Brahmasutra/C3/S2: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (324)ओं सन्ध्ये सृष्टिराह हि ओम् ॥ 03-02-01 ॥ | ||
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न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते । ‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ | न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते । | ||
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‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते’(बृ.उ.६.३.१०) इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (325)ओं निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ओम् ॥ 03-02-02॥ | ||
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‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’ इति च । | ‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’(क.उ.२.२.८) इति च । ‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥ | ||
‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (326)ओं मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ओम् ॥03-02-03॥ | ||
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| Line 66: | Line 68: | ||
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अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण | अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति। | ||
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| Line 73: | Line 75: | ||
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नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात् । | |||
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यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता | ब्रह्माण्डे च – | ||
‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः ।प्रदर्शयति जीवाय स्वप्न इति गीयते ॥ | |||
यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता ।अनभिव्यक्तरूपत्वान्नान्यसाधनजं भवेत्॥’ इति ॥ 03 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (327)ओं सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ओम् ॥ 03-02-04 ॥ | ||
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| Line 105: | Line 100: | ||
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साधनान्तराभावेऽपि | साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेनेश्वरो(न चेश्वरो) दर्शयति । | ||
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| Line 112: | Line 107: | ||
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‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति | ‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति ।समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने॥’(छां.उ.५.२.८) इत्यादिश्रुतेः । | ||
हिशब्दाद्दर्शनाच्च। | |||
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| Line 127: | Line 115: | ||
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‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो | ‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद् देवतावृषभोऽपि वा ।स्वप्नस्थमथवा राजा तत् तथैव भविष्यति॥’ | ||
इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥ | इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 145: | Line 126: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (328)ओं पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ओम् ॥03-02-05॥ | ||
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| Line 160: | Line 134: | ||
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बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव | बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नादितिरस्कर्ता । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (329)ओं देहयोगाद्वासोऽपि ओम् ॥ 03-02-06 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (330)ओं तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि ह ओम् ॥ 03-02-07॥ | ||
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| Line 224: | Line 184: | ||
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जाग्रत्स्वप्नाभावः | जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिर्नाडीस्थे परमात्मनि । | ||
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| Line 231: | Line 191: | ||
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‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’ ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेः ॥ 07 ॥ | ‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’(छां.उ.८.६.३), ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’(छां.उ.६.८.१) इति श्रुतेः ॥ 07 ॥ | ||
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| Line 241: | Line 201: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (331)ओम् अतः प्रभोधोऽस्मात् ओम् ॥ 03-02-08॥ | ||
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यतस्तस्मिन् सुप्तिः | यतस्तस्मिन् सुप्तिः । | ||
‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातैष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥ | |||
‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष | |||
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| Line 273: | Line 220: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (332)ओं स एव च कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ओम् ॥ 03-02-09॥ | ||
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| Line 288: | Line 228: | ||
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| text = | | text = | ||
न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति कर्मण्यवधारणात् ॥ | न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव(एनं) साधु कर्म कारयति’(कौ.ब्रा.३.९) इति कर्मण्यवधारणात् ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 295: | Line 235: | ||
