Brahmasutra/C4/S4: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 3: | Line 3: | ||
| chapter_num = 4 | | chapter_num = 4 | ||
| title = चतुर्थः पादः | | title = चतुर्थः पादः | ||
}} | }}भोगमाहास्मिन् पादे- | ||
भोगमाहास्मिन् पादे- | |||
=== सम्पद्याधिकरणम् === | === सम्पद्याधिकरणम् === | ||
| Line 29: | Line 28: | ||
| id = BS_C04_S04_V01_B1 | | id = BS_C04_S04_V01_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स य एवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन्नात्मनमभिसम्पद्यैतेनात्मना यथाकामं सर्वान् कामाननुभवति’ इति सौपर्णश्रुतिः । | ‘स य एवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन्नात्मनमभिसम्पद्यैतेनात्मना यथाकामं सर्वान् कामाननुभवति’ इति सौपर्णश्रुतिः । | ||
| Line 38: | Line 36: | ||
| id = BS_C04_S04_V01_B2 | | id = BS_C04_S04_V01_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति च । | ‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति च । | ||
| Line 47: | Line 44: | ||
| id = BS_C04_S04_V01_B3 | | id = BS_C04_S04_V01_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘एवं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति’ इति च । | ‘एवं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति’ इति च । | ||
| Line 56: | Line 52: | ||
| id = BS_C04_S04_V01_B4 | | id = BS_C04_S04_V01_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
तत्र तरणं नाम तत्प्राप्तयेऽन्यतरणमेव । | तत्र तरणं नाम तत्प्राप्तयेऽन्यतरणमेव । | ||
| Line 65: | Line 60: | ||
| id = BS_C04_S04_V01_B5 | | id = BS_C04_S04_V01_B5 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वैतं सेतुमाप्यैतेनैव सेतुना मोदते प्रमोदत आनन्दी भवति’ इति मौद्गल्यश्रुतेः ॥ 01 ॥ | ‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वैतं सेतुमाप्यैतेनैव सेतुना मोदते प्रमोदत आनन्दी भवति’ इति मौद्गल्यश्रुतेः ॥ 01 ॥ | ||
| Line 93: | Line 87: | ||
| id = BS_C04_S04_V02_B1 | | id = BS_C04_S04_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
मुक्त एव चात्रोच्यते । | मुक्त एव चात्रोच्यते । | ||
| Line 102: | Line 95: | ||
| id = BS_C04_S04_V02_B2 | | id = BS_C04_S04_V02_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अहरहरेनमनुप्रविशत्युपसङ्क्रमते च न तत्र मोदते न प्रमोदते न कामाननुभवति बद्धो ह्येष तदा भवत्यथ यदैनं मुक्तोऽनुप्रविशति मोदते च प्रमोदते च कामांश्चैवानुभवति । कामांश्चैवानुभवति’ इति बृहच्छ्रुतौ प्रतिज्ञानात् ॥ 02 ॥ | ‘अहरहरेनमनुप्रविशत्युपसङ्क्रमते च न तत्र मोदते न प्रमोदते न कामाननुभवति बद्धो ह्येष तदा भवत्यथ यदैनं मुक्तोऽनुप्रविशति मोदते च प्रमोदते च कामांश्चैवानुभवति । कामांश्चैवानुभवति’ इति बृहच्छ्रुतौ प्रतिज्ञानात् ॥ 02 ॥ | ||
| Line 130: | Line 122: | ||
| id = BS_C04_S04_V03_B1 | | id = BS_C04_S04_V03_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
परञ्ज्योतिशब्देन परमात्मैवोच्यते । तत्प्रकरणत्वात् । | परञ्ज्योतिशब्देन परमात्मैवोच्यते । तत्प्रकरणत्वात् । | ||
| Line 139: | Line 130: | ||
| id = BS_C04_S04_V03_B2 | | id = BS_C04_S04_V03_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘परञ्ज्योतिः परं ब्रह्म परमात्मादिका गिरः । | ‘परञ्ज्योतिः परं ब्रह्म परमात्मादिका गिरः । | ||
सर्वत्र हरिमेवैकं ब्रूयुर्नान्यं कथञ्चन’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 03 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 168: | Line 158: | ||
