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Bhagavadgitabhashya/C17: Difference between revisions

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== सप्तदशोऽध्यायः ==
#REDIRECT [[Bhagavadgitabhashya#BGB_C17]]
{{Adhyaya
| document_id  = BGB
| chapter_num  = 17
| title        = सप्तदशोऽध्यायः
}}
गुणभेदान् प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन ।
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V01
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।
| verse_line2  = तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Uvacha|अर्जुन उवाच}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V01
| id      = BGB_C17_V01_B01
| text    =
शास्त्रविधिमुत्सृज्य= अज्ञात्वा एव ।‘वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना।’(म.स्मृ.२.२३५) इति विधिरुत्सृष्टो हि तैः ।‘ये वै वेदं न पठन्ते न चार्थं वेदोज्झितांस्तान् विद्धि सानूनबुद्धीन्’ ।इति च माधुच्छन्दसश्रुतिः ।अन्यथा तु ‘तामसाः’ इत्येवोच्येत, नतु विभज्य । यदि सात्त्विकाः तर्हि नोत्सृष्टशास्त्राः । नहि वेदविरुद्धो धर्मः । ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्, स्मृतिशीले च तद्विदाम्’(म.स्मृ.२.६) ।इति हि स्मृतिः । ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः’(भाग.६.१.४०) इति भागवते ॥१ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V02
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
| verse_line2  = सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Uvacha|श्रीभगवानुवाच}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V02
| id      = BGB_C17_V02_B01
| text    =
अतो विभज्याह- त्रिविधेत्यादिना ॥ २ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V03
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
| verse_line2  = श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V03
| id      = BGB_C17_V03_B01
| text    =
सत्त्वानुरूपा चित्तानुरूपा । यो यच्छ्रद्धः स एव स सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V04
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
| verse_line2  = प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V04
| id      = BGB_C17_V04_B01
| text    =
कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - यजन्त इत्यादिना ॥४॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V05
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
| verse_line2  = दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V06
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
| verse_line2  = मां चैवान्तःशरीरस्थं तान् विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V06
| id      = BGB_C17_V06_B01
| text    =
भगवत्कर्शनं नाम अल्पत्वदृष्टिरेव ।‘यो वै महान्तं परमं पुमांसं नैवं द्रष्टा कर्शकः सोऽतिपापी’ ।इत्यनभिम्लान(त)श्रुतिः ।
            आसुरो निश्चयो येषां त आसुरनिश्चयाः ।‘देवास्तु सात्त्विकाः प्रोक्ताः दैत्या राजसतामसाः।’इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः ॥ ६॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V07
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
| verse_line2  = यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V08
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
| verse_line2  = रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V08
| id      = BGB_C17_V08_B01
| text    =
प्रीतिः आनन्तरिका । हृद्यत्वं दर्शने । स्थिराश्च न तदैव पक्वा भवन्ति । तथा ह्याज्यादयः ॥ ८ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V09
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
| verse_line2  = आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V10
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
| verse_line2  = उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V11
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
| verse_line2  = यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V12
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
| verse_line2  = इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V13
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
| verse_line2  = श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V14
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
| verse_line2  = ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V15
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
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| verse_line1  = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
| verse_line2  = स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V16
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
| verse_line2  = भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V16
| id      = BGB_C17_V16_B01
| text    =
सौम्यत्वम् अक्रौर्यम् । ‘अक्रूरः सौम्य उच्यते’इति ह्यभिधानम् । मौनं मननशीलत्वम् । ‘बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः’(बृ.अ.५,ब्रा.५.१) इति हि श्रुतिः ।
            ‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ ।इति हि भाल्लवेयश्रुतिः ।
          कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V17
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।
| verse_line2  = अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥
}}
 
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| document_id  = BGB
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| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
| verse_line2  = क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥
}}
 
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| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
| verse_line2  = परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V20
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
| verse_line2  = देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२० ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V21
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
| verse_line2  = दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V22
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते ।
| verse_line2  = असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V23
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
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| verse_line1  = ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।
| verse_line2  = ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGB_C17_V24
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
| verse_line2  = प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V24
| id      = BGB_C17_V24_B01
| text    =
पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- ओं तत् सत् इत्यादिना ॥ परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि-  ‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च ।सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु ।द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V24
| id      = BGB_C17_V24_B02
| text    =
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१) इति च । ‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१) इति च । तेन ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V25
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
| verse_line2  = दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V25
| id      = BGB_C17_V25_B01
| text    =
‘तत् फलं मे स्यात्’ इत्यनभिसन्धाय ॥ २५ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V26
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ।
| verse_line2  = प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V27
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
| verse_line2  = कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C17_V28
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C17
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
| verse_line2  = असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V28
| id      = BGB_C17_V28_author-note
| text    =
॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोध्यायः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17_V28
| id      = BGB_C17_V28_B01
| text    =
सद्भावशब्देन प्रजननं सूचितम् । ‘ओम्’ इत्युक्त्वा, अनभिसन्धाय फलम्, यज्ञदानतपआदिकृताम् अतिप्रीतेः नामसाम्याद् ब्रह्मैव निष्पादितं भवतीत्याशयः । तथा च ऋग्वेदखिलेषु-‘ओं यज्ञाद्या निष्फलं कर्म तत् स्यात् सद् वै तदर्थं कर्म वदन्ति वेदाः । तच्छब्दानां सन्निधेर्ब्रह्मप्रीतेः तद्रूपत्वाज्जनितं ब्रह्म तस्य ॥’ इति ॥ २६-२८ ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C17
| id      = BGB_C17_author-note
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये सप्तदशोऽध्यायः ॥
}}
 
[[Category:Bhagavadgitabhashya]]

Latest revision as of 06:41, 13 April 2026