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Anuvyakyanam: Difference between revisions

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__NOTOC__
__NOTOC__


== अध्यायाः ==
<div class="gr-chapter-nav">
* [[Anuvyakyanam/C1/S1|प्रथमाध्यायः — प्रथमः पादः]]
<div class="gr-chapter-nav-title">अनुक्रमणिका</div>
* [[Anuvyakyanam/C1/S2|प्रथमाध्यायः — द्वितीयः पादः]]
<ul>
* [[Anuvyakyanam/C1/S3|प्रथमाध्यायः — तृतीयः पादः]]
<li><a href="#AV_C01_S01">प्रथमाध्यायः — प्रथमः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C1/S4|प्रथमाध्यायः — चतुर्थः पादः]]
<li><a href="#AV_C01_S02">प्रथमाध्यायः — द्वितीयः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C2/S1|द्वितीयोध्यायः — प्रथमः पादः]]
<li><a href="#AV_C01_S03">प्रथमाध्यायः — तृतीयः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C2/S2|द्वितीयोध्यायः — द्वितीयः पादः]]
<li><a href="#AV_C01_S04">प्रथमाध्यायः — चतुर्थः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C2/S3|द्वितीयोध्यायः — तृतीयः पादः]]
<li><a href="#AV_C02_S01">द्वितीयोध्यायः — प्रथमः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C2/S4|द्वितीयोध्यायः — चतुर्थः पादः]]
<li><a href="#AV_C02_S02">द्वितीयोध्यायः — द्वितीयः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C3/S1|तृतीयाध्यायस्य — प्रथमः पादः]]
<li><a href="#AV_C02_S03">द्वितीयोध्यायः — तृतीयः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C3/S2|तृतीयाध्यायस्य — द्वितीयः पादः]]
<li><a href="#AV_C02_S04">द्वितीयोध्यायः — चतुर्थः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C3/S3|तृतीयाध्यायस्य — तृतीयः पादः]]
<li><a href="#AV_C03_S01">तृतीयाध्यायस्य — प्रथमः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C3/S4|तृतीयाध्यायस्य — चतुर्थः पादः]]
<li><a href="#AV_C03_S02">तृतीयाध्यायस्य — द्वितीयः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C4/S1|चतुर्थाध्यायस्य — प्रथमः पादः]]
<li><a href="#AV_C03_S03">तृतीयाध्यायस्य — तृतीयः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C4/S2|चतुर्थाध्यायस्य — द्वितीयः पादः]]
<li><a href="#AV_C03_S04">तृतीयाध्यायस्य — चतुर्थः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C4/S3|चतुर्थाध्यायस्य — तृतीयः पादः]]
<li><a href="#AV_C04_S01">चतुर्थाध्यायस्य — प्रथमः पादः</a></li>
* [[Anuvyakyanam/C4/S4|चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः]]
<li><a href="#AV_C04_S02">चतुर्थाध्यायस्य — द्वितीयः पादः</a></li>
<li><a href="#AV_C04_S03">चतुर्थाध्यायस्य — तृतीयः पादः</a></li>
<li><a href="#AV_C04_S04">चतुर्थाध्यायस्य — चतुर्थः पादः</a></li>
</ul>
</div>
 
{{Adhyaya
| document_id  = AV
| chapter_num  = 1
| section_num  = 1
| title        = प्रथमः पादः
}}
नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः ।अस्योद्भवादिदमशेषविशेषतोऽपि वन्द्यं सदा प्रियतमं मम सन्नमामि ॥1॥
 
तमेव शास्त्रं प्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव ।विशेषतो मे परमाख्यविद्याव्याख्यां करोम्यन्वपि चाहमेव ॥2॥
 
प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः ।अर्थितः परविद्याख्यं चक्रे शास्त्रमनुत्तमम् ॥3॥
 
गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः ।यतस्तदुदितं मानमजादिभ्यस्तदर्थतः ॥4॥
 
वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता ।आप्तवाक्यतया तेन श्रुतिमूलतया तथा ॥5॥
 
युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् ।दृश्यते ब्रह्मसूत्राणामेकधाऽन्यत्र सर्वशः ॥6॥
 
अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते ।स्वयङ्कृताऽपि तद्य्वाख्या क्रियते स्पष्टतार्थतः ॥7॥
 
तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते ।सर्वत्रानुगतत्वेन पृथगोङ्क्रियतेऽखिलैः ॥8॥
 
=== जिज्ञासाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ओतत्ववाची ह्योङ्कारो वक्त्यसौ तद्गुणोतताम् ।स एव ब्रह्मशब्दार्थो नारायणपदोदितः ॥9॥
}}
 
=== जन्माधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्तस्समुद्रगं विश्वप्रसूतेः कारणं तु यत् ।सूक्तोपनिषदाद्युक्तं ‘जन्माद्यस्य’ इति लक्ष्यते ॥89॥
}}
 
=== शास्त्रयोनित्वाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = एवं धर्मानिति श्रुत्या तदभेदोऽप्युदीर्यते ।शैवाद्यागमसम्प्राप्तदृष्टगेन फलेन तु ॥112॥
}}
 
=== समन्वयाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उपक्रमादिलिङ्गेभ्यो नान्या स्यादनुमा ततः ।त एवान्वयनामानः तैः सम्यक् प्रविचारिते ॥120॥
}}
 
=== ईक्षत्यधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ईक्षणीयत्वतो विष्णुर्वाच्य एव न चान्यथा ॥121॥
}}
 
=== आनन्दमयाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = एवं शास्त्रवगम्यत्वे विभागेन समन्वयम् ॥154॥
}}
 
=== अन्तस्थत्वाधिकरणम् ===
 
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| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ............ देवानां तत्र शक्तताम् ।आशङ्क्य तत्र रूढिं च तच्छब्दानामपि स्वयम् ॥242॥
}}
 
=== आकाशाधिकरणम् ===
 
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| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = चेष्टा हि चेतनानां या सा भवेत् तत्प्रसादतः ।अचेतनस्वभावस्तु विवरादिः कथं ततः ॥244॥
}}
 
=== प्राणाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = .............अध्यात्ममन्वयव्यतिरेकतः ॥246॥
}}
 
=== गायत्र्यधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नित्यत्वादेव शब्दस्य तत्स्वभावः कथं हरेः ।कथं प्रसिद्धबहुलशब्दानामन्यथार्थता ॥248॥
}}
 
=== अन्तिमप्राणाधिकरणम् ===
 
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = .........बाहुल्ये श्रुतिलिङ्गयोः ॥249॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = AV_C01_S01
| id      = AV_C01_S01_author-note
| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
}}
 
{{Adhyaya
| document_id  = AV
| chapter_num  = 1
| section_num  = 2
| title        = द्वितीयः पादः
}}
=== सर्वगतत्वाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = लिङ्गात्मकानां शब्दानां वृत्तिर्नारायणे परे ॥ १ ॥चिन्त्यते सर्वगत्वं तु प्रथमं प्रविचार्यते ।तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तिप्रबोधकः ॥1॥
}}
 
=== अत्तृत्वाधिकरणम् ===
 
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अनित्यत्वात् क्रियाणां तु कथमेव स्वरूपता ।इति चेत् स विशेषोऽपि क्रियाशक्त्यात्मना स्थिरः ॥6॥
}}
 
=== गुहाधिकरणम् ===
 
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ........ द्वित्वं चैकस्य युज्यते ।यः सेतुरिति चैकत्ववचनेन विशेषणात् ॥10॥
}}
 
=== अन्तरधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्तःस्थित्वा रमणकृदन्तरः समुदाहृतः ।रमणं चात्मशब्देनादेयं मातीति चोच्यते ॥11॥
}}
 
=== अन्तर्याम्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = रमणं नातियत्नस्य विक्षेपादेव युज्यते ॥15॥
}}
 
=== अदृश्यत्वाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = गुणक्रियादयो भावा यदि वा स्युरभेदिनः ॥17॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = AV_C01_S02
| id      = AV_C01_S02_author-note
| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
}}
 
{{Adhyaya
| document_id  = AV
| chapter_num  = 1
| section_num  = 3
| title        = तृतीयः पादः
}}
तत्रान्यत्र प्रसिद्धानां(तत्रान्यत्र च सिद्धानां) लिङ्गानाम्नां पुनर्हरिः ।विशेषान्मुख्यतो वृत्तिं स्वस्मिन्नेवात्र वक्त्यजः ॥1॥
 
=== द्युभ्वाद्यधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = विष्णावेवात्मशब्दस्य रूढत्वान्न शिवादिकान् ।श्रुतिर्वक्त्यखिलेशत्वात् .............॥
}}
 
=== द्युभ्वाद्यधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
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| verse_line1  = ...............भूमा विष्णुः सुखाधिकः ॥2॥
}}
 
=== अक्षराधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अतो विरुद्धवद्भातमपि व्याख्याय तत्त्वतः ।योजनीयं हरौ वाक्यं विरुद्धैर्लक्षणैर्युतम् ॥3॥
}}
 
=== वामनाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = लिङ्गं साधारणं शब्दौ स्थानं लिङ्गमनुग्रहः ।पुनः शब्दा लिङ्गशब्दौ विचार्या द्विःस्थिता इह ॥7॥
}}
 
=== देवताधिकरणम् ===
 
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| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तत्फलाय विधिः सिद्धे चोपासाया निराकृतः ।यतो जैमिनिनाऽन्यार्थमसिद्धेऽर्थे विधिस्तथा ॥15॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = AV_C01_S03
| id      = AV_C01_S03_author-note
| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
}}
 
{{Adhyaya
| document_id  = AV
| chapter_num  = 1
| section_num  = 4
| title        = चतुर्थः पादः
}}
=== ।आनुमानिकाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = दुःखिबद्धावराद्यास्तु तदधीनत्वहेतुतः ॥1॥
}}
 
=== ज्योतिरुपक्रमाधिकरणम् ===
 
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| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = जातमोतं हरौ यस्माज्ज्योतिः, षः प्राणरूपतः ॥12॥
}}
 
=== प्रकृत्यधिकरणम् ===
 
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| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C01
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स्त्रीशब्दाश्च निषेधार्थाः सर्वेऽपि ब्रह्मवाचकाः ।विरोधिसर्वबाहुल्यकारणस्त्रीनिषेधिनाम् ॥22॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = AV_C01_S04
| id      = AV_C01_S04_author-note
| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
}}
 
{{Adhyaya
| document_id  = AV
| chapter_num  = 2
| section_num  = 1
| title        = प्रथमः पादः
}}
उक्तः समन्वयः साक्षादविरोधोऽत्र साध्यते ।चतुर्विधस्य तस्यादौ यौक्तः तत्रापि च स्मृतेः ॥1॥
 
तस्याश्चतुःस्वरूपत्वात् प्रत्येकं चतुरात्मकाः ।पादाः सर्वे तदंशाश्च मूर्तीनां वर्णमागमात् ॥2॥
 
आप्तता समतादृष्टिश्रुतिसाम्यबलोद्भवाः(बलाद्भवाः) ।सर्वानुसारो लघुता विशेषादर्शनाफले ॥3॥
 
इष्टासिद्धिश्च नियमः पूर्वपक्षेषु युक्तयः ।एता एव त्वतिबलाः सिद्धान्तस्य नियामकाः ॥4॥
 
=== स्मृत्यधिकरणम् ===
 
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| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आप्तैः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा प्रोक्तमर्थं कथं श्रुतिः ।पिपीलिकालिपिनिभा वारयेत् सर्वगा हि ते ॥5॥
}}
 
=== न विलक्षणत्वाधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = AV_C02_S01_V02
| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ........ नित्यत्वात् पुरुषोद्भवैः ।उज्झितं सर्वदोषैश्च कथं नो मानतां व्रजेत् ॥13॥
}}
 
=== अभिमान्यधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = AV_C02_S01_V03
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तथापि मृज्जलादीनां बुद्धिवागादिवाचकः ॥62॥
}}
 
=== असदधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = AV_C02_S01_V04
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अल्पवाक्ययुता युक्तिर्बहुलैव विरोधिनी ।यत्र तत्र कथं वस्तुनिर्णयः स्यादितीरिते ॥68॥
}}
 
=== भोक्त्रधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = AV_C02_S01_V05
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नान्यदन्यत्वमापन्नं क्वचिद् दृष्टं कथञ्चन ॥86॥
}}
 
=== आरम्भणाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ...... कथं च तदनन्यता ।जगतस्त्वविकारत्व उक्तन्यायेन साधिते ॥89॥
}}
 
=== इतरव्यपदेशाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अनंशस्यापि जीवस्य किञ्चित् सामर्थ्ययोजनम् ।कार्येषु यः करोत्यद्धा नमस्तस्मै स्वयम्भुवे ॥96॥
}}
 
=== शब्दमूलत्वाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तस्य त्वशेषशक्तित्वाद्युज्यते सर्वमेव च ॥101॥
}}
 
=== न प्रयोजनाधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सदा प्रवृत्तिरीशस्य स्वभावादेव केवलम् ॥104॥
}}
 
=== वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम् ===
 
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| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = वैषम्यं चैव नैघृण्यं वेदाप्रामाण्यकारणम् ॥112॥
}}
 
=== सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम् ===
 
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| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C02
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = यदधीना गुणाश्चैव दोषा अपि हि सर्वशः ॥113॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = AV_C02_S01
| id      = AV_C02_S01_author-note
| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
}}
 
{{Adhyaya
| document_id  = AV
| chapter_num  = 2
| section_num  = 2
| title        = द्वितीयः पादः
}}
स्मृतियुक्तिश्रुतिगुणयुक्तयो बहुयुक्तयः ॥1॥
 
एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति ।इति प्रथमपादेन निर्णीतेऽप्यभियोगतः ॥2॥
 
दर्शनानां प्रवृत्तत्वान्मन्द आशङ्कते पुनः ।अनादिकालतो वृत्ताः समया हि प्रवाहतः ॥3॥
 
न चोच्छेदोऽस्ति कस्यापि समयस्येत्यतो विभुः ।भ्रान्तिमूलत्वमेतेषां पृथग्दर्शयति स्फुटम् ॥4॥
 
तर्कैर्दृढमतमैरेव वाक्यैश्चागमवादिनाम् ।दौर्लभ्याच्छुद्धबुद्धीनां बाहुल्यादल्पवेदिनाम् ॥5॥
 
तामसत्वाच्च लोकस्य मिथ्याज्ञानप्रसक्तितः ।विद्वेषात् परमे तत्त्वे तत्त्ववेदिषु चानिशम् ॥6॥
 
अनादिवासनायोगादसुराणां बहुत्वतः ।दुराग्रहगृहीतत्वाद्वर्तन्ते समयाः सदा ॥7॥
 
तथापि शुद्धबुद्धीनामीशानुग्रहयोगिनाम् ।सुयुक्तयस्तमो हन्युरागमानुगताः सदा ॥8॥
 
इति विद्यापतिः सम्यक्समयानां निराकृतिम् ।चकार निजभक्तानां बुद्धिशाणत्वसिद्धये ॥9॥
 
=== रचनानुपपत्त्यधिकरणम् ===
 
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = चेतनाचेतनं तत्त्वद्वयमेव निरीश्वराः ।आहुस्तत्पञ्चपञ्चत्वविभागस्थमचेतनम् ॥10॥
}}
 
=== अन्यत्राभावाधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = AV_C02_S02_V02
| document_id  = AV
| chapter_id    = AV_C02
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| verse_line1  = साङ्ख्यस्तु सेश्वरो ब्रूते क्षेत्रानुग्रहशक्तिमान् ॥32॥
}}
 
=== अभ्युपगमाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = चार्वकैरुच्यते मानमक्षजं नापरं क्वचित् ॥40॥
}}
 
=== पुरुषाश्माधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = सन्निधानाच्चेतनस्य वर्तते यद्यचेतनम् ॥46॥
}}
 
