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Brahmasutra/C1/S3: Difference between revisions

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तत्र चान्यत्र च प्रसिद्धानां शब्दानां विष्णौ समन्वयं प्रायेणास्मिन् पादे दर्शयति ।
तत्र चान्यत्र च प्रसिद्धानां शब्दानां विष्णौ समन्वयं प्रायेणास्मिन् पादे दर्शयति ।
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‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’इत्यात्मशब्दात् द्युभ्वाद्याश्रयो विष्णुरेव ।
‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’इत्यात्मशब्दात् द्युभ्वाद्याश्रयो विष्णुरेव ।
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‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् ।
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न सम्भवन्ति यस्मात् तैर्नैवाप्तागुणपूर्णता’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 1 ॥
न सम्भवन्ति यस्मात् तैर्नैवाप्तागुणपूर्णता’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 1 ॥
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‘अमृतस्यैष सेतुः’ इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’,‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ ,‘मुक्तानां परमा गतिः’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् ।
‘अमृतस्यैष सेतुः’ इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’,‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ ,‘मुक्तानां परमा गतिः’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् ।
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‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।
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योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रनिर्णयः’॥ इत्यादित्यपुराणे ॥ 2 ॥
योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रनिर्णयः’॥ इत्यादित्यपुराणे ॥ 2 ॥
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नानुमानात्मकागमपरिकल्पितरुद्रोऽत्र वाच्यः । भस्मधरोग्रत्वादितच्छब्दाभावात् ।
नानुमानात्मकागमपरिकल्पितरुद्रोऽत्र वाच्यः । भस्मधरोग्रत्वादितच्छब्दाभावात् ।
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‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः परोवरीयान्’इत्यादिना प्राणग्रन्थिरुद्रत्वादेर्विष्णोरेवोक्तत्वात् ।ब्रह्माण्डे च
‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः परोवरीयान्’इत्यादिना प्राणग्रन्थिरुद्रत्वादेर्विष्णोरेवोक्तत्वात् ।ब्रह्माण्डे च
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‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः ।
‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः ।
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पिबन्ति ये नरा नाकं मुक्ताः संसारसागरात् ।
पिबन्ति ये नरा नाकं मुक्ताः संसारसागरात् ।
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शिवः सुखात्मकत्वेन शर्वः शंरोधनाद्धरिः ।
शिवः सुखात्मकत्वेन शर्वः शंरोधनाद्धरिः ।
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कृत्तिवासास्ततो देवो विरिञ्चश्च विरेचनात् ।
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एवं नानाविधैः शब्दैरेक एव त्रिविक्रमः ।
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वामने च –
वामने च –
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‘न तु नारायणादीनां नाम्नामन्यत्र सम्भवः ।  अन्यनाम्नां गतिर्विष्णुरेक एव प्रकीर्तितः’ इति ॥
‘न तु नारायणादीनां नाम्नामन्यत्र सम्भवः ।  अन्यनाम्नां गतिर्विष्णुरेक एव प्रकीर्तितः’ इति ॥
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स्कान्दे च –
स्कान्दे च –
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‘ऋते नारायणादीनि नामानि पुरुषोत्तमः ।
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‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति ।
‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति ।
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विशेषनामानि ददौ स्वकीयान्यपि केशवः’इति च ब्राह्मे ॥ 3 ॥
विशेषनामानि ददौ स्वकीयान्यपि केशवः’इति च ब्राह्मे ॥ 3 ॥
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एतैरेव हेतुभिर्न जीवो वायुश्च । ‘अजायमानो बहुधा विजायत’ इति तस्यैव बहुधा जन्मोक्तेः ॥ 04॥
एतैरेव हेतुभिर्न जीवो वायुश्च । ‘अजायमानो बहुधा विजायत’ इति तस्यैव बहुधा जन्मोक्तेः ॥ 04॥
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न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानम्’ इति भेदव्यपदेशात् ॥ 05 ॥
न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानम्’ इति भेदव्यपदेशात् ॥ 05 ॥
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‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥
‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥
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॥ इति द्युभ्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥
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‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
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‘प्राणो व अशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा’ यो वै भूमा तत्सुखम्’ । इत्युक्तेस्यैव भूमत्वप्राप्तिः । ‘उत्क्रान्तप्राणान्’ इत्यादिलिङ्गात् प्राणशब्दश्च वायुवाचीत्यतो वक्ति –
‘प्राणो व अशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा’ यो वै भूमा तत्सुखम्’ । इत्युक्तेस्यैव भूमत्वप्राप्तिः । ‘उत्क्रान्तप्राणान्’ इत्यादिलिङ्गात् प्राणशब्दश्च वायुवाचीत्यतो वक्ति –
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‘सम्प्रसादात्’ पूर्णसुखरूपत्वात् ‘अध्युपदेशात्’ सर्वेशामुपर्युपदेशाच्च विष्णुरेव भूमा ।
‘सम्प्रसादात्’ पूर्णसुखरूपत्वात् ‘अध्युपदेशात्’ सर्वेशामुपर्युपदेशाच्च विष्णुरेव भूमा ।
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‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’ इति श्रुतिः
‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’ इति श्रुतिः
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‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’ इत्यादिना नोत्क्रमणादिलिङ्गविरोधोऽपि ॥08॥
‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’ इत्यादिना नोत्क्रमणादिलिङ्गविरोधोऽपि ॥08॥
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इति भूमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
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सर्वगतत्वादिधर्मोपपतेश्च ॥09॥
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अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः’ अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोतृ’ इत्यादिना । ‘अहं सोममाहनसं भिभर्मि’ इत्यादेस्तस्यापि सम्भवान्मध्यमाक्षरस्योक्ता इत्यतो ब्रूते –
अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः’ अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोतृ’ इत्यादिना । ‘अहं सोममाहनसं भिभर्मि’ इत्यादेस्तस्यापि सम्भवान्मध्यमाक्षरस्योक्ता इत्यतो ब्रूते –
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‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य धृतेर्ब्रह्मैवाक्षरम् ।
‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य धृतेर्ब्रह्मैवाक्षरम् ।
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‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’
‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’
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‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो धृतौ’ इति च स्कान्दे ॥ 10 ॥
‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो धृतौ’ इति च स्कान्दे ॥ 10 ॥
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सा च धृतिः प्रशासादुच्यते ।’ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’ इत्यादिना । तच्च प्रशासनं विष्णोरेव ।
सा च धृतिः प्रशासादुच्यते ।’ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’ इत्यादिना । तच्च प्रशासनं विष्णोरेव ।
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‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ ।
‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ ।
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‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता’।
‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता’।
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॥ इति अक्षराधिकरणम् ॥ 03 ॥
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‘अस्थूलमनणु’ इत्यादिना स्थूलाण्वादीनामन्यवस्तुस्वभावानां व्यावृत्तेश्च।
‘अस्थूलमनणु’ इत्यादिना स्थूलाण्वादीनामन्यवस्तुस्वभावानां व्यावृत्तेश्च।
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‘अस्थूलोऽनणुरमध्यमो मध्यमोऽव्यापको व्यापको योऽसौ हरिरादिरनादिरविश्वो विश्वः सगुणो निर्गुणः’ इत्यादेर्विष्णोरेव ते धर्माः ।
‘अस्थूलोऽनणुरमध्यमो मध्यमोऽव्यापको व्यापको योऽसौ हरिरादिरनादिरविश्वो विश्वः सगुणो निर्गुणः’ इत्यादेर्विष्णोरेव ते धर्माः ।
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‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च ।विरुद्धर्मरूपोऽसावैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः’ । इति च ब्राह्मे ॥ 12 ॥
‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च ।विरुद्धर्मरूपोऽसावैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः’ । इति च ब्राह्मे ॥ 12 ॥
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‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिना सतः स्रष्टृत्वमुच्यते । तच्चसत्’बहुस्यां प्रजायेय’ इति परिणामप्रतीतेर्न विष्णुः । स हि
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिना सतः स्रष्टृत्वमुच्यते । तच्चसत्’बहुस्यां प्रजायेय’ इति परिणामप्रतीतेर्न विष्णुः । स हि
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‘तदैक्षत’ इतीक्षतिकर्मव्यपदेशात् स एव विष्णुरत्रोच्यते ।
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‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’,’नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रु’ इत्यादिना तस्यै व हि तल्लक्षणम् ।
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बहुत्वं चानिकारेणैवोक्तं’अजायमानो बहुधा विजायत’ इति ॥13॥
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चन्द्रादित्याद्याधारत्वं विष्णोरुक्तम् । तच्च’अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’……’ किं तदत्र विद्यते…..’
चन्द्रादित्याद्याधारत्वं विष्णोरुक्तम् । तच्च’अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’……’ किं तदत्र विद्यते…..’
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‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’ इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव ।
‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’ इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव ।
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‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’
‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’
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‘नित्यतीर्णाशनायादिरेक एव हरिः स्वतः ।अशनायादिकानन्ये तत्प्रसादात् तरन्ति हि’ इति पाद्मे ।
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सापेक्षनिरपेक्षयोश्च निरपेक्षं स्वीकर्तव्यम् ॥
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‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् तत्काम्यकामिता’ इति च स्कान्दे ॥ 14 ॥
‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् तत्काम्यकामिता’ इति च स्कान्दे ॥ 14 ॥
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अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति’ इति सुप्तस्य तद्गतिर्ब्रह्मशब्दश्चोच्यते ।
अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति’ इति सुप्तस्य तद्गतिर्ब्रह्मशब्दश्चोच्यते ।
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‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेस्तं हि सुप्तो गच्छति । ‘अरश्च ह वैण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके’ इति लिङ्गं च तथा दृष्टम् ।
‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेस्तं हि सुप्तो गच्छति । ‘अरश्च ह वैण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके’ इति लिङ्गं च तथा दृष्टम् ।
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‘अरश्च वै ण्यश्च सासमुद्रौ तत्रैव सर्वाभिमतप्रदौ द्वौ’ इत्यादिना तस्यैव हि तल्लक्षणत्वेनोच्यते ॥ 15 ॥
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‘एष सेतुर्विधृतिः’ इति धृतेः’एष भूताधिपतिरेण भूतपालः’इत्याद्यस्य महिम्नोऽस्मिन्नुपलब्धेः ।
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‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’
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‘सर्वेशो विष्णुरेवैको नान्योऽस्ति जगतः पतिः’ इति स्कान्दे ॥16॥
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‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’ इति प्रसिद्धेश्च । तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥
‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’ इति प्रसिद्धेश्च । तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥
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‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्टद्यते’ ‘एष आत्मेति होवाच’ इति जीवपरामर्शात् स इति चेन्न ।
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्टद्यते’ ‘एष आत्मेति होवाच’ इति जीवपरामर्शात् स इति चेन्न ।
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तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥
तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥
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‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति चेन्न । तत्र हि परमेश्वरप्रसादादाविर्भूतस्वरूपो मुक्त उच्यते।यत्प्रसादात् स मुक्तो भवति स भगवान् पूर्वोक्तः॥19 ॥
‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति चेन्न । तत्र हि परमेश्वरप्रसादादाविर्भूतस्वरूपो मुक्त उच्यते।यत्प्रसादात् स मुक्तो भवति स भगवान् पूर्वोक्तः॥19 ॥
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‘यं प्राप्य स्वेन रूपेण जीवोऽभिनिष्पद्यते स एष आत्मा’ इति परमात्मार्थश्च परामर्शः ॥ 20 ॥
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॥इति दहराधिकरणम् ॥
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‘दहर’ इत्यल्पश्रुतेर्नेति चेन्न ।’निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च’ इत्युक्व्तात् ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायन्’ इति श्रुत्युक्तत्वाच्च ॥ 21 ॥
‘दहर’ इत्यल्पश्रुतेर्नेति चेन्न ।’निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च’ इत्युक्व्तात् ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायन्’ इति श्रुत्युक्तत्वाच्च ॥ 21 ॥
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अदृश्यत्वादयः परमेश्वरगुणा उक्ताः । ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’  ‘तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्’ इत्यादिना ज्ञानिसुखस्याप्यनिर्देश्यत्वमज्ञेयत्वं चोच्यत इत्यतो वक्ति-
