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| == सप्तमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S07]] |
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| | verse_line1 = यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः ।
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| | verse_line2 = नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायां मनोमयीम् ॥ ७ ॥
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| विद्धि मायां मनोमयीम् । मन्मनःप्रधानप्रकृतिनिर्मिताम् ।
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| 'प्रकृतिः सा परा मह्यं रोदसी लोकधारिणी ।
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| ऋता सत्याऽमराऽजय्या लोकानामात्मसञ्ज्ञिता''॥ इति मोक्षधर्मेषु ॥ ७ ॥
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| | verse_line1 = पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थे भ््रामः स गुणदोषकृत् ।
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| | verse_line2 = कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥
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| 'स्वर्गाद्याश्च गुणाः सर्वे दोषाः सर्वे तथैव च ।
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| आत्मनः कर्तृताभ््र•न्त्या जायन्ते नात्र संशयः ॥
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| परमात्मानमेवैकं कर्तारं वेत्ति यः पुमान् ।
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| स मुच्यतेऽस्मात् संसारात्परमात्मानमेति च''॥ इति भारते ॥
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| इदं मया क्रियते, इदं मया न क्रियते, इदं मया विपरीतं क्रियत इति बुद्धिभेदो रजस्तमोगुणनिमित्तो भ््रामः । सर्वं हि परमेश्वरः करोति ॥८॥
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| | verse_line1 = तस्माद् युक्तेन्द्रियग््र•मो युक्तचित्त इदं जगत् ।
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| | verse_line2 = आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥
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| | text =
| |
| 'आत्मशब्दोदितो ब््राह्मा परमात्माऽभिधो ह्यहम् ।
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| सर्वं ब््राह्मणि वीक्षेत मयि ब््राह्माणमेव च''॥ इति कालसंहितायाम् ॥ ९ ॥
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| | verse_line1 = ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम् ।
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| | verse_line2 = आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यते ॥ १० ॥
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| |
| 'आत्मभूतः आत्मवद्भूतः ।
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| आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन''॥ इति वचनात् ॥ १० ॥
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| | verse_line1 = दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्न निवर्तते ।
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| | verse_line2 = गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथाऽर्भकः ॥ ११ ॥
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| | verse_line1 = सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चलः ।
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| | verse_line2 = पश्यन् मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः ॥ १२ ॥
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| |
| 'कर्तृत्वमात्मनो यस्माज्ज्ञाननिष्ठो न मन्यते ।
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| अतोऽकुर्वन्नपि सदा दोषबुध्द्या न निन्दितम् ॥
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| गुणबुद्ध्या न विहितं किन्त्वीशप््रोरितोऽस्म्यहम् ।
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| स एव च मयि स्थित्वा निन्द्यानिन्द्ये करोत्यजः ॥
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| न मे दोषो न च गुणः कर्तृत्वाभावतः स्फुटम् ।
