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| == द्वितीयः पादः ==
| | #REDIRECT [[Anuvyakyanam#AV_C04_S02]] |
| {{Adhyaya
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| | document_id = AV
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| | chapter_num = 4
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| | title = द्वितीयः पादः
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| }}देवानां च मनुष्याणामेतावत्सममेव हि ॥1॥
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| उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः ।कर्मक्षयस्तथोत्क्रान्तिर्मार्गो भोगश्चतुष्टयम् ॥2॥
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| फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः ।स्रष्टृष्वेव च(तु) सृज्यानां प्रवेशो ब्रह्मणो लये ॥3॥
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| देवानां मार्ग उद्दिष्टो नार्चिरादिर्न चोत्क्रमः ।स्रष्टुस्तु ग्रासभूतस्य देहस्तत्र लयं व्रजेत् ॥4॥
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| यतः सृज्यस्य देवस्य नैवोत्क्रान्तिस्ततो भवेत् ।लयाच्चैवार्चिरादीनां लोकानामपि सर्वशः ॥5॥
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| कथं मार्गो भवेत् तेषां विशतामुत्तरं(विशतामुत्तमं) स्वतः ।जातानां मानुषे लोके देवानां तु(च) कदाचन ॥6॥
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| उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते ।अन्येषामपि साक्षाततु मुक्तिः प्राप्यापि तं हरिम् ॥सहैव ब्रह्मणा भूयादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥7॥
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| ‘क्ष्माम्भोऽनलानलिवियन्मनइन्द्रियार्थभूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः ।अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं परं स्वमनुभूय परः स्वयम्भूः(भाग.३.३२.९) ॥8॥
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| एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः(भाग.३.३२.१०) ॥9॥
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| ‘भगवन्तमनुप्राप्ता अपि तु ब्रह्मणा सह ।परमं मोक्षमायान्ति लिङ्गभङ्गेन योगिनः’ ॥10॥
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| ‘प्राप्ता अपि परं देवं सहैव ब्रह्मणा पुनः ।आनन्दव्यक्तिमायान्ति पूर्णा लिङ्गस्य भङ्गतः’ ॥11 ॥
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| इति श्रुतिपुराणोक्तिबलाद्विज्ञायते च तत् ।भोगस्तु सर्वदेवानां नरादीनां च विद्यते ॥12॥
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| तत्र प्रवेशो देवानामुत्तरोत्तरतः क्रमात् ।उच्यते देहगानां च वृत्तीनामेवमेव तु ॥13॥
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| तत्र मोक्षस्वरूपं तु वादिनः प्रतिभाश्रयात् ।नाना वदन्ति पुंसां हि मतयो गुणभेदतः ॥14॥
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| पृथक् पृथक् प्रजायन्ते तमसैवान्यथामतिः ।रजसा मिश्रबुद्धित्वं सत्त्वेनैव यथामतिः ॥15॥
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| गुणातीता विमुक्तानां मतिः शुद्धिचितिर्यतः ।सम्यगेवाथ नित्या च तत्तन्माहात्म्ययोगतः ॥16॥
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| बहुला चातिविशदा स्पष्टा चैव श्रियो मतिः ।महाशुद्धचितित्वेन ततोऽप्यतिमहाचितिः ॥17॥
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| अशेषोरुविशेषाणामतिस्पष्टतया दृशिः ।नित्यमेकप्रकारा च नारायणमतिः परा ॥18॥
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| सूर्यप्रभावदखिलं भासयन्ती निरन्तरा ।निर्लेपा वीतदोषा च नित्यमेवाविकारिणी ॥19॥
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| विशेषांस्तद्गतांस्त्यक्त्वा प्रायस्तल्लक्षणा श्रियः ।तथैव स्पष्टताभावात् तत्तन्त्रत्वात् तु(च) केवलम् ॥20॥
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| न तादृशी ब्रह्मणस्तु एवं श्रियो यथा ।मुक्तानां तु तदन्येषां समुद्रतरलोपमा ॥21॥
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| अग्निज्वालावदेव स्यात् सृतिगानां दृशो भवः ।एवंविधेषु ज्ञानेषु तमसा मुष्टदृष्टयः ॥22 ॥
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| खद्योतसदृशात्यल्पज्ञानत्वादन्यथादृशः ।वदन्ति वादिनो मोक्षं नानामतसमाश्रयात् ॥23॥
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| आश्रित्य प्रतिभामाह जिनस्तत्रातितामसीम् ।ज्ञानात् कर्मक्षयान्मोक्षो भवेद्देहाख्यपञ्जरात् ॥24॥
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| पञ्जरोन्मुक्तखगवदलोकाकाशगोचरः ।नित्यमूर्ध्वं व्रजत्येव पुद्गलो हस्तपादवान् ॥25॥