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| text = | | text = | ||
‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु | ‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु ।परमः पुरुषो विष्णुस्ततोऽन्यो नास्ति कश्चन’ इत्यनुसारिस्मृतेश्च ॥ | ||
‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयत्यथैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥ | |||
‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष | |||
}} | }} | ||
| Line 310: | Line 243: | ||
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| text = | | text = | ||
‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.३.५.९(१.४.१५)) इति च विधिः ॥ 09 ॥ | |||
}} | }} | ||
=== सम्पत्त्यधिकरणम् === | === सम्पत्त्यधिकरणम्(मुग्धप्राप्त्यधिकरणम्) === | ||
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| Line 320: | Line 253: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (333)ओं मुग्धेऽर्धसम्पत्तिः परिशेषात् ओम् ॥ 03-02-10॥ | ||
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| Line 342: | Line 268: | ||
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‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् | ‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् ॥यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 373: | Line 292: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (334)ओं न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ओम् ॥ 03-02-11 ॥ | ||
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| Line 381: | Line 300: | ||
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स्थानापेक्षया परमात्मनोऽपि भेदादनुग्राह्यानुग्राहकभाव इत्यत आह- | |||
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| Line 395: | Line 314: | ||
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‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति श्रुतिः । | ‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’(ऐ.आ.३.२.३) इति श्रुतिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 402: | Line 321: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः | ‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद् रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 409: | Line 328: | ||
| id = BS_C03_S02_V11_B5 | | id = BS_C03_S02_V11_B5 | ||
| text = | | text = | ||
‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’ | ‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’(भाग.१.९.४९/४२) ॥ इति च भागवते ॥ 11 ॥ | ||
इति च भागवते ॥ 11 ॥ | |||
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| Line 418: | Line 336: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (335)ओं न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ओं॥ 03-02-12 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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| Line 426: | Line 344: | ||
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| text = | | text = | ||
‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ | ‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ ।प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः’(मां.उ.२.३/२.१६) ॥ | ||
इति भेदवचनान्नेति चेत्, न । | |||
इति भेदवचनान्नेति | |||
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| Line 435: | Line 352: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ | ‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.उ.५.७.३),‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’(बृ.उ.४.५.१),‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्(बृ.उ.४.५.१९)’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥ | ||
‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’ | |||
‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । | |||
}} | }} | ||
| Line 457: | Line 360: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (336)ओम् अपि चैवमेके ओम् ॥ 03-02-13 ॥ | ||
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| Line 472: | Line 368: | ||
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‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः’(मां.उ.४.७) इति । | |||
‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः | |||
}} | }} | ||
| Line 494: | Line 382: | ||
| id = BS_C03_S02_V13_B5 | | id = BS_C03_S02_V13_B5 | ||
| text = | | text = | ||
‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद् भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः ।निर्दोषाद्वयरूपोऽपि कथ्यते परमेश्वरः’ इति ॥ 13 ॥ | |||
‘बद्धो | |||
}} | }} | ||
| Line 512: | Line 392: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (337)ओम् अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ओम् ॥ 14-337 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 527: | Line 407: | ||
| id = BS_C03_S02_V14_B1 | | id = BS_C03_S02_V14_B1 | ||
| text = | | text = | ||
प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव | प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद् ब्रह्म । हि शब्दाद् ‘अस्थूलमनणु’(बृ.उ.५.८.८) इत्यादिश्रुतेश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 542: | Line 422: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (338)ओं प्रकाशवच्चावैयर्थ्यम् ओम् ॥ 03-02-15 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 550: | Line 430: | ||
