Brahmasutra/C1/S2: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = BS | | document_id = BS | ||
| chapter_num = 1 | | chapter_num = 1 | ||
| title = द्वितीयः पादः | | title = द्वितीयः पादः | ||
}}लिङ्गात्मकानां शब्दानां विष्णौ प्रवृत्तिं | }}लिङ्गात्मकानां शब्दानां विष्णौ प्रवृत्तिं दर्शयति अस्मिन् पादे प्राधान्येन । | ||
‘ब्रह्म ततमम्’(ऐ.आ.२.४.३)इति सर्वगतत्वमुक्तं विष्णोः । | |||
तच्च‘तस्यैतस्यासावादित्यो रसः’(ऐ.आ.३.२.३) इत्यादिनाऽऽदित्यस्य प्रतीयत इत्यतोऽब्रवीत् । | |||
=== सर्वगतत्वाधिकरणम् === | === सर्वगतत्वाधिकरणम् === | ||
| Line 12: | Line 16: | ||
| chapter_id = BS_C01 | | chapter_id = BS_C01 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ओम् ॥ 01-02-01 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 20: | Line 24: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स यश्चायमशरीरः | ‘स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा’(ऐ.आ.३.२.४)इत्यादिना सर्वत्रोच्यमानो नारायण एव । ‘तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.१.६),‘परमं यो महद्ब्रह्म’(म.भा.१३.२५४.९)(विष्णुसहस्रनाम),‘वासुदेवात् परः को नु ब्रह्मशब्दोदितो भवेत् ।स हि सर्वगुणैः पूर्णस्तदन्ये तूपचारतः’ ॥ | ||
}} | }} | ||
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इति तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दोपदेशात् ॥ 01 ॥ | इति तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दोपदेशात् ॥ 01 ॥ | ||
| Line 45: | Line 39: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ओम् ॥ 01-02-02 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 53: | Line 47: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स योऽतोऽश्रुतः’ इत्यादि । | ‘स योऽतोऽश्रुतः’(ऐ.आ.३.२.४) इत्यादि । स हि‘न ते विष्णो जायमानः’(ऋ.सं.७.९९.२) इत्यादिनाऽश्रुतत्वादिगुणकः(गुणः) ।‘स सविता स वायुः स इन्द्रः सोऽश्रुतः सोऽदृष्टो यो हरिर्यः परमो यो विष्णुर्योऽनन्तः’ इत्यादि चतुर्वेदशिखायाम् ॥02॥ | ||
स | |||
}} | }} | ||
| Line 75: | Line 55: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अनुपपत्तेस्तुन शारीरः ओम् ॥ 01-02-03 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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| Line 98: | Line 78: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ओम् ॥ 01-02-04 ॥ | ||
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| Line 106: | Line 86: | ||
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‘आत्मानां | ‘आत्मानां परस्मै शंसति’(ऐ.आ.३.२.३) इत्यादि ॥04॥ | ||
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| Line 114: | Line 94: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं शब्दविशेषात् ओम् ॥ 05-36 ॥ | ||
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‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति । न हि जीवमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । | ‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’(ऐ.आ.३.२.३) इति । न हि जीवमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । | ||
}} | }} | ||
| Line 137: | Line 117: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं स्मृतेश्च ओम् ॥ 01-02-06 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’ | ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’(भ.गी.१०.२०),‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’(भ.गी.१५.१३) इत्यादि । | ||
}} | }} | ||
| Line 152: | Line 132: | ||
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| text = | | text = | ||
न चाप्रामाणिकं कल्प्यम् ॥ 06 ॥ | |||
न | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अर्भकौकस्त्वात् तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च ओम् ॥01-02-07 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 175: | Line 148: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सर्वेषु भूतेषु’ इति अल्पौकस्त्वात्, चक्षुर्मयत्वादिना जीवव्यपदेशाच्च नेति चेन्न । | |||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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अर्भकौकस्त्वेन चक्षुर्मयत्वादिरूपेण च तस्यैव विष्णोर्निचाय्यत्वात् । | |||
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{{Bhashyam | |||
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सर्वगतत्वेऽप्यल्पौकस्त्वं च युज्यते, व्योमवत् ।‘सर्वेन्द्रियमयो विष्णुः सर्वप्राणिषु च स्थितः ।सर्वनामाभिधेयश्च सर्ववेदोदितश्च सः’ इति स्कान्दे ॥ 07 ॥ | |||
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| Line 183: | Line 170: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ओम् ॥ 08-39 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 198: | Line 185: | ||
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| text = | | text = | ||
‘जीवपरयोरेकशरीरस्थत्वे | ‘जीवपरयोरेकशरीरस्थत्वे समानभोगप्राप्तिः ? इति चेन्न । सामर्थ्य वैशेष्यात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 205: | Line 192: | ||
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उक्तं च गारुडे‘सर्वज्ञाल्पज्ञताभेदात् सर्वशक्त्यल्पशक्तितः ।स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां सम्भोगो नेशजीवयोः’ इति च ॥08॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 216: | Line 202: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अत्ताचराचरग्रहणात् ओम् ॥ 09-40 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 224: | Line 210: | ||
