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| == एकादशोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitabhashya#BGB_C11]] |
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| | title = एकादशोऽध्यायः
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| यथा श्रुते ध्यानं (कर्तुं) शक्यं तथा स्वरूपस्थितिरनेनाध्यायेनोच्यते ।
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| | verse_line1 = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
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| | verse_line2 = यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
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| | verse_line2 = त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥
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| | verse_line1 = एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
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| | verse_line2 = द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥
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| | verse_line1 = मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो ।
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| | verse_line2 = योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥४ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| }}
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| | text =
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| प्रभुः समर्थः । ‘नास्ति तस्मात् परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात्।’(कुम्भ.म.भा.१२.३४७.३१) इति हि मोक्षधर्मे । ‘प्रभुरीशः समर्थश्च’ इत्यादि चाभिधानम् ॥ १-४ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।
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| | verse_line2 = नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
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| | verse_line2 = बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
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| | verse_line2 = मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
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| | verse_line2 = दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।
| |
| | verse_line2 = दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
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| {{Uvacha|सञ्जय उवाच}}
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| |
| | text =
| |
| हरिः सर्वयज्ञभागहारित्वात्-‘इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम् ।वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः’॥इति हि मोक्षधर्मे ।॥९ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् ।
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| | verse_line2 = अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥
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| }}
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| | verse_line1 = दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
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| | verse_line2 = सर्वाश्चर्यमयं देवम् अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
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| | text =
| |
| सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥
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| | verse_line1 = दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
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| | verse_line2 = यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
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| |
| | text =
| |
| सहस्रशब्दोऽनन्तवाची । तदपि ‘पाकशासनविक्रमः’ इत्यादिवत् प्रत्यायनार्थमेव । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु-‘अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि ।’ इति । महातात्पर्याच्च बाहुल्यम् । न च परिमाणोक्त्या किञ्चित् प्रयोजनम् ॥१२ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
| |
| | verse_line2 = अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
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| | verse_line2 = प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
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| | verse_line2 = ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
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| | verse_line2 = नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
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| |
| | text =
| |
| ‘अनेक’शब्दोऽनन्तवाची । ‘अनन्तबाहुम्’(११.१९) इति वक्ष्यति । ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(१३.१४) इत्यादि च ।‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥’इति ऋग्वेदे ।
| |
| ‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वतस्पात् ।सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः ॥’ इति यजुर्वेदे च ।
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| विश्वशब्दश्चानन्तवाची-‘सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्णमेव च।’ इत्यभिधानात् ।‘अनन्तबाहुमनन्तपादम् अनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् ॥’ इति च बाभ्रव्यशाखायाम् ।
| |
| महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति । अन्यथा ‘अनादिमत् परं ब्रह्म’(१३.१३) इत्याद्ययुक्तं स्यात् ।
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| }}
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| | id = BGB_C11_V16_B02
| |
| | text =
| |
| एकत्र त्वनन्तान्यस्य रूपाणि इत्यनन्तरूपः । अन्यत्र त्वपरिमाण इति । उक्तं ह्युभयमपि ‘परात् परं यन्महतो महान्तम्’,‘यदेकमव्यक्तमनन्तरूपम्’(तै.आ.१०.१.१) इति यजुर्वेदे
| |
| अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वेऽपरिमेयत्वं सिध्यति ।‘महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम् ।अनन्तस्य न तस्यान्तः सङ्ख्यानं चापि विद्यते ॥’इत्यादित्यपुराणे ।
