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Brahmasutra/C2/S1: Difference between revisions

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__TOC__
<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
{{Adhyaya
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Line 10: Line 12:
| chapter_id    = BS_C02
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ॐ॥ 01-136
| verse_line1  = (136)ओं स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ओं॥ 02-01-01
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| commentary1  = brahmasutra
}}
}}


उक्तेऽर्थेऽविरोधं दर्शयत्यनेनाध्यायेन । प्रथमपादे युक्त्यविरोधम् । प्रथमतः स्मृत्यविरोधं दर्शयति-
उक्तेऽर्थेऽविरोधं दर्शयति अनेनाध्यायेन । प्रथमपादे युक्त्यविरोधम् । प्रथमतः स्मृत्यविरोधं दर्शयति-


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{{Bhashyam
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सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव स्यादिति चेन्न। अन्यस्मृतीनां विष्ण्वादिभिर्नितरां सर्वर्ज्ञैरेव कृतत्वाच्छृतेराधिक्यं सिद्ध्यति॥ 01 ॥
सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव स्यात् ? इति चेत्, न। अन्यस्मृतीनां विष्ण्वादिभिर्नितरां सर्वर्ज्ञैरेव कृतत्वात्; श्रुतेराधिक्यं च सिद्ध्यति॥ 01 ॥
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Line 28: Line 30:
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| verse_line1  = इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ 02-137
| verse_line1  = (137)ओम् इतरेषां चानुपलब्धेः ओम् ॥ 02-01-02
| commentary1  = brahmasutra
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Line 36: Line 38:
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इतरेषां तासु स्मृतिषूक्तानां फलादीनां प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेरप्रमाण्यं तासां युक्तम् । चशब्देन भागोपलब्धिरङ्गीकृता ॥ 02 ॥
इतरेषां तासु स्मृतिषूक्तानां फलानां, प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेः अप्रमाण्यं तासां युक्तम् । ‘च’शब्देन भागोपलब्धिरङ्गीकृता ॥ 02 ॥
}}
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Line 44: Line 46:
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| verse_line1  = एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ 03-138
| verse_line1  = (138)ओम् एतेन योगः प्रत्युक्तः ओम् 02-01-03 ॥
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॥ इति स्मृत्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
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| text    =
योगफलं प्रत्यक्षोपलभ्यमिति न मन्तव्यम् । उक्ताभ्यासे तत्काल एव फलादृष्टेः ॥ 03 ॥
योगफलं प्रत्यक्षोपलभ्यम् इति न मन्तव्यम् । उक्ताभ्यासे तत्काल एव फलादृष्टेः ॥ 03 ॥
}}
}}


Line 69: Line 64:
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| verse_line1  = न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ 04-139
| verse_line1  = (139)ओं न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ओम् 02-01-04 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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Line 77: Line 72:
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| text    =
| text    =
नैवं श्रुतेस्तदनुसारिस्मृतेश्च तदुक्तानुपलब्देरप्रामाण्यम् । विलक्षणत्वात् नित्यत्वात् तदनुसारित्वाच्च । न हि नित्ये दोषाः कल्प्याः । स्वतश्च प्रमाण्यम् । अन्यथाऽनवस्थितेः
नैवं श्रुतेः तदनुसारिस्मृतेश्च तदुक्तानुपलब्धेः अप्रामाण्यम् । विलक्षणत्वात्, नित्यत्वात्, तदनुसारित्वाच्च ।
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Line 84: Line 79:
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| text    =
| text    =
‘न चक्क्षुर्न श्रोत्रं तर्को न स्मृतिर्वेधा ह्येवैनं वेदयन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च
हि नित्ये दोषाः कल्प्याः ।
}}
 
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स्वतश्च प्रमाण्यम् । अन्यथाऽनवस्थितेः
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Line 91: Line 93:
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| text    =
| text    =
नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’ इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥
‘न चक्षुर्न श्रोत्रं न तर्को न स्मृतिर्वेदा ह्येवैनं वेदयन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च ।
}}
 
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| text    =
नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.सं.८.६४.६) इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’(म.भा.१२.२३८.९३) इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥
}}
}}


Line 99: Line 108:
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| verse_line1  = दृश्यते तु ॥ 05-140
| verse_line1  = (140)ओं दृश्यते तु ओम् 02-01-05 ॥
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॥ इति नविलक्षणत्वाधिकरणं ॥ 02 ॥
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Line 114: Line 116:
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अधिकारिणां फलम् । भविष्यत्पुराणे च
अधिकारिणां फलम् ।
}}
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Line 121: Line 123:
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| text    =
| text    =
‘ऋग्यजुः सामाथर्वाख्या मूलरामायणं तथा।
‘ऋग्यजुः सामाथर्वाश्च मूलरामायणं तथा।भारतं पञ्चरात्रं च वेदा इत्येव शब्दिताः ॥पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः ।स्वतः प्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चिद् विचार्यते ॥यत् तेषूक्तं न दृश्येत पूर्वकर्मात्र कारणम् ।नाप्रामाण्यं भवेदेषां दृश्यते ह्यधिकारतः॥इतः प्रामाण्यमन्येषां न स्वतस्तु कथञ्चन ।अदृश्योक्तौ ततस्तेषामप्रमाण्यं न संशयः’ इति ॥ 05 ॥
भारतं पञ्चरात्रं च वेदा इत्येव शब्दिताः
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः
स्वतः प्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चिद्विचार्यते ॥
}}
 
