Brahmasutra/C2/S1: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
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| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (136)ओं स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ओं॥ 02-01-01 ॥ | ||
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उक्तेऽर्थेऽविरोधं | उक्तेऽर्थेऽविरोधं दर्शयति अनेनाध्यायेन । प्रथमपादे युक्त्यविरोधम् । प्रथमतः स्मृत्यविरोधं दर्शयति- | ||
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सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव | सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव स्यात् ? इति चेत्, न। अन्यस्मृतीनां विष्ण्वादिभिर्नितरां सर्वर्ज्ञैरेव कृतत्वात्; श्रुतेराधिक्यं च सिद्ध्यति॥ 01 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (137)ओम् इतरेषां चानुपलब्धेः ओम् ॥ 02-01-02 ॥ | ||
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| Line 36: | Line 38: | ||
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इतरेषां तासु स्मृतिषूक्तानां | इतरेषां च तासु स्मृतिषूक्तानां फलानां, प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेः अप्रमाण्यं तासां युक्तम् । ‘च’शब्देन भागोपलब्धिरङ्गीकृता ॥ 02 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (138)ओम् एतेन योगः प्रत्युक्तः ओम् ॥ 02-01-03 ॥ | ||
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योगफलं | योगफलं प्रत्यक्षोपलभ्यम् इति न मन्तव्यम् । उक्ताभ्यासे तत्काल एव फलादृष्टेः ॥ 03 ॥ | ||
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| Line 69: | Line 64: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (139)ओं न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ओम् ॥ 02-01-04 ॥ | ||
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| Line 77: | Line 72: | ||
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नैवं | नैवं श्रुतेः तदनुसारिस्मृतेश्च तदुक्तानुपलब्धेः अप्रामाण्यम् । विलक्षणत्वात्, नित्यत्वात्, तदनुसारित्वाच्च । | ||
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| Line 84: | Line 79: | ||
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न हि नित्ये दोषाः कल्प्याः । | |||
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स्वतश्च प्रमाण्यम् । अन्यथाऽनवस्थितेः । | |||
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| text = | | text = | ||
नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’ इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥ | ‘न चक्षुर्न श्रोत्रं न तर्को न स्मृतिर्वेदा ह्येवैनं वेदयन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च । | ||
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{{Bhashyam | |||
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नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.सं.८.६४.६) इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’(म.भा.१२.२३८.९३) इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (140)ओं दृश्यते तु ओम् ॥ 02-01-05 ॥ | ||
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अधिकारिणां फलम् । | अधिकारिणां फलम् । | ||
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‘ऋग्यजुः | ‘ऋग्यजुः सामाथर्वाश्च मूलरामायणं तथा।भारतं पञ्चरात्रं च वेदा इत्येव शब्दिताः ॥पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः ।स्वतः प्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चिद् विचार्यते ॥यत् तेषूक्तं न दृश्येत पूर्वकर्मात्र कारणम् ।नाप्रामाण्यं भवेदेषां दृश्यते ह्यधिकारतः॥इतः प्रामाण्यमन्येषां न स्वतस्तु कथञ्चन ।अदृश्योक्तौ ततस्तेषामप्रमाण्यं न संशयः’ इति ॥ 05 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (141)ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम् ॥ 02-01-06 ॥ | ||
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| Line 164: | Line 141: | ||
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‘मृदब्रवीत्’(श.ब्रा.६.१.३),‘आपोऽब्रुवन्’(श.ब्रा.६.१.३), इत्यादिवचनाद् युक्तिविरुद्धो वेद इति । अतोऽब्रवीत्- | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (142)ओं दृश्यते च ओम् ॥ 02-01-07 ॥ | ||
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तासां सामर्थ्यं महद्भिः । | तासां सामर्थ्यं महद्भिः । | ||
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‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः | ‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः प्रथितौजसः।अचिन्त्याः शक्तयस्तासां दृश्यन्ते मुनिभिश्च ताः ।ताश्च सर्वगता नित्यं वासुदेवैकसंश्रयाः’ इति ॥ 07 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (143)ओम् असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ओम् ॥ 02-01-08 ॥ | ||
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| Line 221: | Line 189: | ||
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‘असदेवेदमग्र | ‘असदेवेदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)‘असतः सदजायत’(ऋ.सं.१०.७२.३) इत्यादिनाऽसतः कारणत्वोक्तेर्विरोध इत्यतो वक्ति- | ||
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| Line 228: | Line 196: | ||
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| text = | | text = | ||
प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते । सर्वशब्दानां ब्रह्मणि | प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते । | ||
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{{Bhashyam | |||
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सर्वशब्दानां ब्रह्मणि समन्वयेऽपि ‘तदधीनत्वाद् अर्थवत्’(ब्र.सू.१.४.३) इत्यादिनाऽमुख्यत्वेनान्यस्यापि वाच्यत्वेन अङ्गीकाराद् असतः प्राप्तिः। | |||
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{{Bhashyam | |||
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तथा श्रुतिप्राप्तमेवासन्मतमत्र निषिध्यते । समयस्योपरि निषेधात् । अर्थाद् युक्तिविरोधोऽपि निराक्रियते ॥ 08 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (144)ओम् अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ओम् ॥ 02-01-09 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (145)ओं न तु दृष्टान्तभावात् ओम् ॥ 02-01-10 ॥ | ||
