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Brahmasutra/C2/S2: Difference between revisions

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अचेतनस्य स्वतः प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्नानुमानपरिकल्पितं प्रधानं जगत्कर्तृ । चशब्देन प्रमाणाभावं दर्शयति ॥ 01 ॥
अचेतनस्य स्वतः प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्नानुमानपरिकल्पितं प्रधानं जगत्कर्तृ । चशब्देन प्रमाणाभावं दर्शयति ॥ 01 ॥
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चेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिदर्शनाच्च ॥ 02 ॥
चेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिदर्शनाच्च ॥ 02 ॥
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पयोऽम्बुवदचेतनस्यापि प्रवृत्तिर्युज्यत इति न युक्तम् ।
पयोऽम्बुवदचेतनस्यापि प्रवृत्तिर्युज्यत इति न युक्तम् ।
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‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते , याश्च श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां य दिशमनु’
‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते , याश्च श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां य दिशमनु’
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‘एतेन ह वाव पयो मण्डं भवति’ इत्यादिना तत्रापीश्वरनिमित्तप्रवृत्तिश्रुतेः ॥ 03 ॥
‘एतेन ह वाव पयो मण्डं भवति’ इत्यादिना तत्रापीश्वरनिमित्तप्रवृत्तिश्रुतेः ॥ 03 ॥
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॥ इति रचनानुपपत्त्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
॥ इति रचनानुपपत्त्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
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‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे’ इति तद्व्यतिरेकेण कस्यापि कर्मणोऽनवस्थितेरनपेक्षितमेवाचेतनवादिमतम् ॥ 04 ॥
‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे’ इति तद्व्यतिरेकेण कस्यापि कर्मणोऽनवस्थितेरनपेक्षितमेवाचेतनवादिमतम् ॥ 04 ॥
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सेश्वरसाङ्ख्यमतं निराकरोति । यथा पृथिव्या एव पर्जन्यानुगृहीतं तृणादिकमुत्पद्यते, एवं प्रधानादीश्वरानुगृहीतं जगदित्यतो ब्रवीति-
सेश्वरसाङ्ख्यमतं निराकरोति । यथा पृथिव्या एव पर्जन्यानुगृहीतं तृणादिकमुत्पद्यते, एवं प्रधानादीश्वरानुगृहीतं जगदित्यतो ब्रवीति-
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॥ इति अन्यत्रभावाधिकरणम् ॥ 02 ॥
॥ इति अन्यत्रभावाधिकरणम् ॥ 02 ॥
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‘यच्च किञ्चित् जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।
‘यच्च किञ्चित् जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।
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‘ब्रह्मण्येवेदमाविरासीद्ब्रह्मणि स्थितं ब्रह्मण्येव लयमभ्येति ।
‘ब्रह्मण्येवेदमाविरासीद्ब्रह्मणि स्थितं ब्रह्मण्येव लयमभ्येति ।
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‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’ इत्यादिश्रुतिभ्योऽन्यत्र जगतोऽभावात् तृणादीनां पर्जन्यवन्नानुग्राहकत्वमात्रमीश्वरस्य ।
‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’ इत्यादिश्रुतिभ्योऽन्यत्र जगतोऽभावात् तृणादीनां पर्जन्यवन्नानुग्राहकत्वमात्रमीश्वरस्य ।
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‘स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत्’इति भागवते ।
‘स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत्’इति भागवते ।
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लोकायतिकपक्षं निराकरोति
लोकायतिकपक्षं निराकरोति
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॥ इति अभ्युपगमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
॥ इति अभ्युपगमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
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यस्य धर्माधर्मौ न स्तः तत्सिद्धान्ते किं प्रयोजनम् । अतः स्वव्याहतेरेवोपेक्ष्यः ॥ 06 ॥
यस्य धर्माधर्मौ न स्तः तत्सिद्धान्ते किं प्रयोजनम् । अतः स्वव्याहतेरेवोपेक्ष्यः ॥ 06 ॥
