Brahmasutra/C4/S3: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
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‘तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्नः आपूर्यमाणपक्षम्’(छां.उ.५.१०.१) इत्यर्चिषः प्राथम्यं श्रूयते । ‘यदा ह वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति’(बृ.उ.७.१०.१) इति वायोः । | |||
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तत्रार्चिषः प्राप्तिरेव प्रथमा । | |||
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‘द्वावेव मार्गौ | ‘द्वावेव मार्गौ प्रथितावर्चिरादिर्विपश्चिताम् ।धूमादिः कर्मिणां चैव सर्ववेदविनिर्णयात् ॥ | ||
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‘अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधैर्वार्चिषः सम्प्रतिष्ठतिः ।अग्निं गत्वा ज्योतिरेति प्रथमं ब्रह्म | ‘अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधैर्वार्चिषः सम्प्रतिष्ठतिः ।अग्निं गत्वा ज्योतिरेति प्रथमं ब्रह्म संव्रजन्’ ॥ इति । एकस्मिन्स्तुपुरे संस्थो द्विरूपोऽग्नेः सुतो महान्’इति च ब्रह्मतर्के॥ | ||
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अर्चिषो वायुं गच्छति ।‘स वायुमागच्छति’(बृ.उ.७.१०.१) इति सामान्यवचनात् । | |||
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‘स इतो गतो द्वितीयां गतिं वायुमागच्छति वायोरहरह्न आपूर्यमाणपक्षम्’() इति विशेषवचनाच्च ॥ 02 ॥ | |||
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‘मासेभ्यः संवत्सरं, संवत्सराद् वरुणलोकं, वरुणलोकात् प्रजापतिलोकम्’इति कौण्डिन्यश्रुतिः । | |||
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‘संवत्सरात् तटितमागच्छति तटितः प्रजापतिलोकम्’इति च गौपवनश्रुतिः ॥ | |||
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‘तटिता ह्यूह्यते वरुणलोकस्तटिदुपरि मुक्तामयो राजते तत्रासौ वरुणो राजा सत्यानृते विविञ्चति’ इत्युपरिसम्बद्धत्वश्रुतेः ॥ 03 ॥ | |||
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पूर्वत्रोक्तस्त्वातिवाहिको वायुः । पूर्वगमनलिङ्गात् ॥ 04 ॥ | |||
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कुतः ? – | कुतः ? – | ||
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‘स वायुमागच्छति’ इति प्रथममुच्यते | ‘स वायुमागच्छति’(बृ.उ.७.१०.१) इति प्रथममुच्यते ।‘उत्क्रान्तो विद्वान् परमभिगच्छन् विद्युतमेवान्तत उपगच्छति द्यौर्वाव विद्युत् तत्पतिं वायुमुपगम्य तेनैव ब्रह्म गच्छति’ इत्यन्तेऽपि वायुगमनश्रुतेः । | ||
पूर्वोक्त आतिवाहिकः परो वेति व्यामोहे(व्यामोहः- वा.रा.पाठ), उत्तरे दिवस्पतिरिति विशेषणात् पूर्वत्राऽतिवाहिकस्यैव सिद्धेः | |||
पूर्वोक्त आतिवाहिकः परो वेति व्यामोहे उत्तरे दिवस्पतिरिति विशेषणात् | |||
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ब्रह्मतर्के च – | ब्रह्मतर्के च – | ||
‘उत्क्रान्तस्तु शरीरात् स्वाद् गच्छत्यर्चिषमेव तु ।ततो हि वायोः पुत्रं च योऽसौ नाम्नाऽऽतिवाहिकः ॥ततोऽहः पूर्वपक्षं चाप्युदक् संवत्सरं तथा ।तटितं वरुणं चैव प्रजापं सूर्यमेव च ॥सोमं वैश्वानरं चेन्द्रं ध्रुवं देवीं दिवं तथा ।ततो वायुं परं प्राप्य तेनैति पुरुषोत्तमम्’ इति ॥ 05 ॥ | |||
‘उत्क्रान्तस्तु शरीरात् | |||