| id = BS_C04_S04_V04_B1 | | id = BS_C04_S04_V04_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ये भोगाः परमात्मना भुज्यन्ते त एव मुक्तैर्भुज्यन्ते । | ये भोगाः परमात्मना भुज्यन्ते त एव मुक्तैर्भुज्यन्ते । | ||
| Line 177: | Line 166: | ||
| id = BS_C04_S04_V04_B2 | | id = BS_C04_S04_V04_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘यानेवाहं श्रुणोमि यान् पश्यामि यान् जिघ्रामि तानेवैत इदं शरीरं विमुच्यानुभवन्ति’ इति दृष्टत्वाच्चतुर्वेदशिखायाम् । | ‘यानेवाहं श्रुणोमि यान् पश्यामि यान् जिघ्रामि तानेवैत इदं शरीरं विमुच्यानुभवन्ति’ इति दृष्टत्वाच्चतुर्वेदशिखायाम् । | ||
| Line 186: | Line 174: | ||
| id = BS_C04_S04_V04_B3 | | id = BS_C04_S04_V04_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
भविष्यत्पुराणे च – | भविष्यत्पुराणे च – | ||
| Line 195: | Line 182: | ||
| id = BS_C04_S04_V04_B4 | | id = BS_C04_S04_V04_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्भोगान् लेशतः क्वचित् । | ‘मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्भोगान् लेशतः क्वचित् । | ||
बहिष्ठान् भुञ्जते नित्यं नानन्दादीन् कथञ्चन’ इति ॥ 04 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 216: | Line 202: | ||
| id = BS_C04_S04_V05_B1 | | id = BS_C04_S04_V05_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सर्वदेहपरित्यागेन मुक्ताः सन्तो ब्राह्मेणैव देहेन भोगान् भुञ्जत इति जैमिनिर्मन्यते । | सर्वदेहपरित्यागेन मुक्ताः सन्तो ब्राह्मेणैव देहेन भोगान् भुञ्जत इति जैमिनिर्मन्यते । | ||
| Line 225: | Line 210: | ||
| id = BS_C04_S04_V05_B2 | | id = BS_C04_S04_V05_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा श्रुणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति’ | ‘स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा श्रुणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति’ | ||
| Line 234: | Line 218: | ||
| id = BS_C04_S04_V05_B3 | | id = BS_C04_S04_V05_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
इति माध्यन्दिनायनश्रुतावुपन्यासात् । | इति माध्यन्दिनायनश्रुतावुपन्यासात् । | ||
| Line 243: | Line 226: | ||
| id = BS_C04_S04_V05_B4 | | id = BS_C04_S04_V05_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘आदत्ते हरिहस्तेन हरिदृष्ट्यैव पश्यति ।गच्छेच्च हरिपादेन मुक्तस्यैषा स्थितिर्भवेत्’ इति स्मृतेः ॥ | ‘आदत्ते हरिहस्तेन हरिदृष्ट्यैव पश्यति ।गच्छेच्च हरिपादेन मुक्तस्यैषा स्थितिर्भवेत्’ इति स्मृतेः ॥ | ||
| Line 252: | Line 234: | ||
| id = BS_C04_S04_V05_B6 | | id = BS_C04_S04_V05_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘गच्छामि विष्णुपादाभ्यां विष्णुदृष्ट्या च दर्शनम् ।’इत्यादि पूर्वस्मरणान्मुक्तस्यैतद्भविष्यति’ इति बृहत्तन्त्रोक्तयुक्तेश्च ॥ 05 ॥ | ‘गच्छामि विष्णुपादाभ्यां विष्णुदृष्ट्या च दर्शनम् ।’इत्यादि पूर्वस्मरणान्मुक्तस्यैतद्भविष्यति’ इति बृहत्तन्त्रोक्तयुक्तेश्च ॥ 05 ॥ | ||
| Line 270: | Line 251: | ||
| id = BS_C04_S04_V06_B1 | | id = BS_C04_S04_V06_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
चितिमात्रो देहो मुक्तानां पृथग्विद्यते तेन भुञ्जते । | चितिमात्रो देहो मुक्तानां पृथग्विद्यते तेन भुञ्जते । | ||
सर्वं वा एतदचित् परित्यज्य चिन्मात्र एवैष भवति चिन्मात्र एवावतिष्ठते तामेतां मुक्तिरित्याचक्षते’ | |||
इत्युद्दालकश्रुतेश्चिदात्मकत्वादित्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 06 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 298: | Line 278: | ||