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प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते। सत उत्पत्तिः | प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते। | ||
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सत उत्पत्तिः सशेषविनाशश्च हि लोके दृष्टः॥10 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (147)ओं तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथाऽनुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः ओं॥ 02-01-12 ॥ | ||
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एतावानेव तर्क इति | एतावानेव तर्क इति प्रतिष्ठापकप्रमाणाभावाद् उक्तादन्यथाऽप्यनुमेयमिति चेत्, | ||
}} | }} | ||
| Line 298: | Line 287: | ||
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न । एवं सति प्रमाणसिद्धेऽपि मोक्षेऽन्यथाऽनुमेयत्वादनिर्मोक्षप्रसङ्गः । | |||
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{{Bhashyam | |||
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अतो यावत्प्रमाणसिद्धं तावदेवाङ्गीकर्तव्यम् । नातोऽन्यच्छङ्क्यम् । | |||
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| text = | | text = | ||
‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥ | ‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥ | ||
| Line 307: | Line 310: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (148)ओम् एतेन शिष्टा अपरिग्रहा अपि व्याख्याताः ओम् ॥ 02-01-13 ॥ | ||
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| Line 329: | Line 325: | ||
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‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’ | ‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’,‘प्रधानादिदमुत्पन्नं प्रधानमधितिष्ठति ।प्रधाने लयमभ्येति न ह्यन्यत् कारणं मतम्’॥‘जीवाद्भवन्ति भूतानि जीवे तिष्ठन्त्यचञ्चलाः ।जीवे तु लयमृच्छन्ति न जीवात् कारणं परम्’ ॥इत्यादिश्रुतिप्राप्ता निराकृताः । | ||
}} | }} | ||
| Line 336: | Line 332: | ||
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यथा दुःखादिषु जीवस्यास्वातन्त्र्यमेवमन्येष्वपीति दृष्टान्तः । श्रुतिगतिस्तु ब्रह्मवाचकत्वेन प्रदर्शिता । यत्रान्यवाचकत्वेऽप्यविरोधस्तत्रान्यदप्यमुख्यतयोच्यते, यत्र विरोधस्तत्र ब्रह्मैवोच्यत इति नियमः ॥ 13 ॥ | |||
}} | }} | ||
=== भोक्त्रधिकरणम् === | |||
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| Line 356: | Line 342: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (149)ओं भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ओम् ॥ 02-01-14 ॥ | ||
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| Line 371: | Line 350: | ||
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| text = | | text = | ||
‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’ इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव | ‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’(मुं.उ.३.२.७) इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव न हन्यस्यान्यत्वं युज्यत इति चेत्, न । स्याल्लोकवत् । यथा लोके उदके उदकान्तरस्यैकीभावव्यवहारेऽप्यन्तर्भेदोऽस्त्येव, एवं स्यादत्रापि । तथा च श्रुतिः- | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’ इति । | ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’(क.उ.४.१५) इति । | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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स्कान्दे च – | स्कान्दे च – | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत् | ‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत् ।न चैतदेव भवति यतो वृद्धिः प्रदृश्यते ॥एवमेव हि जीवोऽपि तादात्म्यं परमात्मना ।प्राप्तोऽपि नासौ भवति स्वातन्त्र्यादिविशेषणात्’ इति ।‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।तद् यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलोहरे’ इति च । | ||
}} | }} | ||
| Line 416: | Line 378: | ||
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| text = | | text = | ||
‘न ते | ‘न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति’(ऋ.सं.७.९९.१),‘न ते विष्णो जायमानो न जातः’(ऋ.७.११.२)इत्यादि च फलत्वेऽपि युक्तिविरोधेऽन्तर्भावादत्रोक्तम् ॥ 14 ॥ | ||
इत्यादि च फलत्वेऽपि युक्तिविरोधेऽन्तर्भावादत्रोक्तम् ॥ 14 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 427: | Line 388: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (150)ओं तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ओम् ॥ 02-01-15 ॥ | ||
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}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
स्वतन्त्रबहुसाधना सृष्टिर्लोके दृष्टा । नैवं ब्रह्मणः । स्वरूपसामर्थ्यादेव तस्य सृष्टिः । | |||
}} | }} | ||
| Line 442: | Line 403: | ||
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| text = | | text = | ||
‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं | ‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत् स्वित् कथाऽऽसीत्’(ऋ.सं.१०.८१.२) इति ह्याक्षेपः । अधिष्ठानाद्यनुक्तेः । आदिशब्दाद्युक्तिभिश्च । | ||
}} | }} | ||
| Line 449: | Line 410: | ||
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| text = | | text = | ||
‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते | ‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते ।साधनानां साधनत्वं यतः किं तस्य साधनैः’() इत्यादिभिः ॥ 15 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 458: | Line 418: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (151)ओं भावे चोपलब्धेः ओम् ॥ 02-01-16 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 466: | Line 426: | ||
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| text = | | text = | ||
स्वतन्त्रसाधनभावे | स्वतन्त्रसाधनभावे प्रमाणैरुपलभ्येत । | ||
}} | }} | ||
