Bruhadaranyaka/C2/S3: Difference between revisions
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विशरणावसादनयुक्तं सत् । ततं सर्वज्ञं च त्यम् । | विशरणावसादनयुक्तं सत् । ततं सर्वज्ञं च त्यम् । | ||
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प्रलयेऽपि भगवदन्तरेव रता अक्षिताऽवस्थितेति श्रीरन्तरिक्षम् । य एष तपतीत्यादित्यस्थो हिरण्यगर्भ उच्यते । | प्रलयेऽपि भगवदन्तरेव रता अक्षिताऽवस्थितेति श्रीरन्तरिक्षम् । य एष तपतीत्यादित्यस्थो हिरण्यगर्भ उच्यते । | ||
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मण्डले पुरुष इति भगवान् विष्णुः । | मण्डले पुरुष इति भगवान् विष्णुः । | ||
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एवमेव चक्षुर्दक्षिणेक्षन्पुरुषश्च । | एवमेव चक्षुर्दक्षिणेक्षन्पुरुषश्च । | ||
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॥ इति मूर्तामूर्तब्राह्मणम् ॥ ४३ ॥ | ॥ इति मूर्तामूर्तब्राह्मणम् ॥ ४३ ॥ | ||
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तस्यैवामूर्तरसस्य भगवतो नेति नेतीत्यादेशः । अतस्तस्मादमूर्तसारत्वादित्यर्थः । अथेत्यानन्तर्यार्थे । इति नेति नेति मूर्तामूर्तविलक्षण इत्यर्थः । उभयसादृश्यनिषेधार्थं द्विवारम् । इति नेति निषिध्यमानमप्येतस्मादन्यत्परं नास्ति एष एव परः । मूर्तामूर्तं त्वपरमेवैतदपेक्षया । मूर्तामूर्तमेवाध्यात्मं प्राणा इत्युच्यन्ते । ब्रह्मणो वायोश्चामूर्तत्वात् । | तस्यैवामूर्तरसस्य भगवतो नेति नेतीत्यादेशः । अतस्तस्मादमूर्तसारत्वादित्यर्थः । अथेत्यानन्तर्यार्थे । इति नेति नेति मूर्तामूर्तविलक्षण इत्यर्थः । उभयसादृश्यनिषेधार्थं द्विवारम् । इति नेति निषिध्यमानमप्येतस्मादन्यत्परं नास्ति एष एव परः । मूर्तामूर्तं त्वपरमेवैतदपेक्षया । मूर्तामूर्तमेवाध्यात्मं प्राणा इत्युच्यन्ते । ब्रह्मणो वायोश्चामूर्तत्वात् । | ||
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मूर्तामूर्तमिदं रूपं ब्रह्मणः प्रतिमात्मकम् । | मूर्तामूर्तमिदं रूपं ब्रह्मणः प्रतिमात्मकम् । | ||
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प्रथमनिषेधेनैव मूर्तरससादृश्यमपि निषिद्धम् ॥ | प्रथमनिषेधेनैव मूर्तरससादृश्यमपि निषिद्धम् ॥ | ||
Revision as of 09:03, 10 April 2026
नैतत्स्वरूपमेतत् स्यात् तद्धि सर्वपरं सदा ॥ श्रियो वायोर्विरिञ्चाच्च येऽन्ये मूर्ता हि ते स्मृताः । मूरं पापं हि तेनाप्तं मूर्तमित्यभिधीयते ॥ विशीर्णं चावसन्नं च तदेवातः सदुच्यते । पराधीनगतित्वाच्च स्थितमित्यभिधीयते ॥ तस्य सारो विरिञ्चस्तु तद्विरुद्धस्वभावकः । मूर्ताद्विरुद्धरूपत्वाच्छ्रीर्वायुश्चाप्यमूर्तकौ ॥ सर्वज्ञौ च ततौ चैव नियतो हरिणैव तौ । तयोः सारस्तु भगवान् हरिर्नारायणः परः ॥ आदित्यमण्डले चैव चक्षुष्वपि च सुस्थितः । तत्रैव संस्थितो ब्रह्मा मूर्तसारोऽपि तस्य च ॥ विष्णुरेव परः सारस्तस्य रूपाण्यनेकधा । महारजनवासोवत् पाण्ड्वाविकवदेव च ॥ विद्युत्पद्मेन्द्रगोपादिवह्निवत् सुखभास्वरः । नैवासौ मूर्तवद्विष्णुर्न च मूर्तरसोपमः ॥ न चामूर्तोपमो देवः स एव परमः सदा । तस्यान्यदपरं सर्वं सत्यसत्यः स एकराट् ॥ मूर्तामूर्तात्मकाः प्राणास्तेषां सत्यः स एव हि ॥
इति नारायणश्रुतौ ।