| |
| तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवन्ति(भवति) ।‘असङ्ख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परीमाणविवर्जिताश्च’ ।इति हि ऋग्वेदखिलेषु ।
| |
| ‘यावान् वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः ।उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते ।उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ ॥’(छा.८.१.३) इति च ।
| |
| ‘कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नपार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम् ।’(भाग.१०.१४.३१)इति च भागवते ।
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| }}
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| | |
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| | id = BGB_C11_V16_B02
| |
| | text =
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| न चैतदयुक्तम् । अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य । ‘अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्’ ।इति श्रीविष्णुपुराणे ।
| |
| ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’(कठ.१.२.९)इति च श्रुतिः ।अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशाद् वाक्यबलाच्चापनेयः । न हि घटवत् कश्चिदपि पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन् निराक्रियते । केषुचित् पदार्थेषु वाक्यव्यवस्थाऽचिन्त्यशक्तित्वाभावाद् अङ्गीक्रियते ।‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥ एवं परे, अन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद् व्यवस्था ॥’ इति जाबालखिलश्रुतेश्च । उपचारत्वपरिहाराय ‘न मध्यम्’ इति । अन्यथा आद्यन्ताभावेनैव तत्सिद्धेः । विश्वरूपः पूर्णरूपः- ‘स विश्वरूपोऽनूनरूपोऽतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् ॥ १६ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
| |
| | verse_line2 = पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
| |
| }}
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| | |
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| | text =
| |
| ‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - अप्रमेयमिति ॥ १७ ॥
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| | verse_line1 = त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
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| | verse_line2 = त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
| |
| | verse_line2 = पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| }}
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| | text =
| |
| ‘शशिसूर्यनेत्रम्’ इत्यपि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्यादिवत् । ‘तदङ्गजाः सर्वसुरादयोऽपि तस्मात् तदङ्गेति ऋषिभिः स्तुतास्ते’ । इत्यृग्वेदखिलेषु । ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्योऽजायत’ ।(ऋ.मं.१०.सू.९०.मं.१६) इति च । बहुरूपत्वाद् बह्वङ्गत्वं च तेषां युक्तम् ॥ १८, १९ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
| |
| | verse_line2 = दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| ‘मातापित्रोरन्तरगः स एकरूपेण चान्यैः सर्वगतः स एकः’ ।इति वारुणश्रुतेरेकेन रूपेण द्यावापृथिव्योरन्तरं (प्राप्तो) व्याप्तो भवति । ‘पश्य मे पार्थ रूपाणि’(११.५) इति बहूनि रूपाणि प्रतिज्ञातानि । मातापितरौ च पृथिवीद्यावौ- ‘मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्’,(ऋ.मं.५.सू.४२.मं.१६)‘मधु द्यौरस्तु नः पिता’(ऋ.मं.१.सू.९०.मं.७) इत्यादिप्रयोगात् । न तु नियमतो भयप्रदं तत्स्वरूपम् । नारदस्य तदभावात् । केषाञ्चित् तथा दर्शयति भगवान् ।‘प्रीयन्ति केचित् तस्य रूपस्य दृष्टौ बिभेति कश्चिदभ्यसे सर्वतृप्तिः’ । इति हि वरुणशाखायाम् ।न तु तं सर्वे पश्यन्ति अदृष्ट्वाऽपि तन्निरूप्य भये द्रष्टुस्तथा प्रतिभाति । तथा च गौतमखिलेषु- ‘दृष्ट्वा देवं मोदमाना अदृष्ट्वाऽप्येतद्भयाद् बिभ्यतो दृष्टवत् ते ।पश्यन्ति ते न्यस्तचक्षुर्मुखांस्तु तस्मिन्नेवैते मनसो गतत्वात्’॥ इति ।॥२० ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
| |
| | verse_line2 = स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
| |
| | verse_line2 = गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥
| |
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| | verse_line1 = रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
| |
| | verse_line2 = बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥ २३ ॥
| |
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| | verse_line1 = नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
| |
| | verse_line2 = दृष्ट्वा हि त्वा(त्वां) प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
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| | verse_line2 = दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
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| | verse_line2 = भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥
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| | verse_line1 = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
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| | verse_line2 = केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥
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| | verse_line1 = यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
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| | verse_line2 = तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥
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| | verse_line1 = यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
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| | verse_line2 = तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥
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| | verse_line1 = लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः ।
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| | verse_line2 = तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥
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| | verse_line1 = आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
