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Brahmasutra/C3/S2: Difference between revisions

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__TOC__
<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
{{Adhyaya
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| document_id  = BS
Line 12: Line 14:
| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = सन्ध्ये सृष्टिराह हि ॥ 01-324
| verse_line1  = (324)ओं सन्ध्ये सृष्टिराह हि ओम् 03-02-01 ॥
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Line 20: Line 22:
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| text    =
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न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते । ‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते’ इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥
न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते ।
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{{Bhashyam
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‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते’(बृ.उ.६.३.१०) इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥
}}
}}


Line 28: Line 37:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥ 02-325 ॥
| verse_line1  = (325)ओं निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ओम् 03-02-02॥
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Line 36: Line 45:
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‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’ इति च ।
‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’(क.उ.२.२.८) इति च । ‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥
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{{Bhashyam
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‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥
}}
}}


Line 51: Line 53:
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| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्त स्वरूपत्वात् ॐ ॥03-326॥
| verse_line1  = (326)ओं मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ओम् ॥03-02-03॥
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}}
}}
Line 66: Line 68:
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| text    =
अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात् । ब्रह्माण्डे च –
अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति।
}}
}}


Line 73: Line 75:
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| text    =
| text    =
‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः
नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात्
प्रदर्शयति जीवाय स्वप्न इति गीयते ॥
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
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यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता
ब्रह्माण्डे च –
अनभिव्यक्तरूपत्वान्नान्यसाधनजं भवेत्’ इति ॥ 03 ॥
‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः ।प्रदर्शयति जीवाय स्वप्न इति गीयते ॥
यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता ।अनभिव्यक्तरूपत्वान्नान्यसाधनजं भवेत्॥’ इति ॥ 03 ॥
}}
}}


Line 90: Line 92:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ 04-327
| verse_line1  = (327)ओं सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ओम् 03-02-04 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति सन्ध्याधिकरणम् ॥ 01 ॥
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Line 105: Line 100:
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| text    =
| text    =
साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेन चेश्वरो दर्शयति ।
साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेनेश्वरो(न चेश्वरो) दर्शयति ।
}}
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Line 112: Line 107:
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| text    =
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‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति
‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति ।समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने॥’(छां.उ.५.२.८) इत्यादिश्रुतेः ।
समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने’ इत्यादिश्रुतेः ।
हिशब्दाद्दर्शनाच्च।
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{{Bhashyam
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हिशब्दाद्दर्शनाच्च ।
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Line 127: Line 115:
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‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद्देवता वृषभोऽपि वा
‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद् देवतावृषभोऽपि वा ।स्वप्नस्थमथवा राजा तत् तथैव भविष्यति॥’
स्वप्नस्थमथवा राजा तत् तथैव भविष्यति’ ॥
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥
इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥
}}
}}
Line 145: Line 126:
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| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॐ ॥05-328॥
| verse_line1  = (328)ओं पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ओम् ॥03-02-05॥
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| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
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॥ इति पराभिध्यानाधिकरणम्॥ 02 ॥
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Line 160: Line 134:
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| text    =
| text    =
बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नतिरस्कर्ता
बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नादितिरस्कर्ता
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Line 177: Line 151:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = देहयोगाद्वासोऽपि ॥ 06-329
| verse_line1  = (329)ओं देहयोगाद्वासोऽपि ओम् 03-02-06 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति देहयोगाधिकरणम् ॥ 03 ॥
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Line 209: Line 176:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि ह 07-330 ॥
| verse_line1  = (330)ओं तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि ह ओम् 03-02-07॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति तदभावाधिकरणम् ॥ 04 ॥
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Line 224: Line 184:
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जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिः नाडीस्थे परमात्मनि ।
जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिर्नाडीस्थे परमात्मनि ।
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Line 231: Line 191:
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‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’ ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेः ॥ 07 ॥
‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’(छां.उ.८.६.३), ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’(छां.उ.६.८.१) इति श्रुतेः ॥ 07 ॥
}}
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Line 241: Line 201:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अतः प्रभोधोऽस्मात् 08-331 ॥
| verse_line1  = (331)ओम् अतः प्रभोधोऽस्मात् ओम् 03-02-08॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति प्रभोधाधिकरणम्॥ 05 ॥
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Line 256: Line 209:
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यतस्तस्मिन् सुप्तिः
यतस्तस्मिन् सुप्तिः
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‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातैष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥
 
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‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातै ष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥
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Line 273: Line 220:
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| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स एव च कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः 09-332 ॥
| verse_line1  = (332)ओं स एव च कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ओम् 03-02-09॥
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| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
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॥ इति कर्मानुस्मृत्यधिकरणम् ॥ 06 ॥
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Line 288: Line 228:
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न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति कर्मण्यवधारणात् ॥
न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव(एनं) साधु कर्म कारयति’(कौ.ब्रा.३.९) इति कर्मण्यवधारणात् ॥
}}
}}


