Brahmasutra/C3/S4: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
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यद्दर्शनार्थमुपासनोक्ता | यद्दर्शनार्थमुपासनोक्ता तस्माद् दर्शनात् सर्वपुरुषार्थप्राप्तिरिति बादरायणो मन्यते । | ||
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‘यं यं लोकं मनसा संविभाति | ‘यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् । तं तं लोकं जायते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः’(मुं.उ.३.१.१०)इति शब्दात् ॥ 01 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (435)ओं शेषत्वात् पुरुषार्थवादो यथाऽन्येष्विति जैमिनिः ओम् ॥ 03-04-02 ॥ | ||
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‘स्वर्गं | ‘स्वर्गं धनाद् देहतो वै गृहाच्च प्राप्स्यन्ति धीरा न त्वधीराः कुतश्चित्’ इति वदति जैमिनिः ॥ 02 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (436)ओम् आचारदर्शनात् ओम् ॥ 03-04-03 ॥ | ||
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‘यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति’ | ‘यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति’(छां.उ.१.१.१०) इति शेषत्वश्रुतेः ॥ 04 ॥ | ||
इति शेषत्वश्रुतेः ॥ 04 ॥ | |||
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‘कर्मैव देहं दैविकं मानुषं | ‘कर्मैव देहं दैविकं मानुषं वाऽप्यन्वारभेत् नापरस्तत्र हेतुः ।भोगांस्तदीयांश्च यथाविभागं ददाति कर्मैव शुभाशुभं यत्’इति माठरश्रुतेश्च । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (439)ओं तद्वतो विधानात् ओम् ॥ 03-04-06 ॥ | ||
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‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जीजीविषेच्छतं समाः | ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जीजीविषेच्छतं समाः ।एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे’(ई.उ.२) इति ॥ 07 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (441)ओम् अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ओम् ॥ 03-04-08॥ | ||
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‘ज्ञानादेव स्वर्गो ज्ञानादेवापवर्गो ज्ञानादेव सर्वे कामाः सम्पद्यन्ते ।तथापि यथा यथा कर्म कुरुते तथा तथाऽधिको भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः | ‘ज्ञानादेव स्वर्गो ज्ञानादेवापवर्गो ज्ञानादेव सर्वे कामाः सम्पद्यन्ते ।तथापि यथा यथा कर्म कुरुते तथा तथाऽधिको भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः,युधिष्ठिरादीनां राजसूयादिना फलाधिक्यदर्शनाच्चेति बादरायणमतम् ॥ 08 ॥ | ||
युधिष्ठिरादीनां राजसूयादिना | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (442)ओं तुल्यम् तु दर्शनम् ओम् ॥ 03-04-09 ॥ | ||
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‘विज्ञातमेतत् सर्वेषां मुनीनां ब्रह्मदर्शनात् | ‘विज्ञातमेतत् सर्वेषां मुनीनां ब्रह्मदर्शनात् ।स्यादेव मोक्षो नान्यस्मादिति तत्रापि चित्रता ॥स्वर्गादयः कर्मणैव नान्येनेत्यपरे विदुः ।ज्ञानेनाऽधिक्यमित्याहुर्जैमिन्याद्यास्तु केचन ॥अदृष्टमेव ज्ञानेन दृष्टं नैवोपलभ्यते ।इति केचिद्विदः प्राहुर्व्यासशिष्या इमेऽखिलाः ॥यस्माद् व्यासमतं सर्वं सत्यमेव ततोऽखिलम् ।यथाऽऽकाशस्त्वनन्तोऽपि व्यामो हस्तावधिस्तथा ।प्रादेशोऽपि हि सत्येन तथैतेषां मतानि तु ॥स्वयं तु भगवान् व्यासो व्याप्तज्ञानमहांशुमान् ।अनन्ताकाशवत् पश्यन् निखिलं पुरुषोत्तमः ॥ज्ञानेनैवाप्यते सर्वं कर्मणा त्वधिकं भवेत् ।इति प्राह महायोगी पुमर्थानां विनिर्णयम्’ इति भविष्यत्पर्वणि । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (443)ओम् असार्वत्रिकी ओम् ॥ 03-04-10 ॥ | ||
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सर्वेषां | सर्वेषां पुरुषार्थापेक्षित्वाज्ज्ञानाधिकारितेत्यत आह – | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (444)ओं विभागः शतवत् ओम् ॥ 03-04-11 ॥ | ||
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‘नवकोट्यो हि देवानां तेषां मध्ये शतस्य तु | ‘नवकोट्यो हि देवानां तेषां मध्ये शतस्य तु ।सोमाधिकारो वेदोक्तो ब्रह्मणी द्वे शताधिके ॥यथा तथैवा सङ्ख्येयाः प्रजास्तासु कियान् जनः ।ज्ञानाधिकारी सम्प्रोक्तो विष्णुपादैकसंश्रयः’() | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (445)ओम् अध्ययनमात्रवतः ओम् ॥ 03-04-12 ॥ | ||
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कस्याधिकारः? | कस्याधिकारः? | ||
‘अवैष्णवस्य वेदेऽपि ह्यधिकारो न विद्यते | ‘अवैष्णवस्य वेदेऽपि ह्यधिकारो न विद्यते ।गुरुभक्तिविहीनस्य शमादिरहितस्य च ॥न च वर्णावरस्यापि तस्मादध्ययनान्वितः ।ब्रह्मज्ञाने तु वेदोक्तेऽप्यधिकारी सतां मतः’ ॥ इति हि ब्रह्मतर्के ॥ | ||
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‘पठेद् वेदानथार्थानधीयीताथ विचार्य ब्रह्म विन्देत्’ इति च कौषारवश्रुतिः ॥ 12 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (446)ओं नाविशेषात् ओम् ॥ 03-04-13 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (447)ओं स्तुतयेऽनुमतिर्वा ओम् ॥ 14-447 ॥ | ||
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‘अथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन | ‘अथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एव’(बृ.उ.५.५.१) इति ज्ञानिनो यथेष्टाचरणं विधीयत इत्यत आह- | ||
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न विधिः । ज्ञानिनः | न विधिः । ज्ञानिनः स्तुतयेऽनुमतिमात्रं वा । युज्यते च ॥ 14 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (448)ओं कामकारेण चैके ओम् ॥ 03-04-15 ॥ | ||
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‘कामाचाराः कामभक्षाः कामवादाः कामेनैवेमं देहमुत्सृज्याथ परात् परमीयुरनारम्भणम्’ इति चैके पठन्ति ॥ 15 ॥ | ‘कामाचाराः कामभक्षाः कामवादाः कामेनैवेमं देहमुत्सृज्याथ परात् परमीयुरनारम्भणम्’(सामशाखा) इति चैके पठन्ति ॥ 15 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 424: | Line 331: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (449)ओम् उपमर्दं च ओम् ॥ 03-04-16 ॥ | ||
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| Line 440: | Line 347: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (450)ओम् ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ओम् ॥ 03-04-17 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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| Line 463: | Line 370: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (451)ओं परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदति हि ओम् ॥ 03-04-18 ॥ | ||
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| Line 471: | Line 378: | ||
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‘प्रातरुत्थाय सन्ध्यामुपासीत यत् सन्ध्यामुपासते ब्रह्मैव तदुपासतेऽथ देवान् नमेत् जुहुयाद् वेदानावर्तयीत नान्यत् किञ्चिदाचरेन्न सुरां पिबेन्न पलाण्डुं भक्षयीत न भृषं वेदेन्न विस्मरेताऽत्मानं सोमं पिबेद्धुतशेषेण वर्तयेत्’() | |||
}} | }} | ||
| Line 485: | Line 392: | ||
| id = BS_C03_S04_V18_B3 | | id = BS_C03_S04_V18_B3 | ||
| text = | | text = | ||
न च निषिद्धं कर्म कर्तव्येमेवेति चोदना । ‘ब्राह्मणो न हन्तव्यः’ इत्याद्यपवादश्च ॥ 18 ॥ | न च निषिद्धं कर्म कर्तव्येमेवेति चोदना । ‘ब्राह्मणो न हन्तव्यः’() इत्याद्यपवादश्च ॥ 18 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 493: | Line 400: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (452)ओम् अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ओम् ॥ 03-04-19 ॥ | ||
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| Line 501: | Line 408: | ||
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अनुष्ठेयानां मध्य एव कामतश्चरणं कामतो | अनुष्ठेयानां मध्य एव कामतश्चरणं कामतो निवृत्तिरिति बादरायणो मन्यते । ‘केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एव’(बृ.उ.५.५.१) इति साम्यश्रुतेः । | ||
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| Line 508: | Line 415: | ||
