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Brahmasutra/C3/S1: Difference between revisions

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== प्रथमः पादः ==
#REDIRECT [[Brahmasutra#BS_C03_S01]]
{{Adhyaya
| document_id  = BS
| chapter_num  = 3
| title        = प्रथमः पादः
}}साधनविचारोऽयमध्यायः । वैराग्यार्थे(य) गत्यादिनिरूपणा प्रथमपादे।
 
भूतबन्धो हि बन्धः- ‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति च वाराहे ।
तच्च मरणे भवति-
 
भूतानां विनिवृत्तिस्तु मरणं समुदाहृतम् ।भूतानां सम्प्रयोगश्च जनिरित्येव पण्डितैः॥’ इति च भारते ॥
 
अतः किं साधनैः? इत्यत आह-
 
=== तदन्तराधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V01
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (295)ओं तदन्तरप्रतिपत्तौरंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ओम् ॥ 03-01-01॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V01
| id      = BS_C03_S01_V01_B1
| text    =
शरीरान्तरप्रतिपत्तौ भूतपरिष्वक्त एव गच्छति ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V01
| id      = BS_C03_S01_V01_B2
| text    =
‘वेत्थ यथा पञ्चम्याम् आहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.३.२), ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.३.९) इति प्रश्नपरिहाराभ्याम् ॥ 01 ॥
}}
 
=== त्र्यात्मकत्वाधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V02
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (296)ओं त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ओम् ॥ 03-01-02 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V02
| id      = BS_C03_S01_V02_B1
| text    =
‘अप्’शब्दस्तु त्र्यात्मकत्वाद् युज्यते ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V02
| id      = BS_C03_S01_V02_B1
| text    =
भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’(भाग.३.२७.४५)इति च भागवते॥02॥
}}
 
=== प्राणागत्यधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V03
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (297)ओं प्राणगतेश्च ओम् ॥ 03-01-03॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V03
| id      = BS_C03_S01_V03_B1
| text    =
‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद् वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’ इति भाल्लवेयश्रुतेः प्राणगतेर्भूतान्यपि सह गच्छन्तीति सिद्धम् ॥ 03 ॥
}}
 
=== अग्न्याद्यधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V04
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (298)ओम् अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ओम् ॥ 03-01-04॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V04
| id      = BS_C03_S01_V04_B1
| text    =
‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’(बृ.उ.५.२.१३) इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेत्? न। भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V04
| id      = BS_C03_S01_V04_B2
| text    =
‘पुरुषस्य मृतौ ब्रह्मन् प्राणा भागत एव तु ।अधिदैवं प्राप्नुवन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ।पुनः शरीरसम्प्राप्तौतमेवानुविशन्ति च’इति ब्राह्मे ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V04
| id      = BS_C03_S01_V04_B5
| text    =
ब्रह्माण्डे च-‘मृतिकाले जहत्येनं प्राणा भूतानि पञ्च च ।भागतो भागतस्त्वेनमनुगच्छन्ति सर्वशः’ इति ॥ 04 ॥
}}
 
=== प्रथमेऽश्रवणाधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V05
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ओं प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ओम् ॥ 05-299 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V05
| id      = BS_C03_S01_V05_B1
| text    =
‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’(छां.उ.५.४.२) इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेत्, न।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V05
| id      = BS_C03_S01_V05_B2
| text    =
ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते । ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.९.१) इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥
}}
 
=== अश्रुतत्वाधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (300)ओम् अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणं प्रतीतेः ओम् ॥ 03-01-06॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V06
| id      = BS_C03_S01_V06_B1
| text    =
अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेत्, न। ‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्क्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥
}}
 
=== भाक्ताधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V07
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (301)ओं भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ओं॥ 03-01-07 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V07
| id      = BS_C03_S01_V07_summary
| text    =
‘अपाम सोमममृता अभूम’(ऋ.सं.८.४८.३) इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V07
| id      = BS_C03_S01_V07_B1
| text    =
भागतस्तदमृतत्वम् ।‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७) इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V07
| id      = BS_C03_S01_V07_B2
| text    =
वाशब्दात् पारम्पर्येणाऽत्मविदपेक्षया वा ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V07
| id      = BS_C03_S01_V07_B3
| text    =
तथा हि श्रुतिः –‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वा अननूक्तोऽन्यद् वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत् पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवाऽत्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवाऽत्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृ.उ.३.४.१५)
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V07
| id      = BS_C03_S01_V07_B4
| text    =
‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो यावन्मनुर्यावदादित्यः’,‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवत्यथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥
}}
 