| id = BS_C04_S04_V07_B1 | | id = BS_C04_S04_V07_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स वा एष एतस्मान्मर्त्याद्विमुक्तश्चिन्मात्रीभवत्यथ तेनैव रूपेणाभिपश्यत्यभिश्रुणोत्यभिमनुतेऽभिविजानाति तामाहुर्मुक्तिः’ इति सौपर्णश्रुतौ चिन्मात्रेणाप्युपन्यासाज्जैमिन्युक्तस्य च भावादुभयत्राप्यविरोधं बादरायणो मन्यते । | ‘स वा एष एतस्मान्मर्त्याद्विमुक्तश्चिन्मात्रीभवत्यथ तेनैव रूपेणाभिपश्यत्यभिश्रुणोत्यभिमनुतेऽभिविजानाति तामाहुर्मुक्तिः’ इति सौपर्णश्रुतौ चिन्मात्रेणाप्युपन्यासाज्जैमिन्युक्तस्य च भावादुभयत्राप्यविरोधं बादरायणो मन्यते । | ||
नारायणाध्यात्मे च- | |||
}} | }} | ||
| Line 308: | Line 287: | ||
| id = BS_C04_S04_V07_B3 | | id = BS_C04_S04_V07_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘मर्त्यं देहं परित्यज्य चितिमात्रात्मदेहिनः । | ‘मर्त्यं देहं परित्यज्य चितिमात्रात्मदेहिनः । | ||
चितिमात्रेन्द्रियाश्चैव प्रविष्टा विष्णुमव्ययम् ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 318: | Line 296: | ||
| id = BS_C04_S04_V07_B5 | | id = BS_C04_S04_V07_B5 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
तदङ्गानुगृहीतैश्च स्वाङ्गैरेव प्रवर्तनम् । | तदङ्गानुगृहीतैश्च स्वाङ्गैरेव प्रवर्तनम् । | ||
कुर्वन्ति भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा ॥ | |||
यथेष्टं परिवर्तन्ते तस्यैवानुग्रहेरिताः’ इति ॥ 07 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 348: | Line 325: | ||
| id = BS_C04_S04_V08_B1 | | id = BS_C04_S04_V08_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न तेषां भोगादिषु प्रयत्नापेक्षा । | न तेषां भोगादिषु प्रयत्नापेक्षा । | ||
‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’ इत्यादिश्रुतेः ॥ 08 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 377: | Line 353: | ||
| id = BS_C04_S04_V09_B1 | | id = BS_C04_S04_V09_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सत्यसङ्कल्पत्वादेव । | सत्यसङ्कल्पत्वादेव । | ||
| Line 386: | Line 361: | ||
| id = BS_C04_S04_V09_B2 | | id = BS_C04_S04_V09_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘परमोऽधिपतिस्तेषां विष्णुरेव न संशयः । | ‘परमोऽधिपतिस्तेषां विष्णुरेव न संशयः । | ||
ब्रह्मादिमानुषान्तानां सर्वेषामविशेषतः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 396: | Line 370: | ||
| id = BS_C04_S04_V09_B4 | | id = BS_C04_S04_V09_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ततः प्राणादिनामान्ताः सर्वेऽपि पतयः क्रमात् ।आचार्याश्चैव सर्वेऽपि यैर्ज्ञानं सुप्रतिष्ठितम् । एतेभ्योऽन्यः पतिर्नैव मुक्तानां नात्र संशयः’ इति वाराहे ॥ 09 ॥ | ततः प्राणादिनामान्ताः सर्वेऽपि पतयः क्रमात् ।आचार्याश्चैव सर्वेऽपि यैर्ज्ञानं सुप्रतिष्ठितम् । एतेभ्योऽन्यः पतिर्नैव मुक्तानां नात्र संशयः’ इति वाराहे ॥ 09 ॥ | ||
| Line 416: | Line 389: | ||
| id = BS_C04_S04_V10_B1 | | id = BS_C04_S04_V10_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
चिन्मात्रं विनाऽन्यो देहस्तेषां न विद्यत इति बादरिः । | चिन्मात्रं विनाऽन्यो देहस्तेषां न विद्यत इति बादरिः । | ||
| Line 425: | Line 397: | ||
| id = BS_C04_S04_V10_B2 | | id = BS_C04_S04_V10_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अशरीरो वाव तदा भवत्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतो याभ्यां ह्येष उन्मथ्यत’ इत्येवं कौण्ठरव्यश्रुतावाह हि ॥ 10 ॥ | अशरीरो वाव तदा भवत्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतो याभ्यां ह्येष उन्मथ्यत’ इत्येवं कौण्ठरव्यश्रुतावाह हि ॥ 10 ॥ | ||
| Line 443: | Line 414: | ||
