Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S4: Difference between revisions
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विजानीहि विज्ञापय । 'व्यत्ययो भेदस्वातन्त्र्यकरणेषु''। इति वचनात् ॥ १ ॥ | विजानीहि विज्ञापय । 'व्यत्ययो भेदस्वातन्त्र्यकरणेषु''। इति वचनात् ॥ १ ॥ | ||
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'तद्वशत्वादिदं रूपं हरेर्नैव स्वरूपतः''। इति मानससंहितायाम् ।'अधिष्ठानमिति प्रोक्तं मूलाधारं विचक्षणैः | 'तद्वशत्वादिदं रूपं हरेर्नैव स्वरूपतः''। इति मानससंहितायाम् । | ||
'अधिष्ठानमिति प्रोक्तं मूलाधारं विचक्षणैः । | |||
यत्स्थितं दृश्यते वस्तु संस्थानं तदुदीरितम् । | |||
उभयं हरिरेवास्य जगतो मुनिपुङ्गव''। इति वामने ॥ | |||
'हरिः परोऽस्य जगतो ह्यव्यक्तादेश्च कृत्स्नशः । | |||
अतस्तत्परमेवेदं वदन्ति मुनयोऽमलाः''॥ इति सात्वतसंहितायाम् । | |||
'यदधीना यस्य सत्ता तत्तदित्येव भण्यते । | |||
विद्यमाने विभेदेऽपि मिथो नित्यं स्वरूपतः''इति भविष्यत्पर्वणि ॥२॥ | |||
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तदधिकं ज्ञातुं पूर्वपक्षं दर्शयति–'एकः सृजसि''इत्यादिना ॥ ४ ॥ | तदधिकं ज्ञातुं पूर्वपक्षं दर्शयति– | ||
'एकः सृजसि''इत्यादिना ॥ ४ ॥ | |||
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'त्वदधीना यतः सत्ता अवरस्यापि केशव | 'त्वदधीना यतः सत्ता अवरस्यापि केशव । | ||
अतः स्वरूपतः सम्यक्सति भेदेऽपि तद्भवान्''इति मात्स्ये ॥ ६ ॥ | |||
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नानृतमित्याक्षेपः ॥ १० ॥ | नानृतमित्याक्षेपः ॥ १० ॥ | ||
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'मुख्या माया हरेः शक्तिरमुख्या प्रकृतिर्मता | 'मुख्या माया हरेः शक्तिरमुख्या प्रकृतिर्मता । | ||
अथामुख्यतमा चैव माया दीना प्रकीर्तिता''॥ १२-१३ ॥ | |||
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परः अधिकः ।'तद्वदेव स्थितं यत्तु तात्वतं तत्प्रचक्षते''। इति कौर्मे ॥ १४ ॥ | परः अधिकः । | ||
'तद्वदेव स्थितं यत्तु तात्वतं तत्प्रचक्षते''। इति कौर्मे ॥ १४ ॥ | |||
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वेदप्रतिपाद्येषु स पर इत्यादि ।'गम्येज्यज्ञेयवाच्येषु योज्येषु च परो हरिः | वेदप्रतिपाद्येषु स पर इत्यादि । | ||
'गम्येज्यज्ञेयवाच्येषु योज्येषु च परो हरिः । | |||
तपसा पूज्यमानानां सर्वलोकेभ्य एव च''॥ इति वाराहे ॥ १५ ॥ | |||
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युगपत्क्रमशोऽपि वेत्यस्य परिहारः 'सत्वं रजस्तम''इति ।'नित्यं गृहीताः सत्वाद्याः स्थित्यादिषु विशेषतः | युगपत्क्रमशोऽपि वेत्यस्य परिहारः 'सत्वं रजस्तम''इति । | ||
'नित्यं गृहीताः सत्वाद्याः स्थित्यादिषु विशेषतः । | |||
युगपत् क्रमशश्चैव गृह्णाति भगवान्स्वयम्''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १८ ॥ | |||
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'ज्ञानेन्द्रियैश्च मनसा सत्वं बध्नाति पूरुषम् | 'ज्ञानेन्द्रियैश्च मनसा सत्वं बध्नाति पूरुषम् । | ||