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| इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) ।गतिरूर्ध्वा च दुःखेता गतित्वाल्लौकिकी यथा ॥26॥
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| इत्युक्ते चानुमानैकशरणस्य किमुत्तरम् ।अनूर्ध्वगतिता तत्र यद्युपाधिः खगस्य च ॥27॥
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| दूरोर्ध्वगमने दुःखमिति साध्यानुगो न सः ।प्रतिसाधनरूपस्य नानुमानस्य दूषणम् ॥28॥
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| उपाधिः प्रतिरूपं हि साधनं तन्न चापरम् ।अथापि सशरीरत्वं चात्रोपाधिर्न वै भवेत् ॥29॥
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| गतित्वं यत्र देहित्वमिति यत्साधनानुगम् ।आगमाननुसारित्वे प्रसङ्गोऽयं यतस्ततः ॥30॥
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| नापसिद्धन्तता दोषः प्रसङ्गे यदि सा भवेत् ।तदैवातिप्रसङ्गः स्यान्न प्रसङ्गः क्वचिद्भवेत् ॥31॥
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| लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः ।सोऽपीत्युक्ते वदेत् किं स तस्माद्वेदोदितो भवेत् ॥32॥
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| मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् ।चकार सौगतमतं मोहायैव चकार यत् ॥33॥
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| असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् ।अतोऽसुराधिकारत्वान्न ग्राह्यं तन्मतं क्वचित् ॥34॥
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| चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् ।अनुमेयबहिस्तत्त्वं तथा प्रत्यक्षबाह्यगम् ॥35॥
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| इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः ।ते मोक्षं तादृशं ब्रूयुर्निःशङ्कं मायिनो यथा ॥36॥
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| न किञ्चिन्मुक्त्यवस्थायामात्मात्मीयमथापि वा ।एकस्मिन् संसृतेर्मुक्ते न किञ्चिदवशिष्यते ॥37॥
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| तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः ।दृश्यते संसृतेर्ध्वंसे निर्विशेषैव शून्यता ॥38॥
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| न सत्त्वं नैव चासत्त्वं शून्यतत्त्वस्य विद्यते ।न सुखत्वं न दुःखत्वं न विशेषोऽपि कश्चन ॥39॥
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| निर्विशेषं स्वयम्भातं विर्लेपमजरामरम् ।शून्यं तत्त्वमसम्बाधं नानासंवृतिवर्जितम् ॥40॥
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| अशेषदोषरहितं मनोवाचामगोचरम् ।मोक्ष इत्युच्यतेऽसद्भिर्नानासंवृतिवर्जितम् ॥41॥
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| संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) ।स्थितया ध्वस्तया चैव संसृतिर्मोक्ष इत्यपि ॥42॥
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| केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा ।अवच्छिन्नं महाशून्यं नाना पुद्गलशब्दितम् ॥43॥
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| यस्य शून्यैकरसता ज्ञानात्मा त्वपगच्छति ।स पुद्गलत्वनिर्मुक्तो महाशून्यत्वमेष्यति ॥44॥
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| संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् ।इत्येवं मायिनश्चाहुरेकजीवत्ववादिनः ॥45॥
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| बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः ।निर्विशेषत्ववाचैव शून्यं ब्रह्मेति नो भिदा(ब्रह्मैव तो भिदा) ॥46॥
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| सच्चित्यसुखादिकं चैव किं कुतोऽखण्डवादिनः ।व्यावर्त्यमात्रभेदस्तु विद्यते शून्यवादिनः ॥47॥
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| अनृतादेरपोहं तु स्वयमेव हि मन्यते ।निर्विशेषत्वतो नैव विशेषो ब्रह्मशून्ययोः ॥48॥
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| प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि ।अतत्त्वावेदकं यस्मात् प्रमाणं तेन कथ्यते ॥49॥
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| अतत्त्वावेदकं यदप्रामाण्यं सतां मतम् ।दीर्घभ्रान्तिकरी चेत् स्यादतत्त्वावेदकप्रमा ॥50॥
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| रज्जुसर्पादिविज्ञानादप्याधिक्यादमानता ।स्यादागमस्यानिवर्त्यमहामोहप्रदत्वतः ॥51॥
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| तलनैल्यादिविज्ञानमाकाशे मानतां व्रजेत् ।छत्राकारत्वविज्ञानं चन्द्रप्रादेशतामतिः ॥52॥
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| निर्भेदत्वं तु शून्यस्य तेनाप्यङ्गीकृतं सदा ।सत्त्वासत्त्वादिधर्माणामभाव उभयोर्मतः ॥53॥
