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Brahmasutra/C4/S4: Difference between revisions

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__TOC__
<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
{{Adhyaya
| document_id  = BS
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| chapter_id    = BS_C04
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| verse_line1  = सम्पद्याविहाय स्वेन शब्दात् ॥ 01-542
| verse_line1  = (542)ओं सम्पद्याविहाय स्वेन शब्दात् ओम् 04-04-01 ॥
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॥ इति सम्पद्याधिकरणम् ॥ 01 ॥
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| text    =
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति च ।
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’(छांउ.८.३.४) इति च ।
}}
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| text    =
| text    =
‘एवं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति’ इति च ।
‘एतं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति’(छां.उ.८.४.२) इति च । तत्र तरणं नाम तत् प्राप्तयेऽन्यतरणमेव
}}
}}


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| text    =
तत्र तरणं नाम तत्प्राप्तयेऽन्यतरणमेव ।
‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वैतं सेतुमाप्य एतेनैव सेतुना मोदते प्रमोदत आनन्दी भवति’() इति मौद्गल्यश्रुतेः ॥ 01 ॥
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वैतं सेतुमाप्यैतेनैव सेतुना मोदते प्रमोदत आनन्दी भवति’ इति मौद्गल्यश्रुतेः ॥ 01 ॥
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Line 65: Line 53:
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥ 02-543
| verse_line1  = (543)ओं मुक्तः प्रतिज्ञानात् ओम् 04-04-02 ॥
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॥ इति मुक्ताधिकरणम् ॥ 02 ॥
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| text    =
| text    =
‘अहरहरेनमनुप्रविशत्युपसङ्क्रमते च न तत्र मोदते न प्रमोदते न कामाननुभवति बद्धो ह्येष तदा भवत्यथ यदैनं मुक्तोऽनुप्रविशति मोदते च प्रमोदते च कामांश्चैवानुभवति । कामांश्चैवानुभवति’ इति बृहच्छ्रुतौ प्रतिज्ञानात् ॥ 02 ॥
‘अहरहरेनमनुप्रविशत्युपसङ्क्रमे च न तत्र मोदते न प्रमोदते न कामाननुभवति बद्धो ह्येष तदा भवत्यथ यदैनं मुक्तोऽनुप्रविशति मोदते च प्रमोदते च कामांश्चैवानुभवति’ इति बृहच्छ्रुतौ प्रतिज्ञानात् ॥ 02 ॥
}}
}}


Line 97: Line 78:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = आत्मा प्रकरणात् ॥ 03-544
| verse_line1  = (544)ओम् आत्मा प्रकरणात् ओम् 04-04-03 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
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॥ इति आत्माधिकरणम् (आत्मसम्पद्यधिकरणम्) ॥ 03 ॥
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Line 119: Line 93:
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| text    =
‘परञ्ज्योतिः परं ब्रह्म परमात्मादिका गिरः
‘परञ्ज्योतिः परं ब्रह्म परमात्मादिका गिरः ।सर्वत्र हरिमेवैकं ब्रूयुर्नान्यं कथञ्चन’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 03 ॥
सर्वत्र हरिमेवैकं ब्रूयुर्नान्यं कथञ्चन’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 03 ॥
}}
}}


Line 130: Line 103:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = अविभागेन दृष्टत्वात् ॥ 04-545
| verse_line1  = (545)ओम् अविभागेन दृष्टत्वात् ओम् ॥ 04-04-04
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॥ इति अविभागाधिकरणम् ॥ 04 ॥
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ये भोगाः परमात्मना भुज्यन्ते त एव मुक्तैर्भुज्यन्ते
ये भोगाः परमात्मना भुज्यन्ते त एव मुक्तैः भुज्यन्ते
}}
}}


Line 152: Line 118:
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| text    =
| text    =
‘यानेवाहं श्रुणोमि यान् पश्यामि यान् जिघ्रामि तानेवैत इदं शरीरं विमुच्यानुभवन्ति’ इति दृष्टत्वाच्चतुर्वेदशिखायाम् ।
‘यानेवाहं श्रुणोमि यान् पश्यामि यान् जिघ्रामि तानेवैत इदं शरीरं विमुच्यानुभवन्ति’() इति दृष्टत्वाच्चतुर्वेदशिखायाम् ।
}}
}}


Line 160: Line 126:
| text    =
| text    =
भविष्यत्पुराणे च –
भविष्यत्पुराणे च –
}}
‘मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्भोगान् लेशतः क्वचित् ।बहिष्ठान् भुञ्जते नित्यं नानन्दादीन् कथञ्चन’ इति ॥ 04 ॥
 
{{Bhashyam
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‘मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्भोगान् लेशतः क्वचित्
बहिष्ठान् भुञ्जते नित्यं नानन्दादीन् कथञ्चन’ इति ॥ 04 ॥
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}}


Line 177: Line 136:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॥ 05-546
| verse_line1  = (546)ओं ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ओम् 04-04-05 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 185: Line 144:
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| text    =
सर्वदेहपरित्यागेन मुक्ताः सन्तो ब्राह्मेणैव देहेन भोगान् भुञ्जत इति जैमिनिर्मन्यते ।
सर्वदेहपरित्यागेन मुक्ताः सन्तो ब्राह्मेणैव देहेन भोगान् भुञ्जते इति जैमिनिर्मन्यते ।
}}
}}


Line 192: Line 151:
| id      = BS_C04_S04_V05_B2
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‘स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा श्रुणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति’
‘स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा श्रुणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति’ इति माध्यन्दिनायनश्रुतावुपन्यासात् ।
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{{Bhashyam
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इति माध्यन्दिनायनश्रुतावुपन्यासात् ।
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Line 206: Line 158:
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‘आदत्ते हरिहस्तेन हरिदृष्ट्यैव पश्यति ।गच्छेच्च हरिपादेन मुक्तस्यैषा स्थितिर्भवेत्’ इति स्मृतेः ॥
‘आदत्ते हरिहस्तेन हरिदृष्ट्यैव पश्यति ।गच्छेच्च हरिपादेन(पादाभ्यां) मुक्तस्यैषा स्थितिर्भवेत्’ इति स्मृतेः ॥
}}
}}


