Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S13: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 13: | Line 13: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V02 | | verse_id = BTN_C03_S13_V02 | ||
| id = BTN_C03_S13_V02_B1 | | id = BTN_C03_S13_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'तमस्तु शार्वरं प्रोक्तं मोहश्चैव विपर्ययः । | 'तमस्तु शार्वरं प्रोक्तं मोहश्चैव विपर्ययः । | ||
| Line 43: | Line 42: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V04 | | verse_id = BTN_C03_S13_V04 | ||
| id = BTN_C03_S13_V04_B1 | | id = BTN_C03_S13_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
कालतो बलतश्चैव ज्ञानानन्दादिकैरपि । | कालतो बलतश्चैव ज्ञानानन्दादिकैरपि । | ||
| Line 85: | Line 83: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V33 | | verse_id = BTN_C03_S13_V33 | ||
| id = BTN_C03_S13_V33_B1 | | id = BTN_C03_S13_V33_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'यां तत्याज विभुर्ब्रह्मा मानुषी वाक् तु सा स्मृता । | 'यां तत्याज विभुर्ब्रह्मा मानुषी वाक् तु सा स्मृता । | ||
| Line 127: | Line 124: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V41 | | verse_id = BTN_C03_S13_V41 | ||
| id = BTN_C03_S13_V41_B4 | | id = BTN_C03_S13_V41_B4 | ||
| text = | | text = | ||
'अभिमानितः शब्दतश्च ब्रह्मा वेदान्ससर्ज ह । | 'अभिमानितः शब्दतश्च ब्रह्मा वेदान्ससर्ज ह । | ||
| Line 148: | Line 144: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V42 | | verse_id = BTN_C03_S13_V42 | ||
| id = BTN_C03_S13_V42_B1 | | id = BTN_C03_S13_V42_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'प्राजापत्यं ब्रह्मचर्यमेकभार्यर्तुगामिता''॥ इति व्यासस्मृतौ ॥ | 'प्राजापत्यं ब्रह्मचर्यमेकभार्यर्तुगामिता''॥ इति व्यासस्मृतौ ॥ | ||
| Line 167: | Line 162: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V43 | | verse_id = BTN_C03_S13_V43 | ||
| id = BTN_C03_S13_V43_B1 | | id = BTN_C03_S13_V43_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'वैखानसा मूलभक्षाः फलभक्षा उदुम्बराः । | 'वैखानसा मूलभक्षाः फलभक्षा उदुम्बराः । | ||
| Line 186: | Line 180: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V44 | | verse_id = BTN_C03_S13_V44 | ||
| id = BTN_C03_S13_V44_B1 | | id = BTN_C03_S13_V44_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'आन्वीक्षिकी तन्त्रविद्या सा च वेदानुसारिणी । | 'आन्वीक्षिकी तन्त्रविद्या सा च वेदानुसारिणी । | ||
| Line 211: | Line 204: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V46 | | verse_id = BTN_C03_S13_V46 | ||
| id = BTN_C03_S13_V46_B1 | | id = BTN_C03_S13_V46_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'स्पर्शास्तस्या भवञ्जीवात्स्वरा देहात्प्रजज्ञिरे । | 'स्पर्शास्तस्या भवञ्जीवात्स्वरा देहात्प्रजज्ञिरे । | ||
| Line 231: | Line 223: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V47 | | verse_id = BTN_C03_S13_V47 | ||
| id = BTN_C03_S13_V47_B1 | | id = BTN_C03_S13_V47_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'शब्दब्रह्मात्मको ब्रह्मा सर्वशब्दाभिधो यतः । | 'शब्दब्रह्मात्मको ब्रह्मा सर्वशब्दाभिधो यतः । | ||
| Line 270: | Line 261: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V51 | | verse_id = BTN_C03_S13_V51 | ||
| id = BTN_C03_S13_V51_author-note | | id = BTN_C03_S13_V51_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BTN_C03_S13_V51 | | verse_id = BTN_C03_S13_V51 | ||
| id = BTN_C03_S13_V51_B1 | | id = BTN_C03_S13_V51_B1 | ||
| text = | | text = | ||
'ऋषीणां भूरिवीर्याणाम्''इति सिंहावलोकनम् । | 'ऋषीणां भूरिवीर्याणाम्''इति सिंहावलोकनम् । | ||
Revision as of 09:00, 10 April 2026
तदाग्रहो महामोहस्तामिस्रः क्रोध उच्यते ॥ मरणं त्वन्धतामिस्रमविद्या पञ्चपर्विका॥ इति भारते ॥
'तमोऽज्ञानं विपर्यासो मोहोऽन्ये तु तदाग्रहाःइति हरिवंशेषु ॥ २ ॥
सर्वैर्गुणैर्विष्णुरेव श्रेष्ठस्तदवमा रमा ॥ अनन्तांशेन कालात्तु समा तस्याश्चतुर्मुखः । अवरो बहुलांशेन तत्समो वायुरुच्यते ॥ नियमाद्वायुरेवैको ब्रह्मत्वं याति नापरः । तस्मात्समानता मुक्तौ वायुत्वे किञ्चिदूनता ॥ दशवर्षं तु तत्पश्चाज्जननं तत्स्त्रियोरपि । आनन्दादिस्तद्दशांशः कालः संवत्सरात्परः ॥ यावत्पश्चाज्जनिस्तावत्पूर्वं देहक्षयो भवेत् । ब्रह्मवाय्वोस्तु ये देव्यौ तद्दशांशः सुखादिकः ॥ शेषस्य गरुडस्यापि कालो दिव्यसहस्रकः । शेषरुद्रौ ब्रह्मवायू यथा तद्वत्परस्परम् ॥ तद्देव्यस्तद्दशांशाः स्युस्ततस्त्विन्द्रादयो मताः । एवं मुक्तौ च पूर्वं च नान्यथा क्वचिदिष्यते ॥ अन्यथोक्तिर्यत्र च स्यात्तन्मोहार्थं भविष्यति । पूर्वापरविपर्यासो बहुरूपत्वहेतुतः ॥इति विष्णुकृततत्त्वविवेके ॥ 'अथात आनन्दस्य मीमांसा। 'देवासुरेभ्यो मघवान्प्रधानःइत्यादि च । 'इन्द्राद्याः सनकाद्याश्च दक्षाद्या येऽपि चापरे । ऋषयो मनवो देवास्तद्वशा ये च केचन ॥ उमाया अवराः सर्वे गुणैः सर्वैर्न संशयः । तत्समो न भविष्यो वा न भूतोऽद्यतनोऽपि वा ॥ ऋते हरिं ब्रह्मवायू शेषवीन्द्रान्सभार्यकान् । शङ्करं चेति वेत्तव्यमन्यन्मोहार्थमुच्यते॥
इति विष्णुकृततत्त्वनिर्णये ॥ ३,४ ॥
यज्ञादींश्चक्लृपे वाचा तथा सर्वाभिमानिनः । 'इतिहासपुराणे तु श्रुत्वा हरिमुखात्स्वयम् ।
भारतादीन्विना पश्चाद्धरिणाऽन्यैश्च निर्मितान्। इति ॥ ३४-४१ ॥
विष्णुप्रक्ता शिवाद्युक्ता ज्ञेया वेदबहिष्कृता ॥ दण्डनीती राजधर्मस्त्रयी वेदाः प्रकीर्तिताः । वार्ता वाणिज्यकादिः स्यादेताभिर्यत्तु जीवनम् ॥ तदान्वीक्षिक्यादिनाम ब्रह्मणा निर्मितं पुरा॥ इति च । प्रणवः पूर्ववक्त्रात् । 'प्रणवः पूर्ववक्त्रेण भूराद्याश्च मुखत्रयात् ।
प्रदक्षिणमवर्तन्त वेदाश्चैवाश्रमास्तथा॥ इति ब्राह्मे ॥ ४४ ॥
ऊष्माणं इन्द्रियेभ्यश्च अन्तस्था बलतो विभोः ॥इति च ॥
'यस्माद्यज्जायते चाङ्गात्तत्तदङ्गाभिधं भवेत्। इति च ॥ ४६ ॥
ऋते नारायणादीनि नाम्नां स विषयो यतः ॥ व्यक्तं ब्रह्माण्डमुद्दिष्टमव्यक्तं महदादि च ।
तद्व्यापकत्वाद्ब्रह्मा तु व्यक्ताव्यक्तात्मकः स्मृतः॥ इति च ॥ ४७ ॥
यत्र पश्चात्तनः श्रेष्ठस्तत्र सिंहावलोकनम्॥ इति ब्रह्मतर्के ॥
केन व्याप्तत्वात्कायः ॥ ४९-५१ ॥