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प्रकारान्तरेण तत्र | प्रकारान्तरेण तत्र तत्रोच्यमानत्वाद् वायोरपि परतो ब्रह्मणोऽर्वाग् गन्तव्योऽस्तीति नाशङ्कनीयम् । विद्युत्पतिना वायुनैव ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’(छांउ.४.१५.६) इति ब्रह्मगमनश्रुतेः । | ||
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‘विद्युत्पतिर्वायुरेव | ‘विद्युत्पतिर्वायुरेव नयेद् ब्रह्म न चापरः । कुतोऽन्यस्य भवेच्छक्तिस्तमृते प्राणनायकम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥ | ||
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‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति कार्यं गमयतीति बादरिर्मन्यते । | ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’(छां.उ.५.१०.२) इति कार्यं ब्रह्म गमयतीति बादरिर्मन्यते । | ||
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‘ऋते देवान् परं ब्रह्म कः पुमान् प्राप्नुयात् क्वचित् | ‘ऋते देवान् परं ब्रह्म कः पुमान् प्राप्नुयात् क्वचित् ।यद्यपि ब्रह्मदृष्टिः स्याद् ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्’ ॥ इत्यध्यात्मवचनात् तस्यैव गत्युपपत्तेः ॥ 07 ॥ | ||
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‘यदि ह वाव परमभिपश्यति प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखं प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखम्’ इति कौषारवश्रुतौ ॥ 08 ॥ | ‘यदि ह वाव परमभिपश्यति, प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखं प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखम्’ इति कौषारवश्रुतौ ॥ 08 ॥ | ||
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‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इति तद्व्यपदेशस्तु समीप एव परमपि | ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१) इति तद्व्यपदेशस्तु समीप एव परमपि प्राप्नोतीत्येतदर्थ एव ॥ 09 ॥ | ||
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‘ते ह ब्रह्माणमभिसम्पद्य | ‘ते ह ब्रह्माणमभिसम्पद्य यदैतद् विलीयतेऽथ सह ब्रह्मणा परमभिगच्छन्ति’ इति सौपर्णश्रुतेः महाप्रलये तदध्यक्षेण ब्रह्मणा सह गच्छन्ति ॥ 10 ॥ | ||
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‘ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे | ‘ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।परस्यान्ते परात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्’ ॥ इति ॥ 11 ॥ | ||
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दृष्टत्वाच्च परब्रह्मणः ॥ 13 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (540)ओं अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा च दोषात् तत्क्रतुश्च ओम् ॥ 04-03-15 ॥ | ||
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‘प्रतीकं देह उद्दिष्टो येषां तत्रैव दर्शनम् | ‘प्रतीकं देह उद्दिष्टो येषां तत्रैव दर्शनम् ।न तु व्याप्ततया क्वापि प्रतीकालम्बनास्तु ते ॥अप्रतीका देवतास्तु ऋषीणां शतमेव च ।राज्ञां च शतमुद्दिष्टं गन्धर्वादि शतं तथा ॥एतेऽधिकारिणो व्याप्तिदर्शनेऽन्ये नतु क्वचित् ।अयोग्यदर्शने यत्नाद् भ्रंशः पूर्वस्य चापि तु ॥अप्रतीकाश्रया ये हि ते यान्ति परमेव तु ।स्वेदेहे ब्रह्म दृष्ट्यैव गच्छेद् ब्रह्मसलोकताम् ।ब्रह्मणा सह सम्प्राप्ते संहारे परमं पदम्’ ॥ इति गारुडवचनात् । | ||