Line 213: Line 165:
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| id      = BS_C04_S04_V05_B6
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| text    =
‘गच्छामि विष्णुपादाभ्यां विष्णुदृष्ट्या च दर्शनम् ।’इत्यादि पूर्वस्मरणान्मुक्तस्यैतद्भविष्यति’ इति बृहत्तन्त्रोक्तयुक्तेश्च ॥ 05 ॥
‘गच्छामि विष्णुपादाभ्यां विष्णुदृष्ट्या च दर्शनम् ।इत्यादि पूर्वस्मरणान्मुक्तस्यैतद् भविष्यति’ इति बृहत्तन्त्रोक्तयुक्तेश्च ॥ 05 ॥
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Line 221: Line 173:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = चितिमात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥ 06-547
| verse_line1  = (547)ओं चितिमात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ओम् 04-04-06 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 229: Line 181:
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| text    =
| text    =
चितिमात्रो देहो मुक्तानां पृथग्विद्यते तेन भुञ्जते ।
चितिमात्रो देहो मुक्तानां पृथग् विद्यते तेन भुञ्जते ।
सर्वं वा एतदचित् परित्यज्य चिन्मात्र एवैष भवति चिन्मात्र एवावतिष्ठते तामेतां मुक्तिरित्याचक्षते’
सर्वं वा एतदचित् परित्यज्य चिन्मात्र एवैष भवति चिन्मात्र एवावतिष्ठते तामेतां मुक्तिरित्याचक्षते’ इत्युद्दालकश्रुतेश्चिदात्मकत्वादित्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 06 ॥
इत्युद्दालकश्रुतेश्चिदात्मकत्वादित्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 06 ॥
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Line 239: Line 190:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॐ ॥07-548॥
| verse_line1  = (548)ओम् एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ओम् ॥04-04-07॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 245: Line 196:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
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इति चितिमात्राधिकरणम् (ब्रह्माधिकरणम्) ॥ 05 ॥
‘स वा एष एतस्मान्मर्त्याद् विमुक्तश्चिन्मात्रीभवत्यथ तेनैव रूपेणाभिपश्यत्यभिश्रुणोत्यभिमनुतेऽभिविजानाति तामाहुर्मुक्तिः’ इति सौपर्णश्रुतौ ।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S04_V07
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| text    =
‘स वा एष एतस्मान्मर्त्याद्विमुक्तश्चिन्मात्रीभवत्यथ तेनैव रूपेणाभिपश्यत्यभिश्रुणोत्यभिमनुतेऽभिविजानाति तामाहुर्मुक्तिः’ इति सौपर्णश्रुतौ चिन्मात्रेणाप्युपन्यासाज्जैमिन्युक्तस्य च भावादुभयत्राप्यविरोधं बादरायणो मन्यते ।
चिन्मात्रेणाप्युपन्यासाज्जैमिन्युक्तस्य च भावादुभयत्राप्यविरोधं बादरायणो मन्यते ।
नारायणाध्यात्मे च-
}}
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Line 262: Line 212:
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| id      = BS_C04_S04_V07_B3
| text    =
| text    =
‘मर्त्यं देहं परित्यज्य चितिमात्रात्मदेहिनः
‘मर्त्यं देहं परित्यज्य चितिमात्रात्मदेहिनः ।चितिमात्रेन्द्रियाश्चैव प्रविष्टा विष्णुमव्ययम् ॥तदङ्गानुगृहीतैश्च स्वाङ्गैरेव प्रवर्तनम् ।कुर्वन्ति भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा ॥यथेष्टं परिवर्तन्ते तस्यैवानुग्रहेरिताः’ इति ॥ 07 ॥
चितिमात्रेन्द्रियाश्चैव प्रविष्टा विष्णुमव्ययम्
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S04_V07
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| text    =
तदङ्गानुगृहीतैश्च स्वाङ्गैरेव प्रवर्तनम्
कुर्वन्ति भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा
यथेष्टं परिवर्तन्ते तस्यैवानुग्रहेरिताः’ इति ॥ 07 ॥
}}
}}


Line 282: Line 222:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सङ्कल्पादेव च तच्च्रुतेः ॐ ॥ 08-549
| verse_line1  = (549)ओं सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः ओम् 04-04-08 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S04_V08
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| text    =
॥ इति सङ्कल्पाधिकरणम् ॥ 06 ॥
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Line 297: Line 230:
| id      = BS_C04_S04_V08_B1
| id      = BS_C04_S04_V08_B1
| text    =
| text    =
न तेषां भोगादिषु प्रयत्नापेक्षा ।
न तेषां भोगादिषु प्रयत्नापेक्षा । ‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छांउ.८.२.१) इत्यादिश्रुतेः ॥ 08 ॥
‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’ इत्यादिश्रुतेः ॥ 08 ॥
}}
}}


=== अनन्याधिपतित्वाधिकरणम् ===
=== अनन्याधिपत्यधिकरणम् ===


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Line 308: Line 240:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अत एव चानन्याधिपतिः ॥ 09-550 ॥
| verse_line1  = (550)ओम् अत एव चानन्याधिपतिः ओम् ॥ 09-550 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S04_V09
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॥ इति अनन्याधिपतित्वाधिकरणम् ॥ 07 ॥
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Line 330: Line 255:
| id      = BS_C04_S04_V09_B2
| id      = BS_C04_S04_V09_B2
| text    =
| text    =
‘परमोऽधिपतिस्तेषां विष्णुरेव न संशयः ।
‘परमोऽधिपतिस्तेषां विष्णुरेव न संशयः ।ब्रह्मादिमानुषान्तानां सर्वेषामविशेषतः ॥ततः प्राणादिनामान्ताः सर्वेऽपि पतयः क्रमात् ।आचार्याश्चैव सर्वेऽपि यैर्ज्ञानं सुप्रतिष्ठितम् एतेभ्योऽन्यः पतिर्नैव मुक्तानां नात्र संशयः’ इति वाराहे ॥ 09
ब्रह्मादिमानुषान्तानां सर्वेषामविशेषतः
}}
}}


{{Bhashyam
=== अभावाधिकरणम् (उभयविधभोगाधिकरणम्) ===
| verse_id = BS_C04_S04_V09
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| text    =
ततः प्राणादिनामान्ताः सर्वेऽपि पतयः क्रमात् ।आचार्याश्चैव सर्वेऽपि यैर्ज्ञानं सुप्रतिष्ठितम् । एतेभ्योऽन्यः पतिर्नैव मुक्तानां नात्र संशयः’ इति वाराहे ॥ 09 ॥
}}
 