| Line 473: | Line 433: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न | ‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न वस्त्वस्ति कुतश्चन । अतो वेदत्वमेतेषां यतस्ते सर्ववेदकाः’ इति स्कान्दे ॥ 16 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 481: | Line 441: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (152)ओं सत्वाच्चावरस्य ओम् ॥ 02-01-17 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 489: | Line 449: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अद्भ्यः सम्भूतः पृथिव्यै रसाच्च’ इत्यादिना साधनान्तरप्रतीतेः कथमनुपलब्धिरित्यत आह | ‘अद्भ्यः सम्भूतः पृथिव्यै रसाच्च’(तै.आ.३.१६) इत्यादिना साधनान्तरप्रतीतेः कथमनुपलब्धिरित्यत आह- | ||
}} | }} | ||
| Line 503: | Line 463: | ||
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| text = | | text = | ||
‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् | ‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् तद् यदासीत् तदावृतमासीत् तदधीनमासीदथ ह्येक एव परम आसीद् यस्यैतदासीन्न ह्येतदासीत्’() इति हि काषायणश्रुतिः ॥ 17 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 511: | Line 471: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (153)ओम् असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ओम् ॥ 02-01-18॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 519: | Line 479: | ||
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| text = | | text = | ||
‘नासदासीन्नो सदासीत्’ इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति | ‘नासदासीन्नो सदासीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.१) इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति चेत्, न । अव्यक्तत्वपारतन्त्र्यादिधर्मान्तरेण हि तदुच्यते ।‘तम आसीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.३) इति वाक्यशेषात् । न चान्यत्र प्रमाणमस्ति । | ||
}} | }} | ||
| Line 526: | Line 486: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’(महा.ना.उ.१०.५)। | |||
‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति | ‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति ।न चान्यथा क्वाऽपि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथा भविष्यत्’(),‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’(भ.गी.१६.८),‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञाः शक्तिं हरेर्ये न विदुःपरां हि’। | ||
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते | |||
‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञाः शक्तिं हरेर्ये न विदुःपरां | |||
}} | }} | ||
| Line 555: | Line 494: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा | ‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा’(),‘अथ हैनमाहुः सत्यकर्मेति सत्यं ह्येवेदं विश्वमसौ सृजते। अथैनमार्हुनित्यकर्मेति नित्यं ह्येवासौ कुरुते’()। | ||
}} | }} | ||
| Line 569: | Line 501: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यच्चिकेत | ‘यच्चिकेत सत्यमित्तन्न मोघम्’(ऋ.सं.१०.५५.६) इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः । | ||
}} | }} | ||
| Line 576: | Line 508: | ||
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| text = | | text = | ||
‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र | ‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र युक्तता।तथैवार्थः परिज्ञेयो नावाक्या युक्तिरिष्यते’()॥इति बृहत्संहितायाम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 585: | Line 515: | ||
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| text = | | text = | ||
‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः | ‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः ।तत्र दृष्टानुसारेण तेषामर्थोऽन्ववेक्ष्यते’ ॥ इति च । | ||
}} | }} | ||
| Line 593: | Line 522: | ||
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| text = | | text = | ||
‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि | ‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि ।इत्यादिवद् विरुद्धानि वचनान्यथ युक्तयः ।प्रमाणैर्बहुभिर्ज्ञेया आभासा इति वैदिकैः ॥वेदवेदानुसारेषु विरोधेऽन्यार्थकल्पना ।अन्येषां तु विरुद्धानां विप्रलम्भोऽथवा भ्रमः’॥ इति भागवततन्त्रे । | ||
इति भागवततन्त्रे । | |||
}} | }} | ||
| Line 617: | Line 529: | ||
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| text = | | text = | ||
‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम् | ‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम् ।मध्यमं त्वागमो ज्ञेयः प्रत्यक्षमधमं स्मृतम् ॥प्रत्यक्षयोरागमयोर्विरोधे निश्चयाय तु ।अनुमाद्या न स्वतन्त्राः प्रमाणपदवीं ययुः’इति पुरुषोत्तमतन्त्रे॥ 18 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 633: | Line 537: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (154)ओं युक्तेः शब्दान्तराच्च ओम् ॥ 02-01-19 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 641: | Line 545: | ||
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| text = | | text = | ||
‘साधनानां साधनत्वं | ‘साधनानां साधनत्वं यदाऽऽत्माधीनमिष्यते ।तदा साधनसम्पत्तिरैश्वर्यद्योतिका भवेत्’(),इत्यादेः साधनान्तरेण सृष्टिर्युक्ता । | ||
इत्यादेः साधनान्तरेण सृष्टिर्युक्ता । | |||
}} | }} | ||
| Line 650: | Line 552: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’ इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥ | ‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’(महा.ना.उ.१.१२) इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 658: | Line 560: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (155)ओं पटवच्च ओम् ॥ 02-01-20॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 674: | Line 576: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (156)ओं यथा प्राणादिः ओम् ॥ 02-01-21॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 689: | Line 584: | ||
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| text = | | text = | ||
तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव यथा शरीरेन्द्रियादिः। | तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव । यथा शरीरेन्द्रियादिः। | ||
}} | }} | ||
| Line 706: | Line 601: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (157)ओम् इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ओम् ॥ 02-01-22॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 714: | Line 609: | ||
| id = BS_C02_S01_V22_summary | | id = BS_C02_S01_V22_summary | ||
| text = | | text = | ||
जीवकर्तृपक्षः श्रुतिप्राप्तो विस्तरान्निराक्रियते- | |||
}} | }} | ||
| Line 729: | Line 624: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (158)ओम् अधिकं तु भेदनिर्देशात् ओम् ॥ 02-01-23 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 737: | Line 632: | ||
| id = BS_C02_S01_V23_B1 | | id = BS_C02_S01_V23_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न च ब्रह्मणः | न च ब्रह्मणः श्रमचिन्तादिदोषप्राप्तिः ।अधिकशक्तित्वात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 744: | Line 639: | ||
| id = BS_C02_S01_V23_B2 | | id = BS_C02_S01_V23_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘श्रोता मन्ता | ‘श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टाऽघोष्टा विज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः’(ऐ.आ.३.२.४),‘एष त आत्मा सर्वान्तरः’(बृ.उ.५.५.२),‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’(बृ.उ.५.५.१), इत्यादिविशेषनिर्देशात् ॥ 23 ॥ | ||
‘एष त आत्मा सर्वान्तरः’ | |||
‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ | |||
इत्यादिविशेषनिर्देशात् ॥ 23 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 755: | Line 647: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (159)ओम् अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ओम् ॥ 02-01-24 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 778: | Line 670: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (160)ओम् उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ओम् ॥ 02-01-25 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 786: | Line 678: | ||
| id = BS_C02_S01_V25_B1 | | id = BS_C02_S01_V25_B1 | ||
| text = | | text = | ||
जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति | जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति चेत्, न । यथा क्षीरं गोषु दृश्यमानमपि प्राणादेव जायते- | ||
}} | }} | ||
| Line 793: | Line 685: | ||
| id = BS_C02_S01_V25_B2 | | id = BS_C02_S01_V25_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’ इति वचनात् | ‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’() इति वचनात्, एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव । | ||
एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव । | |||
}} | }} | ||
| Line 807: | Line 692: | ||
| id = BS_C02_S01_V25_B4 | | id = BS_C02_S01_V25_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ | ‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(),‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’() इत्यादेः ॥ 25 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 815: | Line 700: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (161)ओं देवादिवदपि लोके ओम् ॥ 02-01-26 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 823: | Line 708: | ||
| id = BS_C02_S01_V26_B1 | | id = BS_C02_S01_V26_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । | न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । देवादिवद् अदृश्यत्वशक्तियोगात् । लोकेऽपि पिशाचादीनां तादृशी शक्तिर्दृष्टा किम्वीश्वरस्य । | ||
}} | }} | ||
| Line 830: | Line 715: | ||
| id = BS_C02_S01_V26_B2 | | id = BS_C02_S01_V26_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘न | ‘न युक्तियोगाद् वाक्यानि निराकार्याण्यपि क्वचित् ।विरोध एव वाक्यानां युक्तयो न तु युक्तयः’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 26 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 838: | Line 723: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (162)ओं कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ओम् ॥ 02-01-27 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 853: | Line 731: | ||
| id = BS_C02_S01_V27_B1 | | id = BS_C02_S01_V27_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च | अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च तद्युज्यते । सामर्थ्यैकदेशदर्शनात् । न चैकदेशेन निरवयवत्वात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 860: | Line 738: | ||
| id = BS_C02_S01_V27_B2 | | id = BS_C02_S01_V27_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता | ‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता सुखी दुःखी शरीरेन्द्रियस्थः’() इति भाल्लवेयश्रुतिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 867: | Line 745: | ||
| id = BS_C02_S01_V27_B4 | | id = BS_C02_S01_V27_B4 | ||
| text = | | text = | ||
न चोपाधिकृतोंऽशः | न चोपाधिकृतोंऽशः । अंश उपहित इति द्वित्वापेक्षत्वात् न चान्यत् कल्प्यम् ।‘यद्धि युक्त्या विरुद्ध्येत तदीशकृतमेव हि’()। इति गत्यन्तरोक्तेः ॥ 27 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 877: | Line 755: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (163)ओं श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ओम् ॥ 02-01-28 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 885: | Line 763: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B1 | | id = BS_C02_S01_V28_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न | न चेश्वरपक्षेऽयं विरोधः- | ||
}} | }} | ||
| Line 892: | Line 770: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B2 | | id = BS_C02_S01_V28_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो | ‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो मनुरमनुरवाग् वागिन्द्रोऽनिन्द्रः प्रवृत्तिरप्रवृत्तिः स परः परमात्मा’() इति पैङ्ग्यादिश्रुतेरेव । | ||