| id = BS_C03_S02_V15_B1 | | id = BS_C03_S02_V15_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं | ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’(मुं.उ.३.१.३),‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये’(छां.उ.८.१३.१),‘सुवर्णज्योतिः’(तै.उ.३.१०) इत्यादिश्रुतीनां च न वैयर्थ्यम् । विलक्षणरूपवत्वात् । | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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| text = | |||
यथा चक्षुरादिप्रकाशे विद्यमानेऽपि वैलक्षण्यादप्रकाशादिव्यवहारः ॥ 15 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 559: | Line 445: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (339)ओम् आह च तन्मात्रम् ओम् ॥ 03-02-16 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 567: | Line 453: | ||
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वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य | वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं ‘ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’(मां.उ.२.१) इति ।आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 582: | Line 461: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (340)ओं दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ओम् ॥ 03-02-17 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 597: | Line 469: | ||
| id = BS_C03_S02_V17_B1 | | id = BS_C03_S02_V17_B1 | ||
| text = | | text = | ||
दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं | दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं ‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’(मुं.उ.२.२.८) इति ॥‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥ | ||
‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’ इति | |||
}} | }} | ||
| Line 621: | Line 479: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (341)ओम् अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ओम् ॥ 03-02-18 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 636: | Line 487: | ||
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| text = | | text = | ||
यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न | यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद् भेदः, अत एव सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा ‘च’शब्देन भेदं दर्शयति । | ||
}} | }} | ||
| Line 643: | Line 494: | ||
| id = BS_C03_S02_V18_B2 | | id = BS_C03_S02_V18_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘रूपं रूपं प्रतिरूपो | ‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(बृ.उ.४.५.१९)। | ||
}} | }} | ||
| Line 650: | Line 501: | ||
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| text = | | text = | ||
‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले | ‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले ।एवमेवाऽत्मका लोके परात्मसदृशा मताः’ इत्यादि ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 658: | Line 508: | ||
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| text = | | text = | ||
अत एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 668: | Line 518: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (342)ओम् अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् ओम् ॥ 03-02-19॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 676: | Line 526: | ||
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| text = | | text = | ||
नित्यसिद्धत्वात् सादृश्यस्य नित्यानन्दज्ञानादेर्न | नित्यसिद्धत्वात् सादृश्यस्य नित्यानन्दज्ञानादेर्न भक्तिज्ञानादि(ना)प्रयोजनमित्यतो ब्रवीति- | ||
}} | }} | ||
| Line 697: | Line 540: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ इति हि श्रुतिः। | ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(क.उ.१.२.२३) इति हि श्रुतिः। | ||
}} | }} | ||
| Line 704: | Line 547: | ||
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| text = | | text = | ||
‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते | ‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तयैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 714: | Line 557: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (343)ओं वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ओम् ॥03-02-20॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 722: | Line 565: | ||
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| text = | | text = | ||
तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् । | तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 728: | Line 571: | ||
| verse_id = BS_C03_S02_V20 | | verse_id = BS_C03_S02_V20 | ||
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| text = | |||
एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीन् अन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति। | |||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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| text = | | text = | ||
‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥ | ‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥ | ||
| Line 737: | Line 587: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (344)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 03-02-21 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 746: | Line 596: | ||
| text = | | text = | ||
कुतः? – | कुतः? – | ||
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| Line 759: | Line 602: | ||
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| text = | | text = | ||
अथात ‘आनन्दस्य मीमांसा भवति’(तै.उ.२.८.१) इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् ।चशब्दात् स्मृतिः-‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे ।तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने’ इति ॥ 21 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 777: | Line 612: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (345)ओं प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ओम् ॥ 03-02-22 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 786: | Line 621: | ||
