Jump to content

Brahmasutra/C3/S3: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 1: Line 1:
__TOC__
<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
{{Adhyaya
| document_id  = BS
| document_id  = BS
Line 5: Line 7:
}}उपासनाऽस्मिन् पाद उच्यते। सर्वपरिज्ञानं प्रथमत उच्यते-
}}उपासनाऽस्मिन् पाद उच्यते। सर्वपरिज्ञानं प्रथमत उच्यते-


=== सर्वेवेदा(न्तप्रत्यया)धिकरणम् ===
=== सर्वेवेदाधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 12: Line 14:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ सर्ववेदान्तप्रत्ययाधिकरणम् चोदनाद्यविशेषात् ॥ 01-366
| verse_line1  = (366)ओं सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ओम् 03-03-01 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 20: Line 22:
| id      = BS_C03_S03_V01_B1
| id      = BS_C03_S03_V01_B1
| text    =
| text    =
अन्तो निर्णयः । ‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तः’ इति वचनात् । सर्ववेद निर्णयोत्पाद्यज्ञानं ब्रह्म ।’आत्मेत्येवोपासीत’ इत्यादिविधीनां तदुक्त युक्तीनां चाविशिष्टत्वात् ॥ 01 ॥
अन्तो निर्णयः । ‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तः’(भ.गी.२.१६) इति वचनात् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V01
| id      = BS_C03_S03_V01_B2
| text    =
सर्ववेद निर्णयोत्पाद्यज्ञानं ब्रह्म ।‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.३.४.७) इत्यादिविधीनां तदुक्तयुक्तीनां चाविशिष्टत्वात् ॥ 01 ॥
}}
}}


Line 28: Line 37:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = भेदान्नेति चेदेकस्यामपि ॥ 02-367
| verse_line1  = (367)ओं भेदान्नेति चेदेकस्यामपि ओम् 03-03-02 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 36: Line 45:
| id      = BS_C03_S03_V02_B1
| id      = BS_C03_S03_V02_B1
| text    =
| text    =
‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’’सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इत्यादि प्रतिशाखमुक्तिभेदान्नैकाधिकारिविषयाः सर्वशाखा इति चेन्न । एकस्यामपि शाखायां’आत्मेत्येवोपासीत’‘ॐ खं ब्रह्म’ इत्यादिभेददर्शनात् ॥ 02 ॥
‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृ.उ.५.९.२८)‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१) इत्यादि प्रतिशाखमुक्तिभेदान्नैकाधिकारिविषयाः सर्वशाखा इति चेन्न ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V02
| id      = BS_C03_S03_V02_B2
| text    =
एकस्यामपि शाखायां ‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.३.४.७)‘कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छां.उ.४.१०.५) इत्यादिभेददर्शनात् ॥ 02 ॥
}}
}}


Line 44: Line 60:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च ॥ 03-368
| verse_line1  = (368)ओं स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च ओम् ॥ 03-03-03
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 52: Line 68:
| id      = BS_C03_S03_V03_B1
| id      = BS_C03_S03_V03_B1
| text    =
| text    =
‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इति सामान्यविधेः । हिशब्दात्वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना’इति स्मृतेः ।
‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’(तै.आ.२.१५) इति सामान्यविधेः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V03
| id      = BS_C03_S03_V03_B2
| text    =
हिशब्दात् वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना’इति स्मृतेः ।
}}
}}


Line 59: Line 82:
| id      = BS_C03_S03_V03_B3
| id      = BS_C03_S03_V03_B3
| text    =
| text    =
‘सर्ववेदोक्तमार्गेण कर्म कुर्वीत नित्यशः
‘सर्ववेदोक्तमार्गेण कर्म कुर्वीत नित्यशः ।आनन्दो हि फलं यस्माच्छाखाभेदो ह्यशक्तिजः ॥
आनन्दो हि फलं यस्माच्छाखाभेदो ह्यशक्तिजः ॥
}}
}}


Line 67: Line 89:
| id      = BS_C03_S03_V03_B5
| id      = BS_C03_S03_V03_B5
| text    =
| text    =
सर्वकर्मकृतौ यस्मादशक्ताः सर्वजन्तवः
‘सर्वकर्मकृतौ यस्मादशक्ताः सर्वजन्तवः ।शाखाभेदं कर्मभेदं व्यासस्तस्मादचीक्लृपत्’()
शाखाभेदं कर्मभेदं व्यासस्तस्मादचीक्लृपत्’
इति समाचारे सर्वेषामधिकाराच्च ॥ 03 ॥
इति समाचारे सर्वेषामधिकाराच्च ॥ 03 ॥
}}
}}
Line 77: Line 98:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सलिलवच्च तन्नियमः ॥ 04-369
| verse_line1  = (369)ओं सलिलवच्च तन्नियमः ओम् 03-03-04 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 85: Line 106:
| id      = BS_C03_S03_V04_B1
| id      = BS_C03_S03_V04_B1
| text    =
| text    =
यथा सर्वं सलिलं समुद्रं गच्छत्येवं सर्वाणि वचनानि ब्रह्मज्ञानार्थानीति नियमः ।
यथा सर्वं सलिलं समुद्रं गच्छति एवं सर्वाणि वचनानि ब्रह्मज्ञानार्थानीति नियमः ।
}}
}}


Line 93: Line 114:
| text    =
| text    =
आग्नेये च –
आग्नेये च –
‘यथा नदीनां सलिलं शक्ये सागरगं भवेत्
‘यथा नदीनां सलिलं शक्ये सागरगं भवेत् ।एवं वाक्यानि सर्वाणि पुंशक्त्या ब्रह्मवित्तये’() इति ॥ 04 ॥
एवं वाक्यानि सर्वाणि पुंशक्त्या ब्रह्मवित्तये’ इति ॥ 04 ॥
}}
}}


Line 102: Line 122:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = दर्शयति च ॥ 05-370
| verse_line1  = (370)ओं दर्शयति च ओम् 03-03-05 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V05
| id      = BS_C03_S03_V05_author-note
| text    =
॥ इति सर्वेवेदा(न्तप्रत्यया)धिकरणम् ॥ 01 ॥
}}
}}


Line 117: Line 130:
| id      = BS_C03_S03_V05_B1
| id      = BS_C03_S03_V05_B1
| text    =
| text    =
‘सर्वैश्च वेदैः परमो हि देवो जीज्ञास्योऽसौ नाल्पवेदैः प्रसिद्ध्येत् ।तस्मादेनं सर्वेवेदानदीत्य विचार्य च ज्ञातुमिच्छेन्मुमुक्षुः’ इति चतुर्वेदशिखायाम्
‘सर्वैश्च वेदैः परमो हि देवो जीज्ञास्योऽसौ नाल्पवेदैः प्रसिद्ध्येत् ।तस्मादेनं सर्वेवेदानदीत्य विचार्य च ज्ञातुमिच्छेन्मुमुक्षुः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ।‘सर्वान् वेदान् सेतिहासान् सपुराणान् सयुक्तिकान् ।सपञ्चरात्रान् विज्ञाय विष्णुर्ज्ञेयो न चान्यथा’इति ब्रह्मतर्के ॥ 05 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V05
| id      = BS_C03_S03_V05_B4
| text    =
‘सर्वान् वेदान् सेतिहासान् सपुराणान् सयुक्तिकान् ।सपञ्चरात्रान् विज्ञाय विष्णुर्ज्ञेयो न चान्यथा’इति ब्रह्मतर्के ॥ 05 ॥
}}
}}


Line 134: Line 140:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत् समाने च ॥ 06-371
| verse_line1  = (371)ओम् उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत् समाने च ओम् 03-03-06 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 163: Line 169:
| id      = BS_C03_S03_V06_B5
| id      = BS_C03_S03_V06_B5
| text    =
| text    =
आग्नेये च-
आग्नेये च-विधिशेषाणि कर्माणि सर्ववेदोदितान्यपि ।यथा कार्याणि सर्वैश्च सर्वाण्येवाविशेषतः ॥एवं सर्वगुणान् सर्वदोषाभावांश्च यत्नतः ।योजयित्वैव भगवानुपास्यो नान्यथा क्वचित्’ ॥ इति ॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V06
| verse_id = BS_C03_S03_V06
| id      = BS_C03_S03_V06_B6
| id      = BS_C03_S03_V06_B10
| text    =
| text    =
विधिशेषाणि कर्माणि सर्ववेदोदितान्यपि
समानविषये चोपसंहारः न तु ‘सोऽरोदीत्’(तै.सं.१.५.१) इत्यादिनाम् ।गुणैरेव स तूपास्यो नैव दोषैः कथञ्चन।गुणैरपि न तूपास्यो यो पूर्णत्वविरोधिनः’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06
यथा कार्याणि सर्वैश्च सर्वाण्येवाविशेषतः
}}
}}


{{Bhashyam
{{VerseBlock
| verse_id = BS_C03_S03_V06
| id      = BS_C03_S03_V06_B8
| text    =
एवं सर्वगुणान् सर्वदोषाभावांश्च यत्नतः ।
योजयित्वैव भगवानुपास्यो नान्यथा क्वचित्’ इति ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V06
| id      = BS_C03_S03_V06_B10
| text    =
समानविषये चोपसंहारः । न तु’सोऽरोदीत्’ इत्यादिनाम् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V06
| id      = BS_C03_S03_V06_B11
| text    =
गुणैरेव स तूपास्यो नैव दोषैः कथञ्चन।गुणैरपि न तूपास्यो यो पूर्णत्वविरोधिनः’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S03_V07
| verse_id      = BS_C03_S03_V07
| document_id  = BS
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥ 07-372
| verse_line1  = (372)ओम् अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ओम् 03-03-07 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 209: Line 192:
| id      = BS_C03_S03_V07_B1
| id      = BS_C03_S03_V07_B1
| text    =
| text    =
‘आत्मेत्येवैपासीत’ इतिशब्दादुपसंहारस्यान्यथात्वमिति चेन्न । एते गुणा नोपास्य इति विशेषवचनाभावात् ।
‘आत्मेत्येवैपासीत’(बृ.उ.३.४.७) इतिशब्दादुपसंहारस्यान्यथात्वमिति चेत्,
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V07
| verse_id = BS_C03_S03_V07
| id      = BS_C03_S03_V07_B2
| id      = BS_C03_S03_V07_B1
| text    =
| text    =
‘सर्वैर्गुणैरेक एवेशिताऽसावुपासितव्यो न तु दोषैः कदाचित्’ इति विशेषवचनाच्च ।
न। एते गुणा नोपास्य इति विशेषवचनाभावात् । ‘सर्वैर्गुणैरेक एवेशिताऽसावुपासितव्यो न तु दोषैः कदाचित्’() इति विशेषवचनाच्च ।
}}
}}


Line 231: Line 214:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् ॥ 08-373
| verse_line1  = (373)ओं न वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् ओम् 03-03-08 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 239: Line 222:
| id      = BS_C03_S03_V08_B1
| id      = BS_C03_S03_V08_B1
| text    =
| text    =
प्रकरणभेदान्नवोपसंहारः कार्यः । परोवरीयस्त्वादिषु तावदेव ह्युक्तम् ॥ 08 ॥
प्रकरणभेदान्नवोपसंहारः कार्यः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V08
| id      = BS_C03_S03_V08_B2
| text    =
परोवरीयस्त्वादिषु तावदेव ह्युक्तम् ॥ 08 ॥
}}
}}


Line 247: Line 237:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सङ्ज्ञातश्चेत् तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ 09-374
| verse_line1  = (374)ओं सङ्ज्ञातश्चेत् तदुक्तमस्ति तु तदपि ओम् 03-03-09 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V09
| id      = BS_C03_S03_V09_author-note
| text    =
॥ इति उपसंहाराधिकरणम्॥ 2 ॥
}}
}}


Line 262: Line 245:
| id      = BS_C03_S03_V09_B1
| id      = BS_C03_S03_V09_B1
| text    =
| text    =
सर्वविद्या’उक्त्वासोऽहं नामविदेवास्मि नात्मवित्’ इति वचनात् सर्वस्य ब्रह्मनामत्वात् तदुपसंहारः कार्यः
सर्वविद्या’उक्त्वासोऽहं नामविदेवास्मि नाऽत्मवित्’(छां.उ.७.१.३) इति वचनात् सर्वस्य ब्रह्मनामत्वात् तदुपसंहारः कार्यः ।‘नामत्वात् सर्वविद्यानां गुणानामुपसंहृतिः ।कार्यैव ब्रह्मणि परे नात्र कार्या विचारणा’ इति च ब्रह्मतर्के ॥
}}
}}


Line 269: Line 252:
| id      = BS_C03_S03_V09_B2
| id      = BS_C03_S03_V09_B2
| text    =
| text    =
‘नामत्वात् सर्वविद्यानां गुणानामुपसंहृति ।कार्यैव ब्रह्मणि परे नात्र कार्या विचारणा’ इति च ब्रह्मतर्के ॥
इति चेत् सत्यम् । उक्तो ह्युपसंहारः ।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V09
| verse_id = BS_C03_S03_V09
| id      = BS_C03_S03_V09_B4
| id      = BS_C03_S03_V09_B3
| text    =
| text    =
इति चेत् सत्यम् । उक्तो ह्युपसंहारः । तत्प्रमाणमप्यस्त्येव ।
तत्प्रमाणमप्यस्त्येव । ‘नाम वा एता ब्रह्मणः सर्वविद्यास्तस्मादेकः सर्वगुणैर्विचिन्त्यः’ इति कौण्डिन्यश्रुतौ ॥ 09 ॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== प्राप्त्यधिकरणम् ===
| verse_id = BS_C03_S03_V09
 
| id      = BS_C03_S03_V09_B5
| text    =
‘नाम वा एता ब्रह्मणः सर्वविद्यास्तस्मादेकः सर्वगुणैर्विचिन्त्यः’ इति कौण्डिन्यश्रुतौ ॥ 09 ॥
}}
 
=== प्राप्तैधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S03_V10
| verse_id      = BS_C03_S03_V10
Line 293: Line 269:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्राप्तेश्च समञ्जसम् ॥ 10-375
| verse_line1  = (375)ओं प्राप्तेश्च समञ्जसम् ओम् 03-03-10 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V10
| id      = BS_C03_S03_V10_author-note
| text    =
॥ इति प्राप्तैधिकरणम् ॥ 03 ॥
}}
}}


Line 315: Line 284:
| id      = BS_C03_S03_V10_B2
| id      = BS_C03_S03_V10_B2
| text    =
| text    =
‘गुणैःसर्वैरुपास्योऽसौ ब्रह्मणा परमेश्वरः ।अन्यैर्यथाक्रमं चैव मानुषैः कैश्चिदेव तु’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥
‘गुणैः सर्वैरुपास्योऽसौ ब्रह्मणा परमेश्वरः ।अन्यैर्यथाक्रमं चैव मानुषैः कैश्चिदेव तु’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥
}}
}}


=== सर्वाभेदाधिकरणम् ===
=== सर्वभेदाधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 325: Line 294:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥ 11-376
| verse_line1  = (376)ओं सर्वाभेदादन्यत्रेमे ओम् 03-03-11 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V11
| id      = BS_C03_S03_V11_author-note
| text    =
॥ इति सर्वाभेदाधिकरणम् ॥ 04 ॥
}}
}}


Line 347: Line 309:
| id      = BS_C03_S03_V11_B2
| id      = BS_C03_S03_V11_B2
| text    =
| text    =
‘सम्पूर्णोपासनाद्ब्रह्मा सम्पूर्णानन्दभाग्भवेत् ।इतरे तु यथायोगं सम्यङ् मुक्तौभवन्ति हि’ इति पाद्मे ॥ 11 ॥
‘सम्पूर्णोपासनाद्ब्रह्मा सम्पूर्णानन्दभाग् भवेत् ।इतरे तु यथायोगं सम्यङ् मुक्तौ भवन्ति हि’ इति पाद्मे ॥ 11 ॥
}}
}}


