Brahmasutra/C1/S2: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 16: | Line 16: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V01 | | verse_id = BS_C01_S02_V01 | ||
| id = BS_C01_S02_V01_B1 | | id = BS_C01_S02_V01_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा’इत्यादिना सर्वत्रोच्यमानो नारायण एव । | ‘स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा’इत्यादिना सर्वत्रोच्यमानो नारायण एव । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V01 | | verse_id = BS_C01_S02_V01 | ||
| id = BS_C01_S02_V01_B2 | | id = BS_C01_S02_V01_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’ | ‘तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’ | ||
| Line 35: | Line 33: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V01 | | verse_id = BS_C01_S02_V01 | ||
| id = BS_C01_S02_V01_B5 | | id = BS_C01_S02_V01_B5 | ||
| text = | | text = | ||
इति तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दोपदेशात् ॥ 01 ॥ | इति तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दोपदेशात् ॥ 01 ॥ | ||
| Line 52: | Line 49: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V02 | | verse_id = BS_C01_S02_V02 | ||
| id = BS_C01_S02_V02_B1 | | id = BS_C01_S02_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘स योऽतोऽश्रुतः’ इत्यादि । | ‘स योऽतोऽश्रुतः’ इत्यादि । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V02 | | verse_id = BS_C01_S02_V02 | ||
| id = BS_C01_S02_V02_B2 | | id = BS_C01_S02_V02_B2 | ||
| text = | | text = | ||
स हि ‘न ते विष्णो जायमानः’ इत्यादिनाऽश्रुतत्वादिगुणकः । | स हि ‘न ते विष्णो जायमानः’ इत्यादिनाऽश्रुतत्वादिगुणकः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V02 | | verse_id = BS_C01_S02_V02 | ||
| id = BS_C01_S02_V02_B3 | | id = BS_C01_S02_V02_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘स सविता स वायुः स इन्द्रः, सोऽश्रुतः सोऽदृष्टो यो हरिर्यः परमो यो विष्णुर्योऽनन्तः’ इत्यादि चतुर्वेदशिखायाम् ॥02॥ | ‘स सविता स वायुः स इन्द्रः, सोऽश्रुतः सोऽदृष्टो यो हरिर्यः परमो यो विष्णुर्योऽनन्तः’ इत्यादि चतुर्वेदशिखायाम् ॥02॥ | ||
| Line 85: | Line 79: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V03 | | verse_id = BS_C01_S02_V03 | ||
| id = BS_C01_S02_V03_summary | | id = BS_C01_S02_V03_summary | ||
| text = | | text = | ||
न चादित्यशब्दाच्चक्षुर्मयत्वादेश्च जीव इति वाच्यम् । | न चादित्यशब्दाच्चक्षुर्मयत्वादेश्च जीव इति वाच्यम् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V03 | | verse_id = BS_C01_S02_V03 | ||
| id = BS_C01_S02_V03_B1 | | id = BS_C01_S02_V03_B1 | ||
| text = | | text = | ||
एकस्य सर्वशरीरस्थत्वानुपपत्तेरेव ॥ 03 ॥ | एकस्य सर्वशरीरस्थत्वानुपपत्तेरेव ॥ 03 ॥ | ||
| Line 110: | Line 102: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V04 | | verse_id = BS_C01_S02_V04 | ||
| id = BS_C01_S02_V04_B1 | | id = BS_C01_S02_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्मानां परस्मैशंसति’ इत्यादि ॥04॥ | ‘आत्मानां परस्मैशंसति’ इत्यादि ॥04॥ | ||
| Line 127: | Line 118: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V05 | | verse_id = BS_C01_S02_V05 | ||
| id = BS_C01_S02_V05_B1 | | id = BS_C01_S02_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति । न हि जीवमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । | ‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति । न हि जीवमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V05 | | verse_id = BS_C01_S02_V05 | ||
| id = BS_C01_S02_V05_B2 | | id = BS_C01_S02_V05_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘एष उ एव ब्रह्मैष उ एवात्मैष उ एव सवितैष उ एवेन्द्र एष उ एव हरिर्हरति परः परानन्दः’ इति चेन्द्रद्युम्नशाखायाम् ॥ 05 ॥ | ‘एष उ एव ब्रह्मैष उ एवात्मैष उ एव सवितैष उ एवेन्द्र एष उ एव हरिर्हरति परः परानन्दः’ इति चेन्द्रद्युम्नशाखायाम् ॥ 05 ॥ | ||
| Line 152: | Line 141: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V06 | | verse_id = BS_C01_S02_V06 | ||
| id = BS_C01_S02_V06_B1 | | id = BS_C01_S02_V06_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’ | ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V06 | | verse_id = BS_C01_S02_V06 | ||
| id = BS_C01_S02_V06_B2 | | id = BS_C01_S02_V06_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’ इत्यादि । | ‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’ इत्यादि । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V06 | | verse_id = BS_C01_S02_V06 | ||
| id = BS_C01_S02_V06_B3 | | id = BS_C01_S02_V06_B3 | ||
| text = | | text = | ||
न चा प्रामाणिकं कल्प्यम् ॥ 06 ॥ | न चा प्रामाणिकं कल्प्यम् ॥ 06 ॥ | ||
| Line 185: | Line 171: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V07 | | verse_id = BS_C01_S02_V07 | ||
| id = BS_C01_S02_V07_B1 | | id = BS_C01_S02_V07_B1 | ||
| text = | | text = | ||
सर्वेषु भूतेष्वित्यल्पौकस्त्वाच्चक्षुर्मयत्वादिना जीवव्यपदेशाच्च नेति चेन्न । अर्भकौकस्त्वेन चक्षुर्मयत्वादिरूपेण च तस्यैव विष्णोर्निचाय्यत्वात् । सर्वगतत्वेऽप्यल्पौकस्त्वं च युज्यते व्योमवत् ।‘सर्वेन्द्रियमयो विष्णुः सर्वप्राणिषु च स्थितः ।सर्वनामाभिधेयश्च सर्ववेदोदितश्च सः’ इति स्कान्दे ॥ 07 ॥ | सर्वेषु भूतेष्वित्यल्पौकस्त्वाच्चक्षुर्मयत्वादिना जीवव्यपदेशाच्च नेति चेन्न । अर्भकौकस्त्वेन चक्षुर्मयत्वादिरूपेण च तस्यैव विष्णोर्निचाय्यत्वात् । सर्वगतत्वेऽप्यल्पौकस्त्वं च युज्यते व्योमवत् ।‘सर्वेन्द्रियमयो विष्णुः सर्वप्राणिषु च स्थितः ।सर्वनामाभिधेयश्च सर्ववेदोदितश्च सः’ इति स्कान्दे ॥ 07 ॥ | ||
| Line 202: | Line 187: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V08 | | verse_id = BS_C01_S02_V08 | ||
| id = BS_C01_S02_V08_author-note | | id = BS_C01_S02_V08_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति सर्वगतत्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥ | ॥ इति सर्वगतत्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V08 | | verse_id = BS_C01_S02_V08 | ||
| id = BS_C01_S02_V08_B1 | | id = BS_C01_S02_V08_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘जीवपरयोरेकशरीरस्थत्वे समानभोगप्राप्तिरिति चेन्न ।सामर्थ्य वैशेष्यात् ।उक्तं च गारुडे | ‘जीवपरयोरेकशरीरस्थत्वे समानभोगप्राप्तिरिति चेन्न ।सामर्थ्य वैशेष्यात् ।उक्तं च गारुडे | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V08 | | verse_id = BS_C01_S02_V08 | ||
| id = BS_C01_S02_V08_B2 | | id = BS_C01_S02_V08_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वज्ञाल्पज्ञताभेदात् सर्वशक्त्यल्पशक्तितः । | ‘सर्वज्ञाल्पज्ञताभेदात् सर्वशक्त्यल्पशक्तितः । | ||
| Line 238: | Line 220: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V09 | | verse_id = BS_C01_S02_V09 | ||
| id = BS_C01_S02_V09_summary | | id = BS_C01_S02_V09_summary | ||
| text = | | text = | ||
‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्तम् । तत्रात्तृत्वं, | ‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्तम् । तत्रात्तृत्वं, | ||
| Line 248: | Line 229: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V09 | | verse_id = BS_C01_S02_V09 | ||
| id = BS_C01_S02_V09_B1 | | id = BS_C01_S02_V09_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न हि चराचरस्य सर्वस्यात्तृत्वमदितेः । | न हि चराचरस्य सर्वस्यात्तृत्वमदितेः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V09 | | verse_id = BS_C01_S02_V09 | ||
| id = BS_C01_S02_V09_B2 | | id = BS_C01_S02_V09_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘स्रष्टा पाता तथैवात्ता निखिलस्यैक एव तु । वासुदेवः परः पुंसामितरेऽल्पस्य वा न वा’ इति स्कान्दे । | ‘स्रष्टा पाता तथैवात्ता निखिलस्यैक एव तु । वासुदेवः परः पुंसामितरेऽल्पस्य वा न वा’ इति स्कान्दे । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V09 | | verse_id = BS_C01_S02_V09 | ||
| id = BS_C01_S02_V09_B4 | | id = BS_C01_S02_V09_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘एकः पुरस्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः ।यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृतमिहायुषेऽत्तु देवः’ इति श्रुतिः ॥ 09 ॥ | ‘एकः पुरस्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः ।यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृतमिहायुषेऽत्तु देवः’ इति श्रुतिः ॥ 09 ॥ | ||
| Line 281: | Line 259: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V10 | | verse_id = BS_C01_S02_V10 | ||
| id = BS_C01_S02_V10_author-note | | id = BS_C01_S02_V10_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति अत्तृत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥ | ॥ इति अत्तृत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V10 | | verse_id = BS_C01_S02_V10 | ||
| id = BS_C01_S02_V10_B1 | | id = BS_C01_S02_V10_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अप्संवत्सरसृष्ट्यादिना तत्प्रकरणाच्च । | अप्संवत्सरसृष्ट्यादिना तत्प्रकरणाच्च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V10 | | verse_id = BS_C01_S02_V10 | ||
| id = BS_C01_S02_V10_B2 | | id = BS_C01_S02_V10_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘नेहासीत् किञ्चनाप्यादौ मृत्युरासीद्धरिस्तदा । | ‘नेहासीत् किञ्चनाप्यादौ मृत्युरासीद्धरिस्तदा । | ||
| Line 306: | Line 281: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V10 | | verse_id = BS_C01_S02_V10 | ||
| id = BS_C01_S02_V10_B4 | | id = BS_C01_S02_V10_B4 | ||
| text = | | text = | ||
शयानस्तासु भगवान्निर्ममेऽण्डं महत्तरम् । | शयानस्तासु भगवान्निर्ममेऽण्डं महत्तरम् । | ||
| Line 315: | Line 289: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V10 | | verse_id = BS_C01_S02_V10 | ||
| id = BS_C01_S02_V10_B6 | | id = BS_C01_S02_V10_B6 | ||
| text = | | text = | ||
तमत्तुं व्याददादास्यं तदाऽसौ विरुराव ह । | तमत्तुं व्याददादास्यं तदाऽसौ विरुराव ह । | ||
| Line 324: | Line 297: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V10 | | verse_id = BS_C01_S02_V10 | ||
| id = BS_C01_S02_V10_B8 | | id = BS_C01_S02_V10_B8 | ||
| text = | | text = | ||
सोऽसृजद्भुवनं सर्वमद्यार्थ्यं हरये विभुःइति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 10 ॥ | सोऽसृजद्भुवनं सर्वमद्यार्थ्यं हरये विभुःइति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 10 ॥ | ||
| Line 343: | Line 315: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V11 | | verse_id = BS_C01_S02_V11 | ||
| id = BS_C01_S02_V11_summary | | id = BS_C01_S02_V11_summary | ||
| text = | | text = | ||
सर्वात्रैकः परः उक्तः । | सर्वात्रैकः परः उक्तः । | ||
| Line 352: | Line 323: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V11 | | verse_id = BS_C01_S02_V11 | ||
| id = BS_C01_S02_V11_B1 | | id = BS_C01_S02_V11_B1 | ||
| text = | | text = | ||
गुहां प्रविष्टौ पिबन्तौ विष्णुरूपे एव । | गुहां प्रविष्टौ पिबन्तौ विष्णुरूपे एव । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V11 | | verse_id = BS_C01_S02_V11 | ||
| id = BS_C01_S02_V11_B2 | | id = BS_C01_S02_V11_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘घर्मा समन्ता त्रिवृतं व्यापतुस्तयोर्जुष्टिं मातरिश्वा जगाम’ इत्यादिना तद्दर्शनात् । | ‘घर्मा समन्ता त्रिवृतं व्यापतुस्तयोर्जुष्टिं मातरिश्वा जगाम’ इत्यादिना तद्दर्शनात् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V11 | | verse_id = BS_C01_S02_V11 | ||
| id = BS_C01_S02_V11_B3 | | id = BS_C01_S02_V11_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्माऽन्तरात्मेति हरिरेक एव द्विधा स्थितः ।निविष्टो हृदयेनित्यं रसं पिबति कर्मजम्इति बृहत्संहितायाम् । | ‘आत्माऽन्तरात्मेति हरिरेक एव द्विधा स्थितः ।निविष्टो हृदयेनित्यं रसं पिबति कर्मजम्इति बृहत्संहितायाम् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V11 | | verse_id = BS_C01_S02_V11 | ||
| id = BS_C01_S02_V11_B5 | | id = BS_C01_S02_V11_B5 | ||
| text = | | text = | ||
‘शुभं पिबत्यसौ नित्यं नाशुभं स हरिः पिबेत् ।पूर्णानन्दमयस्यास्य चेष्टा न ज्ञायते क्वचित्’इति पाद्मे ॥ | ‘शुभं पिबत्यसौ नित्यं नाशुभं स हरिः पिबेत् ।पूर्णानन्दमयस्यास्य चेष्टा न ज्ञायते क्वचित्’इति पाद्मे ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V11 | | verse_id = BS_C01_S02_V11 | ||
| id = BS_C01_S02_V11_B7 | | id = BS_C01_S02_V11_B7 | ||
| text = | | text = | ||
‘यो वेद निहितं गुहायाम्’ इत्यादिना प्रसिद्धं हिशब्देन दर्शयति ॥ 11 ॥ | ‘यो वेद निहितं गुहायाम्’ इत्यादिना प्रसिद्धं हिशब्देन दर्शयति ॥ 11 ॥ | ||
| Line 401: | Line 367: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_author-note | | id = BS_C01_S02_V12_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति गुहाधिकरणम् ॥ 03 ॥ | ॥ इति गुहाधिकरणम् ॥ 03 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B1 | | id = BS_C01_S02_V12_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म तत्परम्’ इति । | ‘यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म तत्परम्’ इति । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B2 | | id = BS_C01_S02_V12_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘पृथग् वक्तुं गुणास्तस्य न शक्यन्तेऽमितत्वतः । | ‘पृथग् वक्तुं गुणास्तस्य न शक्यन्तेऽमितत्वतः । | ||
| Line 426: | Line 389: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B4 | | id = BS_C01_S02_V12_B4 | ||
| text = | | text = | ||
एतस्माद्ब्रह्मशब्दोऽयं विष्णोरेव विशेषणम् । | एतस्माद्ब्रह्मशब्दोऽयं विष्णोरेव विशेषणम् । | ||
| Line 435: | Line 397: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B6 | | id = BS_C01_S02_V12_B6 | ||
| text = | | text = | ||
न च जीवे समन्वयोऽभिधीयते । | न च जीवे समन्वयोऽभिधीयते । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B7 | | id = BS_C01_S02_V12_B7 | ||
| text = | | text = | ||
‘सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्यः’ इति भाल्लवेयश्रुतिः । | ‘सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्यः’ इति भाल्लवेयश्रुतिः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B8 | | id = BS_C01_S02_V12_B8 | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्मा हि परमः स्वतन्त्रोऽधिगुणो ऽऽल्पशक्तिरस्वातन्त्रोऽवरः’ इति च भाल्लवेयश्रुतिः । | ‘आत्मा हि परमः स्वतन्त्रोऽधिगुणो ऽऽल्पशक्तिरस्वातन्त्रोऽवरः’ इति च भाल्लवेयश्रुतिः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B10 | | id = BS_C01_S02_V12_B10 | ||
| text = | | text = | ||
‘यथेश्वरस्य जीवस्य भेदः सत्यो विनिश्चयात् । | ‘यथेश्वरस्य जीवस्य भेदः सत्यो विनिश्चयात् । | ||
| Line 468: | Line 426: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B12 | | id = BS_C01_S02_V12_B12 | ||
| text = | | text = | ||
‘यथेश्वरश्च जीवश्च सत्यभेदौ परस्परम् । | ‘यथेश्वरश्च जीवश्च सत्यभेदौ परस्परम् । | ||
| Line 477: | Line 434: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V12 | | verse_id = BS_C01_S02_V12 | ||
| id = BS_C01_S02_V12_B14 | | id = BS_C01_S02_V12_B14 | ||
| text = | | text = | ||
इत्यदेर्नासत्यो भेदः ॥ 12 ॥ | इत्यदेर्नासत्यो भेदः ॥ 12 ॥ | ||
| Line 496: | Line 452: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V13 | | verse_id = BS_C01_S02_V13 | ||
| id = BS_C01_S02_V13_summary | | id = BS_C01_S02_V13_summary | ||
| text = | | text = | ||
आदित्ये विष्णुरित्युक्तम् । | आदित्ये विष्णुरित्युक्तम् । | ||
| Line 508: | Line 463: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V13 | | verse_id = BS_C01_S02_V13 | ||
| id = BS_C01_S02_V13_B1 | | id = BS_C01_S02_V13_B1 | ||
| text = | | text = | ||
चक्षुरन्तस्थो विष्णुरेव।‘त्रिपादस्यामृतं दिवि’इत्यादिना तस्यैवामृतत्वाद्युपपत्तेः।ब्रह्मशब्दाद्युपपत्तेश्च । | चक्षुरन्तस्थो विष्णुरेव।‘त्रिपादस्यामृतं दिवि’इत्यादिना तस्यैवामृतत्वाद्युपपत्तेः।ब्रह्मशब्दाद्युपपत्तेश्च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V13 | | verse_id = BS_C01_S02_V13 | ||
| id = BS_C01_S02_V13_B2 | | id = BS_C01_S02_V13_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘सोऽहमस्मि’ इत्यादि त्वन्तर्याम्यपेक्षया । | ‘सोऽहमस्मि’ इत्यादि त्वन्तर्याम्यपेक्षया । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V13 | | verse_id = BS_C01_S02_V13 | ||
| id = BS_C01_S02_V13_B3 | | id = BS_C01_S02_V13_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘अन्तर्यामिणमीशेशमपेक्ष्याहं त्वमित्यपि ।सर्वे शब्दाः प्रयुज्यन्ते सति भेदेऽपि वस्तुषु’ इति महाकौर्मे ॥ 13 ॥ | ‘अन्तर्यामिणमीशेशमपेक्ष्याहं त्वमित्यपि ।सर्वे शब्दाः प्रयुज्यन्ते सति भेदेऽपि वस्तुषु’ इति महाकौर्मे ॥ 13 ॥ | ||
| Line 541: | Line 493: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V14 | | verse_id = BS_C01_S02_V14 | ||
| id = BS_C01_S02_V14_B1 | | id = BS_C01_S02_V14_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘तद्यदस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति’ इत्यादिस्थानशक्तिः वामनिर्भामनिरित्याद्यात्मशक्तिश्चोच्यते । | ‘तद्यदस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति’ इत्यादिस्थानशक्तिः वामनिर्भामनिरित्याद्यात्मशक्तिश्चोच्यते । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V14 | | verse_id = BS_C01_S02_V14 | ||
| id = BS_C01_S02_V14_B2 | | id = BS_C01_S02_V14_B2 | ||
| text = | | text = | ||
तस्य ह्येत्यल्लिङ्गम् ।‘स ईशः सोऽसपत्नः स हरिः स परः स परोवरीयान् यदिदं चक्षुषि सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति स वामनः स भामनः स आनन्दः सोऽच्युतः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् । | तस्य ह्येत्यल्लिङ्गम् ।‘स ईशः सोऽसपत्नः स हरिः स परः स परोवरीयान् यदिदं चक्षुषि सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति स वामनः स भामनः स आनन्दः सोऽच्युतः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V14 | | verse_id = BS_C01_S02_V14 | ||
| id = BS_C01_S02_V14_B3 | | id = BS_C01_S02_V14_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘यत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुभिः । स वामनः परोऽस्माकं गतिरित्येव चिन्तयेत्’ इति वामने ॥ 14 ॥ | ‘यत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुभिः । स वामनः परोऽस्माकं गतिरित्येव चिन्तयेत्’ इति वामने ॥ 14 ॥ | ||
| Line 574: | Line 523: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V15 | | verse_id = BS_C01_S02_V15 | ||
| id = BS_C01_S02_V15_B1 | | id = BS_C01_S02_V15_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’ इति,‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ | ‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’ इति,‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ | ||
| Line 583: | Line 531: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V15 | | verse_id = BS_C01_S02_V15 | ||
| id = BS_C01_S02_V15_B4 | | id = BS_C01_S02_V15_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘लक्षणं परमानन्दो विष्णोरेव न संशयः ।अव्यक्तादितृणान्तास्तु विप्लुडानन्दभागिनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ | ‘लक्षणं परमानन्दो विष्णोरेव न संशयः ।अव्यक्तादितृणान्तास्तु विप्लुडानन्दभागिनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V15 | | verse_id = BS_C01_S02_V15 | ||
| id = BS_C01_S02_V15_B6 | | id = BS_C01_S02_V15_B6 | ||
| text = | | text = | ||
न च मुख्ये सत्यमुख्यं युज्यते ॥ 15 ॥ | न च मुख्ये सत्यमुख्यं युज्यते ॥ 15 ॥ | ||
| Line 608: | Line 554: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V16 | | verse_id = BS_C01_S02_V16 | ||
| id = BS_C01_S02_V16_B1 | | id = BS_C01_S02_V16_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति । न ह्यन्यविद्यया अन्यगतिर्युक्ता ॥16॥ | ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति । न ह्यन्यविद्यया अन्यगतिर्युक्ता ॥16॥ | ||
| Line 625: | Line 570: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V17 | | verse_id = BS_C01_S02_V17 | ||
| id = BS_C01_S02_V17_author-note | | id = BS_C01_S02_V17_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इत्यन्तराधिकरणम् ॥ | ॥ इत्यन्तराधिकरणम् ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V17 | | verse_id = BS_C01_S02_V17 | ||
| id = BS_C01_S02_V17_B1 | | id = BS_C01_S02_V17_B1 | ||
| text = | | text = | ||
जीवस्य जीवान्तरनियामकत्वेऽनवस्थितेः, साम्यादसम्भवाच्च न जीवः । नियमप्रमाणाभावात् । अनीश्वरापेक्षत्वाच्च ॥ 17 ॥ | जीवस्य जीवान्तरनियामकत्वेऽनवस्थितेः, साम्यादसम्भवाच्च न जीवः । नियमप्रमाणाभावात् । अनीश्वरापेक्षत्वाच्च ॥ 17 ॥ | ||
| Line 652: | Line 595: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V18 | | verse_id = BS_C01_S02_V18 | ||
| id = BS_C01_S02_V18_summary | | id = BS_C01_S02_V18_summary | ||
| text = | | text = | ||
‘यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ इत्याद्यन्तर्याम्युच्यते । | ‘यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ इत्याद्यन्तर्याम्युच्यते । | ||
