Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S32: Difference between revisions
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चक्षुःसकाशाद् द्रष्टुर्द्रष्टृत्वम् अक्ष्णोर्योग्यता ॥ ४८ ॥ | चक्षुःसकाशाद् द्रष्टुर्द्रष्टृत्वम् अक्ष्णोर्योग्यता ॥ ४८ ॥ | ||
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केवलं ज्ञानं पुरुषार्थः । देहादिष्वसङ्गिनो जीवस्य तन्निमित्तसुखदुःखादयो न सन्ति । किमुत देहस्य अचेतनत्वात् ॥ ५० ॥ | केवलं ज्ञानं पुरुषार्थः । देहादिष्वसङ्गिनो जीवस्य तन्निमित्तसुखदुःखादयो न सन्ति । किमुत देहस्य अचेतनत्वात् ॥ ५० ॥ | ||
Revision as of 16:46, 9 April 2026
भगवानुवाच–कलिलं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् ।
'नानाविधा गर्भवृद्धिः कर्मभेदाद्भविष्यति ।
अतो नानाविधं ग्रन्थे गर्भसंस्थानमुच्यते॥ इति षाड्गुण्ये ॥ २ ॥
नाथमानो ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः ।स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥ १२ ॥
'वध्रयस्त्विन्द्रियाण्याहुर्हृषीकाणीति चोच्यतेइति शब्दनिर्णये ॥१२॥
ज्ञानं यदेतददधात् कतमः स देव-स्त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांशः ।
कतमः सुखतमः ॥ १७ ॥
पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रिःशारीरभेदमशरीरवदस्य देहे ।
अशरीरवत् परमात्मवत् । परमात्मन एव देहोऽपि तद्वशत्वात् ।
'तत्त्वज्ञानं तु देवानां गर्भस्थानां भविष्यति ।
उत्तमानामृषीणां वाऽप्यन्येषां बहुजन्मगम्॥ इति स्कान्दे ॥ २० ॥तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मावसायिषु ।सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ ३६ ॥
खण्डितात्मावसायिषु जीवमात्रज्ञानिषु ॥ ३६ ॥
तत्सृष्टिसृष्टसृष्टेषु कोन्वखण्डितधीः पुमान् ।ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥ ३९ ॥
'मयः प्रधान उद्दिष्टो माया तद्वश उच्यते। इति षाड्गुण्ये ॥ ३९ ॥
बलं मे पश्य मायायाःस्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् ।
सङ्गं न कुर्यात् प्रमदासु जातुयोगस्य पारं परमारुरुक्षुः ।
योपयाति शनैर्माया योषिद् देवविनिर्मिता ।तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ ४२ ॥
'सत्पुंसु च तथा स्त्रीषु न सङ्गो दोषमावहेत् ।
यथायोग्यं गुणायैव दोषकृद्दुष्टजन्तुषु॥ इति वाराहे ॥ ४०-४२ ॥
देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् ।भुञ्जान एव कर्माणि करोत्यविरतं पुमान् ॥ ४५ ॥
जीवभूतेन जीवकर्मभूतेन ॥ ४५ ॥
यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा ।तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वं योग्यताऽनयोः ॥ ४८ ॥
चक्षुःसकाशाद् द्रष्टुर्द्रष्टृत्वम् अक्ष्णोर्योग्यता ॥ ४८ ॥
आत्मनः केवलं ज्ञानमर्थो देहाद्यसङ्गिनः ।सुखदुःखादयो भावा न देहस्य न चात्मनः ॥ ५० ॥
॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥
केवलं ज्ञानं पुरुषार्थः । देहादिष्वसङ्गिनो जीवस्य तन्निमित्तसुखदुःखादयो न सन्ति । किमुत देहस्य अचेतनत्वात् ॥ ५० ॥