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| स्वतन्त्रत्वान्न चेशस्य येऽज्ञास्तेषु भवेदपि ॥
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| इति मत्वा निवर्तेत निन्द्यात्कुर्याद्गुणानपि''॥ इति बोद्धव्ये ॥
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| 'अनित्या मे गुणा न स्युर्दोषा नैव कथञ्चन ।
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| इति मत्वा शुभं कुर्यान्निवर्तेदशुभादपि ॥
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| ज्ञानी त्वकर्तृतामानादीशकर्तृत्वनिश्चयात् ।
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| किन्तु पूर्णगुणायैव न तु दोषापनुत्तये ॥
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| न चाल्पगुणसिद्ध्यर्थं बालवत्कृतनिश्चयः''॥ इति वैशारद्ये ॥
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| 'वैलक्षण्याद्धरेर्भिन्नं तत्तन्त्रत्वात्तदात्मकम् ।
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| इति विश्वं प्रपश्यन्ति ज्ञाननिष्ठा हरेः प््रिायाः''॥ इति सार्वज्ञ्ये ॥ ११,१२ ॥
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| | verse_line1 = उद्धव उवाच– योगेश योगविन्यास योगात्मन् योगसम्भव । निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षणः ॥ १४ ॥
| |
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| |
| योगो देवादिषु तेन न्यस्त इति योगविन्यासः ।
| |
| 'ज्ञानं तु योगशब्दोक्तं युज्यतेऽनेन यत्सुखम् ।
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| क्वचिद्योग उपायः स्यात्क्वचिच्चित्तनिरोधनम्''॥ इति दत्तात्रेययोगे ॥
| |
| अत्र ज्ञानमुपायश्च ॥ १४ ॥
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| | verse_line1 = सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे । सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब््राह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः ॥ १७ ॥
| |
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| |
| अभगवत्स्वरूपत्वात्तनुभृत्त्वम् । बहिरर्थापेक्षयैव च तेषां मोहः । परमसुख-साधनादन्योऽर्थो बहिरर्थः ।
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| 'अशरीरः सदा विष्णुः पूर्णानन्दत्वतः सदा ।
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| इच्छा च क्रीडयैवास्य न फलाय यतो विभोः ॥
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| अतो बाह्यार्थकामोऽपि निष्काम इति कथ्यते ।
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| ब््राह्मा निरभिमानत्वाच्छरीर्यप्यशरीरवान् ॥
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| नित्यानन्दोपयोग्यन्यकामस्योज्झितितः सदा ।
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| बहिरर्थविनिर्मुक्तस्तथापि तनुधारणात् ॥
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| अमूढो मूढ इतिवदुच्यते च सरस्वती ।
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| रुद्राद्यास्तन्वभीमानाद्बहिरर्थयुजस्तथा ॥
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| सर्वेषां ब््राह्मपदवीयोग्यानां पूर्वमेव तु ।
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| अभावस्त्वपरोक्षस्य मोहो ज्ञानस्य भण्यते ॥
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| ब््राह्मणस्त्वंशरूपेषु भारत्या ज्ञानवर्जनम् ।
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| ब््राह्मगायत्रिभावे तु नांशावतरणं क्वचित् ॥
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| शतजन्मसु पूर्वं तु ज्ञानोदय उदीर्यते ।
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| आपरोक्ष्येण पारोक्ष्यात्पूर्णज्ञानं सदैव तु ॥
| |
| शतजन्मगतायाश्च आपरोक्ष्योज्झितिर्भवेत् ।
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| क्वचित्क्वचित्सरस्वत्यामंशावतरणेष्विति''॥ इति शक्तिविवेके ॥
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| 'अशरीरो वायुरभ््रां विद्युत्स्तनयित्नुरशरीराणि वा एतानि''॥ इति च श्रुतिः।
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| 'श्रुतिभिस्तनितत्वात्तु स्तनयित्नुर्हरिः स्मृतः ।