Line 357: Line 319:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ 12-377
| verse_line1  = (377)ओम् आनन्दादयः प्रधानस्य ओम् 03-03-12 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 365: Line 327:
| id      = BS_C03_S03_V12_summary
| id      = BS_C03_S03_V12_summary
| text    =
| text    =
सर्वेषां मुमुक्षूणां कियन्नियमेनोपास्यमिति आह-
सर्वेषां मुमुक्षूणां कियन्नियमेनोपास्यमिति अत आह-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V12
| id      = BS_C03_S03_V12_author-note
| text    =
॥ इति आनन्दाद्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
}}
}}


Line 396: Line 351:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥ 13-378
| verse_line1  = (378)ओं प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ओम् 03-03-13 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 418: Line 373:
| id      = BS_C03_S03_V13_B2
| id      = BS_C03_S03_V13_B2
| text    =
| text    =
‘नैव सर्वगुणाः सर्वैरुपास्या मुक्तिभेदतः ।विरिञ्चस्यैव यन्मुक्तावानन्दस्य सुपूर्णता’ इति हि वाराहे ॥ 13 ॥
‘नैव सर्वगुणाः सर्वैरुपास्या मुक्तिभेदतः ।विरिञ्चस्यैव यन्मुक्तावानन्दस्य सुपूर्णता’ इति (हि) वाराहे ॥ 13 ॥
}}
}}


Line 428: Line 383:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ 14-379
| verse_line1  = (379)ओम् इतरे त्वर्थसामान्यात् ओम् 03-03-14 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V14
| id      = BS_C03_S03_V14_author-note
| text    =
॥ इति इतराधिकरणम् (फलसाम्याधिकरणम्) ॥ 07 ॥
}}
}}


Line 446: Line 394:
}}
}}


=== अध्यानाधिकरणम् ===
=== आध्यानाधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 453: Line 401:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ 15-380
| verse_line1  = (380)ओम् आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ओम् 03-03-15 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 475: Line 423:
| id      = BS_C03_S03_V15_B2
| id      = BS_C03_S03_V15_B2
| text    =
| text    =
‘ज्ञानार्थमथ ध्यानार्थं गुणानां समुधीरणा ।
‘ज्ञानार्थमथ ध्यानार्थं गुणानां समुदीरणा ।ज्ञातव्याश्चैव ध्यातव्या गुणाः सर्वेऽप्यतो हरेः ॥नान्यत् प्रयोजनं ज्ञानात् ध्यानात् कर्मकृतेरपि ।श्रवणाच्चाथ पाठाद्वा विद्याभिः कञ्चिदिष्यते’ इति परमसंहितायाम्
ज्ञातव्याश्चैव ध्यातव्या गुणाः सर्वेऽप्यतो हरेः ॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V15
| verse_id = BS_C03_S03_V15
| id      = BS_C03_S03_V15_B4
| id      = BS_C03_S03_V15_B6
| text    =
| text    =
नान्यत् प्रयोजनं ज्ञानाध्यानात् कर्मकृतेरपि ।श्रवणाच्चाथ पाठाद्वा विद्याभिः कञ्चिदिष्यते’ इति परमसंहितायाम्
‘गुणाः सर्वेऽपि वेत्तव्या ध्यातव्याश्च न संशयः ।नान्यत् प्रयोजनं मुख्यं गुणानां कथने भवेत्’()
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V15
| verse_id = BS_C03_S03_V15
| id      = BS_C03_S03_V15_B6
| id      = BS_C03_S03_V15_B8
| text    =
‘गुणाः सर्वेऽपि वेत्तव्या ध्यातव्याश्च न संशयः ।
नान्यत् प्रयोजनं मुख्यं गुणानां कथने भवेत् ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V15
| id      = BS_C03_S03_V15_B8
| text    =
| text    =
ज्ञानाध्यानसमायोगाद्गुणानां सर्वशः फलम् ।मुख्यं भवेन्न चान्येन फलं मुख्यं क्वचिद्भवेत्’इति ब्रह्मतन्त्रे ॥ 15 ॥
ज्ञानाध्यानसमायोगाद्गुणानां सर्वशः फलम् ।मुख्यं भवेन्न चान्येन फलं मुख्यं क्वचिद्भवेत्’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 15 ॥
}}
}}


Line 506: Line 445:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आत्मशब्दाच्च ॥ 16-381
| verse_line1  = (381)ओम् आत्मशब्दाच्च ओम् 03-03-16 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V16
| id      = BS_C03_S03_V16_author-note
| text    =
॥ इति अध्यानाधिकरणम् ॥ 08 ॥
}}
}}


Line 521: Line 453:
| id      = BS_C03_S03_V16_B10
| id      = BS_C03_S03_V16_B10
| text    =
| text    =
‘आत्मेत्येवोपासीत’ इत्यनुपसंहारप्रमाणम् ॥ 16 ॥
‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.६.४.७) इत्यनुपसंहारप्रमाणम् ॥ 16 ॥
}}
}}


Line 531: Line 463:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आत्मगृहीतिरितवदुत्तरात् ॥ 17-382 ॥
| verse_line1  = (382)ओम् आत्मगृहीतिरितवदुत्तरात् ओम् ॥ 17-382 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V17
| id      = BS_C03_S03_V17_author-note
| text    =
॥ इति आत्मगृहीत्यधिकरणम्॥ 09 ॥
}}
}}


Line 546: Line 471:
| id      = BS_C03_S03_V17_B1
| id      = BS_C03_S03_V17_B1
| text    =
| text    =
च’आनन्दादयः प्रधानस्य’ इत्युक्तिविरोधः । यतः’सत्यं ज्ञानमनन्तम् ब्रह्म।’विज्ञानमानन्दम् ब्रह्म’ इतिवदेवात्मशब्दगृहीतिः । ‘अत्र ह्येते सर्व एकीभवन्ति’ इत्युत्तरात्
च ‘आनन्दादयः प्रधानस्य’(ब्र.सू.३.३.१२) इत्युक्तिविरोधः । यतः ‘सत्यं ज्ञानमनन्तम् ब्रह्म’(तै.उ.२.१)।‘विज्ञानमानन्दम् ब्रह्म’() इतिवदेवात्मशब्दगृहीतिः ।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V17
| verse_id = BS_C03_S03_V17
| id      = BS_C03_S03_V17_B3
| id      = BS_C03_S03_V17_B2
| text    =
| text    =
‘आनन्दानुभवत्त्वाच्च निर्दोषत्वाच्च भण्यते ।नित्यत्वाच्च तथाऽऽत्मेति वेदवादिभिरीश्वरः’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 17 ॥
‘अत्र ह्येते सर्व एकीभवन्ति’(बृ.उ.३.४.७) इत्युत्तरात् ।‘आनन्दानुभवत्त्वाच्च निर्दोषत्वाच्च भण्यते ।नित्यत्वाच्च तथाऽऽत्मेति वेदवादिभिरीश्वरः’ इति (हि) बृहत्तन्त्रे ॥ 17 ॥
}}
}}


Line 563: Line 488:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्वयादिति चेत् स्यादवधारणात् ॥ 18-383
| verse_line1  = (383)ओम् अन्वयादिति चेत् स्यादवधारणात् ओम् 03-03-18 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 569: Line 494:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V18
| verse_id = BS_C03_S03_V18
| id      = BS_C03_S03_V18_author-note
| id      = BS_C03_S03_V18_B1
| text    =
| text    =
इति अन्वयाधिकरणम् ॥ 10 ॥
सर्वगुणानामान्वय आत्म शब्दे भवति । ‘आप्तव्याप्तेरात्मशब्दः परमस्य प्रयुज्यते’() इति वचनादिति चेत्,
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V18
| verse_id = BS_C03_S03_V18
| id      = BS_C03_S03_V18_B1
| id      = BS_C03_S03_V18_B2
| text    =
| text    =
सर्वगुणानामान्वय आत्म शब्दे भवति । ‘आप्तव्याप्तेरात्मशब्दः परमस्य प्रयुज्यते’ इति वचनादिति चेत् सत्यम् । स्याच्च्यैवं आत्मेत्येवेत्यवधारणात् । अन्यथा सर्वोपसंहारवचनविरोधात् ॥ 18 ॥
सत्यम् । स्याच्च्यैवम् ‘आत्मेत्येव’(बृ.उ.३.४.७) इत्यवधारणात् । अन्यथा सर्वोपसंहारवचनविरोधात् ॥ 18 ॥
}}
}}


=== कार्या(ख्यान)धिकरणम् ===
=== कार्याख्यानाधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 588: Line 513:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ 19-384
| verse_line1  = (384)ओं कार्याख्यानादपूर्वम् ओम् 03-03-19 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V19
| id      = BS_C03_S03_V19_author-note
| text    =
॥ इति कार्या(ख्यान)धिकरणम् ॥ 11 ॥
}}
}}


Line 603: Line 521:
| id      = BS_C03_S03_V19_B1
| id      = BS_C03_S03_V19_B1
| text    =
| text    =
‘अलौकिकास्तस्य गुणा ह्युपास्य अलौकिकं मुक्तिकार्यं यतोऽस्य’
‘अलौकिकास्तस्य गुणा ह्युपास्य अलौकिकं मुक्तिकार्यं यतोऽस्य’()इति कार्याख्यानादन्यत्रादृष्टा एव गुणा उपास्याः ॥ 19 ॥
इति कार्याख्यानादन्यत्रादृष्टा एव गुणा उपास्याः ॥ 19 ॥
}}
}}


Line 614: Line 531:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = समान एवं चाभेदात् ॥ 20-385
| verse_line1  = (385)ओं समान एवं चाभेदात् ओम् 03-03-20 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 632: Line 549:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ 21-386
| verse_line1  = (386)ओं सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ओम् 03-03-21 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 638: Line 555:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V21
| verse_id = BS_C03_S03_V21
| id      = BS_C03_S03_V21_author-note
| id      = BS_C03_S03_V21_B1
| text    =
| text    =
॥ इति समानाधिकरणम् ॥ 12 ॥
परमात्मसम्बन्धित्वेन नित्यत्वात् त्रिविक्रमत्वादिष्वप्युपसंहार्यत्वं युज्यते।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V21
| verse_id = BS_C03_S03_V21
| id      = BS_C03_S03_V21_B1
| id      = BS_C03_S03_V21_B2
| text    =
| text    =
परमात्मसम्बन्धित्वेन नित्यत्वात् त्रिविक्रमत्वादिष्वप्युपसंहार्यत्वं युज्यते।
‘गुणास्त्रैविक्रमाद्याश्च संहर्तव्या न संशयः ।विरिञ्चस्यैव नान्येषां स हि सर्वगुणाधिकः’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 21 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V21
| id      = BS_C03_S03_V21_B2
| text    =
‘गुणास्त्रैविक्रमाद्याश्च संहर्तव्या न संशयः ।विरिञ्चस्यैव नान्येषां स हि सर्वगुणाधिकः’ इति ब्रह्मतन्त्रे ॥ 21 ॥
}}
}}


Line 662: Line 572:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न वा विशेषात् ॥ 22-387
| verse_line1  = (387)ओं न वा विशेषात् ओम् 03-03-22 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 670: Line 580:
| id      = BS_C03_S03_V22_B1
| id      = BS_C03_S03_V22_B1
| text    =
| text    =
वा ऽऽत्मशब्देन सर्वगुणगृहीतिः । अधिकारिविशेषात् ॥ 22 ॥
वाऽऽत्मशब्देन सर्वगुणगृहीतिः । अधिकारिविशेषात् ॥ 22 ॥
}}
}}


Line 678: Line 588:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = दर्शयति च ॥ 23-388
| verse_line1  = (388)ओं दर्शयति च ओम् 03-03-23 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 686: Line 596:
| id      = BS_C03_S03_V23_author-note
| id      = BS_C03_S03_V23_author-note
| text    =
| text    =
॥ इति विशेषणाधिकरणम्(नानाधिकरणम्) ॥ 13 ॥
॥ इति नवाधिकरणम् (विशेषणाधिकरणम्) ॥ 13 ॥
}}
}}


Line 703: Line 613:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ सम्भृतिद्युव्याप्तपि चातः ॥ 24-389
| verse_line1  = (389)ओं सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ओम् 03-03-24 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V24
| id      = BS_C03_S03_V24_author-note
| text    =
॥ इति सम्भृत्यधिकरणम् ॥ 14 ॥
}}
}}


Line 725: Line 628:
| id      = BS_C03_S03_V24_B2
| id      = BS_C03_S03_V24_B2
| text    =
| text    =
‘देवादीनामुपास्यास्तुभृतिव्याप्त्यादयो गुणाः ।आनन्दाद्यास्तु सर्वेषामन्यथाऽनर्थकृद्भवेत्’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 24 ॥
‘देवादीनामुपास्यास्तु भृतिव्याप्त्यादयो गुणाः ।आनन्दाद्यास्तु सर्वेषामन्यथाऽनर्थकृद्भवेत्’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 24 ॥
}}
}}


Line 735: Line 638:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = पुरुषविद्यायामपि चेतरेषामनाम्नानात् ॥ 25-390
| verse_line1  = (390)ओं पुरुषविद्यायामपि चेतरेषामनाम्नानात् ओम् 03-03-25 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 743: Line 646:
| id      = BS_C03_S03_V25_summary
| id      = BS_C03_S03_V25_summary
| text    =
| text    =
यस्यां विद्यायां महागुणा उच्यन्ते सोत्तमानामितराऽन्येषामिति चेन्न
यस्यां विद्यायां महागुणा उच्यन्ते सोत्तमानामितराऽन्येषामिति चेत्, न
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V25
| id      = BS_C03_S03_V25_author-note
| text    =
॥ इति पुरुषविद्याधिकरणम् ॥ 15 ॥
}}
}}


Line 774: Line 670:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = वेधाद्यर्थभेदात् ॥ 26-391
| verse_line1  = (391)ओं वेधाद्यर्थभेदात् ओम् 03-03-26 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V26
| id      = BS_C03_S03_V26_author-note
| text    =
॥ इति वेधाद्यधिकरणम् ॥ 16 ॥
}}
}}


Line 789: Line 678:
| id      = BS_C03_S03_V26_B1
| id      = BS_C03_S03_V26_B1
| text    =
| text    =
‘भिन्धि विद्धि श्रुणीहीति फलभेदेन सर्वशः ।यत्यादीनां तेष्वयोगान्नाधिकार्येकता भवेत् ।अयोग्योपासनादीयुरनर्थं चार्थनाशनम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥
‘भिन्धि विद्ध्यश्रुणीहीति फलभेदेन सर्वशः ।यत्यादीनां तेष्वयोगान्नाधिकार्येकता भवेत् ।अयोग्योपासनादीयुरनर्थं चार्थनाशनम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥
}}
}}


=== मुक्तोपासनाधिकरणम् (हान्यधिकरणम्) ===
=== (मुक्तोपासनाधिकरणम्) हान्यधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 799: Line 688:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाछन्दस्तुत्युपगानवत् तदुक्तम् ॐ ॥27-392॥
| verse_line1  = (392)ओं हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाछन्दस्तुत्युपगानवत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-27॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 807: Line 696:
| id      = BS_C03_S03_V27_summary
| id      = BS_C03_S03_V27_summary
| text    =
| text    =
मुक्तस्योपासना कर्तव्या न वेत्यतो ब्रवीति
मुक्तस्योपासना कर्तव्या न वा ? इत्यतोऽब्रवीत्
}}
}}


Line 814: Line 703:
| id      = BS_C03_S03_V27_B1
| id      = BS_C03_S03_V27_B1
| text    =
| text    =
नियतस्वाध्यायानन्तरं स्वेच्छया कुशाग्रहणस्तुत्युपगानवदेव मोक्ष उपासनादिः ।’ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इति मोक्षवाक्यशेषत्वादितरेषाम् ॥
नियतस्वाध्यायानन्तरं स्वेच्छया कुशाग्रहणस्तुत्युपगानवदेव मोक्ष उपासनादिः ।‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१.१) इति मोक्षवाक्यशेषत्वादितरेषाम् ॥ तच्चोक्तम् ‘एतत् सामगायन्नास्ते’(तै.उ.३.१०) इत्यादि ।
तच्चोक्तम्’’एतत् सामगायन्नास्ते’ इत्यादि ।
ब्रह्मतर्के च-
}}
}}


