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Brahmasutra/C3/S1: Difference between revisions

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__TOC__
<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
{{Adhyaya
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| document_id  = BS
| chapter_num  = 3
| chapter_num  = 3
| title        = प्रथमः पादः
| title        = प्रथमः पादः
}}साधनविचारोऽयमध्यायः । वैराग्यार्थे गत्यादिनिरूपणा प्रथमपादे।
}}साधनविचारोऽयमध्यायः । वैराग्यार्थे(य) गत्यादिनिरूपणा प्रथमपादे।


भूतबन्धो हि बन्धः। ‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति वाराहे ।
भूतबन्धो हि बन्धः- ‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति वाराहे ।
तच्च मरणे भवति।
तच्च मरणे भवति-


भूतानां विनिवृत्तिस्तु मरणं समुदाहृतम्
भूतानां विनिवृत्तिस्तु मरणं समुदाहृतम् ।भूतानां सम्प्रयोगश्च जनिरित्येव पण्डितैः॥’ इति च भारते ॥
भूतानां सम्प्रयोगश्च जनिरित्येव पण्डितैः’ इति च भारते ॥


अतः किं साधनैरित्यत आह-
अतः किं साधनैः? इत्यत आह-


=== तदन्तराधिकरणम् ===
=== तदन्तराधिकरणम् ===
Line 20: Line 21:
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| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तदन्तरप्रतिपत्तौरंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॥ 01-295 ॥
| verse_line1  = (295)ओं तदन्तरप्रतिपत्तौरंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ओम् 03-01-01॥
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इति तदन्तराधिकरणम् ॥ 01 ॥
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शरीरान्तरप्रतिपत्तौ भूतसम्परिष्वक्त एव गच्छति ।
शरीरान्तरप्रतिपत्तौ भूतपरिष्वक्त एव गच्छति ।
}}
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Line 42: Line 36:
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‘वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’
‘वेत्थ यथा पञ्चम्याम् आहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.३.२), ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.३.९) इति प्रश्नपरिहाराभ्याम् ॥ 01 ॥
‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इति प्रश्नपरिहाराभ्याम् ॥ 01 ॥
}}
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Line 53: Line 46:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ॥ 02-296
| verse_line1  = (296)ओं त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ओम् 03-01-02 ॥
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Line 59: Line 52:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
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॥ इति त्र्यात्मकत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥
‘अप्’शब्दस्तु त्र्यात्मकत्वाद् युज्यते ।
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Line 68: Line 61:
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अप्छब्दस्तुत्र्यात्मकत्वादुज्यते । भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’इति च भागवते॥02॥
भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’(भाग.३.२७.४५)इति च भागवते॥02॥
}}
}}


Line 78: Line 71:
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| verse_line1  = प्राणगतेश्च ॥ 03-297 ॥
| verse_line1  = (297)ओं प्राणगतेश्च ओम् ॥ 03-01-03॥
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| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
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॥ इति प्राणागत्यधिकरणम् ॥ 03 ॥
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Line 93: Line 79:
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‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद्वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’
‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद् वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’ इति भाल्लवेयश्रुतेः प्राणगतेर्भूतान्यपि सह गच्छन्तीति सिद्धम् ॥ 03 ॥
इति भाल्लवेयश्रुतेः प्राणगतेर्भूतान्यपि सन्ति इति सिद्धम् ॥ 03 ॥
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}}


Line 104: Line 89:
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| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् 04-298 ॥
| verse_line1  = (298)ओम् अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ओम् 03-01-04॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति अग्न्याद्यधिकरणम् ॥ 04 ॥
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Line 119: Line 97:
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‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’ इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेन्न भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’(बृ.उ.५.२.१३) इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेत्? न। भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
}}
}}


Line 133: Line 111:
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| text    =
ब्रह्माण्डे च-
ब्रह्माण्डे च-‘मृतिकाले जहत्येनं प्राणा भूतानि पञ्च च ।भागतो भागतस्त्वेनमनुगच्छन्ति सर्वशः’ इति ॥ 04 ॥
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
‘मृतिकाले जहत्येनं प्राणा भूतानि पञ्च च
भागतो भागतस्त्वेनमनुगच्छन्ति सर्वशः’ इति ॥ 04 ॥
}}
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=== प्रथमश्रवणाधिकरणम् ===
=== प्रथमेऽश्रवणाधिकरणम् ===


