Brahmasutra/C1/S3: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
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| chapter_id = BS_C01 | | chapter_id = BS_C01 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ओम् ॥ 01-03-01 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
तत्र चान्यत्र च प्रसिद्धानां शब्दानां विष्णौ समन्वयं प्रायेणास्मिन् पादे दर्शयति । | तत्र चान्यत्र च प्रसिद्धानां शब्दानां विष्णौ समन्वयं प्रायेणास्मिन् पादे दर्शयति । | ||
विष्णोः परविद्याविषयत्वमुक्तम् । तत्र ‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्चसर्वैस्तमेवैकं जानथ आत्मानम्’ इत्यत्र, ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रोऽमाऽऽविशान्तकः’ ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’ इत्यादिना रुद्रस्य प्राणाधारत्वप्रतीतेः | विष्णोः परविद्याविषयत्वमुक्तम् । तत्र ‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्चसर्वैस्तमेवैकं जानथ आत्मानम्’(मुण्डक.उ.२.२.५) इत्यत्र, ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रोऽमाऽऽविशान्तकः’(महाना.उ.३५) ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’(बोधायनगृह्यसूत्रं) इत्यादिना रुद्रस्य प्राणाधारत्वप्रतीतेः, ‘स एषोऽन्तरश्चरते बहुधा जायमानः’(मुण्डक.उ.२.२.६) इति जीवलिङ्गाच्च तयोः प्राप्तिरित्यत उच्यते – | ||
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‘तमेवैकं जानथ | ‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’(मुण्डक.उ.२.२.५)इत्यात्मशब्दात् द्युभ्वाद्यायतनं(श्रयो) विष्णुरेव । | ||
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‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् | ‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् ।न सम्भवन्ति यस्मात् तैर्नैवाप्तागुणपूर्णता’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 1 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-03-02 ॥ | ||
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‘अमृतस्यैष सेतुः’ इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’,‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ ,‘मुक्तानां परमा गतिः’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् । | ‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.२.२.५) इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१),‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’(महाना.उ.११) ,‘मुक्तानां परमा गतिः’(मभा.१२.२५४.१७(विष्णुसहस्रनाम.१७)) ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’(तै.उ. २.८) इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् । | ||
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‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति | ‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रनिर्णयः॥’ इत्यादित्यपुराणे ॥ 2 ॥ | ||
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| Line 79: | Line 66: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं नानुमानमतच्छब्दात् ओम् ॥ 01-03-03-66 ॥ | ||
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न अनुमानात्मकागमपरिकल्पितरुद्रोऽत्र वाच्यः । भस्मधरोग्रत्वादितच्छब्दाभावात् । | |||
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‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः | ‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः परोवरीयान्’ इत्यादिना प्राणग्रन्थिरुद्रत्वादेर्विष्णोरेवोक्तत्वात् । | ||
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| text = | | text = | ||
‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः | ब्रह्माण्डे च- | ||
‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः ।ईशानादेव चेशानो महैदेवो महत्त्वतः ॥पिबन्ति ये नरा नाकं मुक्ताः संसारसागरात् ।तदाधारो यतो विष्णुः पिनाकीति ततः (स्मृ)श्रुतः॥शिवः सुखात्मकत्वेन शर्वः शंरोधनाद्धरिः ।कृत्यात्मकमिदं देहं यतो वस्ते प्रवर्तयन् ॥कृत्तिवासास्ततो देवो विरिञ्चश्च विरेचनात् ।बृंहणाद्ब्रह्मनामाऽसौ ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ॥एवं नानाविधैः शब्दैरेक एव त्रिविक्रमः ।वेदेषु सपुराणेषु गीयते पुरुषोत्तमः’ इति । | |||
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| Line 141: | Line 96: | ||
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वामने च | वामने च –‘न तु नारायणादीनां नाम्नामन्यत्र सम्भवः । अन्यनाम्नां गतिर्विष्णुः एक एव प्रकीर्तितः॥’ इति ॥ | ||
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स्कान्दे च – | स्कान्दे च – ‘ऋते नारायणादीनि नामानि पुरुषोत्तमः ।प्रादादन्यत्र भगवान् राजेवर्ते स्वकं पुरम्॥’इति । | ||
‘ऋते नारायणादीनि नामानि पुरुषोत्तमः | |||
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‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति | ‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति ।उग्रो भस्मधरो नग्नः कपालीति शिवस्य च ।विशेषनामानि ददौ स्वकीयान्यपि केशवः॥’ इति च ब्राह्मे ॥ 3 ॥ | ||
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एतैरेव | एतैरेव हेतुभिः न जीवो वायुश्च । ‘अजायमानो बहुधा विजायत’(तै.आ.३.१३.१) इति तस्यैव बहुधा जन्मोक्तेः ॥ 04॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं भेदव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-03-05 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा | न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशम् अस्य महिमानम्’(मुण्डक.३.१.२) इति भेदव्यपदेशात् ॥ 05 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (69)ओं प्रकरणात् ओम् ॥ 01-03-06 ॥ | ||
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‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥ | ‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’(मुण्डक.१.१.४) इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (70)ओं स्थित्यदनाभ्यां च ओम् ॥ 01-03-07 ॥ | ||
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‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते | ‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्ननन्यो अभिचाकशीति’(मुण्डक.३.१.१) | ||
इति ईश-जीवयोः स्थिति-अदनोक्तेः ॥ 07 ॥ | |||
इति | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (71)ओं भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ओम् ॥ 01-03-08 ॥ | ||
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‘प्राणो व अशाया भूयान्’ | ‘प्राणो व अशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा ‘यो वै भूमा तत्सुखम्’(छां.उ.७.१३.१) इत्युक्तेः तस्यैव भूमत्वप्राप्तिः । | ||
‘उत्क्रान्तप्राणान्’(छां.उ.७.१५.३) इत्यादिलिङ्गात् प्राणशब्दश्च वायुवाचीति अत उच्यते – | |||
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सम्प्रसादात्= पूर्णसुखरूपत्वात् । अध्युपदेशात्= सर्वेशामुपर्युपदेशाच्च विष्णुरेव भूमा । | |||
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‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’ इति श्रुतिः | ‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’(महाना.उ.११) इति श्रुतिः | ||
}} | }} | ||
| Line 290: | Line 215: | ||
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‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’ इत्यादिना | ‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’(बृ.उ.६.४.२) इत्यादिना न उत्क्रमणादिलिङ्गविरोधोऽपि ॥08॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (72)ओं धर्मोपपत्तेश्च ओम् ॥ 01-03-09 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (73)ओम् अक्षरमम्बरान्तधृतेः ओम् ॥ 01-03-10॥ | ||
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| Line 331: | Line 249: | ||