| text = | | text = | ||
सृष्टिसंहारकर्तृत्वमेवास्य न पालकत्वं स्वतः सिद्धेरित्यत आह- | सृष्टिसंहारकर्तृत्वमेवास्य न पालकत्वं स्वतः सिद्धेरित्यत आह- | ||
}} | }} | ||
| Line 799: | Line 627: | ||
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| text = | | text = | ||
उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति | उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति- ‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’(ऋ.सं.१०.३१.८) इति । | ||
‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’ इति । | |||
}} | }} | ||
| Line 813: | Line 634: | ||
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| text = | | text = | ||
च शब्दात् स्मृतिश्च | च शब्दात् स्मृतिश्च ।‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 830: | Line 644: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (346)ओं तदव्यक्तमाह हि ओम् ॥ 03-02-23॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 845: | Line 659: | ||
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| text = | | text = | ||
अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः । | अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः । ‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्क(ष्फ)लम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्॥’ इति हि कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥ | ||
‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च | |||
}} | }} | ||
| Line 860: | Line 667: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (347)ओम् अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ओम् ॥ 03-02-24 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 875: | Line 682: | ||
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| text = | | text = | ||
‘न तमाराधयित्वाऽपि | ‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद् व्यक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 883: | Line 690: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (348)ओं प्रकाशवच्चावैशेष्यम् ओम् ॥ 03-02-25 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 891: | Line 698: | ||
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| text = | | text = | ||
नित्याव्यक्तरूपेण तथैव | नित्याव्यक्तरूपेण तथैव तिष्ठति; व्यक्तं किञ्चिद् रूपं गृहीत्वा दृश्यते; यधाऽग्न्यादयस्तन्मात्रारूपेणादृश्या अपि स्थूलरूपेण दृश्यन्ते। एवं इति चेत्, न- | ||
}} | }} | ||
| Line 905: | Line 712: | ||
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| text = | | text = | ||
‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः | ‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परमः’ इति माण्डव्यश्रुतेः । | ||
}} | }} | ||
| Line 912: | Line 719: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न | ‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 919: | Line 726: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न | ‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 927: | Line 734: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (349)ओं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ओम् ॥ 03-02-26॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 935: | Line 742: | ||
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| text = | | text = | ||
तर्हि किं | तर्हि किं यत्नेन? इत्यत आह- | ||
}} | }} | ||
| Line 942: | Line 749: | ||
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विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति | विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति । | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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| text = | |||
‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’(बृ.उ.४.४.५)इति श्रुतेः ॥ 26 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 950: | Line 764: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (350)ओम् अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ओम् ॥ 03-02-27॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 958: | Line 772: | ||
| id = BS_C03_S02_V27_summary | | id = BS_C03_S02_V27_summary | ||
| text = | | text = | ||
नित्याव्यक्तस्य कथं प्रकाशः इत्यत उच्यते- | नित्याव्यक्तस्य कथं प्रकाशः ? इत्यत उच्यते- | ||
}} | }} | ||
| Line 972: | Line 779: | ||
| id = BS_C03_S02_V27_B1 | | id = BS_C03_S02_V27_B1 | ||
| text = | | text = | ||
उभयत्र प्रमाणभावात् | उभयत्र प्रमाणभावात् तत् प्रसादादेव प्रकाशो भवति । | ||
}} | }} | ||
| Line 979: | Line 786: | ||
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| text = | | text = | ||
‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’ | ‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’(श्वे.उ.१.१०) इति लिङ्गात् । | ||
इति लिङ्गात् । | |||
युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् । | युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 997: | Line 797: | ||
}} | }} | ||
=== उभयव्यपदेशाधिकरणम् === | === उभयव्यपदेशाधिकरणम्(अहिकुण्डलाधिकरणम्) === | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (351)ओम् उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ओम् ॥ 03-02-28॥ | ||
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स्वरूपेणानन्दादिना | स्वरूपेणानन्दादिना कथमानन्दित्वादिः? इत्यत(तत्रो) उच्यते- | ||
}} | }} | ||
| Line 1,019: | Line 819: | ||