Line 823: Line 710:
| id      = BS_C03_S03_V27_B2
| id      = BS_C03_S03_V27_B2
| text    =
| text    =
‘मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरेः
ब्रह्मतर्के च-
नियमानन्तरं विप्राः कुशाद्यैरप्यधीयते’ इति ॥
‘मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरेः ।नियमानन्तरं विप्राः कुशाद्यैरप्यधीयते’ इति ॥
}}
}}


Line 831: Line 718:
| id      = BS_C03_S03_V27_B4
| id      = BS_C03_S03_V27_B4
| text    =
| text    =
‘कृष्णो मुक्यैरिज्यते वीतमोहैः’ इति च भारते ॥ 27 ॥
‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः’ इति च भारते ॥ 27 ॥
}}
}}


Line 839: Line 726:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ साम्परायेतर्तव्याभावात् तथा ह्यन्ये ॥ 28-393
| verse_line1  = (393)ओं साम्पराये तर्तव्याभावात् तथा ह्यन्ये ओम् 03-03-28 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 845: Line 732:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V28
| verse_id = BS_C03_S03_V28
| id      = BS_C03_S03_V28_author-note
| id      = BS_C03_S03_V28_B1
| text    =
| text    =
॥ इति मुक्तोपासनाधिकरणम् (हान्यधिकरणम्) ॥ 17 ॥
स्वेच्छयैवेत्यङ्गीकर्तव्यम् । मुक्तस्य तीर्णत्वात् ।‘तीर्णो हि तदा सर्वान् शोकान् हृदयस्य भवति’(बृ.उ.३.३.२२) इति ह्यन्ये पठन्ति ।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V28
| verse_id = BS_C03_S03_V28
| id      = BS_C03_S03_V28_B1
| id      = BS_C03_S03_V28_B2
| text    =
| text    =
स्वेच्छयैवेत्यङ्गीकर्तव्यम् । मुक्तस्य तीर्णत्वात् ।‘तीर्णो हि तदा सर्वां भवति’ इति ह्यन्ये पठन्ति ।
‘स्थितप्रज्ञत्वमाप्ता ये ज्ञानेन परमात्मनः ।ब्रह्मलोकं गताः सर्वे ब्रह्मणा च परं गताः ।तीर्णतर्तव्यभागाश्च स्वेच्छयोपासते परम्’() इति ॥ 28 ॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== छन्दाधिकरणम् ===
| verse_id = BS_C03_S03_V28
 
| id      = BS_C03_S03_V28_B2
| text    =
वायुप्रोक्ते च
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V28
| id      = BS_C03_S03_V28_B3
| text    =
‘स्थितप्रज्ञत्वमाप्ता ये ज्ञानेन परमात्मनः ।
ब्रह्मलोकं गताः सर्वे ब्रह्मणा च परं गताः ।
तीर्णतर्तव्यभागश्च स्वेच्छयोपासते परम्’ इति ॥ 28 ॥
}}
 
=== छन्दादिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S03_V29
| verse_id      = BS_C03_S03_V29
Line 880: Line 751:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = छन्दत उभयाविरोधात् ॥ 29-394
| verse_line1  = (394)ओं छन्दत उभयाविरोधात् ओम् 03-03-29 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 888: Line 759:
| id      = BS_C03_S03_V29_summary
| id      = BS_C03_S03_V29_summary
| text    =
| text    =
कर्मापि कुर्वन्ति न वेत्याह
कर्मापि कुर्वन्ति न वा ? इत्यत आह
}}
}}


Line 903: Line 774:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा विरोधः ॥ 30-395
| verse_line1  = (395)ओं गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः ओम् 03-03-30 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 918: Line 789:
| id      = BS_C03_S03_V30_B2
| id      = BS_C03_S03_V30_B2
| text    =
| text    =
‘कदाचित् कर्म कुर्वन्ति कदाचिन्नैव कुर्वते
‘कदाचित् कर्म कुर्वन्ति कदाचिन्नैव कुर्वते ।नित्यज्ञानस्वरूपत्वान्नित्यं ध्यायन्ति केशवम्’()
नित्यज्ञानस्वरूपत्वान्नित्यं ध्यायन्ति केशवम्
}}
}}


Line 934: Line 804:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ॥ 31-396
| verse_line1  = (396)ओम् उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ओम् 03-03-31 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V31
| id      = BS_C03_S03_V31_author-note
| text    =
इति छन्दादिकरणम्
}}
}}


Line 959: Line 822:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अनियमः सर्वेषामविरोधाच्छब्दानुमानाभ्याम् ॥ 32-397
| verse_line1  = (397)ओम् अनियमः सर्वेषामविरोधाच्छब्दानुमानाभ्याम् ओम् 03-03-32 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V32
| id      = BS_C03_S03_V32_author-note
| text    =
॥ इति अनियमाधिकरणम् ॥ 19 ॥
}}
}}


Line 974: Line 830:
| id      = BS_C03_S03_V32_B1
| id      = BS_C03_S03_V32_B1
| text    =
| text    =
प्राप्तज्ञानानामपि केषाञ्चिन्मुक्तिप्राप्तिः केषाञ्चिन्न, यथोपसंहारनियम इति न मन्तव्यम्
प्राप्तज्ञानानामपि केषाञ्चिन्मुक्तिप्राप्तिः केषाञ्चिन्न, यथोपसंहारनियम इति न मन्तव्यम् ।‘सर्वेगुणा ब्रह्मणैव ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः’() इत्युपसंहारविरोधादन्यत्राविरोधात् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V32
| id      = BS_C03_S03_V32_B2
| text    =
‘सर्वेगुणा ब्रह्मणैव ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः’ इत्युपसंहारविरोधादन्यत्राविरोधात् ।
}}
}}


Line 988: Line 837:
| id      = BS_C03_S03_V32_B4
| id      = BS_C03_S03_V32_B4
| text    =
| text    =
‘न कश्चिद्ब्रह्मवित् स्मृतिमनुभवति मुक्तो ह्येव भवति तस्मादाहुः स्मृतिहेति’ इति कौण्डन्यश्रुतेश्च ।
‘न कश्चिद्ब्रह्मवित् सृतिमनुभवति मुक्तो ह्येव भवति तस्मादाहुः सृतिहेति’() इति कौण्डन्यश्रुतेश्च ।
}}
}}


Line 1,005: Line 854:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ॥ 33-398
| verse_line1  = (398)ओं यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ओम् 03-03-33 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,020: Line 869:
| id      = BS_C03_S03_V33_B2
| id      = BS_C03_S03_V33_B2
| text    =
| text    =
अध्यात्मे
‘ज्ञानं चोपासनं चैव मुक्तावानन्द एव ।यथाधिकारं देवानां भवन्त्येवोत्तरोत्तरम्’ इति ॥ 33 ॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{VerseBlock
| verse_id = BS_C03_S03_V33
| id      = BS_C03_S03_V33_B3
| text    =
‘ज्ञानं चोपासनं चैव मुक्तावानन्द एव च ।
यथाधिकारं देवानां भवन्त्येवोत्तरोत्तरम्’ इति ॥ 33 ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S03_V34
| verse_id      = BS_C03_S03_V34
| document_id  = BS
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अक्षरधियां त्वविरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत् तदुक्तम् ॐ ॥34-99
| verse_line1  = (399)ओम् अक्षरधियां त्वविरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-34
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V34
| id      = BS_C03_S03_V34_author-note
| text    =
॥ इति यावदधिकाराधिकरणम् ॥ 20 ॥
}}
}}


Line 1,058: Line 892:
| id      = BS_C03_S03_V34_B2
| id      = BS_C03_S03_V34_B2
| text    =
| text    =
उक्तं च तुरश्रुतौ –
‘नानाविधा जीवसङ्घा विमुक्तौन चैव तेषां ब्रह्मधियां विरोधः।दोषाभावाद्गुरुशिष्यादिभावाल्लोकेऽपि नासौ किमु तेषां विमुक्तेः’ इति ॥ 34 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V34
| id      = BS_C03_S03_V34_B3
| text    =
‘नानाविधा जीवसङ्घा विमुक्तौन चैव तेषां ब्रह्मधियां विरोधः।
दोषाभावाद्गुरुशिष्यादिभावाल्लोकेऽपि नासौ किमु तेषां विमुक्तेः’ इति ॥ 34 ॥
}}
}}


Line 1,076: Line 902:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = इयदामननात् ॥ 35-400
| verse_line1  = (400)ओम् इयदामननात् ओम् 03-03-35 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,084: Line 910:
| id      = BS_C03_S03_V35_B1
| id      = BS_C03_S03_V35_B1
| text    =
| text    =
नामाध्यारभ्य प्राणान्तमुत्तरोत्तरमुत्तमत्वमुक्तम्। न प्राणात् किञ्चिद्बूय उक्तम् । तथाऽपि पूर्ववत् स्यात् इति न वाच्यम् ।
नामाध्यारभ्य प्राणान्तमुत्तरोत्तरमुत्तमत्वमुक्तम्। न प्राणात् किञ्चिद् भूय उक्तम् । तथाऽपि पूर्ववत् स्यात् इति(स्यादपीति) न वाच्यम् ।
}}
}}


Line 1,099: Line 925:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्तरा भूतग्रामवदिति चेत् तदुक्तम् ॥ 36-401
| verse_line1  = (401)ओम् अन्तरा भूतग्रामवदिति चेत् तदुक्तम् ओम् 03-03-36 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,107: Line 933:
| id      = BS_C03_S03_V21_B3
| id      = BS_C03_S03_V21_B3
| text    =
| text    =
यथा भूतग्राम एकस्मादेक उत्तमोऽस्त्येव, एवं प्राणादपि परमात्मानमन्तरा विद्यत इति चेन्न। प्राणादुत्तमाभावे प्रमाणमुक्तम् । अन्यत्रोत्तमाभावे न प्रमाणम्। दृष्यते चान्यत्रोत्तमत्वम् ॥ 36 ॥
यथा भूतग्राम एकस्मादेक उत्तमोऽस्त्येव, एवं प्राणादपि परमात्मानमन्तरा विद्यत इति चेत्,
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V36
| id      = BS_C03_S03_V21_B4
| text    =
न। प्राणादुत्तमाभावे प्रमाणमुक्तम् । अन्यत्रोत्तमाभावे न प्रमाणम्। दृष्यते चान्यत्रोत्तमत्वम् ॥ 36 ॥
}}
}}


Line 1,115: Line 948:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशवत् ॥ 37-402
| verse_line1  = (402)ओम् अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशवत् ओम् 03-03-37 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,121: Line 954:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V37
| verse_id = BS_C03_S03_V37
| id      = BS_C03_S03_V37_author-note
| id      = BS_C03_S03_V21_B4
| text    =
| text    =
॥ इति इयदामननाधिकरणम् ॥ 21 ॥
प्राणस्य सर्वोत्तमत्वे परमात्मना भेदानुपपत्तिरिति चेत्,
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V37
| verse_id = BS_C03_S03_V37
| id      = BS_C03_S03_V21_B4
| id      = BS_C03_S03_V21_B5
| text    =
| text    =
प्राणस्य सर्वोत्तमत्वे परमात्मना भेदानुपपत्तिरिति चेन्न । श्रुत्युपदिष्टवदुपपत्तेः । अन्येभ्यः प्राणस्योत्तमत्वं तस्मात् परमात्मनो ह्युपदिष्टम् ॥ 37 ॥
न। श्रुत्युपदिष्टवदुपपत्तेः । अन्येभ्यः प्राणस्योत्तमत्वं तस्मात् परमात्मनो ह्युपदिष्टम् ॥ 37 ॥
}}
}}


Line 1,140: Line 973:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ॥ 38-403
| verse_line1  = (403)ओं व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ओम् 03-03-38 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,148: Line 981:
| id      = BS_C03_S03_V38_summary
| id      = BS_C03_S03_V38_summary
| text    =
| text    =
नेति चेन्न-
नेति चेत्, न-
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V38
| verse_id = BS_C03_S03_V38
| id      = BS_C03_S03_V38_author-note
| id      = BS_C03_S03_V38_B1
| text    =
| text    =
इति व्यतिहाराधिकरणम् ॥ 22 ॥
उक्तं प्राणात् परमात्मन उत्तमत्वं पूर्वोक्ताध्याहारेण‘एष तु वा अतिवदति’(छां.उ.७.१६) इति विशिंषन्ति हि । यथेतरेषु विशेषणम् ।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V38
| verse_id = BS_C03_S03_V38
| id      = BS_C03_S03_V38_B1
| id      = BS_C03_S03_V38_B2
| text    =
| text    =
उक्तं प्राणात् परमात्मन उत्तमत्वं पूर्वोक्ताध्याहारेण’एष तु वा अतिवदति’ इति विशिंषन्ति हि । यथेतरेषु विशेषणम् ।
‘उत्तमत्वं हि देवानां मुक्तावपि हि मानवात् ।तेभ्यः प्राणस्य तस्माच्च नित्यमुक्तस्य वै हरेः’ ॥इति च बृहत्तन्त्रे ॥ 38 ॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== सत्याद्यधिकरणम् ===
| verse_id = BS_C03_S03_V38
| id      = BS_C03_S03_V38_B2
| text    =
‘उत्तमत्वं हि देवानां मुक्तावपि हि मानवात् ।
तेभ्यः प्राणस्य तस्माच्च नित्यमुक्तस्य वै हरेः’ इति च ब्रह्मतन्त्रे ॥ 38 ॥
}}
 
=== सत्याद्यधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 1,180: Line 1,005:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सैव हि सत्यादयः 29-404
| verse_line1  = (404)ओं सैव हि सत्यादयः ओम् 03-03-39
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,188: Line 1,013:
| id      = BS_C03_S03_V39_summary
| id      = BS_C03_S03_V39_summary
| text    =
| text    =
कृतिर्निष्ठा ज्ञानमित्यादीनां भेदाद्बहव उत्तमा इति चेन्न
कृतिर्निष्ठा ज्ञानमित्यादीनां भेदाद्बहव उत्तमा इति चेत्, न
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V39
| id      = BS_C03_S03_V39_author-note
| text    =
॥ इति सत्याद्यधिकरणम् ॥ 23 ॥
}}
}}


Line 1,209: Line 1,027:
| id      = BS_C03_S03_V39_B2
| id      = BS_C03_S03_V39_B2
| text    =
| text    =
ब्रह्मतर्के च –
‘नामादिप्राणपर्यन्ताद्योहि सत्यादिरूपवान् ।तस्मै नमो भगवते विष्णवे सर्वजिष्णवे’ इति ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V39
| id      = BS_C03_S03_V39_B3
| text    =
‘नामादिप्राणपर्यन्ताद्योहि सत्यादिरूपवान्
तस्मै नमो भगवते विष्णवे सर्वजिष्णवे’ इति ॥
}}
}}


Line 1,224: Line 1,034:
| id      = BS_C03_S03_V39_B4
| id      = BS_C03_S03_V39_B4
| text    =
| text    =
‘सत्याद्या अहमात्मान्ता यद्गुणाः समुदीरिताः ।तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते’इति चाध्यात्मे ॥ 39 ॥
‘सत्याद्या अहमात्मान्ताः यद्गुणाः समुदीरिताः ।तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते’इति चाध्यात्मे ॥ 39 ॥
}}
}}


Line 1,234: Line 1,044:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = कामादितरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ 40-405
| verse_line1  = (405)ओं कामादितरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ओम् 03-03-40 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,242: Line 1,052:
| id      = BS_C03_S03_V40_summary
| id      = BS_C03_S03_V40_summary
| text    =
| text    =
प्रकृतेरपि जन्मादेः संसारप्राप्तेः किमिति नामादिष्वपाठ इत्यत्रोच्यते-
प्रकृतेरपि जन्मादेः संसारप्राप्तेः किमिति नामादिष्वपाठ इति अत्रोच्यते-
}}
}}