| id = BS_C04_S04_V11_B1 | | id = BS_C04_S04_V11_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स वा एष एवंवित् परमभिपश्यत्यभिशृणोति ज्योतिषैव रूपेण चिता वाऽचिता वा नित्येन वाऽनित्येन वाऽथानन्दी ह्येवैष भवति नानानन्दं कञ्चिदुपस्पृषति’ | ‘स वा एष एवंवित् परमभिपश्यत्यभिशृणोति ज्योतिषैव रूपेण चिता वाऽचिता वा नित्येन वाऽनित्येन वाऽथानन्दी ह्येवैष भवति नानानन्दं कञ्चिदुपस्पृषति’ | ||
इत्यौद्दालकश्रुतौ विकल्पाम्नानादन्यदेहस्यापि भावं जैमिनिर्मन्यते ॥ 11 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 462: | Line 432: | ||
| id = BS_C04_S04_V12_B1 | | id = BS_C04_S04_V12_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
यथा द्वादशाहः क्रत्वात्मकः सत्रात्मकश्च भवति । एवं मुक्तभोगो बाह्यशरीरकृतश्चिन्मात्रकृतश्च भवति इति बादरायणो मन्यते ॥ 12 ॥ | यथा द्वादशाहः क्रत्वात्मकः सत्रात्मकश्च भवति । एवं मुक्तभोगो बाह्यशरीरकृतश्चिन्मात्रकृतश्च भवति इति बादरायणो मन्यते ॥ 12 ॥ | ||
| Line 488: | Line 457: | ||
| id = BS_C04_S04_V13_B1 | | id = BS_C04_S04_V13_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सन्ध्यं स्वप्नः ।‘सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम्’ इति श्रुतेः ॥ 13 ॥ | सन्ध्यं स्वप्नः ।‘सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम्’ इति श्रुतेः ॥ 13 ॥ | ||
| Line 506: | Line 474: | ||
| id = BS_C04_S04_V14_B1 | | id = BS_C04_S04_V14_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मवैवर्ते च – | ब्रह्मवैवर्ते च – | ||
| Line 515: | Line 482: | ||
| id = BS_C04_S04_V14_B2 | | id = BS_C04_S04_V14_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स्वप्नस्थानं यथा भोगो विना देहेन युज्यते । | ‘स्वप्नस्थानं यथा भोगो विना देहेन युज्यते । | ||
एवं मुक्तावपि भवेद्विना देहेन भोजनम् ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 525: | Line 491: | ||
| id = BS_C04_S04_V14_B4 | | id = BS_C04_S04_V14_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
स्वेच्छया वा शरीराणि तेजोरूपाणि कानिचित् । | स्वेच्छया वा शरीराणि तेजोरूपाणि कानिचित् । | ||
स्वीकृत्य जागरितवद्भुक्त्वा त्यागः कदाचन’ इति ॥ 14 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 544: | Line 509: | ||
| id = BS_C04_S04_V15_B1 | | id = BS_C04_S04_V15_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
शरीरमनुप्रविश्यापि तत्प्रकाशयन्तः पुण्यानेव भोगाननुभवन्ति न तु दुःखादीन् । यथा प्रदीपो दीपिकादिषु प्रविष्टस्तत्स्थं तैलाद्येव भुङ्ते न तु तत्कार्ष्ण्यादि । | शरीरमनुप्रविश्यापि तत्प्रकाशयन्तः पुण्यानेव भोगाननुभवन्ति न तु दुःखादीन् । यथा प्रदीपो दीपिकादिषु प्रविष्टस्तत्स्थं तैलाद्येव भुङ्ते न तु तत्कार्ष्ण्यादि । | ||
‘तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति’ इति हि दर्शयति ॥ 15 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 554: | Line 518: | ||
| id = BS_C04_S04_V15_B2 | | id = BS_C04_S04_V15_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न च स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति इत्यादिना स्वर्गादिस्थस्यैतदिति वाच्यम् । यतः – | न च स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति इत्यादिना स्वर्गादिस्थस्यैतदिति वाच्यम् । यतः – | ||
| Line 580: | Line 543: | ||
| id = BS_C04_S04_V16_B1 | | id = BS_C04_S04_V16_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सुप्तौ मोक्षे वा तदुच्यते । ‘अत्र पिताऽपिता भवत्यनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन’ इत्याद्याविष्कृतत्वात् ॥ | सुप्तौ मोक्षे वा तदुच्यते । ‘अत्र पिताऽपिता भवत्यनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन’ इत्याद्याविष्कृतत्वात् ॥ | ||
| Line 589: | Line 551: | ||
