Bruhadaranyaka/C3/S9: Difference between revisions
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ये ये वराः सुरास्ते तु परेषां महिमात्मकाः । | ये ये वराः सुरास्ते तु परेषां महिमात्मकाः । | ||
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अग्रं विष्णुं नयेद्यस्मात् सुपर्णोऽग्निरुदाहृतः ॥ | अग्रं विष्णुं नयेद्यस्मात् सुपर्णोऽग्निरुदाहृतः ॥ | ||
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प्राणाद्या वायुपुत्रास्तु दश बुद्ध्यभिमानवान् ॥ | प्राणाद्या वायुपुत्रास्तु दश बुद्ध्यभिमानवान् ॥ | ||
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मासाभिमानिनो ये तु यमचंद्रयुता द्विषट् ॥ | मासाभिमानिनो ये तु यमचंद्रयुता द्विषट् ॥ | ||
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स्तनयित्नोरभीमानी वायुजस्त्विंद्र उच्यते ॥ | स्तनयित्नोरभीमानी वायुजस्त्विंद्र उच्यते ॥ | ||
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एवं प्राधान्यतो देवास्त्रयस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः ॥ | एवं प्राधान्यतो देवास्त्रयस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः ॥ | ||
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शारीरो मनुरुद्दिष्टः कामः प्रद्युम्न उच्यते । | शारीरो मनुरुद्दिष्टः कामः प्रद्युम्न उच्यते । | ||
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बुद्धिवृत्त्यपेक्षया बहिः प्रकाशहेतुत्वमपि देव्या न विरुध्यते । इम एव त्रयो लोका इति पूर्वोक्तानां देवानामनुक्तौ कथं लोकमात्रे सर्वदेवानामन्तर्भावः । उक्ताङ्गीकारेऽनन्तर्भावः कथम् । कथं चाग्न्यादिषु । न चावासमात्रमत्र विवक्षितम् । प्रतिशरीरमपि सर्वदेवानामावासान्न लोकादीनां विशेषः । सामर्थ्याधिक्यं चात्र विवक्षितम् । एतेषु हीदं सर्वं षडिति । यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते महिमान एवैषाम् इत्यादिषु षड्गुणोद्रेकादीनामुक्तेः । अन्तर्भावस्य च महिमकारणकत्वोक्तेः । इदं सर्वं गुणषट्कं पूर्णं गुणषट्कमित्यर्थः । इदंशब्दोविवक्षितत्वादयं भगवानितिवत् । एवमेवेदं सर्वमध्यार्ध्नोदिति च । गुणाधिक्येन तदधीनत्वे विवक्षिते निवासत्वादिकमन्तर्भवति । उत्तमानामधिकव्याप्त्यादेः । न तु निवासत्वादौ गुणाधिक्यादिकम् । कथं च तन्महिमत्वेनान्तर्भावमुक्त्वा निवासत्वमात्रेणान्तर्भाव उच्यते । कथं चान्यथा कामादीनां प्रसिद्धमहिमानां स्त्रीमात्रादिकं देवतोच्यते । प्रसिद्धं चैतत् । आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भः आत्मा वै वातः इंद्रो वै देवानामोजिष्ठःब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव अयं वाव शिशुर्योयं मध्यमः प्राणः तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तो यच्छुक्लं तेनेन्द्रः । | बुद्धिवृत्त्यपेक्षया बहिः प्रकाशहेतुत्वमपि देव्या न विरुध्यते । इम एव त्रयो लोका इति पूर्वोक्तानां देवानामनुक्तौ कथं लोकमात्रे सर्वदेवानामन्तर्भावः । उक्ताङ्गीकारेऽनन्तर्भावः कथम् । कथं चाग्न्यादिषु । न चावासमात्रमत्र विवक्षितम् । प्रतिशरीरमपि सर्वदेवानामावासान्न लोकादीनां विशेषः । सामर्थ्याधिक्यं चात्र विवक्षितम् । एतेषु हीदं सर्वं षडिति । यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत् स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते महिमान एवैषाम् इत्यादिषु षड्गुणोद्रेकादीनामुक्तेः । अन्तर्भावस्य च महिमकारणकत्वोक्तेः । इदं सर्वं गुणषट्कं पूर्णं गुणषट्कमित्यर्थः । इदंशब्दोविवक्षितत्वादयं भगवानितिवत् । एवमेवेदं सर्वमध्यार्ध्नोदिति च । गुणाधिक्येन तदधीनत्वे विवक्षिते निवासत्वादिकमन्तर्भवति । उत्तमानामधिकव्याप्त्यादेः । न तु निवासत्वादौ गुणाधिक्यादिकम् । कथं च तन्महिमत्वेनान्तर्भावमुक्त्वा निवासत्वमात्रेणान्तर्भाव उच्यते । कथं चान्यथा कामादीनां प्रसिद्धमहिमानां स्त्रीमात्रादिकं देवतोच्यते । प्रसिद्धं चैतत् । आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भः आत्मा वै वातः इंद्रो वै देवानामोजिष्ठःब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव अयं वाव शिशुर्योयं मध्यमः प्राणः तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तो यच्छुक्लं तेनेन्द्रः । | ||
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अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः । | अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः । | ||
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वायुर्भीमो भीमनादो महौजास्सर्वेषाञ्च प्राणिनां प्राणभूतः । | वायुर्भीमो भीमनादो महौजास्सर्वेषाञ्च प्राणिनां प्राणभूतः । | ||
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क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः वायोरात्मानं कवयो निचिक्युः । | क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः वायोरात्मानं कवयो निचिक्युः । | ||
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आत्मत एष प्राणो जायते । | आत्मत एष प्राणो जायते । | ||
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देवानां देवता वायुर्वायोर्देवो जनार्दनः। | देवानां देवता वायुर्वायोर्देवो जनार्दनः। | ||
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स प्राणमसृजत । प्राणाच्छ्रद्धाम् एतस्माज्जायते प्राणः। | स प्राणमसृजत । प्राणाच्छ्रद्धाम् एतस्माज्जायते प्राणः। | ||
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रुद्रं समाश्रिता देवाः रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः । | रुद्रं समाश्रिता देवाः रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः । | ||
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श्रियः प्रसादं स कुशेशयेशयः श्रितः स चिन्त्यः प्रशशंस शौरिम् इत्यादि च । | श्रियः प्रसादं स कुशेशयेशयः श्रितः स चिन्त्यः प्रशशंस शौरिम् इत्यादि च । | ||
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दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति याज्ञवल्क्यवचनम् । सर्वप्रतिष्ठात्वेन ब्रह्मणोऽपि ज्ञानं भवतीति किं ब्रह्म विद्वानित्यस्य चोत्तरम् । | दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति याज्ञवल्क्यवचनम् । सर्वप्रतिष्ठात्वेन ब्रह्मणोऽपि ज्ञानं भवतीति किं ब्रह्म विद्वानित्यस्य चोत्तरम् । | ||
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यदि दिशो वेत्थ तर्हि किं देवतोऽस्याम् । | यदि दिशो वेत्थ तर्हि किं देवतोऽस्याम् । | ||
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आदित्यस्याश्रयश्चक्षुर्नामा स्वायम्भुवो मनुः । | आदित्यस्याश्रयश्चक्षुर्नामा स्वायम्भुवो मनुः । | ||
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एवं यमस्याश्रयश्च यज्ञमान्यनिरुद्धकः ॥ | एवं यमस्याश्रयश्च यज्ञमान्यनिरुद्धकः ॥ | ||
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अब्देवता सदा चंद्रो वरुणस्य समाश्रयः ॥ | अब्देवता सदा चंद्रो वरुणस्य समाश्रयः ॥ | ||
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...... तस्यैव तु दिगीशितुः ॥ | ...... तस्यैव तु दिगीशितुः ॥ | ||
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मध्यदिक्स्वामिनोऽग्नेश्च स्वाधारो वाग्बृहस्पतिः ॥ | मध्यदिक्स्वामिनोऽग्नेश्च स्वाधारो वाग्बृहस्पतिः ॥ | ||
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तस्याः समाश्रयो रुद्रस्त्वमहञ्चेति रूपवान् ॥ | तस्याः समाश्रयो रुद्रस्त्वमहञ्चेति रूपवान् ॥ | ||
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शिवस्य च तथोमायाः प्राणात्मा शेष आश्रयः । | शिवस्य च तथोमायाः प्राणात्मा शेष आश्रयः । | ||
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तद्गुणानां सुपूर्णानां विप्लुट्कं प्रतिबिम्बितम् । | तद्गुणानां सुपूर्णानां विप्लुट्कं प्रतिबिम्बितम् । | ||
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अहर्ज्ञानमस्य लीनमित्यहर्लीक एवाहल्लिकः । अज्ञेत्याक्षिपति । न हि गृह्यते इत्यादिना ग्रहणशीरणादिषु सर्वप्रमाणाभावं दर्शयति ॥ | अहर्ज्ञानमस्य लीनमित्यहर्लीक एवाहल्लिकः । अज्ञेत्याक्षिपति । न हि गृह्यते इत्यादिना ग्रहणशीरणादिषु सर्वप्रमाणाभावं दर्शयति ॥ | ||
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नेति नेत्यादिरूपेण विज्ञापितगुणोऽपि तु । | नेति नेत्यादिरूपेण विज्ञापितगुणोऽपि तु । | ||