| Line 662: | Line 604: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V18 | | verse_id = BS_C01_S02_V18 | ||
| id = BS_C01_S02_V18_B1 | | id = BS_C01_S02_V18_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘यं पृथिवी न वेद’ ‘यः पृथिव्या अन्तरः’, इत्यादिना अधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशाद्विष्णुरेवान्तर्यामी । | ‘यं पृथिवी न वेद’ ‘यः पृथिव्या अन्तरः’, इत्यादिना अधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशाद्विष्णुरेवान्तर्यामी । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V18 | | verse_id = BS_C01_S02_V18 | ||
| id = BS_C01_S02_V18_B2 | | id = BS_C01_S02_V18_B2 | ||
| text = | | text = | ||
स हि ‘न ते विष्णो चायमानो न जातः’ | स हि ‘न ते विष्णो चायमानो न जातः’ | ||
| Line 688: | Line 628: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V19 | | verse_id = BS_C01_S02_V19 | ||
| id = BS_C01_S02_V19_B1 | | id = BS_C01_S02_V19_B1 | ||
| text = | | text = | ||
त्रिगुणत्वादिप्रधानधर्मानुक्तेर्न स्मृत्युक्तं प्रधानमन्तर्यामि ॥19॥ | त्रिगुणत्वादिप्रधानधर्मानुक्तेर्न स्मृत्युक्तं प्रधानमन्तर्यामि ॥19॥ | ||
| Line 705: | Line 644: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V20 | | verse_id = BS_C01_S02_V20 | ||
| id = BS_C01_S02_V20_author-note | | id = BS_C01_S02_V20_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इत्यन्तर्याम्यधिकरणम् ॥ 05 ॥ | ॥ इत्यन्तर्याम्यधिकरणम् ॥ 05 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V20 | | verse_id = BS_C01_S02_V20 | ||
| id = BS_C01_S02_V20_B1 | | id = BS_C01_S02_V20_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा | ‘य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V20 | | verse_id = BS_C01_S02_V20 | ||
| id = BS_C01_S02_V20_B2 | | id = BS_C01_S02_V20_B2 | ||
| text = | | text = | ||
शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ | शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V20 | | verse_id = BS_C01_S02_V20 | ||
| id = BS_C01_S02_V20_B3 | | id = BS_C01_S02_V20_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं’ | ‘यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं’ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V20 | | verse_id = BS_C01_S02_V20 | ||
| id = BS_C01_S02_V20_B5 | | id = BS_C01_S02_V20_B5 | ||
| text = | | text = | ||
इत्युभयेऽपि हि शाखिनो भेदेनैनं जीवमधीयते । | इत्युभयेऽपि हि शाखिनो भेदेनैनं जीवमधीयते । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V20 | | verse_id = BS_C01_S02_V20 | ||
| id = BS_C01_S02_V20_B6 | | id = BS_C01_S02_V20_B6 | ||
| text = | | text = | ||
‘शीर्यते नित्यमेवास्माद्विष्णोस्तु जगदीदृशम् । | ‘शीर्यते नित्यमेवास्माद्विष्णोस्तु जगदीदृशम् । | ||
| Line 766: | Line 699: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V21 | | verse_id = BS_C01_S02_V21 | ||
| id = BS_C01_S02_V21_summary | | id = BS_C01_S02_V21_summary | ||
| text = | | text = | ||
अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः । तत्र – | अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः । तत्र – | ||
| Line 776: | Line 708: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V21 | | verse_id = BS_C01_S02_V21 | ||
| id = BS_C01_S02_V21_B1 | | id = BS_C01_S02_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
पृथिव्यादि दृष्टान्तमुक्त्वा‘अक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’ इत्यतः परं तत्परतः पराभिधानात्,‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’ इति स्मृतेश्च प्रकृतेः प्राप्तिः । | पृथिव्यादि दृष्टान्तमुक्त्वा‘अक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’ इत्यतः परं तत्परतः पराभिधानात्,‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’ इति स्मृतेश्च प्रकृतेः प्राप्तिः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V21 | | verse_id = BS_C01_S02_V21 | ||
| id = BS_C01_S02_V21_B2 | | id = BS_C01_S02_V21_B2 | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मशब्दात् तत्परतः पराभिध्यानादेव च हिरण्यगर्भस्य । | ब्रह्मशब्दात् तत्परतः पराभिध्यानादेव च हिरण्यगर्भस्य । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V21 | | verse_id = BS_C01_S02_V21 | ||
| id = BS_C01_S02_V21_B3 | | id = BS_C01_S02_V21_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ । | ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V21 | | verse_id = BS_C01_S02_V21 | ||
| id = BS_C01_S02_V21_B4 | | id = BS_C01_S02_V21_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया’ | ‘तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया’ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V21 | | verse_id = BS_C01_S02_V21 | ||
| id = BS_C01_S02_V21_B5 | | id = BS_C01_S02_V21_B5 | ||
| text = | | text = | ||
‘अथ द्वे वाव विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा च’। तत्र यो वेदा यान्यङ्गानि यान्युपाङ्गानि यानि प्रत्यङ्गानि साऽपरा । | ‘अथ द्वे वाव विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा च’। तत्र यो वेदा यान्यङ्गानि यान्युपाङ्गानि यानि प्रत्यङ्गानि साऽपरा । | ||
| Line 826: | Line 753: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V22 | | verse_id = BS_C01_S02_V22 | ||
| id = BS_C01_S02_V22_B1 | | id = BS_C01_S02_V22_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप’ इति विशेषणान्न प्रकृतिः ।’ तस्मातेतत्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते’ इति भेदव्यपदेशान्न विरिञ्चः । | ‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप’ इति विशेषणान्न प्रकृतिः ।’ तस्मातेतत्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते’ इति भेदव्यपदेशान्न विरिञ्चः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V22 | | verse_id = BS_C01_S02_V22 | ||
| id = BS_C01_S02_V22_B2 | | id = BS_C01_S02_V22_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका । श्रीः परा प्रकृतिः प्रोक्ता चेतना विष्णुसंश्रया ॥तामक्षरं परं प्राहुः परतः परमक्षरम् । हरिमैवाखिलगुणमक्षरत्रयमीरितम्’॥ | ‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका । श्रीः परा प्रकृतिः प्रोक्ता चेतना विष्णुसंश्रया ॥तामक्षरं परं प्राहुः परतः परमक्षरम् । हरिमैवाखिलगुणमक्षरत्रयमीरितम्’॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V22 | | verse_id = BS_C01_S02_V22 | ||
| id = BS_C01_S02_V22_B6 | | id = BS_C01_S02_V22_B6 | ||
| text = | | text = | ||
इति स्कान्दे त्र्यक्षराभिधानात्’ अक्षरात् परतः परः’ इत्यपि विशेषणमेव । | इति स्कान्दे त्र्यक्षराभिधानात्’ अक्षरात् परतः परः’ इत्यपि विशेषणमेव । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V22 | | verse_id = BS_C01_S02_V22 | ||
| id = BS_C01_S02_V22_B7 | | id = BS_C01_S02_V22_B7 | ||
| text = | | text = | ||
‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः’ | ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः’ | ||
| Line 868: | Line 791: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V23 | | verse_id = BS_C01_S02_V23 | ||
| id = BS_C01_S02_V23_author-note | | id = BS_C01_S02_V23_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति अदृश्यत्वाधिकरणम् ॥ | ॥ इति अदृश्यत्वाधिकरणम् ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V23 | | verse_id = BS_C01_S02_V23 | ||
| id = BS_C01_S02_V23_B1 | | id = BS_C01_S02_V23_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ इति | ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ इति | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V23 | | verse_id = BS_C01_S02_V23 | ||
| id = BS_C01_S02_V23_B2 | | id = BS_C01_S02_V23_B2 | ||
| text = | | text = | ||
“एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । स मुनिर्भूत्वासमचिन्तयत् । तत एते व्यजायन्त विश्वो हिरण्यगर्भोऽग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्राः” इति । | “एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । स मुनिर्भूत्वासमचिन्तयत् । तत एते व्यजायन्त विश्वो हिरण्यगर्भोऽग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्राः” इति । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V23 | | verse_id = BS_C01_S02_V23 | ||
| id = BS_C01_S02_V23_B3 | | id = BS_C01_S02_V23_B3 | ||
| text = | | text = | ||
तस्य हैतस्य परमस्य नारायणस्य चत्वारि रूपाणि शुक्लं रक्तं रौक्मं कृष्णमिति । स एतान्येतेभ्योऽभ्यचीक्लृपत् । विमिश्राणि व्यमिश्रयत् । अत एतादृगेतद्रूपमिति तस्यैव हि रूपाण्यभिधीयन्ते ॥ 32 ॥ | तस्य हैतस्य परमस्य नारायणस्य चत्वारि रूपाणि शुक्लं रक्तं रौक्मं कृष्णमिति । स एतान्येतेभ्योऽभ्यचीक्लृपत् । विमिश्राणि व्यमिश्रयत् । अत एतादृगेतद्रूपमिति तस्यैव हि रूपाण्यभिधीयन्ते ॥ 32 ॥ | ||
| Line 911: | Line 830: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V24 | | verse_id = BS_C01_S02_V24 | ||
| id = BS_C01_S02_V24_summary | | id = BS_C01_S02_V24_summary | ||
| text = | | text = | ||
अदृश्यत्वादिगुणेषु सर्वगतत्वं | अदृश्यत्वादिगुणेषु सर्वगतत्वं | ||
| Line 920: | Line 838: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V24 | | verse_id = BS_C01_S02_V24 | ||
| id = BS_C01_S02_V24_B1 | | id = BS_C01_S02_V24_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अग्नाविष्ण्वोः साधारणस्य वैश्वानरशब्दस्य विष्णावेव प्रसिद्धात्म शब्देन विशेषणाद्वैश्वानरो विष्णुरेव ॥ 24 ॥ | अग्नाविष्ण्वोः साधारणस्य वैश्वानरशब्दस्य विष्णावेव प्रसिद्धात्म शब्देन विशेषणाद्वैश्वानरो विष्णुरेव ॥ 24 ॥ | ||
| Line 937: | Line 854: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V25 | | verse_id = BS_C01_S02_V25 | ||
| id = BS_C01_S02_V25_B1 | | id = BS_C01_S02_V25_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’ | ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V25 | | verse_id = BS_C01_S02_V25 | ||
| id = BS_C01_S02_V25_B2 | | id = BS_C01_S02_V25_B2 | ||
| text = | | text = | ||
इति स्मर्यमाणमत्रापि स एवोच्यत इत्यस्यानुमापकम् । समाख्यानात् । इतिशब्दः समाख्याप्रदर्शकः ॥ 25 ॥ | इति स्मर्यमाणमत्रापि स एवोच्यत इत्यस्यानुमापकम् । समाख्यानात् । इतिशब्दः समाख्याप्रदर्शकः ॥ 25 ॥ | ||
| Line 962: | Line 877: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B1 | | id = BS_C01_S02_V26_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘अयमग्निर्वैश्वानरः’‘वैश्वानरमृत आजातमग्निम्’ इत्यादिशब्दः । | ‘अयमग्निर्वैश्वानरः’‘वैश्वानरमृत आजातमग्निम्’ इत्यादिशब्दः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B2 | | id = BS_C01_S02_V26_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘वैश्वानरे तद्दुतं भवति’ ‘हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः’ इत्याद्यग्निलिङ्गमादिशब्दोक्तम्। | ‘वैश्वानरे तद्दुतं भवति’ ‘हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः’ इत्याद्यग्निलिङ्गमादिशब्दोक्तम्। | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B3 | | id = BS_C01_S02_V26_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘येनेदमन्नं पच्यते’’तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम्’ इत्यादिना पाचकत्वेनान्तः प्रतिष्ठानं च प्रतीयते । तस्मान्न विष्णुरिति चेन्न । | ‘येनेदमन्नं पच्यते’’तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम्’ इत्यादिना पाचकत्वेनान्तः प्रतिष्ठानं च प्रतीयते । तस्मान्न विष्णुरिति चेन्न । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B5 | | id = BS_C01_S02_V26_B5 | ||
| text = | | text = | ||
‘अथ हेममात्मानमणोरणीयांसं परतः परं विश्वं हरिमुपासीतेति । | ‘अथ हेममात्मानमणोरणीयांसं परतः परं विश्वं हरिमुपासीतेति । | ||
| Line 995: | Line 906: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B6 | | id = BS_C01_S02_V26_B6 | ||
| text = | | text = | ||
‘स य एतमेवमात्मानं विश्वं हरिमारादरमुपास्ते तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेषु देवेषु सर्वषुवेदेषु कामचारो भवति’ | ‘स य एतमेवमात्मानं विश्वं हरिमारादरमुपास्ते तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेषु देवेषु सर्वषुवेदेषु कामचारो भवति’ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B7 | | id = BS_C01_S02_V26_B7 | ||
| text = | | text = | ||
इति तत्तन्नामलिङ्गादिना तस्यैव दृष्ट्युपदेशान्महोपनिषदि ॥ | इति तत्तन्नामलिङ्गादिना तस्यैव दृष्ट्युपदेशान्महोपनिषदि ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B8 | | id = BS_C01_S02_V26_B8 | ||
| text = | | text = | ||
अनात्तत्वादनात्मान ऊनत्वाद्गुणराशितः । | अनात्तत्वादनात्मान ऊनत्वाद्गुणराशितः । | ||
| Line 1,020: | Line 928: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B10 | | id = BS_C01_S02_V26_B10 | ||
| text = | | text = | ||
इत्यादिना ‘को न आत्मा किं ब्रह्म’ इत्यारम्भाच्च अन्येषामसम्भवाद्विष्णुरेव वैश्वानरः । | इत्यादिना ‘को न आत्मा किं ब्रह्म’ इत्यारम्भाच्च अन्येषामसम्भवाद्विष्णुरेव वैश्वानरः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B11 | | id = BS_C01_S02_V26_B11 | ||
| text = | | text = | ||
‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत’ | ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत’ | ||
| Line 1,037: | Line 943: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B13 | | id = BS_C01_S02_V26_B13 | ||
| text = | | text = | ||
इत्यादिनैनं वैश्वानरमधीयते । चशब्देन सकलवेदतन्त्रपुराणादिषु विष्णुपरत्वं पुरुषसूक्तस्य दर्शयति ।तथा च ब्राह्मे – | इत्यादिनैनं वैश्वानरमधीयते । चशब्देन सकलवेदतन्त्रपुराणादिषु विष्णुपरत्वं पुरुषसूक्तस्य दर्शयति ।तथा च ब्राह्मे – | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B14 | | id = BS_C01_S02_V26_B14 | ||
| text = | | text = | ||
‘यथैव पौरुषं सूक्तं नित्यं विष्णुपरायणम् । | ‘यथैव पौरुषं सूक्तं नित्यं विष्णुपरायणम् । | ||
| Line 1,054: | Line 958: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B16 | | id = BS_C01_S02_V26_B16 | ||
| text = | | text = | ||
चतुर्वेदशिखायां च – | चतुर्वेदशिखायां च – | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B17 | | id = BS_C01_S02_V26_B17 | ||
| text = | | text = | ||
‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’ इति ।‘एष ह्येवाचिन्त्यः परः परमो हरिरादिरनादिरनन्तोऽनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तबाहुरनन्त गुणोऽनन्तरूपः’ इति बृहत्संहितायां च | ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’ इति ।‘एष ह्येवाचिन्त्यः परः परमो हरिरादिरनादिरनन्तोऽनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तबाहुरनन्त गुणोऽनन्तरूपः’ इति बृहत्संहितायां च | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B18 | | id = BS_C01_S02_V26_B18 | ||
| text = | | text = | ||
‘यथा हि पौरुषं सूक्तं विष्णोरेवाभिधायकम् । | ‘यथा हि पौरुषं सूक्तं विष्णोरेवाभिधायकम् । | ||
| Line 1,079: | Line 980: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V26 | | verse_id = BS_C01_S02_V26 | ||
| id = BS_C01_S02_V26_B20 | | id = BS_C01_S02_V26_B20 | ||
| text = | | text = | ||
‘यस्माद्यज्जायते चाङ्गाल्लोकवेदादिकं हरेः ।तन्नामवाच्यमङ्गं तद्यथा ब्रह्मादिकं मुखम्’॥इति नारदीयवचनान्नाभेदोक्तिविरोधः ॥ 26 ॥ | ‘यस्माद्यज्जायते चाङ्गाल्लोकवेदादिकं हरेः ।तन्नामवाच्यमङ्गं तद्यथा ब्रह्मादिकं मुखम्’॥इति नारदीयवचनान्नाभेदोक्तिविरोधः ॥ 26 ॥ | ||
| Line 1,096: | Line 996: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V27 | | verse_id = BS_C01_S02_V27 | ||
| id = BS_C01_S02_V27_B1 | | id = BS_C01_S02_V27_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अग्निवैश्वानरादिशब्दस्तेजसि भूते अग्निदेवतायां च प्रसिद्धोऽप्यतः पूर्वोक्तहेतुत एवात्र न सा तच्चाभिधीयते ॥ 27 ॥ | अग्निवैश्वानरादिशब्दस्तेजसि भूते अग्निदेवतायां च प्रसिद्धोऽप्यतः पूर्वोक्तहेतुत एवात्र न सा तच्चाभिधीयते ॥ 27 ॥ | ||
| Line 1,113: | Line 1,012: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V28 | | verse_id = BS_C01_S02_V28 | ||
| id = BS_C01_S02_V28_B1 | | id = BS_C01_S02_V28_B1 | ||
| text = | | text = | ||
नाग्न्यादयः शब्दा अग्न्यादिवाचकास्तथापि साक्षादेवानन्ययोगेन ब्रह्मवाचकैश्यब्दैः व्यवहारार्थमनभिज्ञानाच्चान्यत्र व्यवहारन्तीत्यभ्युपगमेऽविरोधं जैमिनिर्वक्ति । | नाग्न्यादयः शब्दा अग्न्यादिवाचकास्तथापि साक्षादेवानन्ययोगेन ब्रह्मवाचकैश्यब्दैः व्यवहारार्थमनभिज्ञानाच्चान्यत्र व्यवहारन्तीत्यभ्युपगमेऽविरोधं जैमिनिर्वक्ति । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V28 | | verse_id = BS_C01_S02_V28 | ||
| id = BS_C01_S02_V28_B2 | | id = BS_C01_S02_V28_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘व्यासचित्तस्थिताकाशादवच्छिन्नानि कानिचित् । | ‘व्यासचित्तस्थिताकाशादवच्छिन्नानि कानिचित् । | ||
| Line 1,130: | Line 1,027: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V28 | | verse_id = BS_C01_S02_V28 | ||
| id = BS_C01_S02_V28_B4 | | id = BS_C01_S02_V28_B4 | ||
| text = | | text = | ||
इति स्कान्दवचनान्न मतानां परस्परविरोधः ॥ 28 ॥ | इति स्कान्दवचनान्न मतानां परस्परविरोधः ॥ 28 ॥ | ||
| Line 1,147: | Line 1,043: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V29 | | verse_id = BS_C01_S02_V29 | ||
| id = BS_C01_S02_V29_B1 | | id = BS_C01_S02_V29_B1 | ||
| text = | | text = | ||
तत्र तत्र प्रसिद्धावप्यग्न्यादिषु ब्रह्मणोऽभिव्यक्तेरग्न्यादिसूक्तनियम इत्याश्मरथ्यः ॥ 29 ॥ | तत्र तत्र प्रसिद्धावप्यग्न्यादिषु ब्रह्मणोऽभिव्यक्तेरग्न्यादिसूक्तनियम इत्याश्मरथ्यः ॥ 29 ॥ | ||
| Line 1,164: | Line 1,059: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V30 | | verse_id = BS_C01_S02_V30 | ||
| id = BS_C01_S02_V30_B1 | | id = BS_C01_S02_V30_B1 | ||
| text = | | text = | ||
तत्र तत्रोक्तस्य विष्णोरग्न्यादिष्वनुस्मर्यमाणत्वात् तन्नियमः इति बादरिः ॥ 30 ॥ | तत्र तत्रोक्तस्य विष्णोरग्न्यादिष्वनुस्मर्यमाणत्वात् तन्नियमः इति बादरिः ॥ 30 ॥ | ||
| Line 1,181: | Line 1,075: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V31 | | verse_id = BS_C01_S02_V31 | ||
| id = BS_C01_S02_V31_B1 | | id = BS_C01_S02_V31_B1 | ||
| text = | | text = | ||
साक्षादप्यविरोधं वदन् जैमिनिः सूक्तादिनियममग्न्यादि सम्प्राप्त्या मन्यते। | साक्षादप्यविरोधं वदन् जैमिनिः सूक्तादिनियममग्न्यादि सम्प्राप्त्या मन्यते। | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V31 | | verse_id = BS_C01_S02_V31 | ||
| id = BS_C01_S02_V31_B2 | | id = BS_C01_S02_V31_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘तं यथा यथोपासते तदेव भवति’ इति दर्शयति ॥ 31 ॥ | ‘तं यथा यथोपासते तदेव भवति’ इति दर्शयति ॥ 31 ॥ | ||
| Line 1,206: | Line 1,098: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V32 | | verse_id = BS_C01_S02_V32 | ||
| id = BS_C01_S02_V32_author-note | | id = BS_C01_S02_V32_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति वैश्वानराधिकरणम् ॥ 07 ॥ | ॥ इति वैश्वानराधिकरणम् ॥ 07 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V32 | | verse_id = BS_C01_S02_V32 | ||
| id = BS_C01_S02_V32_author-note | | id = BS_C01_S02_V32_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 01-02 ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 01-02 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V32 | | verse_id = BS_C01_S02_V32 | ||
| id = BS_C01_S02_V32_B1 | | id = BS_C01_S02_V32_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न ह्यन्योपासकोऽन्यं प्राप्नुत इति युज्यत इत्यत आह – | न ह्यन्योपासकोऽन्यं प्राप्नुत इति युज्यत इत्यत आह – | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C01_S02_V32 | | verse_id = BS_C01_S02_V32 | ||
| id = BS_C01_S02_V32_B1 | | id = BS_C01_S02_V32_B1 | ||
| text = | | text = | ||
एनं विष्णुमस्मिन्नग्न्यादावामनन्ति । ‘योऽग्नौ तिष्ठन्’‘य एष एतस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः’ इत्यादिना ॥ 32 ॥ | एनं विष्णुमस्मिन्नग्न्यादावामनन्ति । ‘योऽग्नौ तिष्ठन्’‘य एष एतस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः’ इत्यादिना ॥ 32 ॥ | ||
Revision as of 08:59, 10 April 2026
लिङ्गात्मकानां शब्दानां विष्णौ प्रवृत्तिं दर्शयत्यस्मिन् पादे प्राधान्येन ।’ब्रह्म ततमम्’इति सर्वगतत्वमुक्तं विष्णोः । तच्च’तस्यैतस्यासावादित्यो रसः’ इत्यादिनाऽऽदित्यस्य प्रतीयत इत्यतोऽब्रवीत् ।
सर्वगतत्वाधिकरणम्
ॐ सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॐ ॥ 01-32 ॥
‘स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा’इत्यादिना सर्वत्रोच्यमानो नारायण एव ।
‘तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’
‘परमं यो महद्ब्रह्म’ । ‘वासुदेवात् परः को नु ब्रह्मशब्दोदितो भवेत् ।
स हि सर्वगुणैः पूर्णस्तदन्ये तूपचारतः’ ॥इति तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दोपदेशात् ॥ 01 ॥
ॐ विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॐ ॥ 02-33 ॥
‘स योऽतोऽश्रुतः’ इत्यादि ।
स हि ‘न ते विष्णो जायमानः’ इत्यादिनाऽश्रुतत्वादिगुणकः ।
‘स सविता स वायुः स इन्द्रः, सोऽश्रुतः सोऽदृष्टो यो हरिर्यः परमो यो विष्णुर्योऽनन्तः’ इत्यादि चतुर्वेदशिखायाम् ॥02॥
ॐ अनुपपत्तेस्तुन शारीरः ॐ ॥ 03-34 ॥
न चादित्यशब्दाच्चक्षुर्मयत्वादेश्च जीव इति वाच्यम् ।
एकस्य सर्वशरीरस्थत्वानुपपत्तेरेव ॥ 03 ॥
ॐ कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॐ ॥ 04-35 ॥
‘आत्मानां परस्मैशंसति’ इत्यादि ॥04॥
ॐ शब्दविशेषात् ॐ ॥ 05-36 ॥
‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति । न हि जीवमेव ब्रह्मेत्याचक्षते ।
‘एष उ एव ब्रह्मैष उ एवात्मैष उ एव सवितैष उ एवेन्द्र एष उ एव हरिर्हरति परः परानन्दः’ इति चेन्द्रद्युम्नशाखायाम् ॥ 05 ॥
ॐ स्मृतेश्च ॐ ॥ 06-37 ॥
‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’
‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’ इत्यादि ।
न चा प्रामाणिकं कल्प्यम् ॥ 06 ॥
ॐ अर्भकौकस्त्वात् तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च ॐ ॥07-38 ॥
सर्वेषु भूतेष्वित्यल्पौकस्त्वाच्चक्षुर्मयत्वादिना जीवव्यपदेशाच्च नेति चेन्न । अर्भकौकस्त्वेन चक्षुर्मयत्वादिरूपेण च तस्यैव विष्णोर्निचाय्यत्वात् । सर्वगतत्वेऽप्यल्पौकस्त्वं च युज्यते व्योमवत् ।‘सर्वेन्द्रियमयो विष्णुः सर्वप्राणिषु च स्थितः ।सर्वनामाभिधेयश्च सर्ववेदोदितश्च सः’ इति स्कान्दे ॥ 07 ॥
ॐ सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॐ ॥ 08-39 ॥
॥ इति सर्वगतत्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘जीवपरयोरेकशरीरस्थत्वे समानभोगप्राप्तिरिति चेन्न ।सामर्थ्य वैशेष्यात् ।उक्तं च गारुडे
‘सर्वज्ञाल्पज्ञताभेदात् सर्वशक्त्यल्पशक्तितः ।
स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां सम्भोगो नेशजीवयोः’ इति च ॥08॥
अत्तृत्वाधिकरणम्
ॐ अत्ताचराचरग्रहणात् ॐ ॥ 09-40 ॥
‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्तम् । तत्रात्तृत्वं,
‘स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत । सर्वां वा अत्तीति तददितेरदितित्वम्’ इत्यदितेः प्रतीयते ।‘स यद्यदेवासृजत’ इति पुल्लिङ्गम् च ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’इत्यादिवत् । अत्रोच्यते –
न हि चराचरस्य सर्वस्यात्तृत्वमदितेः ।
‘स्रष्टा पाता तथैवात्ता निखिलस्यैक एव तु । वासुदेवः परः पुंसामितरेऽल्पस्य वा न वा’ इति स्कान्दे ।
‘एकः पुरस्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः ।यमप्येति भुवनं साम्पराये स नो हरिर्घृतमिहायुषेऽत्तु देवः’ इति श्रुतिः ॥ 09 ॥
ॐ प्रकरणाच्च ॐ ॥ 10-41 ॥
॥ इति अत्तृत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥
अप्संवत्सरसृष्ट्यादिना तत्प्रकरणाच्च ।
‘नेहासीत् किञ्चनाप्यादौ मृत्युरासीद्धरिस्तदा ।
सो त्मनो मनसाऽस्राक्षीदप एव जनार्दनः ॥
शयानस्तासु भगवान्निर्ममेऽण्डं महत्तरम् ।
तत्र संवत्सरं नाम ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः ॥
तमत्तुं व्याददादास्यं तदाऽसौ विरुराव ह ।
थं तं कृपया विष्णुः सृष्टिकर्मण्ययोजयत् ।
सोऽसृजद्भुवनं सर्वमद्यार्थ्यं हरये विभुःइति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 10 ॥
गुहाधिकरणम्
ॐ गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॐ ॥ 11-42 ॥
सर्वात्रैकः परः उक्तः ।
‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः’ । इति पिबन्तौ प्रतीयेते । तौ काविति । उच्यते ।
गुहां प्रविष्टौ पिबन्तौ विष्णुरूपे एव ।
‘घर्मा समन्ता त्रिवृतं व्यापतुस्तयोर्जुष्टिं मातरिश्वा जगाम’ इत्यादिना तद्दर्शनात् ।
‘आत्माऽन्तरात्मेति हरिरेक एव द्विधा स्थितः ।निविष्टो हृदयेनित्यं रसं पिबति कर्मजम्इति बृहत्संहितायाम् ।
‘शुभं पिबत्यसौ नित्यं नाशुभं स हरिः पिबेत् ।पूर्णानन्दमयस्यास्य चेष्टा न ज्ञायते क्वचित्’इति पाद्मे ॥
‘यो वेद निहितं गुहायाम्’ इत्यादिना प्रसिद्धं हिशब्देन दर्शयति ॥ 11 ॥
ॐ विशेषणाच्च ॐ ॥ 12-43 ॥
॥ इति गुहाधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म तत्परम्’ इति ।
‘पृथग् वक्तुं गुणास्तस्य न शक्यन्तेऽमितत्वतः ।
यतोऽतो ब्रह्मशब्देन सर्वेषां ग्रहणं भवेत् ॥
एतस्माद्ब्रह्मशब्दोऽयं विष्णोरेव विशेषणम् ।
अमिता हि गुणा यस्मान्नान्येषां तमृते विभुम्’ ॥ इति पाद्मे ।
न च जीवे समन्वयोऽभिधीयते ।
‘सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यं भिदा सत्यं भिदा सत्यं भिदा मैवारुवण्यो मैवारुवण्यो मैवारुवण्यः’ इति भाल्लवेयश्रुतिः ।
‘आत्मा हि परमः स्वतन्त्रोऽधिगुणो ऽऽल्पशक्तिरस्वातन्त्रोऽवरः’ इति च भाल्लवेयश्रुतिः ।
‘यथेश्वरस्य जीवस्य भेदः सत्यो विनिश्चयात् ।
एवमेव हि मे वाचं सत्यां कर्तुमिहार्हसि’ ॥
‘यथेश्वरश्च जीवश्च सत्यभेदौ परस्परम् ।
तेन सत्येन मां देवास्त्रायन्तु सहकेशवाः ॥’
इत्यदेर्नासत्यो भेदः ॥ 12 ॥
इत्यन्तराधिकरणम्
ॐ अन्तर उपपत्तेः ॐ ॥ 13-44 ॥
आदित्ये विष्णुरित्युक्तम् ।
‘य एष आदित्ये पुरुषः सोऽहमस्मि स एवाहमस्मि’
इत्यादावग्नीनामेवादित्यस्थत्वमुच्यते । अतोऽक्ष्यादित्ययोरैक्याद्
‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यत’ इत्यत्राप्यग्निरेवोच्यते । अतः
‘तद्यथा पुष्करफलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविधि पापं कर्म न श्लिष्यते’ इत्यग्निज्ञानादेव सर्वपापश्लेषान्मोक्षोपपत्तिरिति । अतो ब्रवीति –चक्षुरन्तस्थो विष्णुरेव।‘त्रिपादस्यामृतं दिवि’इत्यादिना तस्यैवामृतत्वाद्युपपत्तेः।ब्रह्मशब्दाद्युपपत्तेश्च ।
‘सोऽहमस्मि’ इत्यादि त्वन्तर्याम्यपेक्षया ।
‘अन्तर्यामिणमीशेशमपेक्ष्याहं त्वमित्यपि ।सर्वे शब्दाः प्रयुज्यन्ते सति भेदेऽपि वस्तुषु’ इति महाकौर्मे ॥ 13 ॥
ॐ स्थानादिव्यपदेशाच्च ॐ ॥ 14-45 ॥
‘तद्यदस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति’ इत्यादिस्थानशक्तिः वामनिर्भामनिरित्याद्यात्मशक्तिश्चोच्यते ।
तस्य ह्येत्यल्लिङ्गम् ।‘स ईशः सोऽसपत्नः स हरिः स परः स परोवरीयान् यदिदं चक्षुषि सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति स वामनः स भामनः स आनन्दः सोऽच्युतः’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ।
‘यत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुभिः । स वामनः परोऽस्माकं गतिरित्येव चिन्तयेत्’ इति वामने ॥ 14 ॥
ॐ सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॐ ॥ 15-46 ॥
‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’ इति,‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’
‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’ इत्यादेस्तस्यैव हि लक्षणम् ।
‘लक्षणं परमानन्दो विष्णोरेव न संशयः ।अव्यक्तादितृणान्तास्तु विप्लुडानन्दभागिनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥
न च मुख्ये सत्यमुख्यं युज्यते ॥ 15 ॥
ॐ श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॐ ॥ 16-47 ॥
‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इति । न ह्यन्यविद्यया अन्यगतिर्युक्ता ॥16॥
ॐ अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॐ ॥ 17-48 ॥
॥ इत्यन्तराधिकरणम् ॥
जीवस्य जीवान्तरनियामकत्वेऽनवस्थितेः, साम्यादसम्भवाच्च न जीवः । नियमप्रमाणाभावात् । अनीश्वरापेक्षत्वाच्च ॥ 17 ॥
इत्यन्तर्याम्यधिकरणम्
ॐ अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॐ ॥ 18-49 ॥
‘यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ इत्याद्यन्तर्याम्युच्यते ।
तत्र च ‘एतदमृतम्’ इत्युक्तममृतत्वमुच्यते । स च ‘यस्य पृथिवी शरीरम्’ इत्यादिना सर्वात्मकत्वात् प्रकृतिस्तत्तज्जीवो वा युक्तः ।न हि विष्णोः पृथिव्यादिशरीरत्वमङ्गीक्रियत इत्यत आह –
‘यं पृथिवी न वेद’ ‘यः पृथिव्या अन्तरः’, इत्यादिना अधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशाद्विष्णुरेवान्तर्यामी ।
स हि ‘न ते विष्णो चायमानो न जातः’
‘स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः सर्वेषां भूतामन्तरपुरुष’ इत्यादिनाऽविदितोऽन्तरश्च ॥ 18 ॥
ॐ न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॐ ॥ 19-50 ॥
त्रिगुणत्वादिप्रधानधर्मानुक्तेर्न स्मृत्युक्तं प्रधानमन्तर्यामि ॥19॥
ॐ शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॐ ॥ 20-51 ॥
॥ इत्यन्तर्याम्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
‘य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा
शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’
‘यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं’
इत्युभयेऽपि हि शाखिनो भेदेनैनं जीवमधीयते ।
‘शीर्यते नित्यमेवास्माद्विष्णोस्तु जगदीदृशम् ।
रमते च परो ह्यस्मिन् शरीरं तस्य तज्जगत्’ ॥
इति वचनान्न शरीरत्वविरोधः ॥20॥अदृश्यत्वाधिकरणम्
ॐ अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॐ ॥ 21-52 ॥
अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः । तत्र –
‘यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तद् पाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः’इत्युक्त्वा,‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’ इत्युक्त्वा तस्माच्च ‘अक्षरात्परतः परः’ इति परः प्रतीयत इत्यतोऽब्रवीत्-
पृथिव्यादि दृष्टान्तमुक्त्वा‘अक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’ इत्यतः परं तत्परतः पराभिधानात्,‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’ इति स्मृतेश्च प्रकृतेः प्राप्तिः ।
ब्रह्मशब्दात् तत्परतः पराभिध्यानादेव च हिरण्यगर्भस्य ।
‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ ।
‘तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया’
‘अथ द्वे वाव विद्ये वेदितव्ये परा चैवापरा च’। तत्र यो वेदा यान्यङ्गानि यान्युपाङ्गानि यानि प्रत्यङ्गानि साऽपरा ।
अथ परा यया स हरिर्वेदितव्यो योऽसावदृश्यो निर्गुणः परः परमात्मा’इत्यादिना तद्धर्मत्वेनावगतपरविद्या¬विषयत्वोक्तेर्विष्णुरेवादृश्यत्वादि गुणकः ॥ 21 ॥
ॐ विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां नेतरौ ॐ ॥ 22-53 ॥
‘यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप’ इति विशेषणान्न प्रकृतिः ।’ तस्मातेतत्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते’ इति भेदव्यपदेशान्न विरिञ्चः ।
‘अपरं त्वक्षरं या सा प्रकृतिर्जडरूपिका । श्रीः परा प्रकृतिः प्रोक्ता चेतना विष्णुसंश्रया ॥तामक्षरं परं प्राहुः परतः परमक्षरम् । हरिमैवाखिलगुणमक्षरत्रयमीरितम्’॥
इति स्कान्दे त्र्यक्षराभिधानात्’ अक्षरात् परतः परः’ इत्यपि विशेषणमेव ।
‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः’
इति भेदव्यपदेशादीशपदप्राप्तोऽपि न रुद्रः ॥ 22 ॥
ॐ रूपोपन्यासाच्च ॐ ॥ 23 ॥
॥ इति अदृश्यत्वाधिकरणम् ॥
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ इति
“एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । स मुनिर्भूत्वासमचिन्तयत् । तत एते व्यजायन्त विश्वो हिरण्यगर्भोऽग्निर्यमो वरुणरुद्रेन्द्राः” इति ।
तस्य हैतस्य परमस्य नारायणस्य चत्वारि रूपाणि शुक्लं रक्तं रौक्मं कृष्णमिति । स एतान्येतेभ्योऽभ्यचीक्लृपत् । विमिश्राणि व्यमिश्रयत् । अत एतादृगेतद्रूपमिति तस्यैव हि रूपाण्यभिधीयन्ते ॥ 32 ॥
अदृश्यत्वाधिकरणम्
ॐ वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॐ ॥ 24-55॥
अदृश्यत्वादिगुणेषु सर्वगतत्वं
‘यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते’ इति वैश्वानरस्योक्तमित्यत आह –
अग्नाविष्ण्वोः साधारणस्य वैश्वानरशब्दस्य विष्णावेव प्रसिद्धात्म शब्देन विशेषणाद्वैश्वानरो विष्णुरेव ॥ 24 ॥
ॐ स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॐ ॥25-56॥
‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’
इति स्मर्यमाणमत्रापि स एवोच्यत इत्यस्यानुमापकम् । समाख्यानात् । इतिशब्दः समाख्याप्रदर्शकः ॥ 25 ॥
ॐ शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानान्नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशादसम्भवात् पुरुषविधमपि चैनमधीयते ॐ ॥ 26-57 ॥
‘अयमग्निर्वैश्वानरः’‘वैश्वानरमृत आजातमग्निम्’ इत्यादिशब्दः ।
‘वैश्वानरे तद्दुतं भवति’ ‘हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः’ इत्याद्यग्निलिङ्गमादिशब्दोक्तम्।
‘येनेदमन्नं पच्यते’’तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम्’ इत्यादिना पाचकत्वेनान्तः प्रतिष्ठानं च प्रतीयते । तस्मान्न विष्णुरिति चेन्न ।
‘अथ हेममात्मानमणोरणीयांसं परतः परं विश्वं हरिमुपासीतेति ।
सर्वनामा सर्वकर्मा सर्वलिङ्गः सर्वगुणः सर्वकामः सर्व धर्मः सर्वरूप इति’।
‘स य एतमेवमात्मानं विश्वं हरिमारादरमुपास्ते तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेषु देवेषु सर्वषुवेदेषु कामचारो भवति’
इति तत्तन्नामलिङ्गादिना तस्यैव दृष्ट्युपदेशान्महोपनिषदि ॥
अनात्तत्वादनात्मान ऊनत्वाद्गुणराशितः ।
अब्रह्माणः परे सर्वे ब्रह्मात्म विष्णुरेव हि’ ॥
इत्यादिना ‘को न आत्मा किं ब्रह्म’ इत्यारम्भाच्च अन्येषामसम्भवाद्विष्णुरेव वैश्वानरः ।
‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत’
इत्यादिना यः पुरुषाख्यो विष्णुरभहितस्तद्विधमेवात्र ‘मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मा’
इत्यादिनैनं वैश्वानरमधीयते । चशब्देन सकलवेदतन्त्रपुराणादिषु विष्णुपरत्वं पुरुषसूक्तस्य दर्शयति ।तथा च ब्राह्मे –
‘यथैव पौरुषं सूक्तं नित्यं विष्णुपरायणम् ।
तथैव मे मनो नित्यं भूयाद्विष्णुपरायणम्’ इति ॥
चतुर्वेदशिखायां च –
‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’ इति ।‘एष ह्येवाचिन्त्यः परः परमो हरिरादिरनादिरनन्तोऽनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तबाहुरनन्त गुणोऽनन्तरूपः’ इति बृहत्संहितायां च
‘यथा हि पौरुषं सूक्तं विष्णोरेवाभिधायकम् ।
न तथा सर्ववेदाश्च वेदाङ्गानि च नारद’ इत्यादि ॥
‘यस्माद्यज्जायते चाङ्गाल्लोकवेदादिकं हरेः ।तन्नामवाच्यमङ्गं तद्यथा ब्रह्मादिकं मुखम्’॥इति नारदीयवचनान्नाभेदोक्तिविरोधः ॥ 26 ॥
ॐ अत एव न देवता भूतं च ॐ ॥ 27-58॥
अग्निवैश्वानरादिशब्दस्तेजसि भूते अग्निदेवतायां च प्रसिद्धोऽप्यतः पूर्वोक्तहेतुत एवात्र न सा तच्चाभिधीयते ॥ 27 ॥
ॐ साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॐ ॥ 28-59 ॥
नाग्न्यादयः शब्दा अग्न्यादिवाचकास्तथापि साक्षादेवानन्ययोगेन ब्रह्मवाचकैश्यब्दैः व्यवहारार्थमनभिज्ञानाच्चान्यत्र व्यवहारन्तीत्यभ्युपगमेऽविरोधं जैमिनिर्वक्ति ।
‘व्यासचित्तस्थिताकाशादवच्छिन्नानि कानिचित् ।
अन्ये व्ववहरन्त्येतान्यूरीकृत्य गृहादिवत्’ ॥
इति स्कान्दवचनान्न मतानां परस्परविरोधः ॥ 28 ॥
ॐ अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॐ ॥ 29-60 ॥
तत्र तत्र प्रसिद्धावप्यग्न्यादिषु ब्रह्मणोऽभिव्यक्तेरग्न्यादिसूक्तनियम इत्याश्मरथ्यः ॥ 29 ॥
ॐ अनुस्मृतेर्बादरिः ॐ ॥ 30-61 ॥
तत्र तत्रोक्तस्य विष्णोरग्न्यादिष्वनुस्मर्यमाणत्वात् तन्नियमः इति बादरिः ॥ 30 ॥
ॐ सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॐ ॥ 31-62 ॥
साक्षादप्यविरोधं वदन् जैमिनिः सूक्तादिनियममग्न्यादि सम्प्राप्त्या मन्यते।
‘तं यथा यथोपासते तदेव भवति’ इति दर्शयति ॥ 31 ॥
ॐ आमनन्ति चैनमस्मिन् ॐ ॥ 32-63 ॥
॥ इति वैश्वानराधिकरणम् ॥ 07 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 01-02 ॥
न ह्यन्योपासकोऽन्यं प्राप्नुत इति युज्यत इत्यत आह –
एनं विष्णुमस्मिन्नग्न्यादावामनन्ति । ‘योऽग्नौ तिष्ठन्’‘य एष एतस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः’ इत्यादिना ॥ 32 ॥