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| verse_line1  = प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥ 05-299 ॥
| verse_line1  = ओं प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ओम् ॥ 05-299 ॥
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Line 157: Line 127:
{{Bhashyam
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इति प्रथमश्रवणाधिकरणम् ॥ 05 ॥
‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’(छां.उ.५.४.२) इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेत्, न।
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{{Bhashyam
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‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’ इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेन्न। ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते ।‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥
ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते । ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.९.१) इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥
}}
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Line 176: Line 146:
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| verse_line1  = अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणं प्रतीतेः 06-300 ॥
| verse_line1  = (300)ओम् अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणं प्रतीतेः ओम् 03-01-06॥
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॥ इति अश्रुतत्वाधिकरणम् ॥ 06 ॥
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अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेन्न।
अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेत्, न। ‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्क्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥
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‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥
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Line 208: Line 164:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ॐ॥ 07-301
| verse_line1  = (301)ओं भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ओं॥ 03-01-07 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 216: Line 172:
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‘अपाम सोमममृता अभूम’ इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति-
‘अपाम सोमममृता अभूम’(ऋ.सं.८.४८.३) इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति-
}}
 
{{Bhashyam
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॥ इति भाक्ताधिकरणम् ॥ 07 ॥
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Line 230: Line 179:
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| text    =
भागतस्तदमृतत्वम् ।’नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् । वाशब्दात् पारम्पर्येणात्मविदपेक्षया वा । तथा हि श्रुतिः –
भागतस्तदमृतत्वम् ।‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७) इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् ।
}}
}}


Line 237: Line 186:
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| text    =
| text    =
‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वाकर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्द्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत् सृजते’
वाशब्दात् पारम्पर्येणाऽत्मविदपेक्षया वा
}}
}}


Line 244: Line 193:
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| text    =
| text    =
‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो योवन्मनुर्यावदादित्यः’।
तथा हि श्रुतिः –‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वा अननूक्तोऽन्यद् वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत् पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवाऽत्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवाऽत्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृ.उ.३.४.१५)
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Line 251: Line 200:
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‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवति अथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥
‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो यावन्मनुर्यावदादित्यः’,‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवत्यथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥
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Line 261: Line 210:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम् ॥ 08-302
| verse_line1  = (302)ओं कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम् ओम् 03-01-08 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 270: Line 219:
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| text    =
कृतस्य कर्मणो भोगेन क्षयान्मुक्तिरित्यत आह-
कृतस्य कर्मणो भोगेन क्षयान्मुक्तिरित्यत आह-
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॥ इति कृतात्ययाधिकरणम् ॥ 08 ॥
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‘ततः शेषेणेमं लोकमायाति पुनः कर्म कुरुते पुनर्गच्छति पुनरागच्छति’ इति श्रुतेः
‘ततः शेषेणेमं लोकमायाति पुनः कर्म कुरुते पुनर्गच्छति पुनरागच्छति’ इति श्रुतेः
}}
}}


Line 290: Line 232:
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| id      = BS_C03_S01_V08_B2
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‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः
‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः ।कर्म कृत्वा पुनर्गच्छेत् पुनरायाति नित्यशः ॥’
कर्म कृत्वा पुनर्गच्छेत् पुनरायाति नित्यशः
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}}


Line 298: Line 239:
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आचतुर्दशमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु
‘आचतुर्दशमाद् वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ॥अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति’॥ इत्यादिस्मृतेश्च शेषवानेवाऽयाति ॥ 08 ॥
दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम्
अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति’॥
इत्यादिस्मृतेश्च शेषवानेवायाति ॥ 08 ॥
}}
}}


Line 311: Line 249:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = यथेतमनेवं च ॥ 09-303
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 319: Line 257:
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‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’ इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’() इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V09
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॥इति यथेताधिकरणम् ॥ 09 ॥
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Line 333: Line 264:
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‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धोमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’ इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥
‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद् वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’() इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥
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Line 343: Line 274:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = चरणादिति चेन्न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॐ॥ 10-304
| verse_line1  = (304)ओं चरणादिति चेन्न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ओं॥ 03-01-10 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 351: Line 282:
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| text    =
| text    =
‘तद्य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’ इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
‘तद् य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’(छां.उ.५.१०.७) इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
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}}