Line 295: Line 235:
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| id      = BS_C03_S02_V09_B3
| text    =
| text    =
‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु
‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु ।परमः पुरुषो विष्णुस्ततोऽन्यो नास्ति कश्चन’ इत्यनुसारिस्मृतेश्च ॥
परमः पुरुषो विष्णुस्ततोऽन्यो नास्ति कश्चन’ इत्यनुसारिस्मृतेश्च ॥
‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयत्यथैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S02_V09
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| text    =
‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयथ्यैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥
}}
}}


Line 310: Line 243:
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| id      = BS_C03_S02_V09_B7
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| text    =
आत्मानमेव लोकमुपासीत’ इति च विधिः ॥ 09 ॥
‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.३.५.९(१.४.१५)) इति च विधिः ॥ 09 ॥
}}
}}


=== सम्पत्त्यधिकरणम् ===
=== सम्पत्त्यधिकरणम्(मुग्धप्राप्त्यधिकरणम्) ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 320: Line 253:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = मुग्धेऽर्धसम्पत्तिः परिशेषात् 10-333 ॥
| verse_line1  = (333)ओं मुग्धेऽर्धसम्पत्तिः परिशेषात् ओम् 03-02-10॥
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| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
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॥ इति मुग्धप्राप्त्यधिकरणम् (सम्पत्त्यधिकरणम्) ॥ 07 ॥
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Line 342: Line 268:
| id      = BS_C03_S02_V10_B2
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‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन्
‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् ॥यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥
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{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S02_V10
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| text    =
यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥
}}
}}


Line 373: Line 292:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ॥ 11-334
| verse_line1  = (334)ओं न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ओम् 03-02-11 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 381: Line 300:
| id      = BS_C03_S02_V11_summary
| id      = BS_C03_S02_V11_summary
| text    =
| text    =
स्वानापेक्षया, परमात्मनो भेदादनुग्राह्यानुग्राहकभाव इत्यत आह-
स्थानापेक्षया परमात्मनोऽपि भेदादनुग्राह्यानुग्राहकभाव इत्यत आह-
}}
}}


Line 395: Line 314:
| id      = BS_C03_S02_V11_B2
| id      = BS_C03_S02_V11_B2
| text    =
| text    =
‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति श्रुतिः ।
‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’(ऐ.आ.३.२.३) इति श्रुतिः ।
}}
}}


Line 402: Line 321:
| id      = BS_C03_S02_V11_B3
| id      = BS_C03_S02_V11_B3
| text    =
| text    =
‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद्रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥
‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद् रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥
}}
}}


Line 409: Line 328:
| id      = BS_C03_S02_V11_B5
| id      = BS_C03_S02_V11_B5
| text    =
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‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’
‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’(भाग.१.९.४९/४२) ॥ इति च भागवते ॥ 11 ॥
इति च भागवते ॥ 11 ॥
}}
}}


Line 418: Line 336:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॐ॥ 12-335
| verse_line1  = (335)ओं न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ओं॥ 03-02-12 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 426: Line 344:
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| text    =
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‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ
‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ ।प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः’(मां.उ.२.३/२.१६)
प्राज्ञः कारणबद्धस्तुद्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः’ ॥
इति भेदवचनान्नेति चेत्, न
इति भेदवचनान्नेति चेन्न
}}
}}


Line 435: Line 352:
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| id      = BS_C03_S02_V12_B4
| text    =
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‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’
‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.उ.५.७.३),‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’(बृ.उ.४.५.१),‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्(बृ.उ.४.५.१९)’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥
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{{Bhashyam
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| text    =
‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’
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{{Bhashyam
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| text    =
‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद्ब्रह्मापूपर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥
}}
}}


Line 457: Line 360:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अपि चैवमेके ॥ 13-336
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| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
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॥ इति स्थान(तोऽप्य)भेदाधिकरणम् ॥ 08 ॥
}}
}}


Line 472: Line 368:
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एवमभेदेनैव । चशब्दादनन्तरूपत्वं चैके शाखिनः पठन्ति ।
‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः’(मां.उ.४.७) इति ।
}}
 
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‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः’ इति ।
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}}


Line 494: Line 382:
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| text    =
ब्रह्मतर्के च-
‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद् भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः ।निर्दोषाद्वयरूपोऽपि कथ्यते परमेश्वरः’ इति ॥ 13 ॥
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‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद्भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः
निर्दोषाद्वयरूपोऽपि कथ्यते परमेश्वरः’ इति ॥ 13 ॥
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Line 512: Line 392:
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| verse_line1  = अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ 14-337 ॥
| verse_line1  = (337)ओम् अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ओम् ॥ 14-337 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद्ब्रह्म । हि शब्दाद्’अस्थूलमनणु’ इत्यादिश्रुतेश्च ।
प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद् ब्रह्म । हि शब्दाद् ‘अस्थूलमनणु’(बृ.उ.५.८.८) इत्यादिश्रुतेश्च ।
}}
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Line 542: Line 422:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = प्रकाशवच्चावैयर्थ्यम् ॥ 15-338
| verse_line1  = (338)ओं प्रकाशवच्चावैयर्थ्यम् ओम् 03-02-15 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 550: Line 430:
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‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’(मुं.उ.३.१.३),‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये’(छां.उ.८.१३.१),‘सुवर्णज्योतिः’(तै.उ.३.१०) इत्यादिश्रुतीनां च न वैयर्थ्यम् । विलक्षणरूपवत्वात् ।
‘श्यामाच्चबलं प्रपद्ये’‘सुवर्णज्योतिः’ इत्यादिश्रुतीनां च न वैयर्थ्यम् । विलक्षणरूपवत्वात् । यथा चक्षुरादिप्रकाशे विद्यमानेऽपि वैलक्षण्यादप्रकाशादिव्यवहारः ॥ 15 ॥
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यथा चक्षुरादिप्रकाशे विद्यमानेऽपि वैलक्षण्यादप्रकाशादिव्यवहारः ॥ 15 ॥
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Line 559: Line 445:
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आह च तन्मात्रम् ॥ 16-339
| verse_line1  = (339)ओम् आह च तन्मात्रम् ओम् 03-02-16 ॥
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Line 567: Line 453:
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वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं’ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’ इति
वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं ‘ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’(मां.उ.२.१) इति ।आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥
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आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं योऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥
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}}