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‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्तम् । तत्रात्तृत्वं, | ‘जन्माद्यस्य यतः’(ब्र.सू.१.१.२) इत्युक्तम् । तत्रात्तृत्वं,‘स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत । सर्वां वा अत्तीति तददितेरदितित्वम्’(बृ.उ.३.२.५) इत्यदितेः प्रतीयते । | ||
‘स यद्यदेवासृजत’ इति पुल्लिङ्गम् च ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(भ.गी.१५.१६)इतिवत् (इत्यादिवत्) । अत्रोच्यते – | |||
‘स यद्यदेवासृजत’ इति पुल्लिङ्गम् च ‘कूटस्थोऽक्षर | |||
}} | }} | ||
| Line 233: | Line 218: | ||
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| text = | | text = | ||
न हि चराचरस्य | न हि चराचरस्य= सर्वस्य अत्तृत्वमदितेः । | ||
}} | }} | ||
| Line 245: | Line 230: | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘एकः पुरस्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः ।यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृतमिहायुषेऽत्तु देवः’ इति श्रुतिः ॥ 09 ॥ | ‘एकः पुरस्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः ।यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृतमिहायुषेऽत्तु देवः’ इति श्रुतिः ॥ 09 ॥ | ||
| Line 255: | Line 240: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं प्रकरणाच्च ओम् ॥ 01-02-10 ॥ | ||
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}} | }} | ||
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अप्संवत्सरसृष्ट्यादिना तत्प्रकरणाच्च । | अप्संवत्सरसृष्ट्यादिना तत्प्रकरणाच्च(प्रकरणत्वाच्च) । | ||
‘नेहाऽसीत् किञ्चनाप्यादौ मृत्युरासीद्धरिस्तदा ।सोऽत्मनो मनसाऽस्राक्षीद् अप एव जनार्दनः’ ॥ | |||
शयानस्तासु भगवान् निर्ममेऽण्डं महत्तरम् ।तत्र संवत्सरं नाम ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः ॥तमत्तुं व्याददादास्यं तदाऽसौ विरुराव ह ॥ | |||
अथ तं(तत्) कृपया विष्णुः सृष्टिकर्मण्ययोजयत् ।सोऽसृजद्भुवनं विश्वमद्यार्थं हरये विभुःइति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 10 ॥ | |||
शयानस्तासु | |||
}} | }} | ||
| Line 311: | Line 268: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ओम् ॥ 01-02-11 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 320: | Line 277: | ||
| text = | | text = | ||
सर्वात्रैकः परः उक्तः । | सर्वात्रैकः परः उक्तः । | ||
‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । | ‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायाऽऽतपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः’ ।(क.उ.१.३.१) इति पिबन्तौ प्रतीयेते, तौ कौ ? इति । उच्यते । | ||
}} | }} | ||
| Line 334: | Line 291: | ||
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| text = | | text = | ||
‘घर्मा समन्ता त्रिवृतं | ‘घर्मा समन्ता त्रिवृतं व्यापतुः तयोर्जुष्टिं मातरिश्वा जगाम’(ऋ.सं.१०.११४.११) इत्यादिना तद्दर्शनात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 348: | Line 305: | ||
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| text = | | text = | ||
‘शुभं पिबत्यसौ नित्यं नाशुभं स हरिः पिबेत् ।पूर्णानन्दमयस्यास्य चेष्टा न ज्ञायते क्वचित्’इति पाद्मे | ‘शुभं पिबत्यसौ नित्यं नाशुभं स हरिः पिबेत् ।पूर्णानन्दमयस्यास्य चेष्टा न ज्ञायते क्वचित्’इति पाद्मे ॥‘यो वेद निहितं गुहायाम्’(तै.उ.२.१) इत्यादिना प्रसिद्धं ‘हि’शब्देन दर्शयति ॥ 11 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 363: | Line 313: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं विशेषणाच्च ओम् ॥ 01-02-12 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 378: | Line 328: | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B1 | | id = BS_C01_S02_V12_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म तत्परम्’ इति । | ‘यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म तत्परम्’(क.उ.१.३.२) इति । | ||
}} | }} | ||
| Line 385: | Line 335: | ||
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| text = | | text = | ||
‘पृथग् वक्तुं गुणास्तस्य न शक्यन्तेऽमितत्वतः | ‘पृथग् वक्तुं गुणास्तस्य न शक्यन्तेऽमितत्वतः ।यतोऽतो ब्रह्मशब्देन सर्वेषां ग्रहणं भवेत्’ ॥ | ||
एतस्माद्ब्रह्मशब्दोऽयं विष्णोरेव विशेषणम् ।अमिता हि गुणा यस्मान्नान्येषां तमृते विभुम्’(प्रभुम्) ॥ इति ब्राह्मे । | |||
एतस्माद्ब्रह्मशब्दोऽयं विष्णोरेव विशेषणम् | |||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
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| text = | | text = | ||
न च जीवे समन्वयोऽभिधीयते । | न च जीवे समन्वयोऽभिधीयते । | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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‘सत्य आत्मा, सत्यो जीवः, सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा, मैवाऽरुवण्यो मैवाऽरुवण्यो मैवाऽरुवण्यः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।‘आत्मा हि परमः स्वतन्त्रोऽधिगुणः, जीवोऽल्पशक्तिरस्वतन्त्रोऽवरः’ इति च भाल्लवेयश्रुतिः । | |||
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‘यथेश्वरस्य जीवस्य भेदः सत्यो विनिश्चयात् ।एवमेव हि मे वाचं सत्यां कर्तुमिहार्हसि’ ॥ | |||
‘यथेश्वरश्च जीवश्च सत्यभेदौ परस्परम् ।तेन सत्येन मां देवास्त्रायन्तु सहकेशवाः ॥’इत्यदेर्नासत्यो भेदः ॥ 12 ॥ | |||
}} | }} | ||
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‘आदित्ये विष्णुः’ इत्युक्तम् ।‘य एष आदित्ये पुरुषः सोऽहमस्मि, स एवाहमस्मि’(छां.उ.४.११) इत्यादावग्नीनामेवाऽदित्यस्थत्वमुच्यते । | |||
अतोऽक्ष्यादित्ययोरैक्याद्,‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यत’(छां.उ.४.१५) इत्यत्राप्यग्निरेवोच्यते । | |||