| |
| अभ््रां भूतानि भरणाच्छ्रीर्वायुर्भरतः स्मृतः ॥
| |
| विद्युत्तु भारती प्रोक्ता एत एवाशरीरिणः ।
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| व्यत्यासेनापि नाम स्यादेतेषां महतां सदा''॥ इत्युभयनिरुक्ते ॥१७॥
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| | verse_line1 = तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं सर्वज्ञमीश्वरमखण्डविकुण्ठधिष्ण्यम् । निर्वेदधीरहरहर्वृजिनाभितप्तो नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥
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| |
| 'विष्णोर्वायोरनन्तस्य त्रिभिरंशैर्नरः स्मृतः ।
| |
| सेन्द्रैश्चतुर्भिः पार्थस्तु द्वाभ्यां तु बललक्ष्मणौ''॥ इत्यंशविवेके ॥१८॥
| |
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| | verse_line1 = श्री भगवानुवाच– प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्वविचक्षणाः । समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९ ॥
| |
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| |
| लोके तत्त्वे च विचक्षणाः ।
| |
| 'पारोक्ष्येणैव तत्त्वं तु लोकं चापि विदन्ति ये ।
| |
| तेऽपि सत्स्नेहनिर्मुक्तास्तमो यान्ति विनिश्चयात् ॥
| |
| आपरोक्ष्यान्न च ज्ञानं तेषामुत्पद्यते क्वचित्''॥ इति षाड्गुण्ये ॥१९॥
| |
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| | verse_line1 = त्वं हि नः पृच्छतां ब््राह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम् ।
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| | verse_line2 = ब््राूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः ॥ ३० ॥
| |
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| |
| केवलात्मनः शरीरमात्रपरिग््राहस्य ॥ ३० ॥
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| | verse_line1 = शश्वत् परार्थसर्वेहां परार्थैकान्तसम्भवम् ।
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| | verse_line2 = साधुः शिक्षेत भूमेश्च अनुशिक्षं व््रातान्तरम् ॥ ३८ ॥
| |
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| |
| परार्थैकान्तसम्भवम् । आत्मनो वृद्धिश्च परार्थेति ।
| |
| 'सज्जनार्थेऽनुमन्येत ऐहिकीं वृद्धिमात्मनः ।
| |
| पारत्रिकीमैहिकीं च प्रीतये गुरुदेवयोः ॥
| |
| देवतानां च सर्वेषां स्वोत्तमानां च सर्वशः''॥ इति च ॥ ३८ ॥
| |
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| | verse_line1 = अन्तर्बहिश्च स्थिरजङ्गमेषु ब््राह्मात्मभावेन समन्वयेन । व्याप्त्याऽव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभोवद् विततस्य भावयेत् ॥ ४२ ॥
| |
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| |
| 'जीवान्तर्यामको विष्णुरात्मनामा समीरितः ।
| |
| तस्य तु ब््राह्मरूपत्वाद्बहिरन्तस्तथैव च ।
| |
| पश्येदाकाशवद्व्याप्तिमसङ्गत्वं च नित्यशः''॥ इति तन्त्रभागवते ॥ ४२ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः ।
| |
| | verse_line2 = न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान् ॥ ४३ ॥
| |
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| |
| 'गुणान्जीवस्य चेष्टव्यान्सिद्धान्विष्णोर्गुणांस्तथा ।
| |
| तत्तद्दृष्ट्या विचिन्वीत पृथगेव सुधीः सदा''॥ इति लोकतत्त्वे ॥ ४३ ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थवन्नृणाम् ।
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| | verse_line2 = मुनिः पुनात्यघान्मित्रमीक्षणस्पर्शकीर्तनैः ॥ ४४ ॥
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| |
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| |
| 'मधुनाम सुखं विन्द्यान्माधुर्यं सुखहेतुता ।
| |
| सुखे रतिर्वां सम्प्रोक्ता शब्दतत्त्वविचक्षणैः''॥ इति शब्दनिर्णये ॥४४॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षो दूरभाजनः ।
| |
| | verse_line2 = सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते पापमग्निवत् ॥ ४५ ॥
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| | text =
| |
| दूरत एव भजनीयः ।
| |
| 'पराभवो धर्षणं स्यादवज्ञानमथापि वा ।
| |