| id = BS_C04_S04_V16_B2 | | id = BS_C04_S04_V16_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मवैवर्ते च- | ब्रह्मवैवर्ते च- | ||
| Line 598: | Line 559: | ||
| id = BS_C04_S04_V16_B3 | | id = BS_C04_S04_V16_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘ज्योतिर्मयेषु देहेषु स्वेच्छया विश्वमोक्षिणः । | ‘ज्योतिर्मयेषु देहेषु स्वेच्छया विश्वमोक्षिणः । | ||
भुञ्जते सुसुखान्येव न दुःखादीन् कदाचन ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 608: | Line 568: | ||
| id = BS_C04_S04_V16_B5 | | id = BS_C04_S04_V16_B5 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
तीर्णा हि सर्वशोकांस्ते पुण्यपापादिवर्जिताः । | तीर्णा हि सर्वशोकांस्ते पुण्यपापादिवर्जिताः । | ||
सर्वदोषनिवृत्तास्ते गुणमात्रस्वरूपिणः’ इति ॥ 16 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 629: | Line 588: | ||
| id = BS_C04_S04_V17_B1 | | id = BS_C04_S04_V17_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतःसमभवत्’ इत्युच्यते । तत्र सृष्ट्यादिभ्योऽन्यान् व्यापारानाप्नोति ॥ 17 ॥ | ‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतःसमभवत्’ इत्युच्यते । तत्र सृष्ट्यादिभ्योऽन्यान् व्यापारानाप्नोति ॥ 17 ॥ | ||
| Line 655: | Line 613: | ||
| id = BS_C04_S04_V18_B1 | | id = BS_C04_S04_V18_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
जीवप्रकरणत्वाज्जीवानां तादृक्सामर्थ्यविदूरत्वाच्च । वाराहे च- | जीवप्रकरणत्वाज्जीवानां तादृक्सामर्थ्यविदूरत्वाच्च । वाराहे च- | ||
| Line 664: | Line 621: | ||
| id = BS_C04_S04_V18_B2 | | id = BS_C04_S04_V18_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स्वाधिकानन्दसम्प्राप्तौ सृष्ट्यादिव्यापृतिष्वपि । | ‘स्वाधिकानन्दसम्प्राप्तौ सृष्ट्यादिव्यापृतिष्वपि । | ||
मुक्तानां नैव कामः स्यादन्यान् कामांस्तु भुञ्जते ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 674: | Line 630: | ||
| id = BS_C04_S04_V18_B4 | | id = BS_C04_S04_V18_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
तद्योग्यता नैव तेषां कदाचित् क्वापि विद्यते । | तद्योग्यता नैव तेषां कदाचित् क्वापि विद्यते । | ||
न चायोग्यं विमुक्तोऽपि प्राप्नुयान्नच कामयेत्’ इति ॥ 18 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 693: | Line 648: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B1 | | id = BS_C04_S04_V19_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘ता यो वेद, स वेद ब्रह्म, सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति’ इति प्रत्यक्षोपदेशाज्जगदैश्वर्यमप्यस्तीति चेन्न । | ‘ता यो वेद, स वेद ब्रह्म, सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति’ इति प्रत्यक्षोपदेशाज्जगदैश्वर्यमप्यस्तीति चेन्न । | ||
| Line 702: | Line 656: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B3 | | id = BS_C04_S04_V19_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
आधिकारिकमण्डलाधिपतिर्ब्रह्मा हि तत्रोच्यते । | आधिकारिकमण्डलाधिपतिर्ब्रह्मा हि तत्रोच्यते । | ||
| Line 711: | Line 664: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B4 | | id = BS_C04_S04_V19_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
गारुडे च- | गारुडे च- | ||
| Line 720: | Line 672: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B5 | | id = BS_C04_S04_V19_B5 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्मेत्येव परं देवमुपास्य हरिमव्ययम् । | ‘आत्मेत्येव परं देवमुपास्य हरिमव्ययम् । | ||