Line 1,249: Line 1,059:
| id      = BS_C03_S03_V40_B1
| id      = BS_C03_S03_V40_B1
| text    =
| text    =
स्वेच्छयैव मूलस्थाने स्थिताऽन्यत्रावतारान् करोतीश्वरेच्छानुसारेण
स्वेच्छयैव मूलस्थाने स्थिताऽन्यत्र चावतारान् करोतीश्वरेच्छानुसारेण ।‘सर्वायतना सर्वकाला सर्वेच्छा सर्वज्ञा सर्वावस्था बद्धा बन्धिका सैषा प्रकृतिविकृतिः’ इति वत्सश्रुतेः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V40
| id      = BS_C03_S03_V40_B2
| text    =
‘सर्वायतना सर्वकाला सर्वेच्छा न बद्धाबन्धिका सैषा प्रकृतिरविकृतिः’ इति वत्सश्रुतेः ।
}}
}}


Line 1,263: Line 1,066:
| id      = BS_C03_S03_V40_B4
| id      = BS_C03_S03_V40_B4
| text    =
| text    =
‘नामादयस्तु बद्धत्वान्मोचकत्वात् परोऽपि च
‘नामादयस्तु बद्धत्वान्मोचकत्वात् परोऽपि च ।उभयोरप्यभावेन यथाऽव्यक्तं न तूदितम् ॥श्रुतौ तथा जीवपरावुच्येते किञ्चिनेतरत् ।नोच्यते च तदा तत्त्वद्वयं वै समुदाहृतम्’इति ब्रह्मतर्के ॥ 40 ॥
उभयोरप्यभावेन यथाऽव्यक्तं न तूदितम्
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V40
| id      = BS_C03_S03_V40_B6
| text    =
श्रुतौ तथा जीवपरावुच्येते किञ्चिनेतरत् ।नोच्यते च तदा तत्त्वद्वयं वै समुदाहृतम्’इति ब्रह्मतर्के ॥ 40 ॥
}}
}}


Line 1,279: Line 1,074:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आदरादलोपः ॥ 41-406
| verse_line1  = (406)ओम् आदरादलोपः ओम् 03-03-41 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,294: Line 1,089:
| id      = BS_C03_S03_V41_B2
| id      = BS_C03_S03_V41_B2
| text    =
| text    =
‘यथा श्रीर्नित्यमुक्ताऽपि प्राप्तकर्माऽपि सर्वदा ।उपास्ते नित्यशो विष्णमेवं भक्तो हरेर्भवेत्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 41 ॥
‘यथा श्रीर्नित्यमुक्ताऽपि प्राप्तकामाऽपि सर्वदा ।उपास्ते नित्यशो विष्णमेवं भक्तो हरेर्भवेत्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 41 ॥
}}
}}


Line 1,302: Line 1,097:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उपस्थितेस्तद्वचनात् ॥ 42-407
| verse_line1  = (407)ओम् उपस्थितेस्तद्वचनात् ओम् 03-03-42 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V42
| id      = BS_C03_S03_V42_author-note
| text    =
॥ इति कामाधिकरणम् ॥ 24 ॥
}}
}}


Line 1,327: Line 1,115:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तन्निर्धारणार्थनियमस्तद्दृष्टेः पृथग्ध्यप्रतिबन्धः पलम् ॐ॥43-408
| verse_line1  = (408)ओं तन्निर्धारणार्थनियमस्तद्दृष्टेः पृथग्ध्यप्रतिबन्धः पलम् ओं॥ 03-03-43
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,335: Line 1,123:
| id      = BS_C03_S03_V43_summary
| id      = BS_C03_S03_V43_summary
| text    =
| text    =
दर्शनार्थं ह्युपासनम् । तच्च श्रवणादेरेव भवति । अतः किमर्थमित्यत्रोच्यते–
दर्शनार्थं ह्युपासनम् । तच्च श्रवणादेरेव भवति । अतः किमर्थमिति अत्रोच्यते–
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V43
| verse_id = BS_C03_S03_V43
| id      = BS_C03_S03_V43_author-note
| id      = BS_C03_S03_V43_B1
| text    =
| text    =
॥ इति निर्धारणाधिकरणम् ॥ 25 ॥
तत्त्वनिश्चयो वेदार्थनियमश्च ब्रह्मदृष्टेः पृथगेव ।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V43
| verse_id = BS_C03_S03_V43
| id      = BS_C03_S03_V43_B1
| id      = BS_C03_S03_V43_B2
| text    =
| text    =
तत्त्वनिश्चयो वेदार्थनियमश्च ब्रह्मदृष्टेः पृथगेव । हिशब्देन’आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य’ इति श्रुतिं सूचयति । श्रवणादिफलं चाज्ञानविपर्ययादिदर्शनप्रतिबन्धनिवृत्तिः ।
हिशब्देन ‘आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य’(बृ.उ.४.४.५) इति श्रुतिं सूचयति ।
ब्रह्मतर्के च –
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V43
| verse_id = BS_C03_S03_V43
| id      = BS_C03_S03_V43_B2
| id      = BS_C03_S03_V43_B3
| text    =
| text    =
‘श्रुत्वा मत्वा तथा ध्यात्वा तदज्ञानविपर्ययौ
श्रवणादिफलं चाज्ञानविपर्ययादिदर्शनप्रतिबन्धनिवृत्तिः ।
संशयं च पराणुद्य लभते ब्रह्मदर्शनम्’ इति ॥ 43 ॥
ब्रह्मतर्के च –
‘श्रुत्वा मत्वा तथा ध्यात्वा तदज्ञानविपर्ययौ ।संशयं च पराणुद्य लभते ब्रह्मदर्शनम्’() इति ॥ 43 ॥
}}
}}


Line 1,368: Line 1,156:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रदानवदेव हि तदुक्तम् ॥ 44-409
| verse_line1  = (409)ओं प्रदानवदेव हि तदुक्तम् ओम् 03-03-44 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V44
| id      = BS_C03_S03_V44_author-note
| text    =
॥ इति प्रदानाधिकरणम् ॥ 26 ॥
}}
}}


Line 1,383: Line 1,164:
| id      = BS_C03_S03_V44_B1
| id      = BS_C03_S03_V44_B1
| text    =
| text    =
न च श्रवणादिमात्रेण ब्रह्मदृष्टिर्भवति, किन्तु सेतिकर्तव्येन । यथा गुरुदत्तं तथैव भवति।’आचार्यवान् पुरुषो वेद’ इति ह्युक्तम् ॥ 44 ॥
न च श्रवणादिमात्रेण ब्रह्मदृष्टिर्भवति, किन्तु सेतिकर्तव्येन । यथा गुरुदत्तं तथैव भवति।‘आचार्यवान् पुरुषो वेद’(छां.उ.६.१४.२) इति ह्युक्तम् ॥ 44 ॥
}}
}}


Line 1,393: Line 1,174:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = लिङ्गभूयस्त्वात् तद्धि बलीयस्तदपि ॥ 45-410
| verse_line1  = (410)ओं लिङ्गभूयस्त्वात् तद्धि बलीयस्तदपि ओम् 03-03-45 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,402: Line 1,183:
| text    =
| text    =
गुरुप्रसादः स्वप्रयत्नो वा बलवानिति निगद्यते-
गुरुप्रसादः स्वप्रयत्नो वा बलवानिति निगद्यते-
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V45
| id      = BS_C03_S03_V45_author-note
| text    =
॥ इति गुरुप्रसादाधिकरणम् (लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणम्) ॥ 27 ॥
}}
}}


Line 1,415: Line 1,189:
| id      = BS_C03_S03_V45_B1
| id      = BS_C03_S03_V45_B1
| text    =
| text    =
ऋषभादिभ्यो विद्यां ज्ञात्वाऽपि सत्यकामेन’भगवांस्त्वेव मे कामं ब्रूयात्’ श्रुतं ह्येव भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्यैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति’ इति वचनात् ।‘अत्र ह न किञ्चन वीयाय’ इत्यनुज्ञानादुपकोसलवचनाच्च लिङ्गभूयस्त्वाद्गुरुप्रदानमेव बलवत् । तर्हि तावताऽलमिति न मन्तव्यम् ।’श्रोतव्यो मन्तव्यः’ इत्यादेस्तदपि कर्तव्यम् ।
ऋषभादिभ्यो विद्यां ज्ञात्वाऽपि सत्यकामेन‘भगवांस्त्वेव मे कामं ब्रूयात्’(छां.उ.४.९.२), श्रुतं ह्येव भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्‍ध्वेव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति’(छां.उ.४.९.३) इति वचनात् ।‘अत्र ह न किञ्चन वीयाय’(छां.उ.४.९.३) इत्यनुज्ञानादुपकोसलवचनाच्च लिङ्गभूयस्त्वाद्गुरुप्रसाद एव बलवान्(गुरुप्रदानमेव बलवत्)
वाराहे च –
}}
}}


Line 1,423: Line 1,196:
| id      = BS_C03_S03_V45_B2
| id      = BS_C03_S03_V45_B2
| text    =
| text    =
‘गुरुप्रसादो बलवान्न तस्माद्बलवत्तरम्
तर्हि तावताऽलमिति न मन्तव्यम् ।‘श्रोतव्यो मन्तव्यः’(बृ.उ.४.४.५) इत्यादेस्तदपि कर्तव्यम् ।
तथाऽपि श्रवणादिश्च कर्तव्यो मोक्षसिद्धये’ इति ॥ 45 ॥
वाराहे च –
‘गुरुप्रसादो बलवान्न तस्माद्बलवत्तरम् ।तथाऽपि श्रवणादिश्च कर्तव्यो मोक्षसिद्धये’() इति ॥ 45 ॥
}}
}}


Line 1,434: Line 1,208:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ पूर्वविकल्पःप्रकरणात् स्यात् क्रियामानसवत् ॥ 46-411
| verse_line1  = (411)ओं पूर्वविकल्पः प्रकरणात् स्यात् क्रियामानसवत् ओम् 03-03-46 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,442: Line 1,216:
| id      = BS_C03_S03_V46_B1
| id      = BS_C03_S03_V46_B1
| text    =
| text    =
न च पूर्वप्राप्त एव गुरुरिति नियमः । समग्रानुग्रहं चेत् पश्चात्तनः करोति स्वयमेव तदा विकल्पः स्यात् । मानसक्रियावत्, यथोभयोर्ध्यानयोः समयोः
न च पूर्वप्राप्त एव गुरुरिति नियमः । समग्रानुग्रहं चेत् पश्चात्तनः करोति स्वयमेव तदा विकल्पः स्यात् ।
}}
}}


Line 1,449: Line 1,223:
| id      = BS_C03_S03_V46_B2
| id      = BS_C03_S03_V46_B2
| text    =
| text    =
‘पूर्वस्मादुत्तमो लब्धः स्वयमेव गुरुर्यदि
मानसक्रियावत्, यथोभयोर्ध्यानयोः समयोः ।‘पूर्वस्मादुत्तमो लब्धः स्वयमेव गुरुर्यदि ।गृह्णीयादविचारेण विकल्पः समयोर्भवेत्’
गृह्णीयादविचारेण विकल्पः समयोर्भवेत्
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V46
| verse_id = BS_C03_S03_V46
| id      = BS_C03_S03_V46_B4
| id      = BS_C03_S03_V46_B3
| text    =
| text    =
समग्रानुग्रहाभावात् सत्यकामः स्वकं गुरुम् ।ऋषभाद्यनुज्ञया चैष प्राप तस्माद्धि युज्यते’इति बृहत्तन्त्रे ॥
समग्रानुग्रहाभावात् सत्यकामः स्वकं गुरुम् ।ऋषभाद्यनुज्ञया चैष प्राप तस्माद्धि युज्यते’इति बृहत्तन्त्रे ॥
Line 1,462: Line 1,235:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V46
| verse_id = BS_C03_S03_V46
| id      = BS_C03_S03_V46_B6
| id      = BS_C03_S03_V46_B4
| text    =
| text    =
‘समग्रानुग्रहं कश्चित् स्वयमेव समो यदि
‘समग्रानुग्रहं कश्चित् स्वयमेव समो यदि ।कुर्यात् पुनश्च गृह्णीयादविरोधेन कामतः ॥ध्यानयोः समयोर्यद्वद्विकल्पः कामतो भवेत् ।एवं गुरोर्द्वितीयस्य विकल्पो ग्रहणेऽपि च’इति महासंहितायाम् ॥ 46
कुर्यात् पुनश्च गृह्णीयादविरोधेन कामतः ॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{VerseBlock
| verse_id = BS_C03_S03_V46
| verse_id      = BS_C03_S03_V47
| id      = BS_C03_S03_V46_B8
| text    =
ध्यानयोः समयोर्यद्वद्विकल्पः कामतो भवेत् ।एवं गुरोर्द्वितीयस्य विकल्पो ग्रहणेऽपि च’इति महासंहितायाम् ॥ 46 ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S03_V47
| document_id  = BS
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अतिदेशाच्च ॥ 47-412
| verse_line1  = (412)ओम् अतिदेशाच्च ओम् 03-03-47 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V47
| id      = BS_C03_S03_V47_author-note
| text    =
॥ इति पूर्वविकल्पाधिकरणम् ॥ 28 ॥
}}
}}


Line 1,495: Line 1,253:
| id      = BS_C03_S03_V47_B11
| id      = BS_C03_S03_V47_B11
| text    =
| text    =
‘ब्रह्मोपास्त्व बह्मोपचरस्व तच्छ्रुणु हि तत्त्वामवतु । या ब्रह्मोपचरेर्यथा मामुपचरेर्ये चान्येऽस्मद्विधाः श्रेयसश्च तानुपास्व तानुपचरस्व तेभ्यः शृणु हि ते त्वामवन्तु’ इति पौष्यायणश्रुतावतीदेशाच्च॥ 47 ॥
‘ब्रह्मोपास्त्व बह्मोपचरस्व तच्छ्रुणु हि तत्त्वामवतु । या ब्रह्मोपचरेर्यथा मामुपचरेर्ये चान्येऽस्मद्विधाः श्रेयसश्च तानुपास्व तानुपचरस्व तेभ्यः शृणु हि ते त्वामवन्तु’ इति पौष्यायणश्रुतावतिदेशाच्च॥ 47 ॥
}}
}}


Line 1,505: Line 1,263:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = विद्यैव तु निर्धारणात् ॥ 48-413
| verse_line1  = (413)ओं विद्यैव तु निर्धारणात् ओम् 03-03-48 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,513: Line 1,271:
| id      = BS_C03_S03_V48_B1
| id      = BS_C03_S03_V48_B1
| text    =
| text    =
च’कर्मण्यैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः’ इत्यादिनाऽन्यन्मोक्षसाधनम् ।
च‘कर्मण्यैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः’(भ.गी.३.२०)इत्यादिनाऽन्यन्मोक्षसाधनम् ।
}}
}}


Line 1,520: Line 1,278:
| id      = BS_C03_S03_V48_B2
| id      = BS_C03_S03_V48_B2
| text    =
| text    =
‘तमेवं विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय’ इति निर्धारणाद्विद्ययैव मोक्षः ॥ 48 ॥
‘तमेवं विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय’(श्वे.उ.३.८) इति निर्धारणाद् विद्ययैव मोक्षः ॥ 48 ॥
}}
}}


Line 1,528: Line 1,286:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = दर्शनाच्च ॥ 49-414
| verse_line1  = (414)ओं दर्शनाच्च ओम् 03-03-49 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V49
| id      = BS_C03_S03_V49_author-note
| text    =
॥ इति विद्याधिकरणम् ॥ 29 ॥
}}
}}