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उभयत्रोक्तदोषाच्चाप्रतीकालम्बनान् परं नयति । ‘स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति, यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते, यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते’(बृ.उ.६.४.५) इति श्रुतेश्च । अत्र कर्मोपासनमेव । अन्यान् कार्यं नयतीति भगवन्मतम् ॥ 15 ॥ | |||
‘स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति | |||
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‘अन्तःप्रकाशा बहिःप्रकाशाः सर्वप्रकाशाः | ‘अन्तःप्रकाशा बहिःप्रकाशाः सर्वप्रकाशाः, देवा वाव सर्वप्रकाशा ऋषयोऽन्तःप्रकाशाः मानुषा एव बहिःप्रकाशाः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥ | ||
}} | }} | ||
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Revision as of 09:39, 10 April 2026
मार्गो गम्यं चास्मिन् पाद उच्यते –
अर्चिराद्यधिकरणम्
(526)ओम् अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ओम् ॥ 04-03-01 ॥
‘तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्नः आपूर्यमाणपक्षम्’(छां.उ.५.१०.१) इत्यर्चिषः प्राथम्यं श्रूयते । ‘यदा ह वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति’(बृ.उ.७.१०.१) इति वायोः ।
तत्रार्चिषः प्राप्तिरेव प्रथमा ।
‘द्वावेव मार्गौ प्रथितावर्चिरादिर्विपश्चिताम् ।धूमादिः कर्मिणां चैव सर्ववेदविनिर्णयात् ॥
‘अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधैर्वार्चिषः सम्प्रतिष्ठतिः ।अग्निं गत्वा ज्योतिरेति प्रथमं ब्रह्म संव्रजन्’ ॥ इति । एकस्मिन्स्तुपुरे संस्थो द्विरूपोऽग्नेः सुतो महान्’इति च ब्रह्मतर्के॥
वायुगत्यधिकरणम्
(527)ओं वायुशब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ओम् ॥ 04-03-02 ॥
अर्चिषो वायुं गच्छति ।‘स वायुमागच्छति’(बृ.उ.७.१०.१) इति सामान्यवचनात् ।
‘स इतो गतो द्वितीयां गतिं वायुमागच्छति वायोरहरह्न आपूर्यमाणपक्षम्’() इति विशेषवचनाच्च ॥ 02 ॥
तटिदधिकरणम्
(528)ओं तटितोऽधि वरुणः सम्बन्धात् ओम् ॥ 04-03-03 ॥
‘मासेभ्यः संवत्सरं, संवत्सराद् वरुणलोकं, वरुणलोकात् प्रजापतिलोकम्’इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
‘संवत्सरात् तटितमागच्छति तटितः प्रजापतिलोकम्’इति च गौपवनश्रुतिः ॥
‘तत्र तटितो वरुणं गच्छति ।
‘तटिता ह्यूह्यते वरुणलोकस्तटिदुपरि मुक्तामयो राजते तत्रासौ वरुणो राजा सत्यानृते विविञ्चति’ इत्युपरिसम्बद्धत्वश्रुतेः ॥ 03 ॥
आतिवाहिकाधिकरणम्
(529)ओम् आतिवाहिकस्तल्लिङ्गात् ओम् ॥ 04-03-04 ॥
पूर्वत्रोक्तस्त्वातिवाहिको वायुः । पूर्वगमनलिङ्गात् ॥ 04 ॥
(530)ओम् उभयव्यामोहत् तत्सिद्धेः ओं॥ 04-03-05 ॥
कुतः ? –
‘स वायुमागच्छति’(बृ.उ.७.१०.१) इति प्रथममुच्यते ।‘उत्क्रान्तो विद्वान् परमभिगच्छन् विद्युतमेवान्तत उपगच्छति द्यौर्वाव विद्युत् तत्पतिं वायुमुपगम्य तेनैव ब्रह्म गच्छति’ इत्यन्तेऽपि वायुगमनश्रुतेः ।
पूर्वोक्त आतिवाहिकः परो वेति व्यामोहे(व्यामोहः- वा.रा.पाठ), उत्तरे दिवस्पतिरिति विशेषणात् पूर्वत्राऽतिवाहिकस्यैव सिद्धेः
ब्रह्मतर्के च –
‘उत्क्रान्तस्तु शरीरात् स्वाद् गच्छत्यर्चिषमेव तु ।ततो हि वायोः पुत्रं च योऽसौ नाम्नाऽऽतिवाहिकः ॥ततोऽहः पूर्वपक्षं चाप्युदक् संवत्सरं तथा ।तटितं वरुणं चैव प्रजापं सूर्यमेव च ॥सोमं वैश्वानरं चेन्द्रं ध्रुवं देवीं दिवं तथा ।ततो वायुं परं प्राप्य तेनैति पुरुषोत्तमम्’ इति ॥ 05 ॥
वैद्युताधिकरणम्
(531)ओं वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ओम् ॥ 04-03-06 ॥