अतः तत् ‘यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्ते, एवम् एवंविधि पापं कर्म न श्लिष्यते’(छां.उ.४.१४.३) इत्यग्निज्ञानादेव सर्वपापश्लेषात् मोक्षोपपत्तिरिति । अतोऽब्रवीत् (ब्रवीति) – | |||
}} | }} | ||
| Line 467: | Line 385: | ||
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| text = | | text = | ||
चक्षुरन्तस्थो विष्णुरेव।‘त्रिपादस्यामृतं | चक्षुरन्तस्थो विष्णुरेव।‘त्रिपादस्यामृतं दिवि’(ऋ.सं.१०.९०.३)इत्यादिना तस्यैवामृतत्वाद्युपपत्तेः। | ||
}} | }} | ||
| Line 474: | Line 392: | ||
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| text = | | text = | ||
ब्रह्मशब्दाद्युपपत्तेश्च ।‘सोऽहमस्मि’(छां.उ.४.११.१) इत्यादि त्वन्तर्याम्यपेक्षया । | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘तद्यदस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति’ इत्यादिस्थानशक्तिः | ‘तद्यदस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति’(छां.उ.४.१५.१) इत्यादिस्थानशक्तिः, ‘वामनिः, भामनिः’(छां.उ.४.१५.३-४) इत्याद्यात्मशक्तिश्चोच्यते । तस्य ह्येत्यल्लिङ्गम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 504: | Line 422: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स ईशः सोऽसपत्नः स हरिः स परः स परोवरीयान् यदिदं चक्षुषि सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति स वामनः स भामनः स आनन्दः सोऽच्युतः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् । | |||
}} | }} | ||
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}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’ इति,‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ | ‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छां.उ.४.१०.५) इति,‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृ.उ.५.९.२८)‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६) इत्यादेस्तस्यैव हि लक्षणम् । | ||
‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’ इत्यादेस्तस्यैव हि लक्षणम् । | |||
}} | }} | ||
| Line 535: | Line 452: | ||
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| text = | | text = | ||
‘लक्षणं परमानन्दो विष्णोरेव न संशयः ।अव्यक्तादितृणान्तास्तु | ‘लक्षणं परमानन्दो विष्णोरेव न संशयः ।अव्यक्तादितृणान्तास्तु विप्लु(विपृ)डानन्दभागिनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 542: | Line 459: | ||
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| text = | | text = | ||
न च मुख्ये | न च मुख्ये सति अमुख्यं युज्यते ॥ 15 ॥ | ||
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| Line 550: | Line 467: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ओम् ॥ 01-02-16 ॥ | ||
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| Line 558: | Line 475: | ||
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‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति । न ह्यन्यविद्यया अन्यगतिर्युक्ता ॥16॥ | ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’(छां.उ.४.१५.५) इति । न ह्यन्यविद्यया अन्यगतिर्युक्ता ॥16॥ | ||
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| Line 566: | Line 483: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ओम् ॥ 01-02-17॥ | ||
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| text = | | text = | ||
जीवस्य जीवान्तरनियामकत्वेऽनवस्थितेः, साम्यादसम्भवाच्च न जीवः । नियमप्रमाणाभावात् । अनीश्वरापेक्षत्वाच्च ॥ 17 ॥ | जीवस्य जीवान्तरनियामकत्वेऽनवस्थितेः, साम्यादसम्भवाच्च न जीवः । नियमप्रमाणाभावात्(नियमे प्रमाणाभावात्) । अनीश्वरापेक्षत्वाच्च ॥ 17 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 591: | Line 508: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-02-18 ॥ | ||
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| Line 599: | Line 516: | ||
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‘यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ | ‘यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.उ.५.७.३) इत्यादिना अन्तर्याम्युच्यते । | ||
तत्र च ‘एतदमृतम्’ इत्युक्तममृतत्वमुच्यते । स च ‘यस्य पृथिवी शरीरम्’ इत्यादिना सर्वात्मकत्वात् प्रकृतिस्तत्तज्जीवो वा युक्तः । | तत्र च ‘एतदमृतम्’(छां.उ.४.१५.१) इत्युक्तममृतत्वमुच्यते । स च ‘यस्य पृथिवी शरीरम्’ इत्यादिना सर्वात्मकत्वात् प्रकृतिस्तत्तज्जीवो वा युक्तः । | ||
न हि विष्णोः | न हि विष्णोः पृथिव्यादिशरीरत्वमङ्गीक्रियते ? इत्यत आह – | ||
}} | }} | ||
| Line 608: | Line 525: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यं पृथिवी न वेद’ ‘यः पृथिव्या अन्तरः’, इत्यादिना अधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशाद्विष्णुरेवान्तर्यामी । | ‘यं पृथिवी न वेद’ ‘यः पृथिव्या अन्तरः’(बृ.उ.५.७.३), इत्यादिना अधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशाद्विष्णुरेवान्तर्यामी । | ||
}} | }} | ||
| Line 615: | Line 532: | ||
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| text = | | text = | ||
स | स हि‘न ते विष्णो चायमानो न जातः’(ऋ.सं.७.९९.२) | ||
‘स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः सर्वेषां भूतामन्तरपुरुष’ इत्यादिनाऽविदितोऽन्तरश्च ॥ 18 ॥ | ‘स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः सर्वेषां भूतामन्तरपुरुष’(ऐ.आ.३.२.४) इत्यादिनाऽविदितोऽन्तरश्च ॥ 18 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 624: | Line 541: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ओम् ॥ 01-02-19 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 640: | Line 557: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ओम् ॥ 01-02-20 ॥ | ||
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| Line 655: | Line 572: | ||