Line 1,550: Line 1,301:
| id      = BS_C03_S03_V49_B2
| id      = BS_C03_S03_V49_B2
| text    =
| text    =
सर्वान् परो माययाऽयं सिनीते दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’ इति कौशिकश्रुतेः ॥ 49 ॥
‘सर्वान् परो माययाऽयं सिनीते दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’ इति कौशिकश्रुतेः ॥ 49 ॥
}}
}}


Line 1,560: Line 1,311:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = श्रुत्यादिबलीयास्त्वाच्च न बाधः ॥ 50-415
| verse_line1  = (415)ओं श्रुत्यादिबलीयास्त्वाच्च न बाधः ओम् 03-03-50 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V50
| id      = BS_C03_S03_V50_author-note
| text    =
॥ इति अबाधाधिकरणम् (श्रुत्यधिकरणम्) ॥ 30 ॥
}}
}}


Line 1,575: Line 1,319:
| id      = BS_C03_S03_V50_B1
| id      = BS_C03_S03_V50_B1
| text    =
| text    =
सावधारणा बलवति श्रुतिः ।
सावधारणा बलवति श्रुतिः ।‘इन्द्रोऽश्वमेधांश्चतमिष्ट्वाऽपि राजा ब्रह्माणमीढ्यं समुवाचोपसन्नः॥न कर्मभिर्न धनैर्नैव चान्यैः पश्येत् सुखं तेन तत्त्वं ब्रवीहि’इति बलवल्लिङ्गम् ॥‘नास्त्यकृतः कृतेन’(मुं.उ.१.२.१२) इत्युपपत्तिश्च
}}
}}


Line 1,582: Line 1,326:
| id      = BS_C03_S03_V50_B2
| id      = BS_C03_S03_V50_B2
| text    =
| text    =
‘इन्द्रोऽश्वमेधांश्चतमिष्ट्वाऽपि राजा ब्रह्माणमीढ्यं समुवाचोपपन्नः॥
‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः’इति युक्तिमद्बगवद्वचनम् ॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V50
| verse_id = BS_C03_S03_V50
| id      = BS_C03_S03_V50_B3
| id      = BS_C03_S03_V50_B9
| text    =
| text    =
कर्मभिर्न धनैर्नैव चान्यैः पश्ये सुखं तेन तत्त्वं ब्रवीहि’इति बलवल्लिङ्गम्
अतो प्रमाणान्तरबाधः ।‘कर्मण्यैव’(भ.गी.३.२०) इत्ययोगव्यवच्छेदः ॥ 50
}}
}}


{{Bhashyam
=== अनुबन्धाद्यधिकरणम् ===
| verse_id = BS_C03_S03_V50
| id      = BS_C03_S03_V50_B5
| text    =
‘नास्त्यकृतः कृतेन’ इत्युपपत्तिश्च ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V50
| id      = BS_C03_S03_V50_B6
| text    =
‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः’इति युक्तिमद्बगवद्वचनम् ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V50
| id      = BS_C03_S03_V50_B9
| text    =
अतो न प्रमाणान्तरबाधः ।’कर्मण्यैव’ इत्ययोगव्यवच्छेदः ॥ 50 ॥
}}
 
=== अनुबन्धाद्यधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 1,620: Line 1,343:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अनुबन्धादिभ्यः ॥ 51-416
| verse_line1  = (416)ओम् अनुबन्धादिभ्यः ओम् 03-03-51 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V51
| id      = BS_C03_S03_V51_author-note
| text    =
॥ इति अनुबन्धाद्यधिकरणम् ॥ 31॥
}}
}}


Line 1,635: Line 1,351:
| id      = BS_C03_S03_V51_B1
| id      = BS_C03_S03_V51_B1
| text    =
| text    =
न केवलं श्रवणादिभिर्गुरुप्रसादेन च ब्रह्मदर्शनम् ।
न केवलं श्रवणादिभिर्गुरुप्रसादेन च ब्रह्मदर्शनम् । किन्तु भक्त्यादिभिश्च
}}
}}


Line 1,642: Line 1,358:
| id      = BS_C03_S03_V51_B2
| id      = BS_C03_S03_V51_B2
| text    =
| text    =
किन्तु भक्त्यादिभिश्च
‘सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वज्ञो विष्णुतत्परः ।यद्गुरुः सुप्रसन्नः सन् दद्यात् तन्नान्यथा भवेत् ॥तथाऽप्यनादिसंसिद्धो भक्त्यादिगुणपूगतः
लभेद्गुरुप्रसादं च तस्मादेव च तद्भवेत्’() इति ॥
}}
}}


Line 1,649: Line 1,366:
| id      = BS_C03_S03_V51_B3
| id      = BS_C03_S03_V51_B3
| text    =
| text    =
‘सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वज्ञो विष्णुतत्परः ।
‘भक्तिर्विष्णौ गुरौ चैव गुरोर्नित्यप्रसन्नताम् ।दद्याच्छमदमादिं च तेन चैते गुणाः पुनः ॥तैः सर्वैर्दर्शनं विष्णोः श्रवणादिकृतं भवेत्’ ॥इति नारायणतन्त्रे ॥ 51
यद्गुरुः सुप्रसन्नः सन् दद्यात् तन्नान्यथा भवेत्
}}
}}


{{Bhashyam
=== दर्शनभेधादिकरणम् (प्रज्ञान्तराधिकरणम्) ===
| verse_id = BS_C03_S03_V51
| id      = BS_C03_S03_V51_B5
| text    =
तथाऽप्यनादिसंसिद्धो भक्त्यादिगुणपूगतः ।
लभेद्गुरुप्रसादं च तस्मादेव च तद्भवेत्’ इति ॥
}}


{{Bhashyam
{{VerseBlock
| verse_id = BS_C03_S03_V51
| verse_id      = BS_C03_S03_V52
| id      = BS_C03_S03_V51_B7
| document_id  = BS
| text    =
‘भक्तिर्विष्णौ गुरौ चैव गुरोर्नित्यप्रसन्नताम् ।
दद्याच्छमदमादिश्च तेन चैते गुणाः पुनः ॥
तैः सर्वैर्दर्शनं विष्णोः श्रवणादिकृतं भवेत्’
इति नारायणतन्त्रे ॥ 51 ॥
}}
 
=== दर्शनबेधादिकरणम् (प्रज्ञान्तराधिकरणम्) ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S03_V52
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद्दृष्टिश्च तदुक्तम् ॥ 52-417
| verse_line1  = (417)ओं प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद्दृष्टिश्च तदुक्तम् ओम् 03-03-52 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V52
| id      = BS_C03_S03_V52_author-note
| text    =
॥ इति दर्शनबेधादिकरणम् (प्रज्ञान्तराधिकरणम्) ॥ 52 ॥
}}
}}


Line 1,693: Line 1,384:
| id      = BS_C03_S03_V52_B1
| id      = BS_C03_S03_V52_B1
| text    =
| text    =
उपासनाभेदवद्दर्शनभेदः । तच्चोक्तं कमठश्रुतौ
उपासनाभेदवद्दर्शनभेदः । तच्चोक्तं कमठश्रुतौ –‘अन्तर्दृष्टयो बहिर्दृष्टयोऽवतारदृष्टयः सर्वदृष्टय इति । देवावाव सर्वदृष्टयस्तेषु चोत्तरोत्तरमाब्रह्मणोऽन्येषु तु यथायोगं यथा ह्याचार्या आचक्षते’ इति ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V52
| id      = BS_C03_S03_V52_B2
| text    =
‘अन्तर्दृष्टयो बहिर्दृष्टयोऽवतारदृष्टयः सर्वदृष्टय इति । देवावाव सर्वदृष्टयस्तेषु चोत्तरोत्तरमाब्रह्मणोऽन्येषु यथायोगं यथा ह्याचार्या आचक्षते’ इति । आध्यात्मे च –
}}
}}


Line 1,707: Line 1,391:
| id      = BS_C03_S03_V52_B3
| id      = BS_C03_S03_V52_B3
| text    =
| text    =
‘दृष्ट्वैव ह्यवताराणां मुच्यन्ते केचिदञ्जसा
आध्यात्मे च –
दर्शनेनान्तरेणान्ये देवाः सर्वत्र दर्शनात्
‘दृष्ट्वैव ह्यवताराणां मुच्यन्ते केचिदञ्जसा ।दर्शनेनान्तरेणान्ये देवाः सर्वत्र दर्शनात् ॥तेषां विशेषमाचार्यो वेत्ति सर्वज्ञतां गतः’ इति ॥ 52 ॥
तेषां विशेषमाचार्यो वेत्ति सर्वज्ञतां गतः’ इति ॥ 52 ॥
}}
}}


Line 1,719: Line 1,402:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ 53-418
| verse_line1  = (418)ओं न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ओम् 03-03-53 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V53
| id      = BS_C03_S03_V53_author-note
| text    =
॥ इति नसामान्याधिकरणम् ॥ 33 ॥
}}
}}


Line 1,741: Line 1,417:
| id      = BS_C03_S03_V53_B2
| id      = BS_C03_S03_V53_B2
| text    =
| text    =
‘सामान्यदर्शनाल्लोका मुक्तिर्योग्यात्मदर्शनात्’इति हि नारायणतन्त्रे॥
‘सामान्यदर्शनाल्लोका मुक्तिर्योग्यात्मदर्शनात्’इति हि नारायणतन्त्रे॥‘मुच्यते नात्र सन्देहो दृष्ट्वा तु स्वात्मयोग्यया’ इति च ॥‘दर्शनेनात्मयोग्येन मुक्तिर्नान्येन केनचित्’ इति चाध्यात्मे ॥ 53 ॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== ताद्विध्याधिकरणम् (परेणाधिकरणम्) ===
| verse_id = BS_C03_S03_V53
| id      = BS_C03_S03_V53_B4
| text    =
‘मुच्यते नात्र सन्देहो दृष्ट्वा तु स्वात्मयोग्यया’ इति च ॥
}}


{{Bhashyam
{{VerseBlock
| verse_id = BS_C03_S03_V53
| id      = BS_C03_S03_V53_B5
| text    =
‘दर्शनेनात्मयोग्येन मुक्तिर्नान्येन केनचित्’ इति चाध्यात्मे ॥ 53 ॥
}}
 
=== ताद्विध्याधिकरणम् (परेणाधिकरणम्) ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S03_V54
| verse_id      = BS_C03_S03_V54
| document_id  = BS
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = परेण शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात् त्वनुबन्धः ॥ 54-419
| verse_line1  = (419)ओं परेण शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात् त्वनुबन्धः ओम् 03-03-54 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,773: Line 1,435:
| id      = BS_C03_S03_V54_summary
| id      = BS_C03_S03_V54_summary
| text    =
| text    =
‘भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी’ इति माठरश्रुतेर्न परमात्मना दर्शनमिति चेन्न ।
‘भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी’() इति माठरश्रुतेर्न परमात्मना दर्शनमिति चेत्, न ।‘तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम’(मुं.उ.३.२.४) इति श्रुतेः ।
              ‘तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम’ इति श्रुतेः ।
               कथं तर्ह्येषा श्रुतिः –
               कथं तर्ह्येषा श्रुतिः –
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V54
| id      = BS_C03_S03_V54_author-note
| text    =
॥ इति ताद्विध्याधिकरणम् (परेणाधिकरणम्) ॥ 34 ॥
}}
}}


Line 1,789: Line 1,443:
| id      = BS_C03_S03_V54_B1
| id      = BS_C03_S03_V54_B1
| text    =
| text    =
परमात्मैवं भक्त्या दर्शनं प्राप्य मुक्तिं ददातीति प्रधानसाधनत्वाद्भक्तिः करणत्वेनोच्यते।
परमात्मैवं भक्त्या दर्शनं प्राप्य मुक्तिं ददाति । प्रधानसाधनत्वाद्भक्तिः करणत्वेनोच्यते।
}}
}}


Line 1,797: Line 1,451:
| text    =
| text    =
मायावैभवे च
मायावैभवे च
}}
‘भक्तिस्थः परमो विष्णुस्तयैवैनं वशं नयेत् ।तयैव दर्शनं यातः प्रदद्यान्मुक्तिमेतया ॥स्नेहानुबन्धो यस्तस्मिन् बहुमानपुरस्सरः ।भक्तिरित्युच्यते सैव करणं परमीशितुः’॥इति सर्वशब्दानां ब्रह्मणि प्रवृत्तेश्च ॥ 54 ॥
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V54
| id      = BS_C03_S03_V54_B3
| text    =
‘भक्तिस्थः परमो विष्णुस्तयैवैनं वशं नयेत्
तयैव दर्शनं यातः प्रदद्यान्मुक्तिमेतया
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V54
| id      = BS_C03_S03_V54_B4
| text    =
स्नेहानुबन्धो यस्तस्मिन् बहुमानपुरस्सरः
भक्तिरित्युच्यते सैव करणं परमीशितुः’॥
इति सर्वशब्दानां ब्रह्मणि प्रवृत्तेश्च ॥ 54 ॥
}}
}}


Line 1,823: Line 1,461:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ एकः आत्मनः शरीरे भावात् ॥ 55-420
| verse_line1  = (420)ओम् एक आत्मनः शरीरे भावात् ओम् 03-03-55 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,846: Line 1,484:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = व्यतिरेकस्तद्भावभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ 56-421
| verse_line1  = (421)ओं व्यतिरेकस्तद्भावभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ओम् 03-03-56 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V56
| id      = BS_C03_S03_V56_author-note
| text    =
॥ इति एकाधिकरणम् ॥ 35 ॥
}}
}}


Line 1,869: Line 1,500:
| text    =
| text    =
परमसंहितायां च –
परमसंहितायां च –
}}
‘अंशिनस्तु पृथग्जाता अंशास्तस्यैव कर्मणा ।पुनरैक्यं प्रपद्यन्ते नात्र कार्य विचारणा’ इति ॥ 56 ॥
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V56
| id      = BS_C03_S03_V56_B4
| text    =
‘अंशिनस्तु पृथग्जाता अंशास्तस्यैव कर्मणा
पुनरैक्यं प्रपद्यन्ते नात्र कार्य विचारणा’ इति ॥ 56 ॥
}}
}}


Line 1,886: Line 1,510:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ अङ्गावबद्धास्तुन शाखासु हि प्रतिवेदनम् ॐ ॥ 57-422
| verse_line1  = (422)ओम् अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ओम् 03-03-57 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,909: Line 1,533:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ मन्त्रादिवद्वाऽविरोधः ॐ ॥ 58-423
| verse_line1  = (423)ओं मन्त्रादिवद् वाऽविरोधः ओम् 03-03-58 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V58
| id      = BS_C03_S03_V58_author-note
| text    =
॥ इति अङ्गावबद्धाधिकरणम् ॥ 36 ॥
}}
}}


Line 1,924: Line 1,541:
| id      = BS_C03_S03_V58_B1
| id      = BS_C03_S03_V58_B1
| text    =
| text    =
सर्वदेवतामन्त्रा यथाऽधीयन्त एवमविरोधो वा ।
सर्वदेवतामन्त्रा यथाऽधीयन्ते, एवमविरोधो वा ।
}}
}}


Line 1,941: Line 1,558:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ॥ 59-424
| verse_line1  = (424)ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम् 03-03-59 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V59
| id      = BS_C03_S03_V59_author-note
| text    =
॥ इति भूमाधिकरणम् ॥ 37 ॥
}}
}}


Line 1,956: Line 1,566:
| id      = BS_C03_S03_V59_B1
| id      = BS_C03_S03_V59_B1
| text    =
| text    =
सर्वगुणेषु भूमगुणस्य ज्यायस्त्वं क्रतुवत् । सर्वत्र सहभावात् दीक्षाप्रायणीयोदयनीयसवनत्र यावभृथात्मकः क्रतुः ।
सर्वगुणेषु भूमगुणस्य ज्यायस्त्वं क्रतुवत् । सर्वत्र सहभावात् दीक्षाप्रायणीयोदयनीयसवनत्रयावभृथात्मकः क्रतुः ।‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते तस्माद्भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टःइति च गौपवनश्रुतिः ॥ 59 ॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== नानाशब्दाधिकरणम् ===
| verse_id = BS_C03_S03_V59
| id      = BS_C03_S03_V59_B2
| text    =
‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते । तस्माद्भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टःइति च गौपवनश्रुतिः ॥ 59 ॥
}}
 