रजः कर्मेन्द्रियैर्नित्यं शरीरेण तमस्तथा । | |||
आन्तरं यत्तु कर्तृत्वं तत्सत्वेनाभिमन्यते ॥ | |||
रजसा त्वभिमन्येत करणैः कर्मकारणैः । | |||
शारीरं वेदनाद्यं तु तमसा ह्यभिमन्यते ॥ | |||
अकर्ता करणैर्हीनः शरीरेण विवर्जितः । | |||
नित्यज्ञानस्वरूपोऽसौ गुणैरेवाभिमन्यते ॥ | |||
एवं जीवः परेणैव प््रोरितः संसृतिं व्रजेत् । | |||
न परः संसृतिं क्वापि स्वातन्त्र्यादधिकत्वतः ॥ | |||
एवं जीवपरौ भिन्नौ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि''॥ इति पाद्मे ॥ | |||
मायिनं ज्ञानिनं स्वतः ॥ १९ ॥ | |||
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लिङ्गैः ज्ञापकैः । त्रिगुणैः । एतैर्लिङ्गैः । स्वप्रसादाज्जीवेन लक्षितगतिः ।'स्वप्रसादादिमं जीवः पश्येत्तेन स्वलक्षितः''इति षाड्गुण्ये ॥ २० ॥ | लिङ्गैः ज्ञापकैः । त्रिगुणैः । एतैर्लिङ्गैः । स्वप्रसादाज्जीवेन लक्षितगतिः । | ||
'स्वप्रसादादिमं जीवः पश्येत्तेन स्वलक्षितः''इति षाड्गुण्ये ॥ २० ॥ | |||
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स्वया मायया स्वशक्त्या ।'यत्रान्यहेत्वभावः स्यादीश्वरेच्छादिना विना | स्वया मायया स्वशक्त्या । | ||
'यत्रान्यहेत्वभावः स्यादीश्वरेच्छादिना विना । | |||
तदिच्छा हि यदृच्छा स्यादतस्तत्र यदृच्छया''। इति ब्रह्मतर्के । | |||
'कालकर्मस्वभावादि नित्ययेशेच्छया सदा । | |||
प्राप्तमेव विशेषेण सृष्ट्यादावुन्नयत्यजः''॥ इति च । | |||
विबुभूषुः बहुधा बुभूषुः । | |||
'ईशो बह्वीः पुरः सृष्ट्वा तत्रैव बहुरूपताम् । | |||
तत्तन्नियामकतया प्राप्तुं कालाद्युपाददे''॥ इति च ॥ २१ ॥ | |||
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प्रकृतेः परिणामस्वभावतः ।'गुणकालस्वभावेभ्य ईशेनाधिष्ठितत्वतः | प्रकृतेः परिणामस्वभावतः । | ||
'गुणकालस्वभावेभ्य ईशेनाधिष्ठितत्वतः । | |||
जगदादि महत्तत्त्वमभूत्तस्येच्छया हरेः ॥''इति षाड्गुण्ये ॥ २२ ॥ | |||
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'भूतानि द्रव्यनामानि ज्ञानं ज्ञानेन्द्रियाण्यपि | 'भूतानि द्रव्यनामानि ज्ञानं ज्ञानेन्द्रियाण्यपि । | ||
क्रिया कर्मेन्द्रियाण्याहुस्तन्मूलत्वादहं त्रिधा''। इति गारुडे ॥ २३ ॥ | |||
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'विशिष्टकार्यशक्तित्वाद्देवा वैकारिकाः स्मृताः | 'विशिष्टकार्यशक्तित्वाद्देवा वैकारिकाः स्मृताः । | ||
अतिजाज्वल्यमानत्वात्तैजसानीन्द्रियाण्यपि ॥ | |||
तामसानि तु भूतानि यतस्तावन्न तूभयम्''॥ इति पाद्मे । | |||
ज्ञानेन्द्रियाणां देवानां ज्ञानशक्तिरुदीरिता । | |||
क्रिया कर्मेन्द्रियाणां च भूतानां द्रव्यशक्तिता''॥ इति स्कान्दे । | |||
'द्रव्यं तु द्रवणप्राप्यं द्वयोर्विवदमानयोः । | |||
पूर्वं वेगाभिसम्बन्धादाकाशस्तु प्रदेशतः''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २४ ॥ | |||
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'पञ्चेन्द्रियाभिमेयत्वान्मात्रागुण इतीरितः''॥ इति मात्स्ये ।'शब्देनैव परो द्रष्टा ज्ञायते जगदेव च ।"इति विष्णुसंहितायाम् ॥ २५ ॥ | 'पञ्चेन्द्रियाभिमेयत्वान्मात्रागुण इतीरितः''॥ इति मात्स्ये । | ||