अदृश्यत्वादयः परमेश्वरगुणा उक्ताः । ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’  ‘तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्’ इत्यादिना ज्ञानिसुखस्याप्यनिर्देश्यत्वमज्ञेयत्वं चोच्यत इत्यतो वक्ति-
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‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’ इत्यनुकृतेः,
‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’ इत्यनुकृतेः,
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‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ इति वचनाच्च परमात्मैवानिर्देश्यसुखरूपः ।
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न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं तत्तेजो रश्मीन्’ इति नारायणभासा हि सर्वं भाति ॥ 22 ॥
न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं तत्तेजो रश्मीन्’ इति नारायणभासा हि सर्वं भाति ॥ 22 ॥
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वामनशब्दादेव विष्णुरिति प्रमितः । न हि श्रुतेर्लिङ्गं बलवत् ।
वामनशब्दादेव विष्णुरिति प्रमितः । न हि श्रुतेर्लिङ्गं बलवत् ।
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‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः स्यादेवमागमनिर्णय’ इति स्कान्दे ॥
‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः स्यादेवमागमनिर्णय’ इति स्कान्दे ॥
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तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव प्राणत्वोक्तेः’तद्वैत्वं त्वं प्राणो अभवः’ इति ॥ 24 ॥
तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव प्राणत्वोक्तेः’तद्वैत्वं त्वं प्राणो अभवः’ इति ॥ 24 ॥
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॥ इति वामनाधिकरणम् ॥ 07 ॥
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सर्वगतस्यापि तस्याङ्गुष्ठमात्रत्वं हृद्यवकाशापेक्षया युज्यते । इतरप्राणिनामङ्गुष्ठाभावेऽपि मनुष्याधिकारत्वान्न विरोधः ॥ 25 ॥
सर्वगतस्यापि तस्याङ्गुष्ठमात्रत्वं हृद्यवकाशापेक्षया युज्यते । इतरप्राणिनामङ्गुष्ठाभावेऽपि मनुष्याधिकारत्वान्न विरोधः ॥ 25 ॥
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मनुष्याणामेव वेदविद्यायामधिकार इत्युक्तम् । तिर्यगाद्यपेक्षयैव मनुष्यत्वविशेषणमुक्तं, न तु देवाद्यपेक्षयेत्याह-
मनुष्याणामेव वेदविद्यायामधिकार इत्युक्तम् । तिर्यगाद्यपेक्षयैव मनुष्यत्वविशेषणमुक्तं, न तु देवाद्यपेक्षयेत्याह-
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तदुपरि मनुष्याणां सतां देवादित्वप्राप्युपरि । सम्भवति हि तेषां विशिष्टबुद्ध्यादिभावात् । तिर्यगादीनां तदभावादभावः । तेषामपि यत्र विशिष्टबुद्ध्यादिभावस्तत्राविरोधः । निषेदभावात् । दृश्यन्ते हि जरितार्यादयः ॥ 26 ॥
तदुपरि मनुष्याणां सतां देवादित्वप्राप्युपरि । सम्भवति हि तेषां विशिष्टबुद्ध्यादिभावात् । तिर्यगादीनां तदभावादभावः । तेषामपि यत्र विशिष्टबुद्ध्यादिभावस्तत्राविरोधः । निषेदभावात् । दृश्यन्ते हि जरितार्यादयः ॥ 26 ॥
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मानुषा एव देवादयो भवन्तीति तदुपरीत्युक्तम् । तत्र यदि मनुष्याः सन्तो देवादयो भवन्ति तत्पूर्वं देवताभावाद्देवतोद्दिष्टकर्मणि विरोध इति चेन्न । अनेकेषां देवतापदप्राप्तेर्दर्शनात् ।
मानुषा एव देवादयो भवन्तीति तदुपरीत्युक्तम् । तत्र यदि मनुष्याः सन्तो देवादयो भवन्ति तत्पूर्वं देवताभावाद्देवतोद्दिष्टकर्मणि विरोध इति चेन्न । अनेकेषां देवतापदप्राप्तेर्दर्शनात् ।
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‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादिश्रुतेराप्त्यनिश्चयान्नित्यत्वापेक्षत्वाच्च मूलप्रमाणस्य, स्वतः प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च नित्यत्वाद्वेदस्य तदुदितानां देवानामनित्यत्वात् पुनरन्यभावनियमाभावाच्च शब्दे विरोध इति चेन्न ।
‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादिश्रुतेराप्त्यनिश्चयान्नित्यत्वापेक्षत्वाच्च मूलप्रमाणस्य, स्वतः प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च नित्यत्वाद्वेदस्य तदुदितानां देवानामनित्यत्वात् पुनरन्यभावनियमाभावाच्च शब्दे विरोध इति चेन्न ।
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‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्’
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‘यथैव नियमः काले सुरादिनियमस्तथा ।
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अत एव शब्दस्य नित्यत्वादेव च देवप्रवाहनित्यत्वं युक्तम् ॥ 29 ॥
अत एव शब्दस्य नित्यत्वादेव च देवप्रवाहनित्यत्वं युक्तम् ॥ 29 ॥
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अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’ इति दर्शनात् ।
अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’ इति दर्शनात् ।
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‘अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।
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वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः’ इति स्मृतेश्च ॥30॥
वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः’ इति स्मृतेश्च ॥30॥
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‘वसूनामेवैको भूत्वा’ इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥
‘वसूनामेवैको भूत्वा’ इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥
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ज्योतिषि सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च विध्यानाम् ॥ 32 ॥
ज्योतिषि सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च विध्यानाम् ॥ 32 ॥
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॥इति देवताधिकरणम् ॥ 08 ॥
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फलविशेषभावात् प्राप्तपदानामपि देवानां मध्वादिष्वप्यधिकारं बादरायणो मन्यते । अस्ति हि प्रकाशविशेषः ।
फलविशेषभावात् प्राप्तपदानामपि देवानां मध्वादिष्वप्यधिकारं बादरायणो मन्यते । अस्ति हि प्रकाशविशेषः ।
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‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता । सम्भवाच्च प्रकाशस्य परमेकमृते हरिम् ॥तेषां सामर्थ्ययोगाच्च देवानामप्युपासनम्।  सर्वं विधीयते नित्यं सर्वयज्ञादिकर्म च’ इति स्कान्दे ॥
‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता । सम्भवाच्च प्रकाशस्य परमेकमृते हरिम् ॥तेषां सामर्थ्ययोगाच्च देवानामप्युपासनम्।  सर्वं विधीयते नित्यं सर्वयज्ञादिकर्म च’ इति स्कान्दे ॥
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उक्तफलानधिकारमात्रं जैमिनिमतम् । अतो न मतविरोधः ।
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‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 33 ॥
‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 33 ॥
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मनुष्याधिकारत्वादित्युक्तेऽविशेषाच्छूद्रस्यापि’अह हारे त्वा शूद्र’ इति पौत्रायणोक्तेरधिकार इत्यत आह –
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नासौ पौत्रायणः शूद्रः, शुचाऽऽद्रवणमेव शूद्रत्वम् ।
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‘स ह सञ्ञिहान एव क्षत्तारमुवाच’ इति सूच्यते हि ॥ 34 ॥
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अयमश्वतरीरथ इति चित्ररथसम्बन्दित्वेन लिङ्गेन पौत्रायणस्य क्षत्रियत्वावगतेश्च ।
अयमश्वतरीरथ इति चित्ररथसम्बन्दित्वेन लिङ्गेन पौत्रायणस्य क्षत्रियत्वावगतेश्च ।
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‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’ इति ब्राह्मे ।
‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’ इति ब्राह्मे ।
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‘यत्र वेदो रथस्तत्र न वेदो यत्र नो रथः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 35 ॥
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‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत’ इत्यद्ययनार्थं संस्कारपरामर्शात् । ‘नाग्निर्न यज्ञो न क्रीया न संस्कारो न व्रतानि शूद्रस्य’ इति पैङ्गिश्रुतौ संस्काराभावाभिलापाच्च ।
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उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् ।
उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् ।
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संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन । अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं तथा’इति स्मृतेः ॥ 36 ॥
संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन । अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं तथा’इति स्मृतेः ॥ 36 ॥
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‘नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्मि’ इति सत्यवचनेन सत्यकामस्य शूद्रत्वाभावनिर्धारणे हारिद्रुमतस्य’नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति’ इति तत्संस्कारे प्रवृत्तेश्च ॥ 37 ॥
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इति अपशूद्राधिकरणम् ॥ 09 ॥
इति अपशूद्राधिकरणम् ॥ 09 ॥
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‘श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् । अध्ययने जिह्वाच्छेदः अर्थावधारणे हृदयविदारणम्’ इति प्रतिषेधात् ।
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‘नाग्निर्न यज्ञः शूद्रस्य तथैवाद्ययनं कुतः ।केवलैव तु शुश्रूषा त्रिवर्णानां विधीयते’ इति स्मृतेश्च ।
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विदुरादीनां तूत्पन्नज्ञानत्वात् कश्चिद्विशेषः ॥ 38 ॥
विदुरादीनां तूत्पन्नज्ञानत्वात् कश्चिद्विशेषः ॥ 38 ॥
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‘यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।  महद्बयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति’  इत्युद्यतवज्रज्ञानान्मोक्षः श्रूयत इत्यतोऽब्रवीत् ।
‘यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।  महद्बयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति’  इत्युद्यतवज्रज्ञानान्मोक्षः श्रूयत इत्यतोऽब्रवीत् ।
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इति कम्पनाधिकरणं ॥ 10 ॥
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एजतीति कम्पनवचनादुद्यतवज्रो भगवानेव ।
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‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’तथा चेतोऽर्पणार्थं हि निगत्यते इति हि श्रुतिः ।
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‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः’ इति च
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‘नभस्वतोऽपि सर्वाः स्युश्चेष्टा भगवतो हरेः । किमुतान्यस्य जगतो यस्य चेष्टा नभस्वतः’ इति स्कान्दे ॥
‘नभस्वतोऽपि सर्वाः स्युश्चेष्टा भगवतो हरेः । किमुतान्यस्य जगतो यस्य चेष्टा नभस्वतः’ इति स्कान्दे ॥
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‘चक्रं चङ्क्रमणादेष वर्जनाद्वज्रमुच्यते ।खण्डनात् खड्ग एवैष हेतिनामा स्वयं हरिः’इति ब्रह्म वैवर्ते ॥ 39 ॥
‘चक्रं चङ्क्रमणादेष वर्जनाद्वज्रमुच्यते ।खण्डनात् खड्ग एवैष हेतिनामा स्वयं हरिः’इति ब्रह्म वैवर्ते ॥ 39 ॥
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हृदय आहितं ज्योतिः परमात्मेत्युक्तम् । तत्र’योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः’ इत्यत्र’उभौ लोकावनुसञ्चरति’ इति वचनाज्जीव इति प्रतीयत इत्यत उच्यते –
हृदय आहितं ज्योतिः परमात्मेत्युक्तम् । तत्र’योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः’ इत्यत्र’उभौ लोकावनुसञ्चरति’ इति वचनाज्जीव इति प्रतीयत इत्यत उच्यते –
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इति ज्योतिरधिकरणं ॥ 11 ॥
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‘विष्णुरेव ज्योतिर्विष्णुरेव ब्रह्म विष्णुरेवात्मा विष्णुरेव बलं विष्णुरेव यशो विष्णुरेवानन्दः’ इति दर्शनाच्चतुर्वेदशिखायां ज्योतिर्विष्णुरेव ।’प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति वचनात् सस्यापि लोकसञ्चरणमस्त्येव ॥ 40 ॥
‘विष्णुरेव ज्योतिर्विष्णुरेव ब्रह्म विष्णुरेवात्मा विष्णुरेव बलं विष्णुरेव यशो विष्णुरेवानन्दः’ इति दर्शनाच्चतुर्वेदशिखायां ज्योतिर्विष्णुरेव ।’प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति वचनात् सस्यापि लोकसञ्चरणमस्त्येव ॥ 40 ॥
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सर्वाधारत्वम् विष्णोरुक्तम् । तच्च’आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता’ इत्यत्राकाशस्य प्रतीयते । वै नामेति प्रसिद्धोपदेशात् । प्रसिद्धाकाशश्चाङ्गीकर्तव्य इत्यत उच्यते –
सर्वाधारत्वम् विष्णोरुक्तम् । तच्च’आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता’ इत्यत्राकाशस्य प्रतीयते । वै नामेति प्रसिद्धोपदेशात् । प्रसिद्धाकाशश्चाङ्गीकर्तव्य इत्यत उच्यते –
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‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’ इत्यर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाकाशो हरिरेव। ‘अवर्णं यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्यादिश्रुतेस्तस्यैव हि तलक्षणम्।
‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’ इत्यर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाकाशो हरिरेव। ‘अवर्णं यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्यादिश्रुतेस्तस्यैव हि तलक्षणम्।
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‘अनामासोऽप्रसिद्धत्वादरूपो भूतवर्जनात्’ इति ब्राह्मे ॥ 41 ॥
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असङ्गत्वं परमात्मन उक्तम् । तच्च  ‘स यत्तत्र किञ्चित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः’ इति स्वप्नादिद्रष्टुः प्रतीयते । स च जीवः प्रसिद्धेरित्यतो वक्ति –
असङ्गत्वं परमात्मन उक्तम् । तच्च  ‘स यत्तत्र किञ्चित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः’ इति स्वप्नादिद्रष्टुः प्रतीयते । स च जीवः प्रसिद्धेरित्यतो वक्ति –
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‘प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्’ ‘प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’
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‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति ब्राह्मणस्यापि नित्यमहिमा प्रतीयते । स च ब्राह्मणः ‘स वा एष महानज आत्मा’ इत्यजशब्दाद्विरिञ्च इति प्राप्तम् । देवानां च विद्याकर्मणोः पदप्राप्तिः सूचिता तदुपर्यपीति । अतो ब्रवीति –
‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति ब्राह्मणस्यापि नित्यमहिमा प्रतीयते । स च ब्राह्मणः ‘स वा एष महानज आत्मा’ इत्यजशब्दाद्विरिञ्च इति प्राप्तम् । देवानां च विद्याकर्मणोः पदप्राप्तिः सूचिता तदुपर्यपीति । अतो ब्रवीति –
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॥इति ब्राह्मणाधिकरणम् ॥ 14 ॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 01-03 ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 01-03 ॥
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‘सर्वस्याधिपतिः सर्वस्येशानः …. स वा एष नेति नेति’ इत्यादि शब्देभ्यो नित्यमहिमा विष्णुरेव ।
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‘उतामृतत्वस्येशानः । यदन्नेनादतिरोहति’
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इत्यादि श्रुतिभ्यस्तस्यैव हि ते शब्दाः ॥ 43 ॥
इत्यादि श्रुतिभ्यस्तस्यैव हि ते शब्दाः ॥ 43 ॥

Revision as of 08:59, 10 April 2026

द्युभ्वाधिकरणम्

ॐ द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॐ ॥ 01-64 ॥


तत्र चान्यत्र च प्रसिद्धानां शब्दानां विष्णौ समन्वयं प्रायेणास्मिन् पादे दर्शयति ।
             विष्णोः परविद्याविषयत्वमुक्तम् । तत्र ‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्चसर्वैस्तमेवैकं जानथ आत्मानम्’ इत्यत्र, ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रोऽमाऽऽविशान्तकः’ ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’ इत्यादिना रुद्रस्य प्राणाधारत्वप्रतीतेः ।
‘स एषोऽन्तरश्चरते बहुधा जायमानः’ इति जीवलिङ्गाच्च तयोः प्राप्तिरित्यत उच्यते –
‘तमेवैकं जानथ आत्मानम्’इत्यात्मशब्दात् द्युभ्वाद्याश्रयो विष्णुरेव ।
‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् ।
न सम्भवन्ति यस्मात् तैर्नैवाप्तागुणपूर्णता’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 1 ॥
ॐ मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॐ ॥ 02-65 ॥


‘अमृतस्यैष सेतुः’ इति ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’,‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ ,‘मुक्तानां परमा गतिः’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ इत्यादिना तस्यैव मुक्तप्राप्यत्वव्यपदेशात् ।
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।
योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रनिर्णयः’॥ इत्यादित्यपुराणे ॥ 2 ॥
ॐ नानुमानमतच्छब्दात् ॐ ॥ 03-66 ॥


नानुमानात्मकागमपरिकल्पितरुद्रोऽत्र वाच्यः । भस्मधरोग्रत्वादितच्छब्दाभावात् ।
‘सोऽन्तकः स रुद्रः स प्राणभृत् स प्राणनायकः स ईशो यो हरिर्योऽनन्तो यो विष्णुर्यः परः परोवरीयान्’इत्यादिना प्राणग्रन्थिरुद्रत्वादेर्विष्णोरेवोक्तत्वात् ।ब्रह्माण्डे च
‘रुजं द्रावयते यस्माद्रुद्रस्तस्माज्जनार्दनः । ईशानादेव चेशानो महैदेवो महत्त्वतः ॥
पिबन्ति ये नरा नाकं मुक्ताः संसारसागरात् । तदाधारो यतो विष्णुः पिनाकीति ततः स्मृतः॥
शिवः सुखात्मकत्वेन शर्वः शंरोधनाद्धरिः । कृत्यात्मकमिदं देहं यतो वस्ते प्रवर्तयन् ॥
कृत्तिवासास्ततो देवो विरिञ्चश्च विरेचनात् । बृंहणाद्ब्रह्मनामाऽसावैश्वर्यादिन्द्र उच्यते ॥
एवं नानाविधैः शब्दैरेक एव त्रिविक्रमः । वेदेषु सपुराणेषु गीयते पुरुषोत्तमः’ इति ।
वामने च –
‘न तु नारायणादीनां नाम्नामन्यत्र सम्भवः । अन्यनाम्नां गतिर्विष्णुरेक एव प्रकीर्तितः’ इति ॥
स्कान्दे च –
‘ऋते नारायणादीनि नामानि पुरुषोत्तमः । प्रादादन्यत्र भगवान् राजेवर्ते स्वकं पुरम्’इति
‘चतुर्मुखः शतानन्दो ब्रह्मणः पद्मभूरिति । उग्रो भस्मधरो नग्नः कपालीति शिवस्य च ।
विशेषनामानि ददौ स्वकीयान्यपि केशवः’इति च ब्राह्मे ॥ 3 ॥
ॐ प्राणभृच्च ॐ ॥ 04-67 ॥


एतैरेव हेतुभिर्न जीवो वायुश्च । ‘अजायमानो बहुधा विजायत’ इति तस्यैव बहुधा जन्मोक्तेः ॥ 04॥
ॐ भेदव्यपदेशात् ॐ ॥ 05-68 ॥


न चैक्यं वाच्यम् । ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानम्’ इति भेदव्यपदेशात् ॥ 05 ॥
ॐ प्रकरणात् ॐ ॥ 06-69 ॥


‘द्वे विद्ये वेदितव्ये’ इति तस्य ह्येतत् प्रकरणम् ॥ 06 ॥
ॐ स्थित्यदनाभ्यां च ॐ ॥ 07-70 ॥


॥ इति द्युभ्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्ननन्यो अभिचाकशीति’

इति ईशजीवयोः स्धित्यदनोक्तेः ॥ 07 ॥

भूमाधिकरणम्

ॐ भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ॐ ॥ 08-71 ॥


‘प्राणो व अशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा’ यो वै भूमा तत्सुखम्’ । इत्युक्तेस्यैव भूमत्वप्राप्तिः । ‘उत्क्रान्तप्राणान्’ इत्यादिलिङ्गात् प्राणशब्दश्च वायुवाचीत्यतो वक्ति –
‘सम्प्रसादात्’ पूर्णसुखरूपत्वात् ‘अध्युपदेशात्’ सर्वेशामुपर्युपदेशाच्च विष्णुरेव भूमा ।
‘सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ॥विश्वतः परमां नित्यम्’ इति श्रुतिः
‘तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति’ इत्यादिना नोत्क्रमणादिलिङ्गविरोधोऽपि ॥08॥
ॐ धर्मोपपत्तेश्च ॐ ॥ 09-72 ॥


इति भूमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
सर्वगतत्वादिधर्मोपपतेश्च ॥09॥

अक्षराधिकरणम्

ॐ अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॐ ॥ 10-73 ॥


अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः’ अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोतृ’ इत्यादिना । ‘अहं सोममाहनसं भिभर्मि’ इत्यादेस्तस्यापि सम्भवान्मध्यमाक्षरस्योक्ता इत्यतो ब्रूते –
‘एतस्मिन् खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’ इत्यम्बरान्तस्य सर्वस्य धृतेर्ब्रह्मैवाक्षरम् ।
‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा’ ‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति । एको देवो बहुधा निविष्टः । यदा भारं तन्द्रयते स भर्तुम् । पराऽस्य भारं पुनरस्तमेति’ । ‘यस्मिन्निदं सञ्च वि चैदि सर्वं यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः’ इत्यादि श्रुतेः ।
‘पृथिव्यादिप्रकृत्यन्तं भूतं भव्यं भवच्च यत् ।विष्णुरेको बिभर्तीदं नान्यस्तस्मात् क्षमो धृतौ’ इति च स्कान्दे ॥ 10 ॥
ॐ सा च प्रशासनात् ॐ ॥ 11-74 ॥


सा च धृतिः प्रशासादुच्यते ।’ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’ इत्यादिना । तच्च प्रशासनं विष्णोरेव ।
‘सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’ । चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीरवीविपत्’ इत्यादिश्रुतेः ।
‘एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता’।

यो हृच्छयस्तमहमिह ब्रवीमि’

‘न केवलं मे भवतश्च राजन् स वै बलं बलीनां चापरेषाम्’इत्यादेश्च ॥ 11 ॥
ॐ अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॐ ॥ 12-75 ॥


॥ इति अक्षराधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘अस्थूलमनणु’ इत्यादिना स्थूलाण्वादीनामन्यवस्तुस्वभावानां व्यावृत्तेश्च।
‘अस्थूलोऽनणुरमध्यमो मध्यमोऽव्यापको व्यापको योऽसौ हरिरादिरनादिरविश्वो विश्वः सगुणो निर्गुणः’ इत्यादेर्विष्णोरेव ते धर्माः ।
‘अस्थूलोऽनणुरूपोऽसावविश्वो विश्व एव च ।विरुद्धर्मरूपोऽसावैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः’ । इति च ब्राह्मे ॥ 12 ॥

सदधिकरणम्

ॐ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॐ ॥ 13-76 ॥


‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिना सतः स्रष्टृत्वमुच्यते । तच्चसत्’बहुस्यां प्रजायेय’ इति परिणामप्रतीतेर्न विष्णुः । स हि ‘अविकारः सदा शुद्धो नित्य आत्मा सदा हरिः’ इत्यादिनाऽ तस्यैव हि तल्लक्षणम् । बहुत्वं चाविकारेणैवोक्तं’ अजायमानो बहुधा विजायत’ इति ॥ 13 ॥
॥इति सदधिकरणम् ॥ 04 ॥
‘तदैक्षत’ इतीक्षतिकर्मव्यपदेशात् स एव विष्णुरत्रोच्यते ।
‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’,’नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट्रु’ इत्यादिना तस्यै व हि तल्लक्षणम् ।
बहुत्वं चानिकारेणैवोक्तं’अजायमानो बहुधा विजायत’ इति ॥13॥

दहराधिकरणम्

ॐ दहर उत्तरेभ्यः ॐ ॥ 14-77 ॥


चन्द्रादित्याद्याधारत्वं विष्णोरुक्तम् । तच्च’अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’……’ किं तदत्र विद्यते…..’
             ‘उभे अस्मिन् द्यावा पृथिवी अन्तरेव समाहिते ।  उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ ।  विद्युन्नक्षत्राणि’इत्यादिनाऽऽकाशस्य प्रतीयते ।
स चाकाशो न विष्णुः । तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्’ इति श्रुतेरित्यत आह- .
‘य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्य स विजिज्ञासितव्यः’ इत्यादिभ्य उत्तरेभ्यो गुणेभ्यो दहरे विष्णुरेव ।
‘योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’

‘स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः’

इत्यादिना विष्णोरेव हि ते गुणाः ।
‘नित्यतीर्णाशनायादिरेक एव हरिः स्वतः ।अशनायादिकानन्ये तत्प्रसादात् तरन्ति हि’ इति पाद्मे ।
सापेक्षनिरपेक्षयोश्च निरपेक्षं स्वीकर्तव्यम् ॥
‘सत्यकामोऽअपरो नास्ति तमृते विष्णुमव्ययम् । सत्यकामत्वमन्येषां भवेत् तत्काम्यकामिता’ इति च स्कान्दे ॥ 14 ॥
ॐ गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च ॐ ॥ 15-78 ॥


अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति’ इति सुप्तस्य तद्गतिर्ब्रह्मशब्दश्चोच्यते ।
‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेस्तं हि सुप्तो गच्छति । ‘अरश्च ह वैण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके’ इति लिङ्गं च तथा दृष्टम् ।
‘अरश्च वै ण्यश्च सासमुद्रौ तत्रैव सर्वाभिमतप्रदौ द्वौ’ इत्यादिना तस्यैव हि तल्लक्षणत्वेनोच्यते ॥ 15 ॥
ॐ धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॐ ॥ 16-79 ॥


‘एष सेतुर्विधृतिः’ इति धृतेः’एष भूताधिपतिरेण भूतपालः’इत्याद्यस्य महिम्नोऽस्मिन्नुपलब्धेः ।
‘एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च’

‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि’ ‘स हि सर्वाधिपतिः स हि सर्वकालः स ईशः स विष्णुः’

‘पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्’ इत्यादिश्रुतिभ्यस्तस्य ह्येष महिमा ।
‘सर्वेशो विष्णुरेवैको नान्योऽस्ति जगतः पतिः’ इति स्कान्दे ॥16॥
ॐ प्रसिद्धेश्च ॐ ॥ 17-80 ॥


‘तत्रापि दह्रं गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तुदुपासितव्यम्’ इति प्रसिद्धेश्च । तदन्तस्थापेक्षत्वान्न सुषिरश्रुतिविरोधः ॥17॥
ॐ इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासम्भवात् ॐ ॥ 18-81 ॥


‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्टद्यते’ ‘एष आत्मेति होवाच’ इति जीवपरामर्शात् स इति चेन्न ।
तस्य स्वतोऽपहतपाप्मत्वाद्यसम्भवात् ॥ 18 ॥
ॐ उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॐ ॥ 19-82 ॥


‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादुत्तरवचनाज्जीव एवेति चेन्न । तत्र हि परमेश्वरप्रसादादाविर्भूतस्वरूपो मुक्त उच्यते।यत्प्रसादात् स मुक्तो भवति स भगवान् पूर्वोक्तः॥19 ॥
ॐ अन्यार्थश्च परामर्शः ॐ ॥ 20-83 ॥


‘यं प्राप्य स्वेन रूपेण जीवोऽभिनिष्पद्यते स एष आत्मा’ इति परमात्मार्थश्च परामर्शः ॥ 20 ॥
ॐ अल्पश्रुतेरिति चेत् तदुक्तम् ॐ ॥ 21-84 ॥


॥इति दहराधिकरणम् ॥
‘दहर’ इत्यल्पश्रुतेर्नेति चेन्न ।’निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च’ इत्युक्व्तात् ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायन्’ इति श्रुत्युक्तत्वाच्च ॥ 21 ॥

अनुकृत्यधिकरणम्

ॐ अनुकृतेस्तस्य च ॐ ॥ 22-85 ॥


अदृश्यत्वादयः परमेश्वरगुणा उक्ताः । ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’ ‘तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्’ इत्यादिना ज्ञानिसुखस्याप्यनिर्देश्यत्वमज्ञेयत्वं चोच्यत इत्यतो वक्ति-
‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’ इत्यनुकृतेः,
‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ इति वचनाच्च परमात्मैवानिर्देश्यसुखरूपः ।
न हि ज्ञानिसुखमनुभाति सर्वम् । न च तद्भासा । ‘अहं तत्तेजो रश्मीन्’ इति नारायणभासा हि सर्वं भाति ॥ 22 ॥
ॐ आपि स्मर्यते ॐ ॥ 23-86 ॥


॥ इति अनुकृत्यधिकरणम् ॥ 06 ॥
‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्’ इति
‘न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम’ इति च ॥ 23 ॥

वामनाधिकरणम्

ॐ शब्दादेव प्रमितः ॐ ॥ 24-87 ॥


विष्णुरेव जिज्ञास्य इत्युक्तम् । तत्र
             ‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति।  मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते’
इति सर्वदेवोपास्यः कश्चित् प्रतीयते । स च ‘एवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथगेव सन्निधत्ते’ ‘योऽयं मध्यमः प्राणः’’कुविदङ्ग’ इत्यादिना प्राणव्यवस्थापकत्वान्मध्यमत्वात् सर्वदेवोपास्यत्वाच्च वायुरेवेति प्रतीयते । अतोऽब्रवीत् ॥
वामनशब्दादेव विष्णुरिति प्रमितः । न हि श्रुतेर्लिङ्गं बलवत् ।
‘श्रुतिर्लिङ्गं समाख्या च वाक्यं प्रकरणं तथा ।पूर्वं पूर्वं बलीयः स्यादेवमागमनिर्णय’ इति स्कान्दे ॥
तच्चलिङ्गं विष्णोरेव। तस्मैव प्राणत्वोक्तेः’तद्वैत्वं त्वं प्राणो अभवः’ इति ॥ 24 ॥
ॐ हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॐ ॥ 25-88 ॥


॥ इति वामनाधिकरणम् ॥ 07 ॥
सर्वगतस्यापि तस्याङ्गुष्ठमात्रत्वं हृद्यवकाशापेक्षया युज्यते । इतरप्राणिनामङ्गुष्ठाभावेऽपि मनुष्याधिकारत्वान्न विरोधः ॥ 25 ॥

देवताधिकरणम्

ॐ तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ॐ ॥ 26-89 ॥


मनुष्याणामेव वेदविद्यायामधिकार इत्युक्तम् । तिर्यगाद्यपेक्षयैव मनुष्यत्वविशेषणमुक्तं, न तु देवाद्यपेक्षयेत्याह-
तदुपरि मनुष्याणां सतां देवादित्वप्राप्युपरि । सम्भवति हि तेषां विशिष्टबुद्ध्यादिभावात् । तिर्यगादीनां तदभावादभावः । तेषामपि यत्र विशिष्टबुद्ध्यादिभावस्तत्राविरोधः । निषेदभावात् । दृश्यन्ते हि जरितार्यादयः ॥ 26 ॥
ॐ विरोधः कर्मणेति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॐ॥ 27-90 ॥


मानुषा एव देवादयो भवन्तीति तदुपरीत्युक्तम् । तत्र यदि मनुष्याः सन्तो देवादयो भवन्ति तत्पूर्वं देवताभावाद्देवतोद्दिष्टकर्मणि विरोध इति चेन्न । अनेकेषां देवतापदप्राप्तेर्दर्शनात् । ‘ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः’ इति ॥27॥
ॐ शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॐ ॥ 28-91 ॥


‘वाचा विरूप नित्यया’ इत्यादिश्रुतेराप्त्यनिश्चयान्नित्यत्वापेक्षत्वाच्च मूलप्रमाणस्य, स्वतः प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च नित्यत्वाद्वेदस्य तदुदितानां देवानामनित्यत्वात् पुनरन्यभावनियमाभावाच्च शब्दे विरोध इति चेन्न ।
‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्’
‘यथैव नियमः काले सुरादिनियमस्तथा ।

तस्मान्नानीदृशं क्वापि विश्वमेतद्भविष्यति’ ॥

इत्यादेरत एव शब्दात् तेषां प्रभवनियमात्,महतां प्रत्यक्षात् । यथेदानीं तथोपर्यपि देवा भविष्यन्तीतीतरेषामनुमानाच्च ॥ 28 ॥
ॐ अत एव च नित्यत्वम् ॐ ॥ 29-92 ॥


अत एव शब्दस्य नित्यत्वादेव च देवप्रवाहनित्यत्वं युक्तम् ॥ 29 ॥
ॐ समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॐ ॥ 30-93 ॥


अतीतानागतानां देवानां समाननामरूपत्वात् प्राप्तपदानां मुक्त्याऽवृत्तावप्यविरोधः । ‘यथापूर्वम्’ इति दर्शनात् ।
‘अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा । ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः ।
वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः’ इति स्मृतेश्च ॥30॥
ॐ मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनिः ॐ ॥ 31-94॥


‘वसूनामेवैको भूत्वा’ इत्यादिना प्राप्यफलत्वात् प्राप्तपदानां देवानां मध्वादिविद्यास्वनधिकारं जैमिनिर्मन्यते ॥ 31 ॥
ॐ ज्योतिषि भावाच्च ॐ ॥ 32-95॥


ज्योतिषि सर्वज्ञत्वे भावाच्च। आदित्यप्रकाशेऽन्तर्भाववत् तज्ज्ञाने सर्ववस्तूनामान्तर्भावात् । नित्यसिद्धत्वाच्च विध्यानाम् ॥ 32 ॥
ॐ भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॐ ॥33-96॥


॥इति देवताधिकरणम् ॥ 08 ॥
फलविशेषभावात् प्राप्तपदानामपि देवानां मध्वादिष्वप्यधिकारं बादरायणो मन्यते । अस्ति हि प्रकाशविशेषः ।
‘यावत्सेवा परे तत्वे तावत्सुखविशेषता । सम्भवाच्च प्रकाशस्य परमेकमृते हरिम् ॥तेषां सामर्थ्ययोगाच्च देवानामप्युपासनम्। सर्वं विधीयते नित्यं सर्वयज्ञादिकर्म च’ इति स्कान्दे ॥
उक्तफलानधिकारमात्रं जैमिनिमतम् । अतो न मतविरोधः ।
‘सर्वज्ञस्यैव कृष्णस्य त्वेकदेशविचिन्तितम् ।स्वीकृत्य मुनयो ब्रूयुस्तन्मतं न विरुध्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 33 ॥

अपशूद्राधिकरणम्

ॐ शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाऽऽद्रवणात् सूच्यते हि ॐ ॥34-97॥


मनुष्याधिकारत्वादित्युक्तेऽविशेषाच्छूद्रस्यापि’अह हारे त्वा शूद्र’ इति पौत्रायणोक्तेरधिकार इत्यत आह –
नासौ पौत्रायणः शूद्रः, शुचाऽऽद्रवणमेव शूद्रत्वम् । ‘कम्वर एनमेतत्सन्तम्’ इत्यनादरश्रवणात् ।
‘स ह सञ्ञिहान एव क्षत्तारमुवाच’ इति सूच्यते हि ॥ 34 ॥
ॐ क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॐ ॥ 35-98 ॥


अयमश्वतरीरथ इति चित्ररथसम्बन्दित्वेन लिङ्गेन पौत्रायणस्य क्षत्रियत्वावगतेश्च ।
‘रथस्त्वश्वतरीयुक्तश्चित्र इत्यभिधीयते’ इति ब्राह्मे ।
‘यत्र वेदो रथस्तत्र न वेदो यत्र नो रथः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 35 ॥
ॐ संस्कारपरामर्शात् तदभावाभिलापाच्च ॐ ॥ 36-99 ॥


‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत’ इत्यद्ययनार्थं संस्कारपरामर्शात् । ‘नाग्निर्न यज्ञो न क्रीया न संस्कारो न व्रतानि शूद्रस्य’ इति पैङ्गिश्रुतौ संस्काराभावाभिलापाच्च ।
उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् । ‘सपत्नीं मे पराधम’ इत्यादिष्वधिकारदर्शनात् ।
संस्काराभावेनाभावस्तु सामान्येन । अस्ति च तासां संस्कारः ।‘स्त्रीणां प्रदानकर्मैव यथोपनयनं तथा’इति स्मृतेः ॥ 36 ॥
ॐ तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॐ ॥ 37-100 ॥


‘नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्मि’ इति सत्यवचनेन सत्यकामस्य शूद्रत्वाभावनिर्धारणे हारिद्रुमतस्य’नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति’ इति तत्संस्कारे प्रवृत्तेश्च ॥ 37 ॥
ॐ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॐ ॥ 38-101 ॥


इति अपशूद्राधिकरणम् ॥ 09 ॥
‘श्रवणे त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् । अध्ययने जिह्वाच्छेदः अर्थावधारणे हृदयविदारणम्’ इति प्रतिषेधात् ।
‘नाग्निर्न यज्ञः शूद्रस्य तथैवाद्ययनं कुतः ।केवलैव तु शुश्रूषा त्रिवर्णानां विधीयते’ इति स्मृतेश्च ।
विदुरादीनां तूत्पन्नज्ञानत्वात् कश्चिद्विशेषः ॥ 38 ॥

कम्पनाधिकरणं

ॐ कम्पनात् ॐ ॥ 39-102 ॥


‘यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्बयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति’ इत्युद्यतवज्रज्ञानान्मोक्षः श्रूयत इत्यतोऽब्रवीत् ।
इति कम्पनाधिकरणं ॥ 10 ॥
एजतीति कम्पनवचनादुद्यतवज्रो भगवानेव ।
‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’तथा चेतोऽर्पणार्थं हि निगत्यते इति हि श्रुतिः ।
‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः’ इति च
‘नभस्वतोऽपि सर्वाः स्युश्चेष्टा भगवतो हरेः । किमुतान्यस्य जगतो यस्य चेष्टा नभस्वतः’ इति स्कान्दे ॥
‘चक्रं चङ्क्रमणादेष वर्जनाद्वज्रमुच्यते ।खण्डनात् खड्ग एवैष हेतिनामा स्वयं हरिः’इति ब्रह्म वैवर्ते ॥ 39 ॥

ज्योतिरधिकरणं

ॐ ज्योतिर्दर्शनात् ॐ ॥ 40-103 ॥


हृदय आहितं ज्योतिः परमात्मेत्युक्तम् । तत्र’योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः’ इत्यत्र’उभौ लोकावनुसञ्चरति’ इति वचनाज्जीव इति प्रतीयत इत्यत उच्यते –
इति ज्योतिरधिकरणं ॥ 11 ॥
‘विष्णुरेव ज्योतिर्विष्णुरेव ब्रह्म विष्णुरेवात्मा विष्णुरेव बलं विष्णुरेव यशो विष्णुरेवानन्दः’ इति दर्शनाच्चतुर्वेदशिखायां ज्योतिर्विष्णुरेव ।’प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति वचनात् सस्यापि लोकसञ्चरणमस्त्येव ॥ 40 ॥

आकाशाधिकरणम्

ॐ आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॐ ॥ 41-104 ॥


सर्वाधारत्वम् विष्णोरुक्तम् । तच्च’आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता’ इत्यत्राकाशस्य प्रतीयते । वै नामेति प्रसिद्धोपदेशात् । प्रसिद्धाकाशश्चाङ्गीकर्तव्य इत्यत उच्यते –
इति आकाशाधिकरणम् ॥ 12 ॥
‘ते यदन्तरा तद्ब्रह्म’ इत्यर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाकाशो हरिरेव। ‘अवर्णं यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्यादिश्रुतेस्तस्यैव हि तलक्षणम्।
‘अनामासोऽप्रसिद्धत्वादरूपो भूतवर्जनात्’ इति ब्राह्मे ॥ 41 ॥

सुषुप्त्यधिकरणम्

ॐ सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॐ ॥ 42-105 ॥


असङ्गत्वं परमात्मन उक्तम् । तच्च ‘स यत्तत्र किञ्चित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः’ इति स्वप्नादिद्रष्टुः प्रतीयते । स च जीवः प्रसिद्धेरित्यतो वक्ति –
॥ इति सुषुप्त्यधिकरणम् ॥ 13 ॥
‘प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्’ ‘प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’ इति भेदव्यपदेशान्न जीवः, पर एवासङ्गः । स्वप्नादिद्रष्ट्रुत्वं च सर्वज्ञत्वात् तस्यैव युज्यते ॥ 42 ॥

ब्राह्मणाधिकरणम्

ॐ पत्यादिशब्देभ्यः ॐ ॥ 43-106 ॥


‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति ब्राह्मणस्यापि नित्यमहिमा प्रतीयते । स च ब्राह्मणः ‘स वा एष महानज आत्मा’ इत्यजशब्दाद्विरिञ्च इति प्राप्तम् । देवानां च विद्याकर्मणोः पदप्राप्तिः सूचिता तदुपर्यपीति । अतो ब्रवीति –
॥इति ब्राह्मणाधिकरणम् ॥ 14 ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 01-03 ॥
‘सर्वस्याधिपतिः सर्वस्येशानः …. स वा एष नेति नेति’ इत्यादि शब्देभ्यो नित्यमहिमा विष्णुरेव ।
‘उतामृतत्वस्येशानः । यदन्नेनादतिरोहति’

‘सप्तार्धगर्भाभुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’

‘स योऽतोऽश्रुतः’
इत्यादि श्रुतिभ्यस्तस्यैव हि ते शब्दाः ॥ 43 ॥