Line 358: Line 289:
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| text    =
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‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः
‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः ।अशुद्धिदस्त्वानाचारश्चरणं तूभयं मतम्’()
अशुद्धिदस्त्वानाचारश्चरणं तूभयं मतम्’ ॥
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}}


Line 366: Line 296:
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| text    =
इति स्मृतेरिति चेन्न, यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
इति स्मृतेरिति चेत्, न । यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
}}
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Line 374: Line 304:
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 382: Line 312:
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तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात् । चरणशब्दस्यानर्थक्यमिति चेन्न। चरणापेक्षत्वाद्रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वेनोपपत्तेः ॥ 11 ॥
तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात्, चरणशब्दस्याऽनर्थक्यमिति चेत्, न। चरणापेक्षत्वाद् रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वोपपत्तेः ॥ 11 ॥
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Line 390: Line 320:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ 12-306
| verse_line1  = (306)ओं सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ओम् 03-01-12 ॥
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{{Bhashyam
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॥ इति चरणाधिकरणम् ॥ 10 ॥
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‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’ इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुश्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’() इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुष्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
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Line 412: Line 335:
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‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’ इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥
‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’() इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥
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Line 422: Line 345:
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| verse_line1  = अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥ 13-307 ॥
| verse_line1  = ओं अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ओम् ॥ 13-307 ॥
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Line 437: Line 360:
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‘‘तद्यइह शुभाकृतो ये वाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयावर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
‘‘तद् य इह शुभाकृतो ये चाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयाऽवर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’() इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
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Line 445: Line 368:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ॥ 14-308
| verse_line1  = (308)ओं संयमने त्वनुभूयेतरेषाम् आरोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ओम् 03-01-14 ॥
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Line 460: Line 383:
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‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्यतमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद्वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुप्रजन्ति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्य तमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद् वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुव्रजन्ति’() इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
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Line 468: Line 391:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स्मरन्ति च ॥ 15-309
| verse_line1  = (309)ओं स्मरन्ति च ओम् 03-01-15 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति अनिष्टादिकार्यधिकरणम् ॥ 11 ॥
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Line 483: Line 399:
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| text    =
‘‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः
‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः ।‘तत्र भुक्त्वा पतन्त्येव ये द्विषन्ति जनार्दनम् ।‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित् ।‘इतरेषां तु पापानां व्युत्थानं विद्यतेऽपि च ।‘सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।‘इति सर्वत्र नियमः पञ्चकष्टे तु तत् सदा’() ॥ इत्यादि ॥ 15 ॥
‘तत्र भुक्त्वा पतन्त्येव ये द्विषन्ति जनार्दनम्
}}
 
{{Bhashyam
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‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित्
‘इतरेषां तु पापानां व्युत्थानं विद्यतेऽपि च
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{{Bhashyam
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‘सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम्
‘इति सर्वत्र नियमः पञ्चकष्टे तु तत् सदा’ इत्यादि ॥ 15 ॥
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Line 510: Line 409:
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अपि सप्त ॥ 16-310 ॥
| verse_line1  = (310)ओम् अपि सप्त ओम् ॥ 16-310 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति सप्ताधिकरणम् ॥ 12 ॥
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‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा
‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥
कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु
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तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥
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Line 543: Line 427:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_line1  = तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥ 17-311
| verse_line1  = (311)ओं तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ओम् 03-01-17 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’ इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’() इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
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{{Bhashyam
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॥ इति तद्व्यापाराधिकरणम् ॥ 13 ॥
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‘स स्वर्गे स भूमौ स नरके सोऽन्धे तमसि प्रवृत्तिकृदेक एवानुविष्टो नासौ दुःखभुगीश्वरः प्रभुत्वात् सर्वं पश्यति सर्वं कारयति नासौ दुःखभुग्य एवं वेद’ इति पौत्रायणश्रुतेरविरोधः ।
‘स स्वर्गे स भूमौ स नरके सोऽन्धे तमसि प्रवृत्तिकृदेक एवानुविष्टो नासौ दुःखभुगीश्वरः प्रभुत्वात् सर्वं पश्यति सर्वं कारयति नासौ दुःखभुग् य एवं वेद’() इति पौत्रायणश्रुतेरविरोधः ।
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}}


Line 579: Line 456:
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| id      = BS_C03_S01_V17_B3
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‘नरकेऽपि वसन्नीशो नासौ दुःखभुगुच्यते ।नीचोच्चतैव दुःखादेर्भोग इत्यभिधीयते ॥नासौ नीचोच्चतां याति पश्यत्येव प्रभुत्वतः’ इति भागवततन्त्रे ॥ 17 ॥
‘नरकेऽपि वसन्नीशो नासौ दुःखभुगुच्यते ।नीचोच्चतैव दुःखादेर्भोग इत्यभिधीयते ॥नासौ नीचोच्चतां याति पश्यत्येव प्रभुत्वतः’(छां.उ.५.१०.८) इति भागवततन्त्रे ॥ 17 ॥
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}}


Line 589: Line 466:
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| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ 18-312
| verse_line1  = (312)ओं विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ओम् 03-01-18 ॥
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Line 597: Line 474:
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‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्’ इति गतिस्वातन्त्र्यं भूतानां प्रतीयत इत्यत आह-
‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानम्’(छां.उ.५.१०.८) इति गतिस्वातन्त्र्यं भूतानां प्रतीयत इत्यत आह-
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{{Bhashyam
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इति विद्याकर्माधिकरणम् ॥ 14 ॥
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Line 611: Line 481:
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विद्याकर्मापेक्षयैतद्वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
विद्याकर्मापेक्षयैवैतद् वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
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}}


Line 618: Line 488:
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‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग्वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥
‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग् वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥
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Line 628: Line 498:
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| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ 19-313
| verse_line1  = (313)ओं न तृतीये तथोपलब्धेः ओम् 03-01-19 ॥
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Line 636: Line 506:
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‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
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}}


Line 643: Line 513:
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‘अथाविद्वानकर्माऽवाग्गच्छति त्रिधा ह वाऽवाग्गतिस्तिर्यग्यातना तम इति । द्वेवाव सुखानुवृत्ते, न तमः सुखानुवृत्तं केवलं ह्येवात्र दुःखं भवति’ इति श्रुतेर्न तृतीयावाग्गतौ सुखम् ॥ 19 ॥
‘अथाविद्वानकर्माऽवाग्गच्छति त्रिधा ह वाऽवाग् गच्छति तिर्यग् यातना तम इति । द्वे वाव सुखानुवृत्ते, न तमः सुखानुवृत्तं केवलं ह्येवात्र दुःखं भवति’() इति श्रुतेर्न तृतीयावाग्गतौ सुखम् ॥ 19 ॥
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Line 651: Line 521:
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Line 681: Line 551:
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Line 689: Line 559:
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‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान्
‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान् ॥नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून् ।निरस्ताशेषदुःखांश्च नित्यानन्दैकभागिनः ॥अपश्यत् त्रिविधान् ब्रह्मा साक्षादेव चतुर्मुखः॥’ इति दर्शनवचनाच्च पाद्मे ॥ 21 ॥
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{{Bhashyam
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नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून्
निरस्ताशेषदुःखांश्च नित्यानन्दैकभागिनः
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{{Bhashyam
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अपश्यत् त्रिविधान् ब्रह्मा साक्षादेव चतुर्मुखः’
इति दर्शनवचनाच्च पाद्मे॥ 21 ॥
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Line 713: Line 567:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = तृतीये शब्दावरोधः संशोकजस्य 22-316 ॥
| verse_line1  = (316) ओं तृतीये शब्दावरोधः संशोकजस्य ओम् 03-01-22॥
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Line 721: Line 575:
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तृतीये तृतीयतमस श्रवणादेव शब्दानुसारेण संशोकजमोहप्राप्तिः ॥ 22 ॥
तृतीये तृतीयतमसः श्रवणादेव शब्दानुसारेण संशोकजमोहप्राप्तिः ॥ 22 ॥
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Line 729: Line 583:
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति महातमोऽधिकरणम् (नतृतीयाधिकरणम्) ॥ 15 ॥
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Line 744: Line 591:
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‘महातमस्त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वं मध्यं तथाऽधरम् ।श्रवणादेव मूर्च्छादिरधरस्य यतो भवेत् ॥तस्मान्न विस्तरेण्यैतत् कथ्यते राजसत्तम’ इति कौर्मे ॥ 23 ॥
‘महातमस्त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वं मध्यं तथाऽधरम् ।श्रवणादेव मूर्च्छादिरधरस्य यतो भवेत् ॥तस्मान्न विस्तरेणैतत् कथ्यते राजसत्तम॥’ इति कौर्मे ॥ 23 ॥
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}}


Line 754: Line 601:
| chapter_id    = BS_C03
| chapter_id    = BS_C03
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः 24-318 ॥
| verse_line1  = (318)ओं तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ओम् 03-01-24॥
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| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 762: Line 609:
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| text    =
| text    =
‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्याद्यन्यभावः श्रूयते । स कथमित्यतो ब्रवीति-
‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’(छां.उ.५.१०.५,काषायणश्रुतौ) इत्याद्यन्यभावः श्रूयते । स कथमित्यतो ब्रवीति-
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
॥ इति तत्स्वाभाव्याधिकरणम् ॥ 16 ॥
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Line 776: Line 616:
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धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः । न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते । न च तत्पदप्राप्तिः । गारुडे च-
धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः ।
}}
}}


Line 783: Line 623:
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धूमादिभावप्राप्तिश्च तद्गतौ गतिरेव तु
न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते तत्पदप्राप्तिः ।
स्थितौ स्थितिः प्रवशश्च लघुत्वादिस्तथैव
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V24
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न ह्यन्यस्यान्यथाभावो न च तत्पदमिष्यते ।
विद्यागम्यं पदं यस्मात् न तत्प्राप्यं हि कर्मणा॥
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{{Bhashyam
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एकदेशस्वभावेन वागभेदाऽपि युज्यते
गारुडे च-
यथा जीवः परं ब्रह्म ब्रह्मेदं जगदित्यपि’ इति ॥ 24 ॥
धूमादिभावप्राप्तिश्च तद्गतौ गतिरेव तु ।स्थितौ स्थितिः प्रवेशश्च लघुत्वादिस्तथैव च ॥
न ह्यन्यस्यान्यथाभावो न च तत्पदमिष्यते ।विद्यागम्यं पदं यस्मात् न तत्प्राप्यं हि कर्मणा॥
एकदेशस्वभावेन वागभेदाऽपि युज्यते ।यथा जीवः परं ब्रह्म ब्रह्मेदं जगदित्यपि॥’ इति ॥ 24 ॥
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| verse_line1  = नातिचिरेण विशेषात् ॥ 25-319
| verse_line1  = (319)ओं नातिचिरेण विशेषात् ओम् 03-01-25 ॥
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॥ इति नातिचिरेणाधिकरणम् (अचिरप्राप्त्यधिकरणम्) ॥ 17
‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’(छां.उ.५.१०.७) इति विशेषान्नातिचिरेण
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‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’ इति विशेषान्नातिचिरेण ॥स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात्पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च’ इति च नारदीये ॥ 25 ॥
‘स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात् पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च॥’(छां.उ.५.१०.७) इति च नारदीये ॥ 25 ॥
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=== अन्या(धिष्ठिता)धिकरणम् ===
=== अन्याधिष्ठिताधिकरणम् ===


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| verse_line1  = अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् 26-320 ॥
| verse_line1  = (320)ओम् अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् ओम् 03-01-26॥
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‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’ इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’(छां.उ.५.१०.६) इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
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अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य । ‘धूमोभूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्यादिपूर्वोक्तिवत् ॥
अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य ।
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‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
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‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
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| verse_line1  = (321)ओम् अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ओम् 03-01-27॥
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॥ इति अन्या(धिष्ठिता)धिकरणम् ॥ 18 ॥
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इति रेतोऽधिकरणम् ॥ 19 ॥
‘ततो रेतःसिचमेवानुप्रविशत्यथ मातरमथ प्रसूयते स कर्म कुरुते’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः पितरमेव प्रथमतो विशति।
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‘ततो रेतस्सिचमेवानुप्रविशत्यथ मातरमथ प्रसूयते स कर्म कुरुते’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः पितरमेव प्रथमतो विशति। मातृप्राप्तेः पश्चादपि भाव्यत्वात् ॥ 28 ॥
मातृप्राप्तेः पश्चादपि भाव्यत्वात् ॥ 28 ॥
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| verse_line1  = (323)ओं योनेः शरीरम् ओम् 03-01-29॥
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‘देहं गर्भस्थितं क्वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
‘देहं गर्भस्थितं क्‍वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 03-01 ॥
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‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितम् ।अथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितमथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
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‘स्थावराणि दिवः प्राप्तः स्थावरेभ्यश्च पूरुषम्
‘स्थावराणि दिवः प्राप्तः स्थावरेभ्यश्च पूरुषम् ।पुरुषात् स्त्रियमापन्नस्ततो देहं यथाक्रमम् ॥
पुरुषात् स्त्रियमापन्नस्ततो देहं यथाक्रमम् ॥
देहेन जायते जन्तुरिति सामान्यतो जनिः ।विशेषवचनं(जननं) चापि प्रोच्यमानं निबोध मे ॥
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स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च॥’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥
 
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देहेन जायते जन्तुरिति सामान्यतो जनिः
विशेषजननं चापि प्रोच्यमानं निबोध मे ॥
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स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥
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[[Category:Brahmasutra]]
[[Category:Brahmasutra]]

Revision as of 09:39, 10 April 2026

साधनविचारोऽयमध्यायः । वैराग्यार्थे(य) गत्यादिनिरूपणा प्रथमपादे।

भूतबन्धो हि बन्धः- ‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति च वाराहे । तच्च मरणे भवति-

भूतानां विनिवृत्तिस्तु मरणं समुदाहृतम् ।भूतानां सम्प्रयोगश्च जनिरित्येव पण्डितैः॥’ इति च भारते ॥

अतः किं साधनैः? इत्यत आह-

तदन्तराधिकरणम्

(295)ओं तदन्तरप्रतिपत्तौरंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ओम् ॥ 03-01-01॥


शरीरान्तरप्रतिपत्तौ भूतपरिष्वक्त एव गच्छति ।
‘वेत्थ यथा पञ्चम्याम् आहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.३.२), ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.३.९) इति प्रश्नपरिहाराभ्याम् ॥ 01 ॥

त्र्यात्मकत्वाधिकरणम्

(296)ओं त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ओम् ॥ 03-01-02 ॥


‘अप्’शब्दस्तु त्र्यात्मकत्वाद् युज्यते ।
भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’(भाग.३.२७.४५)इति च भागवते॥02॥

प्राणागत्यधिकरणम्

(297)ओं प्राणगतेश्च ओम् ॥ 03-01-03॥


‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद् वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’ इति भाल्लवेयश्रुतेः प्राणगतेर्भूतान्यपि सह गच्छन्तीति सिद्धम् ॥ 03 ॥

अग्न्याद्यधिकरणम्

(298)ओम् अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ओम् ॥ 03-01-04॥


‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’(बृ.उ.५.२.१३) इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेत्? न। भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
‘पुरुषस्य मृतौ ब्रह्मन् प्राणा भागत एव तु ।अधिदैवं प्राप्नुवन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ।पुनः शरीरसम्प्राप्तौतमेवानुविशन्ति च’इति ब्राह्मे ।
ब्रह्माण्डे च-‘मृतिकाले जहत्येनं प्राणा भूतानि पञ्च च ।भागतो भागतस्त्वेनमनुगच्छन्ति सर्वशः’ इति ॥ 04 ॥

प्रथमेऽश्रवणाधिकरणम्

ओं प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ओम् ॥ 05-299 ॥


‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’(छां.उ.५.४.२) इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेत्, न।
ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते । ‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’(छां.उ.५.९.१) इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥

अश्रुतत्वाधिकरणम्

(300)ओम् अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणं प्रतीतेः ओम् ॥ 03-01-06॥


अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेत्, न। ‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्क्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥

भाक्ताधिकरणम्

(301)ओं भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ओं॥ 03-01-07 ॥


‘अपाम सोमममृता अभूम’(ऋ.सं.८.४८.३) इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति-
भागतस्तदमृतत्वम् ।‘नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७) इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् ।
वाशब्दात् पारम्पर्येणाऽत्मविदपेक्षया वा ।
तथा हि श्रुतिः –‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वा अननूक्तोऽन्यद् वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत् पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवाऽत्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवाऽत्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृ.उ.३.४.१५)
‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो यावन्मनुर्यावदादित्यः’,‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवत्यथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥

कृतात्ययाधिकरणम्

(302)ओं कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम् ओम् ॥ 03-01-08 ॥


कृतस्य कर्मणो भोगेन क्षयान्मुक्तिरित्यत आह-
‘ततः शेषेणेमं लोकमायाति पुनः कर्म कुरुते पुनर्गच्छति पुनरागच्छति’ इति श्रुतेः ।
‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः ।कर्म कृत्वा पुनर्गच्छेत् पुनरायाति नित्यशः ॥’
‘आचतुर्दशमाद् वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ॥अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति’॥ इत्यादिस्मृतेश्च शेषवानेवाऽयाति ॥ 08 ॥