=== उभयविधभोगाधिकरणम् ===


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Line 348: Line 265:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
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| verse_line1  = अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ 10-551
| verse_line1  = (551)ओम् अभावं बादरिराह ह्येवम् ओम् 04-04-10 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 363: Line 280:
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| text    =
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अशरीरो वाव तदा भवत्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतो याभ्यां ह्येष उन्मथ्यत’ इत्येवं कौण्ठरव्यश्रुतावाह हि ॥ 10 ॥
अशरीरो वाव तदा भवत्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतो याभ्यां ह्येष उन्मथ्यते’ इत्येवं कौण्ठरव्यश्रुतावाह हि ॥ 10 ॥
}}
}}


Line 371: Line 288:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = भावं जैमिनिर्विकल्पाम्नानात् ॥ 11-552
| verse_line1  = (552)ओं भावं जैमिनिर्विकल्पाम्नानात् ओम् 04-04-11 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 379: Line 296:
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| id      = BS_C04_S04_V11_B1
| text    =
| text    =
‘स वा एष एवंवित् परमभिपश्यत्यभिशृणोति ज्योतिषैव रूपेण चिता वाऽचिता वा नित्येन वाऽनित्येन वाऽथानन्दी ह्येवैष भवति नानानन्दं कञ्चिदुपस्पृषति’
‘स वा एष एवंवित् परमभिपश्यत्यभिशृणोति ज्योतिषैव रूपेण चिता वाऽचिता वा नित्येन वाऽनित्येन वाऽथानन्दी ह्येवैष भवति नानानन्दं कञ्चिदुपस्पृशति’ इत्यौद्दालकश्रुतौ विकल्पाम्नानाद् अन्यदेहस्यापि भावं जैमिनिर्मन्यते ॥ 11 ॥
इत्यौद्दालकश्रुतौ विकल्पाम्नानादन्यदेहस्यापि भावं जैमिनिर्मन्यते ॥ 11 ॥
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}}


Line 388: Line 304:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ 12-553
| verse_line1  = (553)ओं द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ओम् 04-04-12 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 396: Line 312:
| id      = BS_C04_S04_V12_B1
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| text    =
| text    =
यथा द्वादशाहः क्रत्वात्मकः सत्रात्मकश्च भवति एवं मुक्तभोगो बाह्यशरीरकृतश्चिन्मात्रकृतश्च भवति इति बादरायणो मन्यते ॥ 12 ॥
यथा द्वादशाहः क्रत्वात्मकः सत्रात्मकश्च भवति, एवं मुक्तभोगो बाह्यशरीरकृतश्चिन्मात्रकृतश्च भवतीति बादरायणो मन्यते ॥ 12 ॥
}}
}}


Line 404: Line 320:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ॥ 13-554
| verse_line1  = (554)ओं तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ओम् 04-04-13 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 419: Line 335:
| id      = BS_C04_S04_V13_B1
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| text    =
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सन्ध्यं स्वप्नः ।‘सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम्’ इति श्रुतेः ॥ 13 ॥
सन्ध्यं स्वप्नः ।‘सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम्’(बृ.उ.६.३.९) इति श्रुतेः ॥ 13 ॥
}}
}}


Line 427: Line 343:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = भावे जाग्रद्वत् ॥ 14-555
| verse_line1  = (555)ओं भावे जाग्रद्वत् ओम् 04-04-14 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 436: Line 352:
| text    =
| text    =
ब्रह्मवैवर्ते च –
ब्रह्मवैवर्ते च –
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‘स्वप्नस्थानं यथा भोगो विना देहेन युज्यते ।एवं मुक्तावपि भवेद् विना देहेन भोजनम् ॥स्वेच्छया वा शरीराणि तेजोरूपाणि कानिचित् ।स्वीकृत्य जागरितवद् भुक्त्वा त्यागः कदाचन’ इति ॥ 14 ॥
 
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‘स्वप्नस्थानं यथा भोगो विना देहेन युज्यते
एवं मुक्तावपि भवेद्विना देहेन भोजनम्
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स्वेच्छया वा शरीराणि तेजोरूपाणि कानिचित्
स्वीकृत्य जागरितवद्भुक्त्वा त्यागः कदाचन’ इति ॥ 14 ॥
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}}


Line 459: Line 360:
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| verse_line1  = प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ॥ 15-556
| verse_line1  = (556)ओं प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ओम् 04-04-15 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 467: Line 368:
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शरीरमनुप्रविश्यापि तत्प्रकाशयन्तः पुण्यानेव भोगाननुभवन्ति न तु दुःखादीन् । यथा प्रदीपो दीपिकादिषु प्रविष्टस्तत्स्थं तैलाद्येव भुङ्ते न तु तत्कार्ष्ण्यादि
शरीरमनुप्रविश्यापि तत् प्रकाशयन्तः पुण्यानेव भोगाननुभवन्ति न तु दुःखादीन् । यथा प्रदीपो दीपिकादिषु प्रविष्टः, तत् स्थं तैलाद्येव भुङ्ते, न तु तत् कार्ष्ण्यादि
‘तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति’ इति हि दर्शयति ॥ 15 ॥
‘तीर्णो हि तदा सर्वान् शोकान् हृदयस्य भवति’(बृ.उ.६.३.२२) इति हि दर्शयति ॥ 15 ॥
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}}


Line 475: Line 376:
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| text    =
| text    =
न च स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति इत्यादिना स्वर्गादिस्थस्यैतदिति वाच्यम् । यतः –
न च ‘स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति’(क.उ.१.१२) इत्यादिना स्वर्गादिस्थस्यैतदिति वाच्यम् । यतः –
}}
}}


Line 483: Line 384:
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| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ स्वाप्यायसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ॥ 16-557
| verse_line1  = (557)ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ओम् 04-04-16 ॥
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| text    =
॥ इति उभयविधभोगाधिकरणम्(अभावाधिकरणम्) ॥ 08 ॥
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}}


Line 498: Line 392:
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| text    =
| text    =
सुप्तौ मोक्षे वा तदुच्यते । ‘अत्र पिताऽपिता भवत्यनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन’ इत्याद्याविष्कृतत्वात् ॥
सुप्तौ मोक्षे वा तदुच्यते ।‘अत्र पिताऽपिता भवति’, ‘अनन्वागतं पुण्येनान्वागतं पापेन’(बृ.उ.६.३.२२) इत्याद्याविष्कृतत्वात् ॥
}}
}}