}} | }} | ||
| Line 899: | Line 777: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B4 | | id = BS_C02_S01_V28_B4 | ||
| text = | | text = | ||
शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः | शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः- | ||
}} | }} | ||
| Line 906: | Line 784: | ||
| id = BS_C02_S01_V28_B5 | | id = BS_C02_S01_V28_B5 | ||
| text = | | text = | ||
‘यद्वाक्योक्तं न | ‘यद्वाक्योक्तं न तद्युक्तिः विरोद्धुं शक्नुयात् क्वचित् । विरोधे वाक्ययोः क्वापि किञ्चित् साहाय्यकारणम्’()॥इति पुरुषोत्तमतन्त्रे ॥ 28 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 915: | Line 792: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (164)ओम् आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ओम् ॥ 02-01-29 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 923: | Line 800: | ||
| id = BS_C02_S01_V29_B1 | | id = BS_C02_S01_V29_B1 | ||
| text = | | text = | ||
परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति | परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति । नान्येषाम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 930: | Line 807: | ||
| id = BS_C02_S01_V29_B2 | | id = BS_C02_S01_V29_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणो न चान्येषां शक्तयस्तादृशाः स्युः ।एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान् देवानेक एवानुविष्टः’॥इति श्वेताश्वतरश्रुतिः ॥ 29 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 938: | Line 815: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (165)ओं स्वपक्षदोषाच्च ओम् ॥ 02-01-30 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 946: | Line 823: | ||
| id = BS_C02_S01_V30_B1 | | id = BS_C02_S01_V30_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘ये दोषा इतरत्रापि ते गुणाः परमे मताः ।न दोषः परमे कश्चिद् गुणा एव निरन्तराः’()इति वचनाज्जीवपक्ष एव दोषो न परपक्षे । | |||
इति वचनाज्जीवपक्ष एव दोषो न परपक्षे । | |||
}} | }} | ||
| Line 963: | Line 838: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (166)ओं सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ओम् ॥ 02-01-31 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 971: | Line 846: | ||
| id = BS_C02_S01_V31_B1 | | id = BS_C02_S01_V31_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वैर्युक्ता शक्तिभिर्देवता सा परेति यां प्राहुरजस्रशक्तिम् ।नित्यानन्दा नित्यरूपाऽजरा च या शाश्वताऽत्मेति च यां वदन्ति’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 978: | Line 853: | ||
| id = BS_C02_S01_V31_B4 | | id = BS_C02_S01_V31_B4 | ||
| text = | | text = | ||
अतो न केवलं विचित्रशक्तिः | अतो न केवलं विचित्रशक्तिः । किन्तु सर्वशक्तिरेव ॥ 31 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 986: | Line 861: | ||
| chapter_id = BS_C02 | | chapter_id = BS_C02 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (167)ओं विकरणत्वान्नेति चेत् तदुक्तम् ओम् ॥ 02-01-32 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 1,008: | Line 876: | ||
| id = BS_C02_S01_V32_B2 | | id = BS_C02_S01_V32_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘अपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रुणोत्यकर्णः।स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्’(श्वे.उ.३.१९)। | |||
}} | }} | ||
| Line 1,016: | Line 883: | ||
| id = BS_C02_S01_V32_B4 | | id = BS_C02_S01_V32_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते | ‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’(श्वे.उ.६.८)इत्यादि श्रतिभ्यः | ||
इत्यादि श्रतिभ्यः | |||
}} | }} | ||
| Line 1,025: | Line 890: | ||
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‘सर्वोपेता च’ इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥ | ‘सर्वोपेता च’(ब्र.सू.२.१.३१) इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥ | ||
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=== | === नप्रयोजनत्वाधिकरणम् === | ||
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यत् प्रयोजनार्थं सृष्ट्यादिस्तदूनत्वान्नपूर्णतेत्यत आह – | |||
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‘अथैष एव परम आनन्दः’ इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु | ‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु ? | ||
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यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य । | यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला, न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य । | ||
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‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव | ‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव प्रयोजनमपेक्ष्य तु ।कुरुते केवलानन्दाद् यथा मत्तस्य नर्तनम् ॥पूर्णानन्दस्य तस्येह प्रयोजनमतिः कुतः ।मुक्ता अप्याप्तकामाः स्युः किमु तस्याखिलात्मनः’() इति ॥ | ||
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‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’ इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥ | ‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’(मां.उ.२.१) इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (170)ओं वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति ओम् ॥ 02-01-35॥ | ||
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कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति श्रुतिः ॥ 35 ॥ | कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.३.७) इति हि श्रुतिः ॥ 35 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (171)ओं न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ओम् ॥ 02-01-36 ॥ | ||
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‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’ इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न | ‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’(कौ.३.८) इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न, तस्यापि पूर्वकर्म कारणमित्यनादित्वात् कर्मणः । | ||