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| न हि सत्प्रतियोगित्वं शून्यत्वं तेन चेष्यते ।न च दुःखविरोधित्वादन्या ह्यानन्दतेष्यते ॥54॥
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| मायिना शून्यपक्षेऽपि ज्ञानं जाड्यविरोधि च ।धर्माः केऽपि(धर्मास्तेऽपि) न सन्त्येव को विशेषस्ततस्तयोः ॥55॥
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| एतादृशानां पक्षाणां दूषणं प्रभुणा कृतम् ।स्वपक्षसाधनेनैव ‘नाभाव’ इति चोक्तितः ॥56॥
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| आत्माभावे पुमर्थः क इष्टस्यात्माऽऽवधिर्यतः ।यदि नात्मावधिर्मोक्षो मोक्षः स्याद्धटशून्यता ॥57॥
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| कल्पितत्वाद्विशेषाणां मायिनोऽपि समं हि तत् ।दृश्यमाने विशेषेऽपि यदि चेदविशेषता ॥58॥
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| घटाभावोऽविशेषः स्यात् पाश्चात्यश्चेदनागतः ।न मोक्षो विमतो यस्माददेहो घटशून्यता ॥59॥
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| यथेत्युक्तो वदेत् किं स योनुमामात्रमानकः ।न च मायी वदेत् तत्र पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ॥60॥
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| अमानत्वात् श्रुतेस्तस्य न चादेहत्ववादिनी ।श्रुतिः काचिददेहत्वमप्राकृतशरीरताम् ॥61॥
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| मोक्षे भोगं यतो ब्रूते जक्षन् क्रीडन्निति श्रुतिः ।निर्दुःखत्वान्न तन्मोक्षः प्रतिपन्नं यथेति च ॥62॥
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| अनुमादूषणं किं स्याद्वादिनोः शून्यमायिनोः ।दुःखं दुःखादभिन्नत्वान्मोक्षोऽपि स्यादसंशयम् ॥63॥
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| भेदे सद्द्वैततैव स्यादित्याद्यमितदोषतः ।हेयं मायामतेनैव सह शून्यमतं बुधैः ॥64॥
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| एवं विज्ञानवादोऽपि ज्ञानमात्रविशेषतः ।तस्यापि भङ्गुरत्वादिविशेषमपहाय हि ॥65॥
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| अद्वैततामतं साक्षादुक्तदोषस्ततो भवेत् ।कालो न केवलज्ञानी कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥66॥
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| एतयाऽनुमया रोधान्न तादृङ्मोक्षरूपता ।यदि कालोऽपि नेत्याह कदेति प्रश्न उत्तरम् ॥67॥
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| किं वक्ष्यति यदावस्थां वदेत् सा पक्षतां व्रजेत् ।अवस्थात्वादिति ह्येव हेतुः साऽपि कदेति च ॥68॥
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| पृष्टे कालश्च वक्तव्यो नाकालत्वं ततो भवेत् ।न काल इति सामान्यनिषेधे कालगप्रमा ॥69॥
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| निरुणद्धि समश्चायं त्रयाणामुक्तवादिनाम् ।एकजीवत्वपक्षे तु कालाभावादियं प्रमा ॥70॥
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| कुपिता कालमाधाय द्वैतमेवोपपादयेत् ।विमतः प्रपञ्चवान् कालः कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥71॥
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| इति चान्यानुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् ।कालशब्देश्वरैकत्वमतान्यप्येवमेव हि ॥72॥
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| निराकृतानि तेषां च समत्वात् पक्षदोषयोः ।ज्ञानं स्वरसभङ्ग्येव नित्यसन्तानमिष्यते ॥73॥
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| बौद्धाभ्यामपराभ्यां तु तत्राप्युक्तानुमा रिपुः ।मोक्षो न शुद्धविज्ञानसन्तानी कालगत्वतः ॥74॥
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| प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् ।अनुमानानि सर्वाणि प्रतिसाधनयोगतः ॥75॥
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| निषिद्धान्युक्तभङ्ग्यैव श्रुतयश्चास्मदुक्तिगाः ।साङ्ख्यनैयायिकाद्याश्च प्राहुर्मोक्षं च(तु) निःसुखम् ॥76॥
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| इच्छाद्वेषप्रयत्नादेरपि सर्वात्मना लयम् ।तत्राहुर्नैतदप्यत्र शोभनं श्रुतयो यतः ॥77॥
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| महानन्दं च भोगं च नियमेन वदन्ति हि ।प्राकृतप्रियहानिस्तु प्रियास्पृष्टिरितीर्यते ॥78॥
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| अप्रियं प्रतिकूलं तदविशेषेण शब्दितम् ।नास्ति ह्यप्राकृतं दुःखं सतो जीवस्य कुत्रचित् ॥79॥
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| प्रियं स्वरूपमेवास्य बलानन्दादिवाक्यतः ।हेयत्वादप्रियस्यैव प्रियहानेरनिष्टतः ॥80॥