Line 506: Line 400:
| text    =
| text    =
ब्रह्मवैवर्ते च-
ब्रह्मवैवर्ते च-
}}
‘ज्योतिर्मयेषु देहेषु स्वेच्छया विश्वमोक्षिणः ।भुञ्जते सुसुखान्येव न दुःखादीन् कदाचन ॥तीर्णा हि सर्वशोकांस्ते पुण्यपापादिवर्जिताः(निवृत्तसर्वदोषास्ते पुण्यपापादिवर्जिताः) ।सर्वदोषनिवृत्तास्ते गुणमात्रस्वरूपिणः’ इति ॥ 16 ॥
 
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‘ज्योतिर्मयेषु देहेषु स्वेच्छया विश्वमोक्षिणः
भुञ्जते सुसुखान्येव न दुःखादीन् कदाचन
}}
 
{{Bhashyam
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तीर्णा हि सर्वशोकांस्ते पुण्यपापादिवर्जिताः
सर्वदोषनिवृत्तास्ते गुणमात्रस्वरूपिणः’ इति ॥ 16 ॥
}}
}}


Line 531: Line 410:
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| chapter_id    = BS_C04
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| verse_line1  = जगद्व्यापारवर्जम् ॥ 17-558
| verse_line1  = (558)ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम् 04-04-17 ॥
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Line 539: Line 418:
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‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतःसमभवत्’ इत्युच्यते । तत्र सृष्ट्यादिभ्योऽन्यान् व्यापारानाप्नोति ॥ 17 ॥
‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतःसमभवत्’(ऐ.आ.२.५.४) इत्युच्यते । तत्र सृष्ट्यादिभ्योऽन्यानाप्नोति ॥ 17 ॥
}}
}}


Line 547: Line 426:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ॥ 18-559
| verse_line1  = (559)ओं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ओम् 04-04-18 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 562: Line 441:
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| text    =
| text    =
जीवप्रकरणत्वाज्जीवानां तादृक्सामर्थ्यविदूरत्वाच्च । वाराहे च-
जीवप्रकरणत्वाज्जीवानां तादृक्सामर्थ्यविदूरत्वाच्च ।
}}
}}


Line 569: Line 448:
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| text    =
| text    =
‘स्वाधिकानन्दसम्प्राप्तौ सृष्ट्यादिव्यापृतिष्वपि
वाराहे च-
मुक्तानां नैव कामः स्यादन्यान् कामांस्तु भुञ्जते
‘स्वाधिकानन्दसम्प्राप्तौ सृष्ट्यादिव्यापृतिष्वपि ।मुक्तानां नैव कामः स्यादन्यान् कामांस्तु भुञ्जते ॥तद्योग्यता नैव तेषां कदाचित् क्वापि विद्यते ।न चायोग्यं विमुक्तोऽपि प्राप्नुयान्न च कामयेत्’ इति ॥ 18 ॥
}}
 
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तद्योग्यता नैव तेषां कदाचित् क्वापि विद्यते
चायोग्यं विमुक्तोऽपि प्राप्नुयान्नच कामयेत्’ इति ॥ 18 ॥
}}
}}


Line 586: Line 457:
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| chapter_id    = BS_C04
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॐ ॥ 19-560
| verse_line1  = (560)ओं प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाऽधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ओम् 04-04-19 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 594: Line 465:
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| text    =
‘ता यो वेद, स वेद ब्रह्म, सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति’ इति प्रत्यक्षोपदेशाज्जगदैश्वर्यमप्यस्तीति चेन्न ।
‘ता यो वेद स वेद ब्रह्म सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति’(तै.उ.१.५) इति प्रत्यक्षोपदेशाज्जगदैश्वर्यमप्यस्तीति चेत्,
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S04_V19
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| text    =
आधिकारिकमण्डलाधिपतिर्ब्रह्मा हि तत्रोच्यते ।
न । आधिकारिकमण्डलाधिपतिर्ब्रह्मा हि तत्रोच्यते ।
}}
}}


{{Bhashyam
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| text    =
गारुडे च-
गारुडे च-
}}
‘आत्मेत्येव परं देवमुपास्य हरिमव्ययम् ।केचिदत्रैव मुच्यन्ते नोत् क्रामन्ति कदाचन ॥अत्रैव च स्थितिस्तेषामन्तरिक्षे तु केचन ।केचित् स्वर्गे महर्लोके जने तपसि चापरे ॥केचित् सत्ये महाज्ञाना गच्छन्ति क्षीरसागरम् ।तत्रापि क्रमयोगेन ज्ञानाधिक्यात् समीपगाः ॥सालोक्यं च सरूपत्वं सामीप्यं योग एव च ।इमामारभ्य सर्वत्र यावत् सुक्षीरसागरे ॥पुरुषोऽनन्तशयनः श्रीमन्नारायणाभिधः ।मानुषा वर्णभेदेन तथैवाऽश्रमभेदतः ॥क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः ।आजानजाः कर्मजाश्च तात्त्विकाश्च शचीपतिः ॥रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशस्तेषु चैवोत्तमोत्तमाः ।नित्यानन्दे च भोगे च ज्ञानैश्वर्यगुणेषु च ॥सर्वे शतगुणोद्रिक्ताः पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् ।पूज्यन्ते चावरैस्ते तु सर्वपूज्यश्चतुर्मुखः ॥स्वजगद्व्यापृतिस्तेषां पूर्ववत् समुदीरिता ।सयुजः परमात्मानं प्रविश्य च बहिर्गताःचिद्रूपान् प्राकृतांश्चापि विना भोगांस्तु कांश्चन ।भुञ्जते मुक्तिरेवं ते विस्पष्टं समुदाहृता’ इति ॥ 19 ॥
 
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‘आत्मेत्येव परं देवमुपास्य हरिमव्ययम्
केचिदत्रैव मुच्यन्ते नोत्क्रामन्ति कदाचन
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अत्रैव च स्थितिस्तेषामन्तरिक्षे तु केचन
केचित् स्वर्गे महर्लोके जने तपसि चापरे
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केचित् सत्ये महाज्ञान गच्छन्ति क्षीरसागरम्
तत्रापि क्रमयोगेन ज्ञानाधिक्यात् समीपगाः
}}
 
