
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| | verse_line1 = यो वै वाङ्मनसी सम्यङ् न संयच्छेद् धिया यतिः ।
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| | verse_line2 = तस्य व््रातं तपो ज्ञानं स्रवत्यामघटाम्बुवत् ॥ ४३ ॥
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| | verse_line1 = तस्माद् वचोमनःप्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः ।
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| | verse_line2 = मद्भक्तियुक्तया बुद्ध्या ततः परिसमाप्यते ॥ ४४ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥
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| यो मयि न संयच्छति । तस्य ज्ञानं स्रवति ॥
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| वाङ्मनः प्राणबुध्द्यादीन्नियच्छेत्केशवे परे ।21
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| सर्वशब्दाभिधेयत्वं तस्य ज्ञात्वा विशेषतः ॥
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| मुख्यवृत्त्याऽभिधेयत्वमन्येषां मनसो भ््रामात् ।
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| तस्मात्तथा चिन्तयतः स्रवेज्ज्ञानं यथातथम् ॥
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| तस्मान्मनोवचःप्राणान्माधवैकपरायणान् ।
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| कुर्यात्तद्धि तपो ह्यग््रयं महाधर्मोत्तमश्च सः''॥ इति धर्मविवेके ॥
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| 'यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
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| ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि''॥ इति च ॥४३,४४॥
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