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| text = | | text = | ||
‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’ | ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’(तै.उ.२.४.), ‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्युभयव्यपदेशात्, अहिकुण्डलवदेव युज्यते । | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (352) ओं प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ओम् ॥ 03-02-29॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,035: | Line 842: | ||
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| text = | | text = | ||
यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। | यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद् ब्रह्मणः ॥ 29 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,043: | Line 850: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (353)ओं पूर्ववद् वा ओम् ॥ 03-02-30 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 1,051: | Line 858: | ||
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| text = | | text = | ||
यथा एक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः। | |||
}} | }} | ||
| Line 1,057: | Line 864: | ||
| verse_id = BS_C03_S02_V30 | | verse_id = BS_C03_S02_V30 | ||
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| text = | |||
स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः । | |||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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| text = | | text = | ||
‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे। | ‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे। | ||
| Line 1,065: | Line 879: | ||
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| text = | | text = | ||
‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः | ‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद् वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्॥’ इति पाद्मे(ब्राह्मे) ॥ 30 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,073: | Line 887: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (354)ओं प्रतिषेधाच्च ओम् ॥ 03-02-31॥ | ||
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}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘एकमेवाद्वितीयम्’ ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’ इति भेदस्य ॥ 31 ॥ | ‘एकमेवाद्वितीयम्’(छां.उ.६.२.१) ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’(क.उ.२.४.११) इति भेदस्य ॥ 31 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,098: | Line 905: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (355)ओं परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ओम् ॥ 03-02-32॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,106: | Line 913: | ||
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| text = | | text = | ||
न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष | न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृतिः’(छां.उ.८.४.१), ‘य एष आनन्दः परस्य’, ‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’(बृ.उ.६.४.२३) इति सेतुत्वं ह्युच्यते। ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’(तै.उ.२.४) इत्युन्मानत्वम्। ‘एतस्यैवाऽनन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’(बृ.उ.६.३.३२) इति सम्बन्धः।‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥ अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥ | ||
अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,128: | Line 921: | ||
| chapter_id = BS_C03 | | chapter_id = BS_C03 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,136: | Line 929: | ||
| id = BS_C03_S02_V33_B1 | | id = BS_C03_S02_V33_B1 | ||
| text = | | text = | ||
दर्शनादेव चान्यानन्दादीनाम् । ‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥ | |||
‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,151: | Line 937: | ||
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अप्रसिद्धस्य कथमानन्द | अप्रसिद्धस्य कथमानन्द इत्यादिव्यपदेशः? इत्यतो वक्ति – | ||
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जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा | जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा ‘पाद’शब्देन व्यपदिश्यते ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’(ऋ.सं.१०.९०.३) इति, तथा । | ||
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परानन्दमात्रात्वे कथं ब्रह्माद्यानन्दादीनां विशेषः? इत्यत उच्यते – | |||
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‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दादिः परस्य(आनन्दः परमस्य) च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥ | |||
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=== तथान्यत्वाधिकरणम् === | === प्रतिषेधाधिकरणम् (तथान्यत्वाधिकरणम्) === | ||
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ध्यानकाले यच्चित्ते | ध्यानकाले यच्चित्ते प्रदृष्यते तदेव हि ब्रह्मरूपम् । अतः कथमव्यक्तता ? इत्यत आह- | ||
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यथा जीवानन्दादेरन्यद् ब्रह्म तथोपासाकृतादपि । | |||
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‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’(केन.उ.१.६) इति प्रतिषेधात् । | |||
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‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम् ।ब्रह्मैव प्रतिबिम्बे यदतस्तेषां फलप्रदम् ॥ | |||
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तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा । | |||