{{Bhashyam
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यत् तेषूक्तं न दृश्येत पूर्वकर्मात्र कारणम्
नाप्रामाण्यं भवेत् तेषां दृश्यते ह्यधिकारतः॥
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{{Bhashyam
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इतः प्रामाण्यमन्येषां न स्वतस्तु कथञ्चन
अदृश्योक्तौ ततस्तेषामप्रमाण्यं न संशयः’ इति ॥ 05 ॥
}}
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Line 156: Line 133:
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| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ 06-141
| verse_line1  = (141)ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम् 02-01-06 ॥
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Line 164: Line 141:
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| id      = BS_C02_S01_V06_summary
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| text    =
‘मृदब्रवीत्’’आपोऽब्रुवन्’ इत्यादिवचनाद्युक्तिविरुद्धो वेद इत्यतोऽब्रवीत् य-
‘मृदब्रवीत्’(श.ब्रा.६.१.३),‘आपोऽब्रुवन्’(श.ब्रा.६.१.३), इत्यादिवचनाद् युक्तिविरुद्धो वेद इति । अतोऽब्रवीत्-
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Line 179: Line 156:
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = दृश्यते च ॥ 07-142
| verse_line1  = (142)ओं दृश्यते च ओम् 02-01-07 ॥
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{{Bhashyam
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| text    =
॥ इति अभिमान्यधिकरणम् ॥ 03 ॥
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Line 194: Line 164:
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| text    =
तासां सामर्थ्यं महद्भिः । भविष्यत्पुराणे च –
तासां सामर्थ्यं महद्भिः ।
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Line 201: Line 171:
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‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः प्रथितौजसः।
‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः प्रथितौजसः।अचिन्त्याः शक्तयस्तासां दृश्यन्ते मुनिभिश्च ताः ।ताश्च सर्वगता नित्यं वासुदेवैकसंश्रयाः’ इति ॥ 07 ॥
अचिन्त्याः शक्तयस्तासां दृश्यन्ते मुनिभिश्च ताः
ताश्च सर्वगता नित्यं वासुदेवैकसंश्रयाः’ इति ॥ 07 ॥
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Line 213: Line 181:
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| verse_line1  = असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥ 08-143
| verse_line1  = (143)ओम् असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ओम् 02-01-08 ॥
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Line 221: Line 189:
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‘असदेवेदमग्र आसीत्’’असतः सदजायत’ इत्यादिनाऽसतः कारणत्वोक्तेर्विरोध इत्यतो वक्ति-
‘असदेवेदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)‘असतः सदजायत’(ऋ.सं.१०.७२.३) इत्यादिनाऽसतः कारणत्वोक्तेर्विरोध इत्यतो वक्ति-
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Line 228: Line 196:
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| text    =
| text    =
प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते । सर्वशब्दानां ब्रह्मणि समन्वयेऽपि’तदधीनत्वादर्थवत्’ इत्यादिनाऽमुख्यत्वेनान्यस्यापि वाच्यत्वेनाङ्गिकारादसतः प्राप्तिः।तथा श्रुतिप्राप्तमेवासन्मतमत्र निषिध्यते ।समयस्योपरि निषेधात् । अर्थाद्युक्तिविरोधोऽपि निराक्रियते ॥ 08 ॥
प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते ।
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{{Bhashyam
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सर्वशब्दानां ब्रह्मणि समन्वयेऽपि ‘तदधीनत्वाद् अर्थवत्’(ब्र.सू.१.४.३) इत्यादिनाऽमुख्यत्वेनान्यस्यापि वाच्यत्वेन अङ्गीकाराद् असतः प्राप्तिः।
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{{Bhashyam
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तथा श्रुतिप्राप्तमेवासन्मतमत्र निषिध्यते । समयस्योपरि निषेधात् । अर्थाद् युक्तिविरोधोऽपि निराक्रियते ॥ 08 ॥
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Line 236: Line 218:
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| verse_line1  = अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥ 09-144
| verse_line1  = (144)ओम् अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ओम् 02-01-09 ॥
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Line 252: Line 234:
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = न तु दृष्टान्तभावात् ॥ 10-145
| verse_line1  = (145)ओं न तु दृष्टान्तभावात् ओम् 02-01-10 ॥
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Line 260: Line 242:
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प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते। सत उत्पत्तिः, सशेषविनाशश्च हि लोके दृष्टः॥10 ॥
प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते।
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सत उत्पत्तिः सशेषविनाशश्च हि लोके दृष्टः॥10 ॥
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Line 268: Line 257:
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Line 284: Line 273:
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथाऽनुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः ॐ॥ 12-147
| verse_line1  = (147)ओं तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथाऽनुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः ओं॥ 02-01-12 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 292: Line 281:
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एतावानेव तर्क इति प्रतिष्ठापकप्रमाणाभावादुक्तादन्यथाऽप्यनुमेयमिति चेन्न, एवं सति प्रमाणसिद्धेऽपि मोक्षेऽन्यथाऽनुमेयत्वादनिर्मोक्ष प्रसङ्गः । अतो यावत्प्रमाणसिद्धं तावदेवाङ्गीकर्तव्यम् । नातोऽन्यच्छङ्क्यम् ।
एतावानेव तर्क इति प्रतिष्ठापकप्रमाणाभावाद् उक्तादन्यथाऽप्यनुमेयमिति चेत्,
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}}


Line 298: Line 287:
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न । एवं सति प्रमाणसिद्धेऽपि मोक्षेऽन्यथाऽनुमेयत्वादनिर्मोक्षप्रसङ्गः ।
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{{Bhashyam
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अतो यावत्प्रमाणसिद्धं तावदेवाङ्गीकर्तव्यम् । नातोऽन्यच्छङ्क्यम् ।
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{{Bhashyam
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| text    =
‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥
‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥
Line 307: Line 310:
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| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ 13-148
| verse_line1  = (148)ओम् एतेन शिष्टा अपरिग्रहा अपि व्याख्याताः ओम् 02-01-13 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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{{Bhashyam
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॥ इति असदधिकरणम् ॥ 04 ॥
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Line 329: Line 325:
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| text    =
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‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’
‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’,‘प्रधानादिदमुत्पन्नं प्रधानमधितिष्ठति ।प्रधाने लयमभ्येति न ह्यन्यत् कारणं मतम्’॥‘जीवाद्भवन्ति भूतानि जीवे तिष्ठन्त्यचञ्चलाः ।जीवे तु लयमृच्छन्ति न जीवात् कारणं परम्’ ॥इत्यादिश्रुतिप्राप्ता निराकृताः ।
}}
}}


Line 336: Line 332:
| id      = BS_C02_S01_V13_B3
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| text    =
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‘प्रधानादिदमुत्पन्नं प्रधानमधितिष्ठति
यथा दुःखादिषु जीवस्यास्वातन्त्र्यमेवमन्येष्वपीति दृष्टान्तः श्रुतिगतिस्तु ब्रह्मवाचकत्वेन प्रदर्शिता । यत्रान्यवाचकत्वेऽप्यविरोधस्तत्रान्यदप्यमुख्यतयोच्यते, यत्र विरोधस्तत्र ब्रह्मैवोच्यत इति नियमः ॥ 13 ॥
प्रधाने लयमभ्येति न ह्यन्यत् कारणं मतम्’॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== भोक्त्रधिकरणम् ===
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| text    =
‘जीवाद्भवन्ति भूतानि जीवे तिष्ठन्त्यचञ्चलाः ।
जीवे तु लयमृच्छन्ति न जीवात् कारणं परम्’
इत्यादिश्रुतिप्राप्ता निराकृताः । यथा दुःखादिषु जीवस्यास्वातन्त्र्यमेवमन्येष्वपीति दृष्टान्तः । श्रुतिगतिस्तु ब्रह्मवाचकत्वेन प्रदर्शिता । यत्रान्यवाचकत्वेऽप्यविरोधस्तत्रान्यदप्यमुख्यतयोच्यते, यत्र विरोधस्तत्र ब्रह्मैवोच्यत इति नियमः ॥ 13 ॥
}}
 
=== भोक्त्राधिकरणम् ===


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Line 356: Line 342:
| chapter_id    = BS_C02
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ॥ 14-149
| verse_line1  = (149)ओं भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ओम् 02-01-14 ॥
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{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S01_V14
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| text    =
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}}
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Line 371: Line 350:
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‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’ इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव न हन्यस्यान्यत्वं युज्यत इति चेन्न । स्याल्लोकवत् । यथा लोके उदके उदकान्तरस्यैकीभावव्यवहारेऽप्यन्तर्भेदोऽस्त्येव, एवं स्यादत्रापि । तथा च श्रुतिः
‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’(मुं.उ.३.२.७) इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव न हन्यस्यान्यत्वं युज्यत इति चेत्, न । स्याल्लोकवत् । यथा लोके उदके उदकान्तरस्यैकीभावव्यवहारेऽप्यन्तर्भेदोऽस्त्येव, एवं स्यादत्रापि । तथा च श्रुतिः-
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‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’ इति  ।
‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’(क.उ.४.१५) इति  ।
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स्कान्दे च –
स्कान्दे च –
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‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत्
‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत् ।न चैतदेव भवति यतो वृद्धिः प्रदृश्यते ॥एवमेव हि जीवोऽपि तादात्म्यं परमात्मना ।प्राप्तोऽपि नासौ भवति स्वातन्त्र्यादिविशेषणात्’ इति ।‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।तद् यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलोहरे’ इति च ।
चैतदेव भवति यतो वृद्धिः प्रदृश्यते
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एवमेव हि जीवोऽपि तादात्म्यं परमात्मना
प्राप्तोऽपि नासौ भवति स्वातन्त्र्यादिविशेषणात्’ इति
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‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते
तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलोहरे’ इति च ।
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‘न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति’’न ते विष्णो जायमानो न जातः’
‘न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति’(ऋ.सं.७.९९.१),‘न ते विष्णो जायमानो न जातः’(ऋ.७.११.२)इत्यादि च फलत्वेऽपि युक्तिविरोधेऽन्तर्भावादत्रोक्तम् ॥ 14 ॥
इत्यादि च फलत्वेऽपि युक्तिविरोधेऽन्तर्भावादत्रोक्तम् ॥ 14 ॥
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_line1  = तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ 15-150
| verse_line1  = (150)ओं तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ओम् 02-01-15 ॥
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स्वतन्त्र बहुसाधना सृष्टिर्लोके दृष्टा । नैवं ब्रह्मणः । स्वरूपसामर्थ्यादेव तस्य सृष्टिः ।
स्वतन्त्रबहुसाधना सृष्टिर्लोके दृष्टा । नैवं ब्रह्मणः । स्वरूपसामर्थ्यादेव तस्य सृष्टिः ।
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‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथाऽऽसीत्’ इति ह्याक्षेपः । अधिष्ठानाद्यनुक्तेः । आदिशब्दाद्युक्तिभिश्च ।
‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत् स्वित् कथाऽऽसीत्’(ऋ.सं.१०.८१.२) इति ह्याक्षेपः । अधिष्ठानाद्यनुक्तेः । आदिशब्दाद्युक्तिभिश्च ।
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‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते
‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते ।साधनानां साधनत्वं यतः किं तस्य साधनैः’() इत्यादिभिः ॥ 15 ॥
साधनानां साधनत्वं यतः किं तस्य साधनैः’ इत्यादिभिः ॥ 15 ॥
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| verse_line1  = (151)ओं भावे चोपलब्धेः ओम् 02-01-16 ॥
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स्वतन्त्रसाधनभावे प्रमाण्यैरुपलभ्येत
स्वतन्त्रसाधनभावे प्रमाणैरुपलभ्येत
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‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न वस्त्वस्तिकुतश्चन । अतो वेदत्वमेतेषां यतस्ते सर्ववेदकाः’ इति स्कान्दे ॥ 16 ॥
‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न वस्त्वस्ति कुतश्चन । अतो वेदत्वमेतेषां यतस्ते सर्ववेदकाः’ इति स्कान्दे ॥ 16 ॥
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| verse_line1  = सत्वाच्चावरस्य ॥ 17-152
| verse_line1  = (152)ओं सत्वाच्चावरस्य ओम् 02-01-17 ॥
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‘अद्भ्यः सम्भूतः पृथिव्यै रसाच्च’ इत्यादिना साधनान्तरप्रतीतेः कथमनुपलब्धिरित्यत आह
‘अद्भ्यः सम्भूतः पृथिव्यै रसाच्च’(तै.आ.३.१६) इत्यादिना साधनान्तरप्रतीतेः कथमनुपलब्धिरित्यत आह-
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Line 503: Line 463:
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‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् तद्यदासीत् तदावृतमासीत् ततधीनमासीदथ ह्येक एव परम आसीद्यस्यैतदासीन्न ह्येतदासीत्’ इति हि काषायणश्रुतिः ॥ 17 ॥
‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् तद् यदासीत् तदावृतमासीत् तदधीनमासीदथ ह्येक एव परम आसीद् यस्यैतदासीन्न ह्येतदासीत्’() इति हि काषायणश्रुतिः ॥ 17 ॥
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Line 511: Line 471:
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| verse_line1  = असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् 18-153॥
| verse_line1  = (153)ओम् असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ओम् 02-01-18॥
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Line 519: Line 479:
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‘नासदासीन्नो सदासीत्’ इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति चेन्न । अव्यक्तत्वपारतन्त्र्यादिधर्मान्तरेण हि तदुच्यते ।’तम आसीत्’ इति वाक्यशेषात् । न चान्यत्र प्रमाणमस्ति ।
‘नासदासीन्नो सदासीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.१) इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति चेत्, न । अव्यक्तत्वपारतन्त्र्यादिधर्मान्तरेण हि तदुच्यते ।‘तम आसीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.३) इति वाक्यशेषात् । न चान्यत्र प्रमाणमस्ति ।
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Line 526: Line 486:
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‘अजे ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’।
‘अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’(महा.ना.उ.१०.५)।
‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति
‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति ।न चान्यथा क्वाऽपि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथा भविष्यत्’(),‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’(भ.गी.१६.८),‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञाः शक्तिं हरेर्ये न विदुःपरां हि’।
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चान्यथा क्वाऽपि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथा भविष्यत्’॥
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‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा’।
‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा’(),‘अथ हैनमाहुः सत्यकर्मेति सत्यं ह्येवेदं विश्वमसौ सृजते। अथैनमार्हुनित्यकर्मेति नित्यं ह्येवासौ कुरुते’()।
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‘अथैनमाहुः सत्यकर्मेति, सत्यं ह्येवेदं विश्वमसौ सृजते। अथैनमार्हुनित्यकर्मेति नित्यं ह्येवासौ कुरुते’।
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Line 569: Line 501:
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‘यच्चिकेत सत्यमित् तन्न मोघम्’ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ।
‘यच्चिकेत सत्यमित्तन्न मोघम्’(ऋ.सं.१०.५५.६) इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ।
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Line 576: Line 508:
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‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र युक्तता।
‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र युक्तता।तथैवार्थः परिज्ञेयो नावाक्या युक्तिरिष्यते’()॥इति बृहत्संहितायाम् ।
तथैवार्थ परिज्ञेयो नावाक्या युक्तिरिष्यते’
इति बृहत्संहितायाम् ।
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}}


Line 585: Line 515:
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| text    =
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‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः
‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः ।तत्र दृष्टानुसारेण तेषामर्थोऽन्ववेक्ष्यते’ इति च ।
तत्र दृष्टानुसारेण तेषामर्थोऽन्ववेक्ष्यते’ इति च ।
}}
}}


Line 593: Line 522:
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| text    =
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‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि
‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि ।इत्यादिवद् विरुद्धानि वचनान्यथ युक्तयः ।प्रमाणैर्बहुभिर्ज्ञेया आभासा इति वैदिकैः ॥वेदवेदानुसारेषु विरोधेऽन्यार्थकल्पना ।अन्येषां तु विरुद्धानां विप्रलम्भोऽथवा भ्रमः’॥ इति भागवततन्त्रे ।
इत्यादिवद्विरुद्धानि वचनान्यथ युक्तयः
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वेदवेदानुसारेषु विरोधेऽन्यार्थकल्पना
अन्येषां तु विरुद्धानां विप्रलम्भोऽथवा भ्रमः’
इति भागवततन्त्रे ।
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Line 617: Line 529:
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‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम्
‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम् ।मध्यमं त्वागमो ज्ञेयः प्रत्यक्षमधमं स्मृतम् ॥प्रत्यक्षयोरागमयोर्विरोधे निश्चयाय तु ।अनुमाद्या न स्वतन्त्राः प्रमाणपदवीं ययुः’इति पुरुषोत्तमतन्त्रे॥ 18 ॥
मध्यमं त्वागमो ज्ञेयः प्रत्यक्षमधमं स्मृतम्
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प्रत्यक्षयोरागमयोर्विरोधे निश्चयाय तु ।अनुमाद्या न स्वतन्त्राः प्रमाणपदवीं ययुः’इति पुरुषोत्तमतन्त्रे॥ 18 ॥
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Line 633: Line 537:
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| verse_line1  = (154)ओं युक्तेः शब्दान्तराच्च ओम् 02-01-19 ॥
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Line 641: Line 545:
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‘साधनानां साधनत्वं यदात्माधीनमिष्यते ।
‘साधनानां साधनत्वं यदाऽऽत्माधीनमिष्यते ।तदा साधनसम्पत्तिरैश्वर्यद्योतिका भवेत्’(),इत्यादेः साधनान्तरेण सृष्टिर्युक्ता ।
तदा साधनसम्पत्तिरैश्वर्यद्योतिका भवेत्’
इत्यादेः साधनान्तरेण सृष्टिर्युक्ता ।
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Line 650: Line 552:
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‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’ इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥
‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’(महा.ना.उ.१.१२) इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥
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Line 658: Line 560:
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = पटवच्च 20-155 ॥
| verse_line1  = (155)ओं पटवच्च ओम् 02-01-20॥
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Line 674: Line 576:
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| verse_line1  = यथा प्राणादिः 21-156 ॥
| verse_line1  = (156)ओं यथा प्राणादिः ओम् 02-01-21॥
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तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव यथा शरीरेन्द्रियादिः।
तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव यथा शरीरेन्द्रियादिः।
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Line 706: Line 601:
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| verse_line1  = इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः 22-157 ॥
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Line 714: Line 609:
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जीवकर्तृत्वपक्षः श्रुतिप्राप्तो विस्तरान्निराक्रियते
जीवकर्तृपक्षः श्रुतिप्राप्तो विस्तरान्निराक्रियते-
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Line 729: Line 624:
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| verse_line1  = अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ 23-158
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Line 737: Line 632:
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न च ब्रह्मणः श्रमचिन्तादिधोषप्राप्तिः ।अधिकशक्तित्वात् ।
न च ब्रह्मणः श्रमचिन्तादिदोषप्राप्तिः ।अधिकशक्तित्वात् ।
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}}


Line 744: Line 639:
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‘श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टाघोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः’
‘श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टाऽघोष्टा विज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः’(ऐ.आ.३.२.४),‘एष त आत्मा सर्वान्तरः’(बृ.उ.५.५.२),‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’(बृ.उ.५.५.१), इत्यादिविशेषनिर्देशात् ॥ 23 ॥
‘एष त आत्मा सर्वान्तरः’
‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’
इत्यादिविशेषनिर्देशात् ॥ 23 ॥
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Line 778: Line 670:
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| verse_line1  = (160)ओम् उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ओम् 02-01-25 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति चेन्न । यथा गोषु क्षीरं दृश्यमानमपि प्राणादेव जायते ,
जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति चेत्, न । यथा क्षीरं गोषु दृश्यमानमपि प्राणादेव जायते-
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Line 793: Line 685:
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‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’ इति वचनात्
‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’() इति वचनात्, एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव ।
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एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव ।
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Line 807: Line 692:
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‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ ‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्तायस्तु सदा प्रभुः’ इत्यादेः ॥ 25 ॥
‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(),‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’() इत्यादेः ॥ 25 ॥
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Line 815: Line 700:
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = देवादिवदपि लोके ॥ 26-161
| verse_line1  = (161)ओं देवादिवदपि लोके ओम् 02-01-26 ॥
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न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । देवादिवददृश्यत्वशक्तियोगात् । लोकेऽपि पिशाचादीनां तादृशी शक्तिर्दृष्टा किम्वीश्वरस्य ।
न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । देवादिवद् अदृश्यत्वशक्तियोगात् । लोकेऽपि पिशाचादीनां तादृशी शक्तिर्दृष्टा किम्वीश्वरस्य ।
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‘न युक्तियोगाद्वाक्यानि निराकार्याण्यपि क्वचित् ।विरोध एव वाक्यानां युक्तयो न तु युक्तयः’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 26 ॥
‘न युक्तियोगाद् वाक्यानि निराकार्याण्यपि क्वचित् ।विरोध एव वाक्यानां युक्तयो न तु युक्तयः’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 26 ॥
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_line1  = कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ 27-162
| verse_line1  = (162)ओं कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ओम् 02-01-27 ॥
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॥इति इतरव्यपदेशाधिकरणम् ॥ 07 ॥
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अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च तद्युच्यते, सामर्थैकदेशदर्शनात् । न चैकदेशेन, निरवयवत्वात् ।
अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च तद्युज्यते । सामर्थ्यैकदेशदर्शनात् । न चैकदेशेन निरवयवत्वात् ।
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Line 860: Line 738:
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‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता सुखी दुःखी शरीरेन्द्रियस्थः’ इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता सुखी दुःखी शरीरेन्द्रियस्थः’() इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
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Line 867: Line 745:
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न चोपाधिकृतोंऽशः स एवांश उपहित इति, द्वित्वापेक्षत्वात् न चान्यत् कल्प्यम् ।‘यद्धि युक्त्या विरुध्येत तदीशकृतमेव हि’ इति गत्यन्तरोक्तेः ॥ 27 ॥
न चोपाधिकृतोंऽशः । अंश उपहित इति द्वित्वापेक्षत्वात् न चान्यत् कल्प्यम् ।‘यद्धि युक्त्या विरुद्ध्येत तदीशकृतमेव हि’()। इति गत्यन्तरोक्तेः ॥ 27 ॥
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Line 877: Line 755:
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| verse_line1  = ॐ श्रुतेस्तुशब्दमूलत्वात् ॐ ॥ 28-163
| verse_line1  = (163)ओं श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ओम् 02-01-28 ॥
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चेश्वरपक्षेयं विरोधः
चेश्वरपक्षेऽयं विरोधः-
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‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो मनुरमनुरवाग्वागिन्द्रोऽनिन्द्रः प्रवृत्तिरप्रवृत्तिः स परः परमात्मा’ इति पैङ्ग्यादिश्रुतेरेव ।
‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो मनुरमनुरवाग् वागिन्द्रोऽनिन्द्रः प्रवृत्तिरप्रवृत्तिः स परः परमात्मा’() इति पैङ्ग्यादिश्रुतेरेव ।
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Line 899: Line 777:
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शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः
शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः-
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Line 906: Line 784:
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‘यद्वाक्योक्तं न तद्युक्तिर्विरोद्धुं शक्नुयात् क्वचित् । विरोधे वाक्ययोः क्वापि किञ्चित् साहाय्यकारणम्’
‘यद्वाक्योक्तं न तद्युक्तिः विरोद्धुं शक्नुयात् क्वचित् । विरोधे वाक्ययोः क्वापि किञ्चित् साहाय्यकारणम्’()॥इति पुरुषोत्तमतन्त्रे ॥ 28 ॥
इति पुरुषोत्तमतन्त्रे ॥ 28 ॥
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Line 915: Line 792:
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| verse_line1  = आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॥ 29-164
| verse_line1  = (164)ओम् आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ओम् 02-01-29 ॥
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Line 923: Line 800:
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परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति, नान्येषाम् ।
परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति नान्येषाम् ।
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Line 930: Line 807:
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‘ शक्तिः पुरुषः पुराणो न चान्येषां शक्तयस्तादृशाः स्युः ।एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान् देवानेक एवानुविष्टः’॥इति श्वेताश्वतरश्रुतिः ॥ 29 ॥
‘विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणो न चान्येषां शक्तयस्तादृशाः स्युः ।एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान् देवानेक एवानुविष्टः’॥इति श्वेताश्वतरश्रुतिः ॥ 29 ॥
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Line 938: Line 815:
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स्वपक्षदोषाच्च ॥ 30-165
| verse_line1  = (165)ओं स्वपक्षदोषाच्च ओम् 02-01-30 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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Line 946: Line 823:
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ये दोषा इतरत्रापि ते गुणाः परमे मताः
‘ये दोषा इतरत्रापि ते गुणाः परमे मताः ।न दोषः परमे कश्चिद् गुणा एव निरन्तराः’()इति वचनाज्जीवपक्ष एव दोषो न परपक्षे ।
दोषः परमे कश्चिद्गुणा एव निरन्तराः’
इति वचनाज्जीवपक्ष एव दोषो न परपक्षे ।
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Line 963: Line 838:
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_line1  = सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥ 31-166
| verse_line1  = (166)ओं सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ओम् 02-01-31 ॥
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}}
Line 971: Line 846:
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‘सर्वैर्युक्ताशक्तिभिर्देवता सा परेति यां प्राहुरजस्रशक्तिम् ।नित्यानन्दा नित्यरूपाऽजरा च या शाश्वताऽत्मेति च यां वदन्ति’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥
‘सर्वैर्युक्ता शक्तिभिर्देवता सा परेति यां प्राहुरजस्रशक्तिम् ।नित्यानन्दा नित्यरूपाऽजरा च या शाश्वताऽत्मेति च यां वदन्ति’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥
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}}


Line 978: Line 853:
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अतो न केवलं विचित्रशक्तिः, किन्तु सर्वशक्तिरेव ॥ 31 ॥
अतो न केवलं विचित्रशक्तिः किन्तु सर्वशक्तिरेव ॥ 31 ॥
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Line 986: Line 861:
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_type    = sutra
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| verse_line1  = (167)ओं विकरणत्वान्नेति चेत् तदुक्तम् ओम् 02-01-32 ॥
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॥ इति शब्दमूलत्वाधिकरणम् ॥ 08 ॥
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Line 1,008: Line 876:
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‘आपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रुणोत्यकर्णः।
‘अपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रुणोत्यकर्णः।स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्’(श्वे.उ.३.१९)।
वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्तातमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्’।
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}}


Line 1,016: Line 883:
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| text    =
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‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते
‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’(श्वे.उ.६.८)इत्यादि श्रतिभ्यः
पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’
इत्यादि श्रतिभ्यः
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}}


Line 1,025: Line 890:
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| text    =
| text    =
‘सर्वोपेता च’ इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥
‘सर्वोपेता च’(ब्र.सू.२.१.३१) इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥
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=== नप्रयोजनाधिकरणम् ===
=== नप्रयोजनत्वाधिकरणम् ===


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Line 1,035: Line 900:
| chapter_id    = BS_C02
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| verse_line1  = न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ 33-168
| verse_line1  = (168)ओं न प्रयोजनवत्त्वात् ओम् 02-01-33 ॥
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Line 1,043: Line 908:
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यत्प्रयोजनार्थं सृष्ट्यादिस्तदूनत्वादपूर्णतेत्यत आह –
यत् प्रयोजनार्थं सृष्ट्यादिस्तदूनत्वान्नपूर्णतेत्यत आह –
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Line 1,050: Line 915:
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‘अथैष एव परम आनन्दः’ इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु
‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु ?
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Line 1,058: Line 923:
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| verse_line1  = ॐ लोकवत्तुलीलाकैवल्यम् ॐ ॥ 34-169
| verse_line1  = (169)ओं लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ओम् 02-01-34 ॥
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॥ इति नप्रयोजनाधिकरणम् ॥ 09 ॥
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Line 1,073: Line 931:
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यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य । नारायणसंहितायां च-
यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला, न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य ।
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}}


Line 1,080: Line 938:
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| text    =
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‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव प्रयोजनपेक्ष्य तु
‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव प्रयोजनमपेक्ष्य तु ।कुरुते केवलानन्दाद् यथा मत्तस्य नर्तनम् ॥पूर्णानन्दस्य तस्येह प्रयोजनमतिः कुतः ।मुक्ता अप्याप्तकामाः स्युः किमु तस्याखिलात्मनः’() इति ॥
कुरुते केवलानन्दाद्यथा मत्तस्य नर्तनम्
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{{Bhashyam
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पूर्णानन्दस्य तस्येह प्रयोजनमतिः कुतः
मुक्ता अप्याप्तकामाः स्युः किमु तस्याखिलात्मनः’ इति ॥
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}}


Line 1,096: Line 945:
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‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’ इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥
‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’(मां.उ.२.१) इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥
}}
}}


Line 1,106: Line 955:
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति 35-170॥
| verse_line1  = (170)ओं वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति ओम् 02-01-35॥
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| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 1,121: Line 970:
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कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति श्रुतिः ॥ 35 ॥
कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.३.७) इति हि श्रुतिः ॥ 35 ॥
}}
}}


Line 1,129: Line 978:
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| chapter_id    = BS_C02
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ 36-171
| verse_line1  = (171)ओं न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ओम् 02-01-36 ॥
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| commentary1  = brahmasutra
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}}
Line 1,144: Line 993:
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‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’ इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न तस्यापि पूर्वकर्म कारणमित्यनादित्वात् कर्मणः ।
‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’(कौ.३.८) इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न, तस्यापि पूर्वकर्म कारणमित्यनादित्वात् कर्मणः ।
भविष्यत्पुराणे च –
}}
}}


Line 1,152: Line 1,000:
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‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा
भविष्यत्पुराणे च –
अनादित्वात् कर्मणश्च न विरोधः कथञ्चन’ इति ॥ 36 ॥
‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा ।अनादित्वात् कर्मणश्च न विरोधः कथञ्चन’() इति ॥ 36 ॥
}}
}}


Line 1,161: Line 1,009:
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॐ॥ 37-172
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| commentary1  = brahmasutra
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॥ इति वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम् ॥ 10 ॥
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Line 1,183: Line 1,024:
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‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च
‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’ ॥इत्यादिना कर्मादीनां सत्त्वस्यापि तदधीनत्वात् । न च पुनर्वैषम्याद्यापेतेन दोषः । तादृशवैषम्यादेरुपलभ्यमानत्वात्-
यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’
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इत्यादिना कर्मादीनां सत्त्वस्यापि तदधीनत्वात् । न च पुनर्वैषम्याध्यापेते न दोषः । तादृशवैषम्यादेरुपलभ्यमानत्वात्
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‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि
‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि ।ईशो यत्रो गुणदोषादिसत्त्वे स्वयं परोऽनादिरादिः प्रजानाम्’() ॥इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 37 ॥
ईशो यत्रो गुणदोषादिसत्त्वे स्वयं परोऽनादिरादिः प्रजानाम्’
इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 37 ॥
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=== सर्वधर्मोपपत्यधिकरणम् ===
=== सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम् ===


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‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का
‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ।’()इति सर्वगुणोपपत्तिश्रुतेश्च ॥ 38 ॥
चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ।’
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इति सर्वगुणोपपत्तिश्रुतेश्च 38
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्य विरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः 02-01
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Revision as of 09:38, 10 April 2026

स्मृत्यधिकरणम्

(136)ओं स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात् ओं॥ 02-01-01 ॥


उक्तेऽर्थेऽविरोधं दर्शयति अनेनाध्यायेन । प्रथमपादे युक्त्यविरोधम् । प्रथमतः स्मृत्यविरोधं दर्शयति-

सर्वज्ञा हि रुद्रादयः । अतस्तेषां वचनविरोधेऽप्रामाण्यमेव स्यात् ? इति चेत्, न। अन्यस्मृतीनां विष्ण्वादिभिर्नितरां सर्वर्ज्ञैरेव कृतत्वात्; श्रुतेराधिक्यं च सिद्ध्यति॥ 01 ॥
(137)ओम् इतरेषां चानुपलब्धेः ओम् ॥ 02-01-02 ॥


इतरेषां च तासु स्मृतिषूक्तानां फलानां, प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेः अप्रमाण्यं तासां युक्तम् । ‘च’शब्देन भागोपलब्धिरङ्गीकृता ॥ 02 ॥
(138)ओम् एतेन योगः प्रत्युक्तः ओम् ॥ 02-01-03 ॥


योगफलं प्रत्यक्षोपलभ्यम् इति न मन्तव्यम् । उक्ताभ्यासे तत्काल एव फलादृष्टेः ॥ 03 ॥

नविलक्षणत्वाधिकरणं

(139)ओं न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ओम् ॥ 02-01-04 ॥


नैवं श्रुतेः तदनुसारिस्मृतेश्च तदुक्तानुपलब्धेः अप्रामाण्यम् । विलक्षणत्वात्, नित्यत्वात्, तदनुसारित्वाच्च ।
न हि नित्ये दोषाः कल्प्याः ।
स्वतश्च प्रमाण्यम् । अन्यथाऽनवस्थितेः ।
‘न चक्षुर्न श्रोत्रं न तर्को न स्मृतिर्वेदा ह्येवैनं वेदयन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतेश्च ।
नित्यत्वं च शब्दादेव प्रतीयते ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.सं.८.६४.६) इत्यादेः ।‘अनादिनिधना नित्या’(म.भा.१२.२३८.९३) इति च स्मृतिः ॥ 04 ॥
(140)ओं दृश्यते तु ओम् ॥ 02-01-05 ॥


अधिकारिणां फलम् ।
‘ऋग्यजुः सामाथर्वाश्च मूलरामायणं तथा।भारतं पञ्चरात्रं च वेदा इत्येव शब्दिताः ॥पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः ।स्वतः प्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चिद् विचार्यते ॥यत् तेषूक्तं न दृश्येत पूर्वकर्मात्र कारणम् ।नाप्रामाण्यं भवेदेषां दृश्यते ह्यधिकारतः॥इतः प्रामाण्यमन्येषां न स्वतस्तु कथञ्चन ।अदृश्योक्तौ ततस्तेषामप्रमाण्यं न संशयः’ इति ॥ 05 ॥

अभिमान्यधिकरणम्

(141)ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम् ॥ 02-01-06 ॥


‘मृदब्रवीत्’(श.ब्रा.६.१.३),‘आपोऽब्रुवन्’(श.ब्रा.६.१.३), इत्यादिवचनाद् युक्तिविरुद्धो वेद इति । अतोऽब्रवीत्-
मृदाद्यभिमानिदेवता तत्र व्यपदिश्यते । तासां चेतरेभ्यो विशिष्टं सामर्थ्यमनुगतिश्च सर्वत्र । अतस्तासां सर्वमुक्तं युज्यते ॥ 06 ॥
(142)ओं दृश्यते च ओम् ॥ 02-01-07 ॥


तासां सामर्थ्यं महद्भिः ।
‘पृथिव्याद्यभिमानिन्यो देवताः प्रथितौजसः।अचिन्त्याः शक्तयस्तासां दृश्यन्ते मुनिभिश्च ताः ।ताश्च सर्वगता नित्यं वासुदेवैकसंश्रयाः’ इति ॥ 07 ॥

असदधिकरणम्

(143)ओम् असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ओम् ॥ 02-01-08 ॥


‘असदेवेदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१)‘असतः सदजायत’(ऋ.सं.१०.७२.३) इत्यादिनाऽसतः कारणत्वोक्तेर्विरोध इत्यतो वक्ति-
प्रतिषेधमात्रत्वान्नासतः कारणत्वं युक्तम् । असतः कारणत्वाद्युक्तिविरुद्धं वेदवाक्यमित्येतदत्र निषिद्यते ।
सर्वशब्दानां ब्रह्मणि समन्वयेऽपि ‘तदधीनत्वाद् अर्थवत्’(ब्र.सू.१.४.३) इत्यादिनाऽमुख्यत्वेनान्यस्यापि वाच्यत्वेन अङ्गीकाराद् असतः प्राप्तिः।
तथा श्रुतिप्राप्तमेवासन्मतमत्र निषिध्यते । समयस्योपरि निषेधात् । अर्थाद् युक्तिविरोधोऽपि निराक्रियते ॥ 08 ॥
(144)ओम् अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ओम् ॥ 02-01-09 ॥


असत उत्पत्तौ प्रलयेऽपि सर्वासत्त्वमेव स्यात् ॥ 09 ॥
(145)ओं न तु दृष्टान्तभावात् ओम् ॥ 02-01-10 ॥


प्रलये सर्वासत्त्वं भावे दृष्टान्तभावादेव न युज्यते।
सत उत्पत्तिः सशेषविनाशश्च हि लोके दृष्टः॥10 ॥
(146)ओं स्वपक्षदोषाच्च ओम् ॥ 02-01-11 ॥


दृष्टान्ताभावादेव ॥ 11 ॥
(147)ओं तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथाऽनुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः ओं॥ 02-01-12 ॥


एतावानेव तर्क इति प्रतिष्ठापकप्रमाणाभावाद् उक्तादन्यथाऽप्यनुमेयमिति चेत्,
न । एवं सति प्रमाणसिद्धेऽपि मोक्षेऽन्यथाऽनुमेयत्वादनिर्मोक्षप्रसङ्गः ।
अतो यावत्प्रमाणसिद्धं तावदेवाङ्गीकर्तव्यम् । नातोऽन्यच्छङ्क्यम् ।
‘यावदेव प्रमाणेन सिद्धं तावदहापयन् । स्वीकुर्यान्नैव चान्यत्र शङ्क्यं मानमृते क्वचित्’ इति वामने ॥ 12 ॥
(148)ओम् एतेन शिष्टा अपरिग्रहा अपि व्याख्याताः ओम् ॥ 02-01-13 ॥


एतेन दृष्टान्तभावेनाभावेन चावशिष्टा अप्यपरिग्रहा विरुद्धसिद्धान्ता अकर्तृकत्वाचेतनकर्तृकत्वजीवकर्तृकत्वादयोऽपि ।
‘अकस्माद्धीदमाविरासीदकस्मात् तिष्ठत्यकस्माल्लयमभ्युपैति’,‘प्रधानादिदमुत्पन्नं प्रधानमधितिष्ठति ।प्रधाने लयमभ्येति न ह्यन्यत् कारणं मतम्’॥‘जीवाद्भवन्ति भूतानि जीवे तिष्ठन्त्यचञ्चलाः ।जीवे तु लयमृच्छन्ति न जीवात् कारणं परम्’ ॥इत्यादिश्रुतिप्राप्ता निराकृताः ।
यथा दुःखादिषु जीवस्यास्वातन्त्र्यमेवमन्येष्वपीति दृष्टान्तः । श्रुतिगतिस्तु ब्रह्मवाचकत्वेन प्रदर्शिता । यत्रान्यवाचकत्वेऽप्यविरोधस्तत्रान्यदप्यमुख्यतयोच्यते, यत्र विरोधस्तत्र ब्रह्मैवोच्यत इति नियमः ॥ 13 ॥

भोक्त्रधिकरणम्

(149)ओं भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ओम् ॥ 02-01-14 ॥


‘कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति’(मुं.उ.३.२.७) इति मुक्तजीवस्य परापत्तिरुच्यते । अतस्तयोरविभागः । अतः पूर्वमपि स एव न हन्यस्यान्यत्वं युज्यत इति चेत्, न । स्याल्लोकवत् । यथा लोके उदके उदकान्तरस्यैकीभावव्यवहारेऽप्यन्तर्भेदोऽस्त्येव, एवं स्यादत्रापि । तथा च श्रुतिः-
‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति’(क.उ.४.१५) इति ।
स्कान्दे च –
‘उदकं तूदके सिक्तं मिश्रमेव यथा भवेत् ।न चैतदेव भवति यतो वृद्धिः प्रदृश्यते ॥एवमेव हि जीवोऽपि तादात्म्यं परमात्मना ।प्राप्तोऽपि नासौ भवति स्वातन्त्र्यादिविशेषणात्’ इति ।‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।तद् यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलोहरे’ इति च ।
‘न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति’(ऋ.सं.७.९९.१),‘न ते विष्णो जायमानो न जातः’(ऋ.७.११.२)इत्यादि च फलत्वेऽपि युक्तिविरोधेऽन्तर्भावादत्रोक्तम् ॥ 14 ॥

आरम्भणाधिकरणम्

(150)ओं तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ओम् ॥ 02-01-15 ॥


स्वतन्त्रबहुसाधना सृष्टिर्लोके दृष्टा । नैवं ब्रह्मणः । स्वरूपसामर्थ्यादेव तस्य सृष्टिः ।
‘किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत् स्वित् कथाऽऽसीत्’(ऋ.सं.१०.८१.२) इति ह्याक्षेपः । अधिष्ठानाद्यनुक्तेः । आदिशब्दाद्युक्तिभिश्च ।
‘परतन्त्रो ह्यपेक्षेत स्वतन्त्रः किमपेक्ष्यते ।साधनानां साधनत्वं यतः किं तस्य साधनैः’() इत्यादिभिः ॥ 15 ॥
(151)ओं भावे चोपलब्धेः ओम् ॥ 02-01-16 ॥


स्वतन्त्रसाधनभावे प्रमाणैरुपलभ्येत ।
‘अनुक्तं पञ्चभिर्वैदैर्न वस्त्वस्ति कुतश्चन । अतो वेदत्वमेतेषां यतस्ते सर्ववेदकाः’ इति स्कान्दे ॥ 16 ॥
(152)ओं सत्वाच्चावरस्य ओम् ॥ 02-01-17 ॥


‘अद्भ्यः सम्भूतः पृथिव्यै रसाच्च’(तै.आ.३.१६) इत्यादिना साधनान्तरप्रतीतेः कथमनुपलब्धिरित्यत आह-
अवरस्य तदधीनस्य साधनस्य सत्त्वात् ।
‘काल आसीत् पुरुष आसीत् परम आसीत् तद् यदासीत् तदावृतमासीत् तदधीनमासीदथ ह्येक एव परम आसीद् यस्यैतदासीन्न ह्येतदासीत्’() इति हि काषायणश्रुतिः ॥ 17 ॥
(153)ओम् असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ओम् ॥ 02-01-18॥


‘नासदासीन्नो सदासीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.१) इति सर्वस्यासत्त्वव्यपदेशान्नेति चेत्, न । अव्यक्तत्वपारतन्त्र्यादिधर्मान्तरेण हि तदुच्यते ।‘तम आसीत्’(ऋ.सं.१०.१२९.३) इति वाक्यशेषात् । न चान्यत्र प्रमाणमस्ति ।
‘अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’(महा.ना.उ.१०.५)। ‘अनाद्यनन्तं जगदेतदीदृक् प्रवर्तते नात्र विचार्यमस्ति ।न चान्यथा क्वाऽपि च कस्य चेदमभूत् पुरा नापि तथा भविष्यत्’(),‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’(भ.गी.१६.८),‘असत्यमाहुर्जगदेतदज्ञाः शक्तिं हरेर्ये न विदुःपरां हि’।
‘यः सत्यरूपं जगदेतदीदृक् सृष्ट्वा त्वभूत् सत्यकर्मा महात्मा’(),‘अथ हैनमाहुः सत्यकर्मेति सत्यं ह्येवेदं विश्वमसौ सृजते। अथैनमार्हुनित्यकर्मेति नित्यं ह्येवासौ कुरुते’()।
‘यच्चिकेत सत्यमित्तन्न मोघम्’(ऋ.सं.१०.५५.६) इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ।
‘परस्परविरोधे तु वाक्यानां यत्र युक्तता।तथैवार्थः परिज्ञेयो नावाक्या युक्तिरिष्यते’()॥इति बृहत्संहितायाम् ।
‘विरुद्धवत् प्रीतीयन्त आगमा यत्र वै मिथः ।तत्र दृष्टानुसारेण तेषामर्थोऽन्ववेक्ष्यते’ ॥ इति च ।
‘ईशोऽनीशो जगन्मिथ्या न पूज्यो गुरुरित्यपि ।इत्यादिवद् विरुद्धानि वचनान्यथ युक्तयः ।प्रमाणैर्बहुभिर्ज्ञेया आभासा इति वैदिकैः ॥वेदवेदानुसारेषु विरोधेऽन्यार्थकल्पना ।अन्येषां तु विरुद्धानां विप्रलम्भोऽथवा भ्रमः’॥ इति भागवततन्त्रे ।
‘शास्त्रार्थयुक्तोऽनुभवः प्रमाणं तूत्तमं मतम् ।मध्यमं त्वागमो ज्ञेयः प्रत्यक्षमधमं स्मृतम् ॥प्रत्यक्षयोरागमयोर्विरोधे निश्चयाय तु ।अनुमाद्या न स्वतन्त्राः प्रमाणपदवीं ययुः’इति पुरुषोत्तमतन्त्रे॥ 18 ॥
(154)ओं युक्तेः शब्दान्तराच्च ओम् ॥ 02-01-19 ॥


‘साधनानां साधनत्वं यदाऽऽत्माधीनमिष्यते ।तदा साधनसम्पत्तिरैश्वर्यद्योतिका भवेत्’(),इत्यादेः साधनान्तरेण सृष्टिर्युक्ता ।
‘अद्भ्यः सम्भूतो हिरण्यगर्भ इत्यष्टौ’(महा.ना.उ.१.१२) इत्यादिशब्दान्तराच्च ॥ 19 ॥
(155)ओं पटवच्च ओम् ॥ 02-01-20॥


साधनान्तरेण हि पटादिसृष्टिर्दृष्टा ॥ 20 ॥
(156)ओं यथा प्राणादिः ओम् ॥ 02-01-21॥


तच्च साधनजातां तेनानुप्रविष्टमेव । यथा शरीरेन्द्रियादिः।
‘प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्य पुरुषोत्तमः ।क्षोभयामास भगवान् सृष्ट्यर्थं जगतो विभुः’ इति कौर्मे ॥ 21 ॥

इतरव्यपदेशाधिकरणम्

(157)ओम् इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ओम् ॥ 02-01-22॥


जीवकर्तृपक्षः श्रुतिप्राप्तो विस्तरान्निराक्रियते-
जीवकर्तृत्वपक्षे हिताकरणमहितकरणं च न स्यात् ॥ 22 ॥
(158)ओम् अधिकं तु भेदनिर्देशात् ओम् ॥ 02-01-23 ॥


न च ब्रह्मणः श्रमचिन्तादिदोषप्राप्तिः ।अधिकशक्तित्वात् ।
‘श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टाऽघोष्टा विज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः’(ऐ.आ.३.२.४),‘एष त आत्मा सर्वान्तरः’(बृ.उ.५.५.२),‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’(बृ.उ.५.५.१), इत्यादिविशेषनिर्देशात् ॥ 23 ॥
(159)ओम् अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ओम् ॥ 02-01-24 ॥


चेतनत्वेऽप्यश्मादिवदस्वतन्त्रत्वात् स्वतः कर्तृत्वानुपपत्तिर्जीवस्य।
‘यथा धारुमयीं योषां नरः स्थिरसमाहितः।इङ्गयत्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः’ इति भारते ॥ 24 ॥
(160)ओम् उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ओम् ॥ 02-01-25 ॥