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अदृश्यत्वादिगुणा | अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः ‘अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोतृ’(बृ.उ.५.८.११) इत्यादिना, ‘अहं सोममाहनसं भिभर्मि’(ऋ.सं.१०.१२५.२) इत्यादेश्च तस्यापि सम्भवान् मध्यमाक्षरस्योक्ता इति अतो ब्रूते – | ||
}} | }} | ||
| Line 338: | Line 256: | ||
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‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य | ‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’(बृ.उ.५.८.११) इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य धृतेः ब्रह्मैवाक्षरम् । | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’ | ‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’(ऋ.सं.१.१५४.४), ‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति । एको देवो बहुधा निविष्टः । यदा भारं तन्द्रयते स भर्तुम् । पराऽस्य भारं पुनरस्तमेति’(तै.आ.३.१४) । ‘यस्मिन्निदं सं च वि चैधि सर्वं यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः’(महा.ना.१.२) इत्यादि श्रुतेः । | ||
‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति । एको देवो बहुधा निविष्टः । यदा भारं तन्द्रयते स भर्तुम् । पराऽस्य भारं पुनरस्तमेति’ । ‘यस्मिन्निदं | |||
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‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो | ‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो धृतौ॥’ इति च स्कान्दे ॥ 10 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 361: | Line 278: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (74)ओं सा च प्रशासनात् ओम् ॥ 01-03-11 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 369: | Line 286: | ||
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| text = | | text = | ||
सा च धृतिः | सा च धृतिः प्रशासनादुच्यते- ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी! सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’(बृ.उ.५.८.९) इत्यादिना । तच्च प्रशासनं विष्णोरेव । | ||
}} | }} | ||
| Line 376: | Line 293: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ । | ‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ (ऋ.सं.१.१६४.३६)। | ||
‘चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीरवीविपत्’(ऋ.सं.१.१५५.६) इत्यादिश्रुतेः । | |||
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| Line 384: | Line 301: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति | ‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता’(म.भा.१४.२७.२,स्कान्द.१.४२.१७१)। ‘यो हृच्छयः तम् अहमिह ब्रवीमि’() | ||
‘न केवलं मे भवतश्च राजन् स वै बलं बलीनां चापरेषाम्’(भाग.७.८.८)इत्यादेश्च ॥ 11 ॥ | |||
‘न केवलं मे भवतश्च राजन् स वै बलं बलीनां | |||
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| Line 394: | Line 310: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (75)ओम् अन्यभावव्यावृत्तेश्च ओम् ॥ 01-03-12 ॥ | ||
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| Line 409: | Line 318: | ||
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‘अस्थूलमनणु’ इत्यादिना | ‘अस्थूलमनणु’(बृ.उ.५.८.८) इत्यादिना स्थूलाण्वादीनाम् अन्यवस्तुस्वभावानां व्यावृत्तेश्च। | ||
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| Line 423: | Line 332: | ||
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‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च | ‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च ।विरुद्धर्मरूपोऽसौ ऐश्वर्यात् पुरुषोत्तमः॥’ इति च ब्राह्मे ॥ 12 ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (76)ओम् ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ओम् ॥ 01-03-13 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 441: | Line 350: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिना सतः स्रष्टृत्वमुच्यते । | ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१) इत्यादिना सतः स्रष्टृत्वमुच्यते । | ||
तच्च सत् ‘बहुस्यां प्रजायेय’(छां.उ.६.२.३) इति परिणामप्रतीतेर्न विष्णुः । | |||
स हि ‘अविकारः सदा शुद्धो नित्य आत्मा सदा हरिः’ इत्यादिनाऽविकारः प्रसिद्धः इति। अतोऽब्रवीति- | |||
}} | }} | ||
| Line 456: | Line 359: | ||
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| text = | | text = | ||
‘तदैक्षत’ | ‘तदैक्षत’ इति ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् स एव विष्णुरत्रोच्यते । | ||
}} | }} | ||
| Line 463: | Line 366: | ||
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| text = | | text = | ||
‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’, | ‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’(बृ.उ.५.७.२३),‘नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रु’(बृ.उ.५.८.११) इत्यादिना तस्यै व हि तल्लक्षणम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 470: | Line 373: | ||
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| text = | | text = | ||
बहुत्वं | बहुत्वं चानिकारेणैवोक्तम्-‘अजायमानो बहुधा विजायत’(तै.आ.३.१३.१) इति ॥13॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 480: | Line 383: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (77)ओं दहर उत्तरेभ्यः ओम् ॥ 01-03-14 ॥ | ||
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चन्द्रादित्याद्याधारत्वं विष्णोरुक्तम् । | चन्द्रादित्याद्याधारत्वं विष्णोरुक्तम् । तच्च ‘एस्मिन् ब्रह्म पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’,‘किं तदत्र विद्यते.....’(छां.उ.८.१.२), ‘उभे अस्मिन् द्यावा पृथिवी अन्तरेव समाहिते । उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ । विद्युन्नक्षत्राणि’(छां.उ.८.१.३) इत्यादिनाऽऽकाशस्य प्रतीयते । | ||
स चाकाशो न विष्णुः । ‘तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्’(महा.ना.उ.११) इति श्रुतेरित्यत आह- | |||
स चाकाशो न विष्णुः । | |||
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| Line 497: | Line 399: | ||
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| text = | | text = | ||
‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’ इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव । | ‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः, सत्यसङ्कल्पः, सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’(छां.उ.८.७.३) इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव । | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ | ‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’(बृ.उ.५.५), ‘स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः’(छां.उ.१.६.७) इत्यादिना विष्णोरेव हि ते गुणाः । | ||
‘स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः’ | |||
इत्यादिना विष्णोरेव हि ते गुणाः । | |||
}} | }} | ||
| Line 513: | Line 413: | ||
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‘नित्यतीर्णाशनायादिरेक एव हरिः स्वतः ।अशनायादिकानन्ये तत्प्रसादात् तरन्ति | ‘नित्यतीर्णाशनायादिरेक एव हरिः स्वतः ।अशनायादिकानन्ये तत्प्रसादात् तरन्ति हि॥’ इति पाद्मे । | ||
}} | }} | ||
| Line 520: | Line 420: | ||
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सापेक्षनिरपेक्षयोश्च निरपेक्षं स्वीकर्तव्यम् ॥ | सापेक्षनिरपेक्षयोश्च, निरपेक्षं स्वीकर्तव्यम् ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 527: | Line 427: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् | ‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् तत्काम्यकामिता॥’ इति च स्कान्दे ॥ 14 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 535: | Line 435: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (78)ओं गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च ओम् ॥ 01-03-15 ॥ | ||
