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| == द्वाविंशोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C04_S21]] |
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| | verse_line1 = नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् ।
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| | verse_line2 = यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥ ९ ॥
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| |
| 'सर्वज्ञाश्च विरिञ्चाद्या न जानीयुर्हरिं परम् ।
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| हेतवो जगतोऽप्यस्य यथाऽसौ वेद केशवः''॥ इति तन्त्रसारे ॥९॥
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| | verse_line1 = व्यक्तं ह्यात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः ।
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| | verse_line2 = स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥ १६ ॥
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| |
| 'हरेस्तु प्रतिमा प्राज्ञास्तत्रस्थः केशवः स्वयम् ।
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| ददाति ज्ञानमीशेशः परमात्मा स्वयं विभुः''॥ इति च ॥ १६ ॥
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| | verse_line1 = अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः
| |
| | verse_line2 = पादारविन्देऽस्य गुणानुवादिनि ।
| |
| | verse_line3 = रतिः सदा या विधुनोति नैष्ठिकी
| |
| | verse_line4 = कामं कषायं मलमन्तरात्मनः ॥ २० ॥
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| कषणेन गच्छतीति कषायः पापं, तदुभयमेव मलम् ॥ २० ॥
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| | verse_line1 = शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां
| |
| | verse_line2 = क्षेमस्य सम्यग्विमृशेषु हेतुः ।
| |
| | verse_line3 = असङ्ग आत्मव्यतिरिक्तवस्तुनि
| |
| | verse_line4 = दृढा रतिर्ब्रह्मणि निर्गुणे च या ॥ २१ ॥
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| | verse_line1 = हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरया
| |
| | verse_line2 = गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया ।
| |
| | verse_line3 = भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्परात्मनि
| |
| | verse_line4 = स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ॥ २५ ॥
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| | text =
| |
| 'रतिः परात्मनि हरावन्यत्रारतिरेव च ।
| |
| पुमर्थसाधनं ज्ञेयं नातोऽन्यन्मुख्यमिष्यते''॥ इति ॥ २१,२५ ॥
| |
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| | verse_line1 = यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-
| |
| | verse_line2 = नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा ।
| |
| | verse_line3 = दहत्यबीजं हृदयं जीवकोशं
| |
| | verse_line4 = पञ्चात्मकं योनिमिवोत्थितोऽग्निः ॥ २६ ॥
| |
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| |
| अबीजं हृदयं बीजहृदयं विना ।
| |
| 'जीवोपाधिर्द्विधा प्रोक्तः स्वरूपं बाह्यमेव च ।
| |
| बाह्योपाधिर्लयं याति मुक्तावन्यस्य तु स्थितिः ॥
| |
| सर्वोपाधिविनाशे हि प्रतिबिम्बः कथं भवेत् ।
| |
| कथं चात्मविनाशाय प्रयत्नः सेत्स्यति क्वचित् ॥
| |
| अपुमर्थता च मुक्तेः स्यादभावात्पुंस एव तु ।
| |
| ज्ञानज्ञेयाद्यभावाच्च सर्वथा नोपपद्यते ॥
| |
| तस्मादेतन्मतं येषां तमोनिष्ठा हि ते मताः ॥''इति स्कान्दे ॥२६॥
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| | verse_line1 = दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो
| |
| | verse_line2 = नैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे ।
| |
| | verse_line3 = परात्मनोर्यद् व्यवधानं पुरस्तात्
| |
| | verse_line4 = स्वप्ने यथाऽपुरुषस्तद्विनाशे ॥ २७ ॥
| |
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| |
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| |
| दग्धाशयः बीजाशयनाशे तद्गुणानां ज्ञानादीनामभावान्न किञ्चिद्विचक्षीत । परात्मनोर्यदा व्यवधानं संसारावस्थायां तदा स्वप्न इवेत्येतावद्बीजहृदयनाशे त्वपुरुष एव । आत्मनाश एवेत्यर्थः । अतः संसारावस्थैवोत्तमा स्यात् ।
| |
| 'भिदा यदि न दृश्येत जीवात्मपरमात्मनोः ।
| |
| मुक्तौ तदा विमोक्षाय को यत्नं कर्तुमर्हति''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥
| |
| 'मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं न दुःखकरं भवेत् ।