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दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (361)ओम् अनेन सर्वगतत्वमायामयशब्दादिभ्यः ओम् ॥ 03-02-38 ॥ | ||
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देशकालान्तरेऽन्यतोऽपि सृष्ट्याधिर्युक्तेत्यतो ब्रूते- | देशकालान्तरेऽन्यतोऽपि सृष्ट्याधिर्युक्तेत्यतो ब्रूते- | ||
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सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते । | सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते । ‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’ इति हि भाल्लवेयश्रुतिः | ||
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‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतः। अतो मायामयं विष्णुं प्रवदन्ति सनातनम्॥’इति हि चतुर्वेदशिखायाम् । आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥ | |||
‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया | |||
आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥ | |||
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‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’ इति ॥ 40 ॥ | ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’(बृ.उ.५.९.२८) इति ॥ 40 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (364)ओं धर्मं जैमिनिरत एव ओम् ॥ 03-02-41 ॥ | ||
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यतः फलं तदेव | यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद् भवति । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौशीतकि ब्राह्मण.३.८) इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (365)ओं पूर्वं तु बादरायणो हेतु व्यपदेशात् ओम् ॥ 03-02-42॥ | ||
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परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव | परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मणः प्रवर्तकः । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.उ.३.७) इति हेतुव्यपदेशात् । ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’(भाग.२.५.१४) इति च ॥ 42 ॥ | ||
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Revision as of 09:39, 10 April 2026
भक्तिरस्मिन् पाद उच्यते। भक्त्यर्थं भगवन्महिमोक्तिः।
सन्ध्याधिकरणम्
(324)ओं सन्ध्ये सृष्टिराह हि ओम् ॥ 03-02-01 ॥
न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते ।
‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते’(बृ.उ.६.३.१०) इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥
(325)ओं निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ओम् ॥ 03-02-02॥
‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’(क.उ.२.२.८) इति च । ‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥
(326)ओं मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ओम् ॥03-02-03॥
केन साधनेन ?-
अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति।
नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात् ।
ब्रह्माण्डे च –
‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः ।प्रदर्शयति जीवाय स्वप्न इति गीयते ॥
यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता ।अनभिव्यक्तरूपत्वान्नान्यसाधनजं भवेत्॥’ इति ॥ 03 ॥(327)ओं सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ओम् ॥ 03-02-04 ॥
साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेनेश्वरो(न चेश्वरो) दर्शयति ।
‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति ।समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने॥’(छां.उ.५.२.८) इत्यादिश्रुतेः ।
हिशब्दाद्दर्शनाच्च।
‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद् देवतावृषभोऽपि वा ।स्वप्नस्थमथवा राजा तत् तथैव भविष्यति॥’
इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥
पराभिध्यानाधिकरणम्
(328)ओं पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ओम् ॥03-02-05॥
बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नादितिरस्कर्ता ।
‘स्वप्नादिबुद्धिकर्ता च तिरस्कर्ता स एव च ।तदिच्छया यतो ह्यस्य बन्धमोक्षौ प्रतिष्ठितौ’ इति कौर्मे ॥ 05 ॥
देहयोगाधिकरणम्
(329)ओं देहयोगाद्वासोऽपि ओम् ॥ 03-02-06 ॥
देहयोगेन वासो जाग्रदपि तत एव ।
‘स एव जागरिते स्थापयति स स्वप्ने स प्रभुस्तुराषाट् स एको बहुधा भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 06 ॥
तदभावाधिकरणम्
(330)ओं तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि ह ओम् ॥ 03-02-07॥
जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिर्नाडीस्थे परमात्मनि ।
‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’(छां.उ.८.६.३), ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’(छां.उ.६.८.१) इति श्रुतेः ॥ 07 ॥
प्रभोधाधिकरणम्
(331)ओम् अतः प्रभोधोऽस्मात् ओम् ॥ 03-02-08॥
यतस्तस्मिन् सुप्तिः ।
‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातैष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥
कर्मानुस्मृत्यधिकरणम्
(332)ओं स एव च कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ओम् ॥ 03-02-09॥
न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव(एनं) साधु कर्म कारयति’(कौ.ब्रा.३.९) इति कर्मण्यवधारणात् ॥
‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु ।परमः पुरुषो विष्णुस्ततोऽन्यो नास्ति कश्चन’ इत्यनुसारिस्मृतेश्च ॥
‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयत्यथैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥
‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.३.५.९(१.४.१५)) इति च विधिः ॥ 09 ॥
सम्पत्त्यधिकरणम्(मुग्धप्राप्त्यधिकरणम्)
(333)ओं मुग्धेऽर्धसम्पत्तिः परिशेषात् ओम् ॥ 03-02-10॥
मोहावस्थायां परमेश्वरेऽर्धप्राप्तिर्जीवस्य ।
‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् ॥यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥
सोऽपि तत एवेति सिद्धम् ।
‘मूर्च्छा प्रबोधनं चैव यत एव प्रवर्तते ।स ईशः परमो ज्ञेयः परमानन्दलक्षणः’इति हि कौर्मे ॥ 10 ॥