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| Line 543: | Line 443: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति’(छां.उ.८.३.२) इति सुप्तस्य तद्गतिर्ब्रह्मशब्दश्चोच्यते । | |||
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| Line 550: | Line 450: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति | ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’(छां.उ.६.७.१) इति श्रुतेः तं हि सुप्तो गच्छति । ‘अरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके’(छां.उ.८.५.३) इति लिङ्गं च तथा दृष्टम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 565: | Line 465: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (79)ओं धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ओम् ॥ 16 ॥ | ||
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| Line 573: | Line 473: | ||
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‘एष सेतुर्विधृतिः’ इति | ‘एष सेतुर्विधृतिः’(छां.उ.८.४.१) इति धृतेः। ‘एष भूताधिपतिरेण भूतपालः’(बृ.उ.६.४.२१) इत्याद्यस्य महिम्नोऽस्मिन्नुपलब्धेः । | ||
}} | }} | ||
| Line 580: | Line 480: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ | ‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’(बृ.उ.५.८.११), ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि’(बृ.उ.५.८.९) | ||
‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि’ | }} | ||
‘स हि सर्वाधिपतिः स हि सर्वकालः स ईशः स विष्णुः’ | |||
‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्’ इत्यादिश्रुतिभ्यस्तस्य ह्येष महिमा । | {{Bhashyam | ||
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‘स हि सर्वाधिपतिः स हि सर्वकालः स ईशः स विष्णुः’,‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्’(महाना.उ.११) इत्यादिश्रुतिभ्यस्तस्य ह्येष महिमा । | |||
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‘सर्वेशो विष्णुरेवैको नान्योऽस्ति जगतः पतिः’ इति स्कान्दे ॥16॥ | ‘सर्वेशो विष्णुरेवैको नान्योऽस्ति जगतः पतिः’ इति च स्कान्दे ॥16॥ | ||
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| Line 598: | Line 502: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (80)ओं प्रसिद्धेश्च ओम् ॥ 01-03-17 ॥ | ||
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‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’ इति प्रसिद्धेश्च । तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥ | ‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’(महाना.उ.१०.७) इति प्रसिद्धेश्च । | ||
}} | |||
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तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (81)ओम् इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासम्भवात् ओम् ॥ 01-03-18 ॥ | ||
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| Line 622: | Line 533: | ||
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‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन | ‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’(छां.उ.८.१२.३), ‘एष आत्मेति होवाच’(छां.उ.४.१५.१) इति जीवपरामर्शात् स इति चेत्, | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S03_V18 | | verse_id = BS_C01_S03_V18 | ||
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तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥ | न। तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (82)ओम् उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ओम् ॥ 01-03-19 ॥ | ||
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‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति | ‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’(छां.उ.८.१२.३) इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति चेत्? न । तत्र हि परमेश्वरप्रसादाद् आविर्भूतस्वरूपो मुक्त उच्यते। | ||
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यत्प्रसादात् स मुक्तो भवति स भगवान् पूर्वोक्तः॥19 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (83)ओम् अन्यार्थश्च परामर्शः ओम् ॥ 01-03-20 ॥ | ||
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| Line 661: | Line 579: | ||
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‘यं प्राप्य स्वेन रूपेण | ‘यं प्राप्य स्वेन रूपेण जीवोऽ(भि)निष्पद्यते स एष आत्मा’ इति परमात्मार्थश्च परामर्शः ॥ 20 ॥ | ||
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| Line 669: | Line 587: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (84)ओम् अल्पश्रुतेरिति चेत् तदुक्तम् ओम् ॥ 01-03-21॥ | ||
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| Line 675: | Line 593: | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S03_V21 | | verse_id = BS_C01_S03_V21 | ||
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‘दहरः’(छां.उ.८.१.१) इत्यल्पश्रुतेर्न? इति चेत्- न । ‘..निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च’(ब्र.सू.१.२.७) इत्युक्व्तात् । | |||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S03_V21 | | verse_id = BS_C01_S03_V21 | ||
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‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायन्’(छां.उ.३.१४.३) इति श्रुत्युक्तत्वाच्च ॥ 21 ॥ | |||
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| Line 694: | Line 612: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (85)ओम् अनुकृतेस्तस्य च ओम् ॥ 01-03-22 ॥ | ||
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| Line 702: | Line 620: | ||
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| text = | | text = | ||
अदृश्यत्वादयः परमेश्वरगुणा उक्ताः । ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’ ‘तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं | अदृश्यत्वादयः परमेश्वरगुणा उक्ताः । ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’, ‘तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद् विजानीयाम्.....’(क.उ.५.१२,१४) इत्यादिना ज्ञानिसुखस्याप्यनिर्देश्यत्वम्, अज्ञेयत्वं चोच्यते ? इत्यतो वक्ति- | ||
}} | }} | ||
| Line 709: | Line 627: | ||
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| text = | | text = | ||
‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’ इत्यनुकृतेः, | ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’(क.उ.५.१५(२.२.१५)) इत्यनुकृतेः, | ||
}} | }} | ||
| Line 716: | Line 634: | ||
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| text = | | text = | ||
‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ इति वचनाच्च परमात्मैवानिर्देश्यसुखरूपः । | ‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’(क.उ.५.१५(२.२.१५)) इति वचनाच्च परमात्मैवानिर्देश्यसुखरूपः । | ||
}} | }} | ||
| Line 723: | Line 641: | ||
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| text = | | text = | ||
न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं | न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं तत् तेजो रश्मीत्’(चतुर्वेदशिखा) इति नारायणभासा हि सर्वं भाति ॥ 22 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 731: | Line 649: | ||
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| Line 746: | Line 664: | ||
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‘यदादित्यगतं तेजो | ‘यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् ।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्’(भ.गी.१५.१२) इति | ||
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| Line 754: | Line 671: | ||
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‘न | ‘न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम’(भ.गी.१५.६) इति च ॥ 23 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (87)ओं शब्दादेव प्रमितः ओम् ॥ 01-03-24 ॥ | ||