जीवेन कार्योपसंहारदर्शनात् तस्य कर्तृत्वमिति चेत्, न । यथा क्षीरं गोषु दृश्यमानमपि प्राणादेव जायते-
‘अन्नं रसादिरूपेण प्राणः परिणयत्यसौ’() इति वचनात्, एवं जीवे दृश्यमानोऽपि कार्योपसंहारोऽस्वातन्त्र्यात् परकृत एव ।
‘य आत्मानमन्तरो यमयति’(),‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’() इत्यादेः ॥ 25 ॥
(161)ओं देवादिवदपि लोके ओम् ॥ 02-01-26 ॥


न च कर्तुरीश्वरस्यादृष्टिविरोधः । देवादिवद् अदृश्यत्वशक्तियोगात् । लोकेऽपि पिशाचादीनां तादृशी शक्तिर्दृष्टा किम्वीश्वरस्य ।
‘न युक्तियोगाद् वाक्यानि निराकार्याण्यपि क्वचित् ।विरोध एव वाक्यानां युक्तयो न तु युक्तयः’इति बृहत्संहितायाम् ॥ 26 ॥
(162)ओं कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ओम् ॥ 02-01-27 ॥


अयं च दोषो जीवकर्तृत्वपक्षे । एकेनाङ्गुलिमात्रेण प्रवर्तमानोऽपि पूर्णप्रवृत्तिः स्यात् । न च तद्युज्यते । सामर्थ्यैकदेशदर्शनात् । न चैकदेशेन निरवयवत्वात् ।
‘अथ यः स जीवः स नित्यो निरवयवो ज्ञात्वाऽज्ञाता सुखी दुःखी शरीरेन्द्रियस्थः’() इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
न चोपाधिकृतोंऽशः । अंश उपहित इति द्वित्वापेक्षत्वात् न चान्यत् कल्प्यम् ।‘यद्धि युक्त्या विरुद्ध्येत तदीशकृतमेव हि’()। इति गत्यन्तरोक्तेः ॥ 27 ॥

शब्दमूलत्वाधिकरणं

(163)ओं श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ओम् ॥ 02-01-28 ॥


न चेश्वरपक्षेऽयं विरोधः-
‘योऽसौ विरुद्धोऽविरुद्धो मनुरमनुरवाग् वागिन्द्रोऽनिन्द्रः प्रवृत्तिरप्रवृत्तिः स परः परमात्मा’() इति पैङ्ग्यादिश्रुतेरेव ।
शब्दमूलत्वाच्च न युक्तिविरोधः-
‘यद्वाक्योक्तं न तद्युक्तिः विरोद्धुं शक्नुयात् क्वचित् । विरोधे वाक्ययोः क्वापि किञ्चित् साहाय्यकारणम्’()॥इति पुरुषोत्तमतन्त्रे ॥ 28 ॥
(164)ओम् आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ओम् ॥ 02-01-29 ॥


परमात्मनो विचित्राश्च शक्तयः सन्ति । नान्येषाम् ।
‘विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणो न चान्येषां शक्तयस्तादृशाः स्युः ।एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान् देवानेक एवानुविष्टः’॥इति श्वेताश्वतरश्रुतिः ॥ 29 ॥
(165)ओं स्वपक्षदोषाच्च ओम् ॥ 02-01-30 ॥


‘ये दोषा इतरत्रापि ते गुणाः परमे मताः ।न दोषः परमे कश्चिद् गुणा एव निरन्तराः’()इति वचनाज्जीवपक्ष एव दोषो न परपक्षे ।
‘अथ यः सदोषः साञ्जनः सजनिः स जीवोऽथ यः स निर्दोषो निष्कलः सगुणः परः परमात्मा’इति काषायणश्रुतिः ॥ 30 ॥
(166)ओं सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ओम् ॥ 02-01-31 ॥


‘सर्वैर्युक्ता शक्तिभिर्देवता सा परेति यां प्राहुरजस्रशक्तिम् ।नित्यानन्दा नित्यरूपाऽजरा च या शाश्वताऽत्मेति च यां वदन्ति’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥
अतो न केवलं विचित्रशक्तिः । किन्तु सर्वशक्तिरेव ॥ 31 ॥
(167)ओं विकरणत्वान्नेति चेत् तदुक्तम् ओम् ॥ 02-01-32 ॥


न च करणाभावादनुपपत्तिरिति युक्तम् ।
‘अपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रुणोत्यकर्णः।स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्’(श्वे.उ.३.१९)।
‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’(श्वे.उ.६.८)इत्यादि श्रतिभ्यः
‘सर्वोपेता च’(ब्र.सू.२.१.३१) इति सामान्यपरिहारेऽपि विशेषयुक्त्यर्थं पुनराशङ्का ॥ 32 ॥

नप्रयोजनत्वाधिकरणम्

(168)ओं न प्रयोजनवत्त्वात् ओम् ॥ 02-01-33 ॥


यत् प्रयोजनार्थं सृष्ट्यादिस्तदूनत्वान्नपूर्णतेत्यत आह –
‘अथैष एव परम आनन्दः’(बृ.उ.६.३.३३) इत्यादिना कृतकृत्यत्वान्न प्रयोजनाय सृष्टिः किन्तु ?
(169)ओं लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ओम् ॥ 02-01-34 ॥


यथा लोके मत्तस्य सुखोद्रेकादेव नृत्तगानादिलीला, न तु प्रयोजनापेक्षया, एवमेवेश्वरस्य ।
‘सृष्ट्यादिकं हरिर्नैव प्रयोजनमपेक्ष्य तु ।कुरुते केवलानन्दाद् यथा मत्तस्य नर्तनम् ॥पूर्णानन्दस्य तस्येह प्रयोजनमतिः कुतः ।मुक्ता अप्याप्तकामाः स्युः किमु तस्याखिलात्मनः’() इति ॥
‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’(मां.उ.२.१) इति च श्रुतिः ॥ 34 ॥

वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम्

(170)ओं वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति ओम् ॥ 02-01-35॥


सर्वकर्तृत्वे वैषम्यनैर्घृण्ये तस्येत्यतो वक्ति-
कर्मापेक्षया फलदातृत्वान्न तस्य वैषम्यनैर्घृण्ये । ‘पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’(प्र.३.७) इति हि श्रुतिः ॥ 35 ॥
(171)ओं न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ओम् ॥ 02-01-36 ॥


यदपेक्षयाऽसौ फलं ददाति न तत् कर्म ।
‘एष ह्येवैनं साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषते’(कौ.३.८) इति श्रुतेः कर्मणोऽपि तन्निमित्तत्वादिति चेन्न, तस्यापि पूर्वकर्म कारणमित्यनादित्वात् कर्मणः ।
भविष्यत्पुराणे च – ‘पुण्यपापादिकं विष्णुः कारयेत् पूर्वकर्मणा ।अनादित्वात् कर्मणश्च न विरोधः कथञ्चन’() इति ॥ 36 ॥
(172)ओम् उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ओं॥ 02-01-37 ॥


न च कर्मापेक्षत्वेनेश्वरस्यास्वातन्त्र्यम् ।
‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया’ ॥इत्यादिना कर्मादीनां सत्त्वस्यापि तदधीनत्वात् । न च पुनर्वैषम्याद्यापेतेन दोषः । तादृशवैषम्यादेरुपलभ्यमानत्वात्-
‘स कारयेत् पुण्यमथापि पापं न तावता दोषवानीशिताऽपि ।ईशो यत्रो गुणदोषादिसत्त्वे स्वयं परोऽनादिरादिः प्रजानाम्’() ॥इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 37 ॥

सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम्

(173)ओं सर्वधर्मोपपत्तेश्च ओम् ॥ 02-01-38 ॥


अवशिष्टैरुपसंहरति-
‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का ।चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ।’()इति सर्वगुणोपपत्तिश्रुतेश्च ॥ 38 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्य विरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 02-01 ॥