स्थान(तोऽप्य)भेदाधिकरणम्
(334)ओं न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ओम् ॥ 03-02-11 ॥
स्थानापेक्षया परमात्मनोऽपि भेदादनुग्राह्यानुग्राहकभाव इत्यत आह-
स्थानापेक्षयाऽपि परमात्मनो न भिन्नं रूपम् ।
‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’(ऐ.आ.३.२.३) इति श्रुतिः ।
‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद् रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥
‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’(भाग.१.९.४९/४२) ॥ इति च भागवते ॥ 11 ॥
(335)ओं न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ओं॥ 03-02-12 ॥
‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ ।प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः’(मां.उ.२.३/२.१६) ॥
इति भेदवचनान्नेति चेत्, न ।
‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.उ.५.७.३),‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’(बृ.उ.४.५.१),‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्(बृ.उ.४.५.१९)’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥
(336)ओम् अपि चैवमेके ओम् ॥ 03-02-13 ॥
‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः’(मां.उ.४.७) इति ।
अभेदेऽपि भेदव्यपदेशः स्थानभेदादैश्वर्ययोगाच्च युज्यते ।
‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद् भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः ।निर्दोषाद्वयरूपोऽपि कथ्यते परमेश्वरः’ इति ॥ 13 ॥
अरूपाधिकरणम्
(337)ओम् अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ओम् ॥ 14-337 ॥
रूपवत्त्वादनित्यत्वमित्यतो वक्ति-
प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद् ब्रह्म । हि शब्दाद् ‘अस्थूलमनणु’(बृ.उ.५.८.८) इत्यादिश्रुतेश्च ।
‘भौतिकानि हि रूपाणि भूतेभ्योऽसौ परो यतः ।अरूपवानतः प्रोक्तः क्व तदव्यक्ततः परे’ इति च मात्स्ये॥ 14 ॥
(338)ओं प्रकाशवच्चावैयर्थ्यम् ओम् ॥ 03-02-15 ॥
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’(मुं.उ.३.१.३),‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये’(छां.उ.८.१३.१),‘सुवर्णज्योतिः’(तै.उ.३.१०) इत्यादिश्रुतीनां च न वैयर्थ्यम् । विलक्षणरूपवत्वात् ।
यथा चक्षुरादिप्रकाशे विद्यमानेऽपि वैलक्षण्यादप्रकाशादिव्यवहारः ॥ 15 ॥
(339)ओम् आह च तन्मात्रम् ओम् ॥ 03-02-16 ॥
वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं ‘ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’(मां.उ.२.१) इति ।आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥
(340)ओं दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ओम् ॥ 03-02-17 ॥
दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं ‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’(मुं.उ.२.२.८) इति ॥‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥
उपमाधिकरणम्
(341)ओम् अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ओम् ॥ 03-02-18 ॥
यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद् भेदः, अत एव सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा ‘च’शब्देन भेदं दर्शयति ।
‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(बृ.उ.४.५.१९)।
‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले ।एवमेवाऽत्मका लोके परात्मसदृशा मताः’ इत्यादि ॥
अत एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥
अम्बुवदधिकरणम्
(342)ओम् अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् ओम् ॥ 03-02-19॥
नित्यसिद्धत्वात् सादृश्यस्य नित्यानन्दज्ञानादेर्न भक्तिज्ञानादि(ना)प्रयोजनमित्यतो ब्रवीति-
अम्बुवद् स्नेहेन । ग्रहणं ज्ञानम्। भक्तिं विना न तत्सादृश्यं सम्यगभिव्यज्यते ।
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(क.उ.१.२.२३) इति हि श्रुतिः।
‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तयैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥
वृद्धिह्रासाधिकरणम्
(343)ओं वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ओम् ॥03-02-20॥
तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् ।
एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीन् अन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति।
‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥
(344)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 03-02-21 ॥
कुतः? –
अथात ‘आनन्दस्य मीमांसा भवति’(तै.उ.२.८.१) इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् ।चशब्दात् स्मृतिः-‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे ।तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने’ इति ॥ 21 ॥
पालकत्वाधिकरणम्
(345)ओं प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ओम् ॥ 03-02-22 ॥
सृष्टिसंहारकर्तृत्वमेवास्य न पालकत्वं स्वतः सिद्धेरित्यत आह-
उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति- ‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’(ऋ.सं.१०.३१.८) इति ।
च शब्दात् स्मृतिश्च ।‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥
अव्यक्ताधिकरणम्
(346)ओं तदव्यक्तमाह हि ओम् ॥ 03-02-23॥
परमात्मापरोक्ष्यं च तत्प्रसादादेव न जीवशक्त्येति वक्तुमुच्यते-
अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः । ‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्क(ष्फ)लम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्॥’ इति हि कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥
(347)ओम् अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ओम् ॥ 03-02-24 ॥
आराधनेऽप्यव्यक्तमेव । ज्ञानिप्रत्यक्षेणेतरेषामतिसूक्ष्मत्वलिङ्गादनुमानेन।
‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद् व्यक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥
(348)ओं प्रकाशवच्चावैशेष्यम् ओम् ॥ 03-02-25 ॥
नित्याव्यक्तरूपेण तथैव तिष्ठति; व्यक्तं किञ्चिद् रूपं गृहीत्वा दृश्यते; यधाऽग्न्यादयस्तन्मात्रारूपेणादृश्या अपि स्थूलरूपेण दृश्यन्ते। एवं इति चेत्, न-
अग्न्यादिवत् स्थूलसूक्ष्मत्वविशेषाभावात्।
‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परमः’ इति माण्डव्यश्रुतेः ।
‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥
‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥
(349)ओं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ओम् ॥ 03-02-26॥
तर्हि किं यत्नेन? इत्यत आह-
विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति ।
‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’(बृ.उ.४.४.५)इति श्रुतेः ॥ 26 ॥
(350)ओम् अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ओम् ॥ 03-02-27॥
नित्याव्यक्तस्य कथं प्रकाशः ? इत्यत उच्यते-
उभयत्र प्रमाणभावात् तत् प्रसादादेव प्रकाशो भवति ।
‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’(श्वे.उ.१.१०) इति लिङ्गात् ।
युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् ।
नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजशक्तितः।तमृते परमात्मानं कः पश्येतामितं प्रभुम्’इति नारायणाध्यात्मे॥27॥
उभयव्यपदेशाधिकरणम्(अहिकुण्डलाधिकरणम्)
(351)ओम् उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ओम् ॥ 03-02-28॥
स्वरूपेणानन्दादिना कथमानन्दित्वादिः? इत्यत(तत्रो) उच्यते-
‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’(तै.उ.२.४.), ‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्युभयव्यपदेशात्, अहिकुण्डलवदेव युज्यते ।
यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥
(352) ओं प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ओम् ॥ 03-02-29॥
यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद् ब्रह्मणः ॥ 29 ॥
(353)ओं पूर्ववद् वा ओम् ॥ 03-02-30 ॥
यथा एक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः।
स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः ।
‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे।
‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद् वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्॥’ इति पाद्मे(ब्राह्मे) ॥ 30 ॥
(354)ओं प्रतिषेधाच्च ओम् ॥ 03-02-31॥
‘एकमेवाद्वितीयम्’(छां.उ.६.२.१) ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’(क.उ.२.४.११) इति भेदस्य ॥ 31 ॥
परानन्दा(परमता)धिकरणम्
(355)ओं परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ओम् ॥ 03-02-32॥
न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृतिः’(छां.उ.८.४.१), ‘य एष आनन्दः परस्य’, ‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’(बृ.उ.६.४.२३) इति सेतुत्वं ह्युच्यते। ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’(तै.उ.२.४) इत्युन्मानत्वम्। ‘एतस्यैवाऽनन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’(बृ.उ.६.३.३२) इति सम्बन्धः।‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥ अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥
(356)ओं दर्शनात् तु ओम् ॥ 03-02-33॥
दर्शनादेव चान्यानन्दादीनाम् । ‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥
(357)ओं बुद्ध्यर्थः पादवत् ओम् ॥ 03-02-34॥
अप्रसिद्धस्य कथमानन्द इत्यादिव्यपदेशः? इत्यतो वक्ति –
जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा ‘पाद’शब्देन व्यपदिश्यते ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’(ऋ.सं.१०.९०.३) इति, तथा ।
‘अलौकिकोऽपि ज्ञानादिस्तच्छब्दैरेव भण्यते ।ज्ञापनार्थाय लोकस्य यथा राजेव देवराट्’ इति च पाद्मे ॥ 34 ॥
स्थानविशेषाधिकरणम्
(358)ओं स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ओम् ॥ 03-02-35 ॥
परानन्दमात्रात्वे कथं ब्रह्माद्यानन्दादीनां विशेषः? इत्यत उच्यते –
यथाऽऽदित्यस्य दर्पणादिस्थानविशेषात् प्रतिबिम्बविशेष एवमानन्दादेरपि ।
‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दादिः परस्य(आनन्दः परमस्य) च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥
(359)ओम् उपपत्तेश्च ओम् ॥ 03-02-36॥
‘ऐश्वर्यात् परमाद्विष्णोर्भक्त्यादीनामनादितः ।ब्रह्मादीनां सूपपन्ना ह्यानन्दादेर्विचित्रता’ इति हि पाद्मे ॥ 36 ॥
प्रतिषेधाधिकरणम् (तथान्यत्वाधिकरणम्)
(360)ओं तथाऽन्यत् प्रतिषेधात् ओम् ॥ 03-02-37 ॥
ध्यानकाले यच्चित्ते प्रदृष्यते तदेव हि ब्रह्मरूपम् । अतः कथमव्यक्तता ? इत्यत आह-
यथा जीवानन्दादेरन्यद् ब्रह्म तथोपासाकृतादपि ।
‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’(केन.उ.१.६) इति प्रतिषेधात् ।
‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम् ।ब्रह्मैव प्रतिबिम्बे यदतस्तेषां फलप्रदम् ॥
तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा ।
दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥
सर्वगतत्वाधिकरणम्
(361)ओम् अनेन सर्वगतत्वमायामयशब्दादिभ्यः ओम् ॥ 03-02-38 ॥
देशकालान्तरेऽन्यतोऽपि सृष्ट्याधिर्युक्तेत्यतो ब्रूते-
सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते । ‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’ इति हि भाल्लवेयश्रुतिः
‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतः। अतो मायामयं विष्णुं प्रवदन्ति सनातनम्॥’इति हि चतुर्वेदशिखायाम् । आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥
फलदानाधिकरणम्
(362)ओं फलमत उपपत्तेः ओम् ॥ 03-02-39॥
कर्मापेक्षत्वात् फलदानस्य तदेव ददातीति न वाच्यम् । कुतः ?-
अत एवेश्वरात् फलं भवति । न ह्यचेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिर्युज्यते ॥ 39 ॥
(363)ओं श्रुतत्वाच्च ओम् ॥ 03-02-40 ॥
‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’(बृ.उ.५.९.२८) इति ॥ 40 ॥
(364)ओं धर्मं जैमिनिरत एव ओम् ॥ 03-02-41 ॥
यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद् भवति । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौशीतकि ब्राह्मण.३.८) इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥
(365)ओं पूर्वं तु बादरायणो हेतु व्यपदेशात् ओम् ॥ 03-02-42॥
परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मणः प्रवर्तकः । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.उ.३.७) इति हेतुव्यपदेशात् । ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’(भाग.२.५.१४) इति च ॥ 42 ॥