=== नाना(शब्दा)धिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 1,973: Line 1,576:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नाना शब्दादिभेदात् ॥ 60-425
| verse_line1  = (425)ओं नाना शब्दादिभेदात् ओम् 03-03-60 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V60
| id      = BS_C03_S03_V60_author-note
| text    =
॥ इति नाना(शब्दा)धिकरणम् ॥ 38 ॥
}}
}}


Line 1,988: Line 1,584:
| id      = BS_C03_S03_V60_B1
| id      = BS_C03_S03_V60_B1
| text    =
| text    =
‘शब्दोऽनुमा तथैवाक्षो योग्यताभेदतः सदा
‘शब्दोऽनुमा तथैवाक्षो योग्यताभेदतः सदा ।ब्रह्मादीनामेकमर्थं बहुधा दर्शयन्ति हि ॥अतः पूर्णत्वमीशस्य वानैवैषां प्रदृश्यते ।अतः फलस्य नानात्वं नानैवोपासनं यतः’ इति ब्रह्मतर्के ।
ब्रह्मादीनामेकमर्थं बहुधा दर्शयन्ति हि
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V60
| verse_id = BS_C03_S03_V60
| id      = BS_C03_S03_V60_B3
| id      = BS_C03_S03_V60_B5
| text    =
| text    =
अतः पूर्णत्वमीशस्य वानैवैषां प्रदृश्यते ।अतः फलस्य नानात्वं नानैवोपासनं यतः’ इति ब्रह्मतर्के ।
अतो भूमत्वमपि नानैवोपास्यते ॥ 60 ॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== विकल्पाधिकरणम् ===
| verse_id = BS_C03_S03_V60
| id      = BS_C03_S03_V60_B5
| text    =
अतो भूमत्वमपि नानैवोपास्यते ॥ 60 ॥
}}
 
=== विकल्पाधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 2,013: Line 1,601:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = विकल्पो विशिष्टफलत्वात् ॥ 61-426
| verse_line1  = (426)ओं विकल्पो विशिष्टफलत्वात् ओम् 03-03-61 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V61
| id      = BS_C03_S03_V61_author-note
| text    =
॥ इति विकल्पाधिकरणम् ॥ 39 ॥
}}
}}


Line 2,045: Line 1,626:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = काम्यास्तुयथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ॥ 62-427 ॥
| verse_line1  = (427)ओं काम्यास्तुयथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ओम् 03-03-62-427 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V62
| id      = BS_C03_S03_V62_author-note
| text    =
॥ इति काम्याधिकरणम् ॥ 40 ॥
}}
}}


Line 2,060: Line 1,634:
| id      = BS_C03_S03_V62_B1
| id      = BS_C03_S03_V62_B1
| text    =
| text    =
‘यस्य यस्य हि यः कामस्तस्य तस्य ह्युपासनम्
‘यस्य यस्य हि यः कामस्तस्य तस्य ह्युपासनम् ।तादृशानां गुणानां च समाहारं प्रकल्पयेत् ॥अकामत्वान्मुमुक्षूणां न वा तेषामुपासनम् ।तुष्ट्यर्थमीश्वरस्यैव न चोपास विदुष्यति’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 62 ॥
तादृशानां गुणानां च समाहारं प्रकल्पयेत्
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V62
| id      = BS_C03_S03_V62_B3
| text    =
अकामत्वान्मुमुक्षूणां न वा तेषामुपासनम् ।तुष्ट्यर्थमीश्वरस्यैव न चोपास विदुष्यति’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 62 ॥
}}
}}


Line 2,078: Line 1,644:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अङ्गेषु यथाऽऽश्रयाभावः ॥ 63-428
| verse_line1  = (428)ओम् अङ्गेषु यथाऽऽश्रयाभावः ओम् 03-03-63 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 2,086: Line 1,652:
| id      = BS_C03_S03_V63_B1
| id      = BS_C03_S03_V63_B1
| text    =
| text    =
अङ्गदेवतानां यथा यथा परमेश्वराङ्गाश्रयत्वं’चक्षोः सूर्यो अजायत’ इत्यादि तथा भावना कर्तव्या॥63॥
अङ्गदेवतानां यथा यथा परमेश्वराङ्गाश्रयत्वं‘चक्षोः सूर्यो अजायत’(ऋ.सं.१०.९०.१३) इत्यादि तथा भावना कर्तव्या॥63॥
}}
}}


Line 2,094: Line 1,660:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = शिष्टेश्च ॥ 64-429
| verse_line1  = (429)ओं शिष्टेश्च ओम् 03-03-64 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 2,110: Line 1,676:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = समाहारात् ॥ 65-430
| verse_line1  = (430)ओं समाहारात् ओम् 03-03-65 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 2,118: Line 1,684:
| id      = BS_C03_S03_V65_B1
| id      = BS_C03_S03_V65_B1
| text    =
| text    =
‘अङ्गैः पराद्ये हि देवा विसृष्टास्तत्तद्गुणान् परमे संहरेत।
‘अङ्गैः पराद्ये हि देवा विसृष्टास्तत्तद्गुणान् परमे संहरेत।तांश्चापि तत्रैव विचिन्त्य देवान् स्थानं मुमुक्षुः परमं व्रजेत’
तांश्चापि तत्रैव विचिन्त्य देवान् स्थानं मुमुक्षुः परमं व्रजेत’
इति काषायणश्रुतौ समाहारवचनाच्च ॥ 65 ॥
इति काषायणश्रुतौ समाहारवचनाच्च ॥ 65 ॥
}}
}}
Line 2,128: Line 1,693:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ॥ 66-431
| verse_line1  = (431)ओं गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ओम् 03-03-66 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V66
| id      = BS_C03_S03_V66_author-note
| text    =
॥ इति यथाश्रयभावाधिकरणम् (अङ्गाधिकरणम्) ॥ 41 ॥
}}
}}


Line 2,153: Line 1,711:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न वाऽतत्सहभावश्रुतेः ॥ 67-432 ॥
| verse_line1  = (432)ओं न वाऽतत्सहभावश्रुतेः ओम् ॥ 67-432 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 2,169: Line 1,727:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = दर्शनाच्च ॥ 68-433
| verse_line1  = (433)ओं दर्शनाच्च ओम् 03-03-68 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 2,175: Line 1,733:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V68
| verse_id = BS_C03_S03_V68
| id      = BS_C03_S03_V68_author-note
| id      = BS_C03_S03_V68_B1
| text    =
| text    =
इति नवाधिकरणम् 42
‘सत्यो ज्ञानः परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् ।नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते’॥ इति कमठश्रुतौ 68
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V68
| verse_id = BS_C03_S03
| id      = BS_C03_S03_V68_author-note
| id      = BS_C03_S03_author-note
| text    =
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 03-03 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 03-03 ॥
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S03_V68
| id      = BS_C03_S03_V68_B1
| text    =
‘सत्यो ज्ञानः परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् ।नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते’ इति कमठश्रुतौ ॥ 68 ॥
}}
}}




[[Category:Brahmasutra]]
[[Category:Brahmasutra]]

Revision as of 09:39, 10 April 2026

उपासनाऽस्मिन् पाद उच्यते। सर्वपरिज्ञानं प्रथमत उच्यते-

सर्वेवेदाधिकरणम्

(366)ओं सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात् ओम् ॥ 03-03-01 ॥


अन्तो निर्णयः । ‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तः’(भ.गी.२.१६) इति वचनात् ।
सर्ववेद निर्णयोत्पाद्यज्ञानं ब्रह्म ।‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.३.४.७) इत्यादिविधीनां तदुक्तयुक्तीनां चाविशिष्टत्वात् ॥ 01 ॥
(367)ओं भेदान्नेति चेदेकस्यामपि ओम् ॥ 03-03-02 ॥


‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृ.उ.५.९.२८)‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१) इत्यादि प्रतिशाखमुक्तिभेदान्नैकाधिकारिविषयाः सर्वशाखा इति चेन्न ।
एकस्यामपि शाखायां ‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.३.४.७)‘कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छां.उ.४.१०.५) इत्यादिभेददर्शनात् ॥ 02 ॥
(368)ओं स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च ओम् ॥ 03-03-03 ॥


‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’(तै.आ.२.१५) इति सामान्यविधेः ।
हिशब्दात् वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना’इति स्मृतेः ।
‘सर्ववेदोक्तमार्गेण कर्म कुर्वीत नित्यशः ।आनन्दो हि फलं यस्माच्छाखाभेदो ह्यशक्तिजः ॥
‘सर्वकर्मकृतौ यस्मादशक्ताः सर्वजन्तवः ।शाखाभेदं कर्मभेदं व्यासस्तस्मादचीक्लृपत्’() इति समाचारे सर्वेषामधिकाराच्च ॥ 03 ॥
(369)ओं सलिलवच्च तन्नियमः ओम् ॥ 03-03-04 ॥


यथा सर्वं सलिलं समुद्रं गच्छति एवं सर्वाणि वचनानि ब्रह्मज्ञानार्थानीति नियमः ।
आग्नेये च – ‘यथा नदीनां सलिलं शक्ये सागरगं भवेत् ।एवं वाक्यानि सर्वाणि पुंशक्त्या ब्रह्मवित्तये’() इति ॥ 04 ॥
(370)ओं दर्शयति च ओम् ॥ 03-03-05 ॥


‘सर्वैश्च वेदैः परमो हि देवो जीज्ञास्योऽसौ नाल्पवेदैः प्रसिद्ध्येत् ।तस्मादेनं सर्वेवेदानदीत्य विचार्य च ज्ञातुमिच्छेन्मुमुक्षुः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ।‘सर्वान् वेदान् सेतिहासान् सपुराणान् सयुक्तिकान् ।सपञ्चरात्रान् विज्ञाय विष्णुर्ज्ञेयो न चान्यथा’इति ब्रह्मतर्के ॥ 05 ॥

उपसंहाराधिकरणम्

(371)ओम् उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत् समाने च ओम् ॥ 03-03-06 ॥


सर्वैर्वेदैर्ज्ञेयो नोपास्योऽशक्यत्वादित्यत आह-
सर्ववेदोक्तान् गुणान् दोषाभावांश्चोपसंहृत्यैव परमात्मोपास्यः ।
‘उपास्य एकः परतः परो यो वेदैश्च सर्वैः सह चेतीहासैः ।सपञ्चरात्र्यै सपुराणैश्च देवः सर्वगुणैस्तत्र तत्र प्रतीतैः’इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
आग्नेये च-विधिशेषाणि कर्माणि सर्ववेदोदितान्यपि ।यथा कार्याणि सर्वैश्च सर्वाण्येवाविशेषतः ॥एवं सर्वगुणान् सर्वदोषाभावांश्च यत्नतः ।योजयित्वैव भगवानुपास्यो नान्यथा क्वचित्’ ॥ इति ॥
समानविषये चोपसंहारः । न तु ‘सोऽरोदीत्’(तै.सं.१.५.१) इत्यादिनाम् ।गुणैरेव स तूपास्यो नैव दोषैः कथञ्चन।गुणैरपि न तूपास्यो यो पूर्णत्वविरोधिनः’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥
(372)ओम् अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ओम् ॥ 03-03-07 ॥


‘आत्मेत्येवैपासीत’(बृ.उ.३.४.७) इतिशब्दादुपसंहारस्यान्यथात्वमिति चेत्,
न। एते गुणा नोपास्य इति विशेषवचनाभावात् । ‘सर्वैर्गुणैरेक एवेशिताऽसावुपासितव्यो न तु दोषैः कदाचित्’() इति विशेषवचनाच्च ।
आत्मेत्यवधारणमनात्मत्वनिवृत्त्यर्थम् ॥ 07 ॥
(373)ओं न वा प्रकरणभेदात् परोवरीयस्त्वादिवत् ओम् ॥ 03-03-08 ॥


प्रकरणभेदान्नवोपसंहारः कार्यः ।
परोवरीयस्त्वादिषु तावदेव ह्युक्तम् ॥ 08 ॥
(374)ओं सङ्ज्ञातश्चेत् तदुक्तमस्ति तु तदपि ओम् ॥ 03-03-09 ॥


सर्वविद्या’उक्त्वासोऽहं नामविदेवास्मि नाऽत्मवित्’(छां.उ.७.१.३) इति वचनात् सर्वस्य ब्रह्मनामत्वात् तदुपसंहारः कार्यः ।‘नामत्वात् सर्वविद्यानां गुणानामुपसंहृतिः ।कार्यैव ब्रह्मणि परे नात्र कार्या विचारणा’ इति च ब्रह्मतर्के ॥
इति चेत् सत्यम् । उक्तो ह्युपसंहारः ।
तत्प्रमाणमप्यस्त्येव । ‘नाम वा एता ब्रह्मणः सर्वविद्यास्तस्मादेकः सर्वगुणैर्विचिन्त्यः’ इति कौण्डिन्यश्रुतौ ॥ 09 ॥

प्राप्त्यधिकरणम्

(375)ओं प्राप्तेश्च समञ्जसम् ओम् ॥ 03-03-10 ॥


युज्यते चोपसंहारोऽनुपसंहारश्च योग्यताविशेषात् ।
‘गुणैः सर्वैरुपास्योऽसौ ब्रह्मणा परमेश्वरः ।अन्यैर्यथाक्रमं चैव मानुषैः कैश्चिदेव तु’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥

सर्वभेदाधिकरणम्

(376)ओं सर्वाभेदादन्यत्रेमे ओम् ॥ 03-03-11 ॥


सर्वगुणयुक्तत्वेनोपासनादन्यत्रैव फले ब्रह्मादयो भवन्ति ।
‘सम्पूर्णोपासनाद्ब्रह्मा सम्पूर्णानन्दभाग् भवेत् ।इतरे तु यथायोगं सम्यङ् मुक्तौ भवन्ति हि’ इति पाद्मे ॥ 11 ॥

आनन्दाद्यधिकरणम्

(377)ओम् आनन्दादयः प्रधानस्य ओम् ॥ 03-03-12 ॥


सर्वेषां मुमुक्षूणां कियन्नियमेनोपास्यमिति अत आह-
प्रधानफलस्य मोक्षस्यार्थे आनन्दो ज्ञानं सदात्मेत्युपास्य एव ।
‘सच्चिदानन्द आत्मेति ब्रह्मोपासा विनिश्चिता ।सर्वेषां च मुमुक्षूणां फलसाम्यादपेक्षिता’इति ब्रह्मतर्के ॥ 12 ॥

प्रियशिरस्त्वाधिकरणम्

(378)ओं प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ओम् ॥ 03-03-13 ॥


॥ इति प्रियशिरस्त्वाधिकरणम् ॥ 06 ॥
फलभेदार्थमुपचयापचययोर्भावान्न सर्वेषां प्रियशिरस्त्वादिगुणोपासाप्राप्तिः ।
‘नैव सर्वगुणाः सर्वैरुपास्या मुक्तिभेदतः ।विरिञ्चस्यैव यन्मुक्तावानन्दस्य सुपूर्णता’ इति (हि) वाराहे ॥ 13 ॥

