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| == षष्ठोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C02_S05]] |
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| | verse_line1 = रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी ।
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| | verse_line2 = कर्णौ दिशाञ्च तीर्थानां श्रोत्रमाकाशशब्दयोः ॥ ३ ॥
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| तीर्थानां शास्त्राणाम् ॥ ३ ॥
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| | verse_line1 = रोमाण्युद्भिजजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः ।
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| | verse_line2 = केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् ॥ ५ ॥
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| |
| 'याज्ञिका रोममूलस्था रोमान्तस्थास्तु तत्परे ।
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| उद्भिजो वासुदेवस्य लिङ्गगास्तु जरायुजाः''। इति पाद्मे ।
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| 'हरेः श्मश्वाश्रया विद्युच्छिलालोहा नखाश्रयाः''। इत्याग्नेये ॥ ५ ॥
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| | verse_line1 = बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् ।
| |
| | verse_line2 = विक्रमो भूर्भुवःस्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च
| |
| | verse_line3 = सर्वकामवरस्यापि हरेश्चरण आस्पदम् ॥ ६ ॥
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| | text =
| |
| ब्राह्मणवैश्यादीन् वर्जयितुं प्रायश इति ।
| |
| 'मोक्षः शान्तिश्च शरणं निर्वाणं चाभिधीयते''इति ब्राह्मे ।
| |
| 'भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम्''। इति च ।
| |
| 'स्वोत्पत्त्यङ्गेषु देवानामन्येषां पादमूलतः ।
| |
| मुक्तिस्तु विहिता विष्णोर्निर्दिष्टेषु यथावचः''। इत्यध्यात्मे ॥ ६ ॥
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| | verse_line1 = धर्मस्य मम तुभ्यञ्च कुमाराणां भवस्य च ।
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| | verse_line2 = विज्ञानस्य च तत्वस्य परस्यात्मा परायणम् ॥ ११ ॥
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| |
| 'कुमारब्रह्मरुद्राद्या हरेर्मध्यात्समुद्गताः''। इति वामने ।
| |
| 'आत्मेति मध्यदेहश्च सर्वदेहोऽपि वा भवेत् ।
| |
| मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं जीवश्च कथ्यते ॥
| |
| अथवा स्वयमेवेति वायुर्ब्रह्माऽपि वा भवेत् ।
| |
| मुख्यतो ब्रह्म परममात्मशब्देन भण्यते''॥ इति नाममहोदधौ ।
| |
| 'देहेन्द्रियादिभेदेन निर्भेदोऽपि हरिः स्वयम् ।
| |
| भण्यते केवलैश्वर्यादनाद्यानन्दचिद्घनः''॥ इति गारुडे ।
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| | verse_line1 = सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।
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| | verse_line2 = तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठता ॥ १५ ॥
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| | text =
| |
| 'सर्वं पुरुष एवेति भण्यतेऽभेदवज्जगत् ।
| |
| तदधीनं तु सत्तादि यतो ह्यस्य सदा भवेत्''। इति ब्रह्मतर्के ।
| |
| 'वितस्तिमात्रं हृदयमास्थाय व्याप्नुते जगत्''। इति गारुडे ॥ १५ ॥
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| | verse_line1 = स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ ।
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| | verse_line2 = एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान् ॥ १६ ॥
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| |
| 'पश्यन् स्वधिष्ण्यं देहं स बहिष्ठान्विषयानपि ।
| |
| एवमण्डान्तरं पश्यन्बहिः सर्वं च पश्यति''। इति वामने ॥ १६ ॥
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| | verse_line1 = सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् ।
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| | verse_line2 = महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः ॥ १७ ॥
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| | text =
| |
| 'अव्यक्तमात्मनोऽन्नं च महदादि विनाशि च ।
| |
| यदतीतः परो विष्णुः स एवातो विमोक्षदः''॥ इति नारदीये ॥१७॥
| |
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| | verse_line1 = पादोऽस्य सर्वा भूतानि पुंसः स्थितिविदो विदुः ।
| |
| | verse_line2 = अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८ ॥
| |
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| |
| 'स्वरूपांशो विभिन्नांश इति द्वेधांश इष्यते ।
| |
| अनन्तासनवैकुण्ठपद्मनाभाः स्वयं हरिः ॥
| |
| जीवा इमे विभिन्नांशा धर्माधर्मादिसंयुताः''॥ इति वामने ।
| |
| सर्वस्य यथावत्स्थितिविदः ।
| |
| 'त्रिमूर्धा सन् हरिर्धत्ते द्युत्रयं मूर्धभिस्त्रिभिः ।
| |
| अनन्तासनवैकुण्ठनारायणपुराणि तु ।
| |
| बहुलक्षोच्छ्रितेष्वेषु स वसत्यमृतो हरिः''॥ इति मात्स्ये ॥ १८ ॥
| |
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| | verse_line1 = पादास्त्रयो बहिस्त्वासन्नप्रजानां य आश्रयाः ।
| |
| | verse_line2 = अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधैर्बृहद्धुतः ॥ १९ ॥
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| | text =
| |
| 'अनन्तासनवैकुण्ठनारायणपुराणि तु ।
| |
| त्रीणि धामानि वै विष्णोस्त्रिलोकाद्बहिरेव च ॥
| |
| अदायादास्तु पुत्राणामुद्रिक्तज्ञानचक्षुषः ।
