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Bhagavadgitabhashya/C1: Difference between revisions

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== प्रथमोऽध्यायः ==
#REDIRECT [[Bhagavadgitabhashya#BGB_C01]]
{{Adhyaya
| document_id  = BGB
| chapter_num  = 1
| title        = प्रथमोऽध्यायः
}}
श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितम्
श्रीमद्भगवद्गीताभाष्यम्
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| text    =
उपोद्घातः
}}
देवं नारायणं नत्वा सर्वदोषविवर्जितम् ।
परिपूर्णं गुरूंश्चाऽन् गीतार्थं वक्ष्यामि लेशतः ॥
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वेदव्यासावतारे बीजम्
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नष्टधर्मज्ञानलोककृपालुभिर्ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो ज्ञानप्रदर्शनाय भगवान् व्यासोऽवततार ।
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| text    =
महाभारतरचनावतरणिका
}}
ततश्चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारसाधनादर्शनाद् वेदार्थाज्ञानाच्च संसारे क्लिश्यमानानां वेदानधिकारिणां स्त्रीशूद्रादीनां च धर्मज्ञानद्वारा मोक्षो भवेदिति कृपालुः सर्ववेदार्थोपबृंहितां तदनुक्तकेवलेश्वरज्ञानदृष्टार्थयुक्तां च सर्वप्राणिनाम् अवगाह्यानवगाह्यरूपां केवलभगवत्स्वरूपपरां परोक्षार्थां महाभारतसंहिताम् अचीक्लृपत् ॥
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महाभारतस्य सर्वशास्त्रोत्तमत्वे प्रमाणानि
}}
तच्चोक्तम् -
        ‘लोकेशा ब्रह्मरुद्राद्याः संसारे क्लेशिनं जनम् ।
        वेदार्थाज्ञमधीकारवर्जितं च स्त्रियादिकम् ॥अवेक्ष्य प्रार्थयामासुर्देवेशं पुरुषोत्तमम् ।ततः प्रसन्नो भगवान् व्यासो भूत्वा च तेन च ॥अन्यावताररूपैश्च वेदानुक्तार्थभूषितम् ।केवलेनात्मबोधेन दृष्टं वेदार्थसंयुतम् ॥वेदादपि परं चक्रे पञ्चमं वेदमुत्तमम् ।भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥पुराणं भागवतं चेति सम्भिन्नः शास्त्रपुङ्गवः॥’इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।
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| text    =
महाभारतं दशार्थकम्
}}
‘ब्रह्माऽपि तन्न जानाति ईषत् सर्वोऽपि जानति(ते)।बह्वर्थमृषयस्तत्तु भारतं प्रवदन्ति हि ॥’ इत्युपनारदीये।  ‘ब्रह्माद्यैः प्रार्थितो विष्णुर्भारतं स चकार ह ।यस्मिन् दशार्थाः सर्वत्र न ज्ञेयाः सर्वजन्तुभिः ॥’इति नारदीये ।‘भारतं चापि कृतवान् पञ्चमं वेदमुत्तमम् ।दशावरार्थं सर्वत्र केवलं विष्णुबोधकम् ॥
परोक्षार्थं तु सर्वत्र वेदादप्युत्तमं तु यत् ॥’ इति स्कान्दे ।
‘यदि विद्याच्चतुर्वेदान् साङ्गोपनिषदान् द्विजः । न चेत् पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥’(म.भा.१.१.२६८)’
‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रचलिष्यति ।’( म.भा.आदि.१.२९३)
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| text    =
महाभारतार्थस्य त्रैविध्यम्
}}
मन्वादि केचिद् ब्रुवते ह्यास्तीकादि तथाऽपरे ।तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते ॥(म.भा.आदि.१.६६)
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| text    =
महाभारतस्य निर्णेयता निर्णायकता च
}}
भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ।देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैः ऋषिभिश्च समन्वितैः ।व्यासस्यैवाज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम् ॥(ब्रह्माण्डपुराणे)
‘महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ।निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ (म.भा.१.३००)
‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ’( म.भा.आदि ५.५०),‘विराटोद्योगसारवान्’ ( म भा.१.८९) इत्यादितद्वाक्यपर्यालोचनया, ऋषिसम्प्रदायात्, ‘को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ ( वायुप्रोक्तवचनम्) इत्यादिपुराणग्रन्थान्तरगतवाक्यान्यथानुपपत्त्या, नारदाध्ययनादिलिङ्गैश्चावसीयते ।
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| text    =
(युक्त्या भारतस्य सर्वोत्तमत्वसमर्थनम् )
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कथमन्यथा भारतनिरुक्तिज्ञानमात्रेण सर्वपापक्षयः ? प्रसिद्धश्च सोऽर्थः ।
कथं चान्यस्य न कर्तुं शक्यते? ग्रन्थान्तरगतत्वाच्च नाविद्यमानस्तुतिः । न च कर्तुरेव । इतरत्रापि साम्यात् ।
तत्र च सर्वभारतार्थसंग्रहां वासुदेवार्जुनसंवादरूपां भारतपारिजातमधुभूतां गीताम् उपनिबबन्ध ।
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| text    =
गीता महाभारतादप्यधिका
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तच्चोक्तम्–
‘भारतं सर्वशास्त्रेषु भारते गीतिका वरा ।विष्णोः सहस्रनामापि ज्ञेयं पाठ्यं च तद् द्वयम् ॥’ इति महाकौर्मे ।
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| text    =
गीतोक्तधर्मानुष्ठानं मुक्तिहेतुः
}}
‘स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने।’(म.भा.१३.१६.१२.)  इत्यादि च ।
तत्र सेनयोर्मध्ये बान्धवादिमोहजालसंवृतं विषीदन्तम् अर्जुनं भगवानुवाच ।
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| verse_line1  = धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
| verse_line2  = मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥
}}
 