=== कृतात्ययाधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (302)ओं कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम् ओम् ॥ 03-01-08 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V08
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| text    =
कृतस्य कर्मणो भोगेन क्षयान्मुक्तिरित्यत आह-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V08
| id      = BS_C03_S01_V08_B1
| text    =
‘ततः शेषेणेमं लोकमायाति पुनः कर्म कुरुते पुनर्गच्छति पुनरागच्छति’ इति श्रुतेः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V08
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| text    =
‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः ।कर्म कृत्वा पुनर्गच्छेत् पुनरायाति नित्यशः ॥’
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V08
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| text    =
‘आचतुर्दशमाद् वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ॥अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति’॥ इत्यादिस्मृतेश्च शेषवानेवाऽयाति ॥ 08 ॥
}}
 
=== यथेताधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V09
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (303)ओं यथेतमनेवं च ओम् ॥ 03-01-09 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V09
| id      = BS_C03_S01_V09_summary
| text    =
‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’() इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V09
| id      = BS_C03_S01_V09_B1
| text    =
‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद् वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’() इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥
}}
 
=== चरणाधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (304)ओं चरणादिति चेन्न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ओं॥ 03-01-10 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V10
| id      = BS_C03_S01_V10_B1
| text    =
‘तद् य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’(छां.उ.५.१०.७) इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V10
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| text    =
‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः ।अशुद्धिदस्त्वानाचारश्चरणं तूभयं मतम्’() ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V10
| id      = BS_C03_S01_V10_B5
| text    =
इति स्मृतेरिति चेत्, न । यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
}}
 
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| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (305)ओम् आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ओम् ॥ 03-01-11 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V11
| id      = BS_C03_S01_V11_B1
| text    =
तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात्, चरणशब्दस्याऽनर्थक्यमिति चेत्, न। चरणापेक्षत्वाद् रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वोपपत्तेः ॥ 11 ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V12
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = (306)ओं सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ओम् ॥ 03-01-12 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V12
| id      = BS_C03_S01_V12_B1
| text    =
‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’() इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुष्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V12
| id      = BS_C03_S01_V12_B2
| text    =
‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’() इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥
}}
 
=== अनिष्टादिकार्यधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V13
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ओं अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ओम् ॥ 13-307 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V13
| id      = BS_C03_S01_V13_summary
| text    =
पुण्याकृतामेव गमनागमने नेतरेषामित्यत आह-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V13
| id      = BS_C03_S01_V13_B1
| text    =
‘‘तद् य इह शुभाकृतो ये चाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयाऽवर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’() इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V14
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (308)ओं संयमने त्वनुभूयेतरेषाम् आरोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ओम् ॥ 03-01-14 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V14
| id      = BS_C03_S01_V14_B1
| text    =
‘संयमनमनुभूय केषाञ्चिदारोहः केषाञ्चिदवरोहः । तुशब्दोऽवधारणे ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V14
| id      = BS_C03_S01_V14_B2
| text    =
‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्य तमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद् वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुव्रजन्ति’() इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V15
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (309)ओं स्मरन्ति च ओम् ॥ 03-01-15 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V15
| id      = BS_C03_S01_V15_B1
| text    =
‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः ।‘तत्र भुक्त्वा पतन्त्येव ये द्विषन्ति जनार्दनम् ।‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित् ।‘इतरेषां तु पापानां व्युत्थानं विद्यतेऽपि च ।‘सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।‘इति सर्वत्र नियमः पञ्चकष्टे तु तत् सदा’() ॥ इत्यादि ॥ 15 ॥
}}
 
=== सप्ताधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V16
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (310)ओम् अपि सप्त ओम् ॥ 16-310 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V16
| id      = BS_C03_S01_V16_B1
| text    =
‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥
}}
 
