Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S21: Difference between revisions
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'सर्वज्ञाश्च विरिञ्चाद्या न जानीयुर्हरिं परम् । | 'सर्वज्ञाश्च विरिञ्चाद्या न जानीयुर्हरिं परम् । | ||
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'हरेस्तु प्रतिमा प्राज्ञास्तत्रस्थः केशवः स्वयम् । | 'हरेस्तु प्रतिमा प्राज्ञास्तत्रस्थः केशवः स्वयम् । | ||
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कषणेन गच्छतीति कषायः पापं, तदुभयमेव मलम् ॥ २० ॥ | कषणेन गच्छतीति कषायः पापं, तदुभयमेव मलम् ॥ २० ॥ | ||
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'रतिः परात्मनि हरावन्यत्रारतिरेव च । | 'रतिः परात्मनि हरावन्यत्रारतिरेव च । | ||
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अबीजं हृदयं बीजहृदयं विना । | अबीजं हृदयं बीजहृदयं विना । | ||
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दग्धाशयः बीजाशयनाशे तद्गुणानां ज्ञानादीनामभावान्न किञ्चिद्विचक्षीत । परात्मनोर्यदा व्यवधानं संसारावस्थायां तदा स्वप्न इवेत्येतावद्बीजहृदयनाशे त्वपुरुष एव । आत्मनाश एवेत्यर्थः । अतः संसारावस्थैवोत्तमा स्यात् । | दग्धाशयः बीजाशयनाशे तद्गुणानां ज्ञानादीनामभावान्न किञ्चिद्विचक्षीत । परात्मनोर्यदा व्यवधानं संसारावस्थायां तदा स्वप्न इवेत्येतावद्बीजहृदयनाशे त्वपुरुष एव । आत्मनाश एवेत्यर्थः । अतः संसारावस्थैवोत्तमा स्यात् । | ||
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एवंविधाज्ञानकारणमाह । इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैरित्यादि । | एवंविधाज्ञानकारणमाह । इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैरित्यादि । | ||
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'स्वपक्षपातस्त्वभ्यासाद्भोगार्थं व्यापृतस्य तु । | 'स्वपक्षपातस्त्वभ्यासाद्भोगार्थं व्यापृतस्य तु । | ||
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'मनोमात्रं हरेर्यस्मान्मनसा मीयते जगत् । | 'मनोमात्रं हरेर्यस्मान्मनसा मीयते जगत् । | ||
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'अनुवृत्तिरिति प्राज्ञैर्जीवन्मुक्तिरुदीर्यते''। इति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥ | 'अनुवृत्तिरिति प्राज्ञैर्जीवन्मुक्तिरुदीर्यते''। इति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥ | ||
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'सर्वसत्ताप्रदत्वात्तु सर्वतत्त्वं हरिः स्मृतः । | 'सर्वसत्ताप्रदत्वात्तु सर्वतत्त्वं हरिः स्मृतः । | ||
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'यत्स्वरूपतया भातमज्ञानां गगनादिकम् । | 'यत्स्वरूपतया भातमज्ञानां गगनादिकम् । | ||
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द्विमतयः जगति भगवति च प्रतीतियुक्ता अपि भक्तिविशेषात्तत्त्वं नोद्ग्रथयन्ति । संसारगुणास्तेषां विरुद्धा एव प्रतीयन्ते यतः ॥ ४२ ॥ | द्विमतयः जगति भगवति च प्रतीतियुक्ता अपि भक्तिविशेषात्तत्त्वं नोद्ग्रथयन्ति । संसारगुणास्तेषां विरुद्धा एव प्रतीयन्ते यतः ॥ ४२ ॥ | ||
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'नैजः सर्वगुणोत्कर्षः सर्वेभ्यो महदुच्यते''इति शब्दनिर्णये ॥ ५२ ॥ | 'नैजः सर्वगुणोत्कर्षः सर्वेभ्यो महदुच्यते''इति शब्दनिर्णये ॥ ५२ ॥ | ||
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'अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः । | 'अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः । | ||
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॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ | ||
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'गुरुविप्रेषु भक्तया च परेषां हितकृत्तया । | 'गुरुविप्रेषु भक्तया च परेषां हितकृत्तया । | ||
Revision as of 09:01, 10 April 2026
'जीवोपाधिर्द्विधा प्रोक्तः स्वरूपं बाह्यमेव च । बाह्योपाधिर्लयं याति मुक्तावन्यस्य तु स्थितिः ॥ सर्वोपाधिविनाशे हि प्रतिबिम्बः कथं भवेत् । कथं चात्मविनाशाय प्रयत्नः सेत्स्यति क्वचित् ॥ अपुमर्थता च मुक्तेः स्यादभावात्पुंस एव तु । ज्ञानज्ञेयाद्यभावाच्च सर्वथा नोपपद्यते ॥
तस्मादेतन्मतं येषां तमोनिष्ठा हि ते मताः ॥इति स्कान्दे ॥२६॥
'भिदा यदि न दृश्येत जीवात्मपरमात्मनोः । मुक्तौ तदा विमोक्षाय को यत्नं कर्तुमर्हति॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ 'मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं न दुःखकरं भवेत् ।
प्रवृत्तिधर्ममेवाहं मन्ये भरतसत्तम॥ इति मोक्षधर्मेषु ॥ २७ ॥
भवेत्ततोऽनेकशास्त्रयथार्थस्मरणेशिता ॥ नश्यत्यतः स्मृतेर्नाशाद्भगवत्पक्षपातिता । विनश्येत्तेन चैवास्य भवेज्ज्ञानविपर्ययः ॥ न च ज्ञानविपर्यासादन्यन्नाशकरं क्वचित् । सर्वस्यैतस्य मूलं हि दुष्टसंसर्ग एव तु ॥ दुष्टसङ्गो विरक्तस्याप्यन्यथाज्ञानकारणम् । दुष्टसङ्गाद्धि विष्णोश्च स्वात्मत्वं मन्यते बुधः । अभावं स्वात्मनोऽन्यस्य मुक्तिं चापि निरात्मताम्॥
इत्यादि स्कान्दे ॥ ३१-३४ ॥
व्याप्ते मनसि विष्णोश्च स्थितत्वाद्वासनामयम् ॥ वस आच्छादनेत्यस्माद्धातोर्वा वासनामयम् । अतो विष्णोरनीहायां लीयते सकलं जगत् ॥ अनीहावस्थ एवासौ मुमुक्षुभिरवाप्यते । एवं विद्वान्बन्धशक्तिं व्युदस्य हरिमाप्नुते ॥ प्रकृतिर्भिदा च माया च भ्रमश्चेत्यभिधीयते ।
बन्धशक्तिर्यया लोको बम्भ्रमीत्यनिशं भुवि॥ इति तन्त्रसारे ॥ ३७,३८ ॥
सर्वत्र विततत्वाद्वा सोऽहं त्वमिति चोच्यते । सर्वान्तर्यामकत्वात्तु न जीवात्मत्वतो हरिः॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ त्वमनयोः स्थावरजङ्गमयोर्मध्ये एको जीवः विष्वगाधिः नानादुःखःसन्, हृदि स्थितमवैहि । अहं च स जीवोऽस्मि । ज्ञानान्महान् भवामि । यः क्षेत्रवित् ॥ सर्वस्य प्रत्यक्चकास्ति स भगवानिति । 'व्यवधानेनान्वयोऽपि योग्यतापेक्षया भवेत्। इति शब्दनिर्णये ॥
'अभिमानस्त्वहङ्कार आत्मा चेत्यभिधीयते। इति च ॥ ४० ॥
विवेकज्ञानिनां रज्जौ सर्पमावद्विधूयते । तं नित्यमुक्तभावेन निरस्तप्रकृतिं भजेत्॥ इति ज्ञानविवेके ॥ 'न भ्रान्तिर्जगतो दृष्टिर्न भ्रान्तिर्हरिदर्शनम् । अन्योन्यात्मतया दृष्टिर्भ्रान्तिरित्यवधार्यताम्॥ इति च । 'मायेति ज्ञाननाम स्यान्मायेति प्रकृतिस्तथा । ज्ञानं स्वरूपं विष्णोस्तु प्रकृतिर्न हरेस्तनुः । एवं विवेकिनो विश्वं ब्रह्मरूपेण नेष्यते॥ इति वाराहे ॥ ज्ञानप्रकृत्याख्यमायाद्वयस्य विवेकज्ञानात्सदसतोर्विष्ण्वात्मतया प्रतीतिः स्रज्यहिबुद्धिरिव विधूयत इत्यर्थः । 'पञ्चभूतात्मकं देहं विष्णोः पश्यन्त्ययोगिनः ।
तथा न योगिराद्धान्तो ज्ञानं देहो यतो हरेः॥ इति षाड्गुण्ये ॥ ४१ ॥
प्रश्रयेण च कीर्त्या च पृथू राममनुव्रतः॥ इति ब्रह्माण्डे । 'न गुरुर्न च धर्मोऽस्ति रामदेवस्य कुत्रचित् ।
तथापि धर्मरक्षार्थं गुरुभक्तिमदर्शयत्॥ इति वाराहे ॥ ६७ ॥