Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S18: Difference between revisions
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Revision as of 16:46, 9 April 2026
ववौ वायुः सुदुस्पर्शः फट्काराराववान् मुहुः ।उन्मूलयन् नगपतीन् वात्यानीको रजोध्वजः ॥ ५ ॥
'फट्कारश्चैव फूत्कारस्तथा किलकिलादयः ।
अनुकारशब्दा विज्ञेया ये चान्ये तादृशा मताः ॥"इत्यभिधानम् ॥ ५ ॥
अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् ।सृगाला अपि टङ्कारैः प्रणेदुरशिवाः शिवाः ॥ ९ ॥
टङ्कारोऽप्यनुकारशब्दः ।
'नाशस्तत्र सृगालानां शिवानां चान्यथास्वरेइत्याग्नेये ॥ ९ ॥
खरोष्ट्राः कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् ।खात्काररभसा मत्ताः पर्यधावन् वरूथशः ॥ ११ ॥
खात्कारोऽप्यनुकारशब्दः ॥ ११ ॥
तं वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञ्चननूपुरम् ।वैजयन्त्या स्रजा जुष्टमसंन्यस्तमहागदम् ॥ २१ ॥
मनोवीर्यमदोत्सिक्तमधृष्यमकुतोभयम् ।भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहयः ॥ २२ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे अष्टादशोऽध्यायः ॥
'न देवानां प्रजापानां विजेता वरतो विना ।
बलेन विद्यया वापि न समस्तत्पतीन्विना ॥
वरोऽपि तादृशो यावच्छरीरं नान्यदेहगः॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ २१-२२ ॥