=== तद्व्यापाराधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V17
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (311)ओं तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ओम् ॥ 03-01-17 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V17
| id      = BS_C03_S01_V17_summary
| text    =
ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’() इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V17
| id      = BS_C03_S01_V17_B1
| text    =
चशब्दाददुःखानुभवेन ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V17
| id      = BS_C03_S01_V17_B2
| text    =
‘स स्वर्गे स भूमौ स नरके सोऽन्धे तमसि प्रवृत्तिकृदेक एवानुविष्टो नासौ दुःखभुगीश्वरः प्रभुत्वात् सर्वं पश्यति सर्वं कारयति नासौ दुःखभुग् य एवं वेद’() इति पौत्रायणश्रुतेरविरोधः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V17
| id      = BS_C03_S01_V17_B3
| text    =
‘नरकेऽपि वसन्नीशो नासौ दुःखभुगुच्यते ।नीचोच्चतैव दुःखादेर्भोग इत्यभिधीयते ॥नासौ नीचोच्चतां याति पश्यत्येव प्रभुत्वतः’(छां.उ.५.१०.८) इति भागवततन्त्रे ॥ 17 ॥
}}
 
=== विद्याकर्माधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V18
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (312)ओं विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ओम् ॥ 03-01-18 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V18
| id      = BS_C03_S01_V18_summary
| text    =
‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानम्’(छां.उ.५.१०.८) इति गतिस्वातन्त्र्यं भूतानां प्रतीयत इत्यत आह-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V18
| id      = BS_C03_S01_V18_B1
| text    =
विद्याकर्मापेक्षयैवैतद् वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V18
| id      = BS_C03_S01_V18_B2
| text    =
‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग् वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥
}}
 
=== महातमोऽधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V19
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (313)ओं न तृतीये तथोपलब्धेः ओम् ॥ 03-01-19 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ ॥ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
}}
 
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| text    =
‘अथाविद्वानकर्माऽवाग्गच्छति त्रिधा ह वाऽवाग् गच्छति तिर्यग् यातना तम इति ।  द्वे वाव सुखानुवृत्ते, न तमः सुखानुवृत्तं केवलं ह्येवात्र दुःखं भवति’() इति श्रुतेर्न तृतीयावाग्गतौ सुखम् ॥ 19 ॥
}}
 
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| verse_line1  = (314)ओं स्मर्यतेऽपि च लोके ओम् ॥ 03-01-20 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
‘तिर्यक्षु नरके चैव सुखलेशो विधीयते ।नान्धे तमसि मग्नानां सुखलेशोऽपि कश्चन’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
}}
 
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| text    =
लोकसिद्धं चैतत्। चशब्दाल्लोकसिद्धिरपि स्मार्तेत्याह ।
}}
 
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| text    =
‘अतिप्रिये यथा राजा न दुःखं सहते क्वचित् ।अत्यप्रिये सुखमपि तथैव परमेश्वरः’इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥
}}
 
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| verse_line1  = (315)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 03-01-21 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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| text    =
‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान् ॥नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून् ।निरस्ताशेषदुःखांश्च नित्यानन्दैकभागिनः ॥अपश्यत् त्रिविधान् ब्रह्मा साक्षादेव चतुर्मुखः॥’ इति दर्शनवचनाच्च पाद्मे ॥ 21 ॥
}}
 
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| verse_line1  = (316) ओं तृतीये शब्दावरोधः संशोकजस्य ओम् ॥ 03-01-22॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
तृतीये तृतीयतमसः श्रवणादेव शब्दानुसारेण संशोकजमोहप्राप्तिः ॥ 22 ॥
}}
 
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| verse_line1  = (317)ओं स्मरणाच्च ओम् ॥ 03-01-23 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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| text    =
‘महातमस्त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वं मध्यं तथाऽधरम् ।श्रवणादेव मूर्च्छादिरधरस्य यतो भवेत् ॥तस्मान्न विस्तरेणैतत् कथ्यते राजसत्तम॥’ इति कौर्मे ॥ 23 ॥
}}
 