| |
| प्रवृत्तिधर्ममेवाहं मन्ये भरतसत्तम''॥ इति मोक्षधर्मेषु ॥ २७ ॥
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| | verse_line1 = इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतो मनः ।
| |
| | verse_line2 = चेतनां हरते बुद्धेः स्तुम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३० ॥
| |
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| | text =
| |
| एवंविधाज्ञानकारणमाह । इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैरित्यादि ।
| |
| 'बहुस्मरणशक्तिस्तु चेतनेत्युच्यते बुधैः''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ३० ॥
| |
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| | verse_line1 = भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये ।
| |
| | verse_line2 = तद्रोधं कवयः प्राहुरात्मापह्नवमात्मनः ॥ ३१ ॥
| |
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| | verse_line1 = नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः ।
| |
| | verse_line2 = यद्यस्त्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥
| |
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| | verse_line1 = अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् ।
| |
| | verse_line2 = स्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद् येनाविशति मुग्धताम् ॥ ३३ ॥
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| | verse_line1 = न कुर्यात् कर्हिचित् सङ्गं तमस्तीव्रं तितीर्षुणा ।
| |
| | verse_line2 = धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ॥ ३४ ॥
| |
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| |
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| | text =
| |
| 'स्वपक्षपातस्त्वभ्यासाद्भोगार्थं व्यापृतस्य तु ।
| |
| भवेत्ततोऽनेकशास्त्रयथार्थस्मरणेशिता ॥
| |
| नश्यत्यतः स्मृतेर्नाशाद्भगवत्पक्षपातिता ।
| |
| विनश्येत्तेन चैवास्य भवेज्ज्ञानविपर्ययः ॥
| |
| न च ज्ञानविपर्यासादन्यन्नाशकरं क्वचित् ।
| |
| सर्वस्यैतस्य मूलं हि दुष्टसंसर्ग एव तु ॥
| |
| दुष्टसङ्गो विरक्तस्याप्यन्यथाज्ञानकारणम् ।
| |
| दुष्टसङ्गाद्धि विष्णोश्च स्वात्मत्वं मन्यते बुधः ।
| |
| अभावं स्वात्मनोऽन्यस्य मुक्तिं चापि निरात्मताम्''॥
| |
| इत्यादि स्कान्दे ॥ ३१-३४ ॥
| |
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| | verse_line1 = मनोमात्रमिदं विश्वं यथा स्वप्ने मनः क्रिया ।
| |
| | verse_line2 = क्रिया च वासनामात्रं साऽनीहायां प्रलीयते ॥ ३७ ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = आत्मा त्वनीहया साक्षात् स्वयंज्योतिः प्रसिद्ध्यति ।
| |
| | verse_line2 = एवं व्युदस्यात्ममायां भिदामुपरमेन्मुनिः ॥ ३८ ॥
| |
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| |
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| |
| 'मनोमात्रं हरेर्यस्मान्मनसा मीयते जगत् ।
| |
| व्याप्ते मनसि विष्णोश्च स्थितत्वाद्वासनामयम् ॥
| |
| वस आच्छादनेत्यस्माद्धातोर्वा वासनामयम् ।
| |
| अतो विष्णोरनीहायां लीयते सकलं जगत् ॥
| |
| अनीहावस्थ एवासौ मुमुक्षुभिरवाप्यते ।
| |
| एवं विद्वान्बन्धशक्तिं व्युदस्य हरिमाप्नुते ॥
| |
| प्रकृतिर्भिदा च माया च भ्रमश्चेत्यभिधीयते ।
| |
| बन्धशक्तिर्यया लोको बम्भ्रमीत्यनिशं भुवि''॥ इति तन्त्रसारे ॥ ३७,३८ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = न यत्र निद्रा मूर्च्छा वा नार्थदृक् न मनोरथः ।
| |
| | verse_line2 = नानुवृत्तिर्न प्रलयस्तद् ब्रह्म विजितात्मनः ॥ ३९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| 'अनुवृत्तिरिति प्राज्ञैर्जीवन्मुक्तिरुदीर्यते''। इति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् ।
| |
| | verse_line2 = यः क्षेत्रवित् त्वमनयोर्हृदि विष्वगाधिः
| |
| | verse_line3 = प्रत्यक् चकास्ति भगवांस्तमवैहि सोऽस्ति ॥ ४० ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_id = BTN_C04_S21_V40
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| | text =
| |
| 'सर्वसत्ताप्रदत्वात्तु सर्वतत्त्वं हरिः स्मृतः ।
| |
| सर्वत्र विततत्वाद्वा सोऽहं त्वमिति चोच्यते ।
| |
| सर्वान्तर्यामकत्वात्तु न जीवात्मत्वतो हरिः''॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥
| |
| त्वमनयोः स्थावरजङ्गमयोर्मध्ये एको जीवः विष्वगाधिः नानादुःखःसन्, हृदि स्थितमवैहि । अहं च स जीवोऽस्मि । ज्ञानान्महान् भवामि । यः क्षेत्रवित् ॥ सर्वस्य प्रत्यक्चकास्ति स भगवानिति ।