Line 582: Line 461:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ 17-340
| verse_line1  = (340)ओं दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ओम् 03-02-17 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति अरूपाधिकरणम् ॥ 09॥
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दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं
दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं ‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’(मुं.उ.२.२.८) इति ॥‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥
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‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’ इति
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| text    =
‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥
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Line 621: Line 479:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ 18-341
| verse_line1  = (341)ओम् अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ओम् 03-02-18 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति उपमाधिकरणम्॥ 10 ॥
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यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद्वेदः अतः सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा च शब्देन भेदं दर्शयति ।
यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद् भेदः, अत एव सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा ‘च’शब्देन भेदं दर्शयति ।
}}
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Line 643: Line 494:
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‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’।
‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(बृ.उ.४.५.१९)।
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Line 650: Line 501:
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| text    =
‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले
‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले ।एवमेवाऽत्मका लोके परात्मसदृशा मताः’ इत्यादि ॥
एवमेवात्मका लोके परात्मसदृशा मताः’ इत्यादि ॥
}}
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Line 658: Line 508:
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| text    =
| text    =
अथ एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा, नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥
अत एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥
}}
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Line 668: Line 518:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् 19-342 ॥
| verse_line1  = (342)ओम् अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् ओम् 03-02-19॥
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Line 676: Line 526:
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नित्यसिद्धत्वात् सादृश्यस्य नित्यानन्दज्ञानादेर्न भक्तिज्ञानादिना प्रयोजनमित्यतो ब्रवीति-
नित्यसिद्धत्वात् सादृश्यस्य नित्यानन्दज्ञानादेर्न भक्तिज्ञानादि(ना)प्रयोजनमित्यतो ब्रवीति-
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॥ इति अम्बुवदधिकरणम् ॥ 11 ॥
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‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ इति हि श्रुतिः।
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(क.उ.१.२.२३) इति हि श्रुतिः।
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Line 704: Line 547:
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‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तथैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥
‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तयैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥
}}
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Line 714: Line 557:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ॐ ॥20-343॥
| verse_line1  = (343)ओं वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ओम् ॥03-02-20॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 722: Line 565:
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तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् । एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीनन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति।
तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् ।
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}}


Line 728: Line 571:
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एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीन् अन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति।
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‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥
‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥
Line 737: Line 587:
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = (344)ओं दर्शनाच्च ओम् 03-02-21 ॥
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Line 746: Line 596:
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| text    =
कुतः? –
कुतः? –
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{{Bhashyam
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॥ इति वृद्धिह्रासाधिकरणम् ॥ 12 ॥
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Line 759: Line 602:
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‘अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति’ इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् । चशब्दात् स्मृतिः
अथात ‘आनन्दस्य मीमांसा भवति’(तै.उ.२.८.१) इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् ।चशब्दात् स्मृतिः-‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे ।तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने’ इति ॥ 21 ॥
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यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे
तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने’ इति ॥ 21 ॥
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Line 777: Line 612:
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| verse_line1  = प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥ 22-345
| verse_line1  = (345)ओं प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ओम् 03-02-22 ॥
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}}
Line 786: Line 621:
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| text    =
सृष्टिसंहारकर्तृत्वमेवास्य न पालकत्वं स्वतः सिद्धेरित्यत आह-
सृष्टिसंहारकर्तृत्वमेवास्य न पालकत्वं स्वतः सिद्धेरित्यत आह-
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{{Bhashyam
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॥इति पालकत्वाधिकरणम् (प्रकृत्यधिकरणम्) ॥ 13 ॥
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Line 799: Line 627:
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उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति
उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति- ‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’(ऋ.सं.१०.३१.८) इति ।
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{{Bhashyam
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‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’ इति ।
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}}


Line 813: Line 634:
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| text    =
च शब्दात् स्मृतिश्च
च शब्दात् स्मृतिश्च ।‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥
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{{Bhashyam
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‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥
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}}


Line 830: Line 644:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = (346)ओं तदव्यक्तमाह हि ओम् 03-02-23॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 845: Line 659:
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अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः ।
अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः । ‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्क(ष्फ)लम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्॥’ इति हि कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥
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‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्फलम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्’ इति कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥
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Line 860: Line 667:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = (347)ओम् अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ओम् 03-02-24 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 875: Line 682:
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‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद्वक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥
‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद् व्यक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥
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}}