| न तत्सत्सु सदा कुर्यात्सह शय्यासनं न च''इति सद्गुणे ॥ ४५ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = क्वचिच्छन्नः क्वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम् ।
| |
| | verse_line2 = भुङ्क्त्े सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥
| |
| }}
| |
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| |
| | verse_line1 = स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः ।
| |
| | verse_line2 = प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७ ॥
| |
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| }}
| |
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| |
| | text =
| |
| 'जीवस्य छन्नतां शिक्षेत्प्रविष्टत्वं परात्मनः ।
| |
| तत्तद्गुणविडम्बं च वह्नेः सर्वमथापि वा ॥
| |
| अल्पदारौ यथाऽल्पोऽग्निरेवमल्पशरीरगः ।
| |
| दृश्यते परमात्माऽपि स्थूलः स्थूलशरीरगः''॥ इति वैभवे ॥ ४६,४७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = कालनद्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ ।
| |
| | verse_line2 = नित्यावपि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथाऽर्चिषाम् ॥ ४९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_id = BTN_C11_S07_V49
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| | id = BTN_C11_S06_V49_B1
| |
| | text =
| |
| 'अवयव्यवयवानां च गुणानां गुणिनस्तथा ।
| |
| शक्तिशक्तिमतोश्चैव क्रियायास्तद्वतस्तथा ॥
| |
| स्वरूपांशांशिनोश्चैव नित्याभेदो जनार्दने ।
| |
| जीवस्वरूपेषु तथा तथैव प्रकृतावपि ॥
| |
| चिद्रूपायामतोऽनंशा अगुणा अक्रिया इति ।
| |
| हीना अवयवैश्चेति कथ्यन्ते तेऽत्यभेदतः ॥
| |
| पृथग्गुणाद्यभावाच्च नित्यत्वादुभयोरपि ।
| |
| विष्णोरचिन्त्यशक्तेश्च सर्वं सम्भवति ध््राुवम् ॥
| |
| क्रियादेरपि नित्यत्वं व्यक्त्यव्यक्तिविशेषणम् ।
| |
| भावाभावविशेषेण व्यवहारश्च तादृशः ॥
| |
| विशेषस्य विशिष्टस्याप्यभेदस्तद्वदेव तु ।
| |
| सर्वं चाचिन्त्यशक्तित्वाद्युज्यते परमेश्वरे ॥
| |
| तच्छक्त्यैव तु जीवेषु चिद्रूपप्रकृतावपि ।
| |
| भेदाभेदौ तदन्यत्र ह्युभयोरपि दर्शनात् ॥
| |
| कार्यकारणयोश्चापि निमित्तं कारणं विना''॥ इति ब््राह्मतर्के ।
| |
| 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि''।
| |
| 'सर्वोपेता च तद्दर्शनात्''।
| |
| 'सर्वधर्मो-पपत्तेश्च''।
| |
| 'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च''।
| |
| 'यत्रा सप्त ऋषीन्पर एकमाहुः''॥ इत्यादेश्च ॥
| |
| 'विना दोषांच्छ्रुतमद्धाऽवगम्यं तथा स्मृतं परमे सत्यरूपम् ।
| |
| नैवासत्यं क्वचिदस्मिन्परेशे सर्वं युक्तं पूर्णशक्तेः सदैव''॥ इति च विश्वम्भरश्रुतिः ।
| |
| तस्मादेकस्मिन्नपि शरीरे भेदाभेदात्प्रभवाप्ययौ युज्येते । न च विरोधः । स्थूलसूक्ष्मवत् । आपेक्षिकमत्रापि युज्यते ॥ ४९ ॥
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| | verse_line1 = बुद्धिसंस्थेन भेदेन व्यक्तस्थ इव तद्गतः ।
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| | verse_line2 = लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चाम्बुस्थितार्कवत् ॥ ५१ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥
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| 'बुद्धिसंस्थस्त्वात्मभेदो व्यक्तस्थो जीव उच्यते ।
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| तेनैव सह संस्थानात्परात्मा स्थूलबुद्धिभिः ॥
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| जीववल्लक्ष्यते विष्णुर्यथैवाम्बुस्थितार्कवत् ।
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| परमार्कः पारिमाण्डिल्याद्वर्तुलत्वादिना तथा ।
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| अर्कस्वरूपानभिज्ञैः शिरः पादादिवर्जितः ।
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| अचेतनश्च कल्प्येत तत्तेजोमात्रदर्शिभिः ।
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| सूर्यदेहादिभिन्नं हि तेजोमण्डलमेव तु ।
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| दृश्यते स्थूलमतिभिरेवमेव जनार्दनः''॥ इति प्रभासके ॥ ५१ ॥
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