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‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा | भविष्यत्पुराणे च – | ||
‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा ।अनादित्वात् कर्मणश्च न विरोधः कथञ्चन’() इति ॥ 36 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (172)ओम् उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ओं॥ 02-01-37 ॥ | ||
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‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च | ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’ ॥इत्यादिना कर्मादीनां सत्त्वस्यापि तदधीनत्वात् । न च पुनर्वैषम्याद्यापेतेन दोषः । तादृशवैषम्यादेरुपलभ्यमानत्वात्- | ||
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‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि | ‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि ।ईशो यत्रो गुणदोषादिसत्त्वे स्वयं परोऽनादिरादिः प्रजानाम्’() ॥इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 37 ॥ | ||
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=== | === सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम् === | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (173)ओं सर्वधर्मोपपत्तेश्च ओम् ॥ 02-01-38 ॥ | ||
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अवशिष्टैरुपसंहरति- | अवशिष्टैरुपसंहरति- | ||
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‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का | ‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ।’()इति सर्वगुणोपपत्तिश्रुतेश्च ॥ 38 ॥ | ||
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इति | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्य विरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 02-01 ॥ | ||
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[[Category:Brahmasutra]] | [[Category:Brahmasutra]] | ||
Revision as of 09:38, 10 April 2026
स्मृत्यधिकरणम्
(136)ओं स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ओं॥ 02-01-01 ॥
उक्तेऽर्थेऽविरोधं दर्शयति अनेनाध्यायेन । प्रथमपादे युक्त्यविरोधम् । प्रथमतः स्मृत्यविरोधं दर्शयति-
सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव स्यात् ? इति चेत्, न। अन्यस्मृतीनां विष्ण्वादिभिर्नितरां सर्वर्ज्ञैरेव कृतत्वात्; श्रुतेराधिक्यं च सिद्ध्यति॥ 01 ॥
(137)ओम् इतरेषां चानुपलब्धेः ओम् ॥ 02-01-02 ॥
इतरेषां च तासु स्मृतिषूक्तानां फलानां, प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेः अप्रमाण्यं तासां युक्तम् । ‘च’शब्देन भागोपलब्धिरङ्गीकृता ॥ 02 ॥
(138)ओम् एतेन योगः प्रत्युक्तः ओम् ॥ 02-01-03 ॥
योगफलं प्रत्यक्षोपलभ्यम् इति न मन्तव्यम् । उक्ताभ्यासे तत्काल एव फलादृष्टेः ॥ 03 ॥
नविलक्षणत्वाधिकरणं
(139)ओं न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ओम् ॥ 02-01-04 ॥
नैवं श्रुतेः तदनुसारिस्मृतेश्च तदुक्तानुपलब्धेः अप्रामाण्यम् । विलक्षणत्वात्, नित्यत्वात्, तदनुसारित्वाच्च ।
न हि नित्ये दोषाः कल्प्याः ।
स्वतश्च प्रमाण्यम् । अन्यथाऽनवस्थितेः ।
‘न चक्षुर्न श्रोत्रं न तर्को न स्मृतिर्वेदा ह्येवैनं वेदयन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च ।
नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.सं.८.६४.६) इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’(म.भा.१२.२३८.९३) इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥
(140)ओं दृश्यते तु ओम् ॥ 02-01-05 ॥
अधिकारिणां फलम् ।
‘ऋग्यजुः सामाथर्वाश्च मूलरामायणं तथा।भारतं पञ्चरात्रं च वेदा इत्येव शब्दिताः ॥पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः ।स्वतः प्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चिद् विचार्यते ॥यत् तेषूक्तं न दृश्येत पूर्वकर्मात्र कारणम् ।नाप्रामाण्यं भवेदेषां दृश्यते ह्यधिकारतः॥इतः प्रामाण्यमन्येषां न स्वतस्तु कथञ्चन ।अदृश्योक्तौ ततस्तेषामप्रमाण्यं न संशयः’ इति ॥ 05 ॥
अभिमान्यधिकरणम्
(141)ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम् ॥ 02-01-06 ॥
‘मृदब्रवीत्’(श.ब्रा.६.१.३),‘आपोऽब्रुवन्’(श.ब्रा.६.१.३), इत्यादिवचनाद् युक्तिविरुद्धो वेद इति । अतोऽब्रवीत्-
मृदाद्यभिमानिदेवता तत्र व्यपदिश्यते । तासां चेतरेभ्यो विशिष्टं सामर्थ्यमनुगतिश्च सर्वत्र । अतस्तासां सर्वमुक्तं युज्यते ॥ 06 ॥
(142)ओं दृश्यते च ओम् ॥ 02-01-07 ॥
तासां सामर्थ्यं महद्भिः ।
‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः प्रथितौजसः।अचिन्त्याः शक्तयस्तासां दृश्यन्ते मुनिभिश्च ताः ।ताश्च सर्वगता नित्यं वासुदेवैकसंश्रयाः’ इति ॥ 07 ॥
असदधिकरणम्
(143)ओम् असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ओम् ॥ 02-01-08 ॥
‘असदेवेदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)‘असतः सदजायत’(ऋ.सं.१०.७२.३) इत्यादिनाऽसतः कारणत्वोक्तेर्विरोध इत्यतो वक्ति-
प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते ।
सर्वशब्दानां ब्रह्मणि समन्वयेऽपि ‘तदधीनत्वाद् अर्थवत्’(ब्र.सू.१.४.३) इत्यादिनाऽमुख्यत्वेनान्यस्यापि वाच्यत्वेन अङ्गीकाराद् असतः प्राप्तिः।
तथा श्रुतिप्राप्तमेवासन्मतमत्र निषिध्यते । समयस्योपरि निषेधात् । अर्थाद् युक्तिविरोधोऽपि निराक्रियते ॥ 08 ॥
(144)ओम् अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ओम् ॥ 02-01-09 ॥
असत उत्पत्तौ प्रलयेऽपि सर्वासत्त्वमेव स्यात् ॥ 09 ॥
(145)ओं न तु दृष्टान्तभावात् ओम् ॥ 02-01-10 ॥
प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते।
सत उत्पत्तिः सशेषविनाशश्च हि लोके दृष्टः॥10 ॥
(146)ओं स्वपक्षदोषाच्च ओम् ॥ 02-01-11 ॥
दृष्टान्ताभावादेव ॥ 11 ॥
(147)ओं तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथाऽनुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः ओं॥ 02-01-12 ॥
एतावानेव तर्क इति प्रतिष्ठापकप्रमाणाभावाद् उक्तादन्यथाऽप्यनुमेयमिति चेत्,
न । एवं सति प्रमाणसिद्धेऽपि मोक्षेऽन्यथाऽनुमेयत्वादनिर्मोक्षप्रसङ्गः ।
अतो यावत्प्रमाणसिद्धं तावदेवाङ्गीकर्तव्यम् । नातोऽन्यच्छङ्क्यम् ।
‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥
(148)ओम् एतेन शिष्टा अपरिग्रहा अपि व्याख्याताः ओम् ॥ 02-01-13 ॥
एतेन दृष्टान्तभावेनाभावेन चावशिष्टा अप्यपरिग्रहा विरुद्धसिद्धान्ता अकर्तृकत्वाचेतनकर्तृकत्वजीवकर्तृकत्वादयोऽपि ।
‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’,‘प्रधानादिदमुत्पन्नं प्रधानमधितिष्ठति ।प्रधाने लयमभ्येति न ह्यन्यत् कारणं मतम्’॥‘जीवाद्भवन्ति भूतानि जीवे तिष्ठन्त्यचञ्चलाः ।जीवे तु लयमृच्छन्ति न जीवात् कारणं परम्’ ॥इत्यादिश्रुतिप्राप्ता निराकृताः ।
यथा दुःखादिषु जीवस्यास्वातन्त्र्यमेवमन्येष्वपीति दृष्टान्तः । श्रुतिगतिस्तु ब्रह्मवाचकत्वेन प्रदर्शिता । यत्रान्यवाचकत्वेऽप्यविरोधस्तत्रान्यदप्यमुख्यतयोच्यते, यत्र विरोधस्तत्र ब्रह्मैवोच्यत इति नियमः ॥ 13 ॥
भोक्त्रधिकरणम्
(149)ओं भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ओम् ॥ 02-01-14 ॥
‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’(मुं.उ.३.२.७) इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव न हन्यस्यान्यत्वं युज्यत इति चेत्, न । स्याल्लोकवत् । यथा लोके उदके उदकान्तरस्यैकीभावव्यवहारेऽप्यन्तर्भेदोऽस्त्येव, एवं स्यादत्रापि । तथा च श्रुतिः-
‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’(क.उ.४.१५) इति ।
स्कान्दे च –
‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत् ।न चैतदेव भवति यतो वृद्धिः प्रदृश्यते ॥एवमेव हि जीवोऽपि तादात्म्यं परमात्मना ।प्राप्तोऽपि नासौ भवति स्वातन्त्र्यादिविशेषणात्’ इति ।‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।तद् यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलोहरे’ इति च ।
‘न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति’(ऋ.सं.७.९९.१),‘न ते विष्णो जायमानो न जातः’(ऋ.७.११.२)इत्यादि च फलत्वेऽपि युक्तिविरोधेऽन्तर्भावादत्रोक्तम् ॥ 14 ॥
आरम्भणाधिकरणम्
(150)ओं तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ओम् ॥ 02-01-15 ॥
स्वतन्त्रबहुसाधना सृष्टिर्लोके दृष्टा । नैवं ब्रह्मणः । स्वरूपसामर्थ्यादेव तस्य सृष्टिः ।
‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत् स्वित् कथाऽऽसीत्’(ऋ.सं.१०.८१.२) इति ह्याक्षेपः । अधिष्ठानाद्यनुक्तेः । आदिशब्दाद्युक्तिभिश्च ।
‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते ।साधनानां साधनत्वं यतः किं तस्य साधनैः’() इत्यादिभिः ॥ 15 ॥
(151)ओं भावे चोपलब्धेः ओम् ॥ 02-01-16 ॥
स्वतन्त्रसाधनभावे प्रमाणैरुपलभ्येत ।
‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न वस्त्वस्ति कुतश्चन । अतो वेदत्वमेतेषां यतस्ते सर्ववेदकाः’ इति स्कान्दे ॥ 16 ॥
(152)ओं सत्वाच्चावरस्य ओम् ॥ 02-01-17 ॥
‘अद्भ्यः सम्भूतः पृथिव्यै रसाच्च’(तै.आ.३.१६) इत्यादिना साधनान्तरप्रतीतेः कथमनुपलब्धिरित्यत आह-
अवरस्य तदधीनस्य साधनस्य सत्त्वात् ।
‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् तद् यदासीत् तदावृतमासीत् तदधीनमासीदथ ह्येक एव परम आसीद् यस्यैतदासीन्न ह्येतदासीत्’() इति हि काषायणश्रुतिः ॥ 17 ॥
(153)ओम् असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ओम् ॥ 02-01-18॥
‘नासदासीन्नो सदासीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.१) इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति चेत्, न । अव्यक्तत्वपारतन्त्र्यादिधर्मान्तरेण हि तदुच्यते ।‘तम आसीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.३) इति वाक्यशेषात् । न चान्यत्र प्रमाणमस्ति ।
‘अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’(महा.ना.उ.१०.५)।
‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति ।न चान्यथा क्वाऽपि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथा भविष्यत्’(),‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’(भ.गी.१६.८),‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञाः शक्तिं हरेर्ये न विदुःपरां हि’।
‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा’(),‘अथ हैनमाहुः सत्यकर्मेति सत्यं ह्येवेदं विश्वमसौ सृजते। अथैनमार्हुनित्यकर्मेति नित्यं ह्येवासौ कुरुते’()।
‘यच्चिकेत सत्यमित्तन्न मोघम्’(ऋ.सं.१०.५५.६) इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ।
‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र युक्तता।तथैवार्थः परिज्ञेयो नावाक्या युक्तिरिष्यते’()॥इति बृहत्संहितायाम् ।
‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः ।तत्र दृष्टानुसारेण तेषामर्थोऽन्ववेक्ष्यते’ ॥ इति च ।
‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि ।इत्यादिवद् विरुद्धानि वचनान्यथ युक्तयः ।प्रमाणैर्बहुभिर्ज्ञेया आभासा इति वैदिकैः ॥वेदवेदानुसारेषु विरोधेऽन्यार्थकल्पना ।अन्येषां तु विरुद्धानां विप्रलम्भोऽथवा भ्रमः’॥ इति भागवततन्त्रे ।
‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम् ।मध्यमं त्वागमो ज्ञेयः प्रत्यक्षमधमं स्मृतम् ॥प्रत्यक्षयोरागमयोर्विरोधे निश्चयाय तु ।अनुमाद्या न स्वतन्त्राः प्रमाणपदवीं ययुः’इति पुरुषोत्तमतन्त्रे॥ 18 ॥
(154)ओं युक्तेः शब्दान्तराच्च ओम् ॥ 02-01-19 ॥
‘साधनानां साधनत्वं यदाऽऽत्माधीनमिष्यते ।तदा साधनसम्पत्तिरैश्वर्यद्योतिका भवेत्’(),इत्यादेः साधनान्तरेण सृष्टिर्युक्ता ।
‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’(महा.ना.उ.१.१२) इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥
(155)ओं पटवच्च ओम् ॥ 02-01-20॥
साधनान्तरेण हि पटादिसृष्टिर्दृष्टा ॥ 20 ॥
(156)ओं यथा प्राणादिः ओम् ॥ 02-01-21॥
तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव । यथा शरीरेन्द्रियादिः।
‘प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्य पुरुषोत्तमः ।क्षोभयामास भगवान् सृष्ट्यर्थं जगतो विभुः’ इति कौर्मे ॥ 21 ॥
इतरव्यपदेशाधिकरणम्
(157)ओम् इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ओम् ॥ 02-01-22॥
जीवकर्तृपक्षः श्रुतिप्राप्तो विस्तरान्निराक्रियते-
जीवकर्तृत्वपक्षे हिताकरणमहितकरणं च न स्यात् ॥ 22 ॥
(158)ओम् अधिकं तु भेदनिर्देशात् ओम् ॥ 02-01-23 ॥
न च ब्रह्मणः श्रमचिन्तादिदोषप्राप्तिः ।अधिकशक्तित्वात् ।
‘श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टाऽघोष्टा विज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः’(ऐ.आ.३.२.४),‘एष त आत्मा सर्वान्तरः’(बृ.उ.५.५.२),‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’(बृ.उ.५.५.१), इत्यादिविशेषनिर्देशात् ॥ 23 ॥