Line 883: Line 690:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 891: Line 698:
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नित्याव्यक्तरूपेण तथैव तिष्ठति। व्यक्तं किञ्चिद्रूपं गृहीत्वा दृश्यते यधाऽग्न्यादयस्तन्मात्रारूपेणादृश्या अपि स्थूलरूपेण दृश्यन्त एवमिति चेन्न।
नित्याव्यक्तरूपेण तथैव तिष्ठति; व्यक्तं किञ्चिद् रूपं गृहीत्वा दृश्यते; यधाऽग्न्यादयस्तन्मात्रारूपेणादृश्या अपि स्थूलरूपेण दृश्यन्ते। एवं इति चेत्, न-
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}}


Line 905: Line 712:
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‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परम इति’ इति माण्डव्यश्रुतेः ।
‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परमः’ इति माण्डव्यश्रुतेः ।
}}
}}


Line 912: Line 719:
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‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥
‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्‍वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥
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}}


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| text    =
‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥
‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्‍वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥
}}
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Line 927: Line 734:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् 26-349 ॥
| verse_line1  = (349)ओं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ओम् 03-02-26॥
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तर्हि किं यत्नेनेत्यत आह-
तर्हि किं यत्नेन? इत्यत आह-
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विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति ।‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’इति श्रुतेः ॥ 26 ॥
विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति
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‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’(बृ.उ.४.४.५)इति श्रुतेः ॥ 26 ॥
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Line 950: Line 764:
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| verse_line1  = अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् 27-350 ॥
| verse_line1  = (350)ओम् अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ओम् 03-02-27॥
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नित्याव्यक्तस्य कथं प्रकाशः इत्यत उच्यते-
नित्याव्यक्तस्य कथं प्रकाशः ? इत्यत उच्यते-
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॥ इति अव्यक्ताधिकरणम् ॥ 14 ॥
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उभयत्र प्रमाणभावात् तत्प्रसादादेव प्रकाशो भवति ।
उभयत्र प्रमाणभावात् तत् प्रसादादेव प्रकाशो भवति ।
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Line 979: Line 786:
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‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’
‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’(श्वे.उ.१.१०) इति लिङ्गात् ।
इति लिङ्गात् ।
}}
 
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युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् ।
युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् ।
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Line 997: Line 797:
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=== उभयव्यपदेशाधिकरणम् ===
=== उभयव्यपदेशाधिकरणम्(अहिकुण्डलाधिकरणम्) ===


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| verse_line1  = ॐ उभयव्यपदेशात् त्त्वहिकुण्डलवत् ॐ 28-351 ॥
| verse_line1  = (351)ओम् उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ओम् 03-02-28॥
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Line 1,012: Line 812:
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स्वरूपेणानन्दादिना कथमानन्दित्वादिरित्यत उच्यते-
स्वरूपेणानन्दादिना कथमानन्दित्वादिः? इत्यत(तत्रो) उच्यते-
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‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’ ।’अथैष एव परम आनन्दः’  इत्युभयव्यपदेशादहिकुण्डलवदेव युज्यते । यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥
‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’(तै.उ.२.४.), ‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्युभयव्यपदेशात्, अहिकुण्डलवदेव युज्यते ।
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यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥
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Line 1,027: Line 834:
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| verse_line1  = (352) ओं प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ओम् 03-02-29॥
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यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद्ब्रह्मणः ॥ 29 ॥
यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद् ब्रह्मणः ॥ 29 ॥
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Line 1,043: Line 850:
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| verse_line1  = ॐ पूर्ववद्वा ॐ ॥ 30-353
| verse_line1  = (353)ओं पूर्ववद् वा ओम् 03-02-30 ॥
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Line 1,051: Line 858:
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यथैक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः। स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः ।
यथा एक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः।
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Line 1,057: Line 864:
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स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः ।
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‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे।
‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे।
Line 1,065: Line 879:
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‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद्वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्’ इति ब्राह्मे ॥ 30 ॥
‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद् वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्॥’ इति पाद्मे(ब्राह्मे) ॥ 30 ॥
}}
}}