केचिदत्रैव मुच्यन्ते नोत्क्रामन्ति कदाचन ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 730: | Line 681: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B7 | | id = BS_C04_S04_V19_B7 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अत्रैव च स्थितिस्तेषामन्तरिक्षे तु केचन । | अत्रैव च स्थितिस्तेषामन्तरिक्षे तु केचन । | ||
केचित् स्वर्गे महर्लोके जने तपसि चापरे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 740: | Line 690: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B9 | | id = BS_C04_S04_V19_B9 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
केचित् सत्ये महाज्ञान गच्छन्ति क्षीरसागरम् । | केचित् सत्ये महाज्ञान गच्छन्ति क्षीरसागरम् । | ||
तत्रापि क्रमयोगेन ज्ञानाधिक्यात् समीपगाः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 750: | Line 699: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B11 | | id = BS_C04_S04_V19_B11 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सालोक्यं च सरूपत्वं सामीप्यं योग एव च । | सालोक्यं च सरूपत्वं सामीप्यं योग एव च । | ||
इमामारभ्य सर्वत्र यावत्सुक्षीरसागरे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 760: | Line 708: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B13 | | id = BS_C04_S04_V19_B13 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
पुरुषोऽनन्तशयनः श्रीमन्नारायणाभिधः । | पुरुषोऽनन्तशयनः श्रीमन्नारायणाभिधः । | ||
मानुषा वर्णभेदेन तथैवाश्रमभेदतः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 770: | Line 717: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B15 | | id = BS_C04_S04_V19_B15 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । | क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । | ||
आजानजाः कर्मजाश्च तात्त्विकाश्च प्रजापतिः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 780: | Line 726: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B17 | | id = BS_C04_S04_V19_B17 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशस्तेषु चैवोत्तरोत्तराः । | रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशस्तेषु चैवोत्तरोत्तराः । | ||
नित्यानन्दे च भोगे च ज्ञानैश्वर्यगुणेषु च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 790: | Line 735: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B19 | | id = BS_C04_S04_V19_B19 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सर्वे शतगुणोद्रिक्ताः पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् । | सर्वे शतगुणोद्रिक्ताः पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् । | ||
पूज्यन्ते चावरैस्ते तु सर्वपूज्यश्चतुर्मुखः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 800: | Line 744: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B21 | | id = BS_C04_S04_V19_B21 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
स्वजगद्व्यापृतिस्तेषां पूर्ववत् समुदीरिता । | स्वजगद्व्यापृतिस्तेषां पूर्ववत् समुदीरिता । | ||
सयुजः परमात्मानं प्रविश्य च बहिर्गताः | |||
}} | }} | ||
| Line 810: | Line 753: | ||
| id = BS_C04_S04_V19_B23 | | id = BS_C04_S04_V19_B23 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
चिद्रूपान् प्राकृतांश्चापि विना भोगांस्तु कांश्चन । | चिद्रूपान् प्राकृतांश्चापि विना भोगांस्तु कांश्चन । | ||
भुञ्जते मुक्तिरेवं ते विस्पष्टं समुदाहृताः’ इति ॥ 19 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 837: | Line 779: | ||
| id = BS_C04_S04_V20_B1 | | id = BS_C04_S04_V20_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