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| text = | | text = | ||
‘य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद | ‘य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्माशरीरं य आत्मानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’‘यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं’(बृ.उ.५.७.२२)इत्युभयेऽपि हि शाखिनो भेदेन एनं (जीवं)अधीयते । | ||
}} | }} | ||
| Line 662: | Line 579: | ||
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| text = | | text = | ||
‘शीर्यते नित्यमेवास्माद्विष्णोस्तु जगदीदृशम् ।रमते च परो ह्यस्मिन् शरीरं तस्य तज्जगत्’ ॥इति वचनान्न शरीरत्वविरोधः ॥20॥ | |||
‘शीर्यते नित्यमेवास्माद्विष्णोस्तु जगदीदृशम् | |||
}} | }} | ||
| Line 695: | Line 589: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ओम् ॥ 01-02-21 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 704: | Line 598: | ||
| text = | | text = | ||
अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः । तत्र – | अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः । तत्र – | ||
‘यत्तदद्रेश्यम्, अग्राह्यम्, अगोत्रम्, अवर्णम्, अचक्षुःश्रोत्रं, तद् अपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः’(मु.उ.१.१.६)इत्युक्त्वा, अतोऽब्रवीत्(ब्रवीति)- | |||
‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः | ‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’(मु.उ.१.१.७) इत्युक्त्वा तस्माच्च ‘अक्षरात्परतः परः’(मु.उ.२.१.२) इति परः प्रतीयत इत्यतोऽब्रवीत्- | ||
}} | }} | ||
| Line 712: | Line 606: | ||
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पृथिव्यादि दृष्टान्तमुक्त्वा‘अक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’ इत्यतः परं तत्परतः पराभिधानात्,‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’ इति स्मृतेश्च प्रकृतेः प्राप्तिः । | पृथिव्यादि दृष्टान्तमुक्त्वा‘अक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’(मु.उ.१.१.७) इत्यतः परं तत्परतः पराभिधानात्,‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(भ.गी.१५.१६) इति स्मृतेश्च प्रकृतेः प्राप्तिः । | ||
}} | }} | ||
| Line 726: | Line 620: | ||
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‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ । | ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’(तै.आ.३.१२.७) । | ||
}} | }} | ||
| Line 733: | Line 627: | ||
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‘तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया’ | ‘तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया’(भाग.४.२९.४९) | ||
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| Line 740: | Line 634: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अथ द्वे वाव विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा | ‘अथ द्वे वाव विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा च। तत्र यो वेदा यान्यङ्गानि यान्युपाङ्गानि यानि प्रत्यङ्गानि साऽपरा । अथ परा यया स हरिर्वेदितव्यो योऽसावदृश्यो निर्गुणः परः परमात्मा’(मु.उ.१.१.४-५)इत्यादिना तद्धर्मत्वेनावगतपरविद्याविषयत्वोक्तेर्विष्णुरेवादृश्यत्वादि गुणकः ॥ 21 ॥ | ||
अथ परा यया स हरिर्वेदितव्यो योऽसावदृश्यो निर्गुणः परः | |||
}} | }} | ||
| Line 749: | Line 642: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां नेतरौ ओम् ॥ 01-02-22 ॥ | ||
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| Line 757: | Line 650: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप’ इति विशेषणान्न प्रकृतिः | ‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप’(मु.उ.१.१.९) इति विशेषणान्न प्रकृतिः । ‘तस्मादेतत्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते’(मु.उ.१.१.९) इति भेदव्यपदेशान्न विरिञ्चः । | ||
}} | }} | ||
| Line 764: | Line 657: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका । श्रीः परा प्रकृतिः प्रोक्ता चेतना विष्णुसंश्रया ॥तामक्षरं परं प्राहुः परतः परमक्षरम् । | ‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका । श्रीः परा प्रकृतिः प्रोक्ता चेतना विष्णुसंश्रया ॥तामक्षरं परं प्राहुः परतः परमक्षरम् । हरिमैवाखिलगुणमक्षरत्रयमीरितम्’॥इति स्कान्दे त्र्यक्षराभिधानात् ‘अक्षरात् परतः परः’(मु.उ.२.१.२) इत्यपि विशेषणमेव । | ||
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‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः’ | ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः’(मु.उ.३.१.२)इति भेदव्यपदेशादीशपदप्राप्तोऽपि न रुद्रः ॥ 22 ॥ | ||
इति भेदव्यपदेशादीशपदप्राप्तोऽपि न रुद्रः ॥ 22 ॥ | |||
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‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ इति | ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’(मु.उ.३.१.३) इति | ||
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| text = | | text = | ||
तस्य हैतस्य परमस्य नारायणस्य चत्वारि रूपाणि शुक्लं रक्तं रौक्मं कृष्णमिति । स | तस्य हैतस्य परमस्य नारायणस्य चत्वारि रूपाणि शुक्लं रक्तं रौक्मं कृष्णमिति । स एतान्येतेभ्योऽभ्य(व्य)चीक्लृपत् । विमिश्राणि व्यमिश्रयत् । अत एतादृगेतद्रूपम् इति तस्यैव हि रूपाण्यभिधीयन्ते ॥ 32 ॥ | ||
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=== | === वैश्वानराधिकरणम् === | ||
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अदृश्यत्वादिगुणेषु सर्वगतत्वं | अदृश्यत्वादिगुणेषु सर्वगतत्वं | ||
‘यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते’ इति वैश्वानरस्योक्तमित्यत आह – | ‘यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते’(छां.उ.५.१८.१) इति वैश्वानरस्योक्तमित्यत आह – | ||
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अग्नाविष्ण्वोः साधारणस्य वैश्वानरशब्दस्य विष्णावेव | अग्नाविष्ण्वोः साधारणस्य वैश्वानरशब्दस्य विष्णावेव प्रसिद्धात्मशब्देन विशेषणाद्वैश्वानरो विष्णुरेव ॥ 24 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ओम् ॥01-02-25॥ | ||
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‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’ | ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’(भ.गी.१५.१४) | ||
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| text = | | text = | ||
इति स्मर्यमाणमत्रापि स एवोच्यत इत्यस्यानुमापकम् । समाख्यानात् । | इति स्मर्यमाणमत्रापि स एवोच्यत इत्यस्यानुमापकम् । समाख्यानात् । ‘इति’शब्दः समाख्याप्रदर्शकः ॥ 25 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानान्नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशादसम्भवात् पुरुषविधमपि चैनमधीयते ओम् ॥ 26-57 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 881: | Line 766: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अयमग्निर्वैश्वानरः’(बृ.उ.७.९.१)‘वैश्वानरमृत आजातमग्निम्’(ऋ.सं.६.७.१) इत्यादिशब्दः । | |||
}} | }} | ||
| Line 888: | Line 773: | ||
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| text = | | text = | ||
‘वैश्वानरे | ‘वैश्वानरे तद्धुतं भवति’(छां.उ.५.२४.४)‘हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः’(छां.उ.५.१८.२) इत्याद्यग्निलिङ्गमादिशब्दोक्तम्। | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘येनेदमन्नं | ‘येनेदमन्नं पच्यते’(बृ.उ.७.९.१)‘तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम्’(छां.उ.५.१९.१) इत्यादिना पाचकत्वेनान्तः प्रतिष्ठानं च प्रतीयते । तस्मान्न विष्णुरिति चेन्न । | ||
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‘अथ हेममात्मानमणोरणीयांसं परतः परं विश्वं | ‘अथ हेममात्मानमणोरणीयांसं परतः परं विश्वं हरिमुपासीत’ इति । ‘सर्वनामा सर्वकर्मा सर्वलिङ्गः सर्वगुणः सर्वकामः सर्व धर्मः सर्वरूप’ इति। ‘स य एतमेवमात्मानं विश्वं हरिमारादरमुपास्ते तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेषु देवेषु सर्वषुवेदेषु कामचारो भवति’ इति तत्तन्नामलिङ्गादिना तस्यैव दृष्ट्युपदेशान्महोपनिषदि ॥ | ||
‘अनात्तत्वादनात्मान ऊनत्वाद्गुणराशितः ।अब्रह्माणः परे सर्वे ब्रह्मात्म विष्णुरेव हि’॥ | |||
इत्यादिना ‘को न आत्मा, किं ब्रह्म’(छां.उ.५.११.१) इत्यारम्भाच्च अन्येषामसम्भवाद्विष्णुरेव वैश्वानरः । | |||
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‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत’(तै.आ.३.१२,ऋ.सं.१०.९०.१३) इत्यादिना यः पुरुषाख्यो विष्णुरभहितस्तद्विधमेवात्र ‘मूर्धैव सुतेजाः, चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मा’(छां.उ.५.१८.२)इत्यादिनैनं वैश्वानरमधीयते । ‘च’शब्देन सकलवेदतन्त्रपुराणादिषु विष्णुपरत्वं पुरुषसूक्तस्य दर्शयति । तथा च ब्राह्मे – | |||
‘यथैव पौरुषं सूक्तं नित्यं विष्णुपरायणम् ।तथैव मे मनो नित्यं भूयाद्विष्णुपरायणम्’ इति ॥ | |||
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इति | चतुर्वेदशिखायां च‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’(ऋ.सं.१०.९०.१) इति ।‘एष ह्येवाचिन्त्यः परः परमो हरिरादिरनादिरनन्तोऽनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तबाहुरनन्त गुणोऽनन्तरूपः’ इति । बृहत्संहितायां च-‘यथा हि पौरुषं सूक्तं विष्णोरेवाभिधायकम् ।न तथा सर्ववेदाश्च वेदाङ्गानि च नारद’ इत्यादि ॥ | ||
}} | }} | ||
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‘यस्माद्यज्जायते चाङ्गाल्लोकवेदादिकं हरेः ।तन्नामवाच्यमङ्गं तद्यथा ब्रह्मादिकं | ‘यस्माद्यज्जायते चाङ्गाल्लोकवेदादिकं हरेः ।तन्नामवाच्यमङ्गं तद्यथा ब्रह्मादिकं मुखम् ॥’इति नारदीयवचनात् नाभेदोक्तिविरोधः ॥ 26 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अत एव न देवता भूतं च ओम् ॥ 01-02-27॥ | ||
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}} | }} | ||
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अग्निवैश्वानरादिशब्दस्तेजसि भूते अग्निदेवतायां च | अग्निवैश्वानरादिशब्दस्तेजसि भूते अग्निदेवतायां च प्रसिद्धोऽपि अतः= पूर्वोक्तहेतुत एव अत्र न सा तच्चाभिधीयते ॥ 27 ॥ | ||
}} | }} | ||
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नाग्न्यादयः शब्दा अग्न्यादिवाचकास्तथापि साक्षादेवानन्ययोगेन | नाग्न्यादयः शब्दा अग्न्यादिवाचकास्तथापि साक्षादेवानन्ययोगेन ब्रह्मवाचकैः व्यवहारार्थमनभिज्ञानाच्चान्यत्र व्यवहारन्तीत्यभ्युपगमेऽविरोधं जैमिनिर्वक्ति । | ||
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‘व्यासचित्तस्थिताकाशादवच्छिन्नानि कानिचित् | ‘व्यासचित्तस्थिताकाशादवच्छिन्नानि कानिचित् ।अन्ये व्यवहरन्त्येतान्यूरीकृत्य गृहादिवत्’ ॥इति स्कान्दवचनान्न मतानां परस्परविरोधः ॥ 28 ॥ | ||
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तत्रोक्तस्य विष्णोरग्न्यादिष्वनुस्मर्यमाणत्वात् तन्नियमः इति बादरिः ॥ 30 ॥ | |||
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साक्षादप्यविरोधं वदन् जैमिनिः सूक्तादिनियममग्न्यादि सम्प्राप्त्या | साक्षादप्यविरोधं वदन् जैमिनिः सूक्तादिनियममग्न्यादि सम्प्राप्त्या मन्यते-‘तं यथा यथोपासते तदेव भवति’(शत. ब्रा.१०.५.२.२०) इति दर्शयति ॥ 31 ॥ | ||
‘तं यथा यथोपासते तदेव भवति’ इति दर्शयति ॥ 31 ॥ | |||
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न ह्यन्योपासकोऽन्यं प्राप्नुत इति युज्यत इत्यत आह | |||
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॥ इति | ॥ इति वैश्वानराधिकरणम् ॥ 07 ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 01-02 ॥ | |||