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‘यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते’ इति भगवद्वचनाच्च ॥ 19 ॥ | ‘यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते’(भ.गी.३.१७) इति भगवद्वचनाच्च ॥ 19 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 516: | Line 423: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (453)ओं विधिर्वा धारणवत् ओम् ॥ 03-04-20 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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| Line 524: | Line 431: | ||
| id = BS_C03_S04_V20_B1 | | id = BS_C03_S04_V20_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘केन | ‘केन स्याद् येन स्यात्’(बृ.उ.५.५.१) इति विधिर्वा । यथा वेदधारणं त्रैवर्णिकानां विहितं नान्येषाम्, एवं स्वमतानुसारिणी प्रवृत्तिर्ज्ञानिनां विहिता । | ||
}} | }} | ||
| Line 531: | Line 438: | ||
| id = BS_C03_S04_V20_B2 | | id = BS_C03_S04_V20_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘स्वेच्छयैव प्रवृत्तिस्तु ब्रह्मणो | न तत्राधर्मशङ्का कार्या, नान्येषामिति वा । | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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‘स्वेच्छयैव प्रवृत्तिस्तु ब्रह्मणो विधिचोदना ।नाशङ्क्यं तन्मतं क्वापि विष्णोः प्रत्यक्षचोदना ।इतरेषां न विहिता स्वेच्छावृत्तिः कथञ्चन’ इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 539: | Line 453: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (454)ओं स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ओम् ॥ 03-04-21 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 547: | Line 461: | ||
| id = BS_C03_S04_V21_B1 | | id = BS_C03_S04_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
स्तुतिमात्रमेव स्वेच्छाचरणं न विधिः | स्तुतिमात्रमेव स्वेच्छाचरणं, न विधिः, तैरपि सामान्यविधिस्वीकारादिति चेत्, न । अपूर्वत्वात् परवशत्वात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 554: | Line 468: | ||
| id = BS_C03_S04_V21_B2 | | id = BS_C03_S04_V21_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘विधीनां विषयास्त्वन्ये ब्रह्मणः स्वेच्छया कृतौ ।परस्य ब्रह्मणो ह्येव | सर्वविध्यतिक्रमेण स्तुतिमात्रविषयत्वं परब्रह्मण एव हि । | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = BS_C03_S04_V21 | |||
| id = BS_C03_S04_V21_B2 | |||
| text = | |||
‘विधीनां विषयास्त्वन्ये ब्रह्मणः स्वेच्छया कृतौ ।परस्य ब्रह्मणो ह्येव सर्वविध्यतिदूरता’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 21 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 562: | Line 483: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (455)ओं भावशब्दाच्च ओम् ॥ 03-04-22 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 570: | Line 491: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यथाविधानमपरे विधिर्भावे प्रजापतेः । ब्रह्मणः परमस्यैव | ‘यथाविधानमपरे विधिर्भावे प्रजापतेः । ब्रह्मणः परमस्यैव सर्वविध्यतिदूरता’ इति च तुरश्रुतौ ॥ 22 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 578: | Line 499: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (456)ओं पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ओम् ॥ 03-04-23 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 586: | Line 507: | ||
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| text = | | text = | ||
‘केन | ‘केन स्याद् येन स्यात्’(बृ.उ.५.५.१) इत्यादयः स्थिरत्वनिवृत्त्यर्था इति चेत्, न । | ||
}} | }} | ||
| Line 593: | Line 514: | ||
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| text = | | text = | ||
‘त्रेधा | ‘त्रेधा हि ज्ञानिनो विधिनियता अनियताः स्वेच्छानियता इति ।विधिनियता मनुष्या अनियता हि देवा ब्रह्मैव स्वेच्छानियतः’इति गौपवनश्रुतौ विशेषितत्वात् ॥ 23 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 601: | Line 522: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (457)ओं तथा चैकवाक्योपबन्धात् ओम् ॥ 03-04-24 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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| Line 609: | Line 530: | ||
| id = BS_C03_S04_V24_B1 | | id = BS_C03_S04_V24_B1 | ||
| text = | | text = | ||
एवं सति विधिवाक्यानां स्वेच्छावृत्तिवाक्यानां च सम्बन्धो भवति ॥ 24 ॥ | एवं सति विधिवाक्यानां स्वेच्छावृत्तिवाक्यानां (च) सम्बन्धो भवति ॥ 24 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 617: | Line 538: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (458)ओम् अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ओम् ॥ 03-04-25 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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| Line 625: | Line 546: | ||
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| text = | | text = | ||
अत एव ज्ञानस्य | अत एव ज्ञानस्य मोक्षादाने नाग्निहोत्राद्यपेक्षा । | ||
}} | }} | ||
| Line 633: | Line 554: | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मतर्के च – | ब्रह्मतर्के च – | ||
‘येषां ज्ञानं समुत्पन्नं तेषां मोक्षो विनिश्चितः ।शुभकर्मभिराधिक्यं विपरीतैर्विपर्ययः ॥स्वेच्छानुवृत्यैव भवेद् ब्रह्मणः प्रायशस्तथा ।देवानामपि सर्वेषां विशेषादुत्तरोत्तरम्’() इति ॥ 25 ॥ | |||
‘येषां ज्ञानं समुत्पन्नं तेषां मोक्षो विनिश्चितः | |||
}} | }} | ||
| Line 656: | Line 562: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (459)ओं सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ओम् ॥ 03-04-26 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 664: | Line 570: | ||
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| text = | | text = | ||
सर्वधर्मापेक्षा च ज्ञानस्येत्पत्तौ | सर्वधर्मापेक्षा च ज्ञानस्येत्पत्तौ ‘विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन’(बृ.उ.६.४.२२) इति श्रुतेः । | ||
‘विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन’ इति श्रुतेः । | |||
}} | }} | ||
| Line 678: | Line 577: | ||
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| text = | | text = | ||
यथा गतिनिष्पत्यर्थमश्वादयोऽपेक्ष्यन्ते न | यथा गतिनिष्पत्यर्थमश्वादयोऽपेक्ष्यन्ते न निष्पन्नगतेर्ग्रामादिप्राप्तौ ॥ 26 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 686: | Line 585: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (460)ओं शमदमाद्युपेतः स्यात् तथाऽपि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ओम् ॥ 03-04-27 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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| Line 694: | Line 593: | ||
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| text = | | text = | ||
यद्यपि ज्ञानेनैव मोक्षो नियतस्तथाऽपि ज्ञानी शमदमाद्युपेतः | यद्यपि ज्ञानेनैव मोक्षो नियतस्तथाऽपि ज्ञानी शमदमाद्युपेतः स्यात्।‘आचार्याद्विद्यामवाप्यैतमात्मानमभिपश्य शान्तो भवेद् दान्तो भवेदनुकूलो भवेदाचार्यं परिचरेत् परिचरेदाचार्यम्’ इति माठरश्रुतौ ज्ञानिनोऽपि तद्विधेः । | ||
}} | }} | ||
| Line 701: | Line 600: | ||
| id = BS_C03_S04_V27_B2 | | id = BS_C03_S04_V27_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘ब्राह्मीं वाव त उपनिषदब्रूम’ इति । तस्यैतपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् । यो वा एतामुपनिषदमेवं वेद’ | ‘ब्राह्मीं वाव त उपनिषदब्रूम’ इति । तस्यैतपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् । यो वा एतामुपनिषदमेवं वेद’(केन.उ.४.७,८,९)इति ज्ञानाङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् । | ||
इति ज्ञानाङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् । | |||
}} | }} | ||
| Line 724: | Line 622: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (461)ओं सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ओम् ॥ 03-04-28 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 732: | Line 630: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यदि ह वा | ‘यदि ह वा एवंविन्निखिलं भक्षयीत एवमेव स भवति’ इति सर्वान्नानुमतिः प्राणात्ययविषया । ‘न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म उदपानम्’(छां.उ.१.१०.४)इति दर्शनात् ॥ 28 ॥ | ||