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सालोक्यं च सरूपत्वं सामीप्यं योग एव च
इमामारभ्य सर्वत्र यावत्सुक्षीरसागरे ॥
}}
 
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पुरुषोऽनन्तशयनः श्रीमन्नारायणाभिधः
मानुषा वर्णभेदेन तथैवाश्रमभेदतः ॥
}}
 
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| text    =
क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः
आजानजाः कर्मजाश्च तात्त्विकाश्च प्रजापतिः ॥
}}
 
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| text    =
रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशस्तेषु चैवोत्तरोत्तराः ।
नित्यानन्दे च भोगे च ज्ञानैश्वर्यगुणेषु च
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
सर्वे शतगुणोद्रिक्ताः पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम्
पूज्यन्ते चावरैस्ते तु सर्वपूज्यश्चतुर्मुखः
}}
 
{{Bhashyam
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स्वजगद्व्यापृतिस्तेषां पूर्ववत् समुदीरिता
सयुजः परमात्मानं प्रविश्य च बहिर्गताः
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
चिद्रूपान् प्राकृतांश्चापि विना भोगांस्तु कांश्चन
भुञ्जते मुक्तिरेवं ते विस्पष्टं समुदाहृताः’ इति ॥ 19 ॥
}}
}}


Line 696: Line 488:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
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| verse_line1  = विकारावर्ति च तथाहि दर्शयति ॥ 20-561
| verse_line1  = (561)ओं विकारावर्ति च तथाहि दर्शयति ओम् 04-04-20 ॥
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| text    =
॥ इति सर्वकामाधिकरणम् (जगद्व्यापाराधिकरणम्) ॥ 09 ॥
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}}


Line 711: Line 496:
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| text    =
विकारावर्तिव्यापारो मुक्तानां न विद्यते । ‘इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते’ इति हि श्रुतिः ।
विकारावर्तिव्यापारो मुक्तानां न विद्यते । ‘इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते’(छांउ.४.१५.६) इति हि श्रुतिः ।
}}
}}


Line 719: Line 504:
| text    =
| text    =
वाराहे च –
वाराहे च –
}}
स्वाधिकारेण वर्तन्ते देवा मुक्तावपि स्फुटम् ।बलिं हरन्ति मुक्ताय विरिञ्चाय तु पूर्ववत् ॥सब्रह्मकास्तु ते देवा विष्णवे च विशेषतः ।न विकाराधिकारस्तु मुक्तानामन्य एव तु ।विकाराधिकृता ज्ञेया ये नियुक्तास्तु विष्णुना’ इति ॥ 20 ॥
 
{{Bhashyam
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स्वाधिकारेण वर्तन्ते देवा मुक्तावपि स्फुटम्
बलिं हरन्ति मुक्ताय विरिञ्चाय तु पूर्ववत्
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{{Bhashyam
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सब्रह्मकास्तु ते देवा विष्णवे च विशेषतः
विकाराधिकारस्तु मुक्तानामन्य एव तु
विकाराधिकृता ज्ञेया ये नियुक्तास्तु विष्णुना’ इति ॥ 20 ॥
}}
}}


Line 745: Line 514:
| chapter_id    = BS_C04
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| verse_line1  = स्थितिमाह दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ 21-562
| verse_line1  = (562)ओं स्थितिमाह दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ओम् 04-04-21 ॥
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}}
Line 753: Line 522:
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| text    =
‘एतत् साम गायन्नास्ते’ इत्युच्यते ।तत्रानन्दादीनां वृद्धिर्ह्रासश्च न विद्यते। एकप्रकारेणैव सर्वदा स्थितिः ।
‘एतत् साम गायन्नास्ते’(तै.उ.३.१०) इत्युच्यते । तत्राऽनन्दादीनां वृद्धिर्ह्रासश्च न विद्यते। एकप्रकारेणैव सर्वदा स्थितिः ।
}}
}}


Line 760: Line 529:
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‘स एष एतस्मिन् ब्रह्मणि सम्पन्नो न जायते न म्रियते न हीयते न वर्धते स्थित एव सर्वदा भवति दर्शन्नेव ब्रह्म दर्शन्नेवात्मानं तस्यैवं दर्शयतो नापत्तिर्न विपत्तिः’ इत्याह जाबालश्रुतौ ।
‘स एष एतस्मिन्(तै.उ.३.१०) ब्रह्मणि सम्पन्नो न जायते न म्रियते न हीयते न वर्धते स्थित एव सर्वदा भवति दर्शन्नेव ब्रह्म दर्शन्नेवाऽत्मानं तस्यैवं दर्शयतो नाऽपत्तिर्न विपत्तिः’() इत्याह जाबालश्रुतौ ।
}}
}}


Line 772: Line 541:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S04_V21
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| text    =
विद्वत्प्रत्यक्षात् कारणभावल्लिङ्गाच्च । ब्रह्मवैवर्ते च –
विद्वत् प्रत्यक्षात् कारणभावल्लिङ्गाच्च ।
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{{Bhashyam
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| verse_id = BS_C04_S04_V21
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‘न ह्रासो न च वृद्धिर्वा मुक्तानां विद्यते क्वचित्
ब्रह्मवैवर्ते च –
विद्वत्प्रत्यक्षसिद्धत्वात् कारणाभावतोऽनुमा
‘न ह्रासो न च वृद्धिर्वा मुक्तानां विद्यते क्वचित् ।विद्वत्प्रत्यक्षसिद्धत्वात् कारणाभावतोऽनुमा ॥हरेरुपासना चात्र सदैव सुखरूपिणी ।न तु साधनभूता सा सिद्धिरेवात्र सा यतः’ इति ॥ 21 ॥
}}
 
{{Bhashyam
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हरेरुपासना चात्र सदैव सुखरूपिणी
तु साधनभूता सा सिद्धिरेवात्र सा यतः’ इति ॥ 21 ॥
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}}


Line 798: Line 559:
| chapter_id    = BS_C04
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| text    =
॥ इति स्थित्य(एकरूपा)धिकरणम् ॥ 10 ॥
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}}