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एनं | एनं= विष्णुम् अस्मिन्= अग्न्यादौ आमनन्ति ।‘योऽग्नौ तिष्ठन्’(बृ.उ.५.७.५),‘य एष एतस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः’ इत्यादिना ॥ 32 ॥ | ||
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Revision as of 09:38, 10 April 2026
लिङ्गात्मकानां शब्दानां विष्णौ प्रवृत्तिं दर्शयति अस्मिन् पादे प्राधान्येन । ‘ब्रह्म ततमम्’(ऐ.आ.२.४.३)इति सर्वगतत्वमुक्तं विष्णोः । तच्च‘तस्यैतस्यासावादित्यो रसः’(ऐ.आ.३.२.३) इत्यादिनाऽऽदित्यस्य प्रतीयत इत्यतोऽब्रवीत् ।
सर्वगतत्वाधिकरणम्
ओं सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ओम् ॥ 01-02-01 ॥
‘स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा’(ऐ.आ.३.२.४)इत्यादिना सर्वत्रोच्यमानो नारायण एव । ‘तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.१.६),‘परमं यो महद्ब्रह्म’(म.भा.१३.२५४.९)(विष्णुसहस्रनाम),‘वासुदेवात् परः को नु ब्रह्मशब्दोदितो भवेत् ।स हि सर्वगुणैः पूर्णस्तदन्ये तूपचारतः’ ॥
इति तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दोपदेशात् ॥ 01 ॥
ओं विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ओम् ॥ 01-02-02 ॥
‘स योऽतोऽश्रुतः’(ऐ.आ.३.२.४) इत्यादि । स हि‘न ते विष्णो जायमानः’(ऋ.सं.७.९९.२) इत्यादिनाऽश्रुतत्वादिगुणकः(गुणः) ।‘स सविता स वायुः स इन्द्रः सोऽश्रुतः सोऽदृष्टो यो हरिर्यः परमो यो विष्णुर्योऽनन्तः’ इत्यादि चतुर्वेदशिखायाम् ॥02॥
ओम् अनुपपत्तेस्तुन शारीरः ओम् ॥ 01-02-03 ॥
न चादित्यशब्दाच्चक्षुर्मयत्वादेश्च जीव इति वाच्यम् ।
एकस्य सर्वशरीरस्थत्वानुपपत्तेरेव ॥ 03 ॥
ओं कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ओम् ॥ 01-02-04 ॥
‘आत्मानां परस्मै शंसति’(ऐ.आ.३.२.३) इत्यादि ॥04॥
ओं शब्दविशेषात् ओम् ॥ 05-36 ॥
‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’(ऐ.आ.३.२.३) इति । न हि जीवमेव ब्रह्मेत्याचक्षते ।
‘एष उ एव ब्रह्मैष उ एवात्मैष उ एव सवितैष उ एवेन्द्र एष उ एव हरिर्हरति परः परानन्दः’ इति चेन्द्रद्युम्नशाखायाम् ॥ 05 ॥
ओं स्मृतेश्च ओम् ॥ 01-02-06 ॥
‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’(भ.गी.१०.२०),‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’(भ.गी.१५.१३) इत्यादि ।
न चाप्रामाणिकं कल्प्यम् ॥ 06 ॥
ओम् अर्भकौकस्त्वात् तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च ओम् ॥01-02-07 ॥
‘सर्वेषु भूतेषु’ इति अल्पौकस्त्वात्, चक्षुर्मयत्वादिना जीवव्यपदेशाच्च नेति चेन्न ।
अर्भकौकस्त्वेन चक्षुर्मयत्वादिरूपेण च तस्यैव विष्णोर्निचाय्यत्वात् ।
सर्वगतत्वेऽप्यल्पौकस्त्वं च युज्यते, व्योमवत् ।‘सर्वेन्द्रियमयो विष्णुः सर्वप्राणिषु च स्थितः ।सर्वनामाभिधेयश्च सर्ववेदोदितश्च सः’ इति स्कान्दे ॥ 07 ॥
ओं सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ओम् ॥ 08-39 ॥
॥ इति सर्वगतत्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘जीवपरयोरेकशरीरस्थत्वे समानभोगप्राप्तिः ? इति चेन्न । सामर्थ्य वैशेष्यात् ।
उक्तं च गारुडे‘सर्वज्ञाल्पज्ञताभेदात् सर्वशक्त्यल्पशक्तितः ।स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां सम्भोगो नेशजीवयोः’ इति च ॥08॥
अत्तृत्वाधिकरणम्
ओम् अत्ताचराचरग्रहणात् ओम् ॥ 09-40 ॥
‘जन्माद्यस्य यतः’(ब्र.सू.१.१.२) इत्युक्तम् । तत्रात्तृत्वं,‘स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत । सर्वां वा अत्तीति तददितेरदितित्वम्’(बृ.उ.३.२.५) इत्यदितेः प्रतीयते ।
‘स यद्यदेवासृजत’ इति पुल्लिङ्गम् च ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(भ.गी.१५.१६)इतिवत् (इत्यादिवत्) । अत्रोच्यते –
न हि चराचरस्य= सर्वस्य अत्तृत्वमदितेः ।
‘स्रष्टा पाता तथैवात्ता निखिलस्यैक एव तु । वासुदेवः परः पुंसामितरेऽल्पस्य वा न वा’ इति स्कान्दे ।
‘एकः पुरस्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः ।यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृतमिहायुषेऽत्तु देवः’ इति श्रुतिः ॥ 09 ॥
ओं प्रकरणाच्च ओम् ॥ 01-02-10 ॥
॥ इति अत्तृत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥
अप्संवत्सरसृष्ट्यादिना तत्प्रकरणाच्च(प्रकरणत्वाच्च) ।
‘नेहाऽसीत् किञ्चनाप्यादौ मृत्युरासीद्धरिस्तदा ।सोऽत्मनो मनसाऽस्राक्षीद् अप एव जनार्दनः’ ॥ शयानस्तासु भगवान् निर्ममेऽण्डं महत्तरम् ।तत्र संवत्सरं नाम ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः ॥तमत्तुं व्याददादास्यं तदाऽसौ विरुराव ह ॥
अथ तं(तत्) कृपया विष्णुः सृष्टिकर्मण्ययोजयत् ।सोऽसृजद्भुवनं विश्वमद्यार्थं हरये विभुःइति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 10 ॥गुहाधिकरणम्
ओं गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ओम् ॥ 01-02-11 ॥
सर्वात्रैकः परः उक्तः ।
‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायाऽऽतपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः’ ।(क.उ.१.३.१) इति पिबन्तौ प्रतीयेते, तौ कौ ? इति । उच्यते ।
गुहां प्रविष्टौ पिबन्तौ विष्णुरूपे एव ।
‘घर्मा समन्ता त्रिवृतं व्यापतुः तयोर्जुष्टिं मातरिश्वा जगाम’(ऋ.सं.१०.११४.११) इत्यादिना तद्दर्शनात् ।
‘आत्माऽन्तरात्मेति हरिरेक एव द्विधा स्थितः ।निविष्टो हृदयेनित्यं रसं पिबति कर्मजम्इति बृहत्संहितायाम् ।
‘शुभं पिबत्यसौ नित्यं नाशुभं स हरिः पिबेत् ।पूर्णानन्दमयस्यास्य चेष्टा न ज्ञायते क्वचित्’इति पाद्मे ॥‘यो वेद निहितं गुहायाम्’(तै.उ.२.१) इत्यादिना प्रसिद्धं ‘हि’शब्देन दर्शयति ॥ 11 ॥
ओं विशेषणाच्च ओम् ॥ 01-02-12 ॥
॥ इति गुहाधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म तत्परम्’(क.उ.१.३.२) इति ।
‘पृथग् वक्तुं गुणास्तस्य न शक्यन्तेऽमितत्वतः ।यतोऽतो ब्रह्मशब्देन सर्वेषां ग्रहणं भवेत्’ ॥
एतस्माद्ब्रह्मशब्दोऽयं विष्णोरेव विशेषणम् ।अमिता हि गुणा यस्मान्नान्येषां तमृते विभुम्’(प्रभुम्) ॥ इति ब्राह्मे ।
न च जीवे समन्वयोऽभिधीयते ।
‘सत्य आत्मा, सत्यो जीवः, सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा, मैवाऽरुवण्यो मैवाऽरुवण्यो मैवाऽरुवण्यः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।‘आत्मा हि परमः स्वतन्त्रोऽधिगुणः, जीवोऽल्पशक्तिरस्वतन्त्रोऽवरः’ इति च भाल्लवेयश्रुतिः ।
‘यथेश्वरस्य जीवस्य भेदः सत्यो विनिश्चयात् ।एवमेव हि मे वाचं सत्यां कर्तुमिहार्हसि’ ॥
‘यथेश्वरश्च जीवश्च सत्यभेदौ परस्परम् ।तेन सत्येन मां देवास्त्रायन्तु सहकेशवाः ॥’इत्यदेर्नासत्यो भेदः ॥ 12 ॥
इत्यन्तराधिकरणम्
ओम् अन्तर उपपत्तेः ओम् ॥ 01-02-13 ॥
‘आदित्ये विष्णुः’ इत्युक्तम् ।‘य एष आदित्ये पुरुषः सोऽहमस्मि, स एवाहमस्मि’(छां.उ.४.११) इत्यादावग्नीनामेवाऽदित्यस्थत्वमुच्यते ।
अतोऽक्ष्यादित्ययोरैक्याद्,‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यत’(छां.उ.४.१५) इत्यत्राप्यग्निरेवोच्यते ।अतः तत् ‘यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्ते, एवम् एवंविधि पापं कर्म न श्लिष्यते’(छां.उ.४.१४.३) इत्यग्निज्ञानादेव सर्वपापश्लेषात् मोक्षोपपत्तिरिति । अतोऽब्रवीत् (ब्रवीति) –
चक्षुरन्तस्थो विष्णुरेव।‘त्रिपादस्यामृतं दिवि’(ऋ.सं.१०.९०.३)इत्यादिना तस्यैवामृतत्वाद्युपपत्तेः।
ब्रह्मशब्दाद्युपपत्तेश्च ।‘सोऽहमस्मि’(छां.उ.४.११.१) इत्यादि त्वन्तर्याम्यपेक्षया ।
‘अन्तर्यामिणमीशेशमपेक्ष्याहं त्वमित्यपि ।सर्वे शब्दाः प्रयुज्यन्ते सति भेदेऽपि वस्तुषु’ इति महाकौर्मे ॥ 13 ॥
ओं स्थानादिव्यपदेशाच्च ओम् ॥ 01-02-14 ॥
‘तद्यदस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति’(छां.उ.४.१५.१) इत्यादिस्थानशक्तिः, ‘वामनिः, भामनिः’(छां.उ.४.१५.३-४) इत्याद्यात्मशक्तिश्चोच्यते । तस्य ह्येत्यल्लिङ्गम् ।
‘स ईशः सोऽसपत्नः स हरिः स परः स परोवरीयान् यदिदं चक्षुषि सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति स वामनः स भामनः स आनन्दः सोऽच्युतः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ।
‘यत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुभिः । स वामनः परोऽस्माकं गतिरित्येव चिन्तयेत्’ इति वामने ॥ 14 ॥
ओं सुखविशिष्टाभिधानादेव च ओम् ॥ 01-02-15 ॥
‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छां.उ.४.१०.५) इति,‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृ.उ.५.९.२८)‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६) इत्यादेस्तस्यैव हि लक्षणम् ।
‘लक्षणं परमानन्दो विष्णोरेव न संशयः ।अव्यक्तादितृणान्तास्तु विप्लु(विपृ)डानन्दभागिनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥
न च मुख्ये सति अमुख्यं युज्यते ॥ 15 ॥
ओं श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ओम् ॥ 01-02-16 ॥
‘स एनान् ब्रह्म गमयति’(छां.उ.४.१५.५) इति । न ह्यन्यविद्यया अन्यगतिर्युक्ता ॥16॥
ओम् अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ओम् ॥ 01-02-17॥
॥ इत्यन्तराधिकरणम् ॥
जीवस्य जीवान्तरनियामकत्वेऽनवस्थितेः, साम्यादसम्भवाच्च न जीवः । नियमप्रमाणाभावात्(नियमे प्रमाणाभावात्) । अनीश्वरापेक्षत्वाच्च ॥ 17 ॥
इत्यन्तर्याम्यधिकरणम्
ओम् अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ओम् ॥ 01-02-18 ॥
‘यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.उ.५.७.३) इत्यादिना अन्तर्याम्युच्यते ।
तत्र च ‘एतदमृतम्’(छां.उ.४.१५.१) इत्युक्तममृतत्वमुच्यते । स च ‘यस्य पृथिवी शरीरम्’ इत्यादिना सर्वात्मकत्वात् प्रकृतिस्तत्तज्जीवो वा युक्तः ।न हि विष्णोः पृथिव्यादिशरीरत्वमङ्गीक्रियते ? इत्यत आह –
‘यं पृथिवी न वेद’ ‘यः पृथिव्या अन्तरः’(बृ.उ.५.७.३), इत्यादिना अधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशाद्विष्णुरेवान्तर्यामी ।
स हि‘न ते विष्णो चायमानो न जातः’(ऋ.सं.७.९९.२)
‘स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः सर्वेषां भूतामन्तरपुरुष’(ऐ.आ.३.२.४) इत्यादिनाऽविदितोऽन्तरश्च ॥ 18 ॥
ओं न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ओम् ॥ 01-02-19 ॥
त्रिगुणत्वादिप्रधानधर्मानुक्तेर्न स्मृत्युक्तं प्रधानमन्तर्यामि ॥19॥
ओं शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ओम् ॥ 01-02-20 ॥
॥ इत्यन्तर्याम्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
‘य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्माशरीरं य आत्मानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’‘यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं’(बृ.उ.५.७.२२)इत्युभयेऽपि हि शाखिनो भेदेन एनं (जीवं)अधीयते ।
‘शीर्यते नित्यमेवास्माद्विष्णोस्तु जगदीदृशम् ।रमते च परो ह्यस्मिन् शरीरं तस्य तज्जगत्’ ॥इति वचनान्न शरीरत्वविरोधः ॥20॥
अदृश्यत्वाधिकरणम्
ओम् अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ओम् ॥ 01-02-21 ॥
अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः । तत्र –
‘यत्तदद्रेश्यम्, अग्राह्यम्, अगोत्रम्, अवर्णम्, अचक्षुःश्रोत्रं, तद् अपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः’(मु.उ.१.१.६)इत्युक्त्वा, अतोऽब्रवीत्(ब्रवीति)-‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’(मु.उ.१.१.७) इत्युक्त्वा तस्माच्च ‘अक्षरात्परतः परः’(मु.उ.२.१.२) इति परः प्रतीयत इत्यतोऽब्रवीत्-
पृथिव्यादि दृष्टान्तमुक्त्वा‘अक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’(मु.उ.१.१.७) इत्यतः परं तत्परतः पराभिधानात्,‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(भ.गी.१५.१६) इति स्मृतेश्च प्रकृतेः प्राप्तिः ।
ब्रह्मशब्दात् तत्परतः पराभिध्यानादेव च हिरण्यगर्भस्य ।
‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’(तै.आ.३.१२.७) ।
‘तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया’(भाग.४.२९.४९)
‘अथ द्वे वाव विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा च। तत्र यो वेदा यान्यङ्गानि यान्युपाङ्गानि यानि प्रत्यङ्गानि साऽपरा । अथ परा यया स हरिर्वेदितव्यो योऽसावदृश्यो निर्गुणः परः परमात्मा’(मु.उ.१.१.४-५)इत्यादिना तद्धर्मत्वेनावगतपरविद्याविषयत्वोक्तेर्विष्णुरेवादृश्यत्वादि गुणकः ॥ 21 ॥
ओं विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां नेतरौ ओम् ॥ 01-02-22 ॥
‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप’(मु.उ.१.१.९) इति विशेषणान्न प्रकृतिः । ‘तस्मादेतत्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते’(मु.उ.१.१.९) इति भेदव्यपदेशान्न विरिञ्चः ।
‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका । श्रीः परा प्रकृतिः प्रोक्ता चेतना विष्णुसंश्रया ॥तामक्षरं परं प्राहुः परतः परमक्षरम् । हरिमैवाखिलगुणमक्षरत्रयमीरितम्’॥इति स्कान्दे त्र्यक्षराभिधानात् ‘अक्षरात् परतः परः’(मु.उ.२.१.२) इत्यपि विशेषणमेव ।
‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः’(मु.उ.३.१.२)इति भेदव्यपदेशादीशपदप्राप्तोऽपि न रुद्रः ॥ 22 ॥
ओं रूपोपन्यासाच्च ओम् ॥ 01-02-23 ॥
॥ इति अदृश्यत्वाधिकरणम् ॥
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’(मु.उ.३.१.३) इति
“एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । स मुनिर्भूत्वासमचिन्तयत् । तत एते व्यजायन्त विश्वो हिरण्यगर्भोऽग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्राः” इति ।
तस्य हैतस्य परमस्य नारायणस्य चत्वारि रूपाणि शुक्लं रक्तं रौक्मं कृष्णमिति । स एतान्येतेभ्योऽभ्य(व्य)चीक्लृपत् । विमिश्राणि व्यमिश्रयत् । अत एतादृगेतद्रूपम् इति तस्यैव हि रूपाण्यभिधीयन्ते ॥ 32 ॥
वैश्वानराधिकरणम्
ओं वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ओम् ॥ 01-02-24॥
अदृश्यत्वादिगुणेषु सर्वगतत्वं
‘यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते’(छां.उ.५.१८.१) इति वैश्वानरस्योक्तमित्यत आह –
अग्नाविष्ण्वोः साधारणस्य वैश्वानरशब्दस्य विष्णावेव प्रसिद्धात्मशब्देन विशेषणाद्वैश्वानरो विष्णुरेव ॥ 24 ॥
ओं स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ओम् ॥01-02-25॥
‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’(भ.गी.१५.१४)
इति स्मर्यमाणमत्रापि स एवोच्यत इत्यस्यानुमापकम् । समाख्यानात् । ‘इति’शब्दः समाख्याप्रदर्शकः ॥ 25 ॥
ओं शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानान्नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशादसम्भवात् पुरुषविधमपि चैनमधीयते ओम् ॥ 26-57 ॥
‘अयमग्निर्वैश्वानरः’(बृ.उ.७.९.१)‘वैश्वानरमृत आजातमग्निम्’(ऋ.सं.६.७.१) इत्यादिशब्दः ।
‘वैश्वानरे तद्धुतं भवति’(छां.उ.५.२४.४)‘हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः’(छां.उ.५.१८.२) इत्याद्यग्निलिङ्गमादिशब्दोक्तम्।
‘येनेदमन्नं पच्यते’(बृ.उ.७.९.१)‘तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम्’(छां.उ.५.१९.१) इत्यादिना पाचकत्वेनान्तः प्रतिष्ठानं च प्रतीयते । तस्मान्न विष्णुरिति चेन्न ।
‘अथ हेममात्मानमणोरणीयांसं परतः परं विश्वं हरिमुपासीत’ इति । ‘सर्वनामा सर्वकर्मा सर्वलिङ्गः सर्वगुणः सर्वकामः सर्व धर्मः सर्वरूप’ इति। ‘स य एतमेवमात्मानं विश्वं हरिमारादरमुपास्ते तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेषु देवेषु सर्वषुवेदेषु कामचारो भवति’ इति तत्तन्नामलिङ्गादिना तस्यैव दृष्ट्युपदेशान्महोपनिषदि ॥
‘अनात्तत्वादनात्मान ऊनत्वाद्गुणराशितः ।अब्रह्माणः परे सर्वे ब्रह्मात्म विष्णुरेव हि’॥
इत्यादिना ‘को न आत्मा, किं ब्रह्म’(छां.उ.५.११.१) इत्यारम्भाच्च अन्येषामसम्भवाद्विष्णुरेव वैश्वानरः ।‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत’(तै.आ.३.१२,ऋ.सं.१०.९०.१३) इत्यादिना यः पुरुषाख्यो विष्णुरभहितस्तद्विधमेवात्र ‘मूर्धैव सुतेजाः, चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मा’(छां.उ.५.१८.२)इत्यादिनैनं वैश्वानरमधीयते । ‘च’शब्देन सकलवेदतन्त्रपुराणादिषु विष्णुपरत्वं पुरुषसूक्तस्य दर्शयति । तथा च ब्राह्मे –
‘यथैव पौरुषं सूक्तं नित्यं विष्णुपरायणम् ।तथैव मे मनो नित्यं भूयाद्विष्णुपरायणम्’ इति ॥
चतुर्वेदशिखायां च‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’(ऋ.सं.१०.९०.१) इति ।‘एष ह्येवाचिन्त्यः परः परमो हरिरादिरनादिरनन्तोऽनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तबाहुरनन्त गुणोऽनन्तरूपः’ इति । बृहत्संहितायां च-‘यथा हि पौरुषं सूक्तं विष्णोरेवाभिधायकम् ।न तथा सर्ववेदाश्च वेदाङ्गानि च नारद’ इत्यादि ॥
‘यस्माद्यज्जायते चाङ्गाल्लोकवेदादिकं हरेः ।तन्नामवाच्यमङ्गं तद्यथा ब्रह्मादिकं मुखम् ॥’इति नारदीयवचनात् नाभेदोक्तिविरोधः ॥ 26 ॥
ओम् अत एव न देवता भूतं च ओम् ॥ 01-02-27॥
अग्निवैश्वानरादिशब्दस्तेजसि भूते अग्निदेवतायां च प्रसिद्धोऽपि अतः= पूर्वोक्तहेतुत एव अत्र न सा तच्चाभिधीयते ॥ 27 ॥
ओं साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ओम् ॥ 01-02-28 ॥
नाग्न्यादयः शब्दा अग्न्यादिवाचकास्तथापि साक्षादेवानन्ययोगेन ब्रह्मवाचकैः व्यवहारार्थमनभिज्ञानाच्चान्यत्र व्यवहारन्तीत्यभ्युपगमेऽविरोधं जैमिनिर्वक्ति ।
‘व्यासचित्तस्थिताकाशादवच्छिन्नानि कानिचित् ।अन्ये व्यवहरन्त्येतान्यूरीकृत्य गृहादिवत्’ ॥इति स्कान्दवचनान्न मतानां परस्परविरोधः ॥ 28 ॥
ओम् अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ओम् ॥ 01-02-29 ॥
तत्र तत्र प्रसिद्धावप्यग्न्यादिषु ब्रह्मणोऽभिव्यक्तेरग्न्यादिसूक्तनियम इत्याश्मरथ्यः ॥ 29 ॥
ओम् अनुस्मृतेर्बादरिः ओम् ॥ 01-02-30 ॥
तत्रोक्तस्य विष्णोरग्न्यादिष्वनुस्मर्यमाणत्वात् तन्नियमः इति बादरिः ॥ 30 ॥
ओं सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ओम् ॥ 01-02-31 ॥
साक्षादप्यविरोधं वदन् जैमिनिः सूक्तादिनियममग्न्यादि सम्प्राप्त्या मन्यते-‘तं यथा यथोपासते तदेव भवति’(शत. ब्रा.१०.५.२.२०) इति दर्शयति ॥ 31 ॥
ओम् आमनन्ति चैनमस्मिन् ओम् ॥ 01-02-32 ॥
न ह्यन्योपासकोऽन्यं प्राप्नुत इति युज्यत इत्यत आह
॥ इति वैश्वानराधिकरणम् ॥ 07 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 01-02 ॥
एनं= विष्णुम् अस्मिन्= अग्न्यादौ आमनन्ति ।‘योऽग्नौ तिष्ठन्’(बृ.उ.५.७.५),‘य एष एतस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः’ इत्यादिना ॥ 32 ॥