‘न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म | |||
}} | }} | ||
| Line 747: | Line 638: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (462)ओम् अबाधाच्च ओम् ॥ 03-04-29 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 763: | Line 654: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (463)ओम् अपि स्मर्यते ओम् ॥ 03-04-30 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 771: | Line 662: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अतीतानागतज्ञानी | ‘अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।एतादृशोऽपि नाऽचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्’ इति हरिवंशेषु ॥ 30 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 779: | Line 670: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (464)ओं शब्दश्चातोऽकामचारे ओं॥ 03-04-31 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 787: | Line 678: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स य एतदेवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन् न कामचरितं चरेन्न कामं भक्षयीत न | ‘स य एतदेवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन् न कामचरितं चरेन्न कामं भक्षयीत न काममनुवर्तेत’ इति कौण्डन्यश्रुतौ । | ||
}} | }} | ||
| Line 794: | Line 685: | ||
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| text = | | text = | ||
अत इत्यल्पफलत्वं सूचयति । | अत इत्यल्पफलत्वं सूचयति । ‘न निषिद्धानि वर्तेत पूर्णज्ञानफलेच्छया’ इति पाद्मे ॥ 31 ॥ | ||
‘न निषिद्धानि वर्तेत पूर्णज्ञानफलेच्छया’ इति पाद्मे ॥ 31 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 809: | Line 693: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (465)ओं विहितत्वाच्चाऽश्रमकर्मापि ओम् ॥ 03-04-32 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 817: | Line 701: | ||
| id = BS_C03_S04_V32_B1 | | id = BS_C03_S04_V32_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न केवलं | न केवलं निषिद्धाकरणेन पूर्यते । कर्तव्यं च वर्णाश्रमविहितं कर्म ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 824: | Line 708: | ||
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| text = | | text = | ||
‘पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् | ‘पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् कर्मविचारयन्।यदात्मानः सुनियतमानन्दोत्कर्षमाप्नुयात्’ ॥ इति कौषारवश्रुतौ विहितत्वाच्च । अपिशब्दो वर्णधर्मसमुच्चयार्थः ॥ 32 ॥ | ||
इति कौषारवश्रुतौ विहितत्वाच्च । अपिशब्दो वर्णधर्मसमुच्चयार्थः ॥ 32 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 834: | Line 716: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (466)ओं सहकारित्वेन च ओम् ॥ 03-04-33॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 849: | Line 724: | ||
| id = BS_C03_S04_V33_B1 | | id = BS_C03_S04_V33_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘यथा राज्ञः सहकार्येव मन्त्री तथाऽप्यृते तं क्षितिपः कार्यमृच्छेत् | ‘यथा राज्ञः सहकार्येव मन्त्री तथाऽप्यृते तं क्षितिपः कार्यमृच्छेत् ।एवं ज्ञानं कर्म विनाऽपि कार्यं सहायभूतं न विचारः कुतश्चित्’ ॥इति कमठश्रुतौ सहकारित्वोक्तेश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 864: | Line 731: | ||
| id = BS_C03_S04_V33_B4 | | id = BS_C03_S04_V33_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘ज्ञानान्मोक्षो भवेत्येव सर्वकार्यकृतोऽपि तु ।आनन्दो ह्रसतेऽकार्याच्छुभं कृत्वा | ‘ज्ञानान्मोक्षो भवेत्येव सर्वकार्यकृतोऽपि तु ।आनन्दो ह्रसतेऽकार्याच्छुभं कृत्वा च वर्धते’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 871: | Line 738: | ||
| id = BS_C03_S04_V33_B6 | | id = BS_C03_S04_V33_B6 | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वदुःखनिवृत्तिश्च ज्ञानिनो निश्चितैव हि ।उपासया कर्मभिश्च भक्त्या चानन्दचित्रता’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ | ‘सर्वदुःखनिवृत्तिश्च ज्ञानिनो निश्चितैव हि ।उपासया कर्मभिश्च भक्त्या चानन्दचित्रता’ इति च बृहत्तन्त्रे ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 888: | Line 755: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (467)ओं सर्वथाऽपितु त एवोभयलिङ्गात् ओम् ॥ 03-04-34 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 897: | Line 764: | ||
| text = | | text = | ||
सर्वप्रकारेणोत्साहेऽपि ये ज्ञानयोग्यास्त एव ज्ञानं प्राप्नुवन्ति नान्ये । | सर्वप्रकारेणोत्साहेऽपि ये ज्ञानयोग्यास्त एव ज्ञानं प्राप्नुवन्ति नान्ये । | ||
‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः’ | ‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः’(छां.उ.८.७.३) | ||
इति श्रुत्याऽऽचार्योपदेशसाम्येऽपि विरोचनो विपरीतज्ञानमापेन्द्रः सम्यज्ज्ञानमित्युभयविधलिङ्गात् ॥ 34 ॥ | इति श्रुत्याऽऽचार्योपदेशसाम्येऽपि विरोचनो विपरीतज्ञानमापेन्द्रः सम्यज्ज्ञानमित्युभयविधलिङ्गात् ॥ 34 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 906: | Line 773: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (468)ओम् अनभिभवं च दर्शयति ओम् ॥ 03-04-35 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 914: | Line 781: | ||
| id = BS_C03_S04_V35_B1 | | id = BS_C03_S04_V35_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘दैवीमेव सम्पत्तिं देवा अभिगच्छन्त्यासुरीमेव चासुरा नैतयोरभिभवः कदाचित् स्वभाव एव | ‘दैवीमेव सम्पत्तिं देवा अभिगच्छन्त्यासुरीमेव चासुरा नैतयोरभिभवः कदाचित् स्वभाव एव ह्यवतिष्ठते’() इति स्वभावानभिभवं च दर्शयति ॥ 35 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 922: | Line 789: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (469)ओम् अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ओम् ॥ 03-04-36 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 938: | Line 805: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (470)ओम् अपि स्मर्यते ओम् ॥ 03-04-37 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 946: | Line 813: | ||
| id = BS_C03_S04_V37_B1 | | id = BS_C03_S04_V37_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘असुरा | ‘असुरा आसुरेणैव स्वभावेन च कर्मणा । ज्ञानेन विपरीतेन तमो यान्ति विनिश्चयात् ॥देवा दैवस्वभावेन कर्मणा चाप्यसंशयम् । सम्यज्ज्ञानेन परमां गतिं गच्छन्ति वैष्णवीम् ॥नानयोरन्यथाभावः कदाचित् क्वापि विद्यते । मानुषा मिश्रमतयो विमिश्रगतयोऽपि च’ इति स्कान्दे ॥ 37 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 954: | Line 821: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (471)ओं विशेषानुग्रहं च ओम् ॥ 03-04-38 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 962: | Line 829: | ||
| id = BS_C03_S04_V38_B1 | | id = BS_C03_S04_V38_B1 | ||
| text = | | text = | ||
शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः | शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः ।एधमानद्विडुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्’(ऋ.सं.६.४७.१६) | ||
}} | }} | ||
| Line 985: | Line 851: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (472)ओम् अतस्त्वितरज्ज्यायोलिङ्गाच्च ओम् ॥ 03-04-39 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 993: | Line 859: | ||
| id = BS_C03_S04_V39_B1 | | id = BS_C03_S04_V39_B1 | ||
| text = | | text = | ||
देवभागादसुरभाग एव बहुलः । ‘तस्मान्न जनतामियात्’ इति लिङ्गात् । | देवभागादसुरभाग एव बहुलः । ‘तस्मान्न जनतामियात्’(बृ.उ.३.३.२०) इति लिङ्गात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,000: | Line 866: | ||
| id = BS_C03_S04_V39_B2 | | id = BS_C03_S04_V39_B2 | ||
| text = | | text = | ||
चशब्दात् | चशब्दात् -‘ततः कनीयासा एव देवा ज्यायासा असुराः’(बृ.उ.३.३.१) इति श्रुतेश्च । | ||