Line 1,073: Line 887:
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = प्रतिषेधाच्च 31-354 ॥
| verse_line1  = (354)ओं प्रतिषेधाच्च ओम् 03-02-31॥
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॥ इति उभयव्यपदेशाधिकरणम् (अहिकुण्डलाधिकरणम्) ॥ 15 ॥
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‘एकमेवाद्वितीयम्’ ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’ इति भेदस्य ॥ 31 ॥
‘एकमेवाद्वितीयम्’(छां.उ.६.२.१) ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’(क.उ.२.४.११) इति भेदस्य ॥ 31 ॥
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Line 1,098: Line 905:
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| verse_line1  = परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः 32-355 ॥
| verse_line1  = (355)ओं परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ओम् 03-02-32॥
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}}
Line 1,106: Line 913:
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| text    =
| text    =
न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृति’ ‘य एष आनन्दः परस्य’‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति सेतुत्वं ह्युच्यते.‘यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्युन्मानत्वम् ।‘एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’ इति सम्बन्धः।
न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृतिः’(छां.उ.८.४.१), ‘य एष आनन्दः परस्य’, ‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’(बृ.उ.६.४.२३) इति सेतुत्वं ह्युच्यते। ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’(तै.उ.२.४) इत्युन्मानत्वम्। ‘एतस्यैवाऽनन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’(बृ.उ.६.३.३२) इति सम्बन्धः।‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥ अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥
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‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥
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अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥
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Line 1,128: Line 921:
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| verse_line1  = (356)ओं दर्शनात् तु ओम् 03-02-33॥
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दर्शनादेवचान्यानन्दादीनाम्
दर्शनादेव चान्यानन्दादीनाम् । ‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥
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‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥
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Line 1,151: Line 937:
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अप्रसिद्धस्य कथमानन्द इत्यादिव्यपदेश इत्यतो वक्ति –
अप्रसिद्धस्य कथमानन्द इत्यादिव्यपदेशः? इत्यतो वक्ति –
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॥ इति परानन्दा(परमता)धिकरणम् ॥16॥
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जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा पादशब्देन व्यपदिश्यते’पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति तथा ।
जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा ‘पाद’शब्देन व्यपदिश्यते ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’(ऋ.सं.१०.९०.३) इति, तथा ।
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परानन्दमात्रत्वे कथं ब्रह्माद्यानन्दादीनां विशेष इत्यत उच्यते –
परानन्दमात्रात्वे कथं ब्रह्माद्यानन्दादीनां विशेषः? इत्यत उच्यते –
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Line 1,212: Line 991:
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‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दः परमस्य च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥
‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दादिः परस्य(आनन्दः परमस्य) च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥
}}
}}


Line 1,220: Line 999:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = उपपत्तेश्च 36-359 ॥
| verse_line1  = (359)ओम् उपपत्तेश्च ओम् 03-02-36॥
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॥ इति स्थानविशेषाधिकरणम् ॥ 17 ॥
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=== तथान्यत्वाधिकरणम् ===
=== प्रतिषेधाधिकरणम् (तथान्यत्वाधिकरणम्) ===


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| verse_line1  = तथाऽन्यत् प्रतिषेधात् ॥ 37-360
| verse_line1  = (360)ओं तथाऽन्यत् प्रतिषेधात् ओम् 03-02-37 ॥
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Line 1,253: Line 1,025:
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| text    =
| text    =
ध्यानकाले यच्चित्ते दृष्यते तदेव ब्रह्मरूपम् । अतः कथमव्यक्ततेत्यत आह-
ध्यानकाले यच्चित्ते प्रदृष्यते तदेव हि ब्रह्मरूपम् । अतः कथमव्यक्तता ? इत्यत आह-
}}
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॥ इति प्रतिषेधाधिकरणम् (तथान्यत्वाधिकरणम्) ॥ 18 ॥
यथा जीवानन्दादेरन्यद् ब्रह्म तथोपासाकृतादपि ।
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| text    =
यथा जीवानन्दादेरन्यद्ब्रह्म तथोपासाकृतादपि
‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’(केन.उ.१.६) इति प्रतिषेधात्
}}
}}


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{{Bhashyam
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| text    =
| text    =
‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ इति प्रतिषेधात् ।
‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम् ।ब्रह्मैव प्रतिबिम्बे यदतस्तेषां फलप्रदम् ॥
}}
}}


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{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S02_V37
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| text    =
| text    =
‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम्
तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा
ब्रह्मैव प्रतिबिम्बे यदतस्तेषां फलप्रदम् ॥
}}
}}


Line 1,289: Line 1,060:
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| text    =
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तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा ।दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥
दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥
}}
}}


Line 1,299: Line 1,070:
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| verse_line1  = अनेन सर्वगतत्वमायामयशब्दादिभ्यः ॥ 38-361
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| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
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Line 1,308: Line 1,079:
| text    =
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देशकालान्तरेऽन्यतोऽपि सृष्ट्याधिर्युक्तेत्यतो ब्रूते-
देशकालान्तरेऽन्यतोऽपि सृष्ट्याधिर्युक्तेत्यतो ब्रूते-
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॥ इति सर्वगतत्वाधिकरणम् ॥ 19 ॥
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सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते ।
सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते । ‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’ इति हि भाल्लवेयश्रुतिः
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‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’इति भाल्लवेयश्रुतिः
‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतः। अतो मायामयं विष्णुं प्रवदन्ति सनातनम्॥’इति हि चतुर्वेदशिखायाम् आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥
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‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतःइति चतुर्वेदशिखायाम्
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‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’ इति ॥ 40 ॥
‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’(बृ.उ.५.९.२८) इति ॥ 40 ॥
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यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद्भवति ।’ एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥
यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद् भवति । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौशीतकि ब्राह्मण.३.८) इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥
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| verse_line1  = (365)ओं पूर्वं तु बादरायणो हेतु व्यपदेशात् ओम् 03-02-42॥
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परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मप्रवर्तकः ।’पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति हेतुव्यपदेशात् ।’द्रव्यं कर्म च कालश्च’ इति च ॥ 42 ॥
परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मणः प्रवर्तकः । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.उ.३.७) इति हेतुव्यपदेशात् । ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’(भाग.२.५.१४) इति च ॥ 42 ॥
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Revision as of 09:39, 10 April 2026