{{Uvacha|धृतराष्ट्र उवाच}}
 
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| verse_line1  = दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
| verse_line2  = आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥
}}
 
{{Uvacha|सञ्जय उवाच}}
 
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| text    =
( द्रोणाचार्यं प्रति दुर्योधनवचनम् )
}}
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| verse_line1  = पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् ।
| verse_line2  = व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥
}}
 
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| verse_line1  = अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
| verse_line2  = युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥
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| verse_line1  = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
| verse_line2  = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ ५ ॥
}}
 
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| verse_line1  = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
| verse_line2  = सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६ ॥
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| verse_line1  = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
| verse_line2  = नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
}}
 
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( दुर्योधनपक्षीया महारथाः )
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| verse_line1  = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।
| verse_line2  = अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥
}}
 
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| verse_line1  = अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
| verse_line2  = नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥
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| verse_line1  = अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
| verse_line2  = पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
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| verse_line1  = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
| verse_line2  = भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥
}}
 
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| text    =
( भीष्मादिभिः शङ्खनादः )
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| verse_line1  = तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
| verse_line2  = सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ १२ ॥
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| verse_line1  = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
| verse_line2  = सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३ ॥
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| verse_line1  = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
| verse_line2  = माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः  ॥१४ ॥
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| verse_line1  = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
| verse_line2  = पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५ ॥
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| verse_line1  = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
| verse_line2  = नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६ ॥
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| verse_line1  = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
| verse_line2  = धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥
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| verse_line1  = द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
| verse_line2  = सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥ १८ ॥
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| verse_line1  = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
| verse_line2  = नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥
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| verse_line1  = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
| verse_line2  = प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २०॥
}}
 
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| verse_line1  = हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते ।
}}
 
{{Uvacha|अर्जुन उवाच}}
 
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| verse_line1  = यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।
| verse_line2  = कैर्मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२ ॥
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| verse_line1  = योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
| verse_line2  = धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३॥
}}
 
{{Uvacha|सञ्जय उवाच}}
 
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| verse_line1  = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
| verse_line2  = सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥
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| verse_line1  = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
| verse_line2  = उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥
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| verse_line1  = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् ।
| verse_line2  = आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ २६ ॥
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| verse_line1  = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
| verse_line2  = तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥
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| verse_line1  = कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
| verse_line2  = दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥ २८ ॥
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| verse_line1  = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
| verse_line2  = वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥
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| verse_line1  = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
| verse_line2  = न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥
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| verse_line1  = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
| verse_line2  = नच श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१ ॥
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| verse_line1  = न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
| verse_line2  = किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥
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| verse_line1  = येषामर्थे काङ्‍‍क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
| verse_line2  = त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥
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| verse_line1  = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
| verse_line2  = मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥
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| verse_line1  = एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
| verse_line2  = अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥
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| verse_line1  = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
| verse_line2  = पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः॥३६ ॥
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| verse_line1  = तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
| verse_line2  = स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥
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| verse_line1  = यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
| verse_line2  = कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥
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| verse_line1  = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् ।
| verse_line2  = कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥
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| verse_line1  = कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
| verse_line2  = धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥४० ॥
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| verse_line1  = अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
| verse_line2  = स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१ ॥
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| verse_line1  = संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
| verse_line2  = पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥
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| verse_line1  = दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
| verse_line2  = उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ ४३ ॥
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| verse_line1  = उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
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| verse_line1  = अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
| verse_line2  = यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ ४५ ॥
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| verse_line1  = यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
| verse_line2  = धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥
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{{VerseBlock
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| verse_line1  = एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
| verse_line2  = विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥
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{{Uvacha|सञ्जय उवाच}}
 
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| text    =
॥ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥
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[[Category:Bhagavadgitabhashya]]

Latest revision as of 06:41, 13 April 2026