‘ततः कनीयासा एव देवा ज्यायासा असुराः’ इति श्रुतेश्च । | |||
}} | }} | ||
| Line 1,016: | Line 881: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (473)ओं तद्भूतस्य तु तद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाभावेभ्यः ओम् ॥ 03-04-40 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,038: | Line 896: | ||
| id = BS_C03_S04_V40_B2 | | id = BS_C03_S04_V40_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘नासुरा दैवीं न देवा आसुरीं न मनुष्या दैवीमासुरीं च गतिमीयुरात्मीयामेव जातिमनुभवन्ति’ इति नियमश्रुतेः । | ‘नासुरा दैवीं न देवा आसुरीं न मनुष्या दैवीमासुरीं च गतिमीयुरात्मीयामेव जातिमनुभवन्ति’(ऐ(ए).आ.२.१.८) इति नियमश्रुतेः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,052: | Line 910: | ||
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| text = | | text = | ||
‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाऽप्येतर्हि | ‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाऽप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रशस्वित्यभूतिरित्यसुरासेते ह पराबभूवुः’(ऐ.आ.२.१.८) इति देवासुराणां भावाभावश्रुतेश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,059: | Line 917: | ||
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देवानां भूतिरित्येव मनो विष्णौ स्वभावतः | देवानां भूतिरित्येव मनो विष्णौ स्वभावतः ।असुराणामभूतित्वेनैतन्नेयमतोऽन्यथा ॥ | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C03_S04_V40 | | verse_id = BS_C03_S04_V40 | ||
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‘देवाः शापाभिभूतत्वात् प्रह्लादाद्या बभूविरे ।अतः सुगतिरेतेषां नान्यथा व्यत्ययो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ॥ 40 ॥ | ‘देवाः शापाभिभूतत्वात् प्रह्लादाद्या बभूविरे ।अतः सुगतिरेतेषां नान्यथा व्यत्ययो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ॥ 40 ॥ | ||
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| Line 1,085: | Line 942: | ||
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न च | न च परमात्मैश्वर्यादिकमाकाङ्क्ष्यम्, ब्रह्मादीनामपि नाकाङ्क्षयं, किमुपरस्येति सूचयितुमपिशब्दः । चशब्दस्तु ज्ञानार्थीनां पूर्वोक्तादित्थम्भावान्तरसूचकः । अयोग्यमारोढुं प्रयतन् प्रपतन् हि दृश्यते । एवमयोगस्य परमात्मैश्वर्यस्य ब्रह्मादिपदस्य चाकाङ्क्षायां पतनमनुमीयते । | ||
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| Line 1,099: | Line 956: | ||
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‘स्वकीयमिच्छमानं तु राजाद्याः पातयन्ति हि । एवमेव सुराद्याश्च हरिश्च स्वपदेच्छुकम्’ | ‘स्वकीयमिच्छमानं तु राजाद्याः पातयन्ति हि । एवमेव सुराद्याश्च हरिश्च स्वपदेच्छुकम्’ ॥ इत्याद्यनुमानरूपवाक्याच्च ।। | ||
इत्याद्यनुमानरूपवाक्याच्च ।। | |||
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| Line 1,113: | Line 963: | ||
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‘मायाभिरुत्सिसृप्सत इन्द्र द्यामारुरुक्षत ।अवदस्यूँरधूनुथाः’ इति च श्रुतिः॥ | ‘मायाभिरुत्सिसृप्सत इन्द्र द्यामारुरुक्षत ।अवदस्यूँरधूनुथाः’(ऋ.सं.८.१४.१४) इति च श्रुतिः॥ | ||
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उपदेवपदं च | उपदेवपदं च नापेक्षमित्येके । भावशमनवत्, ऋष्टिपदवदेव । तच्चोक्तमिन्द्रद्युम्नश्रुतौ –‘अथ यथर्षीन् प्रजापतीन् नाकाङ्क्षेदेवं न गन्धर्वान् न विद्याधरान् न सिद्धान्’ इति। | ||
तच्चोक्तमिन्द्रद्युम्नश्रुतौ | |||
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बृहत्संहितायां च | बृहत्संहितायां च –‘न दैवानभिकाङ्क्षेत कुत एव हरेर्गुणान् ।प्राजापत्यान् न चार्षांश्च गान्धर्वादीनपि क्वचित् ॥ऋष्यादिषु विशेषे तु दोषो नैवाविशेषतः’ ॥ इति विशेषदर्शनार्थमेक इत्युक्तम् ॥ 42 ॥ | ||
इति विशेषदर्शनार्थमेक इत्युक्तम् ॥ 42 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (476)ओं बहिस्तूभयथाऽपि स्मृतेराचाराच्च ओम् ॥ 03-04-43 ॥ | ||
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‘नानात्वमेव कामानां नाकामः क्व च दृश्यते | ‘नानात्वमेव कामानां नाकामः क्व च दृश्यते ।अतोऽविरुद्धकामः स्यादकामस्तेन भण्यते’ इत्याचाराच्च ॥ 43 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (477)ओं स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ओम् ॥ 03-04-44 ॥ | ||
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‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इत्यादि फलं स्वामिनां देवानामेव भवति । | ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१) इत्यादि फलं स्वामिनां देवानामेव भवति । | ||
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‘यदु किञ्चेमाः प्रजाः शुभमाचरन्ति देवा एव तदाचरन्ति यदु किं चेमाः प्रजा विजानते देवा एव तद्विजानते देवानां ह्येतद्भवति स्वामी हि फलमश्नुते नास्वामी कर्म कुर्वाणः’ | ‘यदु किञ्चेमाः प्रजाः शुभमाचरन्ति देवा एव तदाचरन्ति यदु किं चेमाः प्रजा विजानते देवा एव तद्विजानते देवानां ह्येतद्भवति स्वामी हि फलमश्नुते नास्वामी कर्म कुर्वाणः’ ॥ इति माध्यन्दिनायनश्रुतेरित्यात्रेयो मन्यते ॥ 44 ॥ | ||
इति माध्यन्दिनायनश्रुतेरित्यात्रेयो मन्यते ॥ 44 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (478)ओम् आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रियते ओम् ॥ 45-478 ॥ | ||
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| Line 1,246: | Line 1,057: | ||
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सत्रयागेष्वृत्विजामपि फलदर्शनादल्पं फलं प्रजानामपि भवतीत्यौडुलोमिर्मन्यते । | सत्रयागेष्वृत्विजामपि फलदर्शनादल्पं फलं प्रजानामपि भवतीत्यौडुलोमिर्मन्यते । तदर्थं देवैः क्रियमाणत्वात् ॥ 45 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,254: | Line 1,065: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (479)ओं सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ओम् ॥ 03-04-49 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,270: | Line 1,074: | ||
| text = | | text = | ||
तृतीयः स्वपक्षः । देवानां ज्ञापनादिकर्मणि सहकार्यान्तरत्वेन प्रजा विधीयन्ते । यथा प्रजावतो राज्ञः प्रजाः सहकारित्वेन विधीयन्ते । यथावाऽऽचार्यस्य शिष्याः । | तृतीयः स्वपक्षः । देवानां ज्ञापनादिकर्मणि सहकार्यान्तरत्वेन प्रजा विधीयन्ते । यथा प्रजावतो राज्ञः प्रजाः सहकारित्वेन विधीयन्ते । यथावाऽऽचार्यस्य शिष्याः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,277: | Line 1,080: | ||
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‘ज्ञानादिदानं देवानां विष्णुना साधु चोदितम् | वाराहे च – | ||
‘ज्ञानादिदानं देवानां विष्णुना साधु चोदितम् ।वेदे च तेषां विहितं तत्राचार्यो महत्तरः ॥विहितः सहकारित्वे सहकार्यन्तरं प्रजाः ।पातृत्वेन यथा राज्ञो यथा शिष्या गुरोरपि ॥तस्माच्छ्रुतं फलं तासामाचार्याणां महत्तरम् ।ततो महत्तरं प्रोक्तं देवानामुत्तरोत्तरम्’ ॥ इति ॥ 46 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,304: | Line 1,091: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (480)ओं कृत्स्नभावात् तु गृहिणोपसंहारः ओम् ॥ 03-04-47 ॥ | ||
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| Line 1,312: | Line 1,099: | ||
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‘कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधत्’ इत्युक्त्वा ‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते’ इति गृहिणोपसंहारः क्रियते । | ‘कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधत्’() इत्युक्त्वा ‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते’(छां.उ.८.१४) इति गृहिणोपसंहारः क्रियते । तस्माद् गृहस्तस्यैवोत्तमत्वम् ? इति न वाच्यम् । यतः कृत्स्नगृहस्थान् देवानपेक्ष्यैवोपसंहारः क्रियते । | ||
यतः कृत्स्नगृहस्थान् देवानपेक्ष्यैवोपसंहारः क्रियते । | |||
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‘कृत्स्ना ह्येते गृहिणो देवाः कृत्स्ना एते यतयोऽत | ‘कृत्स्ना ह्येते गृहिणो देवाः कृत्स्ना एते यतयोऽत एषां न पुत्रा दायमुपयन्ति न चैते गृहान् विसृजन्त्यरागा अद्वेषा अलोभाः सर्वभोगाः सर्वज्ञाः सर्वकर्तारः’ इति पौत्रायणश्रुतिः ॥ 47 ॥ | ||