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| Line 773: | Line 689: | ||
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‘विष्णुरेव जिज्ञास्यः’() इत्युक्तम् । तत्र- | |||
‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते’ | ‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते’(क.उ.५.६) | ||
इति सर्वदेवोपास्यः कश्चित् प्रतीयते । स च ‘एवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथगेव सन्निधत्ते’ ‘योऽयं मध्यमः | इति सर्वदेवोपास्यः कश्चित् प्रतीयते । स च ‘एवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथगेव सन्निधत्ते’(प्रश्न.उ.३.४), ‘योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.उ.३.५.२१),‘कुविदङ्ग’(ऋ.सं.७.९१.१) इत्यादिना प्राणव्यवस्थापकत्वात्, मध्यमत्वात्, सर्वदेवोपास्यत्वाच्च वायुरेवेति प्रतीयते । अतोऽब्रवीत् ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 789: | Line 705: | ||
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| text = | | text = | ||
‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः | ‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः स्यादेवमागमनिर्णयः’॥ इति स्कान्दे ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 796: | Line 712: | ||
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| text = | | text = | ||
तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव | तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव प्राणत्वोक्तेः ‘तद्वैत्वं त्वं प्राणो अभवः’() इति ॥ 24 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 804: | Line 720: | ||
| chapter_id = BS_C01 | | chapter_id = BS_C01 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (88)ओं हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ओम् ॥ 01-03-25 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 829: | Line 745: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (89)ओं तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ओम् ॥ 01-03-26 ॥ | ||
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| Line 837: | Line 753: | ||
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मनुष्याणामेव | मनुष्याणामेव वेदविद्यायाम् अधिकार इत्युक्तम् । तिर्यगाद्यपेक्षयैव मनुष्यत्वविशेषणमुक्तं, न तु देवाद्यपेक्षयेत्याह- | ||
}} | }} | ||
| Line 844: | Line 760: | ||
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तदुपरि मनुष्याणां सतां | तदुपरि- मनुष्याणां सतां देवादित्वप्राप्त्युपरि । सम्भवति हि । तेषां विशिष्टबुद्ध्यादिभावात् । | ||
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तिर्यगादीनां तदभावादभावः । | |||
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तेषामपि यत्र विशिष्टबुद्ध्यादिभावस्तत्राविरोधः । निषेदभावात् । दृश्यन्ते हि जरितार्यादयः ॥ 26 ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (90)ओं विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ओं॥ 01-03-27 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘मनुष्या एव देवादयो भवन्ति’() इति ‘तदुपरि’ इत्युक्तम् । तत्र यदि मनुष्याः सन्तो देवादयो भवन्ति तत्पूर्वं देवताभावात् देवतोद्दिष्टकर्मणि विरोध इति चेत् न । | |||
‘ते ह नाकं महिमानः | अनेकेषां देवतापदप्राप्तेर्दर्शनात् । ‘ते ह नाकं महिमानः सचन्ते यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः’(तै.आ.३.१२) इति ॥27॥ | ||
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| Line 869: | Line 799: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (91)ओं शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ओम् ॥ 01-03-28 ॥ | ||
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| Line 877: | Line 807: | ||
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| text = | | text = | ||
‘वाचा विरूप नित्यया’ | ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.स.८.७५.६)) इत्यादिश्रुतेराप्त्यनिश्चयात्, नित्यत्वापेक्षत्वाच्च मूलप्रमाणस्य स्वतः प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च नित्यत्वाद् वेदस्य तदुदितानां देवानामनित्यत्वात् पुनरन्यभावनियमाभावाच्च शब्दे विरोधः ? इति चेत् न । | ||
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| Line 884: | Line 814: | ||
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‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्’ | ‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्’(म.ना.उ.५.७)इति ।‘यथैव नियमः काले सुरादिनियमस्तथा ।तस्मान्नानीदृशं क्वापि विश्वमेतद्भविष्यति’ ॥इत्यादे अत एव शब्दात् तेषां प्रभवनियमात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 891: | Line 821: | ||
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| text = | | text = | ||
महतां प्रत्यक्षात् । यथेदानीं तथोपर्यपि देवा भविष्यन्ति इति इतरेषामनुमानाच्च ॥ 28 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (92)ओं अत एव च नित्यत्वम् ओम् ॥ 01-03-29 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 917: | Line 845: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (93)ओं समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ओम् ॥ 01-03-30 ॥ | ||
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| Line 925: | Line 853: | ||
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अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’ इति दर्शनात् | अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’(म.ना.उ.५.७) इति दर्शनात् ।‘अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः ।वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः’() इति स्मृतेश्च ॥30॥ | ||
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| Line 948: | Line 861: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (94)ओं मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनिः ओम् ॥ 01-03-31॥ | ||
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| Line 956: | Line 869: | ||
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| text = | | text = | ||
‘वसूनामेवैको भूत्वा’ इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥ | ‘वसूनामेवैको भूत्वा’(छां.उ.३.६.३) इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 964: | Line 877: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (95)ओं ज्योतिषि भावाच्च ओम् ॥ 01-03-32॥ | ||
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| text = | | text = | ||
ज्योतिषि सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च | ज्योतिषि= सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च विद्यानाम् ॥ 32 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 980: | Line 893: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (96)ओं भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ओम् ॥01-03-33॥ | ||
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| Line 1,002: | Line 915: | ||
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‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता | ‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता ।सम्भवाच्च प्रकाशस्य परमेकमृते हरिम् ॥तेषां सामर्थ्ययोगाच्च देवानामप्युपासनम्। सर्वं विधीयते नित्यं सर्वयज्ञादिकर्म च’ इति स्कान्दे ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,016: | Line 929: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 33 ॥ | ‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति च ब्राह्मे ॥ 33 ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (97)ओं शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाऽऽद्रवणात् सूच्यते हि ओम् ॥01-03-34॥ | ||
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| Line 1,034: | Line 947: | ||