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| | verse_line2 = विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥
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| धर्मान्तरज्ञानार्थमेव ‘को भवान्’ इति पृच्छति । यथा कश्चित् किञ्चित् नामादिकं जानन्नपि जातिज्ञानार्थं पृच्छति ‘कस्त्वम्’ इति । यदि तमेव न जानाति तर्हि ‘विष्णो’(११.३०) इत्येव सम्बोधनं न स्यात् । ‘त्वमक्षरम्’(११.१८) इत्यादि च ॥ २१-३१ ॥
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| | verse_line1 = कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
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| | verse_line2 = ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥
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| कालशब्दो जगद्बन्धन-च्छेदन-ज्ञानादिसर्वभगवद्धर्मवाची । ‘कल बन्धने’, ‘कल च्छेदने’, ‘कल ज्ञाने’, ‘कल कामधेनुः’ इति (हि) पठन्ति । प्रसिद्धश्च स शब्दो भगवति ।‘नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे ।अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य हरति प्रजाः ।बद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं(पशून्) रशनया यथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८१-८२)इति हि मोक्षधर्मे विष्णुना बद्धो बलिर्वक्ति ।
| |
| ‘विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग्रहे’(भाग.११.१५.१५) इति हि भागवते ।
| |
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| | text =
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| प्रवृद्धः परिपूर्णोऽनादिर्वा ।‘ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्’(ऋ.मं.१०.सू.१९०.मं.१) इति हि श्रुतिः । ‘एतन्महद्भूतमनन्तम्’ इति च । ‘प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान् त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम’(ऋ.मं.७.सू.१००.मं.३) इति च । न तु वर्धनम् ।‘नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ।’(भाग.११.३.३९) इति हि भागवते । ‘यस्य दिव्यं हि तद्रूपं हीयते वर्धते न च’ इति मोक्षधर्मे । ‘न कर्मणा’(बृ.३.४.२३) इति तु, कर्मणाऽपि न, किमु स्वयमिति । लोकान् समाहर्तुमिह विशेषेण प्रवृत्तः । भ्रात्रादींश्च ऋते इति ‘अपि’शब्दः । प्रत्यनीकत्वं तु परस्परतया । सर्वेऽपि (हि) न भविष्यन्ति । अक्षोहिण्यादिभेदेन बहुवचनं च युक्तम् ॥३२ ॥
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| | verse_line1 = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
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| | verse_line1 = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।
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| | verse_line1 = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
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| ‘योऽस्य शिरश्छिन्नं भूमौ पातयति, तच्छिरो भेत्स्यति’ तत्पितुर्वरात् जयद्रथोऽपि विशेषेणोक्तः । सवरा वासवी शक्तिरिति कर्णः ॥३४-३५ ॥
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| | verse_line1 = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
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| | verse_line2 = रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| {{Uvacha|अर्जुन उवाच}}
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| | text =
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| यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च ‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६) इत्यादौ सिद्धम् । ‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३) इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः । ‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः ।बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् ।बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् ।अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन ।हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति ॥ ३६ ॥
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| | verse_line1 = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥
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| कथं ‘स्थाने’ इति ? तदाह - कस्मादित्यादिना ॥ पूर्णश्चासौ आत्मा च इति महात्मा । आत्मशब्दश्चोक्तो भारते-‘यच्चाऽप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति भण्यते ॥’ इति ।तत्परं सदसतः परम् ।‘असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्’(म.भा.१.१.२३) इति च भागवते ।॥३७ ॥
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| | verse_line1 = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
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| | verse_line1 = वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
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| | verse_line1 = नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
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| | verse_line1 = सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
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| | verse_line1 = यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
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| | verse_line2 = एकोऽथवाऽप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥
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| एकस्त्वमेव कारयिता नान्योऽस्त्यथापि ॥ ४२ ॥
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| | verse_line1 = पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
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| | verse_line1 = तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
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| | verse_line1 = अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोध्यायः ॥
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| स्वकं रूपं तु भ्रान्ति(न्त)प्रतीत्या । अन्यथा तदपि स्वकमेव । प्रमाणानि तूक्तानि पुरस्तात् ॥ ५० ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये एकादशोऽध्यायः ॥
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| [[Category:Bhagavadgitabhashya]] | |