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| Line 1,334: | Line 1,114: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (481)ओं मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ओम् ॥ 03-04-48 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (482)ओम् अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ओम् ॥ 49-482 ॥ | ||
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| Line 1,381: | Line 1,147: | ||
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‘एतां विद्यामदीत्य ब्रह्मदर्शी वाव भवति । स एतां मनुष्येषु विब्रूयात् । यथा यथा ह वै ब्रूयात् तथा तथाऽधिको भवति’ | ‘एतां विद्यामदीत्य ब्रह्मदर्शी वाव भवति । स एतां मनुष्येषु विब्रूयात् । यथा यथा ह वै ब्रूयात् तथा तथाऽधिको भवति’ । इति माठरश्रुतौ विद्यादानं श्रूयते । | ||
इति माठरश्रुतौ विद्यादानं श्रूयते । तच्च बहूनां स्वीकरणार्थमाविष्कारेणेति न मन्तव्यम् । | तच्च बहूनां स्वीकरणार्थमाविष्कारेणेति न मन्तव्यम् । अन्वयाद्युक्तेः । अविष्कारेऽयोग्यानामपि स्वीकारप्राप्तिः । | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘मा नः स्तेनेभ्यो यो अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु | तच्च विषिद्धम् – | ||
‘मा नः स्तेनेभ्यो यो अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः।येषां नैतन्नापरं कि च नैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यं कदाचित्’(ऋ.सं.२.२३.१३) ॥ | |||
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| Line 1,397: | Line 1,163: | ||
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अथो (प)शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।आदेवानामोहते विव्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’(ऋ.सं.२.२३.१४) इति । | |||
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विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मां | विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मां शेवधिष्टेऽहमस्मि ।अनार्यकायानृजवे शठाय न मां ब्रूया ऋजवे ब्रूहि नित्यम्’() इति च ॥ 49 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (483)ओम् ऐहिकमप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ओम् ॥ 50-483 ॥ | ||
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‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः’ | ‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः’(बृ.उ.४.४.५) इति दर्शनार्थं श्रवणादि विधीयते । तच्च दर्शनमैहिकमेव प्रारब्धप्रतिबन्धाभावे । | ||
इति दर्शनार्थं श्रवणादि विधीयते । तच्च दर्शनमैहिकमेव | |||
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‘श्रुत्वाऽऽत्मानं मतिपूर्वं | ‘श्रुत्वाऽऽत्मानं मतिपूर्वं ह्युपास्य इहैव दृष्टिं परमस्य विन्देत् ।यद्यारब्धं कर्म निबन्धकं स्यात् प्रेत्यैव पश्येद्योगमेवान्ववेक्ष्य’ ॥ इति सौपर्णश्रुतौ दर्शनात् । | ||
इति सौपर्णश्रुतौ दर्शनात् । | |||
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‘अनादिजन्मसम्बन्धं निर्भेत्तुं पापपञ्जरम् | ‘अनादिजन्मसम्बन्धं निर्भेत्तुं पापपञ्जरम् ।यावत्या सेवया शक्यं तावत् कार्यं न संशयः॥यावद्दूरे स्थितो गम्यात् तावद्गन्तव्यमेव हि ।इह जन्मान्तरे वाऽपि तावत्यैव तु दर्शनम् ॥श्रवणं मननं चैव निधिध्यासनमेव च ।परे गुरौ च या भक्तिः परिचर्यादिकं हरेः ॥एषा सेवेति सम्प्रोक्ता यया तद्दर्शनं भवेत्’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 50 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (484)ओम् एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थावधृतेस्तदवस्थावधृतेः ओम् ॥ 03-04-51 ॥ | ||
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एवमेव प्रारब्धकर्माभावे शरीरपातानन्तरमेव मोक्षः; तद्भावे जन्मान्तराणीत्यनियमः । | |||
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‘धर्मी स्वर्गं विधर्मी निरयमेत्येव ब्रह्मसंस्थोऽमृतमेत्येव ब्रह्मसंस्थोऽमृतम्’ इति ब्रह्मसंस्थस्य मोक्षस्यैवावधारणात् । | |||
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॥ इति | ‘विद्वानमृतमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।अवसन्नं यदारब्दं कर्म तत्रैव गच्छति ॥न चेद्बहूनि जन्मानि प्राप्यैवान्ते न संशयः’ ॥ इति च नारायणाध्यात्मे ॥ 51 ॥ | ||
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॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ 03-04॥ | |||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायः (साधनाध्यायः) ॥ 03 ॥ | |||
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Revision as of 09:39, 10 April 2026
ज्ञानसामर्थ्यमस्मिन् पाद उच्यते –
पुरुषार्थाधिकरणम्
(434)ओं पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति बादरायणः ओम् ॥ 03-04-01 ॥
यद्दर्शनार्थमुपासनोक्ता तस्माद् दर्शनात् सर्वपुरुषार्थप्राप्तिरिति बादरायणो मन्यते ।
‘यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् । तं तं लोकं जायते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः’(मुं.उ.३.१.१०)इति शब्दात् ॥ 01 ॥
(435)ओं शेषत्वात् पुरुषार्थवादो यथाऽन्येष्विति जैमिनिः ओम् ॥ 03-04-02 ॥
अस्त्येव मोक्षसाधनत्वं ज्ञानस्य । स्वर्गादिषु तत्साधनकर्मशेषत्वेन ।
‘स्वर्गं धनाद् देहतो वै गृहाच्च प्राप्स्यन्ति धीरा न त्वधीराः कुतश्चित्’ इति वदति जैमिनिः ॥ 02 ॥
(436)ओम् आचारदर्शनात् ओम् ॥ 03-04-03 ॥
ज्ञानिनामेव देवादीनामाचारदर्शनात् ॥ 03 ॥
(437)ओं तच्छ्रुतेः ओम् ॥ 03-04-04 ॥
‘यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति’(छां.उ.१.१.१०) इति शेषत्वश्रुतेः ॥ 04 ॥
(438)ओं समन्वारम्भणात् ओम् ॥ 03-04-05 ॥
‘कर्मैव देहं दैविकं मानुषं वाऽप्यन्वारभेत् नापरस्तत्र हेतुः ।भोगांस्तदीयांश्च यथाविभागं ददाति कर्मैव शुभाशुभं यत्’इति माठरश्रुतेश्च ।
संशब्द प्राधान्यं दर्शयति ॥ 05 ॥
(439)ओं तद्वतो विधानात् ओम् ॥ 03-04-06 ॥
‘ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत्’ इति कमठश्रुतौ ज्ञानतोऽपि विधानात् ॥ 06 ॥
(440)ओं नियमाच्च ओम् ॥ 03-04-07 ॥
‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जीजीविषेच्छतं समाः ।एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे’(ई.उ.२) इति ॥ 07 ॥
(441)ओम् अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ओम् ॥ 03-04-08॥
‘ज्ञानादेव स्वर्गो ज्ञानादेवापवर्गो ज्ञानादेव सर्वे कामाः सम्पद्यन्ते ।तथापि यथा यथा कर्म कुरुते तथा तथाऽधिको भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः,युधिष्ठिरादीनां राजसूयादिना फलाधिक्यदर्शनाच्चेति बादरायणमतम् ॥ 08 ॥
(442)ओं तुल्यम् तु दर्शनम् ओम् ॥ 03-04-09 ॥
राजसूयादिकृतावकृतौ च सममेव तेषां विज्ञानम् ।
‘विज्ञातमेतत् सर्वेषां मुनीनां ब्रह्मदर्शनात् ।स्यादेव मोक्षो नान्यस्मादिति तत्रापि चित्रता ॥स्वर्गादयः कर्मणैव नान्येनेत्यपरे विदुः ।ज्ञानेनाऽधिक्यमित्याहुर्जैमिन्याद्यास्तु केचन ॥अदृष्टमेव ज्ञानेन दृष्टं नैवोपलभ्यते ।इति केचिद्विदः प्राहुर्व्यासशिष्या इमेऽखिलाः ॥यस्माद् व्यासमतं सर्वं सत्यमेव ततोऽखिलम् ।यथाऽऽकाशस्त्वनन्तोऽपि व्यामो हस्तावधिस्तथा ।प्रादेशोऽपि हि सत्येन तथैतेषां मतानि तु ॥स्वयं तु भगवान् व्यासो व्याप्तज्ञानमहांशुमान् ।अनन्ताकाशवत् पश्यन् निखिलं पुरुषोत्तमः ॥ज्ञानेनैवाप्यते सर्वं कर्मणा त्वधिकं भवेत् ।इति प्राह महायोगी पुमर्थानां विनिर्णयम्’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
‘ज्ञानिनामपि देवानां विशेषः कर्मभिर्भवेत् ।चीर्णीऽकृते वा ज्ञानस्य न विशेषोऽस्ति कर्मणि’ इति ब्रह्मतर्के ॥ 09 ॥
अधिकाराधिकरणम् (असार्वत्रिकाधिकरणम्)
(443)ओम् असार्वत्रिकी ओम् ॥ 03-04-10 ॥
सर्वेषां पुरुषार्थापेक्षित्वाज्ज्ञानाधिकारितेत्यत आह –
न सर्वेषामधिकारः ॥ 10 ॥
(444)ओं विभागः शतवत् ओम् ॥ 03-04-11 ॥
‘नवकोट्यो हि देवानां तेषां मध्ये शतस्य तु ।सोमाधिकारो वेदोक्तो ब्रह्मणी द्वे शताधिके ॥यथा तथैवा सङ्ख्येयाः प्रजास्तासु कियान् जनः ।ज्ञानाधिकारी सम्प्रोक्तो विष्णुपादैकसंश्रयः’()
इति वचनात् सुखापेक्षासाम्येऽपि विभाग इष्यतेऽधिकारार्थम् ॥ 11 ॥
(445)ओम् अध्ययनमात्रवतः ओम् ॥ 03-04-12 ॥
कस्याधिकारः?