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पुरुषोपसर्जनप्रकृतिकर्तृवादमपाकरोति –
पुरुषोपसर्जनप्रकृतिकर्तृवादमपाकरोति –
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यथा चेतनसम्बन्धादचेतनमेव शरीरमश्मादिकमादाय गच्चति, एवमचेतनाऽपि प्रकृतिः पुरषसम्बन्धात् प्रवर्तत इति चेन्न । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’ इति तत्रापि तथात्वे दृष्टान्ताभावात् ॥ 07 ॥
यथा चेतनसम्बन्धादचेतनमेव शरीरमश्मादिकमादाय गच्चति, एवमचेतनाऽपि प्रकृतिः पुरषसम्बन्धात् प्रवर्तत इति चेन्न । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’ इति तत्रापि तथात्वे दृष्टान्ताभावात् ॥ 07 ॥
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॥ इति पुरुषाश्माधिकरणम् ॥ 04 ॥
॥ इति पुरुषाश्माधिकरणम् ॥ 04 ॥
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शरीरप्रवृत्तौपुरषस्याङ्गित्वात् ।
शरीरप्रवृत्तौपुरषस्याङ्गित्वात् ।
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‘अङ्गमङ्गी समादाय यथाकार्यं करोत्यसौ’ इत्यङ्गित्वव्यवहारोऽनुपपन्न ॥ 08 ॥
‘अङ्गमङ्गी समादाय यथाकार्यं करोत्यसौ’ इत्यङ्गित्वव्यवहारोऽनुपपन्न ॥ 08 ॥
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प्रकृत्युपसर्जनपुरुषकर्तृवादमपाकरोति –
प्रकृत्युपसर्जनपुरुषकर्तृवादमपाकरोति –
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शरीरसम्बन्धात् पुरुषः प्रवर्तत इत्यङ्गीकारेऽपि स्वतस्तस्यासामर्थ्याच्चरीरसम्बन्ध एवायुक्तः ॥ 09 ॥
शरीरसम्बन्धात् पुरुषः प्रवर्तत इत्यङ्गीकारेऽपि स्वतस्तस्यासामर्थ्याच्चरीरसम्बन्ध एवायुक्तः ॥ 09 ॥
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॥ इति अन्यथानुमित्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
॥ इति अन्यथानुमित्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
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सकलश्रुतिस्मृतियुक्तिविरुद्धत्वाच्चानीश्वरमतमसमञ्जसम् ।
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‘श्रुतयः स्मृतयश्चैव युक्तयश्चेश्वरं परम् ।
‘श्रुतयः स्मृतयश्चैव युक्तयश्चेश्वरं परम् ।
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परमाण्वारम्भवादमपाकरोति –
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महत्त्वाद्दीर्घत्वाच्च यथा कार्यमुत्पद्यते, एवं ह्रस्वत्वाद् पारिमण्डल्याच्चोत्पद्येत । वाशब्दादन्यथैतयोरपि न स्यात्, विशेषकारणाभावात् ॥ 11 ॥
महत्त्वाद्दीर्घत्वाच्च यथा कार्यमुत्पद्यते, एवं ह्रस्वत्वाद् पारिमण्डल्याच्चोत्पद्येत । वाशब्दादन्यथैतयोरपि न स्यात्, विशेषकारणाभावात् ॥ 11 ॥
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ईश्वरेच्छाया नित्यत्वे तद्भावेऽपि परमाणुकर्माभावान्नेदानीमपि स्यात् । अनित्यत्वे तत्कारणाभावात् । अतः परमाणुचेष्टाभावात् तत्कार्याभावः । वैदिकेश्वरस्य तु वेदेनैव सर्वशक्तित्वोक्तेः सर्वमुपपद्यते । स्वत एव काले विशेषाङ्गीकृतेश्च ॥ 12 ॥
ईश्वरेच्छाया नित्यत्वे तद्भावेऽपि परमाणुकर्माभावान्नेदानीमपि स्यात् । अनित्यत्वे तत्कारणाभावात् । अतः परमाणुचेष्टाभावात् तत्कार्याभावः । वैदिकेश्वरस्य तु वेदेनैव सर्वशक्तित्वोक्तेः सर्वमुपपद्यते । स्वत एव काले विशेषाङ्गीकृतेश्च ॥ 12 ॥
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कार्यकारणादीनां समवायसम्बन्दाङ्गीकारात् तस्य च भिन्नत्वसाम्यात् समवायान्तरापेक्षायामनवस्थितिः। न च तत्प्रमाणम् । प्रथमसम्बन्धा सिद्धैव च तदसिद्धिः । स्वनिर्वाहकत्वे समवाय एव न स्यात् ॥ 13 ॥
कार्यकारणादीनां समवायसम्बन्दाङ्गीकारात् तस्य च भिन्नत्वसाम्यात् समवायान्तरापेक्षायामनवस्थितिः। न च तत्प्रमाणम् । प्रथमसम्बन्धा सिद्धैव च तदसिद्धिः । स्वनिर्वाहकत्वे समवाय एव न स्यात् ॥ 13 ॥
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नित्यत्वाच्च परमाणूनां समवायस्य च तस्यैव जनित्वाङ्गीकारान्नित्यमेव कार्यं स्यात् । अन्यथा न कदाचित् ॥ 14 ॥
नित्यत्वाच्च परमाणूनां समवायस्य च तस्यैव जनित्वाङ्गीकारान्नित्यमेव कार्यं स्यात् । अन्यथा न कदाचित् ॥ 14 ॥
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रूपादिमत्त्वाच्च परमाणूनामनित्यत्वम् । तथा दृष्टत्वाल्लोके ॥ 15 ॥
रूपादिमत्त्वाच्च परमाणूनामनित्यत्वम् । तथा दृष्टत्वाल्लोके ॥ 15 ॥