Line 813: Line 567:
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न च भोगविशेषादिविरोधः ।‘एतमानन्दमयमात्मानमनुविश्य न जायते न म्रियते न ह्रसते न वर्धते यथाकामं चरति यथाकामं पिबति यथाकामं रमते यथाकाममुपरमते’
न च भोगविशेषादिविरोधः ।‘एतमानन्दमयमात्मानमनुविश्य न जायते न म्रियते न ह्रसते न वर्धते यथाकामं चरति यथाकामं पिबति यथाकामं रमते यथाकाममुपरमते’(तै.उ.२.८)
इति भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् ।
इति भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् ।
}}
}}
Line 828: Line 582:
| id      = BS_C04_S04_V22_B6
| id      = BS_C04_S04_V22_B6
| text    =
| text    =
‘प्रवाहतस्तुवृद्धिर्वा ह्रासो वा नैव कुत्रचित्
‘प्रवाहतस्तु वृद्धिर्वा ह्रासो वा नैव कुत्रचित् ।नाप्रियं किञ्चिदपि तु मुक्तानां विद्यते क्वचित् ॥ कुत एव तु दुःखं स्यात् सुखमेव सदोदितम् । भोगानां तु विशेषे तु वैचित्र्यं लभ्यते क्वचित्’|इति नारायणतन्त्रे ॥ 22 ॥
नाप्रियं किञ्चिदपि तु मुक्तानां विद्यते क्वचित् ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S04_V22
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कुत एव तु दुःखं स्यात् सुखमेव सदोदितम् । भोगानां तु विशेषे तु वैचित्र्यं लभ्यते क्वचित्’|इति नारायणतन्त्रे ॥ 22 ॥
}}
}}


Line 846: Line 592:
| chapter_id    = BS_C04
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इति अनावृत्यधिकरणम् ॥ 11
‘नच पुनरावर्तते नच पुनरावर्तते’(छां.उ.८.१५.१),‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’(ऐ.आ.२.५.१-१५) इत्यादिश्रुतिभ्यः 23
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॥ इति श्रीमदानन्ददीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ 04-04
ज्ञानानन्दादिभिः सर्वैर्गुणैः पूर्णाय विष्णवे ।नमोऽस्तु गुरवे नित्यं सर्वथाऽतिप्रियाय मे
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्यं समाप्तम्
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलंबट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुःमध्वो यत् तु तृतीयमेतदमुना भाष्यं कृतं केशवे (तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि)
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Revision as of 09:39, 10 April 2026

भोगमाहास्मिन् पादे-

सम्पद्याधिकरणम्

(542)ओं सम्पद्याविहाय स्वेन शब्दात् ओम् ॥ 04-04-01 ॥


‘स य एवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन्नात्मनमभिसम्पद्यैतेनात्मना यथाकामं सर्वान् कामाननुभवति’ इति सौपर्णश्रुतिः ।
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’(छांउ.८.३.४) इति च ।
‘एतं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति’(छां.उ.८.४.२) इति च । तत्र तरणं नाम तत् प्राप्तयेऽन्यतरणमेव ।
‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वैतं सेतुमाप्य एतेनैव सेतुना मोदते प्रमोदत आनन्दी भवति’() इति मौद्गल्यश्रुतेः ॥ 01 ॥

मुक्ताधिकरणम्

(543)ओं मुक्तः प्रतिज्ञानात् ओम् ॥ 04-04-02 ॥


मुक्त एव चात्रोच्यते ।
‘अहरहरेनमनुप्रविशत्युपसङ्क्रमे च न तत्र मोदते न प्रमोदते न कामाननुभवति बद्धो ह्येष तदा भवत्यथ यदैनं मुक्तोऽनुप्रविशति मोदते च प्रमोदते च कामांश्चैवानुभवति’ इति बृहच्छ्रुतौ प्रतिज्ञानात् ॥ 02 ॥

आत्माधिकरणम्

(544)ओम् आत्मा प्रकरणात् ओम् ॥ 04-04-03 ॥


परञ्ज्योतिशब्देन परमात्मैवोच्यते । तत्प्रकरणत्वात् ।
‘परञ्ज्योतिः परं ब्रह्म परमात्मादिका गिरः ।सर्वत्र हरिमेवैकं ब्रूयुर्नान्यं कथञ्चन’ ॥ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 03 ॥

अविभागाधिकरणम्

(545)ओम् अविभागेन दृष्टत्वात् ओम् ॥ 04-04-04 ॥


ये भोगाः परमात्मना भुज्यन्ते त एव मुक्तैः भुज्यन्ते ।
‘यानेवाहं श्रुणोमि यान् पश्यामि यान् जिघ्रामि तानेवैत इदं शरीरं विमुच्यानुभवन्ति’() इति दृष्टत्वाच्चतुर्वेदशिखायाम् ।
भविष्यत्पुराणे च – ‘मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्भोगान् लेशतः क्वचित् ।बहिष्ठान् भुञ्जते नित्यं नानन्दादीन् कथञ्चन’ इति ॥ 04 ॥

चितिमात्राधिकरणम् (ब्रह्माधिकरणम्)

(546)ओं ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ओम् ॥ 04-04-05 ॥


सर्वदेहपरित्यागेन मुक्ताः सन्तो ब्राह्मेणैव देहेन भोगान् भुञ्जते इति जैमिनिर्मन्यते ।
‘स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा श्रुणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति’ इति माध्यन्दिनायनश्रुतावुपन्यासात् ।
‘आदत्ते हरिहस्तेन हरिदृष्ट्यैव पश्यति ।गच्छेच्च हरिपादेन(पादाभ्यां) मुक्तस्यैषा स्थितिर्भवेत्’ इति स्मृतेः ॥
‘गच्छामि विष्णुपादाभ्यां विष्णुदृष्ट्या च दर्शनम् ।इत्यादि पूर्वस्मरणान्मुक्तस्यैतद् भविष्यति’ इति बृहत्तन्त्रोक्तयुक्तेश्च ॥ 05 ॥
(547)ओं चितिमात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ओम् ॥ 04-04-06 ॥


चितिमात्रो देहो मुक्तानां पृथग् विद्यते तेन भुञ्जते । सर्वं वा एतदचित् परित्यज्य चिन्मात्र एवैष भवति चिन्मात्र एवावतिष्ठते तामेतां मुक्तिरित्याचक्षते’ इत्युद्दालकश्रुतेश्चिदात्मकत्वादित्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 06 ॥
(548)ओम् एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ओम् ॥04-04-07॥


