Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S6: Difference between revisions
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'परमात्मा यतो जीवं मेनेऽसन्तमशक्तितः | 'परमात्मा यतो जीवं मेनेऽसन्तमशक्तितः । | ||
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कालमायांशयोगतः । कालात्परिणामात्, प्रकृतेर्हिरण्यगर्भाच्च ॥ ११-१४ ॥ | कालमायांशयोगतः । कालात्परिणामात्, प्रकृतेर्हिरण्यगर्भाच्च ॥ ११-१४ ॥ | ||
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कालमायांशलिङ्गिनः तन्निमित्तशरीराः । हिरण्यगर्भस्यैव कालाभि-मानी जीवाभिमानीति द्विविधं रूपम् ।'कालजीवाभिमानेन रूपद्वन्द्वी चतुर्Pमुखः''॥ इति पाद्मे ॥ १६ ॥ | कालमायांशलिङ्गिनः तन्निमित्तशरीराः । हिरण्यगर्भस्यैव कालाभि-मानी जीवाभिमानीति द्विविधं रूपम् । | ||
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त्रिभिरात्मभिः कालमायांशैः ॥ २६ ॥ | त्रिभिरात्मभिः कालमायांशैः ॥ २६ ॥ | ||
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सत्प्रमुखा महदादयः ॥ २९ ॥ | सत्प्रमुखा महदादयः ॥ २९ ॥ | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
मैत्रेय उवाच–भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः ।
आत्मनां विभुः जीवाधिपतिः ॥ १ ॥
स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् ।मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २ ॥
'परमात्मा यतो जीवं मेनेऽसन्तमशक्तितः ।
असन्नसावतो नित्यं सत्यज्ञानो यतो हरिः॥ इत्याग्नेये ॥ 'शक्यत्वाच्छक्तयो भार्याः शक्तिः सामर्थ्यमुच्यते॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ 'सुप्तिस्तु प्रकृतेः प्रोक्ता अतीव भगवद्रतिः । अनास्थाऽन्यत्र च प्रोक्ता विष्णोश्चक्षुर्निमीलनम्॥
इति व्योमसंहितायाम् ॥ २ ॥सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः ।आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ ६ ॥
अंशो जीवः ।
'कालजीवगुणादीनामभिमानी चतुर्मुखः ।
सर्वजीवाभिमानित्वादंश इत्येव चोच्यते॥ इति ब्राह्मे ॥ ६ ॥कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः ।तामसानुसृतं स्पर्शं विकुर्वन् निर्ममेऽनिलम् ॥ ११ ॥
अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः ।ससर्ज रूपतन्मात्रां ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ १२ ॥
अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् ।आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ १३ ॥
ज्योतिषाऽम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वत् परवीक्षितम् ।महीं गन्धगुणामाधात् कालमायांशयोगतः ॥ १४ ॥
कालमायांशयोगतः । कालात्परिणामात्, प्रकृतेर्हिरण्यगर्भाच्च ॥ ११-१४ ॥
एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः ।नानात्वात् स्वक्रियानीशाः प्रचुः प्रञ्जलयो विभुम् ॥ १६ ॥
कालमायांशलिङ्गिनः तन्निमित्तशरीराः । हिरण्यगर्भस्यैव कालाभि-मानी जीवाभिमानीति द्विविधं रूपम् ।
'कालजीवाभिमानेन रूपद्वन्द्वी चतुर्Pमुखः॥ इति पाद्मे ॥ १६ ॥
ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा-स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म ।
'ब्रह्मविद्या हरेश्छाया तदंशो हि सुरेष्वपि ।
सर्वविद्याः श्रियः प्रोक्ताः प्रधानांशश्चतुर्मुखे॥ इति ब्राह्मे ॥ १८ ॥
मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै-श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते ।
द्युसरितो धरायाश्च ॥ १९ ॥
तथापरे त्वात्मसमाधियोग-बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।
'वायोश्च प्रकृतेर्विष्णोर्जयो भक्त्यैव नान्यथा।
इति दत्तात्रेययोगे ॥ २५ ॥
तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्यत्वया विसृष्टास्त्रिभिरात्मभिर्ये ।
त्रिभिरात्मभिः कालमायांशैः ॥ २६ ॥
ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थेबभूविमात्मन् करवाम किं ते ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥
सत्प्रमुखा महदादयः ॥ २९ ॥