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‘मनुष्याधिकारत्वात्’ इत्युक्तेऽविशेषात् शूद्रस्यापि ‘अह हारे त्वा शूद्र’(छां.उ.४.२.३) इति पौत्रायणोक्तेरधिकार इत्यत आह – | |||
}} | }} | ||
| Line 1,041: | Line 954: | ||
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नासौ पौत्रायणः शूद्रः | नासौ पौत्रायणः शूद्रः । | ||
‘कम्वर एनमेतत्सन्तम्’ इत्यनादरश्रवणात् । | }} | ||
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शुचाऽऽद्रवणमेव शूद्रत्वम् (शूद्रशब्देनोक्तम्)। | |||
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‘कम्वर एनमेतत्सन्तम्’(छां.उ.४.१.३) इत्यनादरश्रवणात् । | |||
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‘स ह | ‘स ह सञ्जिहान एव क्षत्तारमुवाच’(छां.उ.४.१.५) इति सूच्यते हि ॥ 34 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (98)ओं क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ओम् ॥ 01-03-35 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,065: | Line 991: | ||
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‘अयमश्वतरीरथः’() इति चित्ररथसम्बन्दित्वेन लिङ्गेन पौत्रायणस्य क्षत्रियत्वावगतेश्च । | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’ इति ब्राह्मे । | ‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’() इति ब्राह्मे । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,079: | Line 1,005: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यत्र वेदो रथस्तत्र न वेदो यत्र नो रथः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 35 ॥ | ‘यत्र वेदो रथस्तत्र न वेदो यत्र नो रथः’() इति च ब्रह्मवैवर्ते ॥ 35 ॥ | ||
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| Line 1,087: | Line 1,013: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (99)ओं संस्कारपरामर्शात् तदभावाभिलापाच्च ओम् ॥ 01-03-36 ॥ | ||
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| Line 1,095: | Line 1,021: | ||
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‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत’ इत्यद्ययनार्थं संस्कारपरामर्शात् । ‘नाग्निर्न यज्ञो न क्रीया न संस्कारो न व्रतानि शूद्रस्य’ इति पैङ्गिश्रुतौ संस्काराभावाभिलापाच्च । | ‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत’() इत्यद्ययनार्थं संस्कारपरामर्शात् । ‘नाग्निर्न यज्ञो न क्रीया न संस्कारो न व्रतानि शूद्रस्य’() इति पैङ्गिश्रुतौ संस्काराभावाभिलापाच्च । | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् । | उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् । | ||
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संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन । अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं | संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन । | ||
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अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं तथा’()इति ॥ 36 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (100)ओं तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ओम् ॥ 01-03-37 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,126: | Line 1,059: | ||
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‘नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्मि’ इति सत्यवचनेन सत्यकामस्य शूद्रत्वाभावनिर्धारणे | ‘नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्मि’(छां.उ.४.४.४) इति सत्यवचनेन सत्यकामस्य शूद्रत्वाभावनिर्धारणे हारिद्रुमतस्य‘नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति’(छां.उ.४.४.५) इति तत्संस्कारे प्रवृत्तेश्च ॥ 37 ॥ | ||
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| Line 1,134: | Line 1,067: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (101)ओं श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ओम् ॥ 01-03-38 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,149: | Line 1,082: | ||
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| text = | | text = | ||
‘श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् | ‘श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम्, अध्ययने जिह्वाच्छेदः, अर्थावधारणे हृदयविदारणम्’(गौ.ध.१२.४.७) इति प्रतिषेधात् । | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (102)ओं कम्पनात् ओम् ॥ 01-03-39 ॥ | ||
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‘यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । | ‘यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति’() इत्युद्यतवज्रज्ञानान्मोक्षः प्रतीयते । इत्यतोऽब्रवीत्- | ||
}} | }} | ||
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‘एजति’() इति कम्पनवचनादुद्यतवज्रो भगवानेव । | |||
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‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न | ‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’() इति हि श्रुतिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,209: | Line 1,142: | ||
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| text = | | text = | ||
‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः’ इति | ‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः’() इति च‘नभस्वतोऽपि सर्वाः स्युश्चेष्टा भगवतो हरेः । किमुतान्यस्य जगतो यस्य चेष्टा नभस्वतः’ इति हि स्कान्दे ॥ | ||
}} | }} | ||
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‘चक्रं चङ्क्रमणादेष वर्जनाद्वज्र उच्यते ।खण्डनात् खड्ग एवैष हेतिनामा स्वयं हरिः’इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 39 ॥ | |||
‘चक्रं चङ्क्रमणादेष | |||
}} | }} | ||
| Line 1,233: | Line 1,159: | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,241: | Line 1,167: | ||
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हृदय आहितं ज्योतिः परमात्मेत्युक्तम् । | हृदय आहितं ज्योतिः परमात्मेत्युक्तम् । तत्र ‘योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः’(शत.ब्रा.१४.७.१.७) इत्यत्र ‘उभौ लोकावनुसञ्चरति’(शत.ब्रा.१४.७.१.७) इति वचनाज्जीव इति प्रतीयत इत्यत उच्यते – | ||
}} | }} | ||
| Line 1,255: | Line 1,181: | ||
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| text = | | text = | ||
‘विष्णुरेव | ‘विष्णुरेव ज्योतिः विष्णुरेव ब्रह्म विष्णुरेवात्मा विष्णुरेव बलं विष्णुरेव यशो विष्णुरेवानन्दः’() इति दर्शनात् चतुर्वेदशिखायां ज्योतिर्विष्णुरेव ।’ | ||
}} | |||
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‘प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति वचनात् तस्यापि लोकसञ्चरणमस्त्येव ॥ 40 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (104)ओम् आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-03-41 ॥ | ||
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सर्वाधारत्वम् विष्णोरुक्तम् । | सर्वाधारत्वम् विष्णोरुक्तम् । तच्च ‘आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता’(छां.उ.८.१४.१) इत्यत्राकाशस्य प्रतीयते । वै नामेति प्रसिद्धोपदेशात् । प्रसिद्धाकाशश्चाङ्गीकर्तव्य इत्यत उच्यते – | ||
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‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’ | ‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’(छां.उ.८.१४.१) इत्यर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाद् आकाशो हरिरेव। | ||
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‘अवर्णं’(), ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’(तै.आ.८.४) इत्यादिश्रुतेस्तस्यैव हि तत् लक्षणम्। | |||
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‘अनामा सोऽप्रसिद्धत्वाद् अरूपो भूतवर्जनात्’() इति ब्राह्मे ॥ 41 ॥ | |||