‘अवैष्णवस्य वेदेऽपि ह्यधिकारो न विद्यते ।गुरुभक्तिविहीनस्य शमादिरहितस्य च ॥न च वर्णावरस्यापि तस्मादध्ययनान्वितः ।ब्रह्मज्ञाने तु वेदोक्तेऽप्यधिकारी सतां मतः’ ॥ इति हि ब्रह्मतर्के ॥
‘पठेद् वेदानथार्थानधीयीताथ विचार्य ब्रह्म विन्देत्’ इति च कौषारवश्रुतिः ॥ 12 ॥
अधिकारविशेषाधिकरणम् (अविशेषाधिकरणम्)
(446)ओं नाविशेषात् ओम् ॥ 03-04-13 ॥
न सामान्येनाधिकारो देवादीनाम् ।
‘अथ पुमर्थसाधनान्यर्थो धर्मो ज्ञानमित्युत्तरोत्तरम् ।तत्राधिकारिणो मनुष्या ऋषयो देवा इत्युत्तरोत्तरम्’इति कौण्डिन्यश्रुतिः॥ 13 ॥
कामचाराधिकरणम् (स्तुत्यधिकरणम्)
(447)ओं स्तुतयेऽनुमतिर्वा ओम् ॥ 14-447 ॥
‘अथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एव’(बृ.उ.५.५.१) इति ज्ञानिनो यथेष्टाचरणं विधीयत इत्यत आह-
न विधिः । ज्ञानिनः स्तुतयेऽनुमतिमात्रं वा । युज्यते च ॥ 14 ॥
(448)ओं कामकारेण चैके ओम् ॥ 03-04-15 ॥
‘कामाचाराः कामभक्षाः कामवादाः कामेनैवेमं देहमुत्सृज्याथ परात् परमीयुरनारम्भणम्’(सामशाखा) इति चैके पठन्ति ॥ 15 ॥
(449)ओम् उपमर्दं च ओम् ॥ 03-04-16 ॥
‘ओमित्युच्चार्यान्तरिममात्मानमभिपश्योपमृद्य पुण्यं च पापं च काममाचरन्तो ब्रह्मानुव्रजन्ति’ इति च तुरश्रुतौ ॥ 16 ॥
(450)ओम् ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ओम् ॥ 03-04-17 ॥
न तावता कामचाराणां ज्ञानेऽधिकारः ।
‘य इमं परमं गुह्यमूर्ध्वरेतस्सु भाषयेत् ।न तथा विद्यते भूयान् यं प्राप्यन्येऽपि भूयसः’इति माठरश्रुतेः ॥ 17 ॥
(451)ओं परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदति हि ओम् ॥ 03-04-18 ॥
‘प्रातरुत्थाय सन्ध्यामुपासीत यत् सन्ध्यामुपासते ब्रह्मैव तदुपासतेऽथ देवान् नमेत् जुहुयाद् वेदानावर्तयीत नान्यत् किञ्चिदाचरेन्न सुरां पिबेन्न पलाण्डुं भक्षयीत न भृषं वेदेन्न विस्मरेताऽत्मानं सोमं पिबेद्धुतशेषेण वर्तयेत्’()
इत्युक्ताचारपरामर्शेन विधिबन्धवर्जितत्वेन कामत एव तस्य चरणं कामचार इति जैमिनिर्मन्यते ।
न च निषिद्धं कर्म कर्तव्येमेवेति चोदना । ‘ब्राह्मणो न हन्तव्यः’() इत्याद्यपवादश्च ॥ 18 ॥
(452)ओम् अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ओम् ॥ 03-04-19 ॥
अनुष्ठेयानां मध्य एव कामतश्चरणं कामतो निवृत्तिरिति बादरायणो मन्यते । ‘केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एव’(बृ.उ.५.५.१) इति साम्यश्रुतेः ।
‘यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते’(भ.गी.३.१७) इति भगवद्वचनाच्च ॥ 19 ॥
(453)ओं विधिर्वा धारणवत् ओम् ॥ 03-04-20 ॥
‘केन स्याद् येन स्यात्’(बृ.उ.५.५.१) इति विधिर्वा । यथा वेदधारणं त्रैवर्णिकानां विहितं नान्येषाम्, एवं स्वमतानुसारिणी प्रवृत्तिर्ज्ञानिनां विहिता ।
न तत्राधर्मशङ्का कार्या, नान्येषामिति वा ।
‘स्वेच्छयैव प्रवृत्तिस्तु ब्रह्मणो विधिचोदना ।नाशङ्क्यं तन्मतं क्वापि विष्णोः प्रत्यक्षचोदना ।इतरेषां न विहिता स्वेच्छावृत्तिः कथञ्चन’ इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥
(454)ओं स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ओम् ॥ 03-04-21 ॥
स्तुतिमात्रमेव स्वेच्छाचरणं, न विधिः, तैरपि सामान्यविधिस्वीकारादिति चेत्, न । अपूर्वत्वात् परवशत्वात् ।
सर्वविध्यतिक्रमेण स्तुतिमात्रविषयत्वं परब्रह्मण एव हि ।
‘विधीनां विषयास्त्वन्ये ब्रह्मणः स्वेच्छया कृतौ ।परस्य ब्रह्मणो ह्येव सर्वविध्यतिदूरता’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 21 ॥
(455)ओं भावशब्दाच्च ओम् ॥ 03-04-22 ॥
‘यथाविधानमपरे विधिर्भावे प्रजापतेः । ब्रह्मणः परमस्यैव सर्वविध्यतिदूरता’ इति च तुरश्रुतौ ॥ 22 ॥
(456)ओं पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ओम् ॥ 03-04-23 ॥
‘केन स्याद् येन स्यात्’(बृ.उ.५.५.१) इत्यादयः स्थिरत्वनिवृत्त्यर्था इति चेत्, न ।
‘त्रेधा हि ज्ञानिनो विधिनियता अनियताः स्वेच्छानियता इति ।विधिनियता मनुष्या अनियता हि देवा ब्रह्मैव स्वेच्छानियतः’इति गौपवनश्रुतौ विशेषितत्वात् ॥ 23 ॥
(457)ओं तथा चैकवाक्योपबन्धात् ओम् ॥ 03-04-24 ॥
एवं सति विधिवाक्यानां स्वेच्छावृत्तिवाक्यानां (च) सम्बन्धो भवति ॥ 24 ॥
(458)ओम् अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ओम् ॥ 03-04-25 ॥
अत एव ज्ञानस्य मोक्षादाने नाग्निहोत्राद्यपेक्षा ।
ब्रह्मतर्के च –
‘येषां ज्ञानं समुत्पन्नं तेषां मोक्षो विनिश्चितः ।शुभकर्मभिराधिक्यं विपरीतैर्विपर्ययः ॥स्वेच्छानुवृत्यैव भवेद् ब्रह्मणः प्रायशस्तथा ।देवानामपि सर्वेषां विशेषादुत्तरोत्तरम्’() इति ॥ 25 ॥
(459)ओं सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ओम् ॥ 03-04-26 ॥
सर्वधर्मापेक्षा च ज्ञानस्येत्पत्तौ ‘विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन’(बृ.उ.६.४.२२) इति श्रुतेः ।
यथा गतिनिष्पत्यर्थमश्वादयोऽपेक्ष्यन्ते न निष्पन्नगतेर्ग्रामादिप्राप्तौ ॥ 26 ॥
(460)ओं शमदमाद्युपेतः स्यात् तथाऽपि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ओम् ॥ 03-04-27 ॥
यद्यपि ज्ञानेनैव मोक्षो नियतस्तथाऽपि ज्ञानी शमदमाद्युपेतः स्यात्।‘आचार्याद्विद्यामवाप्यैतमात्मानमभिपश्य शान्तो भवेद् दान्तो भवेदनुकूलो भवेदाचार्यं परिचरेत् परिचरेदाचार्यम्’ इति माठरश्रुतौ ज्ञानिनोऽपि तद्विधेः ।
‘ब्राह्मीं वाव त उपनिषदब्रूम’ इति । तस्यैतपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् । यो वा एतामुपनिषदमेवं वेद’(केन.उ.४.७,८,९)इति ज्ञानाङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ।
‘यस्य ज्ञानं तस्य मोक्ष इति नात्र विचारणा ।तस्य शान्त्यादयोऽङ्गानि तस्मात् तेषामनिष्ठितिः ॥अवश्यकरणीया स्यादन्यथाऽल्पफलं भवेत्’इति च आग्नेये ।
तुशब्दः पूर्णफलार्थत्वं सूचयति ॥ 27 ॥
(461)ओं सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ओम् ॥ 03-04-28 ॥
