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Brahmasutra/C4/S3: Difference between revisions

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॥ इति अर्चिराद्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
॥ इति अर्चिराद्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
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‘तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षम्’ इत्यर्चिषः प्राथम्यं श्रूयते । ‘यदा ह वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति’ इति वायोः । तत्रार्चिषः प्राप्तिरेव प्रथमा ।
‘तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षम्’ इत्यर्चिषः प्राथम्यं श्रूयते । ‘यदा ह वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति’ इति वायोः । तत्रार्चिषः प्राप्तिरेव प्रथमा ।
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‘द्वावेव मार्गौ प्रतिथावर्चिरादिर्विपश्चिताम् ।
‘द्वावेव मार्गौ प्रतिथावर्चिरादिर्विपश्चिताम् ।
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‘अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधैर्वार्चिषः सम्प्रतिष्ठतिः ।अग्निं गत्वा ज्योतिरेति प्रथमं ब्रह्म संव्रजन् ।एकस्मिन्स्तुपुरे संस्थो द्विरूपोऽग्नेः सुतो महान्’इति च ब्रह्मतर्के॥
‘अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधैर्वार्चिषः सम्प्रतिष्ठतिः ।अग्निं गत्वा ज्योतिरेति प्रथमं ब्रह्म संव्रजन् ।एकस्मिन्स्तुपुरे संस्थो द्विरूपोऽग्नेः सुतो महान्’इति च ब्रह्मतर्के॥
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॥ इति वायुगत्यधिकरणम् ॥ 02 ॥
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अर्चिषो वायुं गच्छति ।‘स वायुमागच्छति’ इति सामान्यवचनात् ।‘स इतो गतो द्वितीयां गतिं वायुमागच्छति वायोरहरह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति विशेषवचनाच्च ॥ 02 ॥
अर्चिषो वायुं गच्छति ।‘स वायुमागच्छति’ इति सामान्यवचनात् ।‘स इतो गतो द्वितीयां गतिं वायुमागच्छति वायोरहरह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति विशेषवचनाच्च ॥ 02 ॥
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॥इति तटिदधिकरणम् ॥ 03 ॥
॥इति तटिदधिकरणम् ॥ 03 ॥
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‘मासेभ्यः सन्त्सरं संवत्सराद्वरुणलोकं वरुणलोकात् प्रजापति लोकम्’इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
‘मासेभ्यः सन्त्सरं संवत्सराद्वरुणलोकं वरुणलोकात् प्रजापति लोकम्’इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
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‘संवत्सरात् तटितमागच्छति तटितः प्रजापतिलोकम्’इति च गौपवनश्रुतिः ॥
‘संवत्सरात् तटितमागच्छति तटितः प्रजापतिलोकम्’इति च गौपवनश्रुतिः ॥
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‘तत्र तटितो वरुणं गच्छति । तटिता ह्यूह्यते वरुणलोकस्तटिदुपरि मुक्तामयो राजते तत्रासौ वरुणो राजा सत्यानृते विविञ्चति’ इत्युपरिसम्बबन्धश्रुतेः ॥ 03 ॥
‘तत्र तटितो वरुणं गच्छति । तटिता ह्यूह्यते वरुणलोकस्तटिदुपरि मुक्तामयो राजते तत्रासौ वरुणो राजा सत्यानृते विविञ्चति’ इत्युपरिसम्बबन्धश्रुतेः ॥ 03 ॥
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पूर्वोक्तस्त्वातिवाहिको वायुः । पूर्वगमनलिङ्गात् ॥ 04 ॥
पूर्वोक्तस्त्वातिवाहिको वायुः । पूर्वगमनलिङ्गात् ॥ 04 ॥
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कुतः ? –
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॥ इति अतिवाहिकाधिकरणम् ॥ 04 ॥
॥ इति अतिवाहिकाधिकरणम् ॥ 04 ॥
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‘स वायुमागच्छति’ इति प्रथममुच्यते ।
‘स वायुमागच्छति’ इति प्रथममुच्यते ।
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ब्रह्मतर्के च –
ब्रह्मतर्के च –
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‘उत्क्रान्तस्तु शरीरात् स्वाद्गच्छत्यर्चिषमेव तु ।
‘उत्क्रान्तस्तु शरीरात् स्वाद्गच्छत्यर्चिषमेव तु ।
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ततोऽहः पूर्वपक्षं चाप्युदक्संवत्सरं तथा ।
ततोऽहः पूर्वपक्षं चाप्युदक्संवत्सरं तथा ।
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सोमं वैश्वानरं चेन्द्रं ध्रुवं देवीं दिवं तथा ।
सोमं वैश्वानरं चेन्द्रं ध्रुवं देवीं दिवं तथा ।
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॥ इति वैद्युताधिकरणम् ॥ 05 ॥
॥ इति वैद्युताधिकरणम् ॥ 05 ॥
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प्रकारान्तरेण तत्र तत्रोच्यमानत्वाद्वायोरपि परतो ब्रह्मणोऽर्वाग्गन्तव्योऽस्तीति नाशङ्कनीयम् । विद्युत्पतिना वायुनैव ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति ब्रह्मगमनश्रुतेः ।
प्रकारान्तरेण तत्र तत्रोच्यमानत्वाद्वायोरपि परतो ब्रह्मणोऽर्वाग्गन्तव्योऽस्तीति नाशङ्कनीयम् । विद्युत्पतिना वायुनैव ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति ब्रह्मगमनश्रुतेः ।
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‘विद्युत्पतिर्वायुरेव नयेद्ब्रह्म न चापरः । कुतोऽन्यस्य भवेच्छक्तिस्तमृते प्राणनायकम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥
‘विद्युत्पतिर्वायुरेव नयेद्ब्रह्म न चापरः । कुतोऽन्यस्य भवेच्छक्तिस्तमृते प्राणनायकम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥
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‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति कार्यं गमयतीति बादरिर्मन्यते ।
‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति कार्यं गमयतीति बादरिर्मन्यते ।
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‘ऋते देवान् परं ब्रह्म कः पुमान् प्राप्नुयात् क्वचित् ।
‘ऋते देवान् परं ब्रह्म कः पुमान् प्राप्नुयात् क्वचित् ।
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‘यदि ह वाव परमभिपश्यति प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखं प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखम्’ इति कौषारवश्रुतौ ॥ 08 ॥
‘यदि ह वाव परमभिपश्यति प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखं प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखम्’ इति कौषारवश्रुतौ ॥ 08 ॥
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‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इति तद्व्यपदेशस्तु समीप एव परमपि प्राप्नोतीत्येतदर्थमेव ॥ 09 ॥
‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इति तद्व्यपदेशस्तु समीप एव परमपि प्राप्नोतीत्येतदर्थमेव ॥ 09 ॥
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कदा ? –
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‘ते ह ब्रह्माणमभिसम्पद्य यदैतद्विलीयतेऽथ सह ब्रह्मणा परमभिगच्छन्ति’ इति सौपर्णश्रुतेर्महाप्रलये तदध्यक्षेण ब्रह्मणा सह गच्छन्ति ॥ 10 ॥
‘ते ह ब्रह्माणमभिसम्पद्य यदैतद्विलीयतेऽथ सह ब्रह्मणा परमभिगच्छन्ति’ इति सौपर्णश्रुतेर्महाप्रलये तदध्यक्षेण ब्रह्मणा सह गच्छन्ति ॥ 10 ॥
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‘ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।
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ब्रह्मशब्दस्य तत्रैव मुख्यत्वात् परमेव ब्रह्म गमयतीति जैमिनिर्मन्यते ॥ 12 ॥
ब्रह्मशब्दस्य तत्रैव मुख्यत्वात् परमेव ब्रह्म गमयतीति जैमिनिर्मन्यते ॥ 12 ॥
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न हि कार्ये प्रतिपत्तिः प्राप्नवानीत्यभिसन्धिश्च ।
न हि कार्ये प्रतिपत्तिः प्राप्नवानीत्यभिसन्धिश्च ।
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‘यदुपास्ते पुमान् जीवन् यत् प्राप्तुमभिवाञ्छति ।यच्च पश्यति तृप्तः संस्तत् प्राप्नोति मृतेरनु’ इति पाद्मे ॥ 14 ॥
‘यदुपास्ते पुमान् जीवन् यत् प्राप्तुमभिवाञ्छति ।यच्च पश्यति तृप्तः संस्तत् प्राप्नोति मृतेरनु’ इति पाद्मे ॥ 14 ॥
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‘प्रतीकं देह उद्दिष्टो येषां तत्रैव दर्शनम् ।
‘प्रतीकं देह उद्दिष्टो येषां तत्रैव दर्शनम् ।
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एतेऽधिकारिणो व्याप्तदर्शनेऽन्ये न तु क्वचित् ।
एतेऽधिकारिणो व्याप्तदर्शनेऽन्ये न तु क्वचित् ।
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अप्रतीकाश्रया ये हि ते यान्ति परमेव तु ।
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इति गारुडवचनात् उभयत्रोक्तदोषाच्चाप्रतीकालम्बनान् परं नयति ।
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‘स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते’ इति श्रुतेश्च । अत्र कर्मोपासनमेव । अन्यान् कार्यं नयतीति भगवन्मतम् ॥ 15 ॥
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॥ इति कार्याधिकरणम् ॥ 06 ॥
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 04-03 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 04-03 ॥
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‘अन्तःप्रकाशा बहिःप्रकाशाः सर्वप्रकाशाः । देवा वाव सर्वप्रकाशाः ऋषयोऽन्तःप्रकाशाः मानुषा एव बहिःप्रकाशाः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥
‘अन्तःप्रकाशा बहिःप्रकाशाः सर्वप्रकाशाः । देवा वाव सर्वप्रकाशाः ऋषयोऽन्तःप्रकाशाः मानुषा एव बहिःप्रकाशाः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥

Revision as of 08:59, 10 April 2026

मार्गो गम्यं चास्मिन् पाद उच्यते –

अर्चिराद्यधिकरणम्

ॐ अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॐ ॥ 01-526 ॥


॥ इति अर्चिराद्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षम्’ इत्यर्चिषः प्राथम्यं श्रूयते । ‘यदा ह वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति’ इति वायोः । तत्रार्चिषः प्राप्तिरेव प्रथमा ।
‘द्वावेव मार्गौ प्रतिथावर्चिरादिर्विपश्चिताम् । धूमादिः कर्मिणां चैव सर्ववेदविनिर्णयात् ॥
‘अग्निर्ज्योतिरिति द्वेधैर्वार्चिषः सम्प्रतिष्ठतिः ।अग्निं गत्वा ज्योतिरेति प्रथमं ब्रह्म संव्रजन् ।एकस्मिन्स्तुपुरे संस्थो द्विरूपोऽग्नेः सुतो महान्’इति च ब्रह्मतर्के॥

वायुगत्यधिकरणम्

ॐ वायुशब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॐ ॥ 02-527 ॥


॥ इति वायुगत्यधिकरणम् ॥ 02 ॥
अर्चिषो वायुं गच्छति ।‘स वायुमागच्छति’ इति सामान्यवचनात् ।‘स इतो गतो द्वितीयां गतिं वायुमागच्छति वायोरहरह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति विशेषवचनाच्च ॥ 02 ॥

तटिदधिकरणम्

ॐ तटितोऽधिवरुणः सम्बन्धात् ॐ ॥ 03-528 ॥


॥इति तटिदधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘मासेभ्यः सन्त्सरं संवत्सराद्वरुणलोकं वरुणलोकात् प्रजापति लोकम्’इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
‘संवत्सरात् तटितमागच्छति तटितः प्रजापतिलोकम्’इति च गौपवनश्रुतिः ॥
‘तत्र तटितो वरुणं गच्छति । तटिता ह्यूह्यते वरुणलोकस्तटिदुपरि मुक्तामयो राजते तत्रासौ वरुणो राजा सत्यानृते विविञ्चति’ इत्युपरिसम्बबन्धश्रुतेः ॥ 03 ॥

अतिवाहिकाधिकरणम्

ॐ आतिवाहिकस्तल्लिङ्गात् ॐ ॥ 04-529 ॥


पूर्वोक्तस्त्वातिवाहिको वायुः । पूर्वगमनलिङ्गात् ॥ 04 ॥
ॐ उभयव्यामोहत् तत्सिद्धेः ॐ॥ 05-530 ॥


कुतः ? –
॥ इति अतिवाहिकाधिकरणम् ॥ 04 ॥
‘स वायुमागच्छति’ इति प्रथममुच्यते ।

‘उत्क्रान्तो विद्वान् परमभिगच्छन् विद्युतमेवान्तत उपगच्छति द्यौर्वाव विद्युत् तत्पतिं वायुमुपगम्य तेनैव ब्रह्म गच्छति’ इत्यन्तेऽपि वायुगमनश्रुतेः ।

पूर्वोक्त आतिवाहिकः परो वेति व्यामोहे उत्तरे दिवस्पतिरिति विशेषणात् पूर्वत्रातिवाहिकस्यैव सिद्धेः
ब्रह्मतर्के च –
‘उत्क्रान्तस्तु शरीरात् स्वाद्गच्छत्यर्चिषमेव तु । ततो हि वायोः पुत्रं च योऽसौनाम्नाऽऽतिवाहिकः ॥
ततोऽहः पूर्वपक्षं चाप्युदक्संवत्सरं तथा । तटितं वरुणं चैव प्रजापं सूर्यमेव च ॥
सोमं वैश्वानरं चेन्द्रं ध्रुवं देवीं दिवं तथा । ततो वायुं परं प्राप्य तेनैति पुरुषोत्तमम्’ इति ॥ 05 ॥

वैद्युताधिकरणम्

ॐ वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ॐ ॥ 06-531 ॥


॥ इति वैद्युताधिकरणम् ॥ 05 ॥
प्रकारान्तरेण तत्र तत्रोच्यमानत्वाद्वायोरपि परतो ब्रह्मणोऽर्वाग्गन्तव्योऽस्तीति नाशङ्कनीयम् । विद्युत्पतिना वायुनैव ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति ब्रह्मगमनश्रुतेः ।
‘विद्युत्पतिर्वायुरेव नयेद्ब्रह्म न चापरः । कुतोऽन्यस्य भवेच्छक्तिस्तमृते प्राणनायकम्’ इति बृहत्तन्त्रे ॥ 06 ॥

कार्याधिकरणम्

ॐ कार्यं बादरिरस्यगत्युपपत्तेः ॐ ॥ 07-532 ॥


‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति कार्यं गमयतीति बादरिर्मन्यते ।
‘ऋते देवान् परं ब्रह्म कः पुमान् प्राप्नुयात् क्वचित् । यद्यपि ब्रह्मदृष्टिः स्याद्ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्’ इत्यध्यात्मवचनात् तस्यैव गत्युपपत्तेः ॥ 07 ॥
ॐ विशेषितत्वाच्च ॐ ॥ 08-533 ॥


‘यदि ह वाव परमभिपश्यति प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखं प्राप्नोति ब्रह्माणं चतुर्मुखम्’ इति कौषारवश्रुतौ ॥ 08 ॥
ॐ सामीप्यात्तुतद्व्यपदेशः ॐ ॥ 09-534 ॥


‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इति तद्व्यपदेशस्तु समीप एव परमपि प्राप्नोतीत्येतदर्थमेव ॥ 09 ॥
ॐ कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ॐ॥ 10-535 ॥


कदा ? –
‘ते ह ब्रह्माणमभिसम्पद्य यदैतद्विलीयतेऽथ सह ब्रह्मणा परमभिगच्छन्ति’ इति सौपर्णश्रुतेर्महाप्रलये तदध्यक्षेण ब्रह्मणा सह गच्छन्ति ॥ 10 ॥
ॐ स्मृतेश्च ॐ ॥ 11-536 ॥


‘ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे । परस्यान्ते परात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्’ इति ॥ 11 ॥
ॐ परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॐ ॥ 12-537 ॥


ब्रह्मशब्दस्य तत्रैव मुख्यत्वात् परमेव ब्रह्म गमयतीति जैमिनिर्मन्यते ॥ 12 ॥
ॐ दर्शनाच्च ॐ ॥ 13-538 ॥


दृष्टत्वाच्छ परब्रह्मणः ॥ 13 ॥
ॐ न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॐ ॥ 14-539 ॥


न हि कार्ये प्रतिपत्तिः प्राप्नवानीत्यभिसन्धिश्च ।
‘यदुपास्ते पुमान् जीवन् यत् प्राप्तुमभिवाञ्छति ।यच्च पश्यति तृप्तः संस्तत् प्राप्नोति मृतेरनु’ इति पाद्मे ॥ 14 ॥
ॐ अप्रतीकालम्बनान् नयतीति बादरायण उभयथा च दोषात् तत्क्रतुश्च ॐ ॥ 15-540 ॥


‘प्रतीकं देह उद्दिष्टो येषां तत्रैव दर्शनम् । न तु व्याप्ततया क्वापि प्रतीकालम्बनास्तुते ॥
अप्रतीका देवतास्तु ऋषीणां शतमेव च । राज्ञां च शतमुद्दिष्टं गन्धर्वादि शतं तथा ॥
एतेऽधिकारिणो व्याप्तदर्शनेऽन्ये न तु क्वचित् । अयोग्यदर्शने यत्नाद्ब्रंशः पूर्वस्य चापि तु ॥
अप्रतीकाश्रया ये हि ते यान्ति परमेव तु ।

स्वेदेहे ब्रह्म दृष्ट्यैव गच्छेद्ब्रह्मसलोकताम् ।

ब्रह्मणा सह सम्प्राप्ते संहारे परमं पदम् ॥
इति गारुडवचनात् उभयत्रोक्तदोषाच्चाप्रतीकालम्बनान् परं नयति ।
‘स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते’ इति श्रुतेश्च । अत्र कर्मोपासनमेव । अन्यान् कार्यं नयतीति भगवन्मतम् ॥ 15 ॥
ॐ विशेषं च दर्शयति ॐ ॥ 16-541 ॥


॥ इति कार्याधिकरणम् ॥ 06 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 04-03 ॥
‘अन्तःप्रकाशा बहिःप्रकाशाः सर्वप्रकाशाः । देवा वाव सर्वप्रकाशाः ऋषयोऽन्तःप्रकाशाः मानुषा एव बहिःप्रकाशाः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