इतराधिकरणम्

(379)ओम् इतरे त्वर्थसामान्यात् ओम् ॥ 03-03-14 ॥


इतरे गुणाः फलसाम्यापेक्षयोपसंहर्थव्याः ॥ 14 ॥

आध्यानाधिकरणम्

(380)ओम् आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ओम् ॥ 03-03-15 ॥


उपसंहारानुपसंहारप्रमाणमाह –
आध्यानार्थं हि सर्वे गुणा उच्यन्ते प्रयोजनान्तराभावात् ॥
‘ज्ञानार्थमथ ध्यानार्थं गुणानां समुदीरणा ।ज्ञातव्याश्चैव ध्यातव्या गुणाः सर्वेऽप्यतो हरेः ॥नान्यत् प्रयोजनं ज्ञानात् ध्यानात् कर्मकृतेरपि ।श्रवणाच्चाथ पाठाद्वा विद्याभिः कञ्चिदिष्यते’ इति परमसंहितायाम् ॥
‘गुणाः सर्वेऽपि वेत्तव्या ध्यातव्याश्च न संशयः ।नान्यत् प्रयोजनं मुख्यं गुणानां कथने भवेत्’() ॥
ज्ञानाध्यानसमायोगाद्गुणानां सर्वशः फलम् ।मुख्यं भवेन्न चान्येन फलं मुख्यं क्वचिद्भवेत्’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 15 ॥
(381)ओम् आत्मशब्दाच्च ओम् ॥ 03-03-16 ॥


‘आत्मेत्येवोपासीत’(बृ.उ.६.४.७) इत्यनुपसंहारप्रमाणम् ॥ 16 ॥

आत्मगृहीत्यधिकरणम्

(382)ओम् आत्मगृहीतिरितवदुत्तरात् ओम् ॥ 17-382 ॥


न च ‘आनन्दादयः प्रधानस्य’(ब्र.सू.३.३.१२) इत्युक्तिविरोधः । यतः ‘सत्यं ज्ञानमनन्तम् ब्रह्म’(तै.उ.२.१)।‘विज्ञानमानन्दम् ब्रह्म’() इतिवदेवात्मशब्दगृहीतिः ।
‘अत्र ह्येते सर्व एकीभवन्ति’(बृ.उ.३.४.७) इत्युत्तरात् ।‘आनन्दानुभवत्त्वाच्च निर्दोषत्वाच्च भण्यते ।नित्यत्वाच्च तथाऽऽत्मेति वेदवादिभिरीश्वरः’ इति (हि) बृहत्तन्त्रे ॥ 17 ॥

अन्वयाधिकरणम्

(383)ओम् अन्वयादिति चेत् स्यादवधारणात् ओम् ॥ 03-03-18 ॥


सर्वगुणानामान्वय आत्म शब्दे भवति । ‘आप्तव्याप्तेरात्मशब्दः परमस्य प्रयुज्यते’() इति वचनादिति चेत्,
सत्यम् । स्याच्च्यैवम् । ‘आत्मेत्येव’(बृ.उ.३.४.७) इत्यवधारणात् । अन्यथा सर्वोपसंहारवचनविरोधात् ॥ 18 ॥

कार्याख्यानाधिकरणम्

(384)ओं कार्याख्यानादपूर्वम् ओम् ॥ 03-03-19 ॥


‘अलौकिकास्तस्य गुणा ह्युपास्य अलौकिकं मुक्तिकार्यं यतोऽस्य’()इति कार्याख्यानादन्यत्रादृष्टा एव गुणा उपास्याः ॥ 19 ॥

समानाधिकरणम्

(385)ओं समान एवं चाभेदात् ओम् ॥ 03-03-20 ॥


अपूर्वत्वेऽपि समानानामेवोपसंहारः। न तु त्रिविक्रमत्वादीनां कादाचित्कानां पृथक्त्वेन । नित्यविक्रान्त्यादिष्वन्तर्भावात् ॥ 20 ॥

नवाधिकरणम्

(386)ओं सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ओम् ॥ 03-03-21 ॥


परमात्मसम्बन्धित्वेन नित्यत्वात् त्रिविक्रमत्वादिष्वप्युपसंहार्यत्वं युज्यते।
‘गुणास्त्रैविक्रमाद्याश्च संहर्तव्या न संशयः ।विरिञ्चस्यैव नान्येषां स हि सर्वगुणाधिकः’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 21 ॥
(387)ओं न वा विशेषात् ओम् ॥ 03-03-22 ॥


न वाऽऽत्मशब्देन सर्वगुणगृहीतिः । अधिकारिविशेषात् ॥ 22 ॥
(388)ओं दर्शयति च ओम् ॥ 03-03-23 ॥


॥ इति नवाधिकरणम् (विशेषणाधिकरणम्) ॥ 13 ॥
‘सर्वान् गुणानात्मशब्दो ब्रवीति ब्रह्मादीनामितरेषां न चैव’ इति भाल्लवेयश्रुतिः ॥ 23 ॥

सम्भृत्यधिकरणम्

(389)ओं सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ओम् ॥ 03-03-24 ॥


सम्भृतिद्युव्याप्ती अपि देवादीनामुपसंहर्तव्ये नान्येषाम् । अत एव योग्यताविशेषात् ।
‘देवादीनामुपास्यास्तु भृतिव्याप्त्यादयो गुणाः ।आनन्दाद्यास्तु सर्वेषामन्यथाऽनर्थकृद्भवेत्’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 24 ॥

पुरुषविद्याधिकरणम्

(390)ओं पुरुषविद्यायामपि चेतरेषामनाम्नानात् ओम् ॥ 03-03-25 ॥


यस्यां विद्यायां महागुणा उच्यन्ते सोत्तमानामितराऽन्येषामिति चेत्, न –
पुरुषसूक्तोक्तविद्यायामपि केषाञ्चिद्गुणानामनाम्नानात् ।
‘सर्वतः पौरुषे सूक्ते गुणा विष्णोरुदीरिताः ।तत्रापि नैव सर्वेऽपि तस्मात् कार्योपसंहृतिः’इति ब्रह्मतर्के ॥ 25 ॥

वेधाद्यधिकरणम्

(391)ओं वेधाद्यर्थभेदात् ओम् ॥ 03-03-26 ॥


‘भिन्धि विद्ध्यश्रुणीहीति फलभेदेन सर्वशः ।यत्यादीनां तेष्वयोगान्नाधिकार्येकता भवेत् ।अयोग्योपासनादीयुरनर्थं चार्थनाशनम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥

(मुक्तोपासनाधिकरणम्) हान्यधिकरणम्

(392)ओं हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात् कुशाछन्दस्तुत्युपगानवत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-27॥


मुक्तस्योपासना कर्तव्या न वा ? इत्यतोऽब्रवीत् –
नियतस्वाध्यायानन्तरं स्वेच्छया कुशाग्रहणस्तुत्युपगानवदेव मोक्ष उपासनादिः ।‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१.१) इति मोक्षवाक्यशेषत्वादितरेषाम् ॥ तच्चोक्तम् ‘एतत् सामगायन्नास्ते’(तै.उ.३.१०) इत्यादि ।
ब्रह्मतर्के च- ‘मुक्ता अपि हि कुर्वन्ति स्वेच्छयोपासनं हरेः ।नियमानन्तरं विप्राः कुशाद्यैरप्यधीयते’ इति ॥
‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः’ इति च भारते ॥ 27 ॥
(393)ओं साम्पराये तर्तव्याभावात् तथा ह्यन्ये ओम् ॥ 03-03-28 ॥


स्वेच्छयैवेत्यङ्गीकर्तव्यम् । मुक्तस्य तीर्णत्वात् ।‘तीर्णो हि तदा सर्वान् शोकान् हृदयस्य भवति’(बृ.उ.३.३.२२) इति ह्यन्ये पठन्ति ।
‘स्थितप्रज्ञत्वमाप्ता ये ज्ञानेन परमात्मनः ।ब्रह्मलोकं गताः सर्वे ब्रह्मणा च परं गताः ।तीर्णतर्तव्यभागाश्च स्वेच्छयोपासते परम्’() इति ॥ 28 ॥

छन्दाधिकरणम्

(394)ओं छन्दत उभयाविरोधात् ओम् ॥ 03-03-29 ॥


कर्मापि कुर्वन्ति न वा ? इत्यत आह –
स्वेच्छया कुर्वन्ति न वा । बन्धप्रत्यवाययोरभावात् ॥ 29 ॥
(395)ओं गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः ओम् ॥ 03-03-30 ॥


बन्धप्रत्यवायाभावे हि मोक्षस्यार्थवत्त्वम् । अन्यथा मोक्षत्वमेव न स्यात् ॥
‘कदाचित् कर्म कुर्वन्ति कदाचिन्नैव कुर्वते ।नित्यज्ञानस्वरूपत्वान्नित्यं ध्यायन्ति केशवम्’() ॥
तीर्णतर्तव्यभागा ये प्राप्तानन्दाः परात्मनः ।प्रत्यवायस्य बन्धस्याप्यभावात् स्वेच्छया भवेत्’इति हि ब्रह्माण्डे ॥ 30 ॥
(396)ओम् उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ओम् ॥ 03-03-31 ॥


उपपन्नश्चैवम्भावः । प्राप्तत्वात् तल्लक्षणस्य फलस्य । यथा लोके विद्यर्थत्वेन विष्णुक्रमणादिकं कृत्वा समाप्तकर्मेच्छया करोति न करोति च ॥ 31 ॥

अनियमाधिकरणम्

(397)ओम् अनियमः सर्वेषामविरोधाच्छब्दानुमानाभ्याम् ओम् ॥ 03-03-32 ॥


प्राप्तज्ञानानामपि केषाञ्चिन्मुक्तिप्राप्तिः केषाञ्चिन्न, यथोपसंहारनियम इति न मन्तव्यम् ।‘सर्वेगुणा ब्रह्मणैव ह्युपास्या नान्यैर्देवैः किमु सर्वैर्मनुष्यैः’() इत्युपसंहारविरोधादन्यत्राविरोधात् ।
‘न कश्चिद्ब्रह्मवित् सृतिमनुभवति मुक्तो ह्येव भवति तस्मादाहुः सृतिहेति’() इति कौण्डन्यश्रुतेश्च ।
यथा केषाञ्चिन्मोक्ष एवमन्येषामित्यनुमानाच्च॥ 32 ॥

यावदधिकाराधिकरणम्

(398)ओं यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ओम् ॥ 03-03-33 ॥


यथा यथाऽधिकारो विशिष्यते एवं मुक्तावानन्दो विशिष्यते ।‘मनुष्येभ्यो गन्धर्वाणां गन्धर्वेभ्यः ऋषीणामृषिभ्यो देवानां देवेभ्य इन्द्रस्य इन्द्राद्रुद्रस्य रुद्राद्ब्रह्मण एष ह्येव शतानन्दः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ।
‘ज्ञानं चोपासनं चैव मुक्तावानन्द एव च ।यथाधिकारं देवानां भवन्त्येवोत्तरोत्तरम्’ इति ॥ 33 ॥
(399)ओम् अक्षरधियां त्वविरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-34 ॥


न चासमत्वेन विरोधो भवति । ब्रह्मधीत्वाद्दोषाभावसाम्यादुत्तमेभ्योऽन्येषां भावाच्च । औपसदवच्छिष्यवत् ।
‘नानाविधा जीवसङ्घा विमुक्तौन चैव तेषां ब्रह्मधियां विरोधः।दोषाभावाद्गुरुशिष्यादिभावाल्लोकेऽपि नासौ किमु तेषां विमुक्तेः’ इति ॥ 34 ॥

इयदामननाधिकरणम्

(400)ओम् इयदामननात् ओम् ॥ 03-03-35 ॥


नामाध्यारभ्य प्राणान्तमुत्तरोत्तरमुत्तमत्वमुक्तम्। न प्राणात् किञ्चिद् भूय उक्तम् । तथाऽपि पूर्ववत् स्यात् इति(स्यादपीति) न वाच्यम् ।
प्राणो वाव सर्वेभ्यो भूयान्न हि प्राणाद्भूयान् प्राणो ह्येव भूयांस्तस्माद्भूयान् नाम’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 35 ॥
(401)ओम् अन्तरा भूतग्रामवदिति चेत् तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-36 ॥


यथा भूतग्राम एकस्मादेक उत्तमोऽस्त्येव, एवं प्राणादपि परमात्मानमन्तरा विद्यत इति चेत्,
न। प्राणादुत्तमाभावे प्रमाणमुक्तम् । अन्यत्रोत्तमाभावे न प्रमाणम्। दृष्यते चान्यत्रोत्तमत्वम् ॥ 36 ॥
(402)ओम् अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशवत् ओम् ॥ 03-03-37 ॥


प्राणस्य सर्वोत्तमत्वे परमात्मना भेदानुपपत्तिरिति चेत्,
न। श्रुत्युपदिष्टवदुपपत्तेः । अन्येभ्यः प्राणस्योत्तमत्वं तस्मात् परमात्मनो ह्युपदिष्टम् ॥ 37 ॥

व्यतिहाराधिकरणम्

(403)ओं व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ओम् ॥ 03-03-38 ॥


नेति चेत्, न-
उक्तं प्राणात् परमात्मन उत्तमत्वं पूर्वोक्ताध्याहारेण‘एष तु वा अतिवदति’(छां.उ.७.१६) इति विशिंषन्ति हि । यथेतरेषु विशेषणम् ।
‘उत्तमत्वं हि देवानां मुक्तावपि हि मानवात् ।तेभ्यः प्राणस्य तस्माच्च नित्यमुक्तस्य वै हरेः’ ॥इति च बृहत्तन्त्रे ॥ 38 ॥

सत्याद्यधिकरणम्

(404)ओं सैव हि सत्यादयः ओम् ॥ 03-03-39 ॥


कृतिर्निष्ठा ज्ञानमित्यादीनां भेदाद्बहव उत्तमा इति चेत्, न –
सत्यादिगुणास्तस्या एव परदेवतायाः स्वरूपभूताः ।
‘नामादिप्राणपर्यन्ताद्योहि सत्यादिरूपवान् ।तस्मै नमो भगवते विष्णवे सर्वजिष्णवे’ इति ॥
‘सत्याद्या अहमात्मान्ताः यद्गुणाः समुदीरिताः ।तस्मै नमो भगवते यस्मादेव विमुच्यते’इति चाध्यात्मे ॥ 39 ॥

कामाधिकरणम्

(405)ओं कामादितरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ओम् ॥ 03-03-40 ॥


प्रकृतेरपि जन्मादेः संसारप्राप्तेः किमिति नामादिष्वपाठ इति अत्रोच्यते-
स्वेच्छयैव मूलस्थाने स्थिताऽन्यत्र चावतारान् करोतीश्वरेच्छानुसारेण ।‘सर्वायतना सर्वकाला सर्वेच्छा सर्वज्ञा सर्वावस्था न बद्धा बन्धिका सैषा प्रकृतिविकृतिः’ इति वत्सश्रुतेः ।
‘नामादयस्तु बद्धत्वान्मोचकत्वात् परोऽपि च ।उभयोरप्यभावेन यथाऽव्यक्तं न तूदितम् ॥श्रुतौ तथा जीवपरावुच्येते किञ्चिनेतरत् ।नोच्यते च तदा तत्त्वद्वयं वै समुदाहृतम्’इति ब्रह्मतर्के ॥ 40 ॥
(406)ओम् आदरादलोपः ओम् ॥ 03-03-41 ॥


अबद्धत्वेऽपि भक्तिविशेषादेवोपासनाद्यलोपस्तस्या भवति ।
‘यथा श्रीर्नित्यमुक्ताऽपि प्राप्तकामाऽपि सर्वदा ।उपास्ते नित्यशो विष्णमेवं भक्तो हरेर्भवेत्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 41 ॥
(407)ओम् उपस्थितेस्तद्वचनात् ओम् ॥ 03-03-42 ॥


अनादिकाले भगवत्सम्बन्धित्वाद्युज्यते च नित्यमुक्तत्वं तस्याः । ‘द्वावेतावनादिनित्यावनादियुक्तौ नित्यमुक्तावनादिकृतौ नित्यकृतौ योऽयं परमो या च प्रकृती रमते ह्यस्यां परमो रमते ह्यस्मिन् प्रकृतिः स्वस्मिन् हि रमते परमो न स्वस्मिन् प्रकृतिरत एनमाहुः परम इति’ इति गौपवनश्रुतिवचनात्॥42 ॥