भक्तिरस्मिन् पाद उच्यते। भक्त्यर्थं भगवन्महिमोक्तिः।

सन्ध्याधिकरणम्

(324)ओं सन्ध्ये सृष्टिराह हि ओम् ॥ 03-02-01 ॥


न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते ।
‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते’(बृ.उ.६.३.१०) इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥
(325)ओं निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ओम् ॥ 03-02-02॥


‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’(क.उ.२.२.८) इति च । ‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥
(326)ओं मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ओम् ॥03-02-03॥


केन साधनेन ?-
अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति।
नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात् ।
ब्रह्माण्डे च –

‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः ।प्रदर्शयति जीवाय स्वप्न इति गीयते ॥

यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता ।अनभिव्यक्तरूपत्वान्नान्यसाधनजं भवेत्॥’ इति ॥ 03 ॥
(327)ओं सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ओम् ॥ 03-02-04 ॥


साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेनेश्वरो(न चेश्वरो) दर्शयति ।
‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति ।समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने॥’(छां.उ.५.२.८) इत्यादिश्रुतेः । हिशब्दाद्दर्शनाच्च।
‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद् देवतावृषभोऽपि वा ।स्वप्नस्थमथवा राजा तत् तथैव भविष्यति॥’ इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥

पराभिध्यानाधिकरणम्

(328)ओं पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ओम् ॥03-02-05॥


बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नादितिरस्कर्ता ।
‘स्वप्नादिबुद्धिकर्ता च तिरस्कर्ता स एव च ।तदिच्छया यतो ह्यस्य बन्धमोक्षौ प्रतिष्ठितौ’ इति कौर्मे ॥ 05 ॥

देहयोगाधिकरणम्

(329)ओं देहयोगाद्वासोऽपि ओम् ॥ 03-02-06 ॥


देहयोगेन वासो जाग्रदपि तत एव ।
‘स एव जागरिते स्थापयति स स्वप्ने स प्रभुस्तुराषाट् स एको बहुधा भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 06 ॥

तदभावाधिकरणम्

(330)ओं तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि ह ओम् ॥ 03-02-07॥


जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिर्नाडीस्थे परमात्मनि ।
‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’(छां.उ.८.६.३), ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’(छां.उ.६.८.१) इति श्रुतेः ॥ 07 ॥

प्रभोधाधिकरणम्

(331)ओम् अतः प्रभोधोऽस्मात् ओम् ॥ 03-02-08॥


यतस्तस्मिन् सुप्तिः । ‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातैष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥

कर्मानुस्मृत्यधिकरणम्

(332)ओं स एव च कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ओम् ॥ 03-02-09॥


न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव(एनं) साधु कर्म कारयति’(कौ.ब्रा.३.९) इति कर्मण्यवधारणात् ॥
‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु ।परमः पुरुषो विष्णुस्ततोऽन्यो नास्ति कश्चन’ इत्यनुसारिस्मृतेश्च ॥ ‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयत्यथैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥
‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.३.५.९(१.४.१५)) इति च विधिः ॥ 09 ॥

सम्पत्त्यधिकरणम्(मुग्धप्राप्त्यधिकरणम्)

(333)ओं मुग्धेऽर्धसम्पत्तिः परिशेषात् ओम् ॥ 03-02-10॥


मोहावस्थायां परमेश्वरेऽर्धप्राप्तिर्जीवस्य ।
‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् ॥यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥
सोऽपि तत एवेति सिद्धम् ।
‘मूर्च्छा प्रबोधनं चैव यत एव प्रवर्तते ।स ईशः परमो ज्ञेयः परमानन्दलक्षणः’इति हि कौर्मे ॥ 10 ॥

स्थान(तोऽप्य)भेदाधिकरणम्

(334)ओं न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ओम् ॥ 03-02-11 ॥


स्थानापेक्षया परमात्मनोऽपि भेदादनुग्राह्यानुग्राहकभाव इत्यत आह-
स्थानापेक्षयाऽपि परमात्मनो न भिन्नं रूपम् ।
‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’(ऐ.आ.३.२.३) इति श्रुतिः ।
‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद् रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥
‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’(भाग.१.९.४९/४२) ॥ इति च भागवते ॥ 11 ॥
(335)ओं न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ओं॥ 03-02-12 ॥


‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ ।प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः’(मां.उ.२.३/२.१६) ॥ इति भेदवचनान्नेति चेत्, न ।
‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.उ.५.७.३),‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’(बृ.उ.४.५.१),‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्(बृ.उ.४.५.१९)’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥
(336)ओम् अपि चैवमेके ओम् ॥ 03-02-13 ॥


‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः’(मां.उ.४.७) इति ।
अभेदेऽपि भेदव्यपदेशः स्थानभेदादैश्वर्ययोगाच्च युज्यते ।
‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद् भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः ।निर्दोषाद्वयरूपोऽपि कथ्यते परमेश्वरः’ इति ॥ 13 ॥

