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| == प्रथमोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C10_S01]] |
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| | verse_line1 = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं
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| | verse_line2 = मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।
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| | verse_line3 = दृष्टश्रुताभ्यां मनसाऽनुचिन्तयन्
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| | verse_line4 = प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः ॥ ४१ ॥
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| स्वप्ने यथा दृष्टश्रुतस्मृत्यनुसारि देहं प्राप्नोति । अपस्मृतिर्मृतः । पूर्वदेह-स्मरणाभावात् । अनभिमानतः ॥ ४१ ॥
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| | verse_line1 = यतो यतो धावति दैवचोदितं
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| | verse_line2 = मनो विकारात्मकमात्मपञ्चसु ।
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| | verse_line3 = गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ
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| | verse_line4 = प्रपद्यमानः सह तेन जायते ॥ ४२ ॥
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| यतो यतः । यत्र यत्र मनो धावत्यात्मपञ्चानां मध्ये तत्र तत्र तेन दैवेन सह जायते गुणानुबद्धः सन् ।
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| 'दैवगान्धर्वपित्र्येषु मानुषेष्वासुरेषु च ।
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| यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्रोपजायते ॥
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| स्वगुणस्यानुसारेण सत्वादिविनिबन्धनः''॥ इति गारुडे ।
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| 'देवादित्वं योग्यतया तत्सकाशस्त्वनुस्मृतेः ।
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| श्वेतद्वीपादि तत्रापि योग्यतामप्यपेक्ष्य तु ॥
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| विष्णोः स्थानं विनाऽन्यत्र वायुशक्रादिनामपि ।
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| त्रैलोक्यदेशभेदेषु योग्यता न त्वपेक्षिता''॥ इति नारदीये ॥ ४२ ॥
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| | verse_line1 = ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः
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| | verse_line2 = समीरवेगानुगतं विभाव्यते ।
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| | verse_line3 = एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्
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| | verse_line1 = तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः ।
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| | verse_line2 = आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम् ॥ ४४ ॥
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| विभाव्यते विविधं भाव्यते । स्वमायारचितेषु विष्णुमायारचितेषु । रागानुगतः पुमान् जीवो विविधं मुह्यति ।
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| 'यथैवोदशरावेषु सूर्यादिः प्रतिबिम्बितः ।
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| वायुना चलितो भाति छिन्नभिन्नादिरूपवान् ॥
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| एवं विष्ण्विच्छया जातगुणेषु प्रतिबिम्बितः ।
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| छिन्नो भिन्नो मृतोऽस्मीति बहुधा प्रतिपद्यते ॥
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| तदेव च दृढीभूत उदके निःशरावके ।
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| छेदभेदादि नाप्नोति निश्चलं प्रतिबिम्बितम् ॥
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| एवं गुणैर्विमुक्तस्तु जीवो नाप्नोति दुःखिताम् ।
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| शराववद्गुणाः प्रोक्ता अज्ञानं तु द्रवत्ववत् ॥
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| दृढीभूतोदवज्जीवस्तज्ज्ञानं प्रतिबिम्बवत् ।
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| नित्यान्तःकरणं चैव प्रतिबिम्बश्च तद्गतः ॥
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| द्वयमेव विमुक्तस्य न किञ्चिज्जडमिष्यते ।
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| सूर्यकान्तादिवत्तस्य स्वरूपं द्वयमप्युत ॥
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| तस्मान्न हन्तुं शक्योऽसौ केनचिज्जीव आत्मवान् ।
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| तस्मात्स्वजीवनार्थाय न परद्रोहमाचरेत् ॥
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| हन्यते चाज्ञभावेन परेषां द्रोहमाचरन्''॥ इति तन्त्रभागवते ॥
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| 'परः स्वो हरिरुद्दाम इति नामचतुष्टयम् ।
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| विष्णोर्गुह्यं तु यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते''॥ इति प्रकाशिकायाम् ॥
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| 'स्वतन्त्रत्वात्सुखत्वाच्च स्वनामा विष्णुरुच्यते''इति पाद्मे ॥ ४३,४४ ॥
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| | verse_line1 = अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-
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| | verse_line2 = रदृष्टतोऽन्यन्न निमित्तमस्ति ।
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| | verse_line3 = एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्यः
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| | verse_line4 = शरीरसंयोगवियोगहेतुः ॥ ५१ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥
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| कुण्डादिस्थाग्नेर्दारुयोगादौ स्वतः प्रवृत्त्यभावात् ।
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| 'यथा कुण्डस्थितस्याग्नेर्दैवाद्दारूपसंनमेत् ।
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| देहयोगो वियोगश्च तथा दैवान्न चान्यथा''॥ इति वामने ॥ ५१ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |