Brahmasutra/C2/S3: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = BS | | document_id = BS | ||
| chapter_num = 2 | | chapter_num = 2 | ||
| title = तृतीयः पादः | | title = तृतीयः पादः | ||
}}जीवपरमात्माधिभूताधिदैवेषु श्रुतीनां | }}जीवपरमात्माधिभूताधिदैवेषु श्रुतीनां परस्परविरोधमपाकरोत्यनेन पादेन। | ||
=== वियदधिकरणम् === | === वियदधिकरणम् === | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (219)ओं न वियदश्रुतेः ॥ 02-03-01॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (220)ओम् अस्ति तु ओम् ॥ 02-03-02 ॥ | ||
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अस्त्येव चोत्पत्तिश्रुतिः- ‘आत्मन आकाशः सम्भूतः’ इत्यादि ॥ 02 ॥ | अस्त्येव चोत्पत्तिश्रुतिः- ‘आत्मन आकाशः सम्भूतः’(तै.उ.२.१) इत्यादि ॥ 02 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (221)ओं गौण्यसम्भवात् ओम् ॥ 02-03-03 ॥ | ||
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‘अनादिर्वा अयमाकाशः शून्योऽलौकिकः’ इत्यादिश्रुतिर्गौणी । अन्यथोत्पत्तिश्रुतिबाहुल्यासम्भवात् ॥ 03 ॥ | ‘अनादिर्वा अयमाकाशः शून्योऽलौकिकः’() इत्यादिश्रुतिर्गौणी । अन्यथोत्पत्तिश्रुतिबाहुल्यासम्भवात् ॥ 03 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (222)ओं शब्दाच्च ओम् ॥ 02-03-04 ॥ | ||
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| Line 68: | Line 70: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अथ ह वाव नित्यानि पुरुषः प्रकृतिरात्मा काल इति । अथ यान्यनित्यानि प्राणः श्रद्धाभूतानि भौतिकानीति । यानि ह वा उत्पत्तिमन्ति | ‘अथ ह वाव नित्यानि पुरुषः प्रकृतिरात्मा काल इति । अथ यान्यनित्यानि प्राणः श्रद्धाभूतानि भौतिकानीति । | ||
}} | |||
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यानि ह वा उत्पत्तिमन्ति तान्यनित्यानि। यानि ह वा अनुत्पत्तिमन्ति तानि नित्यानि । | |||
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न ह्येतानि कदाचनोत्पद्यन्ते न विलीयन्ते पुरुषः प्रकृतिरात्मा काल इति । | |||
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{{Bhashyam | |||
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अथैतान्युत्पत्तिमन्ति चानुत्पत्तिमन्ति च प्राणः श्रद्धाऽऽकाश इति भागशो ह्युत्पद्यन्ते’() इति भाल्लवेयश्रुतेः ॥ 04 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (223)ओं स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ओम् ॥ 02-03-05 ॥ | ||
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स्यादेवैकस्योत्पत्तिमत्त्वमनुत्पत्तिमत्त्वं च गौणमुख्यत्वापेक्षया । यथा ब्रह्मशब्दः | स्यादेवैकस्योत्पत्तिमत्त्वमनुत्पत्तिमत्त्वं च गौणमुख्यत्वापेक्षया । यथा ब्रह्मशब्दः- | ||
}} | }} | ||
| Line 91: | Line 114: | ||
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‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म बृहति बृंहयति च’ इति श्रुतेः परे ब्रह्मणि मुख्योऽपि गौणत्वेन विरिञ्चादिष्वपि वर्तते । अत एवाब्रह्मत्वं च तेषाम् । | ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म बृहति बृंहयति च’(अथर्वशिरः) इति श्रुतेः । परे ब्रह्मणि मुख्योऽपि गौणत्वेन विरिञ्चादिष्वपि वर्तते । | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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अत एवाब्रह्मत्वं च तेषाम् । एवम् अन्यत्राप्यनुत्पत्तिमच्छब्दः ॥ 05 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (224)ओं प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ओम् ॥ 02-03-06 ॥ | ||
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ब्रह्मणोऽन्यस्य | ब्रह्मणोऽन्यस्य नित्यत्वे ‘इदं सर्वमसृजत’(तै.उ.२.३) इत्यादि प्रतिज्ञाहानिः। आकाशस्यापि सर्वस्मादव्यतिरेकात्। | ||
}} | }} | ||
| Line 114: | Line 144: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्’ ‘सदेव सोम्येदमग्र | ‘अत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्’(तै.उ.२.३),‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत् । एकमेवाद्वितीयम्’(छां.उ.६.२.१),‘इदं वा अग्रे नैव किञ्चनासीत्’(तै.ब्रा.२.२.९) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 06 ॥ | ||
‘इदं वा अग्रे नैव किञ्चनासीत्’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 06 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 123: | Line 152: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (225)ओं यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ओम् ॥ 02-03-07 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 138: | Line 160: | ||
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| text = | | text = | ||
विभक्तत्वाच्च विकारित्वं युक्तम् । विकारिण एव हि | विभक्तत्वाच्च विकारित्वं युक्तम् । विकारिण एव हि विभक्ता लोके दृश्यन्ते । | ||
}} | }} | ||
| Line 145: | Line 167: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एकोऽविभक्तः परमः पुरुषो विष्णुरुच्यते | ‘एकोऽविभक्तः परमः पुरुषो विष्णुरुच्यते ।प्रकृतिः पुरुषः कालस्त्रय एते विभागतः ॥चतुर्थस्तु महान् प्रोक्तः पञ्चमाऽहङ्कृतिर्मता ।तद्विभागेन जायन्त आकाशाद्याः पृथक् पृथक् ॥यो विभागी विकारः स सोऽविकारः परो हरिः ।अविभागात् परानन्दो नित्यो नित्यगुणात्मकः ।विभागो ह्यल्पशक्तित्वं नहि तत् परमात्मनः’।इति बृहत्संहितायाम् ॥ 07 ॥ | ||
}} | }} | ||
=== मातरिश्वाधिकरणम् === | |||
=== मातरिश्वाधिकरणम् === | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 171: | Line 177: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (226)ओम् एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ओम् ॥ 02-03-08 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 179: | Line 185: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अथ ह नित्याश्चानित्याश्च तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यनित्यानि वायुर्वाव नित्यो वायुना हि सर्वाणि भूतानि नेनीयन्ते’ | ‘अथ ह नित्याश्चानित्याश्च । तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यनित्यानि । वायुर्वाव नित्यो वायुना हि सर्वाणि भूतानि नेनीयन्ते’() | ||
‘अथ ह चेतनाश्चाचेतनाश्च तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यचेतनानि वायुर्वाव चेतनो वायुना हि सर्वाणि भूतानि विज्ञायन्ते’ । | ‘अथ ह चेतनाश्चाचेतनाश्च । तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यचेतनानि । वायुर्वाव चेतनो वायुना हि सर्वाणि भूतानि विज्ञायन्ते’() । | ||
‘कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन् | ‘कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन् । ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण’(ऋ.सं.७.१९.१। | ||
‘सा वा एषा देवताऽनादिर्योऽयं पवते’ इति । | ‘सा वा एषा देवताऽनादिर्योऽयं पवते’() इति । | ||
‘यस्यानाऽदिर्न मध्यं नान्तो नोदयो न निम्लोचः’()।इत्यादिश्रुतिभ्यो वायोरनुत्पत्तिरित्यतो ब्रवीति – | |||
}} | }} | ||
| Line 204: | Line 203: | ||
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| text = | | text = | ||
‘नित्यः परमनित्यश्च तथाऽनित्यः परस्तथा | ‘नित्यः परमनित्यश्च तथाऽनित्यः परस्तथा ।चतुर्धैतज्जगत् सर्वं परानित्यं तु पार्थिवम्।अनित्यानि तु भूतानि नित्यो वायुरुदाहृतः ।परस्तु नित्यः पुरुषः प्रकृतिः काल एव च ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 220: | Line 210: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एतच्चतुष्टयं विष्णुः स्वयं नित्यः परात्परः ।प्रतिव्यूह्य व्यूह्य चासावतीत्या च जनार्दनः ।धारयत्यनिशं देवो नित्यानन्दैकलक्षणः’इति कौर्मे ॥ 08 ॥ | |||
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| Line 230: | Line 220: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (227)ओम् असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ओम् ॥ 02-03-09 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 245: | Line 228: | ||
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| text = | | text = | ||
‘असद् वा इदमग्र आसीत् ततो वै सदजायत’(तै.उ.२.७),‘असतः सदजायत’(ऋ.सं.१०.७२.२) इत्यादि श्रुतिभ्यः सतोऽप्युत्पत्तिरिति चेत्, न । | |||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C02_S03_V09 | | verse_id = BS_C02_S03_V09 | ||
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अनुत्पत्तिरेव सतः । तुशब्देनोक्तव्यवस्थामपाकरोति । न ह्यसतः सदुत्पद्यते । अदृष्टत्वादनुपपत्तेः | अनुत्पत्तिरेव सतः । तुशब्देनोक्तव्यवस्थामपाकरोति । न ह्यसतः सदुत्पद्यते । अदृष्टत्वादनुपपत्तेः ।‘तद् वा एतद्ब्रह्माहुर्बृहति बृंहयति चेति । तद् वा एतदसदाहुः न ह्यासादयति कश्चन । तद् वा एतत् परमाहुः परतो हि तदुदीक्ष्यते’इति श्रुतेरसच्छब्दो ब्रह्मवाची । | ||
}} | }} | ||
| Line 259: | Line 242: | ||
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| text = | | text = | ||
‘देवानां | ‘देवानां पूर्वे युगेऽसतः सदजायतेति । ब्रह्म वा असत् सद् वा प्राणः प्राणं वाव महान् सह ओजो बलमित्याचक्षते’इति च पैङ्गीश्रुतिः। | ||
}} | }} | ||
| Line 266: | Line 249: | ||
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| text = | | text = | ||
‘त्वं | ‘त्वं देवशक्त्यां गुणकर्मयोनौ रेतस्त्वजायां कविरादधेऽजः ।ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे बभूविमात्मन् करवाम किं ते’(भा.३.६.२८)इति भागवते ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 273: | Line 256: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अजायमानो बहुधा | ‘अजायमानो बहुधा विजायते’(तै.आ.३.१३) इति च । | ||
}} | }} | ||
| Line 280: | Line 263: | ||
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| text = | | text = | ||
‘प्रत्यक्षत्वं हरेर्जन्म न विकारः कथञ्चन | ‘प्रत्यक्षत्वं हरेर्जन्म न विकारः कथञ्चन ।पुरुषः प्रकृतिः कालो महानित्यादिषु क्रमात् ॥विकार एव जननं पुरुषे तद्विशेषणम् ।परतन्त्रविशेषो हि विकार इति कीर्तितः’()॥ इति पाद्मे ॥ | ||
इति पाद्मे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 297: | Line 270: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अविकारोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः | ‘अविकारोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ।विकारहेतुकं सर्वं कुरुते निर्विकारवान् ॥‘शक्तिशक्तिमतोश्चापि न विभागः कथञ्चन ।अविभिन्नाऽपि सेच्छादिभेदैरपि विभाव्यते’इति भागवततन्त्रे ॥ 09 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 315: | Line 280: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (228)ओं तेजोऽतस्तथा ह्याह ओम् ॥ 02-03-10 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 330: | Line 288: | ||
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| text = | | text = | ||
‘वायोरग्निः’(तै.आ.२.१)इत्यादेर्नान्यत उत्पत्तिः ग्राह्या । अत एव परात् तदपि जायते । ‘तत् तेजोऽसृजत’(छां.उ.६.२.३) इत्याह । ‘कारणत्वेन’ इत्युक्तेऽप्यमुख्यतयाऽन्येषामपि शब्दोक्तत्वात् पुनरुक्तिरुभयकारणत्वनिवृत्यर्थम् ॥ 10 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 340: | Line 298: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (229)ओम् आपः ओम् ॥ 02-03-11 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 355: | Line 306: | ||
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| text = | | text = | ||
‘ब्रह्मैवेदमग्र आसीत् तदपोऽसृजत तदिदं सर्वम्’ इति श्रुतेः | ‘ब्रह्मैवेदमग्र आसीत् तदपोऽसृजत तदिदं सर्वम्’() इति श्रुतेः ‘अग्नेरापः’(तै.उ.२.१) इत्युक्तेऽपि ब्रह्मण एवाबादिसृष्टिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 362: | Line 313: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च | ‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी’(मुं.उ.२.१.३) इत्यादि च । | ||
}} | }} | ||
| Line 378: | Line 328: | ||
| text = | | text = | ||
वामने च- | वामने च- | ||
‘तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तीः प्रबोधयन् ।एक एव महाशक्तिः कुरुते सर्वमञ्जसा’ इति ॥ | |||
‘तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तीः प्रबोधयन् | |||
}} | }} | ||
| Line 402: | Line 345: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (230)ओं पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरादिभ्यः ओम् ॥ 02-03-12 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 410: | Line 353: | ||
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| text = | | text = | ||
‘ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्यामः | ‘ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्यामः प्रजायेमहीति । ता अन्नमसृजन्त’(छां.उ.६.२) इत्यद्भ्योऽन्नसृष्टिः श्रूयते ।‘अद्भ्यः पृथिवी’(तै.उ.२.१) इति कुत्रचित् पृथिवीसृष्टिः । अतो विरुद्धत्वादप्रामाण्यमित्यतो वक्तिः – | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C02_S03_V12 | | verse_id = BS_C02_S03_V12 | ||
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| text = | | text = | ||
पृथिवी तत्रान्नशब्देनोच्यते । भूताधिकारत्वात् । कार्ष्ण्यप्रचुरा च पृथिवी । नान्नस्य तथा विशेषः । ‘आपश्च पृथिवी चान्नम्’(ऐ.आ.२.३.१),‘पृथिवी वा अन्नम्’(तै.उ.३.९), ‘ता आपोऽन्नमसृजन्त पृथिवी वा अन्नम्’() इत्यादिशब्दान्तराच्च । आदिशब्दाद् युक्तिरपौरुषेयत्वेनादोषस्य वाक्यस्य नाप्रामाण्यमित्यादि । | |||
पृथिवी तत्रान्नशब्देनोच्यते । भूताधिकारत्वात् । कार्ष्ण्यप्रचुरा च पृथिवी । नान्नस्य तथा विशेषः । ‘आपश्च पृथिवी | |||
}} | }} | ||
| Line 432: | Line 367: | ||
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| text = | | text = | ||
‘विरोधो वाक्ययोर्यत्र नाप्रामाण्यं तदेष्यते | ‘विरोधो वाक्ययोर्यत्र नाप्रामाण्यं तदेष्यते ।यथाऽविरुद्धता न स्यात् तथाऽर्थः कल्प्य एतयोः’() इति । | ||
}} | }} | ||
| Line 440: | Line 374: | ||
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| text = | | text = | ||
रक्तोऽग्निरुदकं शुक्लं कृष्णैव पृथिवी स्वतः | रक्तोऽग्निरुदकं शुक्लं कृष्णैव पृथिवी स्वतः ।नाभिपद्माभिसम्बन्धात् पीता सेत्यभिधीयते ।क्षत्ररक्ताभिसम्बन्धाद् रक्तोदकबहुत्वतः ।शुक्लत्वमेत्येवमेव वर्णान्तरगतिर्भवेत् ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 466: | Line 391: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (231)ओं तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ओम् ॥ 02-03-13 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 474: | Line 399: | ||
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‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो मा विशान्तकस्तेनान्नेनाप्यायस्व’ इत्यादिनाऽन्यः संहर्ता प्रतीयत इत्यतो ब्रूते – | ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो मा विशान्तकस्तेनान्नेनाप्यायस्व’(म.ना.उ.१६.२) इत्यादिनाऽन्यः संहर्ता प्रतीयत इत्यतो ब्रूते – | ||
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| Line 488: | Line 406: | ||
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‘तस्याभिध्यानाद् योजनात् तत्त्वभावाद् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’(श्वे.उ.१.१०)इति बन्धलयस्य तदभिध्याननिमित्तत्त्वलिङ्गात् तत्कर्तृत्वं प्रतीयते, किमु सादेर्जगतः । इत्येतस्मादेव संहारकर्ता विष्णुरिति प्रतीयते । किमु | |||
इति बन्धलयस्य तदभिध्याननिमित्तत्त्वलिङ्गात् तत्कर्तृत्वं प्रतीयते, किमु सादेर्जगतः । इत्येतस्मादेव संहारकर्ता विष्णुरिति प्रतीयते | |||
}} | }} | ||
| Line 496: | Line 413: | ||
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‘यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृत मीहायुषेऽत्तु देवः’(),‘य इदं सर्वं विलाययति स हरिः परः परात्मा’इत्यादि श्रुतिभ्य इति एव शब्दः । | |||
‘य इदं सर्वं | |||
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| Line 511: | Line 420: | ||
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‘स्रष्टा पाता च संहर्ता स एको हरिरीश्वरः | ‘स्रष्टा पाता च संहर्ता स एको हरिरीश्वरः ।स्रष्टृत्वादिकमन्येषां दारुयोषावदुच्यते ॥ एकदेशक्रिया चात्र न तु सर्वात्मनेरितम् ।सृष्ट्यादिकं समस्तं तु विष्णोरेव पराद्भवेत्’इति च स्कान्दे ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 518: | Line 427: | ||
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‘निमित्तमात्रमीशस्य विश्वसर्गनिरोधयोः | ‘निमित्तमात्रमीशस्य विश्वसर्गनिरोधयोः ।हिरण्यगर्भः सर्वश्च कालाख्यारूपिणस्तव’ ॥इति भागवते ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 527: | Line 434: | ||
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‘स ब्रह्मणा विसृजति स रुद्रेण | ‘स ब्रह्मणा विसृजति स रुद्रेण विलाययति सोऽनुत्पत्तिलय एक एव हरिः परः परानन्दः’()॥इति च महोपनिषदि ॥ 13 ॥ | ||
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| Line 538: | Line 444: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (232)ओं विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ओम् ॥ 02-03-14 ॥ | ||
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| Line 546: | Line 452: | ||
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‘अत एव हीदं परात् क्रमादुत्पद्यते | ‘अत एव हीदं परात् क्रमादुत्पद्यते क्रमाद् विलीयते नासावुदेति नास्तमेति’() इति भाल्लवेयश्रुतौ क्रमाल्लयः प्रतीयते । | ||
‘अक्षरात् परमादेव सर्वमुत्पद्यते क्रमात् | ‘अक्षरात् परमादेव सर्वमुत्पद्यते क्रमात् । व्युत्क्रमाद् विलयश्चैव तस्मिन्नेव परात्मनि’() ॥इति चतुर्वेदशिखायां व्युत्क्रमाल्लयः प्रतीयते । अत आह | ||
}} | }} | ||
| Line 568: | Line 467: | ||
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‘कर्ता प्राणादिकस्यास्य हन्ता भूम्यादिकस्य च | ‘कर्ता प्राणादिकस्यास्य हन्ता भूम्यादिकस्य च ।यः क्रमाद् व्युत्क्रमाच्चैव स हरिः पर उच्यते’()॥इत्यत एव भाल्लवेयश्रुतिवचनात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 598: | Line 489: | ||
| text = | | text = | ||
वामने च – | वामने च – | ||
‘पूर्वे पूर्वे यतो विष्णोः सन्निधानं क्रमाधिकम् ।सामर्थ्याधिक्यमेतेषां पश्चादेव लयस्तथा ।व्याप्तिश्चाभ्यधिका तेषामत एव न संशयः’() ॥ इति॥ 14 ॥ | |||
‘पूर्वे पूर्वे यतो विष्णोः सन्निधानं क्रमाधिकम् | |||
}} | }} | ||
| Line 622: | Line 499: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (233)ओम् अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ओम् ॥ 02-03-15 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 630: | Line 507: | ||
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| text = | | text = | ||
‘प्राणान्मनो मनसश्च विज्ञानम्’ | ‘प्राणान्मनो मनसश्च विज्ञानम्’, ‘यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि’(कठ.उ.३.१३)इति लिङ्गाद्विज्ञानमनसी अन्तरा विपरीतक्रम इति चेत्, न विशेषप्रमाणाभावात् ॥15 ॥ | ||
इति लिङ्गाद्विज्ञानमनसी अन्तरा विपरीतक्रम इति | |||
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| Line 639: | Line 515: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (234)ओं चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ओम् ॥ 02-03-16 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 654: | Line 523: | ||
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| text = | | text = | ||
‘मनसश्च विज्ञानम्’ इति | ‘मनसश्च विज्ञानम्’() इति व्यपदेशश्चराचरेष्वालोचनाद् विज्ञानं भवतीति भागापेक्षया स्यात् । न विज्ञानतत्त्वापेक्षया । | ||
}} | }} | ||
| Line 662: | Line 531: | ||
| text = | | text = | ||
स्कान्दे च – | स्कान्दे च – | ||
‘परादव्यक्तमुत्पन्नमव्यक्तात्तु महांस्तथा ।विज्ञानतत्त्वं महतः समुत्पन्नं चतुर्मुखात् ॥विज्ञानतत्त्वात्तु मनो मनस्तत्त्वाच्च खादिकम् ।एवं बाह्या परा सृष्टिरन्तस्तद्व्यक्त्यपेक्षया ।विपरीतक्रमो ज्ञेयो यस्मादन्ते हरेर्दृशिः’() ॥इति॥ 16 ॥ | |||
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=== आत्माधिकरणम् === | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (235)ओं नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ओम् ॥ 02-03-17 ॥ | ||
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‘स इदं सर्वं विलाप्यान्तस्तमसि | ‘स इदं सर्वं विलाप्यान्तस्तमसि निलीनस्तद् विलाप्य व्युत्तिष्ठते स इदं सर्वं विसृजति विलापयति विस्थापयति प्रस्थापयत्याच्छादयति प्रकाशयति विमोचयत्येक एव’() इति श्रुतेः परमात्माऽपि न लीयते। अश्रुतत्वाद् ब्रह्मलयस्य। निलीन शब्देनापिहितत्वमुच्यते । ‘तुच्छेनाऽभ्वपिहितं यदासीत्’(ऋ.सं.१०.१२१.३) इति श्रुतेः । | ||
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‘स एतस्मिंस्तमसि निलीनः प्रकृतिं पुरुषं कालं चानुपश्यति कश्चन’ इति पैङ्गिशृतिः । | ‘स एतस्मिंस्तमसि निलीनः प्रकृतिं पुरुषं कालं चानुपश्यति नैनं पश्यति कश्चन’() इति च पैङ्गिशृतिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 723: | Line 563: | ||
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‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’ | ‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’(कठ.उ.५.१३),‘स नित्यो निर्गुणो विभुः परमः परात्मा’()।‘नित्यो विभुः कारणो लोकसाक्षी परो गुणैः सर्वदृक् शाश्वतश्च’() इत्यादि श्रुतिभ्यो नित्यत्वाच्च ॥ 17 ॥ | ||
‘स नित्यो निर्गुणो विभुः | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (236)ओं ज्ञोऽत एव ओम् ॥ 02-03-18॥ | ||
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| Line 743: | Line 581: | ||
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‘नित्यो नित्यानाम्’ इति | ‘नित्यो नित्यानाम्’(कठ.उ.५.१३) इति जीवस्यापि नित्यत्वमुक्तम् ।‘सर्व एते चिदात्मानो व्युच्चरन्ति’() इत्युत्पत्तिरुच्यते । अतो विरोध इत्यत आह – | ||
}} | }} | ||
| Line 750: | Line 588: | ||
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जीवोऽप्यत एव परमेश्वरादुत्पद्यते । शब्दादेव । ‘ते वा एते चिदात्मनोऽविनष्टाः परञ्ज्योतिर्निविशन्त्यविनष्टा एवोत्पद्यन्ते न विनश्यन्ति | जीवोऽप्यत एव परमेश्वरादुत्पद्यते । शब्दादेव । ‘ते वा एते चिदात्मनोऽविनष्टाः परञ्ज्योतिर्निविशन्त्यविनष्टा एवोत्पद्यन्ते न विनश्यन्ति कदाचन’()इति काषायणश्रुतिः ॥ 18 ॥ | ||
}} | }} | ||
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| Line 780: | Line 611: | ||
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‘उत्पद्यन्ते चिदात्मानो नित्यान्नित्याः परात्मनः | ‘उत्पद्यन्ते चिदात्मानो नित्यान्नित्याः परात्मनः ।उपाध्यपेक्षया तेषामुत्पत्तिरपि गीयते’()॥इति व्योमसंहितायाम्॥ 19 ॥ | ||
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=== उत्क्रान्त्यधिकरणम् === | |||
=== उत्क्रान्त्यधिकरणम् === | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (238)ओम् उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ओम् ॥ 02-03-20 ॥ | ||
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‘व्याप्ता ह्यात्मानश्चेतना निर्गुणाश्च सर्वात्मानः सर्वरूपा अनन्ताः’() इति काषायणश्रुतौ व्याप्तत्वं प्रतीयते । | |||
‘अणुर्ह्येष | ‘अणुर्ह्येष आत्मा यं वा एते सिनीतः । पुण्यं च पापं च’() इति गौपवनश्रुतावणुत्वमित्यतो विरोध इति । अतो ब्रवीति- | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘सोऽस्माच्छरीरादुत्क्रम्यामुं लोकमभिगच्छत्यमुष्मादिमं लोकमागच्छति स | ‘सोऽस्माच्छरीरादुत्क्रम्यामुं लोकमभिगच्छत्यमुष्मादिमं लोकमागच्छति । स गर्भी भवति स प्रसूयते स कर्म कुरुते’()इति पौष्यायणश्रुतेः॥ 20 ॥ | ||
इति पौष्यायणश्रुतेः॥ 20 ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (239)ओं स्वात्मना चोत्तरयोः ओम् ॥ 02-03-21 ॥ | ||
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| Line 844: | Line 660: | ||
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| text = | | text = | ||
तत्र स्वातन्त्र्य प्रतीतेः | तत्र स्वातन्त्र्य प्रतीतेः, । | ||
‘एकः प्रसूयते जन्तुरेक एव प्रमीयते। एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्’ ॥ इत्यादेश्च स्वयमेवेत्यतो वक्ति – | |||
}} | }} | ||
| Line 852: | Line 668: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स एतेनैव स्वात्मना परेणेमं गर्भमनुप्रविशति परेण जायते परेण कर्म कुरुते परेण नीयते | ‘स एतेनैव स्वात्मना परेणेमं गर्भमनुप्रविशति परेण जायते परेण कर्म कुरुते परेण नीयते परेणोन्नीयते तं वा एतमभिवदन्ति स्वात्मा’ इति,‘एष ह्यानन्दमादत्ते एष ह्येनं जीवमभिजीवयत्येष उद्गमयत्येष आगमयति।’(पौष्यायण) इति उत्तरयोर्वाक्ययोः परमात्मनैवोत् क्रान्त्यादयः ॥ 21 ॥ | ||
‘एष ह्यानन्दमादत्ते एष ह्येनं जीवमभिजीवयत्येष उद्गमयत्येष | |||
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| Line 861: | Line 676: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (240)ओं नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ओम् ॥ 02-03-22 ॥ | ||
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| Line 869: | Line 684: | ||
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| text = | | text = | ||
‘व्याप्ता ह्यात्मानश्चेतना निर्गुणाश्च’(काषायणश्रुतिः) इति व्याप्तिश्रुतेर्नाणुर्जीव इति चेत्, न । | |||
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‘स आत्मेदं सृजति स द्विधेदं बिभर्ति अन्तर्बहिश्च | ‘स आत्मेदं सृजति स द्विधेदं बिभर्ति अन्तर्बहिश्च स बहुधेदमनुप्रविश्याऽत्मनोऽभिनयति स आत्मा स आत्मानः स ईशः स विष्णुः स परः परोवरीयान्’() इति परमात्माधिकारत्वात् । | ||
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| Line 883: | Line 698: | ||
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‘एकशब्दैर्द्विशब्दैश्च बहुशब्दैश्च केशवः | ‘एकशब्दैर्द्विशब्दैश्च बहुशब्दैश्च केशवः ।एक एवोच्यते वेदैस्तावता नास्य भिन्नता’()॥इति भविष्यत्पुराणे । | ||
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| Line 892: | Line 705: | ||
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‘तदयं प्राणोऽधितिष्ठति। | ‘तदयं प्राणोऽधितिष्ठति। तदुक्तमृषिणा- ‘आतेन यातम्’(ऐ.आ.२.३.८) इत्यादि च ॥ 22 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (241)ओं स्वशब्दोन्मानाभ्यां च ओम् ॥ 02-03-23 ॥ | ||
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‘एषो ह्यात्माऽध्युद्गतो मानशक्तेस्तथाऽप्यसौ प्रमितिं याति वेदैः | ‘एषो ह्यात्माऽध्युद्गतो मानशक्तेस्तथाऽप्यसौ प्रमितिं याति वेदैः ।पूर्णोऽचिन्त्यः सर्ववेदैकयोनिः सर्वाधीशः सर्ववित् सर्वकर्ता’(काषायणश्रुतिः) | ||
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‘आत्माऽमेयः परं ब्रह्म परानन्दादिकाभिधाः।वदन्ति विष्णुमेवैकं | ‘आत्माऽमेयः परं ब्रह्म परानन्दादिकाभिधाः।वदन्ति विष्णुमेवैकं नान्यत्राऽसां गतिः क्वचित्’ इति च कौर्मे ॥ 23 ॥ | ||
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अणोरपि जीवस्य | अणोरपि जीवस्य सर्वशरीरव्याप्तिर्युज्यते। यथा हरिचन्दनविप्लुष एकदेशपतितायाः सर्वशरीरव्याप्तिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 954: | Line 766: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (243)ओम् अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि ओम् ॥ 02-03-25 ॥ | ||
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| Line 962: | Line 774: | ||
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सम्यगसम्यगवस्थानविशेषाद् युज्यते चन्दनस्येति चेत्, न। | |||
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{{Bhashyam | |||
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‘हृदि ह्येषा आत्मा’(प्र.३.६)) इति जीवास्यापि तथाऽभ्युपगमात् ॥ 25 ॥ | |||
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}} | }} | ||
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यथाऽऽलोकस्य प्रकाशगुणेन व्याप्तिर्ज्योतीरूपेणाव्याप्तिः एवं चिद्गुणेन व्याप्तिर्जीवरूपेणाव्याप्तिरिति वा । | यथाऽऽलोकस्य प्रकाशगुणेन व्याप्तिर्ज्योतीरूपेणाव्याप्तिः एवं चिद्गुणेन व्याप्तिर्जीवरूपेणाव्याप्तिरिति वा । | ||
}} | }} | ||
| Line 992: | Line 804: | ||
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‘असम्यक् सम्यगिति च व्यवस्थाभेदतः | ‘असम्यक् सम्यगिति च व्यवस्थाभेदतः सुराः।व्याप्त्यव्याप्तियुतास्त्वन्ये चिद्गुणेनैव नान्यथा॥चिद्गुणस्य स्वरूपत्वात् तद्व्याप्तिश्चेति युज्यते।शक्तियोगात् सुराणां तु विविधा च व्यवस्थितिः’() इति ॥ 26 ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (245)ओं व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति ओम् ॥ 02-03-27 ॥ | ||
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}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘स नित्यो निरवयवः पुण्ययुक् पापयुक् च स इमं लोकममुं | ‘स नित्यो निरवयवः पुण्ययुक् पापयुक् च स इमं लोकममुं चाऽवर्तते स विमुच्यते स एकधा न सप्तधा न शतधा’() इति गौपवनश्रुतावेकस्याबहुत्वं प्रतीयते । | ||
‘स पञ्चधा स सप्तधा स दशधा भवति स शतधा च सहस्रधा स गच्छति स मुच्यते’ इति पाराशर्यायणश्रुतौ बहुरूपत्वं प्रतीयते । | ‘स पञ्चधा स सप्तधा स दशधा भवति स शतधा च सहस्रधा स गच्छति स मुच्यते’() इति पाराशर्यायणश्रुतौ बहुरूपत्वं प्रतीयते । | ||
अतो विरोधं परिहरति- | अतो विरोधं परिहरति- | ||
}} | }} | ||
| Line 1,035: | Line 831: | ||
| id = BS_C02_S03_V27_B1 | | id = BS_C02_S03_V27_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यथा | यथा पुष्पाद् गन्धः पृथग् गच्छति, एवमंशिनो जीवादंशाः पृथग्गच्छन्ति ।‘अथैक एव सन् गन्धवद् व्यतिरिच्यतेऽथैकीभवत्यथ बह्वीभवति तं यथा यथेश्वरः प्रकुरुते तथा तथा भवति सोऽचिन्त्यः परमो गरीयान्’॥() इति शाण्डिल्यश्रुतिः । | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘अचिन्त्ययेशशक्त्यैव ह्येकोऽवयववर्जितः ।आत्मानं बहुधा कृत्वा क्रीडते योगसम्पदा’इति च पाद्मे ॥ 27 ॥ | |||
‘अचिन्त्ययेशशक्त्यैव ह्येकोऽवयववर्जितः ।आत्मानं बहुधा कृत्वा क्रीडते | |||
}} | }} | ||
| Line 1,060: | Line 848: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (246)ओम् पृथगुपदेशात् ओम् ॥ 02-03-28 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,068: | Line 856: | ||
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‘तत्वमसि’ , | ‘तत्वमसि’(छां.उ.६.८.७),‘अहं ब्रह्मास्मि’(बृ.उ.४.१०) इत्यादिषु जीवस्य परेणाभेदः प्रतीयते ।‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’(श्वे.उ.६.१३) ‘द्वा सुपर्णा’(श्वे.उ.४.६) इत्यादिषु भेदः। अत उच्यते- | ||
}} | }} | ||
| Line 1,075: | Line 863: | ||
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| text = | | text = | ||
‘भिन्नोऽचिन्त्यः परमो जीवसङ्घात्पूर्णः परो जीवसङ्घो ह्यपूर्णाः ।यतस्त्वसौ नित्यमुक्तो ह्ययं च बन्धान्मोक्षं तत एवाभिवाञ्छेत्’()॥इति सोपपत्तिककौशिकश्रुतेर्भिन्न एव जीवः ॥ 28 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,090: | Line 871: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (247)ओं तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ओम् ॥ 02-03-29 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,105: | Line 879: | ||
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ज्ञानानन्दादिब्रह्मगुणा एवास्य यतः सारः स्वरूपमतोऽभेदव्यपदेशः । यथा सर्वगुणात्मकत्वात् सर्वात्मकत्वं ब्रह्मण | ज्ञानानन्दादिब्रह्मगुणा एवास्य यतः सारः स्वरूपमतोऽभेदव्यपदेशः । यथा सर्वगुणात्मकत्वात् सर्वात्मकत्वं ब्रह्मण उच्यते- ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’(छां.उ.३.१४.१) इति । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,112: | Line 886: | ||
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| text = | | text = | ||
‘भिन्ना जीवाः परो | ‘भिन्ना जीवाः परो भिन्नस्तथाऽपि ज्ञानरूपतः ।प्रोच्यन्ते ब्रह्मरूपेण वेदवादेषु सर्वशः’()॥ इति॥ 29 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,123: | Line 896: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (248)ओं यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ओम् ॥ 02-03-30 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,131: | Line 904: | ||
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| text = | | text = | ||
जीवास्याप्युत्पत्तिरुक्ता । अतस्तस्य ‘सोऽनादिना पुण्येन पापेन चानुबद्धः। परेण निर्मुक्त आनन्त्याय कल्पते’ | जीवास्याप्युत्पत्तिरुक्ता । अतस्तस्य ‘सोऽनादिना पुण्येन पापेन चानुबद्धः। परेण निर्मुक्त आनन्त्याय कल्पते’(छां.उ.३.१४.१) इत्यानादिकर्मसम्बन्ध आनन्त्यावाप्तिश्च न युज्यत इत्यत आह – | ||
}} | }} | ||
| Line 1,159: | Line 925: | ||
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| text = | | text = | ||
‘आत्मा नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये | ‘आत्मा नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो धातुरस्य त्वनित्यः’(म.भा.५.४०.१२)॥इति च भारते ॥ 30 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,170: | Line 935: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (249)ओं पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ओम् ॥ 02-03-31 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,178: | Line 943: | ||
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| text = | | text = | ||
‘विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः’ | ‘विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः’(प्र.४.११),‘स आनन्दः स बलः स ओजः स परेणामुं लोकं नीयते स विमुच्यते’() इति जीवस्य ज्ञानानन्दादिरूपत्वमुच्यते । | ||
स दुःखाद् विमुक्त आनन्दी भवति सोऽज्ञानाद् विमुक्तो ज्ञानी भवति सोऽबलाद् विमुक्तो बली भवति। स नित्यो निरातङ्कोऽतिष्ठते’() इति पैङ्गीश्रुतौ अनानन्दादिरूपत्वं प्रतीयते । अत आह – | |||
}} | }} | ||
| Line 1,185: | Line 951: | ||
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यथा बालस्य सदेव पुंस्त्वं | यथा बालस्य सदेव पुंस्त्वं यौवनेऽभिव्यज्यते, एवं सतामेवाऽनन्दादीनां व्यक्त्यपेक्षया तदुक्तिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,192: | Line 958: | ||
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‘बलमानन्द ओजश्च सहो ज्ञानमनाकुलम् ।स्वरूपाण्येव जीवस्य व्यज्यन्ते | ‘बलमानन्द ओजश्च सहो ज्ञानमनाकुलम् ।स्वरूपाण्येव जीवस्य व्यज्यन्ते परमाद् विभोः’इति च गौपवनश्रुतिः॥ 31 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,200: | Line 966: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (250)ओं नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ओम् ॥ 02-03-32 ॥ | ||
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| Line 1,206: | Line 972: | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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व्यक्तनङ्गीकारे देवानां च नित्योपलब्धिरानन्दादीनाम्, असुराणां नित्यानुपलब्धिः मनुष्याणां च नित्योपलब्ध्यनुपलब्धी च प्रसज्ज्यन्ते ।‘नित्यानन्दो नित्यज्ञानो नित्यबलः परमात्मा नैवमसुरा एवमनेवं च मनुष्याः’ इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः । | |||
व्यक्तनङ्गीकारे देवानां च | |||
}} | }} | ||
| Line 1,222: | Line 981: | ||
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‘नित्यानन्दज्ञानबला देवा नैवं तु दानवाः | ‘नित्यानन्दज्ञानबला देवा नैवं तु दानवाः ।दुःखोपलब्धिमात्रास्ते मानुषस्तूभयात्मकाः ॥तेषां यदन्यथा दृश्यं तदुपाधिकृतं मतम् ।विज्ञानेनात्मयोगेन निजरूपे व्यवस्थितिः ॥सम्यज्ज्ञानं तु देवानां मनुष्याणां विमिश्रितम् ।विपरीतं च दैत्यानां ज्ञानस्यैवं व्यवस्थितिः’() इति ॥ 32 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,249: | Line 991: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (251)ओं कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ओम् ॥ 02-03-33 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,257: | Line 999: | ||
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ईश्वरस्यैव कर्तृत्वमुक्तम् । | ईश्वरस्यैव कर्तृत्वमुक्तम् । ‘यत् कर्म कुरुते तद् अभिसम्पद्यते’(बृ.उ.६.४.५) इति जीवस्योपलभ्यते । अत आह- | ||
}} | }} | ||
| Line 1,264: | Line 1,006: | ||
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जीवस्य कर्तृत्वाभावे | जीवस्य कर्तृत्वाभावे शास्त्रस्य अप्रयोजकत्वप्राप्तेः जीवोऽपि कर्ता ॥ 33 ॥ | ||
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| Line 1,272: | Line 1,014: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (252)ओं विहारोपदेशात् ओम् ॥ 02-03-34 ॥ | ||
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| Line 1,280: | Line 1,022: | ||
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‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा’ | ‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा’(छां.उ.८.१२.३) इत्यादि ॥ 34 ॥ | ||
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| Line 1,288: | Line 1,030: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (253)ओम् उपादानात् ओम् ॥ 02-03-35 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (254)ओं व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः ओम् ॥ 02-03-36 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,312: | Line 1,054: | ||
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| text = | | text = | ||
‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’ इति क्रियायां व्यपदेशाच्च । | ‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.३.४.१५) इति क्रियायां व्यपदेशाच्च । अन्यथा ‘आत्मैव लोकम्’() इति निर्देशः स्यात् ॥ 36 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,319: | Line 1,061: | ||
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| text = | | text = | ||
तर्हि कथमीश्वरस्यैव | तर्हि कथमीश्वरस्यैव कर्तृत्वम् इत्यतो वक्ति – | ||
}} | }} | ||
| Line 1,327: | Line 1,069: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (255)ओम् उपलब्धिवदनियमः ओम् ॥ 02-03-37 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 1,335: | Line 1,077: | ||
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यथा ज्ञान | यथा ज्ञान ‘इदं ज्ञास्यामि’() इत्यनियमः प्रतीयते, एवं कर्मणि । | ||
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‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(माध्यन्दिनपाठः) इति च श्रुतिः॥ 37 ॥ | |||
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समाध्यभावाच्चास्वातन्त्र्यं प्रतीयते, अतः ॥ 39 ॥ | |||
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| Line 1,390: | Line 1,139: | ||
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यथा तक्ष्णः कारयितृनियतत्वं कर्तृत्वं च विद्यते एवं जीवस्यापि ॥ 40 ॥ | यथा तक्ष्णः कारयितृनियतत्वं कर्तृत्वं च विद्यते, एवं जीवस्यापि ॥ 40 ॥ | ||
}} | }} | ||
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| Line 1,413: | Line 1,162: | ||
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| text = | | text = | ||
‘कर्तृत्वं करणत्वं च स्वभावश्चेतना धृतिः ।यत्प्रसादादिमे सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’इति हि | ‘कर्तृत्वं करणत्वं च स्वभावश्चेतना धृतिः ।यत्प्रसादादिमे सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’इति हि पैङ्गिश्रुतिः ॥ 41 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,421: | Line 1,170: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (260)ओं कृतप्रयत्नापेक्षस्तुविहितप्रतिषेधावैयर्थ्यादिभ्यः ओम् ॥ 02-03-42 ॥ | ||
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| Line 1,436: | Line 1,178: | ||
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ततोऽप्रयोजकत्वं शास्त्रस्य | ततोऽप्रयोजकत्वं शास्त्रस्य नाऽपद्यते । कृतप्रयत्नापेक्षत्वात् तत्प्रेरकत्वस्य । आदिशब्देनावैषम्यादि । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,450: | Line 1,192: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एतदेवं न | ‘एतदेवं न चाप्येवम्, एतदस्ति च नास्ति च’() इति च मोक्षधर्मे ॥ 42 ॥ | ||
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| Line 1,460: | Line 1,202: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (261)ओम् अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके ओम् ॥ 02-03-43 ॥ | ||
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| Line 1,468: | Line 1,210: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अंशा एव हीमे जीवा अंशी हि परमेश्वरः । स्वयमंशैरिदं सर्वं कारयत्यचलो हरिः’ ॥ इति गौपवनश्रुतौ अंशत्वं जीवस्योपलभ्यते । | ‘अंशा एव हीमे जीवा अंशी हि परमेश्वरः । स्वयमंशैरिदं सर्वं कारयत्यचलो हरिः’() ॥ इति गौपवनश्रुतौ अंशत्वं जीवस्योपलभ्यते । | ||
‘नैवांशो न सम्बन्धो नापेक्ष्यो जीवः परस्य । तथाऽपि तु यथायोगं फलदः प्रभुरेकराट् । न नियम्यः स कस्यापि स सर्वस्य नियामकः’ ॥ इति च भाल्लवेयश्रुतौ ॥ | ‘नैवांशो न सम्बन्धो नापेक्ष्यो जीवः परस्य । तथाऽपि तु यथायोगं फलदः प्रभुरेकराट् । न नियम्यः स कस्यापि स सर्वस्य नियामकः’() ॥ इति च भाल्लवेयश्रुतौ ॥ | ||
अतो ब्रवीति- | अतो ब्रवीति- | ||
}} | }} | ||
| Line 1,477: | Line 1,219: | ||
| id = BS_C02_S03_V43_B1 | | id = BS_C02_S03_V43_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘मां रक्षतु विभुर्नित्यं पुत्रोऽहं परमात्मनः’ । | ‘मां रक्षतु विभुर्नित्यं पुत्रोऽहं परमात्मनः’,‘अवः परेण पितरं यो अस्यानुवेद (पर एनावरेण)’(ऋ.सं.१.१६४.१८),‘यस्तद् वेद स पितुष्टिताऽसत्’(महाना.उ.२.४),‘यस्ता विजानात् स पितुष्पिताऽसत्’(ऋ.सं.१.१६४.१६)। | ||
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‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वतत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’(मु.उ.३.१.१)इत्यादिना नानाव्यपदेशादंशो जीवः । | |||
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तथा च पाराशर्यायणश्रुतिः-‘अंशो ह्येष परस्य योऽयं पुमानुत्पद्यते च म्रियते च नाना ह्येनं व्यपदिशन्ति पितेति पुत्रेति भ्रातेति च सखेति’() च इति । | |||
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‘अन्यः परोऽन्यो जीवो नासावस्य कुतश्चन ।नायं तस्यापि कश्चन’() इत्यन्यथा च काषायणश्रुतिः । | |||
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‘ब्रह्मदाशा ब्रह्मकितवा ब्रह्मैवेमे दाशाः’()इत्यभेदेनाप्येकेऽधीयते । | |||
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तथा | तथा चाग्निवेश्यश्रुतिः-‘अंशो ह्येष परस्य भिन्नं ह्येनमधीयिरेऽभिन्नं ह्येनमधीयिरे’() इति ॥ | ||
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‘पुत्रभ्रातृसखित्वेन स्वामित्वेन यतो हरिः ।बहुधा गीयते वेदैर्जीवोंऽशस्तस्य तेन तु ॥यतो भेदेन तस्यायमभेदेन च गीयते ।अतश्चांशत्वमुद्दिष्टं भेदाभेदौ न मुख्यतः’() इति ॥ 43 ॥ | |||
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‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’(ऋ.सं.१०.९०.३) इति ॥ 44 ॥ | |||
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‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन’(भ.गी.१५.७) इति ॥ 45 ॥ | |||
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अनंशत्वश्रुतेर्गतिं चाऽह – | |||
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अंशत्वेऽपि न मत्स्यादिरूपी पर एवंविधः। यथा तेजोंऽशस्यैव कालाग्नेः खद्योतस्य च नैकप्रकारता। यथा जलांशस्यामृतसमुद्रस्य मूत्रादेश्च । यथा च पृथिव्यंशस्य मेरोर्विष्ठादेश्च । अभिमानिदेवतापेक्षयैतत् ॥ 46 ॥ | |||
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‘एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’(भाग.१.३.२८) । | |||
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‘अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः’(भाग.१.३.३२) ॥ | |||
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‘स्वांशश्चाथो विभिन्नांश इति द्वेधांऽश इष्यते ।अंशिनो यत् तु सामर्थ्यं यत् स्वरूपं यथास्थितिः॥‘तदेव नाणुमात्रोऽपि भेदः स्वांशांशिनोः क्वचित् ।विभिन्नांशोऽल्पशक्तिः स्यात् किञ्चित्सादृश्यमात्रयुक्’ ॥ इति वाराहे । | |||
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‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(भ.गी.११.४३) इति च ॥ 47 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (266)ओम् अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत् ओम् ॥ 02-03-48 ॥ | ||
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परानुज्ञया प्रवृत्तिः, परतो बन्धनिवृत्तिश्च जीवस्य प्रतीयते, अंशत्वेऽपि । देहसम्बन्धात्- | |||
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‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(बृ.उ.), ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’(तै.आ.३.१२) इत्यादिना । न तु परस्य। | |||
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युज्यते च ज्योतिरादिवत् । यथाऽऽदित्यो वियद्गतस्तत् प्रकाशश्चैकप्रकारः । ‘शुक्लं कृष्णं कनीनिका’(ऐ.आ.२.१.५) इति तदंशस्याप्यक्ष्णो देहसम्बन्धान्न तादृशी शक्तिस्तदनुग्राह्यत्वं तेनैवाऽवृतिपरिहारश्च । | |||
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यथा बाह्यामृतजलस्यामृतसमुद्रस्य चैकत्वं तदंशस्यापि श्लेष्मणस्तदनुग्राह्यत्वं तेनैव विरोधिनिवृत्तिश्च । | |||
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‘यत् किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते ।सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ईश्वरो हि महद्भूतं प्रभुर्नारायणो विराट् ।भूतान्तरात्मा विज्ञेयः(वरदः) सगुणो निर्गुणोऽपि च ।भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’() इति । | |||
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‘अंशाश्च देहयोग्यत्वाज्जीवा बन्धादिसंयुताः ।अनुग्राह्याश्चेश्वरेण न तु मत्स्यादिको हरिः ॥अदेहबन्धयोग्यत्वाद् यथासूर्यप्रभाऽक्षिणी ।यथाऽमृतसमुद्रस्य श्लेष्मादेश्च द्विरूपता ॥अनुग्राह्यत्वमन्यस्य तेनैवाऽवृतिरोधनम्’() इति ॥ 48 ॥ | |||
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अपूर्णशक्तित्वाच्च जीवस्य न मत्स्यादिसाम्यम् । | |||
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‘तस्य ह वा एतस्य परमस्य त्रीणि रूपाणि कृष्णो रामः कपिल इति । तस्य ह वा एतस्य परमस्य पञ्चरूपाणि दशरूपाणि शतरूपाणि सहस्ररूपाण्यमितरूपाणि। तानि ह वा एतानि सर्वाणि पूर्णानि सर्वाण्यनन्तानि सर्वाण्यसम्मितान्यथावराः सर्व एवापूर्णाः सर्वे एव बध्यन्तेऽथ मुच्यन्ते च केचन’() इति ॥ 49 ॥ | |||
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॥ इति अंशाधिकरणम् ॥ 18 ॥ | |||
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‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.सं.६.४७.१८) इति प्रतिबिम्बत्वाच्च न साम्यम् । | |||
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‘द्विरूपावंशकौ तस्य परमस्य हरेर्विभोः ।प्रतिबिम्बांशकश्चाथ स्वरूपांशक एव च ॥प्रतिबिम्बांशका जीवाः प्रादुर्भावाः परे स्मृताः ।प्रतिबिम्बेष्वल्पसाम्यं स्वरूपाणीतराणि तु’() इति ॥ | |||
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‘सोपाधिरनुपाधिश्च प्रतिबिम्बो द्विधेयते ।जीव ईशस्यानुपाधिरिन्द्रचापो यथा रवेः’इति पैङ्गिश्रुतिः ॥ | |||
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‘यथैषा पुरुषे छाया एतस्मिन्नेतदाततम्’(प्र.३.३) इति च श्रुतिः ॥ 50 ॥ | |||
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=== अदृष्टाधिकरणम् === | |||
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प्रतिबिम्बानां मिथो वैचित्र्ये कारणमाह – | |||
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अनादिविद्याकर्मादिवैचित्र्याद् वैचित्र्यम् ॥ 51 ॥ | |||
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इच्छाद्वेषसुखदुःखादिवैचित्र्यं चादृष्टादेव । च शब्देन प्रतिक्षणवैचित्र्यं च ॥52॥ | |||
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॥ | न स्वर्गभूम्यादिप्रदेशविशेषाद् वैचित्र्यम् । तत्प्राप्तेरप्यदृष्टापेक्षत्वात्। एकदेशस्थितानामेव वैचित्र्यदर्शनाच्च ॥ 53 ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः॥ 02-03 ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः॥ 02-03 ॥ | ||
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[[Category:Brahmasutra]] | [[Category:Brahmasutra]] | ||
Revision as of 09:38, 10 April 2026
जीवपरमात्माधिभूताधिदैवेषु श्रुतीनां परस्परविरोधमपाकरोत्यनेन पादेन।
वियदधिकरणम्
(219)ओं न वियदश्रुतेः ॥ 02-03-01॥
न वियदनुत्पत्तिमत् । तथाऽश्रुतेः ॥ 01 ॥
(220)ओम् अस्ति तु ओम् ॥ 02-03-02 ॥
अस्त्येव चोत्पत्तिश्रुतिः- ‘आत्मन आकाशः सम्भूतः’(तै.उ.२.१) इत्यादि ॥ 02 ॥
(221)ओं गौण्यसम्भवात् ओम् ॥ 02-03-03 ॥
‘अनादिर्वा अयमाकाशः शून्योऽलौकिकः’() इत्यादिश्रुतिर्गौणी । अन्यथोत्पत्तिश्रुतिबाहुल्यासम्भवात् ॥ 03 ॥
(222)ओं शब्दाच्च ओम् ॥ 02-03-04 ॥
‘अथ ह वाव नित्यानि पुरुषः प्रकृतिरात्मा काल इति । अथ यान्यनित्यानि प्राणः श्रद्धाभूतानि भौतिकानीति ।
यानि ह वा उत्पत्तिमन्ति तान्यनित्यानि। यानि ह वा अनुत्पत्तिमन्ति तानि नित्यानि ।
न ह्येतानि कदाचनोत्पद्यन्ते न विलीयन्ते पुरुषः प्रकृतिरात्मा काल इति ।
अथैतान्युत्पत्तिमन्ति चानुत्पत्तिमन्ति च प्राणः श्रद्धाऽऽकाश इति भागशो ह्युत्पद्यन्ते’() इति भाल्लवेयश्रुतेः ॥ 04 ॥
(223)ओं स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ओम् ॥ 02-03-05 ॥
स्यादेवैकस्योत्पत्तिमत्त्वमनुत्पत्तिमत्त्वं च गौणमुख्यत्वापेक्षया । यथा ब्रह्मशब्दः-
‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म बृहति बृंहयति च’(अथर्वशिरः) इति श्रुतेः । परे ब्रह्मणि मुख्योऽपि गौणत्वेन विरिञ्चादिष्वपि वर्तते ।
अत एवाब्रह्मत्वं च तेषाम् । एवम् अन्यत्राप्यनुत्पत्तिमच्छब्दः ॥ 05 ॥
(224)ओं प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ओम् ॥ 02-03-06 ॥
ब्रह्मणोऽन्यस्य नित्यत्वे ‘इदं सर्वमसृजत’(तै.उ.२.३) इत्यादि प्रतिज्ञाहानिः। आकाशस्यापि सर्वस्मादव्यतिरेकात्।
‘अत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्’(तै.उ.२.३),‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत् । एकमेवाद्वितीयम्’(छां.उ.६.२.१),‘इदं वा अग्रे नैव किञ्चनासीत्’(तै.ब्रा.२.२.९) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 06 ॥
(225)ओं यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ओम् ॥ 02-03-07 ॥
विभक्तत्वाच्च विकारित्वं युक्तम् । विकारिण एव हि विभक्ता लोके दृश्यन्ते ।
‘एकोऽविभक्तः परमः पुरुषो विष्णुरुच्यते ।प्रकृतिः पुरुषः कालस्त्रय एते विभागतः ॥चतुर्थस्तु महान् प्रोक्तः पञ्चमाऽहङ्कृतिर्मता ।तद्विभागेन जायन्त आकाशाद्याः पृथक् पृथक् ॥यो विभागी विकारः स सोऽविकारः परो हरिः ।अविभागात् परानन्दो नित्यो नित्यगुणात्मकः ।विभागो ह्यल्पशक्तित्वं नहि तत् परमात्मनः’।इति बृहत्संहितायाम् ॥ 07 ॥
मातरिश्वाधिकरणम्
(226)ओम् एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ओम् ॥ 02-03-08 ॥
‘अथ ह नित्याश्चानित्याश्च । तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यनित्यानि । वायुर्वाव नित्यो वायुना हि सर्वाणि भूतानि नेनीयन्ते’()
‘अथ ह चेतनाश्चाचेतनाश्च । तेजोऽबन्नान्याकाश इति तान्यचेतनानि । वायुर्वाव चेतनो वायुना हि सर्वाणि भूतानि विज्ञायन्ते’() ।
‘कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन् । ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण’(ऋ.सं.७.१९.१।
‘सा वा एषा देवताऽनादिर्योऽयं पवते’() इति ।
‘यस्यानाऽदिर्न मध्यं नान्तो नोदयो न निम्लोचः’()।इत्यादिश्रुतिभ्यो वायोरनुत्पत्तिरित्यतो ब्रवीति –एतेन मुख्यामुख्यानुत्पत्तिवचनेन विभक्तत्वाच्च वाय्वनुत्पत्तिश्रुतिरपि व्याख्याता ।
‘नित्यः परमनित्यश्च तथाऽनित्यः परस्तथा ।चतुर्धैतज्जगत् सर्वं परानित्यं तु पार्थिवम्।अनित्यानि तु भूतानि नित्यो वायुरुदाहृतः ।परस्तु नित्यः पुरुषः प्रकृतिः काल एव च ॥
‘एतच्चतुष्टयं विष्णुः स्वयं नित्यः परात्परः ।प्रतिव्यूह्य व्यूह्य चासावतीत्या च जनार्दनः ।धारयत्यनिशं देवो नित्यानन्दैकलक्षणः’इति कौर्मे ॥ 08 ॥
असम्भवाधिकरणम्
(227)ओम् असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ओम् ॥ 02-03-09 ॥
‘असद् वा इदमग्र आसीत् ततो वै सदजायत’(तै.उ.२.७),‘असतः सदजायत’(ऋ.सं.१०.७२.२) इत्यादि श्रुतिभ्यः सतोऽप्युत्पत्तिरिति चेत्, न ।
अनुत्पत्तिरेव सतः । तुशब्देनोक्तव्यवस्थामपाकरोति । न ह्यसतः सदुत्पद्यते । अदृष्टत्वादनुपपत्तेः ।‘तद् वा एतद्ब्रह्माहुर्बृहति बृंहयति चेति । तद् वा एतदसदाहुः न ह्यासादयति कश्चन । तद् वा एतत् परमाहुः परतो हि तदुदीक्ष्यते’इति श्रुतेरसच्छब्दो ब्रह्मवाची ।
‘देवानां पूर्वे युगेऽसतः सदजायतेति । ब्रह्म वा असत् सद् वा प्राणः प्राणं वाव महान् सह ओजो बलमित्याचक्षते’इति च पैङ्गीश्रुतिः।
‘त्वं देवशक्त्यां गुणकर्मयोनौ रेतस्त्वजायां कविरादधेऽजः ।ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे बभूविमात्मन् करवाम किं ते’(भा.३.६.२८)इति भागवते ॥
‘अजायमानो बहुधा विजायते’(तै.आ.३.१३) इति च ।
‘प्रत्यक्षत्वं हरेर्जन्म न विकारः कथञ्चन ।पुरुषः प्रकृतिः कालो महानित्यादिषु क्रमात् ॥विकार एव जननं पुरुषे तद्विशेषणम् ।परतन्त्रविशेषो हि विकार इति कीर्तितः’()॥ इति पाद्मे ॥
‘अविकारोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ।विकारहेतुकं सर्वं कुरुते निर्विकारवान् ॥‘शक्तिशक्तिमतोश्चापि न विभागः कथञ्चन ।अविभिन्नाऽपि सेच्छादिभेदैरपि विभाव्यते’इति भागवततन्त्रे ॥ 09 ॥
तेजोऽधिकरणम्
(228)ओं तेजोऽतस्तथा ह्याह ओम् ॥ 02-03-10 ॥
‘वायोरग्निः’(तै.आ.२.१)इत्यादेर्नान्यत उत्पत्तिः ग्राह्या । अत एव परात् तदपि जायते । ‘तत् तेजोऽसृजत’(छां.उ.६.२.३) इत्याह । ‘कारणत्वेन’ इत्युक्तेऽप्यमुख्यतयाऽन्येषामपि शब्दोक्तत्वात् पुनरुक्तिरुभयकारणत्वनिवृत्यर्थम् ॥ 10 ॥
अबधिकरणम्
(229)ओम् आपः ओम् ॥ 02-03-11 ॥
‘ब्रह्मैवेदमग्र आसीत् तदपोऽसृजत तदिदं सर्वम्’() इति श्रुतेः ‘अग्नेरापः’(तै.उ.२.१) इत्युक्तेऽपि ब्रह्मण एवाबादिसृष्टिः ।
‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी’(मुं.उ.२.१.३) इत्यादि च ।
‘कर्ता सर्वस्य वै विष्णुः एक एव न संशयः ।इतरेषां तु सत्ताद्या यत एव तदाज्ञया’ इति भविष्यत्पुराणे॥
वामने च-
‘तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तीः प्रबोधयन् ।एक एव महाशक्तिः कुरुते सर्वमञ्जसा’ इति ॥
घर्मात् स्वेदादिदृष्टेः पुनः प्रतिषेधः ॥ 11 ॥
पृथिव्यधिकरणम्
(230)ओं पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरादिभ्यः ओम् ॥ 02-03-12 ॥
‘ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्यामः प्रजायेमहीति । ता अन्नमसृजन्त’(छां.उ.६.२) इत्यद्भ्योऽन्नसृष्टिः श्रूयते ।‘अद्भ्यः पृथिवी’(तै.उ.२.१) इति कुत्रचित् पृथिवीसृष्टिः । अतो विरुद्धत्वादप्रामाण्यमित्यतो वक्तिः –
पृथिवी तत्रान्नशब्देनोच्यते । भूताधिकारत्वात् । कार्ष्ण्यप्रचुरा च पृथिवी । नान्नस्य तथा विशेषः । ‘आपश्च पृथिवी चान्नम्’(ऐ.आ.२.३.१),‘पृथिवी वा अन्नम्’(तै.उ.३.९), ‘ता आपोऽन्नमसृजन्त पृथिवी वा अन्नम्’() इत्यादिशब्दान्तराच्च । आदिशब्दाद् युक्तिरपौरुषेयत्वेनादोषस्य वाक्यस्य नाप्रामाण्यमित्यादि ।
‘विरोधो वाक्ययोर्यत्र नाप्रामाण्यं तदेष्यते ।यथाऽविरुद्धता न स्यात् तथाऽर्थः कल्प्य एतयोः’() इति ।
रक्तोऽग्निरुदकं शुक्लं कृष्णैव पृथिवी स्वतः ।नाभिपद्माभिसम्बन्धात् पीता सेत्यभिधीयते ।क्षत्ररक्ताभिसम्बन्धाद् रक्तोदकबहुत्वतः ।शुक्लत्वमेत्येवमेव वर्णान्तरगतिर्भवेत् ॥
विष्णुवीर्याभियोगाच्च पीतत्वं भुव इष्यते ।स्वर्णवीर्यो हि भगवाननादिः पुरुषोत्तमः॥इति व्योमसंहितायाम् ॥ 12 ॥
तदभिध्यानाधिकरणम्
(231)ओं तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात् सः ओम् ॥ 02-03-13 ॥
‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रो मा विशान्तकस्तेनान्नेनाप्यायस्व’(म.ना.उ.१६.२) इत्यादिनाऽन्यः संहर्ता प्रतीयत इत्यतो ब्रूते –
‘तस्याभिध्यानाद् योजनात् तत्त्वभावाद् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’(श्वे.उ.१.१०)इति बन्धलयस्य तदभिध्याननिमित्तत्त्वलिङ्गात् तत्कर्तृत्वं प्रतीयते, किमु सादेर्जगतः । इत्येतस्मादेव संहारकर्ता विष्णुरिति प्रतीयते । किमु
‘यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृत मीहायुषेऽत्तु देवः’(),‘य इदं सर्वं विलाययति स हरिः परः परात्मा’इत्यादि श्रुतिभ्य इति एव शब्दः ।
‘स्रष्टा पाता च संहर्ता स एको हरिरीश्वरः ।स्रष्टृत्वादिकमन्येषां दारुयोषावदुच्यते ॥ एकदेशक्रिया चात्र न तु सर्वात्मनेरितम् ।सृष्ट्यादिकं समस्तं तु विष्णोरेव पराद्भवेत्’इति च स्कान्दे ॥
‘निमित्तमात्रमीशस्य विश्वसर्गनिरोधयोः ।हिरण्यगर्भः सर्वश्च कालाख्यारूपिणस्तव’ ॥इति भागवते ॥
‘स ब्रह्मणा विसृजति स रुद्रेण विलाययति सोऽनुत्पत्तिलय एक एव हरिः परः परानन्दः’()॥इति च महोपनिषदि ॥ 13 ॥
विपर्ययाधिकरणम्
(232)ओं विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ओम् ॥ 02-03-14 ॥
‘अत एव हीदं परात् क्रमादुत्पद्यते क्रमाद् विलीयते नासावुदेति नास्तमेति’() इति भाल्लवेयश्रुतौ क्रमाल्लयः प्रतीयते ।
‘अक्षरात् परमादेव सर्वमुत्पद्यते क्रमात् । व्युत्क्रमाद् विलयश्चैव तस्मिन्नेव परात्मनि’() ॥इति चतुर्वेदशिखायां व्युत्क्रमाल्लयः प्रतीयते । अत आह
क्रमवचनमपि विपरीतक्रमापेक्षया ।
‘कर्ता प्राणादिकस्यास्य हन्ता भूम्यादिकस्य च ।यः क्रमाद् व्युत्क्रमाच्चैव स हरिः पर उच्यते’()॥इत्यत एव भाल्लवेयश्रुतिवचनात् ।
‘अनुरूपः क्रमः सृष्टौ प्रतिरूपो लये क्रमः ।इति क्रमेण भगवान् सृष्टिसंहारकृद्धरिः’ इति च पाद्मे ।
पूर्वेषां पूर्वेषां सामर्थ्याधिक्यादुपपद्यते च ।
वामने च –
‘पूर्वे पूर्वे यतो विष्णोः सन्निधानं क्रमाधिकम् ।सामर्थ्याधिक्यमेतेषां पश्चादेव लयस्तथा ।व्याप्तिश्चाभ्यधिका तेषामत एव न संशयः’() ॥ इति॥ 14 ॥
अन्तराधिकरणम्
(233)ओम् अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ओम् ॥ 02-03-15 ॥
‘प्राणान्मनो मनसश्च विज्ञानम्’, ‘यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि’(कठ.उ.३.१३)इति लिङ्गाद्विज्ञानमनसी अन्तरा विपरीतक्रम इति चेत्, न विशेषप्रमाणाभावात् ॥15 ॥
(234)ओं चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ओम् ॥ 02-03-16 ॥
‘मनसश्च विज्ञानम्’() इति व्यपदेशश्चराचरेष्वालोचनाद् विज्ञानं भवतीति भागापेक्षया स्यात् । न विज्ञानतत्त्वापेक्षया ।
स्कान्दे च –
‘परादव्यक्तमुत्पन्नमव्यक्तात्तु महांस्तथा ।विज्ञानतत्त्वं महतः समुत्पन्नं चतुर्मुखात् ॥विज्ञानतत्त्वात्तु मनो मनस्तत्त्वाच्च खादिकम् ।एवं बाह्या परा सृष्टिरन्तस्तद्व्यक्त्यपेक्षया ।विपरीतक्रमो ज्ञेयो यस्मादन्ते हरेर्दृशिः’() ॥इति॥ 16 ॥
आत्माधिकरणम्
(235)ओं नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ओम् ॥ 02-03-17 ॥
‘स इदं सर्वं विलाप्यान्तस्तमसि निलीनस्तद् विलाप्य व्युत्तिष्ठते स इदं सर्वं विसृजति विलापयति विस्थापयति प्रस्थापयत्याच्छादयति प्रकाशयति विमोचयत्येक एव’() इति श्रुतेः परमात्माऽपि न लीयते। अश्रुतत्वाद् ब्रह्मलयस्य। निलीन शब्देनापिहितत्वमुच्यते । ‘तुच्छेनाऽभ्वपिहितं यदासीत्’(ऋ.सं.१०.१२१.३) इति श्रुतेः ।
‘स एतस्मिंस्तमसि निलीनः प्रकृतिं पुरुषं कालं चानुपश्यति नैनं पश्यति कश्चन’() इति च पैङ्गिशृतिः ।
‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’(कठ.उ.५.१३),‘स नित्यो निर्गुणो विभुः परमः परात्मा’()।‘नित्यो विभुः कारणो लोकसाक्षी परो गुणैः सर्वदृक् शाश्वतश्च’() इत्यादि श्रुतिभ्यो नित्यत्वाच्च ॥ 17 ॥
ज्ञाधिकरणम्
(236)ओं ज्ञोऽत एव ओम् ॥ 02-03-18॥
‘नित्यो नित्यानाम्’(कठ.उ.५.१३) इति जीवस्यापि नित्यत्वमुक्तम् ।‘सर्व एते चिदात्मानो व्युच्चरन्ति’() इत्युत्पत्तिरुच्यते । अतो विरोध इत्यत आह –
जीवोऽप्यत एव परमेश्वरादुत्पद्यते । शब्दादेव । ‘ते वा एते चिदात्मनोऽविनष्टाः परञ्ज्योतिर्निविशन्त्यविनष्टा एवोत्पद्यन्ते न विनश्यन्ति कदाचन’()इति काषायणश्रुतिः ॥ 18 ॥
(237)ओं युक्तेश्च ओम् ॥ 02-03-19 ॥
नित्यस्यापि ह जीवस्योपाध्यक्षयोत्पत्तिर्युज्यते।
‘उत्पद्यन्ते चिदात्मानो नित्यान्नित्याः परात्मनः ।उपाध्यपेक्षया तेषामुत्पत्तिरपि गीयते’()॥इति व्योमसंहितायाम्॥ 19 ॥
उत्क्रान्त्यधिकरणम्
(238)ओम् उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ओम् ॥ 02-03-20 ॥
‘व्याप्ता ह्यात्मानश्चेतना निर्गुणाश्च सर्वात्मानः सर्वरूपा अनन्ताः’() इति काषायणश्रुतौ व्याप्तत्वं प्रतीयते ।
‘अणुर्ह्येष आत्मा यं वा एते सिनीतः । पुण्यं च पापं च’() इति गौपवनश्रुतावणुत्वमित्यतो विरोध इति । अतो ब्रवीति-
हेतूनाम् सकाशादणुरेव ।
‘सोऽस्माच्छरीरादुत्क्रम्यामुं लोकमभिगच्छत्यमुष्मादिमं लोकमागच्छति । स गर्भी भवति स प्रसूयते स कर्म कुरुते’()इति पौष्यायणश्रुतेः॥ 20 ॥
(239)ओं स्वात्मना चोत्तरयोः ओम् ॥ 02-03-21 ॥
तत्र स्वातन्त्र्य प्रतीतेः, ।
‘एकः प्रसूयते जन्तुरेक एव प्रमीयते। एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्’ ॥ इत्यादेश्च स्वयमेवेत्यतो वक्ति –
‘स एतेनैव स्वात्मना परेणेमं गर्भमनुप्रविशति परेण जायते परेण कर्म कुरुते परेण नीयते परेणोन्नीयते तं वा एतमभिवदन्ति स्वात्मा’ इति,‘एष ह्यानन्दमादत्ते एष ह्येनं जीवमभिजीवयत्येष उद्गमयत्येष आगमयति।’(पौष्यायण) इति उत्तरयोर्वाक्ययोः परमात्मनैवोत् क्रान्त्यादयः ॥ 21 ॥
(240)ओं नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ओम् ॥ 02-03-22 ॥
‘व्याप्ता ह्यात्मानश्चेतना निर्गुणाश्च’(काषायणश्रुतिः) इति व्याप्तिश्रुतेर्नाणुर्जीव इति चेत्, न ।
‘स आत्मेदं सृजति स द्विधेदं बिभर्ति अन्तर्बहिश्च स बहुधेदमनुप्रविश्याऽत्मनोऽभिनयति स आत्मा स आत्मानः स ईशः स विष्णुः स परः परोवरीयान्’() इति परमात्माधिकारत्वात् ।
‘एकशब्दैर्द्विशब्दैश्च बहुशब्दैश्च केशवः ।एक एवोच्यते वेदैस्तावता नास्य भिन्नता’()॥इति भविष्यत्पुराणे ।
‘तदयं प्राणोऽधितिष्ठति। तदुक्तमृषिणा- ‘आतेन यातम्’(ऐ.आ.२.३.८) इत्यादि च ॥ 22 ॥
(241)ओं स्वशब्दोन्मानाभ्यां च ओम् ॥ 02-03-23 ॥
‘एषो ह्यात्माऽध्युद्गतो मानशक्तेस्तथाऽप्यसौ प्रमितिं याति वेदैः ।पूर्णोऽचिन्त्यः सर्ववेदैकयोनिः सर्वाधीशः सर्ववित् सर्वकर्ता’(काषायणश्रुतिः)
इति वाक्यशेषे आत्मशब्दोन्मानाभ्यां च।
‘आत्माऽमेयः परं ब्रह्म परानन्दादिकाभिधाः।वदन्ति विष्णुमेवैकं नान्यत्राऽसां गतिः क्वचित्’ इति च कौर्मे ॥ 23 ॥
(242)ओम् अविरोधश्चन्दनवत् ओम् ॥ 02-03-24॥
अणोरपि जीवस्य सर्वशरीरव्याप्तिर्युज्यते। यथा हरिचन्दनविप्लुष एकदेशपतितायाः सर्वशरीरव्याप्तिः ।
‘अणुमात्रोऽप्ययं जीवः स्वदेहं व्याप्य तिष्ठति ।यथा व्याप्य शरीराणि हरिचन्दनविप्लुषः’ इति च ब्रह्माण्डपुराणे ॥ 24 ॥
(243)ओम् अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि ओम् ॥ 02-03-25 ॥
सम्यगसम्यगवस्थानविशेषाद् युज्यते चन्दनस्येति चेत्, न।
‘हृदि ह्येषा आत्मा’(प्र.३.६)) इति जीवास्यापि तथाऽभ्युपगमात् ॥ 25 ॥
(244)ओं गुणाद्वाऽऽलोकवत् ओम् ॥ 02-03-26 ॥
यथाऽऽलोकस्य प्रकाशगुणेन व्याप्तिर्ज्योतीरूपेणाव्याप्तिः एवं चिद्गुणेन व्याप्तिर्जीवरूपेणाव्याप्तिरिति वा ।
‘असम्यक् सम्यगिति च व्यवस्थाभेदतः सुराः।व्याप्त्यव्याप्तियुतास्त्वन्ये चिद्गुणेनैव नान्यथा॥चिद्गुणस्य स्वरूपत्वात् तद्व्याप्तिश्चेति युज्यते।शक्तियोगात् सुराणां तु विविधा च व्यवस्थितिः’() इति ॥ 26 ॥
व्यतिरेकाधिकरणम्
(245)ओं व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति ओम् ॥ 02-03-27 ॥
‘स नित्यो निरवयवः पुण्ययुक् पापयुक् च स इमं लोकममुं चाऽवर्तते स विमुच्यते स एकधा न सप्तधा न शतधा’() इति गौपवनश्रुतावेकस्याबहुत्वं प्रतीयते ।
‘स पञ्चधा स सप्तधा स दशधा भवति स शतधा च सहस्रधा स गच्छति स मुच्यते’() इति पाराशर्यायणश्रुतौ बहुरूपत्वं प्रतीयते ।अतो विरोधं परिहरति-
यथा पुष्पाद् गन्धः पृथग् गच्छति, एवमंशिनो जीवादंशाः पृथग्गच्छन्ति ।‘अथैक एव सन् गन्धवद् व्यतिरिच्यतेऽथैकीभवत्यथ बह्वीभवति तं यथा यथेश्वरः प्रकुरुते तथा तथा भवति सोऽचिन्त्यः परमो गरीयान्’॥() इति शाण्डिल्यश्रुतिः ।
‘अचिन्त्ययेशशक्त्यैव ह्येकोऽवयववर्जितः ।आत्मानं बहुधा कृत्वा क्रीडते योगसम्पदा’इति च पाद्मे ॥ 27 ॥
पृथगुपदेशाधिकरणम्
(246)ओम् पृथगुपदेशात् ओम् ॥ 02-03-28 ॥
‘तत्वमसि’(छां.उ.६.८.७),‘अहं ब्रह्मास्मि’(बृ.उ.४.१०) इत्यादिषु जीवस्य परेणाभेदः प्रतीयते ।‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्’(श्वे.उ.६.१३) ‘द्वा सुपर्णा’(श्वे.उ.४.६) इत्यादिषु भेदः। अत उच्यते-
‘भिन्नोऽचिन्त्यः परमो जीवसङ्घात्पूर्णः परो जीवसङ्घो ह्यपूर्णाः ।यतस्त्वसौ नित्यमुक्तो ह्ययं च बन्धान्मोक्षं तत एवाभिवाञ्छेत्’()॥इति सोपपत्तिककौशिकश्रुतेर्भिन्न एव जीवः ॥ 28 ॥
(247)ओं तद्गुणसारत्वात् तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ओम् ॥ 02-03-29 ॥
ज्ञानानन्दादिब्रह्मगुणा एवास्य यतः सारः स्वरूपमतोऽभेदव्यपदेशः । यथा सर्वगुणात्मकत्वात् सर्वात्मकत्वं ब्रह्मण उच्यते- ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’(छां.उ.३.१४.१) इति ।
‘भिन्ना जीवाः परो भिन्नस्तथाऽपि ज्ञानरूपतः ।प्रोच्यन्ते ब्रह्मरूपेण वेदवादेषु सर्वशः’()॥ इति॥ 29 ॥
यावदधिकरणम्
(248)ओं यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ओम् ॥ 02-03-30 ॥
जीवास्याप्युत्पत्तिरुक्ता । अतस्तस्य ‘सोऽनादिना पुण्येन पापेन चानुबद्धः। परेण निर्मुक्त आनन्त्याय कल्पते’(छां.उ.३.१४.१) इत्यानादिकर्मसम्बन्ध आनन्त्यावाप्तिश्च न युज्यत इत्यत आह –
यावत्परमात्मा तिष्ठत्यनाद्यनन्तत्वेनैवं जीवोऽपि ।
‘नित्यः परो नित्यो जीवोऽनित्यास्तस्य धातवः ।अत उत्पद्यते च म्रियते च विमुच्यते च’इति च आग्निवेश्यश्रुतिः ।
‘आत्मा नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो धातुरस्य त्वनित्यः’(म.भा.५.४०.१२)॥इति च भारते ॥ 30 ॥
पुंस्त्वाधिकरणम्
(249)ओं पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ओम् ॥ 02-03-31 ॥
‘विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः’(प्र.४.११),‘स आनन्दः स बलः स ओजः स परेणामुं लोकं नीयते स विमुच्यते’() इति जीवस्य ज्ञानानन्दादिरूपत्वमुच्यते ।
स दुःखाद् विमुक्त आनन्दी भवति सोऽज्ञानाद् विमुक्तो ज्ञानी भवति सोऽबलाद् विमुक्तो बली भवति। स नित्यो निरातङ्कोऽतिष्ठते’() इति पैङ्गीश्रुतौ अनानन्दादिरूपत्वं प्रतीयते । अत आह –
यथा बालस्य सदेव पुंस्त्वं यौवनेऽभिव्यज्यते, एवं सतामेवाऽनन्दादीनां व्यक्त्यपेक्षया तदुक्तिः ।
‘बलमानन्द ओजश्च सहो ज्ञानमनाकुलम् ।स्वरूपाण्येव जीवस्य व्यज्यन्ते परमाद् विभोः’इति च गौपवनश्रुतिः॥ 31 ॥
(250)ओं नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ओम् ॥ 02-03-32 ॥
व्यक्तनङ्गीकारे देवानां च नित्योपलब्धिरानन्दादीनाम्, असुराणां नित्यानुपलब्धिः मनुष्याणां च नित्योपलब्ध्यनुपलब्धी च प्रसज्ज्यन्ते ।‘नित्यानन्दो नित्यज्ञानो नित्यबलः परमात्मा नैवमसुरा एवमनेवं च मनुष्याः’ इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः ।
‘नित्यानन्दज्ञानबला देवा नैवं तु दानवाः ।दुःखोपलब्धिमात्रास्ते मानुषस्तूभयात्मकाः ॥तेषां यदन्यथा दृश्यं तदुपाधिकृतं मतम् ।विज्ञानेनात्मयोगेन निजरूपे व्यवस्थितिः ॥सम्यज्ज्ञानं तु देवानां मनुष्याणां विमिश्रितम् ।विपरीतं च दैत्यानां ज्ञानस्यैवं व्यवस्थितिः’() इति ॥ 32 ॥
कर्तृत्वाधिकरणम्
(251)ओं कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ओम् ॥ 02-03-33 ॥
ईश्वरस्यैव कर्तृत्वमुक्तम् । ‘यत् कर्म कुरुते तद् अभिसम्पद्यते’(बृ.उ.६.४.५) इति जीवस्योपलभ्यते । अत आह-
जीवस्य कर्तृत्वाभावे शास्त्रस्य अप्रयोजकत्वप्राप्तेः जीवोऽपि कर्ता ॥ 33 ॥
(252)ओं विहारोपदेशात् ओम् ॥ 02-03-34 ॥
‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा’(छां.उ.८.१२.३) इत्यादि ॥ 34 ॥
(253)ओम् उपादानात् ओम् ॥ 02-03-35 ॥
साधनाद्युपादानप्रतीतेश्च ॥ 35 ॥
(254)ओं व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः ओम् ॥ 02-03-36 ॥
‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.३.४.१५) इति क्रियायां व्यपदेशाच्च । अन्यथा ‘आत्मैव लोकम्’() इति निर्देशः स्यात् ॥ 36 ॥
तर्हि कथमीश्वरस्यैव कर्तृत्वम् इत्यतो वक्ति –
(255)ओम् उपलब्धिवदनियमः ओम् ॥ 02-03-37 ॥
यथा ज्ञान ‘इदं ज्ञास्यामि’() इत्यनियमः प्रतीयते, एवं कर्मणि ।
‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(माध्यन्दिनपाठः) इति च श्रुतिः॥ 37 ॥
(256)ओं शक्तिविपर्ययात् ओम् ॥ 02-03-38॥
कुतः ? –
अल्पशक्तित्वाज्जीवस्य ॥ 38 ॥
(257)ओं समाध्यभावाच्च ओम् ॥ 02-03-39॥
समाध्यभावाच्चास्वातन्त्र्यं प्रतीयते, अतः ॥ 39 ॥
(258)ओं यथा च तक्षोभयथा ओम् ॥ 02-03-40॥
यथा तक्ष्णः कारयितृनियतत्वं कर्तृत्वं च विद्यते, एवं जीवस्यापि ॥ 40 ॥
(259)ओं परात्तु तच्छ्रुतेः ओम् ॥ 02-03-41 ॥
सा च कर्तृत्वशक्तिः परादेव ।
‘कर्तृत्वं करणत्वं च स्वभावश्चेतना धृतिः ।यत्प्रसादादिमे सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’इति हि पैङ्गिश्रुतिः ॥ 41 ॥
(260)ओं कृतप्रयत्नापेक्षस्तुविहितप्रतिषेधावैयर्थ्यादिभ्यः ओम् ॥ 02-03-42 ॥
ततोऽप्रयोजकत्वं शास्त्रस्य नाऽपद्यते । कृतप्रयत्नापेक्षत्वात् तत्प्रेरकत्वस्य । आदिशब्देनावैषम्यादि ।
‘पूर्वकर्म प्रयत्नं च संस्कारं चाप्यपेक्ष्यतु ।ईश्वरः कारयेत् सर्वं तच्चेश्वरकृतं स्वयम् ॥अनादित्वाददोषश्च पूर्णशक्तित्वतो हरेः’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
‘एतदेवं न चाप्येवम्, एतदस्ति च नास्ति च’() इति च मोक्षधर्मे ॥ 42 ॥
अंशाधिकरणम्
(261)ओम् अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके ओम् ॥ 02-03-43 ॥
‘अंशा एव हीमे जीवा अंशी हि परमेश्वरः । स्वयमंशैरिदं सर्वं कारयत्यचलो हरिः’() ॥ इति गौपवनश्रुतौ अंशत्वं जीवस्योपलभ्यते ।
‘नैवांशो न सम्बन्धो नापेक्ष्यो जीवः परस्य । तथाऽपि तु यथायोगं फलदः प्रभुरेकराट् । न नियम्यः स कस्यापि स सर्वस्य नियामकः’() ॥ इति च भाल्लवेयश्रुतौ ॥अतो ब्रवीति-
‘मां रक्षतु विभुर्नित्यं पुत्रोऽहं परमात्मनः’,‘अवः परेण पितरं यो अस्यानुवेद (पर एनावरेण)’(ऋ.सं.१.१६४.१८),‘यस्तद् वेद स पितुष्टिताऽसत्’(महाना.उ.२.४),‘यस्ता विजानात् स पितुष्पिताऽसत्’(ऋ.सं.१.१६४.१६)।
‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वतत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’(मु.उ.३.१.१)इत्यादिना नानाव्यपदेशादंशो जीवः ।
तथा च पाराशर्यायणश्रुतिः-‘अंशो ह्येष परस्य योऽयं पुमानुत्पद्यते च म्रियते च नाना ह्येनं व्यपदिशन्ति पितेति पुत्रेति भ्रातेति च सखेति’() च इति ।
‘अन्यः परोऽन्यो जीवो नासावस्य कुतश्चन ।नायं तस्यापि कश्चन’() इत्यन्यथा च काषायणश्रुतिः ।
‘ब्रह्मदाशा ब्रह्मकितवा ब्रह्मैवेमे दाशाः’()इत्यभेदेनाप्येकेऽधीयते ।
तथा चाग्निवेश्यश्रुतिः-‘अंशो ह्येष परस्य भिन्नं ह्येनमधीयिरेऽभिन्नं ह्येनमधीयिरे’() इति ॥
‘पुत्रभ्रातृसखित्वेन स्वामित्वेन यतो हरिः ।बहुधा गीयते वेदैर्जीवोंऽशस्तस्य तेन तु ॥यतो भेदेन तस्यायमभेदेन च गीयते ।अतश्चांशत्वमुद्दिष्टं भेदाभेदौ न मुख्यतः’() इति ॥ 43 ॥
(262)ओं मन्त्रवर्णात् ओम् ॥ 02-03-44॥
‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’(ऋ.सं.१०.९०.३) इति ॥ 44 ॥
(263)ओम् अपि स्मर्यते ओम् ॥ 02-03-45 ॥
‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन’(भ.गी.१५.७) इति ॥ 45 ॥
(264)ओं प्रकाशादिवन्नैवं परः ओम् ॥ 02-03-46 ॥
अनंशत्वश्रुतेर्गतिं चाऽह –
अंशत्वेऽपि न मत्स्यादिरूपी पर एवंविधः। यथा तेजोंऽशस्यैव कालाग्नेः खद्योतस्य च नैकप्रकारता। यथा जलांशस्यामृतसमुद्रस्य मूत्रादेश्च । यथा च पृथिव्यंशस्य मेरोर्विष्ठादेश्च । अभिमानिदेवतापेक्षयैतत् ॥ 46 ॥
(265)ओं स्मरन्ति च ओम् ॥ 02-03-47 ॥
‘एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’(भाग.१.३.२८) ।
‘अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः’(भाग.१.३.३२) ॥
‘स्वांशश्चाथो विभिन्नांश इति द्वेधांऽश इष्यते ।अंशिनो यत् तु सामर्थ्यं यत् स्वरूपं यथास्थितिः॥‘तदेव नाणुमात्रोऽपि भेदः स्वांशांशिनोः क्वचित् ।विभिन्नांशोऽल्पशक्तिः स्यात् किञ्चित्सादृश्यमात्रयुक्’ ॥ इति वाराहे ।
‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(भ.गी.११.४३) इति च ॥ 47 ॥
(266)ओम् अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत् ओम् ॥ 02-03-48 ॥
परानुज्ञया प्रवृत्तिः, परतो बन्धनिवृत्तिश्च जीवस्य प्रतीयते, अंशत्वेऽपि । देहसम्बन्धात्-
‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(बृ.उ.), ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’(तै.आ.३.१२) इत्यादिना । न तु परस्य।
युज्यते च ज्योतिरादिवत् । यथाऽऽदित्यो वियद्गतस्तत् प्रकाशश्चैकप्रकारः । ‘शुक्लं कृष्णं कनीनिका’(ऐ.आ.२.१.५) इति तदंशस्याप्यक्ष्णो देहसम्बन्धान्न तादृशी शक्तिस्तदनुग्राह्यत्वं तेनैवाऽवृतिपरिहारश्च ।
यथा बाह्यामृतजलस्यामृतसमुद्रस्य चैकत्वं तदंशस्यापि श्लेष्मणस्तदनुग्राह्यत्वं तेनैव विरोधिनिवृत्तिश्च ।
‘यत् किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते ।सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ईश्वरो हि महद्भूतं प्रभुर्नारायणो विराट् ।भूतान्तरात्मा विज्ञेयः(वरदः) सगुणो निर्गुणोऽपि च ।भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’() इति ।
‘अंशाश्च देहयोग्यत्वाज्जीवा बन्धादिसंयुताः ।अनुग्राह्याश्चेश्वरेण न तु मत्स्यादिको हरिः ॥अदेहबन्धयोग्यत्वाद् यथासूर्यप्रभाऽक्षिणी ।यथाऽमृतसमुद्रस्य श्लेष्मादेश्च द्विरूपता ॥अनुग्राह्यत्वमन्यस्य तेनैवाऽवृतिरोधनम्’() इति ॥ 48 ॥
(267)ओम् असन्ततेश्चाव्यतिकरः ओम् ॥ 02-03-49 ॥
अपूर्णशक्तित्वाच्च जीवस्य न मत्स्यादिसाम्यम् ।
‘तस्य ह वा एतस्य परमस्य त्रीणि रूपाणि कृष्णो रामः कपिल इति । तस्य ह वा एतस्य परमस्य पञ्चरूपाणि दशरूपाणि शतरूपाणि सहस्ररूपाण्यमितरूपाणि। तानि ह वा एतानि सर्वाणि पूर्णानि सर्वाण्यनन्तानि सर्वाण्यसम्मितान्यथावराः सर्व एवापूर्णाः सर्वे एव बध्यन्तेऽथ मुच्यन्ते च केचन’() इति ॥ 49 ॥
(268)ओम् आभास एव च ओम् ॥ 02-03-50 ॥
॥ इति अंशाधिकरणम् ॥ 18 ॥
‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.सं.६.४७.१८) इति प्रतिबिम्बत्वाच्च न साम्यम् ।
‘द्विरूपावंशकौ तस्य परमस्य हरेर्विभोः ।प्रतिबिम्बांशकश्चाथ स्वरूपांशक एव च ॥प्रतिबिम्बांशका जीवाः प्रादुर्भावाः परे स्मृताः ।प्रतिबिम्बेष्वल्पसाम्यं स्वरूपाणीतराणि तु’() इति ॥
‘सोपाधिरनुपाधिश्च प्रतिबिम्बो द्विधेयते ।जीव ईशस्यानुपाधिरिन्द्रचापो यथा रवेः’इति पैङ्गिश्रुतिः ॥
‘यथैषा पुरुषे छाया एतस्मिन्नेतदाततम्’(प्र.३.३) इति च श्रुतिः ॥ 50 ॥
अदृष्टाधिकरणम्
(269)ओम् अदृष्टानियमात् ओम् ॥ 02-03-51॥
प्रतिबिम्बानां मिथो वैचित्र्ये कारणमाह –
अनादिविद्याकर्मादिवैचित्र्याद् वैचित्र्यम् ॥ 51 ॥
(270)ओम् अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ओम् ॥ 02-03-52 ॥
इच्छाद्वेषसुखदुःखादिवैचित्र्यं चादृष्टादेव । च शब्देन प्रतिक्षणवैचित्र्यं च ॥52॥
(271)ओं प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ओम् ॥ 02-03-53 ॥
न स्वर्गभूम्यादिप्रदेशविशेषाद् वैचित्र्यम् । तत्प्राप्तेरप्यदृष्टापेक्षत्वात्। एकदेशस्थितानामेव वैचित्र्यदर्शनाच्च ॥ 53 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः॥ 02-03 ॥