यथेताधिकरणम्

(303)ओं यथेतमनेवं च ओम् ॥ 03-01-09 ॥


‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’() इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद् वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’() इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥

चरणाधिकरणम्

(304)ओं चरणादिति चेन्न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ओं॥ 03-01-10 ॥


‘तद् य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’(छां.उ.५.१०.७) इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः ।अशुद्धिदस्त्वानाचारश्चरणं तूभयं मतम्’() ॥
इति स्मृतेरिति चेत्, न । यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
(305)ओम् आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ओम् ॥ 03-01-11 ॥


तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात्, चरणशब्दस्याऽनर्थक्यमिति चेत्, न। चरणापेक्षत्वाद् रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वोपपत्तेः ॥ 11 ॥
(306)ओं सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ओम् ॥ 03-01-12 ॥


‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’() इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुष्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’() इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥

अनिष्टादिकार्यधिकरणम्

ओं अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ओम् ॥ 13-307 ॥


पुण्याकृतामेव गमनागमने नेतरेषामित्यत आह-
‘‘तद् य इह शुभाकृतो ये चाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयाऽवर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’() इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
(308)ओं संयमने त्वनुभूयेतरेषाम् आरोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ओम् ॥ 03-01-14 ॥


‘संयमनमनुभूय केषाञ्चिदारोहः केषाञ्चिदवरोहः । तुशब्दोऽवधारणे ॥
‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्य तमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद् वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुव्रजन्ति’() इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
(309)ओं स्मरन्ति च ओम् ॥ 03-01-15 ॥


‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः ।‘तत्र भुक्त्वा पतन्त्येव ये द्विषन्ति जनार्दनम् ।‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित् ।‘इतरेषां तु पापानां व्युत्थानं विद्यतेऽपि च ।‘सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।‘इति सर्वत्र नियमः पञ्चकष्टे तु तत् सदा’() ॥ इत्यादि ॥ 15 ॥

सप्ताधिकरणम्

(310)ओम् अपि सप्त ओम् ॥ 16-310 ॥


‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥

तद्व्यापाराधिकरणम्

(311)ओं तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ओम् ॥ 03-01-17 ॥


ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’() इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
चशब्दाददुःखानुभवेन ।
‘स स्वर्गे स भूमौ स नरके सोऽन्धे तमसि प्रवृत्तिकृदेक एवानुविष्टो नासौ दुःखभुगीश्वरः प्रभुत्वात् सर्वं पश्यति सर्वं कारयति नासौ दुःखभुग् य एवं वेद’() इति पौत्रायणश्रुतेरविरोधः ।
‘नरकेऽपि वसन्नीशो नासौ दुःखभुगुच्यते ।नीचोच्चतैव दुःखादेर्भोग इत्यभिधीयते ॥नासौ नीचोच्चतां याति पश्यत्येव प्रभुत्वतः’(छां.उ.५.१०.८) इति भागवततन्त्रे ॥ 17 ॥

विद्याकर्माधिकरणम्

(312)ओं विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ओम् ॥ 03-01-18 ॥


‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानम्’(छां.उ.५.१०.८) इति गतिस्वातन्त्र्यं भूतानां प्रतीयत इत्यत आह-
विद्याकर्मापेक्षयैवैतद् वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग् वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥

महातमोऽधिकरणम्

(313)ओं न तृतीये तथोपलब्धेः ओम् ॥ 03-01-19 ॥


‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ ॥ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
‘अथाविद्वानकर्माऽवाग्गच्छति त्रिधा ह वाऽवाग् गच्छति तिर्यग् यातना तम इति । द्वे वाव सुखानुवृत्ते, न तमः सुखानुवृत्तं केवलं ह्येवात्र दुःखं भवति’() इति श्रुतेर्न तृतीयावाग्गतौ सुखम् ॥ 19 ॥
(314)ओं स्मर्यतेऽपि च लोके ओम् ॥ 03-01-20 ॥


‘तिर्यक्षु नरके चैव सुखलेशो विधीयते ।नान्धे तमसि मग्नानां सुखलेशोऽपि कश्चन’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
लोकसिद्धं चैतत्। चशब्दाल्लोकसिद्धिरपि स्मार्तेत्याह ।
‘अतिप्रिये यथा राजा न दुःखं सहते क्वचित् ।अत्यप्रिये सुखमपि तथैव परमेश्वरः’इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥
(315)ओं दर्शनाच्च ओम् ॥ 03-01-21 ॥


‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान् ॥नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून् ।निरस्ताशेषदुःखांश्च नित्यानन्दैकभागिनः ॥अपश्यत् त्रिविधान् ब्रह्मा साक्षादेव चतुर्मुखः॥’ इति दर्शनवचनाच्च पाद्मे ॥ 21 ॥
(316) ओं तृतीये शब्दावरोधः संशोकजस्य ओम् ॥ 03-01-22॥


तृतीये तृतीयतमसः श्रवणादेव शब्दानुसारेण संशोकजमोहप्राप्तिः ॥ 22 ॥
(317)ओं स्मरणाच्च ओम् ॥ 03-01-23 ॥


‘महातमस्त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वं मध्यं तथाऽधरम् ।श्रवणादेव मूर्च्छादिरधरस्य यतो भवेत् ॥तस्मान्न विस्तरेणैतत् कथ्यते राजसत्तम॥’ इति कौर्मे ॥ 23 ॥

तत्स्वाभाव्याधिकरणम्

(318)ओं तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ओम् ॥ 03-01-24॥


‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’(छां.उ.५.१०.५,काषायणश्रुतौ) इत्याद्यन्यभावः श्रूयते । स कथमित्यतो ब्रवीति-
धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः ।
न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते । न च तत्पदप्राप्तिः ।
गारुडे च-

धूमादिभावप्राप्तिश्च तद्गतौ गतिरेव तु ।स्थितौ स्थितिः प्रवेशश्च लघुत्वादिस्तथैव च ॥ न ह्यन्यस्यान्यथाभावो न च तत्पदमिष्यते ।विद्यागम्यं पदं यस्मात् न तत्प्राप्यं हि कर्मणा॥

एकदेशस्वभावेन वागभेदाऽपि युज्यते ।यथा जीवः परं ब्रह्म ब्रह्मेदं जगदित्यपि॥’ इति ॥ 24 ॥

नातिचिरेणाधिकरणम्

(319)ओं नातिचिरेण विशेषात् ओम् ॥ 03-01-25 ॥


बहुस्थानगमनात् कल्पान्तमप्येवं स्यादित्यत आह-
‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’(छां.उ.५.१०.७) इति विशेषान्नातिचिरेण ॥
‘स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात् पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च॥’(छां.उ.५.१०.७) इति च नारदीये ॥ 25 ॥

अन्याधिष्ठिताधिकरणम्

(320)ओम् अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् ओम् ॥ 03-01-26॥


‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’(छां.उ.५.१०.६) इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य ।
‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’(छां.उ.५.१०.५) इत्यादिपूर्वोक्तिवत् ॥
‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
(321)ओम् अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ओम् ॥ 03-01-27॥


हिंसारूपत्वात् पापस्यापि सम्भवाद्धुःखं च भवत्विति चेन्न। शब्दविहितत्वात्॥
‘हिंसा त्ववैदिका या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत्।वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथञ्चन’ इति वाराहे॥ 27 ॥

रेतोऽधिकरणम्

(322)ओं रेतःसिग्योगोऽथ ओम् ॥ 03-01-28॥


‘स्वर्गादवाग्गतश्चापि मातुरेवोदरं व्रजेत्’ इति वचनात् ‘य एव गृही भवति यो वा रेतः सिञ्चति तमेवानुविशति’इति श्रुतिः कथमित्यत आह-
‘ततो रेतःसिचमेवानुप्रविशत्यथ मातरमथ प्रसूयते स कर्म कुरुते’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः पितरमेव प्रथमतो विशति।
मातृप्राप्तेः पश्चादपि भाव्यत्वात् ॥ 28 ॥

योन्यधिकरणम्

(323)ओं योनेः शरीरम् ओम् ॥ 03-01-29॥


‘देहं गर्भस्थितं क्‍वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
पितृशरीरान्मातृयोनिमनुप्रविश्य तत एव शरीरमाप्नोति ।
‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितमथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
‘स्थावराणि दिवः प्राप्तः स्थावरेभ्यश्च पूरुषम् ।पुरुषात् स्त्रियमापन्नस्ततो देहं यथाक्रमम् ॥

देहेन जायते जन्तुरिति सामान्यतो जनिः ।विशेषवचनं(जननं) चापि प्रोच्यमानं निबोध मे ॥

स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च॥’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