प्रकारान्तरेण तत्र तत्रोच्यमानत्वाद् वायोरपि परतो ब्रह्मणोऽर्वाग् गन्तव्योऽस्तीति नाशङ्कनीयम् । विद्युत्पतिना वायुनैव ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’(छांउ.४.१५.६) इति ब्रह्मगमनश्रुतेः ।
‘विद्युत्पतिर्वायुरेव नयेद् ब्रह्म न चापरः । कुतोऽन्यस्य भवेच्छक्तिस्तमृते प्राणनायकम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥
कार्याधिकरणम्
(532)ओं कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ओम् ॥ 04-03-07 ॥
‘स एनान् ब्रह्म गमयति’(छां.उ.५.१०.२) इति कार्यं ब्रह्म गमयतीति बादरिर्मन्यते ।
‘ऋते देवान् परं ब्रह्म कः पुमान् प्राप्नुयात् क्वचित् ।यद्यपि ब्रह्मदृष्टिः स्याद् ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्’ ॥ इत्यध्यात्मवचनात् तस्यैव गत्युपपत्तेः ॥ 07 ॥
(533)ओं विशेषितत्वाच्च ओम् ॥ 04-03-08 ॥
‘यदि ह वाव परमभिपश्यति, प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखं प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखम्’ इति कौषारवश्रुतौ ॥ 08 ॥
(534)ओं सामीप्यात्तु तद्व्यपदेशः ओम् ॥ 04-03-09 ॥
‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१) इति तद्व्यपदेशस्तु समीप एव परमपि प्राप्नोतीत्येतदर्थ एव ॥ 09 ॥
(535)ओं कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ओं॥ 04-03-10 ॥
कदा ? –
‘ते ह ब्रह्माणमभिसम्पद्य यदैतद् विलीयतेऽथ सह ब्रह्मणा परमभिगच्छन्ति’ इति सौपर्णश्रुतेः महाप्रलये तदध्यक्षेण ब्रह्मणा सह गच्छन्ति ॥ 10 ॥
(536)ओं स्मृतेश्च ओम् ॥ 04-03-11 ॥
‘ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।परस्यान्ते परात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्’ ॥ इति ॥ 11 ॥
(537)ओं परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ओम् ॥ 04-03-12 ॥
ब्रह्मशब्दस्य तत्रैव मुख्यत्वात् परमेव ब्रह्म गमयतीति जैमिनिर्मन्यते ॥ 12 ॥
(538)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 04-03-13 ॥
दृष्टत्वाच्च परब्रह्मणः ॥ 13 ॥
(539)ओं न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ओम् ॥ 04-03-14 ॥
न हि कार्ये प्रतिपत्तिः प्राप्नवानीत्यभिसन्धिश्च ।
‘यदुपास्ते पुमान् जीवन् यत् प्राप्तुमभिवाञ्छति ।यच्च पश्यति तृप्तः संस्तत् प्राप्नोति मृतेरनु’ इति पाद्मे ॥ 14 ॥
(540)ओं अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा च दोषात् तत्क्रतुश्च ओम् ॥ 04-03-15 ॥
‘प्रतीकं देह उद्दिष्टो येषां तत्रैव दर्शनम् ।न तु व्याप्ततया क्वापि प्रतीकालम्बनास्तु ते ॥अप्रतीका देवतास्तु ऋषीणां शतमेव च ।राज्ञां च शतमुद्दिष्टं गन्धर्वादि शतं तथा ॥एतेऽधिकारिणो व्याप्तिदर्शनेऽन्ये नतु क्वचित् ।अयोग्यदर्शने यत्नाद् भ्रंशः पूर्वस्य चापि तु ॥अप्रतीकाश्रया ये हि ते यान्ति परमेव तु ।स्वेदेहे ब्रह्म दृष्ट्यैव गच्छेद् ब्रह्मसलोकताम् ।ब्रह्मणा सह सम्प्राप्ते संहारे परमं पदम्’ ॥ इति गारुडवचनात् ।
उभयत्रोक्तदोषाच्चाप्रतीकालम्बनान् परं नयति । ‘स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति, यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते, यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते’(बृ.उ.६.४.५) इति श्रुतेश्च । अत्र कर्मोपासनमेव । अन्यान् कार्यं नयतीति भगवन्मतम् ॥ 15 ॥
(541)ओं विशेषं च दर्शयति ओम् ॥ 04-03-16 ॥
‘अन्तःप्रकाशा बहिःप्रकाशाः सर्वप्रकाशाः, देवा वाव सर्वप्रकाशा ऋषयोऽन्तःप्रकाशाः मानुषा एव बहिःप्रकाशाः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