‘स वा एष एतस्मान्मर्त्याद् विमुक्तश्चिन्मात्रीभवत्यथ तेनैव रूपेणाभिपश्यत्यभिश्रुणोत्यभिमनुतेऽभिविजानाति तामाहुर्मुक्तिः’ इति सौपर्णश्रुतौ ।
चिन्मात्रेणाप्युपन्यासाज्जैमिन्युक्तस्य च भावादुभयत्राप्यविरोधं बादरायणो मन्यते ।
‘मर्त्यं देहं परित्यज्य चितिमात्रात्मदेहिनः ।चितिमात्रेन्द्रियाश्चैव प्रविष्टा विष्णुमव्ययम् ॥तदङ्गानुगृहीतैश्च स्वाङ्गैरेव प्रवर्तनम् ।कुर्वन्ति भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा ॥यथेष्टं परिवर्तन्ते तस्यैवानुग्रहेरिताः’ इति ॥ 07 ॥

सङ्कल्पाधिकरणम्

(549)ओं सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः ओम् ॥ 04-04-08 ॥


न तेषां भोगादिषु प्रयत्नापेक्षा । ‘स यदि पितृलोककामो भवति । सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छांउ.८.२.१) इत्यादिश्रुतेः ॥ 08 ॥

अनन्याधिपत्यधिकरणम्

(550)ओम् अत एव चानन्याधिपतिः ओम् ॥ 09-550 ॥


सत्यसङ्कल्पत्वादेव ।
‘परमोऽधिपतिस्तेषां विष्णुरेव न संशयः ।ब्रह्मादिमानुषान्तानां सर्वेषामविशेषतः ॥ततः प्राणादिनामान्ताः सर्वेऽपि पतयः क्रमात् ।आचार्याश्चैव सर्वेऽपि यैर्ज्ञानं सुप्रतिष्ठितम् । एतेभ्योऽन्यः पतिर्नैव मुक्तानां नात्र संशयः’ इति वाराहे ॥ 09 ॥

अभावाधिकरणम् (उभयविधभोगाधिकरणम्)

(551)ओम् अभावं बादरिराह ह्येवम् ओम् ॥ 04-04-10 ॥


चिन्मात्रं विनाऽन्यो देहस्तेषां न विद्यत इति बादरिः ।
अशरीरो वाव तदा भवत्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतो याभ्यां ह्येष उन्मथ्यते’ इत्येवं कौण्ठरव्यश्रुतावाह हि ॥ 10 ॥
(552)ओं भावं जैमिनिर्विकल्पाम्नानात् ओम् ॥ 04-04-11 ॥


‘स वा एष एवंवित् परमभिपश्यत्यभिशृणोति ज्योतिषैव रूपेण चिता वाऽचिता वा नित्येन वाऽनित्येन वाऽथानन्दी ह्येवैष भवति नानानन्दं कञ्चिदुपस्पृशति’ इत्यौद्दालकश्रुतौ विकल्पाम्नानाद् अन्यदेहस्यापि भावं जैमिनिर्मन्यते ॥ 11 ॥
(553)ओं द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ओम् ॥ 04-04-12 ॥


यथा द्वादशाहः क्रत्वात्मकः सत्रात्मकश्च भवति, एवं मुक्तभोगो बाह्यशरीरकृतश्चिन्मात्रकृतश्च भवतीति बादरायणो मन्यते ॥ 12 ॥
(554)ओं तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ओम् ॥ 04-04-13 ॥


उपपत्तिश्च-
सन्ध्यं स्वप्नः ।‘सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम्’(बृ.उ.६.३.९) इति श्रुतेः ॥ 13 ॥
(555)ओं भावे जाग्रद्वत् ओम् ॥ 04-04-14 ॥


ब्रह्मवैवर्ते च – ‘स्वप्नस्थानं यथा भोगो विना देहेन युज्यते ।एवं मुक्तावपि भवेद् विना देहेन भोजनम् ॥स्वेच्छया वा शरीराणि तेजोरूपाणि कानिचित् ।स्वीकृत्य जागरितवद् भुक्त्वा त्यागः कदाचन’ इति ॥ 14 ॥
(556)ओं प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ओम् ॥ 04-04-15 ॥


शरीरमनुप्रविश्यापि तत् प्रकाशयन्तः पुण्यानेव भोगाननुभवन्ति । न तु दुःखादीन् । यथा प्रदीपो दीपिकादिषु प्रविष्टः, तत् स्थं तैलाद्येव भुङ्ते, न तु तत् कार्ष्ण्यादि । ‘तीर्णो हि तदा सर्वान् शोकान् हृदयस्य भवति’(बृ.उ.६.३.२२) इति हि दर्शयति ॥ 15 ॥
न च ‘स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति’(क.उ.१.१२) इत्यादिना स्वर्गादिस्थस्यैतदिति वाच्यम् । यतः –
(557)ओं स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ओम् ॥ 04-04-16 ॥


सुप्तौ मोक्षे वा तदुच्यते ।‘अत्र पिताऽपिता भवति’, ‘अनन्वागतं पुण्येनान्वागतं पापेन’(बृ.उ.६.३.२२) इत्याद्याविष्कृतत्वात् ॥
ब्रह्मवैवर्ते च- ‘ज्योतिर्मयेषु देहेषु स्वेच्छया विश्वमोक्षिणः ।भुञ्जते सुसुखान्येव न दुःखादीन् कदाचन ॥तीर्णा हि सर्वशोकांस्ते पुण्यपापादिवर्जिताः(निवृत्तसर्वदोषास्ते पुण्यपापादिवर्जिताः) ।सर्वदोषनिवृत्तास्ते गुणमात्रस्वरूपिणः’ इति ॥ 16 ॥

सर्वकामाधिकरणम् (जगद्व्यापाराधिकरणम्)

(558)ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम् ॥ 04-04-17 ॥


‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतःसमभवत्’(ऐ.आ.२.५.४) इत्युच्यते । तत्र सृष्ट्यादिभ्योऽन्यानाप्नोति ॥ 17 ॥
(559)ओं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ओम् ॥ 04-04-18 ॥