| |
| 'व्यवधानेनान्वयोऽपि योग्यतापेक्षया भवेत्''। इति शब्दनिर्णये ॥
| |
| 'अभिमानस्त्वहङ्कार आत्मा चेत्यभिधीयते''। इति च ॥ ४० ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति
| |
| | verse_line2 = मायाविवेकविधुतिः स्रजिवाहिबुद्धिः ।
| |
| | verse_line3 = तं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्धतत्त्वं
| |
| | verse_line4 = प्रत्यूढकर्मकलिलप्रकृतिं प्रपद्ये ॥ ४१ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_id = BTN_C04_S21_V41
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| | id = BTN_C04_S21_V41_B1
| |
| | text =
| |
| 'यत्स्वरूपतया भातमज्ञानां गगनादिकम् ।
| |
| विवेकज्ञानिनां रज्जौ सर्पमावद्विधूयते ।
| |
| तं नित्यमुक्तभावेन निरस्तप्रकृतिं भजेत्''॥ इति ज्ञानविवेके ॥
| |
| 'न भ्रान्तिर्जगतो दृष्टिर्न भ्रान्तिर्हरिदर्शनम् ।
| |
| अन्योन्यात्मतया दृष्टिर्भ्रान्तिरित्यवधार्यताम्''॥ इति च ।
| |
| 'मायेति ज्ञाननाम स्यान्मायेति प्रकृतिस्तथा ।
| |
| ज्ञानं स्वरूपं विष्णोस्तु प्रकृतिर्न हरेस्तनुः ।
| |
| एवं विवेकिनो विश्वं ब्रह्मरूपेण नेष्यते''॥ इति वाराहे ॥
| |
| ज्ञानप्रकृत्याख्यमायाद्वयस्य विवेकज्ञानात्सदसतोर्विष्ण्वात्मतया प्रतीतिः स्रज्यहिबुद्धिरिव विधूयत इत्यर्थः ।
| |
| 'पञ्चभूतात्मकं देहं विष्णोः पश्यन्त्ययोगिनः ।
| |
| तथा न योगिराद्धान्तो ज्ञानं देहो यतो हरेः''॥ इति षाड्गुण्ये ॥ ४१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| |
| | verse_id = BTN_C04_S21_V42
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| | document_id = BTN
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| | chapter_id = BTN_C04
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| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = यत्पादपङ्कजपरागविलासभक्त्या
| |
| | verse_line2 = कर्माशयग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः ।
| |
| | verse_line3 = तत्त्वं न तद् द्विमतयोऽपि विरुद्धमार्ग-
| |
| | verse_line4 = स्रोतोगुणास्तमरणं भज वासुदेवम् ॥ ४२ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
| |
| }}
| |
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| | text =
| |
| द्विमतयः जगति भगवति च प्रतीतियुक्ता अपि भक्तिविशेषात्तत्त्वं नोद्ग्रथयन्ति । संसारगुणास्तेषां विरुद्धा एव प्रतीयन्ते यतः ॥ ४२ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याऽध्यात्मशिक्षया ।
| |
| | verse_line2 = आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥ ५२ ॥
| |
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| |
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| |
| 'नैजः सर्वगुणोत्कर्षः सर्वेभ्यो महदुच्यते''इति शब्दनिर्णये ॥ ५२ ॥
| |
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| | verse_line1 = कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव ।
| |
| | verse_line2 = वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः ।
| |
| | verse_line3 = बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मतत्त्वे स्वयं हरिः ॥ ६४ ॥
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| |
| 'अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः ।
| |
| एकस्तद्वेद भगवान्प्रभुर्नारायणः स्वराट्''॥ इति मोक्षधर्मेषु ॥ ६४ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु ।
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| | verse_line2 = ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यपरोद्यमे ॥ ६५ ॥
| |
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| | verse_line1 = कीर्त्योर्ध्वगीतयः पुंभिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।
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| | verse_line2 = प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥ ६६ ॥
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| ॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥
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| |
| 'गुरुविप्रेषु भक्तया च परेषां हितकृत्तया ।
| |
| प्रश्रयेण च कीर्त्या च पृथू राममनुव्रतः''॥ इति ब्रह्माण्डे ।
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| 'न गुरुर्न च धर्मोऽस्ति रामदेवस्य कुत्रचित् ।
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| तथापि धर्मरक्षार्थं गुरुभक्तिमदर्शयत्''॥ इति वाराहे ॥ ६७ ॥
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