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| न समस्तप्रियाभावो मोक्षे प्रोक्ते तु युज्यते ।अप्रियस्य स्वरूपत्वमसुरेष्वेव हि श्रुतम् ॥81॥
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| असुरा नैवमेवं च नैवं चाखलिमानुषाः ।इत्यात्मप्रियहानाय को यतेत च बुद्धिमान् ॥82॥
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| सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि ।धर्मानुच्छित्तिमेवास्य यतो वक्त्युत्तरश्रुतिः ॥83॥
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| आशङ्क्यास्य ज्ञानहानिं मैत्रेय्या मोहमाह माम् ।भवानित्युक्तवत्या हि नाहं मोहं वदामि ते ॥84॥
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| इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यो हि स्वरूपानाशमूचिवान् ।ज्ञानरूपस्य विज्ञाननाशस्तन्नाश एव यत् ॥85॥
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| इति शून्यमतोच्छित्त्यै पुनरानन्दपूर्वकान् ।धर्मानाहाप्यनुच्छिन्नांस्तार्किकैर्विनिवारितान् ॥86॥
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| मात्रासंसर्गमप्याह तथा माध्यन्दिनश्रुतिः ।आचिक्षेप मतं तच्च यस्मिन्न विषयादनम् ॥87॥
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| घ्राणादिभोगाभावस्य त्वनिष्टत्वहृदा श्रुतिः ।येनेदमखिलं वेद विज्ञातारं स्वमेव च ॥88॥
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| केन तं च विजानीयादित्यनिष्टं हि सर्वथा ।नाखिलज्ञापको विष्णुरज्ञेयो नियमेन हि ॥89॥
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| तज्ज्ञानार्थं हि वेदानामखिलानां प्रवर्तनम् ।प्रत्यक्षमात्मविज्ञानाविरोधानुभवादपि ॥90॥
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| न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते ।कर्तृकर्मविरोधश्च नित्यानुभवरोधतः ॥91॥
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| कथमेव पदं गच्छेद्विरोधोऽदृष्टबाधनम् ।‘सोऽश्नुते सर्वकामांश्च’ ‘कामान्नी कामरूप्यथ’ ॥92॥
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| इत्यादिश्रुतयश्चोक्तमर्थमेव वदन्ति हि ।अस्वातन्त्र्यादिवेत्युक्तं न द्वैताभावतः क्वचित् ॥93॥
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| आत्मैवाभूदिति ह्यस्मादविशेषप्रसङ्गतः ।‘अस्वातन्त्र्योपमाभेदभेदेष्विव उदीरितः’ ॥94॥
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| शब्दतत्त्व इति प्रोक्तं मैत्रेय्युक्तोत्तरं च किम् ।सुखादिधर्महानौ तु मुक्तेः किं च प्रयोजनम् ॥95॥
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| यद्यर्थो दुःखहानिः स्यादनर्थः सुखनाशनम् ।तयोश्च दुःखहानाद्धि सुखनाशोऽधिको भवेत् ॥96॥
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| प्राप्यापि दुःखं सुमहत्सुखलेशाप्तये जनः ।यतते सुखहानौ हि को मोक्षाय यतेत् पुमान् ॥97॥
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| अल्पाच्च सुखनाशाद्धि बिभेत्यतितरां जनः ।महच्च दुःखमाप्नोति सुखनाशनिवृत्तये ॥98॥
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| न च रागनिमित्तं तद्वीतरागा अपि स्फुटम् ।नारदाद्याः सुखार्थाय सहन्ते दुःखमञ्जसा ॥99॥
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| युद्धादिदर्शनं यस्मात् सुदुःखेनापि कुर्वते ।‘यदेन्द्रवैरोचनयोर्ब्रह्मास्त्राभ्यां सुतापिताः ॥100 ॥
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| अपि नैवाजहुर्युद्धरसात् ते नारदादयः’ ।इति स्कान्दवचनस्तस्मात् सुखाभावाय को यतेत् ॥101॥
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| विमतो दुःखयुग् यस्माच्चेतनः सन् सुखोज्झितः ।प्रतिपन्नो यथेत्येव चानुमा केन वार्यते ॥102॥
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| सर्वश्रुतिपुराणेषु सुखभावोक्तितस्तथा ।मुक्तौ न ग्राह्यमेवैतत्सुखाभावमतं बुधैः ॥103॥
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| ‘सोऽनानन्दाद्विमुक्तः सन्नानन्दी भवति स्फुटम्’ ।‘निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः ॥104॥
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| परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) ।‘न विष्णुसदृशं दैवं न मोक्षसदृशं सुखम् ॥105॥
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| | |
| न वेदसदृशं वाक्यं न वर्णोङ्कारसंमितः’ ।‘यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ॥106॥
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| कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि’ ।इति श्रुतिपुराणानि तत्र तत्र वदन्ति हि ॥107॥
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| अतो मोक्षे सुखाभाव इति यत्किञ्चिदेव हि ।शिरःकराद्यभावश्च न मुक्तस्य भवेत् क्वचित् ॥108॥