=== अन्यथानुमित्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = अङ्गित्वं यदि तस्यैव स्वातन्त्र्यं चेन्न चाखलिम् ।तत्प्रेरणेऽप्यशक्तत्वात् स्वतन्त्रोऽन्यो ह्यपेक्षितः ॥49॥
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=== वैशेषिकाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = नित्यज्ञानप्रयत्नेच्छं सङ्ख्याद्यैरपि पञ्चभिः ॥53॥
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=== समुदायाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = वैभाषिकाश्च सौत्रान्ताः स्वरसक्षणिकं जगत् ।अणूनां समुदायं च कालकर्मनिमित्ततः ॥180॥
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=== असदधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = अपरः शून्यमखिलं मनोवाचामगोचरम् ।निर्विशेषं स्वयम्भातं निर्लेपमजरामरम् ॥212॥
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=== अनुपलब्ध्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ज्ञानमेवैकमखिलज्ञेयाकारं प्रभासते ।तत्र सन्ततिभेदश्च स्वभेदो भेद एव च ॥245॥
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=== नैकस्मिन्नधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = आह क्षपणको विश्वं सदसद्द्वयमद्वयम् ।द्वयाद्वयमतत्सर्वं सप्तभङ्गि सदातनम् ॥249॥
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=== पत्युरधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = सर्वज्ञत्वादिकैः सर्वैर्गुणैर्युक्तं सदाशिवम् ॥266॥
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=== उत्पत्त्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = निराकृतौ विशेषस्य भावाच्छक्तिमतं पृथक् ।दूष्यते महती देवी ह्रीङ्कारी सर्वकारणम् ॥292॥
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| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
}}
 
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| title        = तृतीयः पादः
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अथाशेषसमाम्नायविरोधापाकृतिं प्रभुः ।करिष्यन् अधिदैवाधिभूतजीवपरात्मनाम् ॥1॥
 
स्वरूपनिर्णयायैव वचनानां परस्परम् ।पादेनानेनाविरोधं दर्शयत्यमितद्युतिः ॥2॥
 
अनुभूतियुक्तिबहुवाग्वैलोम्यं च ततोऽधिकम् ।एतत्सर्वं सतः साम्यं द्वारवैयर्थ्यमेव च ॥3॥
 
दृष्टयुक्त्यनुसारित्वमुक्तान्यार्थाविरोधतः ।प्रसिद्धनामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तिता ॥4॥
 
लोकदृष्टानुसारित्वं जीवसाम्यमनादिता ।तत्र तत्र परिज्ञानं गुणसाम्यश्रुती तथा ॥5॥
 
उत्पत्तिमत्वं स्वगुणाननुभूत्यल्पकल्पने ।नानाश्रुतिश्च वैचित्र्यं युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥6॥
 
व्यवस्थानुपपत्तिश्च स्वातन्त्र्यमनुसारिता ।मुख्यता शक्तिमत्त्वं च वैरूप्यं सर्वसङ्ग्रहः ॥7॥
 
गत्यादिरीशशक्तिश्च सर्वमानविरोधिता ।अभीष्टासिद्धिसुव्यक्ती शास्त्रसिद्धिर्विपर्ययः ॥8॥
 
विशेषकारणं चेति सिद्धान्तस्यैव साधिकाः ।
 
=== वियदधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = प्रकृतिः पुरुषः कालो वेदास्तदभिमानिनः(देवास्तदभिमानिनः) ॥9॥
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=== मातरिश्वाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = एवं प्रलयकालेऽपि प्रतिभातपरावरः ।मुख्यवायुर्नित्यसमः शरीरोत्पत्तिकारणात् ॥20॥
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=== असम्भवाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ...... स्वतन्त्रत्वात् परात्मनः ॥24॥
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=== व्यतिरेकाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = अच्छेद्यस्यापि जीवस्य विभागं बहुधा हरिः ॥25॥
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=== पृथगधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = एवं स्थितेऽपि जीवैक्यं केचिदाहुः परात्मना ।तद्योऽहमिति पूर्वाभिः श्रुतिभिश्चानुमाबलात् ॥28॥
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=== अंशाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = भेदस्य मुक्तौ वचनादापि तत्पक्षनिग्रहः ॥81॥
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| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
}}
 
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| title        = चतुर्थः पादः
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श्रुत्यर्थः श्रुतियुक्तिभ्यां विरुद्ध इव दृश्यते ।यत्र तन्निर्णयं देवः सुविशिष्टोपपत्तिभिः ॥1॥
 
करोत्यनेन पादेन तत्र स्पष्टार्थवच्छ्रुतिः ।विशेषश्रुतिवैरूप्यं माहात्म्यं व्यक्तसद्गुणाः ॥2॥
 
दृष्टायुक्तिः समानत्वं कर्तृशक्तिर्विमिश्रिता ।युक्तयः पूर्वपक्षेषु सुनिर्णीतास्तु तादृशाः ॥युक्तयो निर्णयस्यैव स्वयं भगवतोदिताः ॥3॥
 
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| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
}}
 
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| title        = प्रथमः पादः
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स्वाभाविकान्यथानामसहभावान्ययोक्तयः ॥1॥
 
अविशेषविशेषौ च सहभाIो विमिश्रता ।विरुद्धोक्तिः सहस्थानं वैयर्थ्यं चान्यथागतिः ॥ 2 ॥
 
युक्तयः पूर्वपक्षस्य गुणाधिक्यर्थतो भवौ ।उपपत्तिद्विरूपत्वमाधिक्यमनुरूपता ॥3॥
 
योग्यता बलवत्त्वं च विभागः कारणाभवः ।क्लृप्तिरन्या गतिश्चैव सिद्धान्तस्यैव साधकाः ॥4॥
 
बीजपूरुषयोनीनां सङ्गातिनियमोज्झितिम् ।अथशब्देन भगवानाह कारणतश्च ताम् ॥4॥
 
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| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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| title        = द्वितीयः पादः
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पश्चाददृष्ट्यविज्ञानकालदुःखपृथग्भवाः ।स्थानभेदो विरुद्धत्वं न्यायसाम्यं स्वतो भवः ॥1॥
 
गुणसाम्यमयोगश्च तर्कबाधो विलोमता ।नानाभावः प्रलोभश्च युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥2॥
 
अशक्यकर्तृताशक्तिः स्वतोऽबोधस्तदेव च ।अमानक्लृप्तिसन्मानव्यवस्थात्यल्पताभवाः ॥3॥
 
विशेषदृष्टिवाक्ये च पुंशक्तिः सुनिर्दशनम् ।अलौकिकत्वमाधिक्यं स्वातन्त्र्यं निर्णयप्रमाः ॥4॥
 
=== सन्ध्याधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = वासनाः सर्ववस्तूनामनाद्यनुभवागताः ।सन्त्येवाशेषजीवानामनादिमनसि स्थिताः ॥5॥
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=== देहयोगाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = सृष्ट्वैव वासनाभिश्च प्रपञ्चं स्वाप्नमीश्वरः ।वासनामात्रतां तस्य नीत्वाऽन्तर्धापयत्यजः ॥107॥
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=== सम्पत्त्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा ।जीवं नयति देवेशः नान्यः कर्ताऽस्य कश्चन ॥108॥
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=== नस्थानतोऽप्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = न स्थानतोभेदतोऽप्यस्य भेदः कश्चित् परेशितुः ।सर्वत्राशेषदोषोज्झपूर्णकल्याणचिद्गुणः ॥109॥
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=== उपमाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = यत आभासतामेव श्रुतिरस्य वदत्यलम् ।‘‘यथैषा पुरुषे छाया एतस्मिन्नेतदाततम्’’ ॥121॥
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=== स्थानविशेषाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = प्रतिबिम्बवदप्येषामानन्दोऽन्यगुणा यथा ॥163॥
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=== पालकत्वाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ..... सृष्टिनाशौ तदधीनावितीरिते ।स्वभावत्वात् स्थितेर्नैतदपेक्षेति न युज्यते ॥166॥
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=== अव्यक्ताधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = अव्यक्तोऽपि स्वशक्यैव भक्तानां दृश्यते हरिः ॥167॥
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=== उभयव्यपदेशाधिकरणम् (अहिकुण्डलाधिकरणम्) ===
 
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| verse_line1  = तदभिन्ना गुणा नित्यमपि सर्वे विशेषतः ।गुणत्वेन गुणित्वेन भोक्तृभोग्यतया स्थिताः ॥168॥
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=== परानन्दाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = .... ते चाखलिवलिक्षणाः ।सर्वे सर्वगुणात्मानः सर्वकर्तार एव तु ॥209॥
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=== फलाधिकरणम् ===
 
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
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| title        = तृतीयः पादः
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वैराग्यतो भक्तिदार्ढ्यं तेनोपासा यदा भवेत् ।आपरोक्ष्यं भवेत् विष्णोरिति पादक्रमो भवेत् ॥1॥
 
युक्तितो ज्ञातवेदार्थो निरस्य समयान् परान् ।परस्परविरोधं(धे) च प्रणुद्याशेषवाक्यगम् ॥2॥
 
अध्यात्मप्रवणो भूत्वा तस्य सन्निहितत्वतः ।बहुयुक्तिविरोधानां भानात् तत्सहितश्रुतेः ॥3॥
 
विरोधं च निराकृत्य श्रुतीनां प्राणतत्वगान् ।परिहृत्य विरोधांश्च तत्प्रसादानुरञ्जितः ॥4॥
 
देहकर्तृत्वमीशस्य ज्ञात्वा तत्पितृतास्मृतेः ।विशेषस्नेहमापाद्य सर्वकर्तृत्वतोऽधिकम् ॥5॥
 
निष्पाद्य बहुमानं च तदन्यत्रातिदुःखतः ।उत्पाद्याधिकवैराग्यं तद्गुणाधिक्यवेदनात् ॥6॥
 
सर्वस्य तद्वशत्वाच्च दार्ढ्यं भक्तेरवाप्य च ।यतेतोपासनायैव विशिष्टाचार्यसम्पदा ॥7॥
 
कर्तव्या ब्रह्मजिज्ञासेत्युक्ते किमिति संशये ।अत इत्युदितेऽप्यस्य विशेषानुक्तितः पुनः ॥8॥
 
सृष्टिबन्धनमोक्षादिकर्तृत्वस्य श्रुतत्वतः ।यतो मोक्षादिदाताऽसावतो जिज्ञास्य एव वः ॥9॥
 
इत्याह तत्परं ब्रह्म व्यासाख्यं ज्ञानरश्मिमत् ।येनैव बन्धमोक्षः स्यात् स च जिज्ञासया गतः ॥10॥
 
सुप्रसन्नो भवेदीशो जिज्ञासाऽतोऽस्य मुक्तिदा ।मोक्षादिदत्वमीशस्य कथमेवावगम्यते ॥11॥
 
इति चेच्छास्त्रयोनित्वात् शास्त्रगम्यो हि मोक्षदः ।प्रत्यक्षावसितेभ्यः स्याद्यदि मोक्षः कथञ्चन ॥12॥
 
किमित्यनादिसंसारमग्नाः सर्वा इमाः प्रजाः ।यस्मान्नियमतो दुःखहानिः प्रत्यक्षतो भवेत् ॥13॥
 
धावन्त्येव तमुद्दिश्य राजाद्यमखिलाः प्रजाः ।अनुमागम्यतो मोक्षो यदि स्यादनुमैव हि ॥14॥
 
दृष्टपूरुषवन्मोक्षदातृतां विनिवारयेत् ।तच्छास्त्रगम्य एवैको मोक्षदो भवति ध्रुवम् ॥15॥
 
शास्त्रगम्यश्च नान्योऽस्ति मोक्षदत्वेन केशवात् ।मोक्षदो हि स्वतन्त्रः स्यात् परतन्त्रः स्वयं सृतौ ॥16॥
 
वर्तमानः कथं शक्तः परमोक्षाय केवलम् ।अन्याश्रयेण यद्येष दद्यान्मोक्षं स एव हि ॥17॥
 
तेन नानुसृतो मोक्षं न दद्यादन्यवाक्यतः ।अतस्तदर्थमपि स ज्ञेयो विष्णुर्मुमुक्षुभिः ॥18॥
 
‘यमेवैष’ इति श्रुत्या ‘तमेवे’ति च सादरम् ।शास्त्रयोनित्वमस्यैव ज्ञायते वेदवादिभिः ॥19॥
 
‘य एनं विदुरमृता’ इत्युक्तस्तु समुद्रगः ।‘तदेव ब्रह्म परममि’ति श्रुत्यावधारितः ॥20॥
 
‘यतः प्रसूते’ति ततः सृष्टिमाह ततो हरिः ।शास्त्रयोनिर्न चान्योऽस्ति मुख्यतस्त्विति गम्यते ॥21॥
 
शास्त्रयोनित्वमेतस्य ज्ञायते हि समन्वयात् ।समिति ह्युपसर्गेन परमुख्यार्थतोच्यते ॥22॥
 
एवं परममुख्यार्थो नारायण इति श्रुतेः ।निर्धारणाय नाशब्दमिति वेदपतिर्जगौ ॥23॥
 
कथं समन्वयो ज्ञेयः स्वल्पशाखाविदां नृणाम् ।‘वेदा ह्यनन्ता’ इति हि श्रुतिराहाप्यनन्ताम् ॥24॥
 
अनन्तवेदनिर्णीतिर्महाप्रलयवारिधेः ।उत्तारणोपमेत्यस्मान्न ज्ञेयोऽत्र समन्वयः ॥25॥
 
इत्याशङ्कापनोदार्थं(इति शङ्कापनोदार्थं) स आह करुणाकरः ।अशक्योत्तारणत्वेऽपि(अशक्योत्तरणत्वेऽपि) ह्यागमापारवारिधेः ॥26॥
 
निर्णीयते मयैवायं रोमकूपलयोदिना ।यद्यप्यशेषवेदार्थो दुर्गमोऽखलिमानवैः ॥27॥
 
मज्ज्ञानाव्याकृताकाशे प्राप्नोति परमाणुताम् ।इति प्रकाशयन् (वेद)विश्वपतिराह प्रमेयताम् ॥28॥
 
निखलिस्यापि वेदस्य गतिसामान्यमञ्जसा ।को नाम गतिसामान्यमनन्तागमसम्पदः ॥29॥
 
ज्ञानसूर्यमृते ब्रूयात् तमेकं बादरायणम् ।अन्योऽप्यल्पमतिः शाखाचतुष्पञ्चगतं वसु ॥30॥
 
जानन्ननुमितत्वेन ब्रूयात् तस्य प्रसादतः ।इति मुख्यतयाऽशेषगतिसामान्यवित् प्रभुः ॥31॥
 
प्रतिजज्ञे दृढं यस्माद्देवानामपि पूर्यते ।अतो निखलिवेदानां सिद्ध एव समन्वयः ॥32॥
 
इति सुज्ञापितार्थोऽपि पृथक् चाह समन्वयम् ।तत्र प्रथमतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां समन्वयः ॥33॥
 
शब्दानां वाच्य एवात्र महामल्लेशभङ्गवत् ।इतोऽत्यभ्यधिकत्वेऽपि तुर्यपादोदितस्य तु ॥34॥
 
महासमन्वये तस्मिन्नाधिकारोऽखिलस्य हि ।ब्रह्मैवाधिकृतस्तत्र मुख्यतोऽन्ये यथाक्रमम् ॥35॥
 
दुर्गमत्वाच्च नैवात्र प्राथम्येनोदितोऽञ्जसा ।अतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां शब्दानां निर्णयाय तु ॥36॥
 
प्रवृत्तः प्रथमं देवः तत्रानन्दादयो गुणाः ।ईशस्यैवेति निर्णीताः श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥37॥
 
देवतान्तरगाः सर्वे शब्दवृत्तिनिमित्ततः ।विष्णुमेव वदन्त्यद्धा तत्सङ्गादुपचारतः ॥38॥
 