'शब्देनैव परो द्रष्टा ज्ञायते जगदेव च ।" | |||
इति विष्णुसंहितायाम् ॥ २५ ॥ | |||
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'सर्वचेष्टयितृत्वात्तु प्राणोऽभिभवशक्तितः | 'सर्वचेष्टयितृत्वात्तु प्राणोऽभिभवशक्तितः । | ||
ओजस्त्वनभिभाव्यत्वात्सहश्च स्वेच्छया कृतेः ॥ | |||
बलं विधारकत्वाच्च विधृतिर्वायुरुच्यते''। इति भारते ॥ २६ ॥ | |||
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'अनाद्यनन्तोऽपि हरिर्वैकारिकगणेष्वजः | 'अनाद्यनन्तोऽपि हरिर्वैकारिकगणेष्वजः । | ||
अवतीर्णः पदाङ्गुष्ठमध्यास्ते विश्वभुग्विभुः ॥ | |||
पाददेवस्तु यज्ञोऽन्यस्तं प्रविश्य हरिः स्वयम् । | |||
सर्वं विधारयन्देहे वर्ततेऽनन्तशक्तिधृक्''॥ इति वह्निपुराणे ॥ ३० ॥ | |||
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सदसत्वं व्यक्ताव्यक्तत्वम् । नः भयम् । अदो ब्रह्माण्डम् । ब्रह्माण्डं हि वदन्तीति जीवानां भयकारणम् । तत्र हि संसृतिः ।'आकाशवायू त्वव्यक्तावितरेऽण्डे प्रकाशिताः | सदसत्वं व्यक्ताव्यक्तत्वम् । नः भयम् । अदो ब्रह्माण्डम् । ब्रह्माण्डं हि वदन्तीति जीवानां भयकारणम् । तत्र हि संसृतिः । | ||
'आकाशवायू त्वव्यक्तावितरेऽण्डे प्रकाशिताः । | |||
तथात्वाद्बाह्यभूतानामण्डस्थानां च सा गतिः''॥ इति मात्स्ये ॥३३॥ | |||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
कालकर्मस्वभावस्थ अजीवः परमेश्वरः । अजीवं स्वात्मानम् अजीजनत् । तदण्डं यथा स्वात्मानं प्रासूते तथा चकार ।'यः प्रणधारणं प्रणप्रासादात्कुरुतेऽनिशम् | कालकर्मस्वभावस्थ अजीवः परमेश्वरः । अजीवं स्वात्मानम् अजीजनत् । तदण्डं यथा स्वात्मानं प्रासूते तथा चकार । | ||
'यः प्रणधारणं प्रणप्रासादात्कुरुतेऽनिशम् । | |||
स जीव इति सन्दिष्टस्तदन्योऽजीव उच्यते । | |||
यत्प्रासादात्स तु प्रणः कुरुते स्वस्य धारणम्''॥ इति वायुप्रक्ते ॥ | |||
'कालकर्मस्वभावस्थो वासुदेवः परः पुमान् । | |||
अकरोदण्डमुद्वृद्धमात्मप्रसवकारणम् ॥''इति ब्रह्माण्डे । | |||
जीव इति वा । | |||
'प्र•णं धारयते यस्मात्स जीवः परमेश्वरः । | |||
अजीवोऽपि महातेजास्त्वथवा जीवयन् जगत्''॥ | |||
इति स्कान्दे ॥ ३४ ॥ | |||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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'अण्डे जातौ पुमांसौ द्वौ हरिर्ब्रह्मा तथैव च | 'अण्डे जातौ पुमांसौ द्वौ हरिर्ब्रह्मा तथैव च । | ||
अनादिस्तु हरिस्तत्र ब्रह्मा सादिरुदाहृतः''। इति च ॥ ३५ ॥ | |||
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'हरेरवयवैर्लोकाः सृष्टा इति विकल्पनम् | 'हरेरवयवैर्लोकाः सृष्टा इति विकल्पनम् । | ||
साक्षात्सत्यमतोऽन्यस्मात् व्यावहारिकमुच्यते''॥ इति मात्स्ये ॥३६॥ | |||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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'ब्राह्मणो मुखमित्येव मुखाज्जातत्वहेतुतः | 'ब्राह्मणो मुखमित्येव मुखाज्जातत्वहेतुतः । | ||
यथावदत् श्रुतौ तद्वज्जीवो ब्रह्मेति वाग्भवेत्''॥ इति ब्राह्मे ॥ ३७ ॥ | |||