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तदपेक्षां विनैवासौ निर्गत्य पुरुषोत्तमः । | तदपेक्षां विनैवासौ निर्गत्य पुरुषोत्तमः । | ||
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न विनोपनिषद्भिः स ज्ञेयः केनापि कस्यचित् । | न विनोपनिषद्भिः स ज्ञेयः केनापि कस्यचित् । | ||
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प्रश्नो वादे च जल्पादौ कर्तव्यः प्रतिवादिना । | प्रश्नो वादे च जल्पादौ कर्तव्यः प्रतिवादिना । | ||
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यश्छिन्नविचिकित्सस्तु च्छिनत्त्यपि च संशयान् । | यश्छिन्नविचिकित्सस्तु च्छिनत्त्यपि च संशयान् । | ||
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षण्णवत्यंगुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमंडलः । | षण्णवत्यंगुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमंडलः । | ||
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अत एव च सर्वागमेषु प्रतिसंहितमाचार्यलक्षणमुच्यते । | अत एव च सर्वागमेषु प्रतिसंहितमाचार्यलक्षणमुच्यते । | ||
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॥ इति शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ५९ ॥ | ॥ इति शाकल्यब्राह्मणम् ॥ ५९ ॥ | ||
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ | इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ||
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यथा वनस्पतौ वृक्ष इत्ययंशब्दोऽमृषा तथैव पुरुषे पुरुषशब्दो विद्यमान एव । स च नित्यत्वे सम्भवति । पुरुकालेऽपि सन्पुरुष इति । स्रावमध्ये यत्स्थिरं विद्यतेऽस्थि सल्लीनं तद्दारुसंश्लिष्टपाशवत् । वृक्षो मूलाद्रोहतीत्यंगीकारमात्रम् । यत्समूलमावृहेयुरिति तस्यापि दूषणात् । अन्यस्य रेतसो जननमपि जीवतः पुरुषान्तरस्य भावे । प्रलये तु सर्वप्रलयात् कस्मादुत्पत्तिः । तत्पृष्टं सर्वं वक्तुमशक्यत्वात् पुरुषस्य पुनरुत्पत्तौ कारणं भगवन्तं जानन्तोऽपि तूष्णीमृषयो बभूवुः । पुरुषनामकत्वान्नित्यस्य जीवस्य यावन्मुक्तिः पुनरुत्पत्या भवितव्यं न शरीरेण सह नाशः । तस्य च स्वोत्पत्तावस्वातंत्र्यादन्येनोत्पादकेन भाव्यम् । कोऽसाविति प्रश्नाशयः । तेषु तूष्णीम्भूतेषु स्वयमेव परिहरति विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेति । तस्याप्यन्य उत्पादक इत्याशंका मा भूदिति जात एव न जायत इत्याह । पुरुषान्तरापेक्षया पुनःशब्दो न तु क्रियाभ्यासापेक्षया । एक एव हरिर्बन्धुः पुनरन्यो न विद्यते इतिवत् । रातिरिष्टः । तिष्ठमानस्य तद्विदः परायणम् ॥ | यथा वनस्पतौ वृक्ष इत्ययंशब्दोऽमृषा तथैव पुरुषे पुरुषशब्दो विद्यमान एव । स च नित्यत्वे सम्भवति । पुरुकालेऽपि सन्पुरुष इति । स्रावमध्ये यत्स्थिरं विद्यतेऽस्थि सल्लीनं तद्दारुसंश्लिष्टपाशवत् । वृक्षो मूलाद्रोहतीत्यंगीकारमात्रम् । यत्समूलमावृहेयुरिति तस्यापि दूषणात् । अन्यस्य रेतसो जननमपि जीवतः पुरुषान्तरस्य भावे । प्रलये तु सर्वप्रलयात् कस्मादुत्पत्तिः । तत्पृष्टं सर्वं वक्तुमशक्यत्वात् पुरुषस्य पुनरुत्पत्तौ कारणं भगवन्तं जानन्तोऽपि तूष्णीमृषयो बभूवुः । पुरुषनामकत्वान्नित्यस्य जीवस्य यावन्मुक्तिः पुनरुत्पत्या भवितव्यं न शरीरेण सह नाशः । तस्य च स्वोत्पत्तावस्वातंत्र्यादन्येनोत्पादकेन भाव्यम् । कोऽसाविति प्रश्नाशयः । तेषु तूष्णीम्भूतेषु स्वयमेव परिहरति विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेति । तस्याप्यन्य उत्पादक इत्याशंका मा भूदिति जात एव न जायत इत्याह । पुरुषान्तरापेक्षया पुनःशब्दो न तु क्रियाभ्यासापेक्षया । एक एव हरिर्बन्धुः पुनरन्यो न विद्यते इतिवत् । रातिरिष्टः । तिष्ठमानस्य तद्विदः परायणम् ॥ | ||
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विजित्य सर्वान् प्रपच्छ याज्ञवल्क्यः पुनर्मुनीन् । | विजित्य सर्वान् प्रपच्छ याज्ञवल्क्यः पुनर्मुनीन् । | ||
Revision as of 09:03, 10 April 2026
महीत्युक्तं हि माहात्म्यं महिमानो हि तन्मिताः ॥ एवं हि महिमाशब्दस्तद्वशत्वं वदत्ययम् । यत्र माहात्म्यवाची स्यान्महत्वं महिमा तथा ॥ त्रयस्त्रिंशत्सुराणां हि परिवारास्ततः परे । षण्णामेते त्रयाणां ते ते द्वयोः साधिकस्य तौ ॥ एकस्य सोऽपि क्रमतः पराधीनस्वरूपिणः । पराधीनबलाश्चैव पराधीनप्रवृत्तयः ॥
एक एव स्वतंत्रोऽसौ भगवान् पुरुषोत्तमः ।
प्रथितं हरिमादाय वातीति प्रथिवः स्मृतः । तद्भार्या पृथिवी नाम यत्तदिच्छानुसारिणी ॥ सर्वज्ञानात् तथायुष्ट्वात् सूत्रात्मा वायुरुच्यते । श्रद्धानामैव तत्पत्नी सर्वस्यान्तर्निरीक्षणात् ॥ अन्तरिक्षमिति प्रोक्ता देवेभ्योऽधिकवीक्षणात् । आदिकालस्थितो यस्मादादित्यस्तु सदाशिवः ॥ द्यौरुमा च समुद्दिष्टा वाग्रूपा द्योतिका यतः । त एते सर्वदेवेभ्यो विशिष्टास्तद्वशाः परे ॥ नक्षत्रमिंद्र उद्दिष्टश्चंद्रः काम उदाहृतः । अत्राणात् सूर्यचंद्राद्यैराह्लादाच्चैव हेतुतः ॥ वासयन्ति जगद्यस्मादेतेऽष्टौ वसवः स्मृताः । ज्ञानादिषड्गुणाः षट्सु तदन्येभ्योऽधिका यतः ॥
वसुष्वपि त एवोच्चा वींद्राद्याः पूर्वकीर्तिताः ।
स एव वज्र इंद्रस्य सोऽशनिश्चाशनादरेः । यज्ञो नामेंद्रपुत्रो यो जयन्त इति चोच्यते ॥
स एव पशुमानित्वात् पशवश्चेति कथ्यते ।
दक्षाग्निप्रमुखाः सर्वे प्राणा एव हि वायुजाः । रुद्रा अपि तदावेशात् पृथंग्नोदीरिता इह ॥ काम एवानुविष्टत्वादनिरुद्धश्च नोदितः । मन्वावेशादिंद्रजस्तु संख्यायामनुवेशितः ॥ अश्विनौ निर्ऋतिश्चैव कुबेरश्च विनायकः । अर्यम्ण्यंशादिचतुर्षु विशेषावेशसंयुताः ॥ अत्रोक्ता अपि पृथिव्याद्या अन्तर्यामिब्राह्मणे भवन्ति । षट्सु प्रधानास्तिस्रो हि वायुवींद्रमहेश्वराः । स्वभार्याणां स्वाश्रयत्वात् ते लोका ज्ञानरूपतः ॥ पदैक्याद्ब्रह्मवाय्वोस्तु पदसाम्याच्छिवस्य च । शेषस्यापि तु नैवोक्तिः पृथक् श्रद्धा च मारुतः ॥ द्वौ देवाविति सम्प्रोक्तावन्नं श्रद्धा प्रकीर्तिता । अतीतत्वाद्देवताभ्यो नेतृत्वाच्चान्नमुच्यते ॥ श्रद्धेति वायोः पत्नी सा प्राणो वै विष्णुरुत्तमः । णेत्येवानन्द उद्दिष्ट आसमन्तात् प्रकृष्टतः ॥ प्राणो हि भगवान् विष्णुरध्यर्धो वायुरुच्यते । अध्यर्धा हि गुणा नित्यं वायोरध्यर्ध एव तत् ॥ न चैकत्वं भवेद्वायोस्तद्विशिष्टो यतो हरिः । न च द्वितीयता तस्मिन् प्रीतिरत्यधिका हरेः ॥ तेनाध्यर्द्धगुणो यस्मात् सर्वस्माद् देवतागणात् । न चाशक्यं न चाप्राप्यमतोऽध्यर्ध इतीरितः ॥ अत्यन्तरंगं यत्तस्मान्न हरेः पृथगीरिता । श्रीः स्वरूपविभेदेऽपि सर्वोत्कृष्टाऽपि नित्यशः ॥ तस्या अपि परो विष्णुर्गुणैः सर्वैरदोषवान् । एक इत्युच्यते नित्यं यस्मान्नान्यस्तथाविधः ॥ तत्परो वा गुणोद्रेके ब्रह्माऽसौ गुणपूर्तितः ।
तथात्वेन यतो नित्यमविकारेण याति हि ॥ त्यदित्युक्तास्ततो विष्णुः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥ इति महामीमांसायाम् ॥
आदित्यस्थस्तथा रुद्रः श्रोत्रश्चंद्र उदाहृतः ॥ छायामयस्तु निर्ऋतिरादर्शे सूर्य एव च । पर्जन्यस्त्वप्सु पुरुषः शक्रः पुत्राभिमानवान् ॥ अमृतं वायुरुद्दिष्टं स्त्रियः श्रीर्गीरुमा तथा । सत्यं ब्रह्मा समुद्दिष्टो गरुत्मच्छेषका दिशः ॥ आदेशनाद्दिशः प्रोक्ताः मृत्युर्यम उदाहृतः । अन्तर्गतेन रूपेण वायुरेव त्वसुः स्मृतः ॥ पालकेन स्वरूपेण ब्रह्मैवात्र प्रजापतिः । प्रकाशस्त्वान्तरो ज्योतिर्लोको बाह्य इतीर्यते ॥ मनःस्थिता मनोनाम्नी बोधरूपत्वतो रमा ।। सैवाग्निस्थाऽदनान्नित्यमग्निरित्येव गीयते ॥ हृदयं बुद्धिसंस्था सा त्वयनं हृदि यत्ततः ।
चक्षुः सा दृष्टिहेतुत्वाद्दृष्टानां लोक एव सा ॥ इति च ।
चक्षुस्थो दृष्टिशक्तीशो रूपात्मेंद्रस्तदाश्रयः ॥
बुद्धितत्त्वात्मिकोमा च शक्रस्यापि समाश्रयः ।
दक्षिणामानिनी देवी रतिरेव तदाश्रयः । श्रद्धारूपः सदा कामस्तस्या अपि समाश्रयः ॥
हृदयात्मिक्युमा तस्य कामस्यापि समाश्रयः ।
रेत आत्मा सुरगुरुः सोमस्यापि समाश्रयः ।
तस्याप्युमैवाश्रयः स्यात् ..
सोमस्य दीक्षारूपा तु शतरूपा समाश्रयः । तस्याः सत्यात्मको देवो मनुरेव समाश्रयः ॥
तस्याप्युमैवाश्रया सा स्रष्टृरूपस्य नित्यदा ।
अहंकारात्मको नित्यमात्मोमा परिकीर्तिता । बुद्ध्यात्मनैवाततत्वाद्यद्यस्यानाश्रयो हरः ॥ तदा बोधात्मिका शक्तिर्नास्या देहाभिरक्षणे ।
अरक्षितान्मानुषादीन् श्वानो वाऽद्युर्वयांसि वा ॥
शेषस्यापानरूपा सा भारत्येव व्यपाश्रयः ॥ तस्या व्यानाभिधो वायुर्विशिष्टानो यतो हि सः । उन्नेतृत्वादुदानाख्या तस्या श्रीराश्रयः सदा ॥ समानाख्यो हरिस्तस्याः सहैव ह्यनयत्यसौ । स्वावरस्यानकास्त्वन्ये सर्वेषां चेष्टको हि सः ॥ स एष भगवान्नैवं श्रीवदन्याश्रयो हरिः । न च ब्रह्मादिवद्विष्णुर्नैवासौ बद्धवत् क्वचित् ॥ न च मुक्तवदीशेशः कुत एव जडोपमः । अग्राह्योऽशीर्यसंगोऽसावसितश्च न रिष्यति ॥ न हि सर्वात्मना क्वापि केनचिज्ज्ञायते क्वचित् । स्वल्पोऽपि शीर्यते नैव कारणात् कालतोऽपि वा ॥ न लिप्यते जगन्नाथः क्वचिद्दोषेण केनचित् । भूतपूर्वो भविष्यो वा बन्धो नास्य कुतश्चन ॥ न च नाशो भवेत् क्वापि न नशिष्यति च क्वचित् । अन्यत् सर्वं गृहीतं हि तेन ज्ञानादिना सदा ॥ अशीर्यत्वादयोऽन्येषां सर्वेषां तत्प्रसादतः ।
अतस्तस्यापि वैषम्यान्नेति नेत्याह तं श्रुतिः ॥ इत्यादि च ॥वहत्येवानिशं सर्वं निरूढं तेन तज्जगत् ॥ प्रति प्रतिस्थितो रूपैर्यस्माद्धत्ते हरिः सदा ।
अतः प्रत्यूह्यते तेन व्यक्ताव्यक्तमिदं जगत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥तदुक्तिमात्रे प्रामाण्ये यदि नास्यागमान्तरम् ॥ अपेक्षितं यदा शंका दर्शनीयस्तदाऽऽगमः । निःशंकत्वेन यो वक्ता प्रश्नानामुत्तरं सदा ॥ आनुकूल्येनागमानां नाशंक्यं तद्वचः क्वचित् । दशतालो दशमुखो ललाटत्रिंशकस्तथा ॥ सार्धोन्नतश्चैव पुनः पर्यग्दशशिरास्तथा । पञ्चोराः सप्तपादो यो नाशंक्यं तद्वचः क्वचित् ॥ नवांगुलमुखो यस्तु गले च चतुरंगुलः । चतुर्विशांगुलतनुस्तद्वाक्यं देवपूजितम् ॥ प्राधान्यल्लक्षणोपेतो दुर्लक्षणयुतोऽपि सन् । तस्यापि वाक्यं मानं स्यात् किमु सर्वयुतस्य तु ॥ प्रायो देवाश्च ऋषयो न सर्वशुभलक्षणाः । ऋते विष्णुं सुरश्रेष्ठं ब्रह्माणं वाऽप्यनन्तरम् ॥ यस्मान्न विदुषां वाक्यमाशंक्यं केनचित् क्वचित् । तस्माद्वेदेषु सर्वेषु कथाः प्रश्नोत्तरात्मिकाः ॥ न प्रमाणान्तरं तत्र पृच्छन्ति घटनां विना । एतस्मादाश्वलाद्याश्च पप्रच्छुर्नैव कुत्रचित् ॥
आगमं याज्ञवल्क्योक्तेरन्यं तं मिथिलोऽपि च ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥
यथा वनस्पतौ वृक्षशब्द एवं यथार्थतः ॥ पुरुषेऽपि हि तच्छब्दो नित्यत्वादेव युज्यते । तस्मान्नास्य शरीरेण नाशस्तस्मात् पुनर्जनिः ॥ आमुक्तेर्भविता नित्यं कुतस्तदिति चोच्यताम् । रेतसो जननं यावत्प्रलयस्तावदेव हि ॥ निर्मूलस्य च वृक्षस्य प्रलये पुरुषस्य च । पुनरुत्पादको यस्तं वदन्तु मम कृत्स्नशः ॥ धानाजात इवायं हि दृश्यते विदुषां तरुः । अस्वातंत्र्यात् तु विदुषां नैव तत्कारणं भवेत् ॥ अंजसा प्रेत्य सम्भूतिकारणं तद्वदन्तु नः । प्रेत्य सम्भूतिकर्ता हि स्वतंत्रो घटते यतः ॥ इति पृष्टास्तु मुनयो न वक्तुं शेकुरंजसा । तद्वेत्तारोऽपि तत्प्रश्ननिर्मूलनबलोज्झिताः ॥ अधार्ष्ट्यात्तत्प्रभावेन धर्षिता नाशकन्यदा । स्वयमेव तदोवाच याज्ञवल्क्यो महामुनिः ॥ पूर्णानन्दो हरिर्नान्यः कारणं सृज्यसर्जने । नैवास्य जनकः कश्चिन्नित्यजातो ह्यसौ हरिः ॥ स प्रियः सर्वदातॄणां ज्ञानिनां परमप्रियः ।
ये तु तद्भाविता नित्यं तेषामेष परायणम् ॥ इति नारदीये ।