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नित्यत्वे परमाणूनां तद्वत् सर्वनित्यत्वं स्यात् । विशेषप्रमाणाभावात् अनित्यत्वे कारणाभावात् तदुत्पत्त्यभावः ॥ 16 ॥
नित्यत्वे परमाणूनां तद्वत् सर्वनित्यत्वं स्यात् । विशेषप्रमाणाभावात् अनित्यत्वे कारणाभावात् तदुत्पत्त्यभावः ॥ 16 ॥
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॥ इति वैशेषिकाधिकरणम् ॥ 06 ॥
॥ इति वैशेषिकाधिकरणम् ॥ 06 ॥
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सकलश्रुतिस्मृत्यपरिगृहीतत्वाच्चातिशयेनानपेक्षता ।
सकलश्रुतिस्मृत्यपरिगृहीतत्वाच्चातिशयेनानपेक्षता ।
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‘आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थकम्’ इति मोक्षधर्मे ॥ 17 ॥
‘आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थकम्’ इति मोक्षधर्मे ॥ 17 ॥
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परमाणुपुञ्जवादिमतं निराकरोति-
परमाणुपुञ्जवादिमतं निराकरोति-
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समुदायस्यैकहेतुकत्वं न युज्यते । उभयहेतुकेऽप्यन्योऽन्याश्रयात् तदप्राप्तिः । अन्यथा सर्वदा समुदायसत्त्वं स्यात् ॥ 18 ॥
समुदायस्यैकहेतुकत्वं न युज्यते । उभयहेतुकेऽप्यन्योऽन्याश्रयात् तदप्राप्तिः । अन्यथा सर्वदा समुदायसत्त्वं स्यात् ॥ 18 ॥
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सर्वदा विद्यमानोऽपि समुदाय परस्परापेक्षया व्यवह्रियत इति चेन्न । एकं कार्यमुत्पाद्य तस्य विनष्टत्वात् परस्परप्रत्ययस्तदपेक्षया व्यवहार इति न युज्यते । कारणे सति कार्यं भवत्येवेति हि तस्य नियमः ॥ 19 ॥
सर्वदा विद्यमानोऽपि समुदाय परस्परापेक्षया व्यवह्रियत इति चेन्न । एकं कार्यमुत्पाद्य तस्य विनष्टत्वात् परस्परप्रत्ययस्तदपेक्षया व्यवहार इति न युज्यते । कारणे सति कार्यं भवत्येवेति हि तस्य नियमः ॥ 19 ॥
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कार्योत्पत्तावेव कारणस्य विनाशाच्च न विशेषकार्योत्पत्तिः ॥ 20 ॥
कार्योत्पत्तावेव कारणस्य विनाशाच्च न विशेषकार्योत्पत्तिः ॥ 20 ॥
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कारणे विनष्टे कार्यमुत्पद्यते चेत् तत्कार्यमिति प्रतिज्ञाहानिः । तत्काले कारणमस्ति चेद्विनाशकारणाभावद्यौगपद्यं सर्वकार्याणाम् ॥ 21 ॥
कारणे विनष्टे कार्यमुत्पद्यते चेत् तत्कार्यमिति प्रतिज्ञाहानिः । तत्काले कारणमस्ति चेद्विनाशकारणाभावद्यौगपद्यं सर्वकार्याणाम् ॥ 21 ॥
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कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमान्निस्सन्तानः ससन्तानश्च विनाशो न युज्यते ॥ 22 ॥
कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमान्निस्सन्तानः ससन्तानश्च विनाशो न युज्यते ॥ 22 ॥
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कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमे सर्वदा कार्यभावान्न कार्यकारणविशेषः । अनियमे कार्यानुत्पत्तिः ॥ 23 ॥
कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमे सर्वदा कार्यभावान्न कार्यकारणविशेषः । अनियमे कार्यानुत्पत्तिः ॥ 23 ॥
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दीपादिषु विशेषदर्शनात् क्षणिकत्वेनान्यत्रापि क्षणिकत्वमनुमीयते चेदाकाशादिष्वविशेषदर्शनादन्यत्रापि तदनुमीयते ॥ 24 ॥
दीपादिषु विशेषदर्शनात् क्षणिकत्वेनान्यत्रापि क्षणिकत्वमनुमीयते चेदाकाशादिष्वविशेषदर्शनादन्यत्रापि तदनुमीयते ॥ 24 ॥
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॥ इति समुदायाधिकरणम् ॥ 07 ॥
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तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानाच्च । प्रत्यभिज्ञाय ब्रान्तित्वे विशेषदर्शनस्यापि ब्रान्तित्वम् ॥ 25 ॥
तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानाच्च । प्रत्यभिज्ञाय ब्रान्तित्वे विशेषदर्शनस्यापि ब्रान्तित्वम् ॥ 25 ॥
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शून्यवादमपाकरोति-
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अदृष्टत्वादसतः कारणत्वं न युज्यते ॥ 26 ॥
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असतः कारणत्वे उदासीनानां हेयोपादेयबुद्धिवर्जितानां खपुष्पादीनामपि सकाशात् कार्यसिद्धिः । चशब्दान्न चेदन्यत्रापि न स्यादविशेषात् ॥ 27 ॥
