Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S5: Difference between revisions
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परोक्षज्ञानं न शोभते । अपरोक्षज्ञानं न भक्त्या विनोत्पद्यते ।'यस्य देवे परा भक्तिः'''यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः'''यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव''इत्यादेः ॥ १२ ॥ | परोक्षज्ञानं न शोभते । अपरोक्षज्ञानं न भक्त्या विनोत्पद्यते । | ||
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शुचिश्रवाः विष्णुः । समाधिना समाधिभाषया । स्मरणं ग्रन्थकृतिः ।'स्मरन्ति च''इत्यादेः ॥ १३ ॥ | शुचिश्रवाः विष्णुः । समाधिना समाधिभाषया । स्मरणं ग्रन्थकृतिः । | ||
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मयि स्थिते ब्रह्मणि । स्थीयतामत्रेतीश्वरेच्छया कल्पितम् ॥ २७ ॥ | मयि स्थिते ब्रह्मणि । स्थीयतामत्रेतीश्वरेच्छया कल्पितम् ॥ २७ ॥ | ||
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त्वमीश्वरोऽपि ॥ ४० ॥ | त्वमीश्वरोऽपि ॥ ४० ॥ | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
नारद उवाच—पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना ।
शारीरमानसयोरभेदादुभयथाऽपि युज्यते । स्वतन्त्रत्वादात्मनैव ह्यलम्बुद्धिः ॥ २ ॥
जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् ।तथाऽपि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥
शोचसि प्रकाशयसि ।
'अजस्रेण शोचिषा शोशुचानःइति श्रुतिः ॥ ४ ॥
व्यास उवाच—अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं, तथाऽपि नात्मा परितुष्यते मे ।
'ज्ञानशक्तिस्वरूपोऽपि ह्यज्ञाशक्तं वदेद्धरिः ।
अज्ञानां मोहनायेशस्तेन मुह्यन्ति मोहिताः। इति पाद्मे ॥ ५ ॥
यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः ।न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥
धर्मादीनामल्पकथनेन पूर्तिः । न वासुदेवमहिम्नोऽतिकथितस्यापि ॥ ९ ॥
न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशोजगत्पवित्रं न गृणीत कर्हिचित् ।
वायसं तीर्थं वयोमात्रानुजीवि शास्त्रम् ॥ १० ॥
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितंन शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।
परोक्षज्ञानं न शोभते । अपरोक्षज्ञानं न भक्त्या विनोत्पद्यते ।
'यस्य देवे परा भक्तिः
'यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः'यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैवइत्यादेः ॥ १२ ॥अतो महाभाग भवानमोघदृक्शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः ।
शुचिश्रवाः विष्णुः । समाधिना समाधिभाषया । स्मरणं ग्रन्थकृतिः ।
'स्मरन्ति चइत्यादेः ॥ १३ ॥
जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनंस्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः ।
प्रवृत्तिधर्मकृते ॥ १५ ॥
विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् ।
अनन्तपारस्य विभोः सकाशाद् यत् सुखम् ॥ १६ ॥
इदं हि विश्वं भगवानिवेतरोयतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः ।
इतरोऽपि भगवान् विश्वमिव । स्वातन्त्र्यात् ॥ २० ॥
तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामतेप्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम ।
मयि स्थिते ब्रह्मणि । स्थीयतामत्रेतीश्वरेच्छया कल्पितम् ॥ २७ ॥
त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोःसमाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥
त्वमीश्वरोऽपि ॥ ४० ॥