‘यदि ह वा एवंविन्निखिलं भक्षयीत एवमेव स भवति’ इति सर्वान्नानुमतिः प्राणात्ययविषया । ‘न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म उदपानम्’(छां.उ.१.१०.४)इति दर्शनात् ॥ 28 ॥
(462)ओम् अबाधाच्च ओम् ॥ 03-04-29 ॥
‘अन्यायचरणाभावे न हि ज्ञानस्य बाधनम् ।अतो विद्वानपि न्यायं वर्तेतोत्कर्षसिद्धये’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 29 ॥
(463)ओम् अपि स्मर्यते ओम् ॥ 03-04-30 ॥
‘अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।एतादृशोऽपि नाऽचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्’ इति हरिवंशेषु ॥ 30 ॥
(464)ओं शब्दश्चातोऽकामचारे ओं॥ 03-04-31 ॥
‘स य एतदेवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन् न कामचरितं चरेन्न कामं भक्षयीत न काममनुवर्तेत’ इति कौण्डन्यश्रुतौ ।
अत इत्यल्पफलत्वं सूचयति । ‘न निषिद्धानि वर्तेत पूर्णज्ञानफलेच्छया’ इति पाद्मे ॥ 31 ॥
(465)ओं विहितत्वाच्चाऽश्रमकर्मापि ओम् ॥ 03-04-32 ॥
न केवलं निषिद्धाकरणेन पूर्यते । कर्तव्यं च वर्णाश्रमविहितं कर्म ॥
‘पश्यन्नपीममात्मानं कुर्यात् कर्मविचारयन्।यदात्मानः सुनियतमानन्दोत्कर्षमाप्नुयात्’ ॥ इति कौषारवश्रुतौ विहितत्वाच्च । अपिशब्दो वर्णधर्मसमुच्चयार्थः ॥ 32 ॥
(466)ओं सहकारित्वेन च ओम् ॥ 03-04-33॥
‘यथा राज्ञः सहकार्येव मन्त्री तथाऽप्यृते तं क्षितिपः कार्यमृच्छेत् ।एवं ज्ञानं कर्म विनाऽपि कार्यं सहायभूतं न विचारः कुतश्चित्’ ॥इति कमठश्रुतौ सहकारित्वोक्तेश्च ।
‘ज्ञानान्मोक्षो भवेत्येव सर्वकार्यकृतोऽपि तु ।आनन्दो ह्रसतेऽकार्याच्छुभं कृत्वा च वर्धते’ इति च ब्रह्माण्डे ॥
‘सर्वदुःखनिवृत्तिश्च ज्ञानिनो निश्चितैव हि ।उपासया कर्मभिश्च भक्त्या चानन्दचित्रता’ इति च बृहत्तन्त्रे ॥
‘धर्मस्वरूपचित्रत्वाद्यो यो देवमनोगतः ।स एव धर्मो विज्ञेयो न ह्येते लोकसम्मिताः’ इति च पाद्मे ॥ 33 ॥
उभयलिङ्गाधिकरणम्
(467)ओं सर्वथाऽपितु त एवोभयलिङ्गात् ओम् ॥ 03-04-34 ॥
सर्वप्रकारेणोत्साहेऽपि ये ज्ञानयोग्यास्त एव ज्ञानं प्राप्नुवन्ति नान्ये ।
‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः’(छां.उ.८.७.३)
इति श्रुत्याऽऽचार्योपदेशसाम्येऽपि विरोचनो विपरीतज्ञानमापेन्द्रः सम्यज्ज्ञानमित्युभयविधलिङ्गात् ॥ 34 ॥(468)ओम् अनभिभवं च दर्शयति ओम् ॥ 03-04-35 ॥
‘दैवीमेव सम्पत्तिं देवा अभिगच्छन्त्यासुरीमेव चासुरा नैतयोरभिभवः कदाचित् स्वभाव एव ह्यवतिष्ठते’() इति स्वभावानभिभवं च दर्शयति ॥ 35 ॥
(469)ओम् अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ओम् ॥ 03-04-36 ॥
सम्यज्ज्ञानविपरीतज्ञानयोरन्तरा स्थितानामपि देवासुरभावयोर्दार्ढ्यदृष्टेः॥ 36 ॥
(470)ओम् अपि स्मर्यते ओम् ॥ 03-04-37 ॥
‘असुरा आसुरेणैव स्वभावेन च कर्मणा । ज्ञानेन विपरीतेन तमो यान्ति विनिश्चयात् ॥देवा दैवस्वभावेन कर्मणा चाप्यसंशयम् । सम्यज्ज्ञानेन परमां गतिं गच्छन्ति वैष्णवीम् ॥नानयोरन्यथाभावः कदाचित् क्वापि विद्यते । मानुषा मिश्रमतयो विमिश्रगतयोऽपि च’ इति स्कान्दे ॥ 37 ॥
(471)ओं विशेषानुग्रहं च ओम् ॥ 03-04-38 ॥
शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः ।एधमानद्विडुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्’(ऋ.सं.६.४७.१६)
इति विशेषानुग्रहं च दर्शयति देवेषु परमेश्वरस्य।
‘असुरान् दमयन् विष्णुः स्वपदं च सुरान् नयन् ।पुनः पुनर्मानुषांस्तु सृतावावर्तयत्यसौ’इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 38 ॥
(472)ओम् अतस्त्वितरज्ज्यायोलिङ्गाच्च ओम् ॥ 03-04-39 ॥
देवभागादसुरभाग एव बहुलः । ‘तस्मान्न जनतामियात्’(बृ.उ.३.३.२०) इति लिङ्गात् ।
चशब्दात् -‘ततः कनीयासा एव देवा ज्यायासा असुराः’(बृ.उ.३.३.१) इति श्रुतेश्च ।
‘असुरा बहुला यस्मात् तस्मान्न जनतामियात्’ इति च ब्राह्मे ॥ 39 ॥
(473)ओं तद्भूतस्य तु तद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाभावेभ्यः ओम् ॥ 03-04-40 ॥
असुरजातेरेवासुरत्वं देवजातेरेव देवत्वं जैमिनेरपि सिद्धमेव।
‘नासुरा दैवीं न देवा आसुरीं न मनुष्या दैवीमासुरीं च गतिमीयुरात्मीयामेव जातिमनुभवन्ति’(ऐ(ए).आ.२.१.८) इति नियमश्रुतेः ।
‘नासुराणां दैवं रूपं न देवानामासुरं न चोभयं मनुष्याणां यो यद्रूपः स तद्रूपो निसर्गो ह्येष भवति’ इत्यतद्रूपत्वश्रुतेः ।
‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाऽप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रशस्वित्यभूतिरित्यसुरासेते ह पराबभूवुः’(ऐ.आ.२.१.८) इति देवासुराणां भावाभावश्रुतेश्च ।
देवानां भूतिरित्येव मनो विष्णौ स्वभावतः ।असुराणामभूतित्वेनैतन्नेयमतोऽन्यथा ॥
‘देवाः शापाभिभूतत्वात् प्रह्लादाद्या बभूविरे ।अतः सुगतिरेतेषां नान्यथा व्यत्ययो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ॥ 40 ॥
अधिकारिकाधिकरणम्
(474)ओं न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात् तदयोगात् ओम् ॥ 03-04-41 ॥
न च परमात्मैश्वर्यादिकमाकाङ्क्ष्यम्, ब्रह्मादीनामपि नाकाङ्क्षयं, किमुपरस्येति सूचयितुमपिशब्दः । चशब्दस्तु ज्ञानार्थीनां पूर्वोक्तादित्थम्भावान्तरसूचकः । अयोग्यमारोढुं प्रयतन् प्रपतन् हि दृश्यते । एवमयोगस्य परमात्मैश्वर्यस्य ब्रह्मादिपदस्य चाकाङ्क्षायां पतनमनुमीयते ।
‘न देवपदमन्विच्छेत् कुत एव हरेर्गुणान् ।इच्छन् पतति पूर्वस्मादधस्ताद्यत्र नोत्थितिः’ इति ब्रह्माण्डे ।
‘स्वकीयमिच्छमानं तु राजाद्याः पातयन्ति हि । एवमेव सुराद्याश्च हरिश्च स्वपदेच्छुकम्’ ॥ इत्याद्यनुमानरूपवाक्याच्च ।।
‘मायाभिरुत्सिसृप्सत इन्द्र द्यामारुरुक्षत ।अवदस्यूँरधूनुथाः’(ऋ.सं.८.१४.१४) इति च श्रुतिः॥
(475)ओम् उपपूर्वमपीत्येके भावशमनवत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-04-42 ॥