| |
| नारायणपरा देवा एवं तान्याप्नुवन्ति''च ॥
| |
| 'स एवान्यस्वरूपेण शक्रलोकसमीपगः ।
| |
| इज्यो यज्ञपुमान्नाम ज्ञानिनां गृहिणां पदम् ॥
| |
| यतीनां ध्रुवलोकस्थो वनिनां मेरुमध्यगः ।
| |
| आदित्यमण्डलस्थस्तु ज्ञानिनां ब्रह्मचारिणाम्''॥
| |
| इति ब्रह्माण्डे ॥ १९ ॥
| |
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| | verse_line1 = सृती विचक्रमे विष्वक्साशनानशने उभे ।
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| | verse_line2 = यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २० ॥
| |
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| |
| 'त्रिपात्स एव भगवान् सर्वप्राणिषु संस्थितः ।
| |
| निरन्नेषु च विद्वत्सु त्रिदशेष्वितरेषु च''॥ इत्यध्यात्मे ॥ २० ॥
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| | verse_line1 = तस्मादण्डाद्विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणाश्रयः ।
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| | verse_line2 = तद्द्रव्यमत्यगाद्विश्वं गोभिः सूर्य इवाश्रयम् ॥ २१ ॥
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| | verse_line1 = यदास्य नाभ्यात् नलिनात् अहमासं महात्मनः ।
| |
| | verse_line2 = नाविन्दं यज्ञसम्भारान् पुरुषावयवान् ऋते ॥ २२ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'तस्माद्धरेरण्डमभूदण्डादपि चतुर्मुखः ।
| |
| स विराण्नामकस्तस्मादधिको हरिरेव तु ॥
| |
| अण्डाज्जातस्य तस्यान्यद्रूपं पद्मादभूद्धरेः ।
| |
| यदोभयात्मको जज्ञे ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
| |
| तदैव सोऽतिरिक्तोऽभूच्छर्वपूर्वापराज्जनात् ।
| |
| त्रिलोकस्थानगं विष्णुमयजच्च समाहितः ।
| |
| तद्रूपभूतांस्त्रींल्लोकान् पशून् कृत्वा महामनाः''॥ इति गारुडे ॥ २१-२२ ॥
| |
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| | verse_line1 = नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च ।
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| | verse_line2 = देवतानुक्रमः कल्पः सङ्कल्पः सूत्रमेव च ॥ २५ ॥
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| सूत्रं मीमांसासूत्रम् ॥ २५ ॥
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| | verse_line1 = नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् ।
| |
| | verse_line2 = गृहीतमायोरुगुणे सर्गादावगुणे स्वतः ॥ ३० ॥
| |
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| |
| यस्मात् तमेवायजन् तस्मादिदं तस्मिन्नाहितम् ।
| |
| 'नित्यं गृहीताः सत्वाद्या जीववज्जडवन्न तु ।
| |
| मिथ्यामानात्स्वरूपत्वात्स्वातन्त्र्याद्बहिरेव तु''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥३०॥
| |
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| | verse_line1 = इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि ।
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| | verse_line2 = नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम् ॥ ३२ ॥
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| |
| 'सदिति व्यक्तमुद्दिष्टमसदव्यक्तमुच्यते ।
| |
| गम्यागम्यस्वरूपत्वात्तत्सत्तादिर्हरेर्यतः ॥
| |
| अतस्तस्मादन्यदेव ह्यनन्यदिति भण्यते''॥ इति च ॥ ३२ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां
| |
| | verse_line2 = भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् ।
| |
| | verse_line3 = यः स्वात्ममायाविभवं स्वयं गतो
| |
| | verse_line4 = नाहं नभस्वांस्तमथापरे कुतः ॥ ३५ ॥
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| |
| 'सर्वजीवनिकायेषु ब्रह्मवायू हरेर्विदौ ।
| |
| न चान्यस्तादृशो वेत्ता यावद्वेत्ति हरिः स्वयम् ॥
| |
| तावत्तावपि नो विष्णुं जानीतो लोकवन्दितौ''॥
| |
| इति ब्रह्माण्डे ॥ ३५ ॥
| |
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| | verse_line1 = स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः ।
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| | verse_line2 = आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं स संयच्छति पाति च ॥ ३८ ॥
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| |
| 'स्वयमेव स्वरूपाणि मत्स्यकूर्मादिकान्यजः ।
| |
| स्वात्मन्येवेच्छया सृष्ट्वा तैर्देवादीन्प्रपात्यसौ ॥
| |
| संयच्छत्यसुरान्विष्णुः कल्पे कल्पे जगत्प्रभुः ।
| |
| तिरोहितं स्वरूपं च प्रकाशयति शास्त्रतः''॥
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| इति भागवततन्त्रे ॥ ३८ ॥
| |
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| | verse_line1 = विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् ।
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| | verse_line2 = सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥ ३९ ॥
| |
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| | verse_line1 = ऋतं विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः ।
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| | verse_line2 = यदा तदैवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४० ॥
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| | text =
| |
| 'ऋतं तदात्मना ज्ञप्तेः सत्यं साधुत्वतः परम् ।
| |
| सम्यक्संस्थमदूष्यत्वाच्छुद्धं दोषोज्झितत्वतः ।
| |
| केवलं तादृशाभावात्प्रत्यगन्तरवस्थितेः ।
| |
| एतदेतादृशं तत्त्वं यो वेद स विमुच्यते''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥३९,४०॥
| |
