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| == प्रथमः पादः ==
| | #REDIRECT [[Anuvyakyanam#AV_C04_S01]] |
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| | title = प्रथमः पादः
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| }}समन्वयाविरोधाभ्यां सिद्धे वस्तुनि साधने ।विचारितेष्वशेषेषु साधनेषु विशेषतः ॥1॥
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| नित्यशः कार्यमत्यन्तमवश्यम्भावि साधनम् ।चिन्त्यते प्रथमं तत्र श्रवणादिसकृत्क्रिया ॥2॥
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| आवृत्तिर्वेति सन्देहे कर्तव्यावृत्तिरेव हि ।उपदेशोऽतत्त्वमसीत्यादि ह्यसकृदेव यत् ॥3॥
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| ‘लिङ्गाल्लातव्यतः पूर्वमृजोर्ब्रह्मत्वतः शतात् ।शुश्रावोग्रतपा नाम योग्यो रुद्रपदस्य यः ॥4॥
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| सार्धं परार्धं विष्णोस्तु गुणान् भक्त्या सदोद्यतः ।तत्त्रिभागमुपासां च चक्रे सम्भृतमानसः ॥5॥
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| दशमन्वन्तरं शक्रपदयोग्यो गरुत्मतः ।पदयोग्यात्सुमनसः सुनन्दो नाम चाशृणोत् ॥6॥
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| उपासां चक्र उद्युक्तो मन्वन्तरचतुष्टयम् ।सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पदयोग्यौ सुतेजसौ ॥7॥
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| सुरूपः शान्तरूपश्च मन्वन्तरचतुष्टयम् ।अशृण्वतां सुमनसो मन्वन्तरमुपासताम् ॥8॥
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| ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः ।अपश्यन् परमं विष्णुं तत्प्रसादैधिताः(तत्प्रसादेधिताः) सदा ॥9॥
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| इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते ।आत्मेति नाम कथितं साक्षान्नारायणस्य हि ॥10॥
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| === आत्माधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = ‘आत्मा ब्रह्म महांस्तारः परमेशः शुचिश्रवाः ।विष्णुर्नारायणोऽनन्त इति श्रीपतिरीर्यते’ ॥11॥
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| === न प्रतीकाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = प्रतीकविषयत्वेन न कार्या विष्णुभावना ॥19॥
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| === ब्रह्माधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = ब्रह्मेति च सदा ध्येयो भगवान् विष्णुरञ्जसा ।उत्कृष्टो ब्रह्मशब्दार्थः पूर्णत्वं ब्रह्मतां यतः ॥35॥
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| === तदधिगमाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = तथोपास्यञ्जसा दृष्टं ब्रह्म पापं च भस्मसात् ॥63॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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| }}
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| [[Category:Anuvyakyanam]] | |