अन्यदेवान् वदन्तीह विशेषगुणवक्तृतः ।विष्णुमेव परं ब्रूयुरेवमन्येऽप्यशेषतः ॥39॥
 
इत्यन्यत्र प्रसिद्धोरुशब्दराशेरशेषतः ।ज्ञाते समन्वये विष्णौ लिङ्गैर्ह्येष समन्वयः ॥40॥
 
तेषामन्यगतत्वे तु न स्यात् सम्यक्समन्वयः ।इत्येवाशेषलिङ्गानां ब्रह्मण्येव समन्वयम् ॥41॥
 
आह उभयगतत्वं च स्यादतो लिङ्गशब्दयोः ।इति संशयनुत्त्यर्थमुभयत्र प्रतीतितः ॥42॥
 
शब्दानां वर्तमानानां सलिङ्गानां विशेषतः ।समन्वयो हरावेव यन्नैवान्यत्र मुख्यतः ॥43॥
 
शब्दा लिङ्गानि च यतो नैवान्यत्र स्वतन्त्रता ।अस्वतन्त्रेषु शब्दस्य वृत्तिहेतुर्न मुख्यतः ॥44॥
 
यतोऽतो यदधीनास्ते शब्दार्थत्वमुपागतः ।अत्यल्पेनैव शब्दस्य वृत्तिहेतुगुणेन तु ॥45॥
 
अयो यथा दाहकत्वं स एवेशः स्वतन्त्रतः ।मुख्यशब्दार्थ इति हि स्वीकर्तव्यो मनीषिभिः ॥46॥
 
इत्याह एवं च शब्दानां नारायणसमन्वये ।सिद्धेऽप्यशेषशब्दानां न कथञ्चन युज्यते ॥47॥
 
विरोधादवरत्वादेरपि प्राप्तिर्यतो भवेत् ।इति चेदवरत्वादि द्विविधं ह्युपलभ्यते ॥48॥
 
परस्यावरताहेतुर्यः स्वयं पर एव सन् ।सोऽपि ह्यवरशब्दार्थो यथा राजा जयी भवेत् ॥49॥
 
अन्योऽवरत्वानुभवी तयोः पूर्वोऽस्ति केशवे ।द्वितीयो जीव एवास्ति स्वातन्त्र्यान्न तु(च) दूषणम् ॥50॥
 
हरेरेवमशेषेण सर्वशब्दसमन्वये ।उक्ते विरोधहीनस्य स्यात् समन्वयता यतः ॥51॥
 
अतोऽशेषविरोधानां कृतेशेन निराकृतिः ।समन्वयाविरोधाभ्यां सञ्जाते वस्तुनिर्णये ॥52॥
 
किं मया कार्यमित्येव स्याद्बुद्धिरधिकारिणः ।तत्र भक्तिविधानार्थमभक्तानर्थसन्ततौ ॥53॥
 
उक्तायां भक्तिदार्ढ्याय प्रोक्तेऽशेषगुणोच्चये ।वक्तव्योपासना नित्यं कर्तव्येत्यादरेण हि ॥54॥
 
सोपासना च द्विविधा शास्त्राभ्यासस्वरूपिणी ।ध्यानरूपा परा चैव तदङ्गं धारणादिकम् ॥55॥
 
तथोभयात्मकं चैव पादेऽस्मिन् बादरायणः ।आहोपासनमद्धैव विस्तरात् श्रुतिपूर्वकम् ॥56॥
 
पृथग्दृष्टिरशक्यत्वमनिर्णीतिः समुच्चयः ।विशेषदर्शनं कार्यलोपो नानोक्तिराशुता ॥57॥
 
विभ्रमोपाकृतिर्लिङ्गमनवस्थाविशेषिता ।अप्रयोजनता चातिप्रसङ्गोऽदूरसंश्रयः ॥58॥
 
विशिष्टकारणं चेष्टां दृष्टवैरूप्यमुन्नतिः ।अनुक्तिरप्रयत्नत्वं दृढबन्धपराभवौ ॥59॥
 
पुंसाम्यं प्राप्तसन्त्यागः कारणानिर्णयो भ्रमः ।विशेषदर्शितालापो गुणसाम्यं पृथग्दृशिः ॥60॥
 
अगम्यवर्त्म सन्धानमिष्टं फलमकल्पना ।शुद्धवैरूप्यमङ्गत्वमविशेषदृशिः क्रिया ॥61॥
 
युक्तयः पूर्वपक्षस्थाः सुज्ञेयत्वं विधिक्रिया ।माहात्म्यमल्पशक्तित्वं यथायोग्यफलं भवः ॥62॥
 
फलसाम्यं विशेषश्च गुणाधिक्यं प्रधानता ।यथाशक्तिक्रिया सन्धिः प्रमाणबलमानतिः ॥63॥
 
कारणं कार्यवैशेष्यं स्वभावो वस्तुदूषणम् ।प्रतिक्रियाविरोधश्च प्रतिसन्धिरनूनता ॥64॥
 
संस्कारपाटवं स्वेच्छानियतिर्वस्तुवैभवम् ।विशेषोक्तिरमानत्वं प्राधान्यं प्रीतिरागमः ॥65॥
 
सुस्थिरत्वं कृतप्राप्तिरनादिगुणविस्तरः ।साधनोत्तमता नानादृष्टिः शिष्टिरनूनता ॥66॥
 
अविघ्नत्वाविरोधौ च गुणवैशेष्यमागमः ।सिद्धान्तनिर्णया ह्येता युक्तयो व्याहृताः सदा ॥67॥
 
=== सर्ववेदान्तप्रत्ययाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = यथाशक्त्यखिलान् वेदान् विज्ञायोपासनं भवेत् ।तत्राखिलस्य विज्ञप्तिः सम्यग्ब्रह्मणः एव हि ॥68॥
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=== उपसंहाराधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = कृत्वाऽथ कुर्वन्नपि वा निदिध्यासनमाचरेत् ॥97॥
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=== नवाधिकरणम्(अनुबन्धाद्यधिकरणम्) ===
 
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| verse_line1  = विषयेषु च संसर्गात् शाश्वतस्य च संशयात् ।मनसा चान्यदाकाङ्क्षात् परं न प्रतिपद्यते ॥98॥
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=== विद्याधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = नैव मोक्ष इति प्राहुर्लोकायतमते स्थिताः ॥122॥
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=== यावदधिकाराधिकरणम्  ===
 
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| verse_line1  = अधिकारविशेषेण भक्तिज्ञानसुखादिभिः ।विशेषो देवतादीनां मोक्षे चैव विशेषतः ॥187॥
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=== इयदामननाधिकरणम्  ===
 
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=== दर्शनभेदाधिकरणम्  ===
 
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| verse_line1  = ..... दृष्टिरिति योग्यानुसारतः ॥203॥
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===  प्रदानाधिकरणम्    ===
 
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| verse_line1  = सम्यग्गुरुप्रसादश्च मुख्यतो दृष्टिकारणम् ।
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===  गुरुप्रसादाधिकरणम्    ===
 
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| verse_line1  = श्रवणादि च कर्तव्यं नान्यथा दर्शनं क्वचित् ॥204॥
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=== पूर्वविकल्पाधिकरणम्    ===
 
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| verse_line1  = गुणाधिकं गुरुं प्राप्य तद्धीनं नाप्नुयात् क्वचित् ।विपर्ययस्तु कर्तव्यः सर्वथा शुभ(मुक्ति)मिच्छता ॥205॥
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===  ताद्विद्याधिकरणम्  ===
 
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| verse_line1  = साधनेभ्योऽधिका भक्तिर्नैवान्यत् तादृशं क्वचित् ॥209॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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एवमुत्पन्ननिर्दोषभगवद्दर्शनात् सदा ।अपेक्षितफलप्राप्तिरारब्धस्यानतिक्रमात् ॥1॥
 
देवर्षिमानुषादीनां तत्तज्जात्यनुसारतः ।जैमिन्युक्तं मानुषाणां तद्विशेषाश्च केचन ॥2॥
 
सामान्यं भगवत्प्रोक्तं देवादीनां विशेषतः ।बलवद्विरोधिसद्भावे जैमिन्याद्युक्तिरिष्यते ॥3॥
 
=== कामचाराधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = विकर्मलेपो नैवस्ति सम्यग्दृष्टिमतां क्वचित् ।गुणहानिश्च नैवास्ति ब्रह्मणस्त्वविकर्मतः ॥4॥
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=== आधिकारिकाधिकरणम् ===
 
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=== फलश्रुत्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = स्वातन्त्र्यतारतम्येन फलं हि फलिनां भवेत् ।अशुभं त्वशुभेऽप्येषां स्वातन्त्र्यात् प्रीतितो हरेः ॥255॥
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=== अन्वयाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ज्ञानदा अपि चाचार्या विशेषात् फलमाप्नुयुः ।‘मुक्तावष्टगुणं शिष्याद् गुरुराप्नोति शोचनम् ॥271॥
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| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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समन्वयाविरोधाभ्यां सिद्धे वस्तुनि साधने ।विचारितेष्वशेषेषु साधनेषु विशेषतः ॥1॥
 
नित्यशः कार्यमत्यन्तमवश्यम्भावि साधनम् ।चिन्त्यते प्रथमं तत्र श्रवणादिसकृत्क्रिया ॥2॥
 
आवृत्तिर्वेति सन्देहे कर्तव्यावृत्तिरेव हि ।उपदेशोऽतत्त्वमसीत्यादि ह्यसकृदेव यत् ॥3॥
 
‘लिङ्गाल्लातव्यतः पूर्वमृजोर्ब्रह्मत्वतः शतात् ।शुश्रावोग्रतपा नाम योग्यो रुद्रपदस्य यः ॥4॥
 
सार्धं परार्धं विष्णोस्तु गुणान् भक्त्या सदोद्यतः ।तत्त्रिभागमुपासां च चक्रे सम्भृतमानसः ॥5॥
 
दशमन्वन्तरं शक्रपदयोग्यो गरुत्मतः ।पदयोग्यात्सुमनसः सुनन्दो नाम चाशृणोत् ॥6॥
 
उपासां चक्र उद्युक्तो मन्वन्तरचतुष्टयम् ।सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पदयोग्यौ सुतेजसौ ॥7॥
 
सुरूपः शान्तरूपश्च मन्वन्तरचतुष्टयम् ।अशृण्वतां सुमनसो मन्वन्तरमुपासताम् ॥8॥
 
ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः ।अपश्यन् परमं विष्णुं तत्प्रसादैधिताः(तत्प्रसादेधिताः) सदा ॥9॥
 
इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते ।आत्मेति नाम कथितं साक्षान्नारायणस्य हि ॥10॥
 
=== आत्माधिकरणम् ===
 
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=== न प्रतीकाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = प्रतीकविषयत्वेन न कार्या विष्णुभावना ॥19॥
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=== ब्रह्माधिकरणम् ===
 
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=== तदधिगमाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = तथोपास्यञ्जसा दृष्टं ब्रह्म पापं च भस्मसात् ॥63॥
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| text    =
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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| title        = द्वितीयः पादः
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देवानां च मनुष्याणामेतावत्सममेव हि ॥1॥
 
उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः ।कर्मक्षयस्तथोत्क्रान्तिर्मार्गो भोगश्चतुष्टयम् ॥2॥
 
फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः ।स्रष्टृष्वेव च(तु) सृज्यानां प्रवेशो ब्रह्मणो लये ॥3॥
 
देवानां मार्ग उद्दिष्टो नार्चिरादिर्न चोत्क्रमः ।स्रष्टुस्तु ग्रासभूतस्य देहस्तत्र लयं व्रजेत् ॥4॥
 
यतः सृज्यस्य देवस्य नैवोत्क्रान्तिस्ततो भवेत् ।लयाच्चैवार्चिरादीनां लोकानामपि सर्वशः ॥5॥
 
कथं मार्गो भवेत् तेषां विशतामुत्तरं(विशतामुत्तमं) स्वतः ।जातानां मानुषे लोके देवानां तु(च) कदाचन ॥6॥
 
उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते ।अन्येषामपि साक्षाततु मुक्तिः प्राप्यापि तं हरिम् ॥सहैव ब्रह्मणा भूयादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥7॥
 
‘क्ष्माम्भोऽनलानलिवियन्मनइन्द्रियार्थभूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः ।अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं परं स्वमनुभूय परः स्वयम्भूः(भाग.३.३२.९) ॥8॥
 
एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः(भाग.३.३२.१०) ॥9॥
 
‘भगवन्तमनुप्राप्ता अपि तु ब्रह्मणा सह ।परमं मोक्षमायान्ति लिङ्गभङ्गेन योगिनः’ ॥10॥
 
‘प्राप्ता अपि परं देवं सहैव ब्रह्मणा पुनः ।आनन्दव्यक्तिमायान्ति पूर्णा लिङ्गस्य भङ्गतः’ ॥11 ॥
 
इति श्रुतिपुराणोक्तिबलाद्विज्ञायते च तत् ।भोगस्तु सर्वदेवानां नरादीनां च विद्यते ॥12॥
 
तत्र प्रवेशो देवानामुत्तरोत्तरतः क्रमात् ।उच्यते देहगानां च वृत्तीनामेवमेव तु ॥13॥
 
तत्र मोक्षस्वरूपं तु वादिनः प्रतिभाश्रयात् ।नाना वदन्ति पुंसां हि मतयो गुणभेदतः ॥14॥
 
पृथक् पृथक् प्रजायन्ते तमसैवान्यथामतिः ।रजसा मिश्रबुद्धित्वं सत्त्वेनैव यथामतिः ॥15॥
 
गुणातीता विमुक्तानां मतिः शुद्धिचितिर्यतः ।सम्यगेवाथ नित्या च तत्तन्माहात्म्ययोगतः ॥16॥
 
बहुला चातिविशदा स्पष्टा चैव श्रियो मतिः ।महाशुद्धचितित्वेन ततोऽप्यतिमहाचितिः ॥17॥
 
अशेषोरुविशेषाणामतिस्पष्टतया दृशिः ।नित्यमेकप्रकारा च नारायणमतिः परा ॥18॥
 
सूर्यप्रभावदखिलं भासयन्ती निरन्तरा ।निर्लेपा वीतदोषा च नित्यमेवाविकारिणी ॥19॥
 
विशेषांस्तद्गतांस्त्यक्त्वा प्रायस्तल्लक्षणा श्रियः ।तथैव स्पष्टताभावात् तत्तन्त्रत्वात् तु(च) केवलम् ॥20॥
 
न तादृशी ब्रह्मणस्तु एवं श्रियो यथा ।मुक्तानां तु तदन्येषां समुद्रतरलोपमा ॥21॥
 
अग्निज्वालावदेव स्यात् सृतिगानां दृशो भवः ।एवंविधेषु ज्ञानेषु तमसा मुष्टदृष्टयः ॥22 ॥
 
खद्योतसदृशात्यल्पज्ञानत्वादन्यथादृशः ।वदन्ति वादिनो मोक्षं नानामतसमाश्रयात् ॥23॥
 
आश्रित्य प्रतिभामाह जिनस्तत्रातितामसीम् ।ज्ञानात् कर्मक्षयान्मोक्षो भवेद्देहाख्यपञ्जरात् ॥24॥
 
पञ्जरोन्मुक्तखगवदलोकाकाशगोचरः ।नित्यमूर्ध्वं व्रजत्येव पुद्गलो हस्तपादवान् ॥25॥
 
इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) ।गतिरूर्ध्वा च दुःखेता गतित्वाल्लौकिकी यथा ॥26॥
 
इत्युक्ते चानुमानैकशरणस्य किमुत्तरम् ।अनूर्ध्वगतिता तत्र यद्युपाधिः खगस्य च ॥27॥
 
दूरोर्ध्वगमने दुःखमिति साध्यानुगो न सः ।प्रतिसाधनरूपस्य नानुमानस्य दूषणम् ॥28॥
 
उपाधिः प्रतिरूपं हि साधनं तन्न चापरम् ।अथापि सशरीरत्वं चात्रोपाधिर्न वै भवेत् ॥29॥
 