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न च जगदेव शून्यमिति वाच्यम् । दृष्टत्वात् ॥28॥
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न च दृष्टस्यापि स्वप्नादिवदभावः। तस्योत्तरकाले’स्वप्नोयं’,’नायं सर्पः’ इत्याद्यनुभवात् । न चात्र तादृशं प्रमाणमस्ति ॥ 29 ॥
न च दृष्टस्यापि स्वप्नादिवदभावः। तस्योत्तरकाले’स्वप्नोयं’,’नायं सर्पः’ इत्याद्यनुभवात् । न चात्र तादृशं प्रमाणमस्ति ॥ 29 ॥
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विज्ञानवादमपाकरोति-
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न विज्ञानमात्रं जगत् । तथाऽनुभवाभावात् ॥ 30 ॥
न विज्ञानमात्रं जगत् । तथाऽनुभवाभावात् ॥ 30 ॥
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ज्ञानं क्षणिकम् । अर्थानां च स्थायित्वमुक्तम् । आतश्च नैक्यम् ॥ 31 ॥
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प्रमाणाभावात् सर्वश्रुतिस्मृतिर्युक्तिविरुद्धत्वाच्च नैते पक्षा ग्राह्याः ॥ 32 ॥
प्रमाणाभावात् सर्वश्रुतिस्मृतिर्युक्तिविरुद्धत्वाच्च नैते पक्षा ग्राह्याः ॥ 32 ॥
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स्याद्वादिमतं दूषयति-
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सत् स्यादसत् स्यात् सदसत् स्यात् ततोऽन्यच्च स्यादित्येतन्नैकस्मिन् युज्यते । अदृष्टत्वेनासम्भवात् ॥ 33 ॥
सत् स्यादसत् स्यात् सदसत् स्यात् ततोऽन्यच्च स्यादित्येतन्नैकस्मिन् युज्यते । अदृष्टत्वेनासम्भवात् ॥ 33 ॥
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जीवस्य शरीरपरिमितत्वाङ्गीकारेऽण्वादिशरीरस्थस्य हस्तादिशरीरेऽकार्त्स्न्यं स्यात् ॥34॥
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तत्तच्छरीरस्थस्य तत्तत्परिमाणत्वमिति न मन्तव्यम् । विकारित्वादनित्यत्वप्रसक्तेः ॥ 35 ॥
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परिमाणाभावे स्वरूपाभावप्राप्त्याऽन्त्यपरिमाणस्थितेस्तदर्थत्वेन शरीरस्थितेरुभयनित्यत्वादविशेषेण सर्वशरीरनित्यत्वं स्यात् ॥ 36 ॥
परिमाणाभावे स्वरूपाभावप्राप्त्याऽन्त्यपरिमाणस्थितेस्तदर्थत्वेन शरीरस्थितेरुभयनित्यत्वादविशेषेण सर्वशरीरनित्यत्वं स्यात् ॥ 36 ॥
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पाशुपतपक्षमपाकरोति-
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‘अस्य देवस्य मील्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
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इदमेव जगत् तस्य करणवदधिष्ठानादिरूपम् । नित्यस्यापि कस्यचिद्भावाद्युज्यत इति चेन्न भोगादिप्राप्तेः। उत्पत्तिविनाशौ सुखदुःखभोगाश्च प्राप्यन्ते तद्गताः ॥ 40 ॥
इदमेव जगत् तस्य करणवदधिष्ठानादिरूपम् । नित्यस्यापि कस्यचिद्भावाद्युज्यत इति चेन्न भोगादिप्राप्तेः। उत्पत्तिविनाशौ सुखदुःखभोगाश्च प्राप्यन्ते तद्गताः ॥ 40 ॥
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देहवत्वेऽन्तवत्वम् । अन्यथा ज्ञानाभावः । शरीरिण एव हि ज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । विष्णोस्तु श्रुत्यैव सर्वे विरोधाः परिहृताः ।
देहवत्वेऽन्तवत्वम् । अन्यथा ज्ञानाभावः । शरीरिण एव हि ज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । विष्णोस्तु श्रुत्यैव सर्वे विरोधाः परिहृताः ।
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‘यदात्मको भगवांस्तदात्मिका व्यक्तिः ।
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‘बुद्धिमनोऽङ्गप्रत्यङ्गवत्तां भगवतो लक्षयामहे । बुद्धिमान् मनोवानङ्गप्रत्यङ्गवान्’ इति
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शक्तिपक्षं दूषयति-
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न हि पुरुषाननुगृहीतस्त्रीभ्य उत्पत्तिर्दृश्यते ॥ 42 ॥
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यदि पुरुषोऽङ्गीक्रियेत तस्यापि करणाभावादनुपपत्तिः ॥ 43 ॥
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यदि विज्ञानादिकरणं तस्याङ्गीक्रियते तदा तत एव सृष्ट्याद्युपपत्तेरीश्वरवादान्तर्भावः ॥ 44 ॥
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॥ इति उत्पत्त्य(शक्त्य)धिकरणम् ॥ 12 ॥
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 02-02 ॥
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सकलश्रुत्यादिविरुद्धत्वाच्चासमञ्जसम् ॥ 45 ॥
सकलश्रुत्यादिविरुद्धत्वाच्चासमञ्जसम् ॥ 45 ॥

Revision as of 08:59, 10 April 2026

‘इतरेषां चानुपलब्धेः’ इति सामान्यतो निराकरणं समयानां कृतम्।विशेषतो निराकरोत्यस्मिन् पादे ।

अचेतनप्रवृत्तिमतं प्रथमतो निराकरोति –

रचनानुपपत्त्यधिकरणम्

ॐ रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॐ ॥ 01-174 ॥


अचेतनस्य स्वतः प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्नानुमानपरिकल्पितं प्रधानं जगत्कर्तृ । चशब्देन प्रमाणाभावं दर्शयति ॥ 01 ॥
ॐ प्रवृत्तेश्च ॐ ॥ 02-175 ॥


चेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिदर्शनाच्च ॥ 02 ॥
ॐ पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि ॐ ॥ 03-176 ॥


पयोऽम्बुवदचेतनस्यापि प्रवृत्तिर्युज्यत इति न युक्तम् ।
‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते , याश्च श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां य दिशमनु’
‘एतेन ह वाव पयो मण्डं भवति’ इत्यादिना तत्रापीश्वरनिमित्तप्रवृत्तिश्रुतेः ॥ 03 ॥
ॐ व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् ॐ ॥ 04-177 ॥


॥ इति रचनानुपपत्त्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे’ इति तद्व्यतिरेकेण कस्यापि कर्मणोऽनवस्थितेरनपेक्षितमेवाचेतनवादिमतम् ॥ 04 ॥

अन्यत्रभावाधिकरणम्

ॐ अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॐ॥ 05-178 ॥


सेश्वरसाङ्ख्यमतं निराकरोति । यथा पृथिव्या एव पर्जन्यानुगृहीतं तृणादिकमुत्पद्यते, एवं प्रधानादीश्वरानुगृहीतं जगदित्यतो ब्रवीति-
॥ इति अन्यत्रभावाधिकरणम् ॥ 02 ॥
‘यच्च किञ्चित् जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः’
‘ब्रह्मण्येवेदमाविरासीद्ब्रह्मणि स्थितं ब्रह्मण्येव लयमभ्येति । ब्रह्मैवाधस्ताद्ब्रह्मैवोपरिष्ठाद्ब्रह्म मध्यतो ब्रह्म सर्वतः’ ॥
‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’ इत्यादिश्रुतिभ्योऽन्यत्र जगतोऽभावात् तृणादीनां पर्जन्यवन्नानुग्राहकत्वमात्रमीश्वरस्य ।
‘स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत्’इति भागवते ।

अभ्युपगमाधिकरणम्

ॐ अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॐ ॥ 06-179 ॥


लोकायतिकपक्षं निराकरोति
॥ इति अभ्युपगमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
यस्य धर्माधर्मौ न स्तः तत्सिद्धान्ते किं प्रयोजनम् । अतः स्वव्याहतेरेवोपेक्ष्यः ॥ 06 ॥

पुरुषाश्माधिकरणम्

ॐ पुरुषाश्मवदिति चेत् तथाऽपि ॐ ॥ 07-180 ॥


पुरुषोपसर्जनप्रकृतिकर्तृवादमपाकरोति –
यथा चेतनसम्बन्धादचेतनमेव शरीरमश्मादिकमादाय गच्चति, एवमचेतनाऽपि प्रकृतिः पुरषसम्बन्धात् प्रवर्तत इति चेन्न । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’ इति तत्रापि तथात्वे दृष्टान्ताभावात् ॥ 07 ॥
ॐ अङ्गीत्वानुपपतेः ॐ ॥ 08-181 ॥


॥ इति पुरुषाश्माधिकरणम् ॥ 04 ॥
शरीरप्रवृत्तौपुरषस्याङ्गित्वात् ।
‘अङ्गमङ्गी समादाय यथाकार्यं करोत्यसौ’ इत्यङ्गित्वव्यवहारोऽनुपपन्न ॥ 08 ॥

अन्यथानुमित्यधिकरणम्

ॐ अन्यथाऽनुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॐ ॥ 09-182 ॥


प्रकृत्युपसर्जनपुरुषकर्तृवादमपाकरोति –
शरीरसम्बन्धात् पुरुषः प्रवर्तत इत्यङ्गीकारेऽपि स्वतस्तस्यासामर्थ्याच्चरीरसम्बन्ध एवायुक्तः ॥ 09 ॥
ॐ विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॐ ॥ 10-183 ॥


॥ इति अन्यथानुमित्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
सकलश्रुतिस्मृतियुक्तिविरुद्धत्वाच्चानीश्वरमतमसमञ्जसम् ।
‘श्रुतयः स्मृतयश्चैव युक्तयश्चेश्वरं परम् । वदन्ति तद्विरुद्धं यो वदेत् तस्मान्न चाधमः’ इति पाद्मे ॥ 10 ॥

वैशेषिकाधिकरणम्

ॐ महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ॐ ॥ 11-184 ॥


परमाण्वारम्भवादमपाकरोति –
महत्त्वाद्दीर्घत्वाच्च यथा कार्यमुत्पद्यते, एवं ह्रस्वत्वाद् पारिमण्डल्याच्चोत्पद्येत । वाशब्दादन्यथैतयोरपि न स्यात्, विशेषकारणाभावात् ॥ 11 ॥
ॐ उभयथाऽपि न कर्मातस्तदभावः ॐ ॥ 12-185 ॥


ईश्वरेच्छाया नित्यत्वे तद्भावेऽपि परमाणुकर्माभावान्नेदानीमपि स्यात् । अनित्यत्वे तत्कारणाभावात् । अतः परमाणुचेष्टाभावात् तत्कार्याभावः । वैदिकेश्वरस्य तु वेदेनैव सर्वशक्तित्वोक्तेः सर्वमुपपद्यते । स्वत एव काले विशेषाङ्गीकृतेश्च ॥ 12 ॥
ॐ समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॐ ॥ 13-186 ॥


कार्यकारणादीनां समवायसम्बन्दाङ्गीकारात् तस्य च भिन्नत्वसाम्यात् समवायान्तरापेक्षायामनवस्थितिः। न च तत्प्रमाणम् । प्रथमसम्बन्धा सिद्धैव च तदसिद्धिः । स्वनिर्वाहकत्वे समवाय एव न स्यात् ॥ 13 ॥
ॐ नित्यमेव च भावात् ॐ ॥ 14-187 ॥


नित्यत्वाच्च परमाणूनां समवायस्य च तस्यैव जनित्वाङ्गीकारान्नित्यमेव कार्यं स्यात् । अन्यथा न कदाचित् ॥ 14 ॥
ॐ रूपादिमत्त्वाच्चविपर्ययो दर्शनात् ॐ ॥ 15-188 ॥


रूपादिमत्त्वाच्च परमाणूनामनित्यत्वम् । तथा दृष्टत्वाल्लोके ॥ 15 ॥
ॐ उभयथा च दोषात् ॐ ॥ 16-189 ॥


नित्यत्वे परमाणूनां तद्वत् सर्वनित्यत्वं स्यात् । विशेषप्रमाणाभावात् अनित्यत्वे कारणाभावात् तदुत्पत्त्यभावः ॥ 16 ॥
ॐ अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॐ ॥ 17-190 ॥


॥ इति वैशेषिकाधिकरणम् ॥ 06 ॥
सकलश्रुतिस्मृत्यपरिगृहीतत्वाच्चातिशयेनानपेक्षता ।
‘आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थकम्’ इति मोक्षधर्मे ॥ 17 ॥

समुदायाधिकरणम्

ॐ समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॐ ॥ 18-191 ॥


परमाणुपुञ्जवादिमतं निराकरोति-
समुदायस्यैकहेतुकत्वं न युज्यते । उभयहेतुकेऽप्यन्योऽन्याश्रयात् तदप्राप्तिः । अन्यथा सर्वदा समुदायसत्त्वं स्यात् ॥ 18 ॥
ॐ इतरेतरप्रत्ययात्वादिति चेन्न उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ॐ ॥ 19-192 ॥


सर्वदा विद्यमानोऽपि समुदाय परस्परापेक्षया व्यवह्रियत इति चेन्न । एकं कार्यमुत्पाद्य तस्य विनष्टत्वात् परस्परप्रत्ययस्तदपेक्षया व्यवहार इति न युज्यते । कारणे सति कार्यं भवत्येवेति हि तस्य नियमः ॥ 19 ॥
ॐ उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॐ ॥ 20-193 ॥


कार्योत्पत्तावेव कारणस्य विनाशाच्च न विशेषकार्योत्पत्तिः ॥ 20 ॥
ॐ असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॐ ॥ 21-194 ॥


कारणे विनष्टे कार्यमुत्पद्यते चेत् तत्कार्यमिति प्रतिज्ञाहानिः । तत्काले कारणमस्ति चेद्विनाशकारणाभावद्यौगपद्यं सर्वकार्याणाम् ॥ 21 ॥
ॐ प्रतिसङ्ख्याऽप्रतिसङ्ख्यानिरोधप्राप्तिरविच्छेदात् ॐ ॥ 22 -195 ॥


कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमान्निस्सन्तानः ससन्तानश्च विनाशो न युज्यते ॥ 22 ॥
ॐ उभयथा च दोषात् ॐ ॥ 23-196 ॥


कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमे सर्वदा कार्यभावान्न कार्यकारणविशेषः । अनियमे कार्यानुत्पत्तिः ॥ 23 ॥
ॐ आकाशे चाविशेषात् ॐ ॥ 24-197 ॥


दीपादिषु विशेषदर्शनात् क्षणिकत्वेनान्यत्रापि क्षणिकत्वमनुमीयते चेदाकाशादिष्वविशेषदर्शनादन्यत्रापि तदनुमीयते ॥ 24 ॥
ॐ अनुस्मृतेश्च ॐ ॥ 25-198 ॥


॥ इति समुदायाधिकरणम् ॥ 07 ॥
तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानाच्च । प्रत्यभिज्ञाय ब्रान्तित्वे विशेषदर्शनस्यापि ब्रान्तित्वम् ॥ 25 ॥

असदधिकरणम्

ॐ नासतोऽदृष्टत्वात् ॐ ॥ 26-199 ॥


शून्यवादमपाकरोति-
अदृष्टत्वादसतः कारणत्वं न युज्यते ॥ 26 ॥
ॐ उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॐ ॥ 27-200 ॥


असतः कारणत्वे उदासीनानां हेयोपादेयबुद्धिवर्जितानां खपुष्पादीनामपि सकाशात् कार्यसिद्धिः । चशब्दान्न चेदन्यत्रापि न स्यादविशेषात् ॥ 27 ॥
ॐ नाभाव उपलब्धेः ॐ ॥ 28-201 ॥


न च जगदेव शून्यमिति वाच्यम् । दृष्टत्वात् ॥28॥
ॐ वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॐ ॥ 29-202 ॥


॥ इति असदधिकरणम् ॥ 08 ॥
न च दृष्टस्यापि स्वप्नादिवदभावः। तस्योत्तरकाले’स्वप्नोयं’,’नायं सर्पः’ इत्याद्यनुभवात् । न चात्र तादृशं प्रमाणमस्ति ॥ 29 ॥

अनुपलब्द्यधिकरणम्

ॐ न भावोऽनुपलब्धेः ॐ ॥ 30-203 ॥


विज्ञानवादमपाकरोति-
न विज्ञानमात्रं जगत् । तथाऽनुभवाभावात् ॥ 30 ॥
ॐ क्षणिकत्वाच्च ॐ ॥ 31-204 ॥


ज्ञानं क्षणिकम् । अर्थानां च स्थायित्वमुक्तम् । आतश्च नैक्यम् ॥ 31 ॥
ॐ सर्वथाऽनुपपत्तेश्च ॐ ॥ 32-205 ॥


॥ इति अनुपलब्द्यधिकरणम् ॥ 09 ॥
प्रमाणाभावात् सर्वश्रुतिस्मृतिर्युक्तिविरुद्धत्वाच्च नैते पक्षा ग्राह्याः ॥ 32 ॥

नैकस्मिन्नधिकरणम्

ॐ नैकस्मिन्नसम्भवात् ॐ ॥ 33-206 ॥


स्याद्वादिमतं दूषयति-
सत् स्यादसत् स्यात् सदसत् स्यात् ततोऽन्यच्च स्यादित्येतन्नैकस्मिन् युज्यते । अदृष्टत्वेनासम्भवात् ॥ 33 ॥
ॐ एवञ्चात्माकार्त्स्न्यम् ॐ ॥ 34-207 ॥


जीवस्य शरीरपरिमितत्वाङ्गीकारेऽण्वादिशरीरस्थस्य हस्तादिशरीरेऽकार्त्स्न्यं स्यात् ॥34॥
ॐ न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ 35-208 ॥


तत्तच्छरीरस्थस्य तत्तत्परिमाणत्वमिति न मन्तव्यम् । विकारित्वादनित्यत्वप्रसक्तेः ॥ 35 ॥
ॐ अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषात् ॐ ॥ 36-209 ॥


॥ इति नैकस्मिन्नधिकरणम् (स्याद्वाद्यधिकरणम्) ॥10॥
परिमाणाभावे स्वरूपाभावप्राप्त्याऽन्त्यपरिमाणस्थितेस्तदर्थत्वेन शरीरस्थितेरुभयनित्यत्वादविशेषेण सर्वशरीरनित्यत्वं स्यात् ॥ 36 ॥

पत्युरधिकरणम्(पशुपत्यधिकरणम्)

ॐ पत्युरसामञ्जस्यात् ॐ ॥ 37-210 ॥


पाशुपतपक्षमपाकरोति-
‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’ ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ’।
‘अस्य देवस्य मील्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्’।
‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नाग्नीषोमौ’ इत्यादि श्रुतेः पारतन्त्र्येणासमञ्जसत्वान्न पशुपतीरीश्वरो जगत्कर्ता ॥ 37 ॥
ॐ सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॐ ॥ 38-211 ॥


अशरीरत्वात् तस्य जगता सम्बन्धो न युज्यते कर्तृत्वेन मृतपुरुषवत् ॥38॥
ॐ अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॐ ॥ 39-212 ॥


पृथिव्याद्यधिष्ठाने स्थितो हि कुलालादिः कार्यं करोति । न चास्य तदस्ति ॥ 39 ॥
ॐ करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॐ ॥ 40-213 ॥


इदमेव जगत् तस्य करणवदधिष्ठानादिरूपम् । नित्यस्यापि कस्यचिद्भावाद्युज्यत इति चेन्न भोगादिप्राप्तेः। उत्पत्तिविनाशौ सुखदुःखभोगाश्च प्राप्यन्ते तद्गताः ॥ 40 ॥
ॐ अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॐ ॥ 41-214 ॥


॥ इति पत्युरधिकरणम् (पशुपत्यधिकरणम्) ॥ 11 ॥
देहवत्वेऽन्तवत्वम् । अन्यथा ज्ञानाभावः । शरीरिण एव हि ज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । विष्णोस्तु श्रुत्यैव सर्वे विरोधाः परिहृताः ।
‘यदात्मको भगवांस्तदात्मिका व्यक्तिः । किमात्मको भगवान् ज्ञानात्मक ऐश्वर्यात्मकः शक्त्यात्मकः’इति ।
‘बुद्धिमनोऽङ्गप्रत्यङ्गवत्तां भगवतो लक्षयामहे । बुद्धिमान् मनोवानङ्गप्रत्यङ्गवान्’ इति
‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः । ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमाक्षरः’ ॥ इत्यादिकया ॥ 41 ॥

उत्पत्त्य(शक्त्य)धिकरणम्

ॐ उत्पत्यसम्भवात् ॐ ॥ 42-215 ॥


शक्तिपक्षं दूषयति-
न हि पुरुषाननुगृहीतस्त्रीभ्य उत्पत्तिर्दृश्यते ॥ 42 ॥
ॐ न च कर्तुः करणम् ॐ ॥ 43-216 ॥


यदि पुरुषोऽङ्गीक्रियेत तस्यापि करणाभावादनुपपत्तिः ॥ 43 ॥
ॐ विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॐ ॥ 44-217 ॥


यदि विज्ञानादिकरणं तस्याङ्गीक्रियते तदा तत एव सृष्ट्याद्युपपत्तेरीश्वरवादान्तर्भावः ॥ 44 ॥
ॐ विप्रतिषेधाच्च ॐ ॥ 45-218 ॥


॥ इति उत्पत्त्य(शक्त्य)धिकरणम् ॥ 12 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 02-02 ॥
सकलश्रुत्यादिविरुद्धत्वाच्चासमञ्जसम् ॥ 45 ॥