Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S7: Difference between revisions
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निजावयवेभ्यः सृष्टाः । बाह्यावयवा लोकैः कल्प्यन्ते ॥ ११ ॥ | निजावयवेभ्यः सृष्टाः । बाह्यावयवा लोकैः कल्प्यन्ते ॥ ११ ॥ | ||
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जीवे कर्मसमावापः । परमेश्वरेण गृह्यते । गुणिनां महदादिजीवानां सामर्थ्ये परिमाणम् 'देवासुरेभ्यो मघवान्''इत्यादि ॥ १४ ॥ | जीवे कर्मसमावापः । परमेश्वरेण गृह्यते । गुणिनां महदादिजीवानां सामर्थ्ये परिमाणम् 'देवासुरेभ्यो मघवान्''इत्यादि ॥ १४ ॥ | ||
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श्रेणीनाम् अङ्गरक्षकाणां युद्धेषूच्यते ॥ १८ ॥ | श्रेणीनाम् अङ्गरक्षकाणां युद्धेषूच्यते ॥ १८ ॥ | ||
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योगतो लिङ्गभङ्गः पूर्वोक्तः । 'पानेन ते देव''इत्यादि पश्चात् ॥ २० ॥ | योगतो लिङ्गभङ्गः पूर्वोक्तः । 'पानेन ते देव''इत्यादि पश्चात् ॥ २० ॥ | ||
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'द्वेधा वावात्ममाया तद्रूपा तद्वशा च''इति । तद्वशया संसारयति । स्वरूपया विमोचयत्युदास्ते तद्वशां विमुक्तस्थ इतरयैनं रमयत्येष आत्मैष आनन्दः''। इति सौकारायणश्रुतिः ॥ २३ ॥ | 'द्वेधा वावात्ममाया तद्रूपा तद्वशा च''इति । तद्वशया संसारयति । स्वरूपया विमोचयत्युदास्ते तद्वशां विमुक्तस्थ इतरयैनं रमयत्येष आत्मैष आनन्दः''। इति सौकारायणश्रुतिः ॥ २३ ॥ | ||
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यस्मात् अनुतिष्ठन्ति तस्मात् परमेष्ठी प्रमाणम् ॥ २५ ॥ | यस्मात् अनुतिष्ठन्ति तस्मात् परमेष्ठी प्रमाणम् ॥ २५ ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयसन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयसन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ | ||
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'यत्र ब्रह्मान्तरोत्पत्तिः ब्रह्मकल्पः स ईरितः''॥ इति च ॥ २८ ॥ | 'यत्र ब्रह्मान्तरोत्पत्तिः ब्रह्मकल्पः स ईरितः''॥ इति च ॥ २८ ॥ | ||
Revision as of 09:00, 10 April 2026
पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः ।लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुमः ॥ ११ ॥
निजावयवेभ्यः सृष्टाः । बाह्यावयवा लोकैः कल्प्यन्ते ॥ ११ ॥
यस्मिन्कर्मसमावापो यथा येनोपगृह्यते ।गुणानां गुणिनां चैव परिमाणं सुविस्तरम् ॥ १४ ॥
जीवे कर्मसमावापः । परमेश्वरेण गृह्यते । गुणिनां महदादिजीवानां सामर्थ्ये परिमाणम् 'देवासुरेभ्यो मघवान्इत्यादि ॥ १४ ॥
नृणां साधारणो धर्मः सविशेषश्च यादृशः ।श्रेणीनां राजर्षीणाञ्च धर्मः कृच्छ्रेषु जीवताम् ॥ १८ ॥
श्रेणीनाम् अङ्गरक्षकाणां युद्धेषूच्यते ॥ १८ ॥
तत्वानां परिसङ्ख्यानं लक्षणं हेतुलक्षणम् ।पुरुषाराधनविधिः योगस्याऽध्यात्मिकस्य च ॥ १९ ॥
हेतुलक्षणं ब्रह्मलक्षणम् ॥ १९ ॥
योगेश्वरैश्वर्यगतिं लिङ्गभङ्गं च योगिनाम् ।वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयोः ॥ २० ॥
योगतो लिङ्गभङ्गः पूर्वोक्तः । 'पानेन ते देवइत्यादि पश्चात् ॥ २० ॥
यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया ।विसृज्य च यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्विभुः ॥ २३ ॥
'द्वेधा वावात्ममाया तद्रूपा तद्वशा चइति । तद्वशया संसारयति । स्वरूपया विमोचयत्युदास्ते तद्वशां विमुक्तस्थ इतरयैनं रमयत्येष आत्मैष आनन्दः। इति सौकारायणश्रुतिः ॥ २३ ॥
अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः ।अपरे ह्यनुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥ २५ ॥
यस्मात् अनुतिष्ठन्ति तस्मात् परमेष्ठी प्रमाणम् ॥ २५ ॥
सूत उवाच—स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः ।
'बालोऽपि स गुरुत्वेन मुनिभ्यो ब्रह्मणा यतः ।
दत्तोऽतो ब्रह्मरातेति नाम वैयासकेरभूत्॥ इति ब्राह्मे ॥ २७ ॥
आह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयसन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
'यत्र ब्रह्मान्तरोत्पत्तिः ब्रह्मकल्पः स ईरितः॥ इति च ॥ २८ ॥