=== तत्स्वाभाव्याधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = (318)ओं तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ओम् ॥ 03-01-24॥
| commentary1  = brahmasutra
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| verse_id = BS_C03_S01_V24
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| text    =
‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’(छां.उ.५.१०.५,काषायणश्रुतौ) इत्याद्यन्यभावः श्रूयते । स कथमित्यतो ब्रवीति-
}}
 
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| text    =
धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः ।
}}
 
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| text    =
न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते । न च तत्पदप्राप्तिः ।
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V24
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| text    =
गारुडे च-
धूमादिभावप्राप्तिश्च तद्गतौ गतिरेव तु ।स्थितौ स्थितिः प्रवेशश्च लघुत्वादिस्तथैव च ॥
न ह्यन्यस्यान्यथाभावो न च तत्पदमिष्यते ।विद्यागम्यं पदं यस्मात् न तत्प्राप्यं हि कर्मणा॥
एकदेशस्वभावेन वागभेदाऽपि युज्यते ।यथा जीवः परं ब्रह्म ब्रह्मेदं जगदित्यपि॥’ इति ॥ 24 ॥
}}
 
=== नातिचिरेणाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = (319)ओं नातिचिरेण विशेषात् ओम् ॥ 03-01-25 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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| text    =
बहुस्थानगमनात् कल्पान्तमप्येवं स्यादित्यत आह-
}}
 
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| text    =
‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’(छां.उ.५.१०.७) इति विशेषान्नातिचिरेण ॥
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V25
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| text    =
‘स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात् पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च॥’(छां.उ.५.१०.७) इति च नारदीये ॥ 25 ॥
}}
 
=== अन्याधिष्ठिताधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = (320)ओम् अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् ओम् ॥ 03-01-26॥
| commentary1  = brahmasutra
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| verse_id = BS_C03_S01_V26
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| text    =
‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’(छां.उ.५.१०.६) इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
}}
 
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| text    =
अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य ।
}}
 
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| text    =
‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’(छां.उ.५.१०.५) इत्यादिपूर्वोक्तिवत् ॥
}}
 
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| text    =
‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
}}
 
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| verse_line1  = (321)ओम् अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ओम् ॥ 03-01-27॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
हिंसारूपत्वात् पापस्यापि सम्भवाद्धुःखं च भवत्विति चेन्न। शब्दविहितत्वात्॥
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V27
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| text    =
‘हिंसा त्ववैदिका या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत्।वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथञ्चन’ इति वाराहे॥ 27 ॥
}}
 
=== रेतोऽधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = (322)ओं रेतःसिग्योगोऽथ ओम् ॥ 03-01-28॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V28
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| text    =
‘स्वर्गादवाग्गतश्चापि मातुरेवोदरं व्रजेत्’ इति वचनात्  ‘य एव गृही भवति यो वा रेतः सिञ्चति तमेवानुविशति’इति श्रुतिः कथमित्यत आह-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V28
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| text    =
‘ततो रेतःसिचमेवानुप्रविशत्यथ मातरमथ प्रसूयते स कर्म कुरुते’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः पितरमेव प्रथमतो विशति।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V28
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| text    =
मातृप्राप्तेः पश्चादपि भाव्यत्वात् ॥ 28 ॥
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=== योन्यधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V29
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = (323)ओं योनेः शरीरम् ओम् ॥ 03-01-29॥
| commentary1  = brahmasutra
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| verse_id = BS_C03_S01_V29
| id      = BS_C03_S01_V29_summary
| text    =
‘देहं गर्भस्थितं क्‍वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
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| text    =
पितृशरीरान्मातृयोनिमनुप्रविश्य तत एव शरीरमाप्नोति ।
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| text    =
‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितमथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V29
| id      = BS_C03_S01_V29_B3
| text    =
‘स्थावराणि दिवः प्राप्तः स्थावरेभ्यश्च पूरुषम् ।पुरुषात् स्त्रियमापन्नस्ततो देहं यथाक्रमम् ॥
देहेन जायते जन्तुरिति सामान्यतो जनिः ।विशेषवचनं(जननं) चापि प्रोच्यमानं निबोध मे ॥
स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च॥’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥
}}
 
 
[[Category:Brahmasutra]]

Latest revision as of 06:40, 13 April 2026