गतित्वं यत्र देहित्वमिति यत्साधनानुगम् ।आगमाननुसारित्वे प्रसङ्गोऽयं यतस्ततः ॥30॥
 
नापसिद्धन्तता दोषः प्रसङ्गे यदि सा भवेत् ।तदैवातिप्रसङ्गः स्यान्न प्रसङ्गः क्वचिद्भवेत् ॥31॥
 
लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः ।सोऽपीत्युक्ते वदेत् किं स तस्माद्वेदोदितो भवेत् ॥32॥
 
मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् ।चकार सौगतमतं मोहायैव चकार यत् ॥33॥
 
असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् ।अतोऽसुराधिकारत्वान्न ग्राह्यं तन्मतं क्वचित् ॥34॥
 
चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् ।अनुमेयबहिस्तत्त्वं तथा प्रत्यक्षबाह्यगम् ॥35॥
 
इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः ।ते मोक्षं तादृशं ब्रूयुर्निःशङ्कं मायिनो यथा ॥36॥
 
न किञ्चिन्मुक्त्यवस्थायामात्मात्मीयमथापि वा ।एकस्मिन् संसृतेर्मुक्ते न किञ्चिदवशिष्यते ॥37॥
 
तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः ।दृश्यते संसृतेर्ध्वंसे निर्विशेषैव शून्यता ॥38॥
 
न सत्त्वं नैव चासत्त्वं शून्यतत्त्वस्य विद्यते ।न सुखत्वं न दुःखत्वं न विशेषोऽपि कश्चन ॥39॥
 
निर्विशेषं स्वयम्भातं विर्लेपमजरामरम् ।शून्यं तत्त्वमसम्बाधं नानासंवृतिवर्जितम् ॥40॥
 
अशेषदोषरहितं मनोवाचामगोचरम् ।मोक्ष इत्युच्यतेऽसद्भिर्नानासंवृतिवर्जितम् ॥41॥
 
संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) ।स्थितया ध्वस्तया चैव संसृतिर्मोक्ष इत्यपि ॥42॥
 
केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा ।अवच्छिन्नं महाशून्यं नाना पुद्गलशब्दितम् ॥43॥
 
यस्य शून्यैकरसता ज्ञानात्मा त्वपगच्छति ।स पुद्गलत्वनिर्मुक्तो महाशून्यत्वमेष्यति ॥44॥
 
संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् ।इत्येवं मायिनश्चाहुरेकजीवत्ववादिनः ॥45॥
 
बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः ।निर्विशेषत्ववाचैव शून्यं ब्रह्मेति नो भिदा(ब्रह्मैव तो भिदा) ॥46॥
 
सच्चित्यसुखादिकं चैव किं कुतोऽखण्डवादिनः ।व्यावर्त्यमात्रभेदस्तु विद्यते शून्यवादिनः ॥47॥
 
अनृतादेरपोहं तु स्वयमेव हि मन्यते ।निर्विशेषत्वतो नैव विशेषो ब्रह्मशून्ययोः ॥48॥
 
प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि ।अतत्त्वावेदकं यस्मात् प्रमाणं तेन कथ्यते ॥49॥
 
अतत्त्वावेदकं यदप्रामाण्यं सतां मतम् ।दीर्घभ्रान्तिकरी चेत् स्यादतत्त्वावेदकप्रमा ॥50॥
 
रज्जुसर्पादिविज्ञानादप्याधिक्यादमानता ।स्यादागमस्यानिवर्त्यमहामोहप्रदत्वतः ॥51॥
 
तलनैल्यादिविज्ञानमाकाशे मानतां व्रजेत् ।छत्राकारत्वविज्ञानं चन्द्रप्रादेशतामतिः ॥52॥
 
निर्भेदत्वं तु शून्यस्य तेनाप्यङ्गीकृतं सदा ।सत्त्वासत्त्वादिधर्माणामभाव उभयोर्मतः ॥53॥
 
न हि सत्प्रतियोगित्वं शून्यत्वं तेन चेष्यते ।न च दुःखविरोधित्वादन्या ह्यानन्दतेष्यते ॥54॥
 
मायिना शून्यपक्षेऽपि ज्ञानं जाड्यविरोधि च ।धर्माः केऽपि(धर्मास्तेऽपि) न सन्त्येव को विशेषस्ततस्तयोः ॥55॥
 
एतादृशानां पक्षाणां दूषणं प्रभुणा कृतम् ।स्वपक्षसाधनेनैव ‘नाभाव’ इति चोक्तितः ॥56॥
 
आत्माभावे पुमर्थः क इष्टस्यात्माऽऽवधिर्यतः ।यदि नात्मावधिर्मोक्षो मोक्षः स्याद्धटशून्यता ॥57॥
 
कल्पितत्वाद्विशेषाणां मायिनोऽपि समं हि तत् ।दृश्यमाने विशेषेऽपि यदि चेदविशेषता ॥58॥
 
घटाभावोऽविशेषः स्यात् पाश्चात्यश्चेदनागतः ।न मोक्षो विमतो यस्माददेहो घटशून्यता ॥59॥
 
यथेत्युक्तो वदेत् किं स योनुमामात्रमानकः ।न च मायी वदेत् तत्र पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ॥60॥
 
अमानत्वात् श्रुतेस्तस्य न चादेहत्ववादिनी ।श्रुतिः काचिददेहत्वमप्राकृतशरीरताम् ॥61॥
 
मोक्षे भोगं यतो ब्रूते जक्षन् क्रीडन्निति श्रुतिः ।निर्दुःखत्वान्न तन्मोक्षः प्रतिपन्नं यथेति च ॥62॥
 
अनुमादूषणं किं स्याद्वादिनोः शून्यमायिनोः ।दुःखं दुःखादभिन्नत्वान्मोक्षोऽपि स्यादसंशयम् ॥63॥
 
भेदे सद्द्वैततैव स्यादित्याद्यमितदोषतः ।हेयं मायामतेनैव सह शून्यमतं बुधैः ॥64॥
 
एवं विज्ञानवादोऽपि ज्ञानमात्रविशेषतः ।तस्यापि भङ्गुरत्वादिविशेषमपहाय हि ॥65॥
 
अद्वैततामतं साक्षादुक्तदोषस्ततो भवेत् ।कालो न केवलज्ञानी कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥66॥
 
एतयाऽनुमया रोधान्न तादृङ्मोक्षरूपता ।यदि कालोऽपि नेत्याह कदेति प्रश्न उत्तरम् ॥67॥
 
किं वक्ष्यति यदावस्थां वदेत् सा पक्षतां व्रजेत् ।अवस्थात्वादिति ह्येव हेतुः साऽपि कदेति च ॥68॥
 
पृष्टे कालश्च वक्तव्यो नाकालत्वं ततो भवेत् ।न काल इति सामान्यनिषेधे कालगप्रमा ॥69॥
 
निरुणद्धि समश्चायं त्रयाणामुक्तवादिनाम् ।एकजीवत्वपक्षे तु कालाभावादियं प्रमा ॥70॥
 
कुपिता कालमाधाय द्वैतमेवोपपादयेत् ।विमतः प्रपञ्चवान् कालः कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥71॥
 
इति चान्यानुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् ।कालशब्देश्वरैकत्वमतान्यप्येवमेव हि ॥72॥
 
निराकृतानि तेषां च समत्वात् पक्षदोषयोः ।ज्ञानं स्वरसभङ्ग्येव नित्यसन्तानमिष्यते ॥73॥
 
बौद्धाभ्यामपराभ्यां तु तत्राप्युक्तानुमा रिपुः ।मोक्षो न शुद्धविज्ञानसन्तानी कालगत्वतः ॥74॥
 
प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् ।अनुमानानि सर्वाणि प्रतिसाधनयोगतः ॥75॥
 
निषिद्धान्युक्तभङ्ग्यैव श्रुतयश्चास्मदुक्तिगाः ।साङ्ख्यनैयायिकाद्याश्च प्राहुर्मोक्षं च(तु) निःसुखम् ॥76॥
 
इच्छाद्वेषप्रयत्नादेरपि सर्वात्मना लयम् ।तत्राहुर्नैतदप्यत्र शोभनं श्रुतयो यतः ॥77॥
 
महानन्दं च भोगं च नियमेन वदन्ति हि ।प्राकृतप्रियहानिस्तु प्रियास्पृष्टिरितीर्यते ॥78॥
 
अप्रियं प्रतिकूलं तदविशेषेण शब्दितम् ।नास्ति ह्यप्राकृतं दुःखं सतो जीवस्य कुत्रचित् ॥79॥
 
प्रियं स्वरूपमेवास्य बलानन्दादिवाक्यतः ।हेयत्वादप्रियस्यैव प्रियहानेरनिष्टतः ॥80॥
 
न समस्तप्रियाभावो मोक्षे प्रोक्ते तु युज्यते ।अप्रियस्य स्वरूपत्वमसुरेष्वेव हि श्रुतम् ॥81॥
 
असुरा नैवमेवं च नैवं चाखलिमानुषाः ।इत्यात्मप्रियहानाय को यतेत च बुद्धिमान् ॥82॥
 
सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि ।धर्मानुच्छित्तिमेवास्य यतो वक्त्युत्तरश्रुतिः ॥83॥
 
आशङ्क्यास्य ज्ञानहानिं मैत्रेय्या मोहमाह माम् ।भवानित्युक्तवत्या हि नाहं मोहं वदामि ते ॥84॥
 
इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यो हि स्वरूपानाशमूचिवान् ।ज्ञानरूपस्य विज्ञाननाशस्तन्नाश एव यत् ॥85॥
 
इति शून्यमतोच्छित्त्यै पुनरानन्दपूर्वकान् ।धर्मानाहाप्यनुच्छिन्नांस्तार्किकैर्विनिवारितान् ॥86॥
 
मात्रासंसर्गमप्याह तथा माध्यन्दिनश्रुतिः ।आचिक्षेप मतं तच्च यस्मिन्न विषयादनम् ॥87॥
 
घ्राणादिभोगाभावस्य त्वनिष्टत्वहृदा श्रुतिः ।येनेदमखिलं वेद विज्ञातारं स्वमेव च ॥88॥
 
केन तं च विजानीयादित्यनिष्टं हि सर्वथा ।नाखिलज्ञापको विष्णुरज्ञेयो नियमेन हि ॥89॥
 
तज्ज्ञानार्थं हि वेदानामखिलानां प्रवर्तनम् ।प्रत्यक्षमात्मविज्ञानाविरोधानुभवादपि ॥90॥
 
न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते ।कर्तृकर्मविरोधश्च नित्यानुभवरोधतः ॥91॥
 
कथमेव पदं गच्छेद्विरोधोऽदृष्टबाधनम् ।‘सोऽश्नुते सर्वकामांश्च’ ‘कामान्नी कामरूप्यथ’ ॥92॥
 
इत्यादिश्रुतयश्चोक्तमर्थमेव वदन्ति हि ।अस्वातन्त्र्यादिवेत्युक्तं न द्वैताभावतः क्वचित् ॥93॥
 
आत्मैवाभूदिति ह्यस्मादविशेषप्रसङ्गतः ।‘अस्वातन्त्र्योपमाभेदभेदेष्विव उदीरितः’ ॥94॥
 
शब्दतत्त्व इति प्रोक्तं मैत्रेय्युक्तोत्तरं च किम् ।सुखादिधर्महानौ तु मुक्तेः किं च प्रयोजनम् ॥95॥
 
यद्यर्थो दुःखहानिः स्यादनर्थः सुखनाशनम् ।तयोश्च दुःखहानाद्धि सुखनाशोऽधिको भवेत् ॥96॥
 
प्राप्यापि दुःखं सुमहत्सुखलेशाप्तये जनः ।यतते सुखहानौ हि को मोक्षाय यतेत् पुमान् ॥97॥
 
अल्पाच्च सुखनाशाद्धि बिभेत्यतितरां जनः ।महच्च दुःखमाप्नोति सुखनाशनिवृत्तये ॥98॥
 
न च रागनिमित्तं तद्वीतरागा अपि स्फुटम् ।नारदाद्याः सुखार्थाय सहन्ते दुःखमञ्जसा ॥99॥
 
युद्धादिदर्शनं यस्मात् सुदुःखेनापि कुर्वते ।‘यदेन्द्रवैरोचनयोर्ब्रह्मास्त्राभ्यां सुतापिताः ॥100 ॥
 
अपि नैवाजहुर्युद्धरसात् ते नारदादयः’ ।इति स्कान्दवचनस्तस्मात् सुखाभावाय को यतेत् ॥101॥
 
विमतो दुःखयुग् यस्माच्चेतनः सन् सुखोज्झितः ।प्रतिपन्नो यथेत्येव चानुमा केन वार्यते ॥102॥
 
सर्वश्रुतिपुराणेषु सुखभावोक्तितस्तथा ।मुक्तौ न ग्राह्यमेवैतत्सुखाभावमतं बुधैः ॥103॥
 
‘सोऽनानन्दाद्विमुक्तः सन्नानन्दी भवति स्फुटम्’ ।‘निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः ॥104॥
 
परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) ।‘न विष्णुसदृशं दैवं न मोक्षसदृशं सुखम् ॥105॥
 
न वेदसदृशं वाक्यं न वर्णोङ्कारसंमितः’ ।‘यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ॥106॥
 
कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि’ ।इति श्रुतिपुराणानि तत्र तत्र वदन्ति हि ॥107॥
 
अतो मोक्षे सुखाभाव इति यत्किञ्चिदेव हि ।शिरःकराद्यभावश्च न मुक्तस्य भवेत् क्वचित् ॥108॥
 
श्रुतयश्च पुराणानि मानमत्र बहूनि च ॥109॥
 
‘न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥110॥
 
श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणिप्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥111॥
 
प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥112॥
 
विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रवलिभिर्यथा नभः ।श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः’(भाग.२.९.१०-१३) ॥113॥
 
‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः’(ऋ.सं.१०.७१.११) ॥114॥
 
कामान्नरूपी चरतीतिपूर्व श्रुत्या पुराणोक्तिभिरप्यदोषः ।देहः स्वरूपात्मक एव तेषां मुक्तिं गतानामपि चेयते हि ॥115॥
 
शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् ।यथेति पूर्वा अनुमाश्च जीव स्वरूपमङ्गादिकमावयन्ति(आपयन्ति) ॥116॥
 
न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् ।स ब्रह्मणा सहितोऽशेषभोगान् भुङ्क्ते तथोपेत्य सुखार्णवं तम् ॥117॥
 
यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् ।भुङ्क्ते स देवः(दैवं) पुरुषोत्तमोऽजः आत्मेति चोक्तो गुणपूर्तिहेतोः ॥118॥
 
सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् ।इत्यादिवाक्यैर्भगवद्वशः सन् भुङ्क्तेऽखिलान् मुक्तिगतोऽपि भोगान् ॥119॥
 
कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् ।इत्यादिका अप्यनुमाः प्रमाणं मुक्तौ च जीवस्य परत्वरोधे ॥120॥
 
कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति ।यतो न दृष्टं यदभून्न पूर्वं पश्चात् तदासेति कुतश्च किञ्चित् ॥121॥
 
न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति ।यतो न कुत्रापि भिदाभिदा च दृष्टा चितश्चेतनया कुतश्चित् ॥122॥
 
इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण ।विदुर्न सम्यग्यदपीह लौकिकाः सुखं मम स्याच्च सदेति जानते ॥123॥
 
औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः ।स्वातन्त्र्यमापूर्णविशेषयोग्यता विरोधहानिश्च चतुर्थपादे ॥124॥
 
व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् ।विभक्तता चात्वरयैव सिद्धिर्विपक्षसम्प्राप्तिविरुद्धहेतवः ॥125॥
 
सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः ।नानाप्रवृत्तिः कृतकृत्यता च विपक्षतर्काः समतीतपादे ॥126॥
 
महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् ।विशेषकार्यं कृतिसंस्थितिश्च(कृतसंस्थितिश्च) सुयुक्तयो निर्णयगाः स्वपक्षे ॥127॥
 
व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च ।समानधर्मः कृतशेषता च लोकोपमा पूर्वमतानुसाराः ॥128॥
 
विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः ।कृतार्थता शश्वदनुप्रवृत्तिः सिद्धान्तनिर्णीतिविशिष्टहेतवः ॥129॥
 
=== नैकस्मिन्नधिकरणम् ===
 
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=== पराधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = तस्मिन् लयं यान्ति भूतान्यशेषक्रमाविरोधेन स एव विष्णौ ॥131॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
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| title        = तृतीयः पादः
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उत्क्रान्तमार्गश्च विमुक्तगम्यं पादोदितं सुक्रमविक्रमौ च ॥1॥
 
सान्तनिकप्राप्तिरभीष्टता च सौकर्यमित्यन्यमतस्य तर्काः ।विशेषसमप्राप्तिरुरुत्वमाप्तिः क्रमानुरागः कथितानुवृत्तिः ॥2॥
 
=== कार्याधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = सिद्धान्तनिर्णीतिकराः प्रतीकं देहादिकं तद्गतमेव ये नराः ।उपासते ते पुरतः समाप्नुयुर्ब्रह्माणमस्मान्मतिमाप्य विष्णुम् ॥3॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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अतिक्रमोक्तिः कृतिरर्थलाभः परागतिः पारगतिस्तदोकः ॥1॥
 
समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके ।सामान्यरूपं प्रतिभानमुक्तिराश्चर्यता कृत्रिमतास्तदोषः ॥2॥
विशेषक्लृतिः कृतनिश्चयश्च माहात्म्यमित्येव सुनिर्णयार्थाः ।
 
=== अनन्याधिपत्त्यधिकरणम् ===
 
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः
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Revision as of 06:40, 13 April 2026

अनुव्याख्यानम्

अनुक्रमणिका
  • <a href="#AV_C01_S01">प्रथमाध्यायः — प्रथमः पादः</a>
  • <a href="#AV_C01_S02">प्रथमाध्यायः — द्वितीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C01_S03">प्रथमाध्यायः — तृतीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C01_S04">प्रथमाध्यायः — चतुर्थः पादः</a>
  • <a href="#AV_C02_S01">द्वितीयोध्यायः — प्रथमः पादः</a>
  • <a href="#AV_C02_S02">द्वितीयोध्यायः — द्वितीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C02_S03">द्वितीयोध्यायः — तृतीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C02_S04">द्वितीयोध्यायः — चतुर्थः पादः</a>
  • <a href="#AV_C03_S01">तृतीयाध्यायस्य — प्रथमः पादः</a>
  • <a href="#AV_C03_S02">तृतीयाध्यायस्य — द्वितीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C03_S03">तृतीयाध्यायस्य — तृतीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C03_S04">तृतीयाध्यायस्य — चतुर्थः पादः</a>
  • <a href="#AV_C04_S01">चतुर्थाध्यायस्य — प्रथमः पादः</a>
  • <a href="#AV_C04_S02">चतुर्थाध्यायस्य — द्वितीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C04_S03">चतुर्थाध्यायस्य — तृतीयः पादः</a>
  • <a href="#AV_C04_S04">चतुर्थाध्यायस्य — चतुर्थः पादः</a>


नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः ।अस्योद्भवादिदमशेषविशेषतोऽपि वन्द्यं सदा प्रियतमं मम सन्नमामि ॥1॥

तमेव शास्त्रं प्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव ।विशेषतो मे परमाख्यविद्याव्याख्यां करोम्यन्वपि चाहमेव ॥2॥

प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः ।अर्थितः परविद्याख्यं चक्रे शास्त्रमनुत्तमम् ॥3॥

गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः ।यतस्तदुदितं मानमजादिभ्यस्तदर्थतः ॥4॥

वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता ।आप्तवाक्यतया तेन श्रुतिमूलतया तथा ॥5॥

युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् ।दृश्यते ब्रह्मसूत्राणामेकधाऽन्यत्र सर्वशः ॥6॥

अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते ।स्वयङ्कृताऽपि तद्य्वाख्या क्रियते स्पष्टतार्थतः ॥7॥

तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते ।सर्वत्रानुगतत्वेन पृथगोङ्क्रियतेऽखिलैः ॥8॥

जिज्ञासाधिकरणम्

ओतत्ववाची ह्योङ्कारो वक्त्यसौ तद्गुणोतताम् ।स एव ब्रह्मशब्दार्थो नारायणपदोदितः ॥9॥


जन्माधिकरणम्

अन्तस्समुद्रगं विश्वप्रसूतेः कारणं तु यत् ।सूक्तोपनिषदाद्युक्तं ‘जन्माद्यस्य’ इति लक्ष्यते ॥89॥


शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्

एवं धर्मानिति श्रुत्या तदभेदोऽप्युदीर्यते ।शैवाद्यागमसम्प्राप्तदृष्टगेन फलेन तु ॥112॥


समन्वयाधिकरणम्

उपक्रमादिलिङ्गेभ्यो नान्या स्यादनुमा ततः ।त एवान्वयनामानः तैः सम्यक् प्रविचारिते ॥120॥


ईक्षत्यधिकरणम्

ईक्षणीयत्वतो विष्णुर्वाच्य एव न चान्यथा ॥121॥


आनन्दमयाधिकरणम्

एवं शास्त्रवगम्यत्वे विभागेन समन्वयम् ॥154॥


अन्तस्थत्वाधिकरणम्

............ देवानां तत्र शक्तताम् ।आशङ्क्य तत्र रूढिं च तच्छब्दानामपि स्वयम् ॥242॥


आकाशाधिकरणम्

चेष्टा हि चेतनानां या सा भवेत् तत्प्रसादतः ।अचेतनस्वभावस्तु विवरादिः कथं ततः ॥244॥


प्राणाधिकरणम्

.............अध्यात्ममन्वयव्यतिरेकतः ॥246॥


गायत्र्यधिकरणम्

नित्यत्वादेव शब्दस्य तत्स्वभावः कथं हरेः ।कथं प्रसिद्धबहुलशब्दानामन्यथार्थता ॥248॥


अन्तिमप्राणाधिकरणम्

.........बाहुल्ये श्रुतिलिङ्गयोः ॥249॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥


सर्वगतत्वाधिकरणम्

लिङ्गात्मकानां शब्दानां वृत्तिर्नारायणे परे ॥ १ ॥चिन्त्यते सर्वगत्वं तु प्रथमं प्रविचार्यते ।तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तिप्रबोधकः ॥1॥


अत्तृत्वाधिकरणम्

अनित्यत्वात् क्रियाणां तु कथमेव स्वरूपता ।इति चेत् स विशेषोऽपि क्रियाशक्त्यात्मना स्थिरः ॥6॥


गुहाधिकरणम्

........ द्वित्वं चैकस्य युज्यते ।यः सेतुरिति चैकत्ववचनेन विशेषणात् ॥10॥


अन्तरधिकरणम्

अन्तःस्थित्वा रमणकृदन्तरः समुदाहृतः ।रमणं चात्मशब्देनादेयं मातीति चोच्यते ॥11॥


अन्तर्याम्यधिकरणम्

रमणं नातियत्नस्य विक्षेपादेव युज्यते ॥15॥


अदृश्यत्वाधिकरणम्

गुणक्रियादयो भावा यदि वा स्युरभेदिनः ॥17॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥


तत्रान्यत्र प्रसिद्धानां(तत्रान्यत्र च सिद्धानां) लिङ्गानाम्नां पुनर्हरिः ।विशेषान्मुख्यतो वृत्तिं स्वस्मिन्नेवात्र वक्त्यजः ॥1॥

द्युभ्वाद्यधिकरणम्

विष्णावेवात्मशब्दस्य रूढत्वान्न शिवादिकान् ।श्रुतिर्वक्त्यखिलेशत्वात् .............॥


द्युभ्वाद्यधिकरणम्

...............भूमा विष्णुः सुखाधिकः ॥2॥


अक्षराधिकरणम्

अतो विरुद्धवद्भातमपि व्याख्याय तत्त्वतः ।योजनीयं हरौ वाक्यं विरुद्धैर्लक्षणैर्युतम् ॥3॥


वामनाधिकरणम्

लिङ्गं साधारणं शब्दौ स्थानं लिङ्गमनुग्रहः ।पुनः शब्दा लिङ्गशब्दौ विचार्या द्विःस्थिता इह ॥7॥


देवताधिकरणम्

तत्फलाय विधिः सिद्धे चोपासाया निराकृतः ।यतो जैमिनिनाऽन्यार्थमसिद्धेऽर्थे विधिस्तथा ॥15॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥


।आनुमानिकाधिकरणम्

दुःखिबद्धावराद्यास्तु तदधीनत्वहेतुतः ॥1॥


ज्योतिरुपक्रमाधिकरणम्

जातमोतं हरौ यस्माज्ज्योतिः, षः प्राणरूपतः ॥12॥


प्रकृत्यधिकरणम्

स्त्रीशब्दाश्च निषेधार्थाः सर्वेऽपि ब्रह्मवाचकाः ।विरोधिसर्वबाहुल्यकारणस्त्रीनिषेधिनाम् ॥22॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥


उक्तः समन्वयः साक्षादविरोधोऽत्र साध्यते ।चतुर्विधस्य तस्यादौ यौक्तः तत्रापि च स्मृतेः ॥1॥

तस्याश्चतुःस्वरूपत्वात् प्रत्येकं चतुरात्मकाः ।पादाः सर्वे तदंशाश्च मूर्तीनां वर्णमागमात् ॥2॥

आप्तता समतादृष्टिश्रुतिसाम्यबलोद्भवाः(बलाद्भवाः) ।सर्वानुसारो लघुता विशेषादर्शनाफले ॥3॥

इष्टासिद्धिश्च नियमः पूर्वपक्षेषु युक्तयः ।एता एव त्वतिबलाः सिद्धान्तस्य नियामकाः ॥4॥

स्मृत्यधिकरणम्

आप्तैः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा प्रोक्तमर्थं कथं श्रुतिः ।पिपीलिकालिपिनिभा वारयेत् सर्वगा हि ते ॥5॥


न विलक्षणत्वाधिकरणम्

........ नित्यत्वात् पुरुषोद्भवैः ।उज्झितं सर्वदोषैश्च कथं नो मानतां व्रजेत् ॥13॥


अभिमान्यधिकरणम्

तथापि मृज्जलादीनां बुद्धिवागादिवाचकः ॥62॥


असदधिकरणम्

अल्पवाक्ययुता युक्तिर्बहुलैव विरोधिनी ।यत्र तत्र कथं वस्तुनिर्णयः स्यादितीरिते ॥68॥


भोक्त्रधिकरणम्

नान्यदन्यत्वमापन्नं क्वचिद् दृष्टं कथञ्चन ॥86॥


आरम्भणाधिकरणम्

...... कथं च तदनन्यता ।जगतस्त्वविकारत्व उक्तन्यायेन साधिते ॥89॥


इतरव्यपदेशाधिकरणम्

अनंशस्यापि जीवस्य किञ्चित् सामर्थ्ययोजनम् ।कार्येषु यः करोत्यद्धा नमस्तस्मै स्वयम्भुवे ॥96॥


शब्दमूलत्वाधिकरणम्

तस्य त्वशेषशक्तित्वाद्युज्यते सर्वमेव च ॥101॥


न प्रयोजनाधिकरणम्

सदा प्रवृत्तिरीशस्य स्वभावादेव केवलम् ॥104॥


वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम्

वैषम्यं चैव नैघृण्यं वेदाप्रामाण्यकारणम् ॥112॥


सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम्

यदधीना गुणाश्चैव दोषा अपि हि सर्वशः ॥113॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥


स्मृतियुक्तिश्रुतिगुणयुक्तयो बहुयुक्तयः ॥1॥

एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति ।इति प्रथमपादेन निर्णीतेऽप्यभियोगतः ॥2॥

दर्शनानां प्रवृत्तत्वान्मन्द आशङ्कते पुनः ।अनादिकालतो वृत्ताः समया हि प्रवाहतः ॥3॥

न चोच्छेदोऽस्ति कस्यापि समयस्येत्यतो विभुः ।भ्रान्तिमूलत्वमेतेषां पृथग्दर्शयति स्फुटम् ॥4॥

तर्कैर्दृढमतमैरेव वाक्यैश्चागमवादिनाम् ।दौर्लभ्याच्छुद्धबुद्धीनां बाहुल्यादल्पवेदिनाम् ॥5॥

तामसत्वाच्च लोकस्य मिथ्याज्ञानप्रसक्तितः ।विद्वेषात् परमे तत्त्वे तत्त्ववेदिषु चानिशम् ॥6॥

अनादिवासनायोगादसुराणां बहुत्वतः ।दुराग्रहगृहीतत्वाद्वर्तन्ते समयाः सदा ॥7॥

तथापि शुद्धबुद्धीनामीशानुग्रहयोगिनाम् ।सुयुक्तयस्तमो हन्युरागमानुगताः सदा ॥8॥

इति विद्यापतिः सम्यक्समयानां निराकृतिम् ।चकार निजभक्तानां बुद्धिशाणत्वसिद्धये ॥9॥

रचनानुपपत्त्यधिकरणम्

चेतनाचेतनं तत्त्वद्वयमेव निरीश्वराः ।आहुस्तत्पञ्चपञ्चत्वविभागस्थमचेतनम् ॥10॥


अन्यत्राभावाधिकरणम्

साङ्ख्यस्तु सेश्वरो ब्रूते क्षेत्रानुग्रहशक्तिमान् ॥32॥


अभ्युपगमाधिकरणम्

चार्वकैरुच्यते मानमक्षजं नापरं क्वचित् ॥40॥


पुरुषाश्माधिकरणम्

सन्निधानाच्चेतनस्य वर्तते यद्यचेतनम् ॥46॥


अन्यथानुमित्यधिकरणम्

अङ्गित्वं यदि तस्यैव स्वातन्त्र्यं चेन्न चाखलिम् ।तत्प्रेरणेऽप्यशक्तत्वात् स्वतन्त्रोऽन्यो ह्यपेक्षितः ॥49॥


वैशेषिकाधिकरणम्

नित्यज्ञानप्रयत्नेच्छं सङ्ख्याद्यैरपि पञ्चभिः ॥53॥


समुदायाधिकरणम्

वैभाषिकाश्च सौत्रान्ताः स्वरसक्षणिकं जगत् ।अणूनां समुदायं च कालकर्मनिमित्ततः ॥180॥


असदधिकरणम्

अपरः शून्यमखिलं मनोवाचामगोचरम् ।निर्विशेषं स्वयम्भातं निर्लेपमजरामरम् ॥212॥


अनुपलब्ध्यधिकरणम्

ज्ञानमेवैकमखिलज्ञेयाकारं प्रभासते ।तत्र सन्ततिभेदश्च स्वभेदो भेद एव च ॥245॥


नैकस्मिन्नधिकरणम्

आह क्षपणको विश्वं सदसद्द्वयमद्वयम् ।द्वयाद्वयमतत्सर्वं सप्तभङ्गि सदातनम् ॥249॥


पत्युरधिकरणम्

सर्वज्ञत्वादिकैः सर्वैर्गुणैर्युक्तं सदाशिवम् ॥266॥


उत्पत्त्यधिकरणम्

निराकृतौ विशेषस्य भावाच्छक्तिमतं पृथक् ।दूष्यते महती देवी ह्रीङ्कारी सर्वकारणम् ॥292॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥


अथाशेषसमाम्नायविरोधापाकृतिं प्रभुः ।करिष्यन् अधिदैवाधिभूतजीवपरात्मनाम् ॥1॥

स्वरूपनिर्णयायैव वचनानां परस्परम् ।पादेनानेनाविरोधं दर्शयत्यमितद्युतिः ॥2॥

अनुभूतियुक्तिबहुवाग्वैलोम्यं च ततोऽधिकम् ।एतत्सर्वं सतः साम्यं द्वारवैयर्थ्यमेव च ॥3॥

दृष्टयुक्त्यनुसारित्वमुक्तान्यार्थाविरोधतः ।प्रसिद्धनामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तिता ॥4॥

लोकदृष्टानुसारित्वं जीवसाम्यमनादिता ।तत्र तत्र परिज्ञानं गुणसाम्यश्रुती तथा ॥5॥

उत्पत्तिमत्वं स्वगुणाननुभूत्यल्पकल्पने ।नानाश्रुतिश्च वैचित्र्यं युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥6॥

व्यवस्थानुपपत्तिश्च स्वातन्त्र्यमनुसारिता ।मुख्यता शक्तिमत्त्वं च वैरूप्यं सर्वसङ्ग्रहः ॥7॥

गत्यादिरीशशक्तिश्च सर्वमानविरोधिता ।अभीष्टासिद्धिसुव्यक्ती शास्त्रसिद्धिर्विपर्ययः ॥8॥

विशेषकारणं चेति सिद्धान्तस्यैव साधिकाः ।

वियदधिकरणम्

प्रकृतिः पुरुषः कालो वेदास्तदभिमानिनः(देवास्तदभिमानिनः) ॥9॥


मातरिश्वाधिकरणम्

एवं प्रलयकालेऽपि प्रतिभातपरावरः ।मुख्यवायुर्नित्यसमः शरीरोत्पत्तिकारणात् ॥20॥


असम्भवाधिकरणम्

...... स्वतन्त्रत्वात् परात्मनः ॥24॥


व्यतिरेकाधिकरणम्

अच्छेद्यस्यापि जीवस्य विभागं बहुधा हरिः ॥25॥


पृथगधिकरणम्

एवं स्थितेऽपि जीवैक्यं केचिदाहुः परात्मना ।तद्योऽहमिति पूर्वाभिः श्रुतिभिश्चानुमाबलात् ॥28॥


अंशाधिकरणम्

भेदस्य मुक्तौ वचनादापि तत्पक्षनिग्रहः ॥81॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥


श्रुत्यर्थः श्रुतियुक्तिभ्यां विरुद्ध इव दृश्यते ।यत्र तन्निर्णयं देवः सुविशिष्टोपपत्तिभिः ॥1॥

करोत्यनेन पादेन तत्र स्पष्टार्थवच्छ्रुतिः ।विशेषश्रुतिवैरूप्यं माहात्म्यं व्यक्तसद्गुणाः ॥2॥

दृष्टायुक्तिः समानत्वं कर्तृशक्तिर्विमिश्रिता ।युक्तयः पूर्वपक्षेषु सुनिर्णीतास्तु तादृशाः ॥युक्तयो निर्णयस्यैव स्वयं भगवतोदिताः ॥3॥

इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥


स्वाभाविकान्यथानामसहभावान्ययोक्तयः ॥1॥

अविशेषविशेषौ च सहभाIो विमिश्रता ।विरुद्धोक्तिः सहस्थानं वैयर्थ्यं चान्यथागतिः ॥ 2 ॥

युक्तयः पूर्वपक्षस्य गुणाधिक्यर्थतो भवौ ।उपपत्तिद्विरूपत्वमाधिक्यमनुरूपता ॥3॥

योग्यता बलवत्त्वं च विभागः कारणाभवः ।क्लृप्तिरन्या गतिश्चैव सिद्धान्तस्यैव साधकाः ॥4॥

बीजपूरुषयोनीनां सङ्गातिनियमोज्झितिम् ।अथशब्देन भगवानाह कारणतश्च ताम् ॥4॥

इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥


पश्चाददृष्ट्यविज्ञानकालदुःखपृथग्भवाः ।स्थानभेदो विरुद्धत्वं न्यायसाम्यं स्वतो भवः ॥1॥

गुणसाम्यमयोगश्च तर्कबाधो विलोमता ।नानाभावः प्रलोभश्च युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥2॥

अशक्यकर्तृताशक्तिः स्वतोऽबोधस्तदेव च ।अमानक्लृप्तिसन्मानव्यवस्थात्यल्पताभवाः ॥3॥

विशेषदृष्टिवाक्ये च पुंशक्तिः सुनिर्दशनम् ।अलौकिकत्वमाधिक्यं स्वातन्त्र्यं निर्णयप्रमाः ॥4॥

सन्ध्याधिकरणम्

वासनाः सर्ववस्तूनामनाद्यनुभवागताः ।सन्त्येवाशेषजीवानामनादिमनसि स्थिताः ॥5॥


देहयोगाधिकरणम्

सृष्ट्वैव वासनाभिश्च प्रपञ्चं स्वाप्नमीश्वरः ।वासनामात्रतां तस्य नीत्वाऽन्तर्धापयत्यजः ॥107॥


सम्पत्त्यधिकरणम्

सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा ।जीवं नयति देवेशः नान्यः कर्ताऽस्य कश्चन ॥108॥


नस्थानतोऽप्यधिकरणम्

न स्थानतोभेदतोऽप्यस्य भेदः कश्चित् परेशितुः ।सर्वत्राशेषदोषोज्झपूर्णकल्याणचिद्गुणः ॥109॥


उपमाधिकरणम्

यत आभासतामेव श्रुतिरस्य वदत्यलम् ।‘‘यथैषा पुरुषे छाया एतस्मिन्नेतदाततम्’’ ॥121॥


स्थानविशेषाधिकरणम्

प्रतिबिम्बवदप्येषामानन्दोऽन्यगुणा यथा ॥163॥


पालकत्वाधिकरणम्

..... सृष्टिनाशौ तदधीनावितीरिते ।स्वभावत्वात् स्थितेर्नैतदपेक्षेति न युज्यते ॥166॥


अव्यक्ताधिकरणम्

अव्यक्तोऽपि स्वशक्यैव भक्तानां दृश्यते हरिः ॥167॥


उभयव्यपदेशाधिकरणम् (अहिकुण्डलाधिकरणम्)

तदभिन्ना गुणा नित्यमपि सर्वे विशेषतः ।गुणत्वेन गुणित्वेन भोक्तृभोग्यतया स्थिताः ॥168॥


परानन्दाधिकरणम्

.... ते चाखलिवलिक्षणाः ।सर्वे सर्वगुणात्मानः सर्वकर्तार एव तु ॥209॥


फलाधिकरणम्

स एवाशेषजीवस्थनिःसङ्ख्यानादिकालिकान् ॥213॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥


वैराग्यतो भक्तिदार्ढ्यं तेनोपासा यदा भवेत् ।आपरोक्ष्यं भवेत् विष्णोरिति पादक्रमो भवेत् ॥1॥

युक्तितो ज्ञातवेदार्थो निरस्य समयान् परान् ।परस्परविरोधं(धे) च प्रणुद्याशेषवाक्यगम् ॥2॥

अध्यात्मप्रवणो भूत्वा तस्य सन्निहितत्वतः ।बहुयुक्तिविरोधानां भानात् तत्सहितश्रुतेः ॥3॥

विरोधं च निराकृत्य श्रुतीनां प्राणतत्वगान् ।परिहृत्य विरोधांश्च तत्प्रसादानुरञ्जितः ॥4॥

देहकर्तृत्वमीशस्य ज्ञात्वा तत्पितृतास्मृतेः ।विशेषस्नेहमापाद्य सर्वकर्तृत्वतोऽधिकम् ॥5॥

निष्पाद्य बहुमानं च तदन्यत्रातिदुःखतः ।उत्पाद्याधिकवैराग्यं तद्गुणाधिक्यवेदनात् ॥6॥

सर्वस्य तद्वशत्वाच्च दार्ढ्यं भक्तेरवाप्य च ।यतेतोपासनायैव विशिष्टाचार्यसम्पदा ॥7॥

कर्तव्या ब्रह्मजिज्ञासेत्युक्ते किमिति संशये ।अत इत्युदितेऽप्यस्य विशेषानुक्तितः पुनः ॥8॥

सृष्टिबन्धनमोक्षादिकर्तृत्वस्य श्रुतत्वतः ।यतो मोक्षादिदाताऽसावतो जिज्ञास्य एव वः ॥9॥

इत्याह तत्परं ब्रह्म व्यासाख्यं ज्ञानरश्मिमत् ।येनैव बन्धमोक्षः स्यात् स च जिज्ञासया गतः ॥10॥

सुप्रसन्नो भवेदीशो जिज्ञासाऽतोऽस्य मुक्तिदा ।मोक्षादिदत्वमीशस्य कथमेवावगम्यते ॥11॥

इति चेच्छास्त्रयोनित्वात् शास्त्रगम्यो हि मोक्षदः ।प्रत्यक्षावसितेभ्यः स्याद्यदि मोक्षः कथञ्चन ॥12॥

किमित्यनादिसंसारमग्नाः सर्वा इमाः प्रजाः ।यस्मान्नियमतो दुःखहानिः प्रत्यक्षतो भवेत् ॥13॥

धावन्त्येव तमुद्दिश्य राजाद्यमखिलाः प्रजाः ।अनुमागम्यतो मोक्षो यदि स्यादनुमैव हि ॥14॥

दृष्टपूरुषवन्मोक्षदातृतां विनिवारयेत् ।तच्छास्त्रगम्य एवैको मोक्षदो भवति ध्रुवम् ॥15॥

शास्त्रगम्यश्च नान्योऽस्ति मोक्षदत्वेन केशवात् ।मोक्षदो हि स्वतन्त्रः स्यात् परतन्त्रः स्वयं सृतौ ॥16॥

वर्तमानः कथं शक्तः परमोक्षाय केवलम् ।अन्याश्रयेण यद्येष दद्यान्मोक्षं स एव हि ॥17॥

तेन नानुसृतो मोक्षं न दद्यादन्यवाक्यतः ।अतस्तदर्थमपि स ज्ञेयो विष्णुर्मुमुक्षुभिः ॥18॥

‘यमेवैष’ इति श्रुत्या ‘तमेवे’ति च सादरम् ।शास्त्रयोनित्वमस्यैव ज्ञायते वेदवादिभिः ॥19॥

‘य एनं विदुरमृता’ इत्युक्तस्तु समुद्रगः ।‘तदेव ब्रह्म परममि’ति श्रुत्यावधारितः ॥20॥

‘यतः प्रसूते’ति ततः सृष्टिमाह ततो हरिः ।शास्त्रयोनिर्न चान्योऽस्ति मुख्यतस्त्विति गम्यते ॥21॥

शास्त्रयोनित्वमेतस्य ज्ञायते हि समन्वयात् ।समिति ह्युपसर्गेन परमुख्यार्थतोच्यते ॥22॥

एवं परममुख्यार्थो नारायण इति श्रुतेः ।निर्धारणाय नाशब्दमिति वेदपतिर्जगौ ॥23॥

कथं समन्वयो ज्ञेयः स्वल्पशाखाविदां नृणाम् ।‘वेदा ह्यनन्ता’ इति हि श्रुतिराहाप्यनन्ताम् ॥24॥

अनन्तवेदनिर्णीतिर्महाप्रलयवारिधेः ।उत्तारणोपमेत्यस्मान्न ज्ञेयोऽत्र समन्वयः ॥25॥

इत्याशङ्कापनोदार्थं(इति शङ्कापनोदार्थं) स आह करुणाकरः ।अशक्योत्तारणत्वेऽपि(अशक्योत्तरणत्वेऽपि) ह्यागमापारवारिधेः ॥26॥

निर्णीयते मयैवायं रोमकूपलयोदिना ।यद्यप्यशेषवेदार्थो दुर्गमोऽखलिमानवैः ॥27॥

मज्ज्ञानाव्याकृताकाशे प्राप्नोति परमाणुताम् ।इति प्रकाशयन् (वेद)विश्वपतिराह प्रमेयताम् ॥28॥

निखलिस्यापि वेदस्य गतिसामान्यमञ्जसा ।को नाम गतिसामान्यमनन्तागमसम्पदः ॥29॥

ज्ञानसूर्यमृते ब्रूयात् तमेकं बादरायणम् ।अन्योऽप्यल्पमतिः शाखाचतुष्पञ्चगतं वसु ॥30॥

जानन्ननुमितत्वेन ब्रूयात् तस्य प्रसादतः ।इति मुख्यतयाऽशेषगतिसामान्यवित् प्रभुः ॥31॥

प्रतिजज्ञे दृढं यस्माद्देवानामपि पूर्यते ।अतो निखलिवेदानां सिद्ध एव समन्वयः ॥32॥

इति सुज्ञापितार्थोऽपि पृथक् चाह समन्वयम् ।तत्र प्रथमतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां समन्वयः ॥33॥

शब्दानां वाच्य एवात्र महामल्लेशभङ्गवत् ।इतोऽत्यभ्यधिकत्वेऽपि तुर्यपादोदितस्य तु ॥34॥

महासमन्वये तस्मिन्नाधिकारोऽखिलस्य हि ।ब्रह्मैवाधिकृतस्तत्र मुख्यतोऽन्ये यथाक्रमम् ॥35॥

दुर्गमत्वाच्च नैवात्र प्राथम्येनोदितोऽञ्जसा ।अतोऽन्यत्र प्रसिद्धानां शब्दानां निर्णयाय तु ॥36॥

प्रवृत्तः प्रथमं देवः तत्रानन्दादयो गुणाः ।ईशस्यैवेति निर्णीताः श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥37॥

देवतान्तरगाः सर्वे शब्दवृत्तिनिमित्ततः ।विष्णुमेव वदन्त्यद्धा तत्सङ्गादुपचारतः ॥38॥

अन्यदेवान् वदन्तीह विशेषगुणवक्तृतः ।विष्णुमेव परं ब्रूयुरेवमन्येऽप्यशेषतः ॥39॥

इत्यन्यत्र प्रसिद्धोरुशब्दराशेरशेषतः ।ज्ञाते समन्वये विष्णौ लिङ्गैर्ह्येष समन्वयः ॥40॥

तेषामन्यगतत्वे तु न स्यात् सम्यक्समन्वयः ।इत्येवाशेषलिङ्गानां ब्रह्मण्येव समन्वयम् ॥41॥

आह उभयगतत्वं च स्यादतो लिङ्गशब्दयोः ।इति संशयनुत्त्यर्थमुभयत्र प्रतीतितः ॥42॥

शब्दानां वर्तमानानां सलिङ्गानां विशेषतः ।समन्वयो हरावेव यन्नैवान्यत्र मुख्यतः ॥43॥

शब्दा लिङ्गानि च यतो नैवान्यत्र स्वतन्त्रता ।अस्वतन्त्रेषु शब्दस्य वृत्तिहेतुर्न मुख्यतः ॥44॥

यतोऽतो यदधीनास्ते शब्दार्थत्वमुपागतः ।अत्यल्पेनैव शब्दस्य वृत्तिहेतुगुणेन तु ॥45॥

अयो यथा दाहकत्वं स एवेशः स्वतन्त्रतः ।मुख्यशब्दार्थ इति हि स्वीकर्तव्यो मनीषिभिः ॥46॥

इत्याह एवं च शब्दानां नारायणसमन्वये ।सिद्धेऽप्यशेषशब्दानां न कथञ्चन युज्यते ॥47॥

विरोधादवरत्वादेरपि प्राप्तिर्यतो भवेत् ।इति चेदवरत्वादि द्विविधं ह्युपलभ्यते ॥48॥

परस्यावरताहेतुर्यः स्वयं पर एव सन् ।सोऽपि ह्यवरशब्दार्थो यथा राजा जयी भवेत् ॥49॥

अन्योऽवरत्वानुभवी तयोः पूर्वोऽस्ति केशवे ।द्वितीयो जीव एवास्ति स्वातन्त्र्यान्न तु(च) दूषणम् ॥50॥