उपदेवपदं च नापेक्षमित्येके । भावशमनवत्, ऋष्टिपदवदेव । तच्चोक्तमिन्द्रद्युम्नश्रुतौ –‘अथ यथर्षीन् प्रजापतीन् नाकाङ्क्षेदेवं न गन्धर्वान् न विद्याधरान् न सिद्धान्’ इति।
बृहत्संहितायां च –‘न दैवानभिकाङ्क्षेत कुत एव हरेर्गुणान् ।प्राजापत्यान् न चार्षांश्च गान्धर्वादीनपि क्वचित् ॥ऋष्यादिषु विशेषे तु दोषो नैवाविशेषतः’ ॥ इति विशेषदर्शनार्थमेक इत्युक्तम् ॥ 42 ॥
(476)ओं बहिस्तूभयथाऽपि स्मृतेराचाराच्च ओम् ॥ 03-04-43 ॥
देवर्षिगन्धर्वादिपदेभ्योऽन्यत्र शुभविषय आकाङ्क्षायामनाकाङ्क्षायां च न पतनम् ।
‘देवर्षिगन्धर्वाणां पदाकाङ्क्षी पतेत् ध्रुवम् ।अन्यत्र शुभमाकाङ्क्षन् न पतेदविरोधतः’ इति स्मृतेः ॥
‘नानात्वमेव कामानां नाकामः क्व च दृश्यते ।अतोऽविरुद्धकामः स्यादकामस्तेन भण्यते’ इत्याचाराच्च ॥ 43 ॥
फलश्रुत्यधिकरणम्
(477)ओं स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ओम् ॥ 03-04-44 ॥
‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१) इत्यादि फलं स्वामिनां देवानामेव भवति ।
‘यदु किञ्चेमाः प्रजाः शुभमाचरन्ति देवा एव तदाचरन्ति यदु किं चेमाः प्रजा विजानते देवा एव तद्विजानते देवानां ह्येतद्भवति स्वामी हि फलमश्नुते नास्वामी कर्म कुर्वाणः’ ॥ इति माध्यन्दिनायनश्रुतेरित्यात्रेयो मन्यते ॥ 44 ॥
(478)ओम् आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रियते ओम् ॥ 45-478 ॥
सत्रयागेष्वृत्विजामपि फलदर्शनादल्पं फलं प्रजानामपि भवतीत्यौडुलोमिर्मन्यते । तदर्थं देवैः क्रियमाणत्वात् ॥ 45 ॥
(479)ओं सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ओम् ॥ 03-04-49 ॥
तृतीयः स्वपक्षः । देवानां ज्ञापनादिकर्मणि सहकार्यान्तरत्वेन प्रजा विधीयन्ते । यथा प्रजावतो राज्ञः प्रजाः सहकारित्वेन विधीयन्ते । यथावाऽऽचार्यस्य शिष्याः ।
वाराहे च –
‘ज्ञानादिदानं देवानां विष्णुना साधु चोदितम् ।वेदे च तेषां विहितं तत्राचार्यो महत्तरः ॥विहितः सहकारित्वे सहकार्यन्तरं प्रजाः ।पातृत्वेन यथा राज्ञो यथा शिष्या गुरोरपि ॥तस्माच्छ्रुतं फलं तासामाचार्याणां महत्तरम् ।ततो महत्तरं प्रोक्तं देवानामुत्तरोत्तरम्’ ॥ इति ॥ 46 ॥
कृत्स्नभावाधिकरणम्
(480)ओं कृत्स्नभावात् तु गृहिणोपसंहारः ओम् ॥ 03-04-47 ॥
‘कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधत्’() इत्युक्त्वा ‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते’(छां.उ.८.१४) इति गृहिणोपसंहारः क्रियते । तस्माद् गृहस्तस्यैवोत्तमत्वम् ? इति न वाच्यम् । यतः कृत्स्नगृहस्थान् देवानपेक्ष्यैवोपसंहारः क्रियते ।
‘कृत्स्ना ह्येते गृहिणो देवाः कृत्स्ना एते यतयोऽत एषां न पुत्रा दायमुपयन्ति न चैते गृहान् विसृजन्त्यरागा अद्वेषा अलोभाः सर्वभोगाः सर्वज्ञाः सर्वकर्तारः’ इति पौत्रायणश्रुतिः ॥ 47 ॥
(481)ओं मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ओम् ॥ 03-04-48 ॥
न चाश्रमद्वयमेव देवानाम् ।
‘देवाएव ब्रह्मचारिणो देवा एव गृहस्था देवा एव वनस्था यथा ह्येते मुनय एवं सर्ववर्णाः सर्वाश्रमाः सर्वं ह्येते कर्म कुर्वन्ति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ यतित्वदृष्टान्तेनान्येषामप्युपदेशात् ॥ 48 ॥
अनाविष्काराधिकरणम्
(482)ओम् अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ओम् ॥ 49-482 ॥
‘एतां विद्यामदीत्य ब्रह्मदर्शी वाव भवति । स एतां मनुष्येषु विब्रूयात् । यथा यथा ह वै ब्रूयात् तथा तथाऽधिको भवति’ । इति माठरश्रुतौ विद्यादानं श्रूयते ।
तच्च बहूनां स्वीकरणार्थमाविष्कारेणेति न मन्तव्यम् । अन्वयाद्युक्तेः । अविष्कारेऽयोग्यानामपि स्वीकारप्राप्तिः ।
तच्च विषिद्धम् –
‘मा नः स्तेनेभ्यो यो अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः।येषां नैतन्नापरं कि च नैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यं कदाचित्’(ऋ.सं.२.२३.१३) ॥
अथो (प)शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।आदेवानामोहते विव्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’(ऋ.सं.२.२३.१४) इति ।
विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मां शेवधिष्टेऽहमस्मि ।अनार्यकायानृजवे शठाय न मां ब्रूया ऋजवे ब्रूहि नित्यम्’() इति च ॥ 49 ॥
ऐहिकाधिकरणम्
(483)ओम् ऐहिकमप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ओम् ॥ 50-483 ॥
‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः’(बृ.उ.४.४.५) इति दर्शनार्थं श्रवणादि विधीयते । तच्च दर्शनमैहिकमेव प्रारब्धप्रतिबन्धाभावे ।
‘श्रुत्वाऽऽत्मानं मतिपूर्वं ह्युपास्य इहैव दृष्टिं परमस्य विन्देत् ।यद्यारब्धं कर्म निबन्धकं स्यात् प्रेत्यैव पश्येद्योगमेवान्ववेक्ष्य’ ॥ इति सौपर्णश्रुतौ दर्शनात् ।
‘अनादिजन्मसम्बन्धं निर्भेत्तुं पापपञ्जरम् ।यावत्या सेवया शक्यं तावत् कार्यं न संशयः॥यावद्दूरे स्थितो गम्यात् तावद्गन्तव्यमेव हि ।इह जन्मान्तरे वाऽपि तावत्यैव तु दर्शनम् ॥श्रवणं मननं चैव निधिध्यासनमेव च ।परे गुरौ च या भक्तिः परिचर्यादिकं हरेः ॥एषा सेवेति सम्प्रोक्ता यया तद्दर्शनं भवेत्’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 50 ॥
मुक्तिफलाधिकरणम्
(484)ओम् एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थावधृतेस्तदवस्थावधृतेः ओम् ॥ 03-04-51 ॥
एवमेव प्रारब्धकर्माभावे शरीरपातानन्तरमेव मोक्षः; तद्भावे जन्मान्तराणीत्यनियमः ।
‘धर्मी स्वर्गं विधर्मी निरयमेत्येव ब्रह्मसंस्थोऽमृतमेत्येव ब्रह्मसंस्थोऽमृतम्’ इति ब्रह्मसंस्थस्य मोक्षस्यैवावधारणात् ।
‘विद्वानमृतमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।अवसन्नं यदारब्दं कर्म तत्रैव गच्छति ॥न चेद्बहूनि जन्मानि प्राप्यैवान्ते न संशयः’ ॥ इति च नारायणाध्यात्मे ॥ 51 ॥
॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ 03-04॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायः (साधनाध्यायः) ॥ 03 ॥