(159)ओम् अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ओम् ॥ 02-01-24 ॥
चेतनत्वेऽप्यश्मादिवदस्वतन्त्रत्वात् स्वतः कर्तृत्वानुपपत्तिर्जीवस्य।
‘यथा धारुमयीं योषां नरः स्थिरसमाहितः।इङ्गयत्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः’ इति भारते ॥ 24 ॥
(160)ओम् उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ओम् ॥ 02-01-25 ॥
जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति चेत्, न । यथा क्षीरं गोषु दृश्यमानमपि प्राणादेव जायते-
‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’() इति वचनात्, एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव ।
‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(),‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’() इत्यादेः ॥ 25 ॥
(161)ओं देवादिवदपि लोके ओम् ॥ 02-01-26 ॥
न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । देवादिवद् अदृश्यत्वशक्तियोगात् । लोकेऽपि पिशाचादीनां तादृशी शक्तिर्दृष्टा किम्वीश्वरस्य ।
‘न युक्तियोगाद् वाक्यानि निराकार्याण्यपि क्वचित् ।विरोध एव वाक्यानां युक्तयो न तु युक्तयः’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 26 ॥
(162)ओं कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ओम् ॥ 02-01-27 ॥
अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च तद्युज्यते । सामर्थ्यैकदेशदर्शनात् । न चैकदेशेन निरवयवत्वात् ।
‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता सुखी दुःखी शरीरेन्द्रियस्थः’() इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
न चोपाधिकृतोंऽशः । अंश उपहित इति द्वित्वापेक्षत्वात् न चान्यत् कल्प्यम् ।‘यद्धि युक्त्या विरुद्ध्येत तदीशकृतमेव हि’()। इति गत्यन्तरोक्तेः ॥ 27 ॥
शब्दमूलत्वाधिकरणं
(163)ओं श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ओम् ॥ 02-01-28 ॥
न चेश्वरपक्षेऽयं विरोधः-
‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो मनुरमनुरवाग् वागिन्द्रोऽनिन्द्रः प्रवृत्तिरप्रवृत्तिः स परः परमात्मा’() इति पैङ्ग्यादिश्रुतेरेव ।
शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः-
‘यद्वाक्योक्तं न तद्युक्तिः विरोद्धुं शक्नुयात् क्वचित् । विरोधे वाक्ययोः क्वापि किञ्चित् साहाय्यकारणम्’()॥इति पुरुषोत्तमतन्त्रे ॥ 28 ॥
(164)ओम् आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ओम् ॥ 02-01-29 ॥
परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति । नान्येषाम् ।
‘विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणो न चान्येषां शक्तयस्तादृशाः स्युः ।एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान् देवानेक एवानुविष्टः’॥इति श्वेताश्वतरश्रुतिः ॥ 29 ॥
(165)ओं स्वपक्षदोषाच्च ओम् ॥ 02-01-30 ॥
‘ये दोषा इतरत्रापि ते गुणाः परमे मताः ।न दोषः परमे कश्चिद् गुणा एव निरन्तराः’()इति वचनाज्जीवपक्ष एव दोषो न परपक्षे ।
‘अथ यः सदोषः साञ्जनः सजनिः स जीवोऽथ यः स निर्दोषो निष्कलः सगुणः परः परमात्मा’इति काषायणश्रुतिः ॥ 30 ॥
(166)ओं सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ओम् ॥ 02-01-31 ॥
‘सर्वैर्युक्ता शक्तिभिर्देवता सा परेति यां प्राहुरजस्रशक्तिम् ।नित्यानन्दा नित्यरूपाऽजरा च या शाश्वताऽत्मेति च यां वदन्ति’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥
अतो न केवलं विचित्रशक्तिः । किन्तु सर्वशक्तिरेव ॥ 31 ॥
(167)ओं विकरणत्वान्नेति चेत् तदुक्तम् ओम् ॥ 02-01-32 ॥
न च करणाभावादनुपपत्तिरिति युक्तम् ।
‘अपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रुणोत्यकर्णः।स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्’(श्वे.उ.३.१९)।
‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’(श्वे.उ.६.८)इत्यादि श्रतिभ्यः
‘सर्वोपेता च’(ब्र.सू.२.१.३१) इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥
नप्रयोजनत्वाधिकरणम्
(168)ओं न प्रयोजनवत्त्वात् ओम् ॥ 02-01-33 ॥
यत् प्रयोजनार्थं सृष्ट्यादिस्तदूनत्वान्नपूर्णतेत्यत आह –
‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु ?
(169)ओं लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ओम् ॥ 02-01-34 ॥
यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला, न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य ।
‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव प्रयोजनमपेक्ष्य तु ।कुरुते केवलानन्दाद् यथा मत्तस्य नर्तनम् ॥पूर्णानन्दस्य तस्येह प्रयोजनमतिः कुतः ।मुक्ता अप्याप्तकामाः स्युः किमु तस्याखिलात्मनः’() इति ॥
‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’(मां.उ.२.१) इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥
वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम्
(170)ओं वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति ओम् ॥ 02-01-35॥
सर्वकर्तृत्वे वैषम्यनैर्घृण्ये तस्येत्यतो वक्ति-
कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.३.७) इति हि श्रुतिः ॥ 35 ॥
(171)ओं न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ओम् ॥ 02-01-36 ॥
यदपेक्षयाऽसौ फलं ददाति न तत् कर्म ।
‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’(कौ.३.८) इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न, तस्यापि पूर्वकर्म कारणमित्यनादित्वात् कर्मणः ।
भविष्यत्पुराणे च –
‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा ।अनादित्वात् कर्मणश्च न विरोधः कथञ्चन’() इति ॥ 36 ॥
(172)ओम् उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ओं॥ 02-01-37 ॥
न च कर्मापेक्षत्वेनेश्वरस्यास्वातन्त्र्यम् ।
‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’ ॥इत्यादिना कर्मादीनां सत्त्वस्यापि तदधीनत्वात् । न च पुनर्वैषम्याद्यापेतेन दोषः । तादृशवैषम्यादेरुपलभ्यमानत्वात्-
‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि ।ईशो यत्रो गुणदोषादिसत्त्वे स्वयं परोऽनादिरादिः प्रजानाम्’() ॥इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 37 ॥
सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम्
(173)ओं सर्वधर्मोपपत्तेश्च ओम् ॥ 02-01-38 ॥
अवशिष्टैरुपसंहरति-
‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ।’()इति सर्वगुणोपपत्तिश्रुतेश्च ॥ 38 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्य विरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 02-01 ॥