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| श्रुतयश्च पुराणानि मानमत्र बहूनि च ॥109॥
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| ‘न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥110॥
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| श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणिप्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥111॥
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| प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥112॥
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| विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रवलिभिर्यथा नभः ।श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः’(भाग.२.९.१०-१३) ॥113॥
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| | |
| ‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः’(ऋ.सं.१०.७१.११) ॥114॥
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| | |
| कामान्नरूपी चरतीतिपूर्व श्रुत्या पुराणोक्तिभिरप्यदोषः ।देहः स्वरूपात्मक एव तेषां मुक्तिं गतानामपि चेयते हि ॥115॥
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| | |
| शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् ।यथेति पूर्वा अनुमाश्च जीव स्वरूपमङ्गादिकमावयन्ति(आपयन्ति) ॥116॥
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| न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् ।स ब्रह्मणा सहितोऽशेषभोगान् भुङ्क्ते तथोपेत्य सुखार्णवं तम् ॥117॥
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| यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् ।भुङ्क्ते स देवः(दैवं) पुरुषोत्तमोऽजः आत्मेति चोक्तो गुणपूर्तिहेतोः ॥118॥
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| | |
| सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् ।इत्यादिवाक्यैर्भगवद्वशः सन् भुङ्क्तेऽखिलान् मुक्तिगतोऽपि भोगान् ॥119॥
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| | |
| कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् ।इत्यादिका अप्यनुमाः प्रमाणं मुक्तौ च जीवस्य परत्वरोधे ॥120॥
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| कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति ।यतो न दृष्टं यदभून्न पूर्वं पश्चात् तदासेति कुतश्च किञ्चित् ॥121॥
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| | |
| न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति ।यतो न कुत्रापि भिदाभिदा च दृष्टा चितश्चेतनया कुतश्चित् ॥122॥
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| इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण ।विदुर्न सम्यग्यदपीह लौकिकाः सुखं मम स्याच्च सदेति जानते ॥123॥
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| औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः ।स्वातन्त्र्यमापूर्णविशेषयोग्यता विरोधहानिश्च चतुर्थपादे ॥124॥
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| व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् ।विभक्तता चात्वरयैव सिद्धिर्विपक्षसम्प्राप्तिविरुद्धहेतवः ॥125॥
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| सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः ।नानाप्रवृत्तिः कृतकृत्यता च विपक्षतर्काः समतीतपादे ॥126॥
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| | |
| महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् ।विशेषकार्यं कृतिसंस्थितिश्च(कृतसंस्थितिश्च) सुयुक्तयो निर्णयगाः स्वपक्षे ॥127॥
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| | |
| व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च ।समानधर्मः कृतशेषता च लोकोपमा पूर्वमतानुसाराः ॥128॥
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| | |
| विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः ।कृतार्थता शश्वदनुप्रवृत्तिः सिद्धान्तनिर्णीतिविशिष्टहेतवः ॥129॥
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| === नैकस्मिन्नधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = प्रधानवायुस्त्विह वायुनामा भूतेष्विति प्रोक्तगतोऽपि युक्त्या ।यस्मात् श्रुतौ पवते चेति भूरिप्रोक्तो यतो भूतमानी च सोऽपि ॥130॥
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| }}
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| === पराधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = तस्मिन् लयं यान्ति भूतान्यशेषक्रमाविरोधेन स एव विष्णौ ॥131॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
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