हरेरेवमशेषेण सर्वशब्दसमन्वये ।उक्ते विरोधहीनस्य स्यात् समन्वयता यतः ॥51॥

अतोऽशेषविरोधानां कृतेशेन निराकृतिः ।समन्वयाविरोधाभ्यां सञ्जाते वस्तुनिर्णये ॥52॥

किं मया कार्यमित्येव स्याद्बुद्धिरधिकारिणः ।तत्र भक्तिविधानार्थमभक्तानर्थसन्ततौ ॥53॥

उक्तायां भक्तिदार्ढ्याय प्रोक्तेऽशेषगुणोच्चये ।वक्तव्योपासना नित्यं कर्तव्येत्यादरेण हि ॥54॥

सोपासना च द्विविधा शास्त्राभ्यासस्वरूपिणी ।ध्यानरूपा परा चैव तदङ्गं धारणादिकम् ॥55॥

तथोभयात्मकं चैव पादेऽस्मिन् बादरायणः ।आहोपासनमद्धैव विस्तरात् श्रुतिपूर्वकम् ॥56॥

पृथग्दृष्टिरशक्यत्वमनिर्णीतिः समुच्चयः ।विशेषदर्शनं कार्यलोपो नानोक्तिराशुता ॥57॥

विभ्रमोपाकृतिर्लिङ्गमनवस्थाविशेषिता ।अप्रयोजनता चातिप्रसङ्गोऽदूरसंश्रयः ॥58॥

विशिष्टकारणं चेष्टां दृष्टवैरूप्यमुन्नतिः ।अनुक्तिरप्रयत्नत्वं दृढबन्धपराभवौ ॥59॥

पुंसाम्यं प्राप्तसन्त्यागः कारणानिर्णयो भ्रमः ।विशेषदर्शितालापो गुणसाम्यं पृथग्दृशिः ॥60॥

अगम्यवर्त्म सन्धानमिष्टं फलमकल्पना ।शुद्धवैरूप्यमङ्गत्वमविशेषदृशिः क्रिया ॥61॥

युक्तयः पूर्वपक्षस्थाः सुज्ञेयत्वं विधिक्रिया ।माहात्म्यमल्पशक्तित्वं यथायोग्यफलं भवः ॥62॥

फलसाम्यं विशेषश्च गुणाधिक्यं प्रधानता ।यथाशक्तिक्रिया सन्धिः प्रमाणबलमानतिः ॥63॥

कारणं कार्यवैशेष्यं स्वभावो वस्तुदूषणम् ।प्रतिक्रियाविरोधश्च प्रतिसन्धिरनूनता ॥64॥

संस्कारपाटवं स्वेच्छानियतिर्वस्तुवैभवम् ।विशेषोक्तिरमानत्वं प्राधान्यं प्रीतिरागमः ॥65॥

सुस्थिरत्वं कृतप्राप्तिरनादिगुणविस्तरः ।साधनोत्तमता नानादृष्टिः शिष्टिरनूनता ॥66॥

अविघ्नत्वाविरोधौ च गुणवैशेष्यमागमः ।सिद्धान्तनिर्णया ह्येता युक्तयो व्याहृताः सदा ॥67॥

सर्ववेदान्तप्रत्ययाधिकरणम्

यथाशक्त्यखिलान् वेदान् विज्ञायोपासनं भवेत् ।तत्राखिलस्य विज्ञप्तिः सम्यग्ब्रह्मणः एव हि ॥68॥


उपसंहाराधिकरणम्

कृत्वाऽथ कुर्वन्नपि वा निदिध्यासनमाचरेत् ॥97॥


नवाधिकरणम्(अनुबन्धाद्यधिकरणम्)

विषयेषु च संसर्गात् शाश्वतस्य च संशयात् ।मनसा चान्यदाकाङ्क्षात् परं न प्रतिपद्यते ॥98॥


विद्याधिकरणम्

नैव मोक्ष इति प्राहुर्लोकायतमते स्थिताः ॥122॥


यावदधिकाराधिकरणम्

अधिकारविशेषेण भक्तिज्ञानसुखादिभिः ।विशेषो देवतादीनां मोक्षे चैव विशेषतः ॥187॥


इयदामननाधिकरणम्

उषाः स्वाहा च पर्जन्यो मित्रोऽग्निर्वरुणो विधुः ॥192॥


दर्शनभेदाधिकरणम्

..... दृष्टिरिति योग्यानुसारतः ॥203॥


प्रदानाधिकरणम्

सम्यग्गुरुप्रसादश्च मुख्यतो दृष्टिकारणम् ।


गुरुप्रसादाधिकरणम्

श्रवणादि च कर्तव्यं नान्यथा दर्शनं क्वचित् ॥204॥


पूर्वविकल्पाधिकरणम्

गुणाधिकं गुरुं प्राप्य तद्धीनं नाप्नुयात् क्वचित् ।विपर्ययस्तु कर्तव्यः सर्वथा शुभ(मुक्ति)मिच्छता ॥205॥


ताद्विद्याधिकरणम्

साधनेभ्योऽधिका भक्तिर्नैवान्यत् तादृशं क्वचित् ॥209॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥


एवमुत्पन्ननिर्दोषभगवद्दर्शनात् सदा ।अपेक्षितफलप्राप्तिरारब्धस्यानतिक्रमात् ॥1॥

देवर्षिमानुषादीनां तत्तज्जात्यनुसारतः ।जैमिन्युक्तं मानुषाणां तद्विशेषाश्च केचन ॥2॥

सामान्यं भगवत्प्रोक्तं देवादीनां विशेषतः ।बलवद्विरोधिसद्भावे जैमिन्याद्युक्तिरिष्यते ॥3॥

कामचाराधिकरणम्

विकर्मलेपो नैवस्ति सम्यग्दृष्टिमतां क्वचित् ।गुणहानिश्च नैवास्ति ब्रह्मणस्त्वविकर्मतः ॥4॥


आधिकारिकाधिकरणम्

अनादियोग्यता चैव कलिवाणीश्वरावधिम् ॥111॥


फलश्रुत्यधिकरणम्

स्वातन्त्र्यतारतम्येन फलं हि फलिनां भवेत् ।अशुभं त्वशुभेऽप्येषां स्वातन्त्र्यात् प्रीतितो हरेः ॥255॥


अन्वयाधिकरणम्

ज्ञानदा अपि चाचार्या विशेषात् फलमाप्नुयुः ।‘मुक्तावष्टगुणं शिष्याद् गुरुराप्नोति शोचनम् ॥271॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥


समन्वयाविरोधाभ्यां सिद्धे वस्तुनि साधने ।विचारितेष्वशेषेषु साधनेषु विशेषतः ॥1॥

नित्यशः कार्यमत्यन्तमवश्यम्भावि साधनम् ।चिन्त्यते प्रथमं तत्र श्रवणादिसकृत्क्रिया ॥2॥

आवृत्तिर्वेति सन्देहे कर्तव्यावृत्तिरेव हि ।उपदेशोऽतत्त्वमसीत्यादि ह्यसकृदेव यत् ॥3॥

‘लिङ्गाल्लातव्यतः पूर्वमृजोर्ब्रह्मत्वतः शतात् ।शुश्रावोग्रतपा नाम योग्यो रुद्रपदस्य यः ॥4॥

सार्धं परार्धं विष्णोस्तु गुणान् भक्त्या सदोद्यतः ।तत्त्रिभागमुपासां च चक्रे सम्भृतमानसः ॥5॥

दशमन्वन्तरं शक्रपदयोग्यो गरुत्मतः ।पदयोग्यात्सुमनसः सुनन्दो नाम चाशृणोत् ॥6॥

उपासां चक्र उद्युक्तो मन्वन्तरचतुष्टयम् ।सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पदयोग्यौ सुतेजसौ ॥7॥

सुरूपः शान्तरूपश्च मन्वन्तरचतुष्टयम् ।अशृण्वतां सुमनसो मन्वन्तरमुपासताम् ॥8॥

ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः ।अपश्यन् परमं विष्णुं तत्प्रसादैधिताः(तत्प्रसादेधिताः) सदा ॥9॥

इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते ।आत्मेति नाम कथितं साक्षान्नारायणस्य हि ॥10॥

आत्माधिकरणम्

‘आत्मा ब्रह्म महांस्तारः परमेशः शुचिश्रवाः ।विष्णुर्नारायणोऽनन्त इति श्रीपतिरीर्यते’ ॥11॥


न प्रतीकाधिकरणम्

प्रतीकविषयत्वेन न कार्या विष्णुभावना ॥19॥


ब्रह्माधिकरणम्

ब्रह्मेति च सदा ध्येयो भगवान् विष्णुरञ्जसा ।उत्कृष्टो ब्रह्मशब्दार्थः पूर्णत्वं ब्रह्मतां यतः ॥35॥


तदधिगमाधिकरणम्

तथोपास्यञ्जसा दृष्टं ब्रह्म पापं च भस्मसात् ॥63॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥


देवानां च मनुष्याणामेतावत्सममेव हि ॥1॥

उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः ।कर्मक्षयस्तथोत्क्रान्तिर्मार्गो भोगश्चतुष्टयम् ॥2॥

फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः ।स्रष्टृष्वेव च(तु) सृज्यानां प्रवेशो ब्रह्मणो लये ॥3॥

देवानां मार्ग उद्दिष्टो नार्चिरादिर्न चोत्क्रमः ।स्रष्टुस्तु ग्रासभूतस्य देहस्तत्र लयं व्रजेत् ॥4॥

यतः सृज्यस्य देवस्य नैवोत्क्रान्तिस्ततो भवेत् ।लयाच्चैवार्चिरादीनां लोकानामपि सर्वशः ॥5॥

कथं मार्गो भवेत् तेषां विशतामुत्तरं(विशतामुत्तमं) स्वतः ।जातानां मानुषे लोके देवानां तु(च) कदाचन ॥6॥

उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते ।अन्येषामपि साक्षाततु मुक्तिः प्राप्यापि तं हरिम् ॥सहैव ब्रह्मणा भूयादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥7॥

‘क्ष्माम्भोऽनलानलिवियन्मनइन्द्रियार्थभूतादिभिः परिवृतः प्रतिसञ्जिघृक्षुः ।अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं परं स्वमनुभूय परः स्वयम्भूः(भाग.३.३२.९) ॥8॥

एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः(भाग.३.३२.१०) ॥9॥

‘भगवन्तमनुप्राप्ता अपि तु ब्रह्मणा सह ।परमं मोक्षमायान्ति लिङ्गभङ्गेन योगिनः’ ॥10॥

‘प्राप्ता अपि परं देवं सहैव ब्रह्मणा पुनः ।आनन्दव्यक्तिमायान्ति पूर्णा लिङ्गस्य भङ्गतः’ ॥11 ॥

इति श्रुतिपुराणोक्तिबलाद्विज्ञायते च तत् ।भोगस्तु सर्वदेवानां नरादीनां च विद्यते ॥12॥

तत्र प्रवेशो देवानामुत्तरोत्तरतः क्रमात् ।उच्यते देहगानां च वृत्तीनामेवमेव तु ॥13॥

तत्र मोक्षस्वरूपं तु वादिनः प्रतिभाश्रयात् ।नाना वदन्ति पुंसां हि मतयो गुणभेदतः ॥14॥

पृथक् पृथक् प्रजायन्ते तमसैवान्यथामतिः ।रजसा मिश्रबुद्धित्वं सत्त्वेनैव यथामतिः ॥15॥

गुणातीता विमुक्तानां मतिः शुद्धिचितिर्यतः ।सम्यगेवाथ नित्या च तत्तन्माहात्म्ययोगतः ॥16॥

बहुला चातिविशदा स्पष्टा चैव श्रियो मतिः ।महाशुद्धचितित्वेन ततोऽप्यतिमहाचितिः ॥17॥

अशेषोरुविशेषाणामतिस्पष्टतया दृशिः ।नित्यमेकप्रकारा च नारायणमतिः परा ॥18॥

सूर्यप्रभावदखिलं भासयन्ती निरन्तरा ।निर्लेपा वीतदोषा च नित्यमेवाविकारिणी ॥19॥

विशेषांस्तद्गतांस्त्यक्त्वा प्रायस्तल्लक्षणा श्रियः ।तथैव स्पष्टताभावात् तत्तन्त्रत्वात् तु(च) केवलम् ॥20॥

न तादृशी ब्रह्मणस्तु एवं श्रियो यथा ।मुक्तानां तु तदन्येषां समुद्रतरलोपमा ॥21॥

अग्निज्वालावदेव स्यात् सृतिगानां दृशो भवः ।एवंविधेषु ज्ञानेषु तमसा मुष्टदृष्टयः ॥22 ॥

खद्योतसदृशात्यल्पज्ञानत्वादन्यथादृशः ।वदन्ति वादिनो मोक्षं नानामतसमाश्रयात् ॥23॥

आश्रित्य प्रतिभामाह जिनस्तत्रातितामसीम् ।ज्ञानात् कर्मक्षयान्मोक्षो भवेद्देहाख्यपञ्जरात् ॥24॥

पञ्जरोन्मुक्तखगवदलोकाकाशगोचरः ।नित्यमूर्ध्वं व्रजत्येव पुद्गलो हस्तपादवान् ॥25॥

इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) ।गतिरूर्ध्वा च दुःखेता गतित्वाल्लौकिकी यथा ॥26॥

इत्युक्ते चानुमानैकशरणस्य किमुत्तरम् ।अनूर्ध्वगतिता तत्र यद्युपाधिः खगस्य च ॥27॥

दूरोर्ध्वगमने दुःखमिति साध्यानुगो न सः ।प्रतिसाधनरूपस्य नानुमानस्य दूषणम् ॥28॥

उपाधिः प्रतिरूपं हि साधनं तन्न चापरम् ।अथापि सशरीरत्वं चात्रोपाधिर्न वै भवेत् ॥29॥

गतित्वं यत्र देहित्वमिति यत्साधनानुगम् ।आगमाननुसारित्वे प्रसङ्गोऽयं यतस्ततः ॥30॥

नापसिद्धन्तता दोषः प्रसङ्गे यदि सा भवेत् ।तदैवातिप्रसङ्गः स्यान्न प्रसङ्गः क्वचिद्भवेत् ॥31॥

लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः ।सोऽपीत्युक्ते वदेत् किं स तस्माद्वेदोदितो भवेत् ॥32॥

मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् ।चकार सौगतमतं मोहायैव चकार यत् ॥33॥

असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् ।अतोऽसुराधिकारत्वान्न ग्राह्यं तन्मतं क्वचित् ॥34॥

चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् ।अनुमेयबहिस्तत्त्वं तथा प्रत्यक्षबाह्यगम् ॥35॥

इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः ।ते मोक्षं तादृशं ब्रूयुर्निःशङ्कं मायिनो यथा ॥36॥

न किञ्चिन्मुक्त्यवस्थायामात्मात्मीयमथापि वा ।एकस्मिन् संसृतेर्मुक्ते न किञ्चिदवशिष्यते ॥37॥

तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः ।दृश्यते संसृतेर्ध्वंसे निर्विशेषैव शून्यता ॥38॥

न सत्त्वं नैव चासत्त्वं शून्यतत्त्वस्य विद्यते ।न सुखत्वं न दुःखत्वं न विशेषोऽपि कश्चन ॥39॥

निर्विशेषं स्वयम्भातं विर्लेपमजरामरम् ।शून्यं तत्त्वमसम्बाधं नानासंवृतिवर्जितम् ॥40॥

अशेषदोषरहितं मनोवाचामगोचरम् ।मोक्ष इत्युच्यतेऽसद्भिर्नानासंवृतिवर्जितम् ॥41॥

संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) ।स्थितया ध्वस्तया चैव संसृतिर्मोक्ष इत्यपि ॥42॥

केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा ।अवच्छिन्नं महाशून्यं नाना पुद्गलशब्दितम् ॥43॥

यस्य शून्यैकरसता ज्ञानात्मा त्वपगच्छति ।स पुद्गलत्वनिर्मुक्तो महाशून्यत्वमेष्यति ॥44॥

संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् ।इत्येवं मायिनश्चाहुरेकजीवत्ववादिनः ॥45॥

बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः ।निर्विशेषत्ववाचैव शून्यं ब्रह्मेति नो भिदा(ब्रह्मैव तो भिदा) ॥46॥

सच्चित्यसुखादिकं चैव किं कुतोऽखण्डवादिनः ।व्यावर्त्यमात्रभेदस्तु विद्यते शून्यवादिनः ॥47॥

अनृतादेरपोहं तु स्वयमेव हि मन्यते ।निर्विशेषत्वतो नैव विशेषो ब्रह्मशून्ययोः ॥48॥

प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि ।अतत्त्वावेदकं यस्मात् प्रमाणं तेन कथ्यते ॥49॥

अतत्त्वावेदकं यदप्रामाण्यं सतां मतम् ।दीर्घभ्रान्तिकरी चेत् स्यादतत्त्वावेदकप्रमा ॥50॥

रज्जुसर्पादिविज्ञानादप्याधिक्यादमानता ।स्यादागमस्यानिवर्त्यमहामोहप्रदत्वतः ॥51॥

तलनैल्यादिविज्ञानमाकाशे मानतां व्रजेत् ।छत्राकारत्वविज्ञानं चन्द्रप्रादेशतामतिः ॥52॥

निर्भेदत्वं तु शून्यस्य तेनाप्यङ्गीकृतं सदा ।सत्त्वासत्त्वादिधर्माणामभाव उभयोर्मतः ॥53॥

न हि सत्प्रतियोगित्वं शून्यत्वं तेन चेष्यते ।न च दुःखविरोधित्वादन्या ह्यानन्दतेष्यते ॥54॥

मायिना शून्यपक्षेऽपि ज्ञानं जाड्यविरोधि च ।धर्माः केऽपि(धर्मास्तेऽपि) न सन्त्येव को विशेषस्ततस्तयोः ॥55॥

एतादृशानां पक्षाणां दूषणं प्रभुणा कृतम् ।स्वपक्षसाधनेनैव ‘नाभाव’ इति चोक्तितः ॥56॥

आत्माभावे पुमर्थः क इष्टस्यात्माऽऽवधिर्यतः ।यदि नात्मावधिर्मोक्षो मोक्षः स्याद्धटशून्यता ॥57॥

कल्पितत्वाद्विशेषाणां मायिनोऽपि समं हि तत् ।दृश्यमाने विशेषेऽपि यदि चेदविशेषता ॥58॥

घटाभावोऽविशेषः स्यात् पाश्चात्यश्चेदनागतः ।न मोक्षो विमतो यस्माददेहो घटशून्यता ॥59॥

यथेत्युक्तो वदेत् किं स योनुमामात्रमानकः ।न च मायी वदेत् तत्र पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ॥60॥

अमानत्वात् श्रुतेस्तस्य न चादेहत्ववादिनी ।श्रुतिः काचिददेहत्वमप्राकृतशरीरताम् ॥61॥

मोक्षे भोगं यतो ब्रूते जक्षन् क्रीडन्निति श्रुतिः ।निर्दुःखत्वान्न तन्मोक्षः प्रतिपन्नं यथेति च ॥62॥

अनुमादूषणं किं स्याद्वादिनोः शून्यमायिनोः ।दुःखं दुःखादभिन्नत्वान्मोक्षोऽपि स्यादसंशयम् ॥63॥

भेदे सद्द्वैततैव स्यादित्याद्यमितदोषतः ।हेयं मायामतेनैव सह शून्यमतं बुधैः ॥64॥

एवं विज्ञानवादोऽपि ज्ञानमात्रविशेषतः ।तस्यापि भङ्गुरत्वादिविशेषमपहाय हि ॥65॥

अद्वैततामतं साक्षादुक्तदोषस्ततो भवेत् ।कालो न केवलज्ञानी कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥66॥

एतयाऽनुमया रोधान्न तादृङ्मोक्षरूपता ।यदि कालोऽपि नेत्याह कदेति प्रश्न उत्तरम् ॥67॥

किं वक्ष्यति यदावस्थां वदेत् सा पक्षतां व्रजेत् ।अवस्थात्वादिति ह्येव हेतुः साऽपि कदेति च ॥68॥

पृष्टे कालश्च वक्तव्यो नाकालत्वं ततो भवेत् ।न काल इति सामान्यनिषेधे कालगप्रमा ॥69॥

निरुणद्धि समश्चायं त्रयाणामुक्तवादिनाम् ।एकजीवत्वपक्षे तु कालाभावादियं प्रमा ॥70॥

कुपिता कालमाधाय द्वैतमेवोपपादयेत् ।विमतः प्रपञ्चवान् कालः कालत्वात् प्रतिपन्नवत् ॥71॥

इति चान्यानुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् ।कालशब्देश्वरैकत्वमतान्यप्येवमेव हि ॥72॥

निराकृतानि तेषां च समत्वात् पक्षदोषयोः ।ज्ञानं स्वरसभङ्ग्येव नित्यसन्तानमिष्यते ॥73॥

बौद्धाभ्यामपराभ्यां तु तत्राप्युक्तानुमा रिपुः ।मोक्षो न शुद्धविज्ञानसन्तानी कालगत्वतः ॥74॥

प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् ।अनुमानानि सर्वाणि प्रतिसाधनयोगतः ॥75॥

निषिद्धान्युक्तभङ्ग्यैव श्रुतयश्चास्मदुक्तिगाः ।साङ्ख्यनैयायिकाद्याश्च प्राहुर्मोक्षं च(तु) निःसुखम् ॥76॥

इच्छाद्वेषप्रयत्नादेरपि सर्वात्मना लयम् ।तत्राहुर्नैतदप्यत्र शोभनं श्रुतयो यतः ॥77॥

महानन्दं च भोगं च नियमेन वदन्ति हि ।प्राकृतप्रियहानिस्तु प्रियास्पृष्टिरितीर्यते ॥78॥

अप्रियं प्रतिकूलं तदविशेषेण शब्दितम् ।नास्ति ह्यप्राकृतं दुःखं सतो जीवस्य कुत्रचित् ॥79॥

प्रियं स्वरूपमेवास्य बलानन्दादिवाक्यतः ।हेयत्वादप्रियस्यैव प्रियहानेरनिष्टतः ॥80॥

न समस्तप्रियाभावो मोक्षे प्रोक्ते तु युज्यते ।अप्रियस्य स्वरूपत्वमसुरेष्वेव हि श्रुतम् ॥81॥

असुरा नैवमेवं च नैवं चाखलिमानुषाः ।इत्यात्मप्रियहानाय को यतेत च बुद्धिमान् ॥82॥

सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि ।धर्मानुच्छित्तिमेवास्य यतो वक्त्युत्तरश्रुतिः ॥83॥

आशङ्क्यास्य ज्ञानहानिं मैत्रेय्या मोहमाह माम् ।भवानित्युक्तवत्या हि नाहं मोहं वदामि ते ॥84॥

इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यो हि स्वरूपानाशमूचिवान् ।ज्ञानरूपस्य विज्ञाननाशस्तन्नाश एव यत् ॥85॥

इति शून्यमतोच्छित्त्यै पुनरानन्दपूर्वकान् ।धर्मानाहाप्यनुच्छिन्नांस्तार्किकैर्विनिवारितान् ॥86॥

मात्रासंसर्गमप्याह तथा माध्यन्दिनश्रुतिः ।आचिक्षेप मतं तच्च यस्मिन्न विषयादनम् ॥87॥

घ्राणादिभोगाभावस्य त्वनिष्टत्वहृदा श्रुतिः ।येनेदमखिलं वेद विज्ञातारं स्वमेव च ॥88॥

केन तं च विजानीयादित्यनिष्टं हि सर्वथा ।नाखिलज्ञापको विष्णुरज्ञेयो नियमेन हि ॥89॥

तज्ज्ञानार्थं हि वेदानामखिलानां प्रवर्तनम् ।प्रत्यक्षमात्मविज्ञानाविरोधानुभवादपि ॥90॥

न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते ।कर्तृकर्मविरोधश्च नित्यानुभवरोधतः ॥91॥

कथमेव पदं गच्छेद्विरोधोऽदृष्टबाधनम् ।‘सोऽश्नुते सर्वकामांश्च’ ‘कामान्नी कामरूप्यथ’ ॥92॥

इत्यादिश्रुतयश्चोक्तमर्थमेव वदन्ति हि ।अस्वातन्त्र्यादिवेत्युक्तं न द्वैताभावतः क्वचित् ॥93॥

आत्मैवाभूदिति ह्यस्मादविशेषप्रसङ्गतः ।‘अस्वातन्त्र्योपमाभेदभेदेष्विव उदीरितः’ ॥94॥

शब्दतत्त्व इति प्रोक्तं मैत्रेय्युक्तोत्तरं च किम् ।सुखादिधर्महानौ तु मुक्तेः किं च प्रयोजनम् ॥95॥

यद्यर्थो दुःखहानिः स्यादनर्थः सुखनाशनम् ।तयोश्च दुःखहानाद्धि सुखनाशोऽधिको भवेत् ॥96॥

प्राप्यापि दुःखं सुमहत्सुखलेशाप्तये जनः ।यतते सुखहानौ हि को मोक्षाय यतेत् पुमान् ॥97॥

अल्पाच्च सुखनाशाद्धि बिभेत्यतितरां जनः ।महच्च दुःखमाप्नोति सुखनाशनिवृत्तये ॥98॥

न च रागनिमित्तं तद्वीतरागा अपि स्फुटम् ।नारदाद्याः सुखार्थाय सहन्ते दुःखमञ्जसा ॥99॥

युद्धादिदर्शनं यस्मात् सुदुःखेनापि कुर्वते ।‘यदेन्द्रवैरोचनयोर्ब्रह्मास्त्राभ्यां सुतापिताः ॥100 ॥

अपि नैवाजहुर्युद्धरसात् ते नारदादयः’ ।इति स्कान्दवचनस्तस्मात् सुखाभावाय को यतेत् ॥101॥

विमतो दुःखयुग् यस्माच्चेतनः सन् सुखोज्झितः ।प्रतिपन्नो यथेत्येव चानुमा केन वार्यते ॥102॥

सर्वश्रुतिपुराणेषु सुखभावोक्तितस्तथा ।मुक्तौ न ग्राह्यमेवैतत्सुखाभावमतं बुधैः ॥103॥

‘सोऽनानन्दाद्विमुक्तः सन्नानन्दी भवति स्फुटम्’ ।‘निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः ॥104॥

परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) ।‘न विष्णुसदृशं दैवं न मोक्षसदृशं सुखम् ॥105॥

न वेदसदृशं वाक्यं न वर्णोङ्कारसंमितः’ ।‘यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ॥106॥

कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि’ ।इति श्रुतिपुराणानि तत्र तत्र वदन्ति हि ॥107॥

अतो मोक्षे सुखाभाव इति यत्किञ्चिदेव हि ।शिरःकराद्यभावश्च न मुक्तस्य भवेत् क्वचित् ॥108॥

श्रुतयश्च पुराणानि मानमत्र बहूनि च ॥109॥

‘न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥110॥

श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ।सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणिप्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः ॥111॥

प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसां परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनाम् ।भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् ॥112॥

विद्योतमानप्रमदोत्तमाभिः सविद्युदभ्रवलिभिर्यथा नभः ।श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः’(भाग.२.९.१०-१३) ॥113॥

‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः’(ऋ.सं.१०.७१.११) ॥114॥

कामान्नरूपी चरतीतिपूर्व श्रुत्या पुराणोक्तिभिरप्यदोषः ।देहः स्वरूपात्मक एव तेषां मुक्तिं गतानामपि चेयते हि ॥115॥

शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् ।यथेति पूर्वा अनुमाश्च जीव स्वरूपमङ्गादिकमावयन्ति(आपयन्ति) ॥116॥

न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् ।स ब्रह्मणा सहितोऽशेषभोगान् भुङ्क्ते तथोपेत्य सुखार्णवं तम् ॥117॥

यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् ।भुङ्क्ते स देवः(दैवं) पुरुषोत्तमोऽजः आत्मेति चोक्तो गुणपूर्तिहेतोः ॥118॥

सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् ।इत्यादिवाक्यैर्भगवद्वशः सन् भुङ्क्तेऽखिलान् मुक्तिगतोऽपि भोगान् ॥119॥

कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् ।इत्यादिका अप्यनुमाः प्रमाणं मुक्तौ च जीवस्य परत्वरोधे ॥120॥

कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति ।यतो न दृष्टं यदभून्न पूर्वं पश्चात् तदासेति कुतश्च किञ्चित् ॥121॥

न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति ।यतो न कुत्रापि भिदाभिदा च दृष्टा चितश्चेतनया कुतश्चित् ॥122॥

इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण ।विदुर्न सम्यग्यदपीह लौकिकाः सुखं मम स्याच्च सदेति जानते ॥123॥

औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः ।स्वातन्त्र्यमापूर्णविशेषयोग्यता विरोधहानिश्च चतुर्थपादे ॥124॥

व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् ।विभक्तता चात्वरयैव सिद्धिर्विपक्षसम्प्राप्तिविरुद्धहेतवः ॥125॥

सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः ।नानाप्रवृत्तिः कृतकृत्यता च विपक्षतर्काः समतीतपादे ॥126॥

महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् ।विशेषकार्यं कृतिसंस्थितिश्च(कृतसंस्थितिश्च) सुयुक्तयो निर्णयगाः स्वपक्षे ॥127॥

व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च ।समानधर्मः कृतशेषता च लोकोपमा पूर्वमतानुसाराः ॥128॥

विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः ।कृतार्थता शश्वदनुप्रवृत्तिः सिद्धान्तनिर्णीतिविशिष्टहेतवः ॥129॥

नैकस्मिन्नधिकरणम्

प्रधानवायुस्त्विह वायुनामा भूतेष्विति प्रोक्तगतोऽपि युक्त्या ।यस्मात् श्रुतौ पवते चेति भूरिप्रोक्तो यतो भूतमानी च सोऽपि ॥130॥


पराधिकरणम्

तस्मिन् लयं यान्ति भूतान्यशेषक्रमाविरोधेन स एव विष्णौ ॥131॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥


उत्क्रान्तमार्गश्च विमुक्तगम्यं पादोदितं सुक्रमविक्रमौ च ॥1॥

सान्तनिकप्राप्तिरभीष्टता च सौकर्यमित्यन्यमतस्य तर्काः ।विशेषसमप्राप्तिरुरुत्वमाप्तिः क्रमानुरागः कथितानुवृत्तिः ॥2॥

कार्याधिकरणम्

सिद्धान्तनिर्णीतिकराः प्रतीकं देहादिकं तद्गतमेव ये नराः ।उपासते ते पुरतः समाप्नुयुर्ब्रह्माणमस्मान्मतिमाप्य विष्णुम् ॥3॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥


अतिक्रमोक्तिः कृतिरर्थलाभः परागतिः पारगतिस्तदोकः ॥1॥

समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके ।सामान्यरूपं प्रतिभानमुक्तिराश्चर्यता कृत्रिमतास्तदोषः ॥2॥ विशेषक्लृतिः कृतनिश्चयश्च माहात्म्यमित्येव सुनिर्णयार्थाः ।

अनन्याधिपत्त्यधिकरणम्

अनन्यभृत्यत्वमिहोदितेभ्यस्त्वन्यस्य भृत्यत्वनिवारणाय ॥3॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