निर्धारणाधिकरणम्

(408)ओं तन्निर्धारणार्थनियमस्तद्दृष्टेः पृथग्ध्यप्रतिबन्धः पलम् ओं॥ 03-03-43 ॥


दर्शनार्थं ह्युपासनम् । तच्च श्रवणादेरेव भवति । अतः किमर्थमिति अत्रोच्यते–
तत्त्वनिश्चयो वेदार्थनियमश्च ब्रह्मदृष्टेः पृथगेव ।
हिशब्देन ‘आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य’(बृ.उ.४.४.५) इति श्रुतिं सूचयति ।
श्रवणादिफलं चाज्ञानविपर्ययादिदर्शनप्रतिबन्धनिवृत्तिः ।

ब्रह्मतर्के च –

‘श्रुत्वा मत्वा तथा ध्यात्वा तदज्ञानविपर्ययौ ।संशयं च पराणुद्य लभते ब्रह्मदर्शनम्’() इति ॥ 43 ॥

प्रदानाधिकरणम्

(409)ओं प्रदानवदेव हि तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-44 ॥


न च श्रवणादिमात्रेण ब्रह्मदृष्टिर्भवति, किन्तु सेतिकर्तव्येन । यथा गुरुदत्तं तथैव भवति।‘आचार्यवान् पुरुषो वेद’(छां.उ.६.१४.२) इति ह्युक्तम् ॥ 44 ॥

गुरुप्रसादाधिकरणम् (लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणम्)

(410)ओं लिङ्गभूयस्त्वात् तद्धि बलीयस्तदपि ओम् ॥ 03-03-45 ॥


गुरुप्रसादः स्वप्रयत्नो वा बलवानिति निगद्यते-
ऋषभादिभ्यो विद्यां ज्ञात्वाऽपि सत्यकामेन‘भगवांस्त्वेव मे कामं ब्रूयात्’(छां.उ.४.९.२), श्रुतं ह्येव भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्‍ध्वेव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति’(छां.उ.४.९.३) इति वचनात् ।‘अत्र ह न किञ्चन वीयाय’(छां.उ.४.९.३) इत्यनुज्ञानादुपकोसलवचनाच्च लिङ्गभूयस्त्वाद्गुरुप्रसाद एव बलवान्(गुरुप्रदानमेव बलवत्) ।
तर्हि तावताऽलमिति न मन्तव्यम् ।‘श्रोतव्यो मन्तव्यः’(बृ.उ.४.४.५) इत्यादेस्तदपि कर्तव्यम् ।

वाराहे च –

‘गुरुप्रसादो बलवान्न तस्माद्बलवत्तरम् ।तथाऽपि श्रवणादिश्च कर्तव्यो मोक्षसिद्धये’() इति ॥ 45 ॥

पूर्वविकल्पाधिकरणम्

(411)ओं पूर्वविकल्पः प्रकरणात् स्यात् क्रियामानसवत् ओम् ॥ 03-03-46 ॥


न च पूर्वप्राप्त एव गुरुरिति नियमः । समग्रानुग्रहं चेत् पश्चात्तनः करोति स्वयमेव तदा विकल्पः स्यात् ।
मानसक्रियावत्, यथोभयोर्ध्यानयोः समयोः ।‘पूर्वस्मादुत्तमो लब्धः स्वयमेव गुरुर्यदि ।गृह्णीयादविचारेण विकल्पः समयोर्भवेत्’ ॥
समग्रानुग्रहाभावात् सत्यकामः स्वकं गुरुम् ।ऋषभाद्यनुज्ञया चैष प्राप तस्माद्धि युज्यते’इति बृहत्तन्त्रे ॥
‘समग्रानुग्रहं कश्चित् स्वयमेव समो यदि ।कुर्यात् पुनश्च गृह्णीयादविरोधेन कामतः ॥ध्यानयोः समयोर्यद्वद्विकल्पः कामतो भवेत् ।एवं गुरोर्द्वितीयस्य विकल्पो ग्रहणेऽपि च’इति महासंहितायाम् ॥ 46 ॥
(412)ओम् अतिदेशाच्च ओम् ॥ 03-03-47 ॥


‘ब्रह्मोपास्त्व बह्मोपचरस्व तच्छ्रुणु हि तत्त्वामवतु । या ब्रह्मोपचरेर्यथा मामुपचरेर्ये चान्येऽस्मद्विधाः श्रेयसश्च तानुपास्व तानुपचरस्व तेभ्यः शृणु हि ते त्वामवन्तु’ इति पौष्यायणश्रुतावतिदेशाच्च॥ 47 ॥

विद्याधिकरणम्

(413)ओं विद्यैव तु निर्धारणात् ओम् ॥ 03-03-48 ॥


न च‘कर्मण्यैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः’(भ.गी.३.२०)इत्यादिनाऽन्यन्मोक्षसाधनम् ।
‘तमेवं विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय’(श्वे.उ.३.८) इति निर्धारणाद् विद्ययैव मोक्षः ॥ 48 ॥
(414)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 03-03-49 ॥


न केवलं विद्यया किन्त्वपरोक्षज्ञानेनैव च।
‘सर्वान् परो माययाऽयं सिनीते दृष्ट्वैव तं मुच्यते नापरेण’ इति कौशिकश्रुतेः ॥ 49 ॥

अबाधाधिकरणम् (श्रुत्यधिकरणम्)

(415)ओं श्रुत्यादिबलीयास्त्वाच्च न बाधः ओम् ॥ 03-03-50 ॥


सावधारणा बलवति श्रुतिः ।‘इन्द्रोऽश्वमेधांश्चतमिष्ट्वाऽपि राजा ब्रह्माणमीढ्यं समुवाचोपसन्नः॥न कर्मभिर्न धनैर्नैव चान्यैः पश्येत् सुखं तेन तत्त्वं ब्रवीहि’इति बलवल्लिङ्गम् ॥‘नास्त्यकृतः कृतेन’(मुं.उ.१.२.१२) इत्युपपत्तिश्च ।
‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते ।तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः’इति युक्तिमद्बगवद्वचनम् ॥
अतो न प्रमाणान्तरबाधः ।‘कर्मण्यैव’(भ.गी.३.२०) इत्ययोगव्यवच्छेदः ॥ 50 ॥

अनुबन्धाद्यधिकरणम्

(416)ओम् अनुबन्धादिभ्यः ओम् ॥ 03-03-51 ॥


न केवलं श्रवणादिभिर्गुरुप्रसादेन च ब्रह्मदर्शनम् । किन्तु भक्त्यादिभिश्च ।
‘सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वज्ञो विष्णुतत्परः ।यद्गुरुः सुप्रसन्नः सन् दद्यात् तन्नान्यथा भवेत् ॥तथाऽप्यनादिसंसिद्धो भक्त्यादिगुणपूगतः । लभेद्गुरुप्रसादं च तस्मादेव च तद्भवेत्’() इति ॥
‘भक्तिर्विष्णौ गुरौ चैव गुरोर्नित्यप्रसन्नताम् ।दद्याच्छमदमादिं च तेन चैते गुणाः पुनः ॥तैः सर्वैर्दर्शनं विष्णोः श्रवणादिकृतं भवेत्’ ॥इति नारायणतन्त्रे ॥ 51 ॥

दर्शनभेधादिकरणम् (प्रज्ञान्तराधिकरणम्)

(417)ओं प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद्दृष्टिश्च तदुक्तम् ओम् ॥ 03-03-52 ॥


उपासनाभेदवद्दर्शनभेदः । तच्चोक्तं कमठश्रुतौ –‘अन्तर्दृष्टयो बहिर्दृष्टयोऽवतारदृष्टयः सर्वदृष्टय इति । देवावाव सर्वदृष्टयस्तेषु चोत्तरोत्तरमाब्रह्मणोऽन्येषु तु यथायोगं यथा ह्याचार्या आचक्षते’ इति ।
आध्यात्मे च – ‘दृष्ट्वैव ह्यवताराणां मुच्यन्ते केचिदञ्जसा ।दर्शनेनान्तरेणान्ये देवाः सर्वत्र दर्शनात् ॥तेषां विशेषमाचार्यो वेत्ति सर्वज्ञतां गतः’ इति ॥ 52 ॥

न सामान्याधिकरणम्

(418)ओं न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ओम् ॥ 03-03-53 ॥


न सामान्यदर्शनमात्रेण मुक्तिः । यथा मृत्युमात्रात् । न हि लोकापत्तिमात्रं मुक्तिः ।
‘सामान्यदर्शनाल्लोका मुक्तिर्योग्यात्मदर्शनात्’इति हि नारायणतन्त्रे॥‘मुच्यते नात्र सन्देहो दृष्ट्वा तु स्वात्मयोग्यया’ इति च ॥‘दर्शनेनात्मयोग्येन मुक्तिर्नान्येन केनचित्’ इति चाध्यात्मे ॥ 53 ॥

ताद्विध्याधिकरणम् (परेणाधिकरणम्)

(419)ओं परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात् त्वनुबन्धः ओम् ॥ 03-03-54 ॥


‘भक्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी’() इति माठरश्रुतेर्न परमात्मना दर्शनमिति चेत्, न ।‘तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम’(मुं.उ.३.२.४) इति श्रुतेः । कथं तर्ह्येषा श्रुतिः –
परमात्मैवं भक्त्या दर्शनं प्राप्य मुक्तिं ददाति । प्रधानसाधनत्वाद्भक्तिः करणत्वेनोच्यते।
मायावैभवे च ‘भक्तिस्थः परमो विष्णुस्तयैवैनं वशं नयेत् ।तयैव दर्शनं यातः प्रदद्यान्मुक्तिमेतया ॥स्नेहानुबन्धो यस्तस्मिन् बहुमानपुरस्सरः ।भक्तिरित्युच्यते सैव करणं परमीशितुः’॥इति सर्वशब्दानां ब्रह्मणि प्रवृत्तेश्च ॥ 54 ॥

एकाधिकरणम्

(420)ओम् एक आत्मनः शरीरे भावात् ओम् ॥ 03-03-55 ॥


जीवांशानां पृथगुत्पत्तेर्नानादियोग्यतापेक्षेति न मन्तव्यम् । कुतः ?
अंशांशिनोरेकत्वमेव । अंशिकर्मनिर्मितशरीर एवांशस्य भावात् ॥ 55 ॥
(421)ओं व्यतिरेकस्तद्भावभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ओम् ॥ 03-03-56 ॥


ज्ञानादिभेधे विद्यमानेऽपि नांशांशिनोः पृथग्भाव एव । तदुपासनादिभोगादंशस्य ।
परमसंहितायां च – ‘अंशिनस्तु पृथग्जाता अंशास्तस्यैव कर्मणा ।पुनरैक्यं प्रपद्यन्ते नात्र कार्य विचारणा’ इति ॥ 56 ॥

अङ्गावबद्धाधिकरणम्

(422)ओम् अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ओम् ॥ 03-03-57 ॥


ब्रह्माद्यङ्गदेवतावबद्धोपासनादि प्रतिशाखं प्रतिवेदं च नोपसंह्रियते। हिशब्दात्
‘समत्वाद्वोत्तमत्वाद्वा नाङ्गदेवाद्युपासनम् ।उपसंहार्यमित्याहुर्वेदसिद्धान्तवेदिनः’इति ब्रह्मतर्कवचनात् ॥ 57 ॥
(423)ओं मन्त्रादिवद् वाऽविरोधः ओम् ॥ 03-03-58 ॥


सर्वदेवतामन्त्रा यथाऽधीयन्ते, एवमविरोधो वा ।
‘उपासनाङ्गदेवानां परमाङ्गतया भवेत् ।उपसंहृतिर्विशेषे तु फलनामन्यथा न तु ॥पुरुषाणां विशेषाद्वा यथायोगं भविष्यति’इति बृहत्तन्त्रे ॥ 58 ॥

भूमाधिकरणम्

(424)ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम् ॥ 03-03-59 ॥


सर्वगुणेषु भूमगुणस्य ज्यायस्त्वं क्रतुवत् । सर्वत्र सहभावात् दीक्षाप्रायणीयोदयनीयसवनत्रयावभृथात्मकः क्रतुः ।‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते । तस्माद्भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टःइति च गौपवनश्रुतिः ॥ 59 ॥

नानाशब्दाधिकरणम्

(425)ओं नाना शब्दादिभेदात् ओम् ॥ 03-03-60 ॥


‘शब्दोऽनुमा तथैवाक्षो योग्यताभेदतः सदा ।ब्रह्मादीनामेकमर्थं बहुधा दर्शयन्ति हि ॥अतः पूर्णत्वमीशस्य वानैवैषां प्रदृश्यते ।अतः फलस्य नानात्वं नानैवोपासनं यतः’ इति ब्रह्मतर्के ।
अतो भूमत्वमपि नानैवोपास्यते ॥ 60 ॥

विकल्पाधिकरणम्

(426)ओं विकल्पो विशिष्टफलत्वात् ओम् ॥ 03-03-61 ॥


स्वयोग्योपासनानन्तरं सामान्यस्यापि कस्यचिदुपासनं विकल्पेन भवति विशिष्टफलापेक्षया ।
‘मुक्त्यर्थमात्मयोग्यं हि कार्यमेव ह्युपासनम् ।नृसिंहादिकमन्यच्च दुरितादिनिवृत्तये ॥उपास्यते यथायोगं न वा फलविभेदतः’ इति च ब्रह्मतर्के ॥ 61 ॥

काम्याधिकरणम्

(427)ओं काम्यास्तुयथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ओम् ॥ 03-03-62-427 ॥


‘यस्य यस्य हि यः कामस्तस्य तस्य ह्युपासनम् ।तादृशानां गुणानां च समाहारं प्रकल्पयेत् ॥अकामत्वान्मुमुक्षूणां न वा तेषामुपासनम् ।तुष्ट्यर्थमीश्वरस्यैव न चोपास विदुष्यति’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 62 ॥

यथाश्रयभावाधिकरणम् (अङ्गाधिकरणम्)

(428)ओम् अङ्गेषु यथाऽऽश्रयाभावः ओम् ॥ 03-03-63 ॥


अङ्गदेवतानां यथा यथा परमेश्वराङ्गाश्रयत्वं‘चक्षोः सूर्यो अजायत’(ऋ.सं.१०.९०.१३) इत्यादि तथा भावना कर्तव्या॥63॥
(429)ओं शिष्टेश्च ओम् ॥ 03-03-64 ॥


‘यस्मिन् यस्मिन् यो हि चाङ्गे निविष्टः परस्य चिन्त्यः स तथा तथैव’ इति पौत्रायणश्रुतेः ॥ 64 ॥
(430)ओं समाहारात् ओम् ॥ 03-03-65 ॥


‘अङ्गैः पराद्ये हि देवा विसृष्टास्तत्तद्गुणान् परमे संहरेत।तांश्चापि तत्रैव विचिन्त्य देवान् स्थानं मुमुक्षुः परमं व्रजेत’ ॥ इति काषायणश्रुतौ समाहारवचनाच्च ॥ 65 ॥
(431)ओं गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ओम् ॥ 03-03-66 ॥


‘साधारण्यात् सर्वगुणाः परस्य समाहार्यास्तत्त्वदृशो मुमुक्षोः’ इति माण्डव्यश्रुतेश्च ॥ 66 ॥

नवाधिकरणम्

(432)ओं न वाऽतत्सहभावश्रुतेः ओम् ॥ 67-432 ॥


न वाऽङ्गदेवतोपसंहारः कार्यः । उपसंहारस्य सहाश्रवणात् ॥ 67 ॥
(433)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 03-03-68 ॥


‘सत्यो ज्ञानः परमानन्दरूप आत्मेत्येवं नित्यदोपासनं स्यात् ।नान्यत् किञ्चित् समुपासीत धीरः सर्वैर्गुणैर्देवगणा उपासते’॥ इति कमठश्रुतौ ॥ 68 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 03-03 ॥