अरूपाधिकरणम्

(337)ओम् अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ओम् ॥ 14-337 ॥


रूपवत्त्वादनित्यत्वमित्यतो वक्ति-
प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद् ब्रह्म । हि शब्दाद् ‘अस्थूलमनणु’(बृ.उ.५.८.८) इत्यादिश्रुतेश्च ।
‘भौतिकानि हि रूपाणि भूतेभ्योऽसौ परो यतः ।अरूपवानतः प्रोक्तः क्व तदव्यक्ततः परे’ इति च मात्स्ये॥ 14 ॥
(338)ओं प्रकाशवच्चावैयर्थ्यम् ओम् ॥ 03-02-15 ॥


‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’(मुं.उ.३.१.३),‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये’(छां.उ.८.१३.१),‘सुवर्णज्योतिः’(तै.उ.३.१०) इत्यादिश्रुतीनां च न वैयर्थ्यम् । विलक्षणरूपवत्वात् ।
यथा चक्षुरादिप्रकाशे विद्यमानेऽपि वैलक्षण्यादप्रकाशादिव्यवहारः ॥ 15 ॥
(339)ओम् आह च तन्मात्रम् ओम् ॥ 03-02-16 ॥


वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं ‘ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’(मां.उ.२.१) इति ।आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥
(340)ओं दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ओम् ॥ 03-02-17 ॥


दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं ‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’(मुं.उ.२.२.८) इति ॥‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥

उपमाधिकरणम्

(341)ओम् अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ओम् ॥ 03-02-18 ॥


यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद् भेदः, अत एव सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा ‘च’शब्देन भेदं दर्शयति ।
‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(बृ.उ.४.५.१९)।
‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले ।एवमेवाऽत्मका लोके परात्मसदृशा मताः’ इत्यादि ॥
अत एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥

अम्बुवदधिकरणम्

(342)ओम् अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् ओम् ॥ 03-02-19॥


नित्यसिद्धत्वात् सादृश्यस्य नित्यानन्दज्ञानादेर्न भक्तिज्ञानादि(ना)प्रयोजनमित्यतो ब्रवीति-
अम्बुवद् स्नेहेन । ग्रहणं ज्ञानम्। भक्तिं विना न तत्सादृश्यं सम्यगभिव्यज्यते ।
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’(क.उ.१.२.२३) इति हि श्रुतिः।
‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तयैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥

वृद्धिह्रासाधिकरणम्

(343)ओं वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ओम् ॥03-02-20॥


तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् ।
एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीन् अन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति।
‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥
(344)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 03-02-21 ॥


कुतः? –
अथात ‘आनन्दस्य मीमांसा भवति’(तै.उ.२.८.१) इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् ।चशब्दात् स्मृतिः-‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे ।तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने’ इति ॥ 21 ॥

पालकत्वाधिकरणम्

(345)ओं प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ओम् ॥ 03-02-22 ॥


सृष्टिसंहारकर्तृत्वमेवास्य न पालकत्वं स्वतः सिद्धेरित्यत आह-
उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति- ‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’(ऋ.सं.१०.३१.८) इति ।
च शब्दात् स्मृतिश्च ।‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥

अव्यक्ताधिकरणम्

(346)ओं तदव्यक्तमाह हि ओम् ॥ 03-02-23॥


परमात्मापरोक्ष्यं च तत्प्रसादादेव न जीवशक्त्येति वक्तुमुच्यते-
अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः । ‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्क(ष्फ)लम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्॥’ इति हि कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥
(347)ओम् अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ओम् ॥ 03-02-24 ॥


आराधनेऽप्यव्यक्तमेव । ज्ञानिप्रत्यक्षेणेतरेषामतिसूक्ष्मत्वलिङ्गादनुमानेन।
‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद् व्यक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥
(348)ओं प्रकाशवच्चावैशेष्यम् ओम् ॥ 03-02-25 ॥


नित्याव्यक्तरूपेण तथैव तिष्ठति; व्यक्तं किञ्चिद् रूपं गृहीत्वा दृश्यते; यधाऽग्न्यादयस्तन्मात्रारूपेणादृश्या अपि स्थूलरूपेण दृश्यन्ते। एवं इति चेत्, न-
अग्न्यादिवत् स्थूलसूक्ष्मत्वविशेषाभावात्।
‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परमः’ इति माण्डव्यश्रुतेः ।
‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्‍वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥
‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्‍वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥
(349)ओं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ओम् ॥ 03-02-26॥


तर्हि किं यत्नेन? इत्यत आह-
विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति ।
‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’(बृ.उ.४.४.५)इति श्रुतेः ॥ 26 ॥
(350)ओम् अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ओम् ॥ 03-02-27॥


नित्याव्यक्तस्य कथं प्रकाशः ? इत्यत उच्यते-
उभयत्र प्रमाणभावात् तत् प्रसादादेव प्रकाशो भवति ।
‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’(श्वे.उ.१.१०) इति लिङ्गात् । युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् ।
नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजशक्तितः।तमृते परमात्मानं कः पश्येतामितं प्रभुम्’इति नारायणाध्यात्मे॥27॥

उभयव्यपदेशाधिकरणम्(अहिकुण्डलाधिकरणम्)