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[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
'अधिष्ठानमिति प्रोक्तं मूलाधारं विचक्षणैः । यत्स्थितं दृश्यते वस्तु संस्थानं तदुदीरितम् । उभयं हरिरेवास्य जगतो मुनिपुङ्गव। इति वामने ॥ 'हरिः परोऽस्य जगतो ह्यव्यक्तादेश्च कृत्स्नशः । अतस्तत्परमेवेदं वदन्ति मुनयोऽमलाः॥ इति सात्वतसंहितायाम् । 'यदधीना यस्य सत्ता तत्तदित्येव भण्यते ।
विद्यमाने विभेदेऽपि मिथो नित्यं स्वरूपतःइति भविष्यत्पर्वणि ॥२॥
'गम्येज्यज्ञेयवाच्येषु योज्येषु च परो हरिः ।
तपसा पूज्यमानानां सर्वलोकेभ्य एव च॥ इति वाराहे ॥ १५ ॥
'नित्यं गृहीताः सत्वाद्याः स्थित्यादिषु विशेषतः ।
युगपत् क्रमशश्चैव गृह्णाति भगवान्स्वयम्॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ १८ ॥
रजः कर्मेन्द्रियैर्नित्यं शरीरेण तमस्तथा । आन्तरं यत्तु कर्तृत्वं तत्सत्वेनाभिमन्यते ॥ रजसा त्वभिमन्येत करणैः कर्मकारणैः । शारीरं वेदनाद्यं तु तमसा ह्यभिमन्यते ॥ अकर्ता करणैर्हीनः शरीरेण विवर्जितः । नित्यज्ञानस्वरूपोऽसौ गुणैरेवाभिमन्यते ॥ एवं जीवः परेणैव प््रोरितः संसृतिं व्रजेत् । न परः संसृतिं क्वापि स्वातन्त्र्यादधिकत्वतः ॥ एवं जीवपरौ भिन्नौ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ इति पाद्मे ॥
मायिनं ज्ञानिनं स्वतः ॥ १९ ॥
'यत्रान्यहेत्वभावः स्यादीश्वरेच्छादिना विना । तदिच्छा हि यदृच्छा स्यादतस्तत्र यदृच्छया। इति ब्रह्मतर्के । 'कालकर्मस्वभावादि नित्ययेशेच्छया सदा । प्राप्तमेव विशेषेण सृष्ट्यादावुन्नयत्यजः॥ इति च । विबुभूषुः बहुधा बुभूषुः । 'ईशो बह्वीः पुरः सृष्ट्वा तत्रैव बहुरूपताम् ।
तत्तन्नियामकतया प्राप्तुं कालाद्युपाददे॥ इति च ॥ २१ ॥
'गुणकालस्वभावेभ्य ईशेनाधिष्ठितत्वतः ।
जगदादि महत्तत्त्वमभूत्तस्येच्छया हरेः ॥इति षाड्गुण्ये ॥ २२ ॥
अतिजाज्वल्यमानत्वात्तैजसानीन्द्रियाण्यपि ॥ तामसानि तु भूतानि यतस्तावन्न तूभयम्॥ इति पाद्मे । ज्ञानेन्द्रियाणां देवानां ज्ञानशक्तिरुदीरिता । क्रिया कर्मेन्द्रियाणां च भूतानां द्रव्यशक्तिता॥ इति स्कान्दे । 'द्रव्यं तु द्रवणप्राप्यं द्वयोर्विवदमानयोः ।
पूर्वं वेगाभिसम्बन्धादाकाशस्तु प्रदेशतः॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २४ ॥
'शब्देनैव परो द्रष्टा ज्ञायते जगदेव च ।"
इति विष्णुसंहितायाम् ॥ २५ ॥
ओजस्त्वनभिभाव्यत्वात्सहश्च स्वेच्छया कृतेः ॥
बलं विधारकत्वाच्च विधृतिर्वायुरुच्यते। इति भारते ॥ २६ ॥
अवतीर्णः पदाङ्गुष्ठमध्यास्ते विश्वभुग्विभुः ॥ पाददेवस्तु यज्ञोऽन्यस्तं प्रविश्य हरिः स्वयम् ।
सर्वं विधारयन्देहे वर्ततेऽनन्तशक्तिधृक्॥ इति वह्निपुराणे ॥ ३० ॥
'आकाशवायू त्वव्यक्तावितरेऽण्डे प्रकाशिताः ।
तथात्वाद्बाह्यभूतानामण्डस्थानां च सा गतिः॥ इति मात्स्ये ॥३३॥
'यः प्रणधारणं प्रणप्रासादात्कुरुतेऽनिशम् । स जीव इति सन्दिष्टस्तदन्योऽजीव उच्यते । यत्प्रासादात्स तु प्रणः कुरुते स्वस्य धारणम्॥ इति वायुप्रक्ते ॥ 'कालकर्मस्वभावस्थो वासुदेवः परः पुमान् । अकरोदण्डमुद्वृद्धमात्मप्रसवकारणम् ॥इति ब्रह्माण्डे । जीव इति वा । 'प्र•णं धारयते यस्मात्स जीवः परमेश्वरः । अजीवोऽपि महातेजास्त्वथवा जीवयन् जगत्॥
इति स्कान्दे ॥ ३४ ॥