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असङ्गत्वं परमात्मन उक्तम् । तच्च ‘स | असङ्गत्वं परमात्मन उक्तम् । तच्च ‘स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः’() इति स्वप्नादिद्रष्टुः प्रतीयते । | ||
स च जीवः प्रसिद्धेरित्यतो वक्ति – | |||
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‘प्राज्ञेनाऽत्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्’, ‘प्राज्ञेनाऽत्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद् याति’(बृ.उ.६.३.३६) इति भेदव्यपदेशान्न जीवः, पर एवासङ्गः । स्वप्नादिद्रष्ट्रुत्वं च सर्वज्ञत्वात् तस्यैव युज्यते ॥ 42 ॥ | |||
इति भेदव्यपदेशान्न जीवः, पर एवासङ्गः । स्वप्नादिद्रष्ट्रुत्वं च सर्वज्ञत्वात् तस्यैव युज्यते ॥ 42 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (106)ओं पत्यादिशब्देभ्यः ओम् ॥ 01-03-43 ॥ | ||
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‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति ब्राह्मणस्यापि नित्यमहिमा प्रतीयते । स च ब्राह्मणः ‘स वा एष महानज आत्मा’ इत्यजशब्दाद्विरिञ्च इति प्राप्तम् । देवानां च विद्याकर्मणोः पदप्राप्तिः सूचिता | ‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’(बृ.उ.६.४.२२)) इति ब्राह्मणस्यापि नित्यमहिमा प्रतीयते । | ||
स च ब्राह्मणः ‘स वा एष महानज आत्मा’(शत.ब्रा.१४.७.२.२९) इत्यजशब्दाद्विरिञ्च इति प्राप्तम् । | |||
देवानां च विद्याकर्मणोः पदप्राप्तिः सूचिता ‘तदुपर्यपि’(ब्र.सू.१.३.२८) इति । अतो ब्रवीति – | |||
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‘सर्वस्याधिपतिः | ‘सर्वस्याधिपतिः सर्वस्येशानः’(), ‘स वा एष नेति नेति’() इत्यादि शब्देभ्यो नित्यमहिमा विष्णुरेव । | ||
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‘उतामृतत्वस्येशानः । यदन्नेनादतिरोहति’ | ‘उतामृतत्वस्येशानः । यदन्नेनादतिरोहति’(तै.आ.३.१२),‘सप्तार्धगर्भाभुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६),‘स योऽतोऽश्रुतः’(ऐ.आ.३.२.४) इत्यादि श्रुतिभ्यस्तस्यैव हि ते शब्दाः ॥ 43 ॥ | ||
‘सप्तार्धगर्भाभुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ | |||
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 01-03 ॥ | |||
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Revision as of 09:38, 10 April 2026
द्युभ्वाधिकरणम्
ओं द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ओम् ॥ 01-03-01 ॥
तत्र चान्यत्र च प्रसिद्धानां शब्दानां विष्णौ समन्वयं प्रायेणास्मिन् पादे दर्शयति ।
विष्णोः परविद्याविषयत्वमुक्तम् । तत्र ‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्चसर्वैस्तमेवैकं जानथ आत्मानम्’(मुण्डक.उ.२.२.५) इत्यत्र, ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रोऽमाऽऽविशान्तकः’(महाना.उ.३५) ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’(बोधायनगृह्यसूत्रं) इत्यादिना रुद्रस्य प्राणाधारत्वप्रतीतेः, ‘स एषोऽन्तरश्चरते बहुधा जायमानः’(मुण्डक.उ.२.२.६) इति जीवलिङ्गाच्च तयोः प्राप्तिरित्यत उच्यते –
‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’(मुण्डक.उ.२.२.५)इत्यात्मशब्दात् द्युभ्वाद्यायतनं(श्रयो) विष्णुरेव ।
‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् ।न सम्भवन्ति यस्मात् तैर्नैवाप्तागुणपूर्णता’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 1 ॥
ओं मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-03-02 ॥
‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.२.२.५) इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१),‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’(महाना.उ.११) ,‘मुक्तानां परमा गतिः’(मभा.१२.२५४.१७(विष्णुसहस्रनाम.१७)) ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’(तै.उ. २.८) इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् ।
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रनिर्णयः॥’ इत्यादित्यपुराणे ॥ 2 ॥
ओं नानुमानमतच्छब्दात् ओम् ॥ 01-03-03-66 ॥
न अनुमानात्मकागमपरिकल्पितरुद्रोऽत्र वाच्यः । भस्मधरोग्रत्वादितच्छब्दाभावात् ।
‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः परोवरीयान्’ इत्यादिना प्राणग्रन्थिरुद्रत्वादेर्विष्णोरेवोक्तत्वात् ।
ब्रह्माण्डे च-
‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः ।ईशानादेव चेशानो महैदेवो महत्त्वतः ॥पिबन्ति ये नरा नाकं मुक्ताः संसारसागरात् ।तदाधारो यतो विष्णुः पिनाकीति ततः (स्मृ)श्रुतः॥शिवः सुखात्मकत्वेन शर्वः शंरोधनाद्धरिः ।कृत्यात्मकमिदं देहं यतो वस्ते प्रवर्तयन् ॥कृत्तिवासास्ततो देवो विरिञ्चश्च विरेचनात् ।बृंहणाद्ब्रह्मनामाऽसौ ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ॥एवं नानाविधैः शब्दैरेक एव त्रिविक्रमः ।वेदेषु सपुराणेषु गीयते पुरुषोत्तमः’ इति ।
वामने च –‘न तु नारायणादीनां नाम्नामन्यत्र सम्भवः । अन्यनाम्नां गतिर्विष्णुः एक एव प्रकीर्तितः॥’ इति ॥
स्कान्दे च – ‘ऋते नारायणादीनि नामानि पुरुषोत्तमः ।प्रादादन्यत्र भगवान् राजेवर्ते स्वकं पुरम्॥’इति ।
‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति ।उग्रो भस्मधरो नग्नः कपालीति शिवस्य च ।विशेषनामानि ददौ स्वकीयान्यपि केशवः॥’ इति च ब्राह्मे ॥ 3 ॥
ओं प्राणभृच्च ओम् ॥ 01-03-04 ॥
एतैरेव हेतुभिः न जीवो वायुश्च । ‘अजायमानो बहुधा विजायत’(तै.आ.३.१३.१) इति तस्यैव बहुधा जन्मोक्तेः ॥ 04॥
ओं भेदव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-03-05 ॥
न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशम् अस्य महिमानम्’(मुण्डक.३.१.२) इति भेदव्यपदेशात् ॥ 05 ॥
(69)ओं प्रकरणात् ओम् ॥ 01-03-06 ॥
‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’(मुण्डक.१.१.४) इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥
(70)ओं स्थित्यदनाभ्यां च ओम् ॥ 01-03-07 ॥
‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्ननन्यो अभिचाकशीति’(मुण्डक.३.१.१)
इति ईश-जीवयोः स्थिति-अदनोक्तेः ॥ 07 ॥
भूमाधिकरणम्
(71)ओं भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ओम् ॥ 01-03-08 ॥
‘प्राणो व अशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा ‘यो वै भूमा तत्सुखम्’(छां.उ.७.१३.१) इत्युक्तेः तस्यैव भूमत्वप्राप्तिः ।
‘उत्क्रान्तप्राणान्’(छां.उ.७.१५.३) इत्यादिलिङ्गात् प्राणशब्दश्च वायुवाचीति अत उच्यते –
सम्प्रसादात्= पूर्णसुखरूपत्वात् । अध्युपदेशात्= सर्वेशामुपर्युपदेशाच्च विष्णुरेव भूमा ।
‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’(महाना.उ.११) इति श्रुतिः
‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’(बृ.उ.६.४.२) इत्यादिना न उत्क्रमणादिलिङ्गविरोधोऽपि ॥08॥
(72)ओं धर्मोपपत्तेश्च ओम् ॥ 01-03-09 ॥
सर्वगतत्वादिधर्मोपपतेश्च ॥09॥
अक्षराधिकरणम्
(73)ओम् अक्षरमम्बरान्तधृतेः ओम् ॥ 01-03-10॥
अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः ‘अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोतृ’(बृ.उ.५.८.११) इत्यादिना, ‘अहं सोममाहनसं भिभर्मि’(ऋ.सं.१०.१२५.२) इत्यादेश्च तस्यापि सम्भवान् मध्यमाक्षरस्योक्ता इति अतो ब्रूते –
‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’(बृ.उ.५.८.११) इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य धृतेः ब्रह्मैवाक्षरम् ।
‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’(ऋ.सं.१.१५४.४), ‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति । एको देवो बहुधा निविष्टः । यदा भारं तन्द्रयते स भर्तुम् । पराऽस्य भारं पुनरस्तमेति’(तै.आ.३.१४) । ‘यस्मिन्निदं सं च वि चैधि सर्वं यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः’(महा.ना.१.२) इत्यादि श्रुतेः ।
‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो धृतौ॥’ इति च स्कान्दे ॥ 10 ॥
(74)ओं सा च प्रशासनात् ओम् ॥ 01-03-11 ॥
सा च धृतिः प्रशासनादुच्यते- ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी! सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’(बृ.उ.५.८.९) इत्यादिना । तच्च प्रशासनं विष्णोरेव ।
‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ (ऋ.सं.१.१६४.३६)।
‘चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीरवीविपत्’(ऋ.सं.१.१५५.६) इत्यादिश्रुतेः ।
‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता’(म.भा.१४.२७.२,स्कान्द.१.४२.१७१)। ‘यो हृच्छयः तम् अहमिह ब्रवीमि’()
‘न केवलं मे भवतश्च राजन् स वै बलं बलीनां चापरेषाम्’(भाग.७.८.८)इत्यादेश्च ॥ 11 ॥
(75)ओम् अन्यभावव्यावृत्तेश्च ओम् ॥ 01-03-12 ॥
‘अस्थूलमनणु’(बृ.उ.५.८.८) इत्यादिना स्थूलाण्वादीनाम् अन्यवस्तुस्वभावानां व्यावृत्तेश्च।
‘अस्थूलोऽनणुरमध्यमो मध्यमोऽव्यापको व्यापको योऽसौ हरिरादिरनादिरविश्वो विश्वः सगुणो निर्गुणः’ इत्यादेर्विष्णोरेव ते धर्माः ।
‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च ।विरुद्धर्मरूपोऽसौ ऐश्वर्यात् पुरुषोत्तमः॥’ इति च ब्राह्मे ॥ 12 ॥
सदधिकरणम्
(76)ओम् ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ओम् ॥ 01-03-13 ॥
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छां.उ.६.२.१) इत्यादिना सतः स्रष्टृत्वमुच्यते ।
तच्च सत् ‘बहुस्यां प्रजायेय’(छां.उ.६.२.३) इति परिणामप्रतीतेर्न विष्णुः ।स हि ‘अविकारः सदा शुद्धो नित्य आत्मा सदा हरिः’ इत्यादिनाऽविकारः प्रसिद्धः इति। अतोऽब्रवीति-
‘तदैक्षत’ इति ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् स एव विष्णुरत्रोच्यते ।
‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’(बृ.उ.५.७.२३),‘नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रु’(बृ.उ.५.८.११) इत्यादिना तस्यै व हि तल्लक्षणम् ।
बहुत्वं चानिकारेणैवोक्तम्-‘अजायमानो बहुधा विजायत’(तै.आ.३.१३.१) इति ॥13॥
दहराधिकरणम्
(77)ओं दहर उत्तरेभ्यः ओम् ॥ 01-03-14 ॥
चन्द्रादित्याद्याधारत्वं विष्णोरुक्तम् । तच्च ‘एस्मिन् ब्रह्म पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’,‘किं तदत्र विद्यते.....’(छां.उ.८.१.२), ‘उभे अस्मिन् द्यावा पृथिवी अन्तरेव समाहिते । उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ । विद्युन्नक्षत्राणि’(छां.उ.८.१.३) इत्यादिनाऽऽकाशस्य प्रतीयते ।
स चाकाशो न विष्णुः । ‘तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्’(महा.ना.उ.११) इति श्रुतेरित्यत आह-
‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः, सत्यसङ्कल्पः, सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’(छां.उ.८.७.३) इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव ।
‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’(बृ.उ.५.५), ‘स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः’(छां.उ.१.६.७) इत्यादिना विष्णोरेव हि ते गुणाः ।
‘नित्यतीर्णाशनायादिरेक एव हरिः स्वतः ।अशनायादिकानन्ये तत्प्रसादात् तरन्ति हि॥’ इति पाद्मे ।
सापेक्षनिरपेक्षयोश्च, निरपेक्षं स्वीकर्तव्यम् ॥
‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् तत्काम्यकामिता॥’ इति च स्कान्दे ॥ 14 ॥
(78)ओं गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च ओम् ॥ 01-03-15 ॥
‘अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति’(छां.उ.८.३.२) इति सुप्तस्य तद्गतिर्ब्रह्मशब्दश्चोच्यते ।
‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’(छां.उ.६.७.१) इति श्रुतेः तं हि सुप्तो गच्छति । ‘अरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके’(छां.उ.८.५.३) इति लिङ्गं च तथा दृष्टम् ।
‘अरश्च वै ण्यश्च सासमुद्रौ तत्रैव सर्वाभिमतप्रदौ द्वौ’ इत्यादिना तस्यैव हि तल्लक्षणत्वेनोच्यते ॥ 15 ॥
(79)ओं धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ओम् ॥ 16 ॥
‘एष सेतुर्विधृतिः’(छां.उ.८.४.१) इति धृतेः। ‘एष भूताधिपतिरेण भूतपालः’(बृ.उ.६.४.२१) इत्याद्यस्य महिम्नोऽस्मिन्नुपलब्धेः ।
‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’(बृ.उ.५.८.११), ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि’(बृ.उ.५.८.९)
‘स हि सर्वाधिपतिः स हि सर्वकालः स ईशः स विष्णुः’,‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्’(महाना.उ.११) इत्यादिश्रुतिभ्यस्तस्य ह्येष महिमा ।
‘सर्वेशो विष्णुरेवैको नान्योऽस्ति जगतः पतिः’ इति च स्कान्दे ॥16॥
(80)ओं प्रसिद्धेश्च ओम् ॥ 01-03-17 ॥
‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’(महाना.उ.१०.७) इति प्रसिद्धेश्च ।
तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥
(81)ओम् इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासम्भवात् ओम् ॥ 01-03-18 ॥
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’(छां.उ.८.१२.३), ‘एष आत्मेति होवाच’(छां.उ.४.१५.१) इति जीवपरामर्शात् स इति चेत्,
न। तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥
(82)ओम् उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ओम् ॥ 01-03-19 ॥
‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’(छां.उ.८.१२.३) इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति चेत्? न । तत्र हि परमेश्वरप्रसादाद् आविर्भूतस्वरूपो मुक्त उच्यते।
यत्प्रसादात् स मुक्तो भवति स भगवान् पूर्वोक्तः॥19 ॥
(83)ओम् अन्यार्थश्च परामर्शः ओम् ॥ 01-03-20 ॥
‘यं प्राप्य स्वेन रूपेण जीवोऽ(भि)निष्पद्यते स एष आत्मा’ इति परमात्मार्थश्च परामर्शः ॥ 20 ॥
(84)ओम् अल्पश्रुतेरिति चेत् तदुक्तम् ओम् ॥ 01-03-21॥
‘दहरः’(छां.उ.८.१.१) इत्यल्पश्रुतेर्न? इति चेत्- न । ‘..निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च’(ब्र.सू.१.२.७) इत्युक्व्तात् ।
‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायन्’(छां.उ.३.१४.३) इति श्रुत्युक्तत्वाच्च ॥ 21 ॥
अनुकृत्यधिकरणम्
(85)ओम् अनुकृतेस्तस्य च ओम् ॥ 01-03-22 ॥
अदृश्यत्वादयः परमेश्वरगुणा उक्ताः । ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’, ‘तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद् विजानीयाम्.....’(क.उ.५.१२,१४) इत्यादिना ज्ञानिसुखस्याप्यनिर्देश्यत्वम्, अज्ञेयत्वं चोच्यते ? इत्यतो वक्ति-
‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’(क.उ.५.१५(२.२.१५)) इत्यनुकृतेः,
‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’(क.उ.५.१५(२.२.१५)) इति वचनाच्च परमात्मैवानिर्देश्यसुखरूपः ।
न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं तत् तेजो रश्मीत्’(चतुर्वेदशिखा) इति नारायणभासा हि सर्वं भाति ॥ 22 ॥
(86)ओम् अपि स्मर्यते ओम् ॥ 01-03-23 ॥
॥ इति अनुकृत्यधिकरणम् ॥ 06 ॥
‘यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् ।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्’(भ.गी.१५.१२) इति
‘न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम’(भ.गी.१५.६) इति च ॥ 23 ॥
वामनाधिकरणम्
(87)ओं शब्दादेव प्रमितः ओम् ॥ 01-03-24 ॥
‘विष्णुरेव जिज्ञास्यः’() इत्युक्तम् । तत्र-
‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते’(क.उ.५.६)इति सर्वदेवोपास्यः कश्चित् प्रतीयते । स च ‘एवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथगेव सन्निधत्ते’(प्रश्न.उ.३.४), ‘योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.उ.३.५.२१),‘कुविदङ्ग’(ऋ.सं.७.९१.१) इत्यादिना प्राणव्यवस्थापकत्वात्, मध्यमत्वात्, सर्वदेवोपास्यत्वाच्च वायुरेवेति प्रतीयते । अतोऽब्रवीत् ॥
वामनशब्दादेव विष्णुरिति प्रमितः । न हि श्रुतेर्लिङ्गं बलवत् ।
‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः स्यादेवमागमनिर्णयः’॥ इति स्कान्दे ॥
तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव प्राणत्वोक्तेः ‘तद्वैत्वं त्वं प्राणो अभवः’() इति ॥ 24 ॥
(88)ओं हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ओम् ॥ 01-03-25 ॥
॥ इति वामनाधिकरणम् ॥ 07 ॥
सर्वगतस्यापि तस्याङ्गुष्ठमात्रत्वं हृद्यवकाशापेक्षया युज्यते । इतरप्राणिनामङ्गुष्ठाभावेऽपि मनुष्याधिकारत्वान्न विरोधः ॥ 25 ॥
देवताधिकरणम्
(89)ओं तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ओम् ॥ 01-03-26 ॥
मनुष्याणामेव वेदविद्यायाम् अधिकार इत्युक्तम् । तिर्यगाद्यपेक्षयैव मनुष्यत्वविशेषणमुक्तं, न तु देवाद्यपेक्षयेत्याह-
तदुपरि- मनुष्याणां सतां देवादित्वप्राप्त्युपरि । सम्भवति हि । तेषां विशिष्टबुद्ध्यादिभावात् ।
तिर्यगादीनां तदभावादभावः ।
तेषामपि यत्र विशिष्टबुद्ध्यादिभावस्तत्राविरोधः । निषेदभावात् । दृश्यन्ते हि जरितार्यादयः ॥ 26 ॥
(90)ओं विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ओं॥ 01-03-27 ॥
‘मनुष्या एव देवादयो भवन्ति’() इति ‘तदुपरि’ इत्युक्तम् । तत्र यदि मनुष्याः सन्तो देवादयो भवन्ति तत्पूर्वं देवताभावात् देवतोद्दिष्टकर्मणि विरोध इति चेत् न ।
अनेकेषां देवतापदप्राप्तेर्दर्शनात् । ‘ते ह नाकं महिमानः सचन्ते यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः’(तै.आ.३.१२) इति ॥27॥
(91)ओं शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ओम् ॥ 01-03-28 ॥
‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ.स.८.७५.६)) इत्यादिश्रुतेराप्त्यनिश्चयात्, नित्यत्वापेक्षत्वाच्च मूलप्रमाणस्य स्वतः प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च नित्यत्वाद् वेदस्य तदुदितानां देवानामनित्यत्वात् पुनरन्यभावनियमाभावाच्च शब्दे विरोधः ? इति चेत् न ।
‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्’(म.ना.उ.५.७)इति ।‘यथैव नियमः काले सुरादिनियमस्तथा ।तस्मान्नानीदृशं क्वापि विश्वमेतद्भविष्यति’ ॥इत्यादे अत एव शब्दात् तेषां प्रभवनियमात् ।
महतां प्रत्यक्षात् । यथेदानीं तथोपर्यपि देवा भविष्यन्ति इति इतरेषामनुमानाच्च ॥ 28 ॥
(92)ओं अत एव च नित्यत्वम् ओम् ॥ 01-03-29 ॥
अत एव शब्दस्य नित्यत्वादेव च देवप्रवाहनित्यत्वं युक्तम् ॥ 29 ॥
(93)ओं समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ओम् ॥ 01-03-30 ॥
अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’(म.ना.उ.५.७) इति दर्शनात् ।‘अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः ।वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः’() इति स्मृतेश्च ॥30॥
(94)ओं मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनिः ओम् ॥ 01-03-31॥
‘वसूनामेवैको भूत्वा’(छां.उ.३.६.३) इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥
(95)ओं ज्योतिषि भावाच्च ओम् ॥ 01-03-32॥
ज्योतिषि= सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च विद्यानाम् ॥ 32 ॥
(96)ओं भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ओम् ॥01-03-33॥
॥इति देवताधिकरणम् ॥ 08 ॥
फलविशेषभावात् प्राप्तपदानामपि देवानां मध्वादिष्वप्यधिकारं बादरायणो मन्यते । अस्ति हि प्रकाशविशेषः ।
‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता ।सम्भवाच्च प्रकाशस्य परमेकमृते हरिम् ॥तेषां सामर्थ्ययोगाच्च देवानामप्युपासनम्। सर्वं विधीयते नित्यं सर्वयज्ञादिकर्म च’ इति स्कान्दे ॥
उक्तफलानधिकारमात्रं जैमिनिमतम् । अतो न मतविरोधः ।
‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति च ब्राह्मे ॥ 33 ॥
अपशूद्राधिकरणम्
(97)ओं शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाऽऽद्रवणात् सूच्यते हि ओम् ॥01-03-34॥
‘मनुष्याधिकारत्वात्’ इत्युक्तेऽविशेषात् शूद्रस्यापि ‘अह हारे त्वा शूद्र’(छां.उ.४.२.३) इति पौत्रायणोक्तेरधिकार इत्यत आह –
नासौ पौत्रायणः शूद्रः ।
शुचाऽऽद्रवणमेव शूद्रत्वम् (शूद्रशब्देनोक्तम्)।
‘कम्वर एनमेतत्सन्तम्’(छां.उ.४.१.३) इत्यनादरश्रवणात् ।
‘स ह सञ्जिहान एव क्षत्तारमुवाच’(छां.उ.४.१.५) इति सूच्यते हि ॥ 34 ॥
(98)ओं क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ओम् ॥ 01-03-35 ॥
‘अयमश्वतरीरथः’() इति चित्ररथसम्बन्दित्वेन लिङ्गेन पौत्रायणस्य क्षत्रियत्वावगतेश्च ।
‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’() इति ब्राह्मे ।
‘यत्र वेदो रथस्तत्र न वेदो यत्र नो रथः’() इति च ब्रह्मवैवर्ते ॥ 35 ॥
(99)ओं संस्कारपरामर्शात् तदभावाभिलापाच्च ओम् ॥ 01-03-36 ॥
‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत’() इत्यद्ययनार्थं संस्कारपरामर्शात् । ‘नाग्निर्न यज्ञो न क्रीया न संस्कारो न व्रतानि शूद्रस्य’() इति पैङ्गिश्रुतौ संस्काराभावाभिलापाच्च ।
उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् ।
‘सपत्नीं मे पराधम’ इत्यादिष्वधिकारदर्शनात् ।
संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन ।
अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं तथा’()इति ॥ 36 ॥
(100)ओं तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ओम् ॥ 01-03-37 ॥
‘नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्मि’(छां.उ.४.४.४) इति सत्यवचनेन सत्यकामस्य शूद्रत्वाभावनिर्धारणे हारिद्रुमतस्य‘नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति’(छां.उ.४.४.५) इति तत्संस्कारे प्रवृत्तेश्च ॥ 37 ॥
(101)ओं श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ओम् ॥ 01-03-38 ॥
इति अपशूद्राधिकरणम् ॥ 09 ॥
‘श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम्, अध्ययने जिह्वाच्छेदः, अर्थावधारणे हृदयविदारणम्’(गौ.ध.१२.४.७) इति प्रतिषेधात् ।
‘नाग्निर्न यज्ञः शूद्रस्य तथैवाद्ययनं कुतः ।केवलैव तु शुश्रूषा त्रिवर्णानां विधीयते’ इति स्मृतेश्च ।
विदुरादीनां तूत्पन्नज्ञानत्वात् कश्चिद्विशेषः ॥ 38 ॥
कम्पनाधिकरणं
(102)ओं कम्पनात् ओम् ॥ 01-03-39 ॥
‘यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति’() इत्युद्यतवज्रज्ञानान्मोक्षः प्रतीयते । इत्यतोऽब्रवीत्-
इति कम्पनाधिकरणं ॥ 10 ॥
‘एजति’() इति कम्पनवचनादुद्यतवज्रो भगवानेव ।
‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’() इति हि श्रुतिः ।
‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः’() इति च‘नभस्वतोऽपि सर्वाः स्युश्चेष्टा भगवतो हरेः । किमुतान्यस्य जगतो यस्य चेष्टा नभस्वतः’ इति हि स्कान्दे ॥
‘चक्रं चङ्क्रमणादेष वर्जनाद्वज्र उच्यते ।खण्डनात् खड्ग एवैष हेतिनामा स्वयं हरिः’इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 39 ॥
ज्योतिरधिकरणं
(103)ओं ज्योतिर्दर्शनात् ओम् ॥ 01-03-40 ॥
हृदय आहितं ज्योतिः परमात्मेत्युक्तम् । तत्र ‘योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः’(शत.ब्रा.१४.७.१.७) इत्यत्र ‘उभौ लोकावनुसञ्चरति’(शत.ब्रा.१४.७.१.७) इति वचनाज्जीव इति प्रतीयत इत्यत उच्यते –
इति ज्योतिरधिकरणं ॥ 11 ॥
‘विष्णुरेव ज्योतिः विष्णुरेव ब्रह्म विष्णुरेवात्मा विष्णुरेव बलं विष्णुरेव यशो विष्णुरेवानन्दः’() इति दर्शनात् चतुर्वेदशिखायां ज्योतिर्विष्णुरेव ।’
‘प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति वचनात् तस्यापि लोकसञ्चरणमस्त्येव ॥ 40 ॥
आकाशाधिकरणम्
(104)ओम् आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-03-41 ॥
सर्वाधारत्वम् विष्णोरुक्तम् । तच्च ‘आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता’(छां.उ.८.१४.१) इत्यत्राकाशस्य प्रतीयते । वै नामेति प्रसिद्धोपदेशात् । प्रसिद्धाकाशश्चाङ्गीकर्तव्य इत्यत उच्यते –
इति आकाशाधिकरणम् ॥ 12 ॥
‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’(छां.उ.८.१४.१) इत्यर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाद् आकाशो हरिरेव।
‘अवर्णं’(), ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’(तै.आ.८.४) इत्यादिश्रुतेस्तस्यैव हि तत् लक्षणम्।
‘अनामा सोऽप्रसिद्धत्वाद् अरूपो भूतवर्जनात्’() इति ब्राह्मे ॥ 41 ॥
सुषुप्त्यधिकरणम्
(105)ओं सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ओम् ॥ 01-03-42 ॥
असङ्गत्वं परमात्मन उक्तम् । तच्च ‘स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः’() इति स्वप्नादिद्रष्टुः प्रतीयते ।
स च जीवः प्रसिद्धेरित्यतो वक्ति –
‘प्राज्ञेनाऽत्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्’, ‘प्राज्ञेनाऽत्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद् याति’(बृ.उ.६.३.३६) इति भेदव्यपदेशान्न जीवः, पर एवासङ्गः । स्वप्नादिद्रष्ट्रुत्वं च सर्वज्ञत्वात् तस्यैव युज्यते ॥ 42 ॥
ब्राह्मणाधिकरणम्
(106)ओं पत्यादिशब्देभ्यः ओम् ॥ 01-03-43 ॥
‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’(बृ.उ.६.४.२२)) इति ब्राह्मणस्यापि नित्यमहिमा प्रतीयते ।
स च ब्राह्मणः ‘स वा एष महानज आत्मा’(शत.ब्रा.१४.७.२.२९) इत्यजशब्दाद्विरिञ्च इति प्राप्तम् ।देवानां च विद्याकर्मणोः पदप्राप्तिः सूचिता ‘तदुपर्यपि’(ब्र.सू.१.३.२८) इति । अतो ब्रवीति –
‘सर्वस्याधिपतिः सर्वस्येशानः’(), ‘स वा एष नेति नेति’() इत्यादि शब्देभ्यो नित्यमहिमा विष्णुरेव ।
‘उतामृतत्वस्येशानः । यदन्नेनादतिरोहति’(तै.आ.३.१२),‘सप्तार्धगर्भाभुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६),‘स योऽतोऽश्रुतः’(ऐ.आ.३.२.४) इत्यादि श्रुतिभ्यस्तस्यैव हि ते शब्दाः ॥ 43 ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 01-03 ॥