कुतः ? –
जीवप्रकरणत्वाज्जीवानां तादृक्सामर्थ्यविदूरत्वाच्च ।
वाराहे च- ‘स्वाधिकानन्दसम्प्राप्तौ सृष्ट्यादिव्यापृतिष्वपि ।मुक्तानां नैव कामः स्यादन्यान् कामांस्तु भुञ्जते ॥तद्योग्यता नैव तेषां कदाचित् क्वापि विद्यते ।न चायोग्यं विमुक्तोऽपि प्राप्नुयान्न च कामयेत्’ इति ॥ 18 ॥
(560)ओं प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाऽधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ओम् ॥ 04-04-19 ॥


‘ता यो वेद । स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति’(तै.उ.१.५) इति प्रत्यक्षोपदेशाज्जगदैश्वर्यमप्यस्तीति चेत्,
न । आधिकारिकमण्डलाधिपतिर्ब्रह्मा हि तत्रोच्यते ।
गारुडे च- ‘आत्मेत्येव परं देवमुपास्य हरिमव्ययम् ।केचिदत्रैव मुच्यन्ते नोत् क्रामन्ति कदाचन ॥अत्रैव च स्थितिस्तेषामन्तरिक्षे तु केचन ।केचित् स्वर्गे महर्लोके जने तपसि चापरे ॥केचित् सत्ये महाज्ञाना गच्छन्ति क्षीरसागरम् ।तत्रापि क्रमयोगेन ज्ञानाधिक्यात् समीपगाः ॥सालोक्यं च सरूपत्वं सामीप्यं योग एव च ।इमामारभ्य सर्वत्र यावत् सुक्षीरसागरे ॥पुरुषोऽनन्तशयनः श्रीमन्नारायणाभिधः ।मानुषा वर्णभेदेन तथैवाऽश्रमभेदतः ॥क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः ।आजानजाः कर्मजाश्च तात्त्विकाश्च शचीपतिः ॥रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशस्तेषु चैवोत्तमोत्तमाः ।नित्यानन्दे च भोगे च ज्ञानैश्वर्यगुणेषु च ॥सर्वे शतगुणोद्रिक्ताः पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् ।पूज्यन्ते चावरैस्ते तु सर्वपूज्यश्चतुर्मुखः ॥स्वजगद्व्यापृतिस्तेषां पूर्ववत् समुदीरिता ।सयुजः परमात्मानं प्रविश्य च बहिर्गताःचिद्रूपान् प्राकृतांश्चापि विना भोगांस्तु कांश्चन ।भुञ्जते मुक्तिरेवं ते विस्पष्टं समुदाहृता’ इति ॥ 19 ॥
(561)ओं विकारावर्ति च तथाहि दर्शयति ओम् ॥ 04-04-20 ॥


विकारावर्तिव्यापारो मुक्तानां न विद्यते । ‘इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते’(छांउ.४.१५.६) इति हि श्रुतिः ।
वाराहे च – स्वाधिकारेण वर्तन्ते देवा मुक्तावपि स्फुटम् ।बलिं हरन्ति मुक्ताय विरिञ्चाय तु पूर्ववत् ॥सब्रह्मकास्तु ते देवा विष्णवे च विशेषतः ।न विकाराधिकारस्तु मुक्तानामन्य एव तु ।विकाराधिकृता ज्ञेया ये नियुक्तास्तु विष्णुना’ इति ॥ 20 ॥

स्थित्य(एकरूपा)धिकरणम्

(562)ओं स्थितिमाह दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ओम् ॥ 04-04-21 ॥


‘एतत् साम गायन्नास्ते’(तै.उ.३.१०) इत्युच्यते । तत्राऽनन्दादीनां वृद्धिर्ह्रासश्च न विद्यते। एकप्रकारेणैव सर्वदा स्थितिः ।
‘स एष एतस्मिन्(तै.उ.३.१०) ब्रह्मणि सम्पन्नो न जायते न म्रियते न हीयते न वर्धते स्थित एव सर्वदा भवति दर्शन्नेव ब्रह्म दर्शन्नेवाऽत्मानं तस्यैवं दर्शयतो नाऽपत्तिर्न विपत्तिः’() इत्याह जाबालश्रुतौ ।
‘यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते । न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इति मोक्षधर्मे ॥
विद्वत् प्रत्यक्षात् कारणभावल्लिङ्गाच्च ।
ब्रह्मवैवर्ते च – ‘न ह्रासो न च वृद्धिर्वा मुक्तानां विद्यते क्वचित् ।विद्वत्प्रत्यक्षसिद्धत्वात् कारणाभावतोऽनुमा ॥हरेरुपासना चात्र सदैव सुखरूपिणी ।न तु साधनभूता सा सिद्धिरेवात्र सा यतः’ इति ॥ 21 ॥
(563)ओं भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ओम् ॥ 04-04-22 ॥


न च भोगविशेषादिविरोधः ।‘एतमानन्दमयमात्मानमनुविश्य न जायते न म्रियते न ह्रसते न वर्धते यथाकामं चरति यथाकामं पिबति यथाकामं रमते यथाकाममुपरमते’(तै.उ.२.८) इति भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् ।
‘अवृद्धिह्रासरूपत्वं मुक्तानां प्रायिकं भवेत् ।कादाचित्कविशेषस्तु नैव तेषां विषिध्यते’ इति कौर्मे ॥
‘प्रवाहतस्तु वृद्धिर्वा ह्रासो वा नैव कुत्रचित् ।नाप्रियं किञ्चिदपि तु मुक्तानां विद्यते क्वचित् ॥ कुत एव तु दुःखं स्यात् सुखमेव सदोदितम् । भोगानां तु विशेषे तु वैचित्र्यं लभ्यते क्वचित्’

अनावृत्यधिकरणम्

(564)ओम् अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ओम् ॥ 04-04-23 ॥


‘नच पुनरावर्तते नच पुनरावर्तते’(छां.उ.८.१५.१),‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’(ऐ.आ.२.५.१-१५) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 23 ॥
ज्ञानानन्दादिभिः सर्वैर्गुणैः पूर्णाय विष्णवे ।नमोऽस्तु गुरवे नित्यं सर्वथाऽतिप्रियाय मे ॥
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलंबट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुःमध्वो यत् तु तृतीयमेतदमुना भाष्यं कृतं केशवे (तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि) ॥
नित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम ।नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै च विष्णवे ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्यं समाप्तम् ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