(351)ओम् उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ओम् ॥ 03-02-28॥


स्वरूपेणानन्दादिना कथमानन्दित्वादिः? इत्यत(तत्रो) उच्यते-
‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’(तै.उ.२.४.), ‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्युभयव्यपदेशात्, अहिकुण्डलवदेव युज्यते ।
यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥
(352) ओं प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ओम् ॥ 03-02-29॥


यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद् ब्रह्मणः ॥ 29 ॥
(353)ओं पूर्ववद् वा ओम् ॥ 03-02-30 ॥


यथा एक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः।
स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः ।
‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे।
‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद् वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्॥’ इति पाद्मे(ब्राह्मे) ॥ 30 ॥
(354)ओं प्रतिषेधाच्च ओम् ॥ 03-02-31॥


‘एकमेवाद्वितीयम्’(छां.उ.६.२.१) ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’(क.उ.२.४.११) इति भेदस्य ॥ 31 ॥

परानन्दा(परमता)धिकरणम्

(355)ओं परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ओम् ॥ 03-02-32॥


न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृतिः’(छां.उ.८.४.१), ‘य एष आनन्दः परस्य’, ‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’(बृ.उ.६.४.२३) इति सेतुत्वं ह्युच्यते। ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’(तै.उ.२.४) इत्युन्मानत्वम्। ‘एतस्यैवाऽनन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’(बृ.उ.६.३.३२) इति सम्बन्धः।‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥ अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥
(356)ओं दर्शनात् तु ओम् ॥ 03-02-33॥


दर्शनादेव चान्यानन्दादीनाम् । ‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥
(357)ओं बुद्ध्यर्थः पादवत् ओम् ॥ 03-02-34॥


अप्रसिद्धस्य कथमानन्द इत्यादिव्यपदेशः? इत्यतो वक्ति –
जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा ‘पाद’शब्देन व्यपदिश्यते ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’(ऋ.सं.१०.९०.३) इति, तथा ।
‘अलौकिकोऽपि ज्ञानादिस्तच्छब्दैरेव भण्यते ।ज्ञापनार्थाय लोकस्य यथा राजेव देवराट्’ इति च पाद्मे ॥ 34 ॥

स्थानविशेषाधिकरणम्

(358)ओं स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ओम् ॥ 03-02-35 ॥


परानन्दमात्रात्वे कथं ब्रह्माद्यानन्दादीनां विशेषः? इत्यत उच्यते –
यथाऽऽदित्यस्य दर्पणादिस्थानविशेषात् प्रतिबिम्बविशेष एवमानन्दादेरपि ।
‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दादिः परस्य(आनन्दः परमस्य) च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥
(359)ओम् उपपत्तेश्च ओम् ॥ 03-02-36॥


‘ऐश्वर्यात् परमाद्विष्णोर्भक्त्यादीनामनादितः ।ब्रह्मादीनां सूपपन्ना ह्यानन्दादेर्विचित्रता’ इति हि पाद्मे ॥ 36 ॥

प्रतिषेधाधिकरणम् (तथान्यत्वाधिकरणम्)

(360)ओं तथाऽन्यत् प्रतिषेधात् ओम् ॥ 03-02-37 ॥


ध्यानकाले यच्चित्ते प्रदृष्यते तदेव हि ब्रह्मरूपम् । अतः कथमव्यक्तता ? इत्यत आह-
यथा जीवानन्दादेरन्यद् ब्रह्म तथोपासाकृतादपि ।
‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’(केन.उ.१.६) इति प्रतिषेधात् ।
‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम् ।ब्रह्मैव प्रतिबिम्बे यदतस्तेषां फलप्रदम् ॥
तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा ।
दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥

सर्वगतत्वाधिकरणम्

(361)ओम् अनेन सर्वगतत्वमायामयशब्दादिभ्यः ओम् ॥ 03-02-38 ॥


देशकालान्तरेऽन्यतोऽपि सृष्ट्याधिर्युक्तेत्यतो ब्रूते-
सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते । ‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’ इति हि भाल्लवेयश्रुतिः
‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतः। अतो मायामयं विष्णुं प्रवदन्ति सनातनम्॥’इति हि चतुर्वेदशिखायाम् । आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥

फलदानाधिकरणम्

(362)ओं फलमत उपपत्तेः ओम् ॥ 03-02-39॥


कर्मापेक्षत्वात् फलदानस्य तदेव ददातीति न वाच्यम् । कुतः ?-
अत एवेश्वरात् फलं भवति । न ह्यचेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिर्युज्यते ॥ 39 ॥
(363)ओं श्रुतत्वाच्च ओम् ॥ 03-02-40 ॥


‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’(बृ.उ.५.९.२८) इति ॥ 40 ॥
(364)ओं धर्मं जैमिनिरत एव ओम् ॥ 03-02-41 ॥


यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद् भवति । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौशीतकि ब्राह्मण.३.८) इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥
(365)ओं पूर्वं तु बादरायणो हेतु व्यपदेशात् ओम् ॥ 03-02-42॥


परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मणः प्रवर्तकः । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.उ.३.७) इति हेतुव्यपदेशात् । ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’(भाग.२.५.१४) इति च ॥ 42 ॥