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| | verse_line1 = आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य
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| | verse_line2 = कालः स्वभावः सदसन्मनश्च ।
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| | verse_line3 = द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि
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| | verse_line4 = विराड् स्वराट्स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ ४१ ॥
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| | verse_line1 = अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशाः
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| | verse_line2 = दक्षादयो ये भवदादयश्च ।
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| | verse_line3 = स्वर्लोकपालाः खगलोकपालाः
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| | verse_line4 = नृलोकपालास्तललोकपालाः ॥ ४२ ॥
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| | verse_line1 = गन्धर्वविद्याधरचारणेशाः
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| | verse_line3 = ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां
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| | verse_line1 = प्राधान्यतो यानृषय आमनन्ति
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| | verse_line3 = आपीयतां कर्मकषायशोषान-
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| | verse_line4 = नुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशलान् ॥ ४५ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
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| 'यः शेते प्रलये विष्णुः शून्यनामा महाकृतिः ।
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| स तु नारायणो नाम नराणामयनत्वतः ।
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| रूपं द्वितीयं भवति दीपाद्दीपान्तरं यथा ॥
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| सिसृक्षोस्तस्य पुरुष इत्याहुस्तद्विदो जनाः ।
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| स रमाया द्वितीये तु रूपे प्रकृतिसंज्ञिते ॥
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| वीर्यमाधत्त पुरुषो महांस्तस्मादजायत ।
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| योऽसौ हिरण्यगर्भाख्यः पुरुषः सोऽपि भण्यते ॥
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| श्रद्धेत्युक्ता तु तत्पत्नी साऽपि प्रकृतिरुच्यते ।
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| प्रलये त्वशरीरौ तौ विभागेन व्यवस्थितौ ॥
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| शरीरं प्राप्य पुरुषात्संयोगं तौ प्रचक्रतुः ।
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| ततः पुनर्महत्तत्त्वं प्रजातं जगदङ्कुरम् ॥
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| स्वस्यैव पुत्रतां यातमहङ्कारस्ततोऽजनि''॥ इति व्योमसंहितायाम् ।
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| पुरुषः तस्यैव आद्योऽवतारः । कालादयो रूपवत् । अस्वरूपमपि प््रिायत्वात् ।
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| 'पुरुषाद्या हरेरूपं ब्रह्माद्यास्तत्प््रिायाः स्मृताः ।
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| स्वरूपभूता नैवैते तत्सन्निधियुता अपि''॥ इति पाद्मे ।
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| 'कालो वस्तुस्वभावश्च प्रकृतिः प्राण एव च ।
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| मनश्च पञ्चभूतानि विकारस्त्रिगुणा अपि ।
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| न स्वरूपं हरेरेतत्तथाप्येषु हरिः स्थितः''॥ इति पाद्मे ।
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| सत् प्राणः । 'सदिति प्राणः''इति श्रुतेः ।
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| 'द्रव्यं तु पञ्चभूतानि विकारोऽण्डमुदाहृतम् ।
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| विराजं गरुडं प्राहुः स्वराडिन्द्र उदाहृतः''॥ इति षाड्गुण्ये ।
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| 'सर्वं तु रूपवद्विष्णोर्विशेषेण विभूतिमत् ।
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| अतिप््रिायत्वान्नैवैतत्स्वरूपमपि भण्यते''॥ इति स्कान्दे ।
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| 'स्वतो महत्वं तु महोविशेषप्राप्तिशक्तिता ।
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| विभूतिर्लक्षणोन्नाहो लक्ष्मीशब्देन भण्यते''॥ इति ब्रह्मतर्के ।
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| 'प्रधानत्वेन सर्वस्मान्मत्स्यकूर्मादयो हरेः ।
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| अवताराः श्रुतौ ख्याताः स एवैते ततः स्मृताः ।
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| न स्वरूपं तु ब्रह्माद्याः स्मृता मायाविभूतयः ।
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| स्वेच्छयैषां विशिष्टत्वं कुरुते तत्तथा स्मृताः ।''इति व्योमसंहितायाम् ॥
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| 'यज्ञशब्दोदितौ द्वौ तु देवौ लोकपुरस्कृतौ ।
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| एको नारायणस्तत्र रुद्रच्छिन्नस्तथापरः ।
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| स तु यज्ञाभिमानी स्यात्तत्पतिः केशवः स्मृतः''॥ इति पाद्मे ॥ ४१-४५ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |