Aitareya/C2/S4: Difference between revisions
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एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । | एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । | ||
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स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ | स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ | ||
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पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिमच्युतः ॥ | पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिमच्युतः ॥ | ||
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एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । | एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । | ||
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... विशतेति स चाब्रवीत् । | ... विशतेति स चाब्रवीत् । | ||
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अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । | अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । | ||
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पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । | पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । | ||
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... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । | ... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । | ||
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देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ॥ | देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ॥ | ||
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इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । | इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥ | ||
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स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ॥ | स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ॥ | ||
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आततगुणत्वादात्मा नारायणः । ब्रह्म पन्थाः सत्यं कर्मेति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । | आततगुणत्वादात्मा नारायणः । ब्रह्म पन्थाः सत्यं कर्मेति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । | ||
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मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । | मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । | ||
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मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम् इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्य बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि य एष तपतीत्यादिना बहुशोऽभ्यासाच्च । सूर्यो हि हिरण्याक्षः । सविता देव आगादिति पिङ्गलाक्षः प्रसिद्धः । | मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम् इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्य बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि य एष तपतीत्यादिना बहुशोऽभ्यासाच्च । सूर्यो हि हिरण्याक्षः । सविता देव आगादिति पिङ्गलाक्षः प्रसिद्धः । | ||
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विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । | विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । | ||
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यो देवानां नामधा एक एव । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः । | यो देवानां नामधा एक एव । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः । | ||
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णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेत्यादिनान्तेऽपि विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । | णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेत्यादिनान्तेऽपि विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । | ||
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आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | ||
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एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । | एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः । | ||
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अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैरित्यर्थः । तत्र हेतुस्तदन्यत् ककिञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीदित्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवदासीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं ककिञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । | अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैरित्यर्थः । तत्र हेतुस्तदन्यत् ककिञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीदित्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवदासीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं ककिञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । | ||
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उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । | उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । | ||
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नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । इति च भारते । | नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । इति च भारते । | ||
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सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलयेऽपि विद्यमानत्वादेव नाग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्वादन्येषामग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । | सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलयेऽपि विद्यमानत्वादेव नाग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्वादन्येषामग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । | ||
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प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । | प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । | ||
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ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । | ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । | ||
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आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । | आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । | ||
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गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । अं विष्णुं बिभर्तीत्यम्भो विष्णुलोको दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वादन्तरिक्षं मरीचयः । मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवी मरः । | गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । अं विष्णुं बिभर्तीत्यम्भो विष्णुलोको दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वादन्तरिक्षं मरीचयः । मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवी मरः । | ||
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भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः सुरान् प्रभुः । | भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः सुरान् प्रभुः । | ||
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या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवतास्ता आप इत्युच्यन्ते । आप इत्याप इतीति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्शब्देनोक्तेः । अयं पितैते पुत्रा इति च । आहं मां देवेभ्यो वेद ओमद्देवान् वेदेति च । | या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवतास्ता आप इत्युच्यन्ते । आप इत्याप इतीति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्शब्देनोक्तेः । अयं पितैते पुत्रा इति च । आहं मां देवेभ्यो वेद ओमद्देवान् वेदेति च । | ||
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ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । | ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । | ||
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अमूर्च्छयत् मूर्छिर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वेत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव । न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितो भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानामुपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्यामन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । | अमूर्च्छयत् मूर्छिर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वेत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव । न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितो भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानामुपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्यामन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । | ||
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नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । | नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । | ||
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एतमेव पुरुषं व्यासकृष्णकपिलराघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपमदर्शमेवाहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे । रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते इति पदविवेके । अपश्यदित्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम् । अभिव्यैख्यदित्यभिशब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः | एतमेव पुरुषं व्यासकृष्णकपिलराघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपमदर्शमेवाहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे । रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते इति पदविवेके । अपश्यदित्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम् । अभिव्यैख्यदित्यभिशब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः | ||
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प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । | प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । | ||
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परोक्षप्रिया इवेत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियं तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीतीवशब्दः ॥ ३ ॥ | परोक्षप्रिया इवेत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियं तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीतीवशब्दः ॥ ३ ॥ | ||
Revision as of 08:59, 10 April 2026
नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः ॥ इदं सर्वमपेक्ष्यासौ कालतो गुणतस्तथा । अग्र्य एव समस्तेभ्यस्तद्वशत्वाद् रमापि सा ॥ विद्यमानाऽपि नाग्रस्था गुणैरूना ततो यतः । न ब्रह्मा न शिवश्चासीन्नैवान्यच्च मिषत् क्वचित्॥ सुप्तास्तत्र यतो जीवाः सर्वे ब्रह्मशिवादिकाः । असुप्ता श्रीश्च मुक्ताश्च स्वतन्त्रोन्मेषवर्जनात् ॥ अनुन्मेषा एव तेऽपि स्वतन्त्रोन्मेष एकराट् । नारायणो न चान्योऽस्ति पूर्णोन्मीलद्गुणात्मकः ॥ पराधीनेन वित्तेन भुञ्जन्नपि हि भिक्षुकः । वित्तवानिति नैवोक्तस्तथा श्रीर्मुक्तिगा अपि ॥ मिषन्तोऽप्यन्यतन्त्रत्वान्न मिषन्तः कथञ्चन । सर्वदाऽप्येक एवायं स्वतन्त्रो नापरः क्वचित्॥
कालाग्र्यत्वं वक्तुमस्य प्रलये स्थितिरुच्यते ।
लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः । स लोकेभ्यः पूर्वतनानबाख्यान् महदादिकान् ॥ ब्रह्मशर्वादिकान् सृष्ट्वा जडैस्सह जनार्दनः । दिवमाकाशमुर्वीं च ससृजेऽथ द्विसप्तकान् ॥ इति सृष्ट्वा स लोकांस्तु पुनस्तानेव लोकपान् । अण्डान्तः स्रष्टुमैच्छच्च तेषां पूज्यत्वसिद्धये ॥ अम्नामकेभ्यस्तेभ्यः स पूर्वसृष्टेभ्य एव तु । सर्वजीवाधिकत्वात् तु ब्रह्माणं पुरुषाभिधम् ॥ अंशेनोद्धृत्य रुद्राद्यैः सह चैनमयोजयत् । तथैव चेतनानाञ्च भागानुद्धृत्य पिण्डवत् ॥
चेतनाचेतनं राशिमेकस्थं विदधे प्रभुः ।
अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् । भिन्नमास्यं पुनस्तस्य विष्णोरेवेच्छया प्रभोः ॥ तत्र वाङ्नामकं रूपं वह्नेरासीत् पुरातनम् । तस्यैवाथ द्वितीयं च यदग्निरिति गीयते ॥ तथैव नासिकातोऽभून्मुख्यवायोः सुतो मरुत् । प्राणो वायुरिति द्वेधा चक्षुषोऽभूत् तथा रविः ॥ द्विरूप एव कर्णाभ्यां मित्रधर्माप्यवित्तपाः । दिग्देवता द्विरूपेण बभूवुः सर्व एव च ॥ हृदयाद् गरुडानन्तशिवचन्द्राः पृथक् पृथक् । मनो बुद्ध्यभिमानाश्च तन्नामानश्च जज्ञिरे ॥ त्वचश्च रोमनामानो वृक्षनामान एव च । द्विविधाः पारिजाताद्या बभूवुर्ब्रह्मदेहतः ॥ हस्ताभ्यां द्विविधः शक्रः पद्भ्यां तत्सूनुरेव च । यज्ञस्त्वजनि पायोश्च यमो निर्ऋतिरेव च ॥ रेतोऽम्नामा द्विरूपस्तु शिव एव च गुह्यतः ।
अपानो मृत्युरिति च मुख्यो नाभेस्तु मारुतः ॥ १ ॥
दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् ॥ तदाऽशनापिपासाख्यं द्विरूपं मारुतं पुनः । तस्मिन् देवसमूहे तु विष्णुः प्रावेशयत् प्रभुः ॥ तेऽब्रुवन् देहि नो वासं यत्र चान्नमदामहे । गोरूपमेभ्यो ब्रह्माणं ददौ नारायणः प्रभुः ॥ तत्र प्रविश्य ते देवा नालमित्यब्रुवन् पुनः । अश्वरूपं विरिञ्चश्च पुनरेवावदत् प्रभुः ॥ तद्रूपेऽपि प्रविश्यैव नालमित्यब्रुवन् पुनः । पूर्वसृष्टं पुमाकारं ब्रह्मणोऽदात् पुनर्हरिः ॥
तद्दृष्ट्वैवालमित्यूचुः.....
कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥ नित्यं भवावेति हरिः सर्वत्र प्रविशेत्यमुम् । आह तस्माद् देवतानां सर्वासां भागभुङ् मरुत् ॥ एक एव प्राणनामा नाभिस्थोऽपि स एव तु । अशनापिपासापानश्च मृत्युश्चेति चतुर्विधः ॥
एक एव महान् वायुः सर्वदेवेषु संस्थितः ॥ २ ॥
अबाख्याः देवताः पूर्वं सृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः ॥ ददर्श सुविशालाभ्यां नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः । तद्दर्शनात् तदिच्छातस्तासां देहोऽभवत् पृथक् ॥ सर्वासामपि देहैकदेशेभ्यो मिलितं शुभम् । सर्वैरधिष्ठितं चैव विरिञ्चेन विशेषतः ॥ दिव्यावयवसम्पन्नमेकमेव सुलोचनम् । भोग्यभोक्त्रात्मना नास्ति तस्य दुःखं कथञ्चन ॥ ते हि देवाः स्वयं भोग्याः स्वयं भोक्तार एव च । क्रीडन्ते मोदिनो नित्यं तथाऽप्यन्नात्मकस्त्वसौ ॥
क्रीडयाऽपाक्रमत् किञ्चित्...
अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा ॥ जानन्नपि क्रीडयैव तारतम्यं प्रकाशयन् । एवं चकार ब्रह्मा स क्वाज्ञानं लोककर्तरि ॥ क्षुत्पिपासदयश्चैव देवानां भोगसाधकाः । न तु पीडाकरास्तेषामैश्वर्यादिगुणोन्नतेः ॥ अन्नमूर्तिं ततो ब्रह्मा प्रधानेनैव वायुना । अपानाख्येनात्तुमैच्छत् तदैवाशकदाशु सः ॥ तस्माद् भोक्तैक एवासौ सर्वस्यान्नस्य मारुतः । तत्प्रसादात् परेऽश्नन्ति किञ्चित् किञ्चिन्न चाखिलम् ॥ आयुरूपोऽखिलानां च देवानां वायुरेव हि । अन्नदेवस्य चायुः स तस्माद्देवोत्तमो मरुत् ॥ आयुःशब्दो ज्ञानवाची गतिवाची च यत्ततः । चेष्टामोक्षज्ञानदाता सुराणां मारुतस्ततः ॥ अन्योन्यगुणदातृत्वात् समानौ ब्रह्ममारुतौ । तस्मान्मोक्षे सुखे ज्ञाने विष्णुभक्त्यादिकेष्वपि ॥
सर्वेभ्यश्चाधिकौ तौ हि तयोर्विष्णुः परस्सदा ।
इत्थमैक्षत देवेशो ब्रह्माद्या यदि मां विना । क्रियादिषु समर्थाः स्युर्न मे विष्ण्वभिधा भवेत् ॥ सर्वचेष्टयितृत्वाच्च विशिष्टबलतस्तथा । विष्णुरित्यभिधा मह्यं सा न युक्ता दिवौकसाम् ॥ स्वतन्त्रत्वे ततः सर्वे मद्वशा एव नान्यथा ।
तस्मादेषां प्रवृत्त्यर्थं प्रवेक्ष्ये सह वायुना ॥
मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः ॥ अग्न्यादयस्ततः पश्चात् प्रविष्टास्तन्नियोजिताः । प्रपदाभ्यां तथाऽन्येन रूपेण प्रविवेश सः ॥ बिभर्ति देहं तेनैव मूर्धाविष्टेन चेष्टयन् । नारायणो वासुदेव इति द्वेधा व्यवस्थितः ॥ मूर्धाविष्टो वासुदेवस्तस्य चावसथास्त्रयः । अक्षि कण्ठो हृदित्येवं त एव स्वप्ननामकाः ॥ आप्नोत्यत्र स्वयं विष्णुरतः स्वप्नाः प्रकीर्तिताः । अनिरुद्धादिरूपेण त्रिधा तेषु व्यवस्थितः ॥ दाताऽवस्थात्रयस्यास्य जीवस्य क्रमशो विभुः । सुषुम्नायां वासुदेवो मूर्धन्येव व्यवस्थितः ॥
तस्यामेव ब्रह्मनाड्यां स्थितो नारायणः प्रभुः ।
जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाविशत् । असुराणां निहन्तारं ज्ञानादिगुणदं तथा ॥ चेष्टाप्रदं च भूतेषु न मदन्यं वदत्यपि । इति मत्वा जगन्नाथो दैत्यनिग्रहणेच्छया ॥ ज्ञानदानार्थमपि तु प्रादुर्भूतो भुवि प्रभुः । तथा जीवेषु सर्वेषु प्रविष्टः प्रेरणेच्छया ॥ को ह्यन्यस्तमृते विष्णुमेतत्कर्म करिष्यति । स सर्वगुणसम्पूर्णं सर्वगं नित्यमव्ययम् ॥ एतदेवस्वरूपं स त्वपश्यदवतारगम् । तस्मात् सर्वावताराश्च सर्वजीवेषु संस्थिताः ॥ प्रादुर्भावाः सर्वगुणैः पूर्णा एव सदा स्थिताः । पश्यन्ति च तथा नित्यं निर्दोषोरुस्वसंविदा ॥ गुणपूर्णस्वरूपस्य त्वापरोक्ष्येण दर्शनात् । सर्वदैव ह्यसौ विष्णुरिदन्द्रो नामतो मतः ॥ ब्रह्मादीनां हि सर्वेषां तत्प्रसादेन जायते । जानन्ति न स्वतस्तेन नेदन्द्रास्ते प्रकीर्तिताः ॥ रमापि तत्प्रसादेन जानाति किमुतापरे । अल्पज्ञाना अल्पगुणा अल्पानन्दाश्च तेऽखिलाः ॥ रमाजशङ्करेन्द्राद्यास्तेनानिन्द्राः क्रमेण ते । पापैरज्ञाततां देवा मानयन्ति सदात्मनः ॥ हर्षेण तेन विष्णुः स इन्द्र इत्यभिशब्द्यते । नेदन्द्रताऽसुरादीनां ज्ञायेतेति श्रुतिर्हरिम् ॥ इन्द्र इत्येव वदति पारोक्ष्येणोरुसद्गुणम् ॥
इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः ॥ कर्माभासा जीवसङ्घाः सत्यं प्रद्युम्ननामकः । सङ्कर्षणो हरिः पन्थाः ब्रह्मोक्तो वासुदेवकः ॥
इत्यादिनामनिर्णये ।चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः । उपचारात् तदन्येषां विष्णुनैव कृताः पुरा ॥
इत्यादिना तस्यैव सर्वनामवत्वाच्च ।न वर्तन्ते तदन्यत्र शृङ्गिबेरेऽग्निशब्दवत् ॥
इति च पाद्मे ।एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः । वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ॥
इत्यादि श्रुतिभ्यश्च ।तदेव मिषणं नाम सद्रूपं मिनुते यतः ॥ मिषच्च नान्यद्विष्णोर्हि किमुतोन्मिषदिष्यते । उच्चैर्मिषन् हि भगवान् सर्वदैव जनार्दनः ॥
इति च सत्तत्त्वे ।जानाति नित्यज्ञानेन मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥
इति च सत्तत्त्वे ।कालज्यैष्ट्यं न यस्मात् तत्सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥
इति वाक्यनिर्णये ।लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः ॥ सम्यक्चकार लोकांस्तांल्लोककर्ता ततः स च ॥
इति ब्रह्मवैवर्ते ।शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः ॥ सर्वे सुराः क्रमेणैव विष्णोर्जाता अबाख्यकाः । ज्ञानानन्दबलाद्येषु विष्णुभक्तौ च सर्वशः ॥ हीनाः शतगुणेनैव क्रमेणानेन ते मताः । तेभ्यश्च ऋषयो मर्त्या हीना एव क्रमेण च ॥ विशेषतस्तु मुक्तानां सर्वसंसारबन्धनात् । क्रमोऽयं सम्यगुद्दिष्टो नित्यानन्दैकभोगिनाम् ॥ न विशेषो ब्रह्मवाय्वोरधिकाराविभेदतः । न शेषशिवयोश्चैव तत्पत्नीनां च सर्वशः ॥ सुपर्णशेषयोश्चैव साम्यं सर्वगुणेष्वपि । साम्यमेवैतयोः पत्न्नयोः साम्यं शक्रमनोजयोः ॥ एते तु महादादीनां सर्वेऽपि ह्यभिमानिनः । पूर्वस्य प्रतिबिम्बश्च चरमस्तत्सुतस्तथा ॥ तद्वशाश्चाखिला विष्णोर्न विष्णुः कस्यचिद्वशे । महदादिमानिनश्चैते जातास्तैः सह सर्वशः ॥ एते लोका इति प्रोक्ता लोकानामभिमानिनः । त एव लोकपालाश्च यदा पश्चाद् प्रजाज्ञिरे ॥ पश्चाज्जातैर्हि रूपैस्तैर्लोकस्थान् पालयन्त्यलम् ॥
इत्यादि तत्त्वसारे ।यदि वागादीनामेवाभिव्याहरणादिशक्तिः स्यान्मां विना तर्हि विष्णुत्वं न मम स्यात् तस्मात् कोऽहं भवानीत्याक्षेपः । विशेषेण प्राणयति सर्वान् सर्वेभ्यो विशिष्टश्चेति हि विष्णुः । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेति व्याख्यानात् । तस्मान्मत्प्रेरिता एवैते अभिव्याहारादिशक्ता इत्यभिप्रायः ।
पूर्णानन्दस्वरूपत्वान्नन्दनो भगवान् । प्रादुर्भावरूपेण जातोऽपि भगवान् सर्वभूतान्यभितः सर्वकालेषु विशेषेण पश्यत्येव । इह भूतेषु मत्तोऽन्यं प्रवर्तकं वदेत् किमित्याक्षेपः । अहमेव स्वतन्त्रः परिपूर्णगुण इति कृष्णराघवादिसर्वावताररूपेऽपि सर्वदानुभवत्येव ।क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥ प्रादुर्भूतश्चिदानन्दशरीरो राघवः स्वयम् । स्तम्भाद्वा नरदेहाद्वा नैवास्य प्राकृती तनुः ॥ दैत्यानां मोहनार्थाय सोऽज्ञानाद्यं प्रकाशयेत् । पूर्णचित्सुखरूपोऽपि सदा सर्वावतारगः ॥
इत्यादि स्कान्दे ।ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥
इत्यादि सत्तत्त्वे ।