Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S12: Difference between revisions
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'तत्प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत्''इति श्रुतिः ॥ ५ ॥ | 'तत्प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत्''इति श्रुतिः ॥ ५ ॥ | ||
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योऽर्यमा दण्डमबिभ्रत् स वर्षशतं यावच्छूद्रत्वं बभार । | योऽर्यमा दण्डमबिभ्रत् स वर्षशतं यावच्छूद्रत्वं बभार । | ||
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'संहर्ता भगवान् विष्णुः काल इत्यभिधीयते । | 'संहर्ता भगवान् विष्णुः काल इत्यभिधीयते । | ||
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स्वैरज्ञातगतिः विविक्तगतिः ॥ २८ ॥ | स्वैरज्ञातगतिः विविक्तगतिः ॥ २८ ॥ | ||
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पितरौ कुन्तीधृतराष्ट्रौ । न चापश्यत् । तस्य मनसि तेषां विपद्भावो बभूव । अन्यथा महाभारतविरोधात् । | पितरौ कुन्तीधृतराष्ट्रौ । न चापश्यत् । तस्य मनसि तेषां विपद्भावो बभूव । अन्यथा महाभारतविरोधात् । | ||
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ब्रह्माण्डे च– | ब्रह्माण्डे च– | ||
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पितृव्यौ गान्धारीधृतराष्ट्रौ ॥ ३४ ॥ | पितृव्यौ गान्धारीधृतराष्ट्रौ ॥ ३४ ॥ | ||
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मुषितोऽस्मि इति प्रलापः ॥ ३७ ॥ | मुषितोऽस्मि इति प्रलापः ॥ ३७ ॥ | ||
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क्व गतावित्यदृष्टापेक्षया ॥ ४० ॥ | क्व गतावित्यदृष्टापेक्षया ॥ ४० ॥ | ||
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'विज्ञानात्मा विरिञ्चोऽयं यस्तस्मिंल्लीयते जगत् । | 'विज्ञानात्मा विरिञ्चोऽयं यस्तस्मिंल्लीयते जगत् । | ||
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'त्रिगुणात्मिका तथा ज्ञानं विष्णुशक्तिस्तथैव च । | 'त्रिगुणात्मिका तथा ज्ञानं विष्णुशक्तिस्तथैव च । | ||
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'परावरे तथैवाऽरादुभयार्थाभिधायिनः''इति च ॥ ५७ ॥ | 'परावरे तथैवाऽरादुभयार्थाभिधायिनः''इति च ॥ ५७ ॥ | ||
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एतत्सर्वं पूर्वमेव ज्ञात्वा तस्मादेव कारणात् विदुरस्तीर्थानि ययौ ॥ ५९ ॥ | एतत्सर्वं पूर्वमेव ज्ञात्वा तस्मादेव कारणात् विदुरस्तीर्थानि ययौ ॥ ५९ ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥ | ||
Revision as of 08:59, 10 April 2026
'शापं श्रुत्वा ब्राह्मणानामुद्धवः खिन्नमानसः । उदासीनं तथा कृष्णमिव सुप्रीतमेव च ॥ नशिष्यमाणं स्वकुलं स्वर्यियासुं च केशवम् । ज्ञात्वा पप्रच्छ भगवत्स्वरूपं तमुपह्वरे ॥ मैत्रेयोऽपि तदैवाऽगाद् जिज्ञासुस्तत्त्वमुत्तमम् । तयोरदात् स भगवान् ज्ञानं निर्मलमञ्जसा ॥ षडि्वंशद्वत्सरात् पूर्वं स्वर्गतेः पुरुषोत्तमः । प्रेषयामास च हरिरुद्धवं बदरीमनु ॥ कलापग्रामिणां वक्तुमेतत् तत्त्वमशेषतः । विदुरं तीर्थयात्रास्थमन्तराले स उद्धवः ॥ दृष्ट्वा नशिष्यमाणं च कुलं जिगमिषुं हरिम् । कथयित्वा बदर्यां च कलापग्रामवासिनाम् ॥ प्रोच्य तत्त्वमशेषेण वासुदेवमुखोद्गतम् । षडि्वंशद्वर्षगमने पुनरागतिमात्मनः ॥ तेषामुक्त्वा पुनः कृष्णसन्निधौ विचचार ह । मैत्रेयो विदुरायैतदूचिवान् कृष्णचोदितः ॥ विदुरः पाण्डवानां च विना यदुविनाशनम् । षडि्वंशद्वर्षतः पूर्वं ज्ञात्वाऽप्यप्रियमेव तत् ॥ नावोचद् विदुरो धीमांस्तस्मान्नाप्रियमावदेत्। इति पाद्मे ॥ 'तावच्छशास क्षितिमेकचक्रामेकातपत्रामजितेन पार्थः। इति चोपरि । 'विदुरं चागतं पुनः। इति च ।
भारते चैकविंशद्वर्षात् पूर्वं विदुरस्य युधिष्ठिरभाव उक्तः ॥ १२ ॥
'न देवानां न दैवीनां सामस्त्येन जनिर्भुवि ।
अंशांशेनैव जायन्ते सर्वे त्वाजानजादयः॥ १५ ॥
स्कान्दे च– 'भीमसन्तर्जितो राज्ञस्त्वनुज्ञां प्राप्य यत्नतः । धृतराष्ट्रो वने वासमकरोद् वत्सरत्रयम् ॥ विदुरस्तद्दिदृक्षार्थमागतेषु वनं पुरात् । पाण्डवेषु तु राजानं प्रविश्यैकत्वमागतः ॥ ततो दावाग्निना दग्धं धृतराष्ट्रं च सौबलीम् । श्रुत्वा कुन्तीं च चिन्तां ते प्रापुः पाण्डुसुतास्तदा॥ 'तांस्तदा नारदो विद्वान् शमयामास धर्मवित् ।
उक्त्वोत्तमां गतिं तेषां निष्ठां तात्कालिकीं तथा। इत्यादि ॥ ३१ ॥
'धृतराष्ट्रे मृते सूतः सञ्जयः पाण्डुसूनवे । गतिं शशंस कुन्त्याश्च गान्धारीधृतराष्ट्रयोः॥ इत्यादि ॥। पितृव्योऽपि धृतराष्ट्र एव । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था । 'यत्राधिकं तत्परता बहुवारमपि ध्रुवम् ।
तद्वदन्ति महाप्राज्ञा लोकवेदानुसारतः। इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ ३२ ॥
'स एष तर्ह्यध्यास्त आसनं पार्थिवोचितम्इत्यादिवत् । 'सुप्तिङ्उपग्रहलिङ्गनराणां कालहलच्स्वरकर्तृयङां च । व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन। इति महाव्याकरणे । 'व्यासादयो वर्तमानमतीतानागते तथा । व्यत्यस्यापि वदन्त्यद्धा मोहनार्थं दुरात्मनाम् ॥ पौर्वापर्यं यतो नैव सदैव परिवर्तनात् ।
अतश्च व्यत्ययादेतद्वदन्ति ज्ञानचक्षुषः। इति ब्राह्मे ॥ ५३ ॥
यादांसि सागरे यद्वत् स क्षेत्रज्ञे जनार्दने ॥ हृदिस्थे च स च व्याप्ते स्वात्मन्येकीभवत्युत । प्रलयौ भेदवन्तौ तु पूर्वोक्तौ ब्रह्मकृष्णयोः ॥ अन्तस्थस्य बहिष्ठे तु तस्य तस्मिन्नभेदतः॥ इति ब्रह्मवैवर्ते । काले तस्य तत्र लयो भविष्यतीति ध्यानमात्रं विलापनम् । 'अविद्यमानमपि यो ध्यायेतैवं विनिश्चितः । उच्यते तस्य कर्तेति तथैव मुनयोऽमलाः । जगद्विलापयामासुरित्युच्यन्तेऽथ तत्स्मृतेः । नच तत्स्मृतिमात्रेण लयो भवति निश्चितम्। इति हि नारदीये । 'स्वरूपं जायमानं च आकाशं च घटे द्विधा । स्वरूपं जायमाने तु घटे निर्भेदमेव हि ॥ भिन्नवद् व्यवहारस्य समर्थं तल्लये च तत् । तद्वदेवावतारेषु देहस्थश्च हरिः स्वयम् ॥ भिन्नवद् व्यवहाराय शक्तो लीने जगत्यपि । स एव पूर्ववज्ज्ञेयो निर्विशेषेण केशवः ॥ जायमानं घटे जाते जायते तल्लये तु न । तस्माद्भिन्नं महाकाशादेवं जीवोऽपि कीर्तितः ॥ उपाधेश्चैव नित्यत्वान्नैव जीवो विनश्यति । स्वरूपत्वादुपाधेश्च न भिन्नोपाधिकल्पनम् ॥
न चाभिन्नत्वमीशेन चिन्मात्रत्वं च युज्यते। इति ब्रह्मतर्के ॥ ५५ ॥
मायाशब्देन भण्यन्ते शब्दतत्त्वार्थवेदिभिः। इति नाममहोदधौ ॥
अत्र सत्वादयो मायागुणाः ॥ ५६ ॥