विकारावर्तिव्यापारो मुक्तानां न विद्यते । ‘इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते’ इति हि श्रुतिः । | विकारावर्तिव्यापारो मुक्तानां न विद्यते । ‘इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते’ इति हि श्रुतिः । | ||
| Line 846: | Line 787: | ||
| id = BS_C04_S04_V20_B3 | | id = BS_C04_S04_V20_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
वाराहे च – | वाराहे च – | ||
| Line 855: | Line 795: | ||
| id = BS_C04_S04_V20_B4 | | id = BS_C04_S04_V20_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
स्वाधिकारेण वर्तन्ते देवा मुक्तावपि स्फुटम् । | स्वाधिकारेण वर्तन्ते देवा मुक्तावपि स्फुटम् । | ||
बलिं हरन्ति मुक्ताय विरिञ्चाय तु पूर्ववत् ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 865: | Line 804: | ||
| id = BS_C04_S04_V20_B6 | | id = BS_C04_S04_V20_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सब्रह्मकास्तु ते देवा विष्णवे च विशेषतः । | सब्रह्मकास्तु ते देवा विष्णवे च विशेषतः । | ||
न विकाराधिकारस्तु मुक्तानामन्य एव तु । | |||
विकाराधिकृता ज्ञेया ये नियुक्तास्तु विष्णुना’ इति ॥ 20 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 887: | Line 825: | ||
| id = BS_C04_S04_V21_B1 | | id = BS_C04_S04_V21_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘एतत् साम गायन्नास्ते’ इत्युच्यते ।तत्रानन्दादीनां वृद्धिर्ह्रासश्च न विद्यते। एकप्रकारेणैव सर्वदा स्थितिः । | ‘एतत् साम गायन्नास्ते’ इत्युच्यते ।तत्रानन्दादीनां वृद्धिर्ह्रासश्च न विद्यते। एकप्रकारेणैव सर्वदा स्थितिः । | ||
| Line 896: | Line 833: | ||
| id = BS_C04_S04_V21_B2 | | id = BS_C04_S04_V21_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स एष एतस्मिन् ब्रह्मणि सम्पन्नो न जायते न म्रियते न हीयते न वर्धते स्थित एव सर्वदा भवति दर्शन्नेव ब्रह्म दर्शन्नेवात्मानं तस्यैवं दर्शयतो नापत्तिर्न विपत्तिः’ इत्याह जाबालश्रुतौ । | ‘स एष एतस्मिन् ब्रह्मणि सम्पन्नो न जायते न म्रियते न हीयते न वर्धते स्थित एव सर्वदा भवति दर्शन्नेव ब्रह्म दर्शन्नेवात्मानं तस्यैवं दर्शयतो नापत्तिर्न विपत्तिः’ इत्याह जाबालश्रुतौ । | ||
| Line 905: | Line 841: | ||
| id = BS_C04_S04_V21_B3 | | id = BS_C04_S04_V21_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते । न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इति मोक्षधर्मे ॥ | ‘यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते । न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इति मोक्षधर्मे ॥ | ||
| Line 914: | Line 849: | ||
| id = BS_C04_S04_V21_B5 | | id = BS_C04_S04_V21_B5 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
विद्वत्प्रत्यक्षात् कारणभावल्लिङ्गाच्च । ब्रह्मवैवर्ते च – | विद्वत्प्रत्यक्षात् कारणभावल्लिङ्गाच्च । ब्रह्मवैवर्ते च – | ||
| Line 923: | Line 857: | ||
| id = BS_C04_S04_V21_B6 | | id = BS_C04_S04_V21_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘न ह्रासो न च वृद्धिर्वा मुक्तानां विद्यते क्वचित् । | ‘न ह्रासो न च वृद्धिर्वा मुक्तानां विद्यते क्वचित् । | ||
विद्वत्प्रत्यक्षसिद्धत्वात् कारणाभावतोऽनुमा ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 933: | Line 866: | ||
| id = BS_C04_S04_V21_B8 | | id = BS_C04_S04_V21_B8 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
हरेरुपासना चात्र सदैव सुखरूपिणी । | हरेरुपासना चात्र सदैव सुखरूपिणी । | ||
न तु साधनभूता सा सिद्धिरेवात्र सा यतः’ इति ॥ 21 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 960: | Line 892: | ||
| id = BS_C04_S04_V22_B1 | | id = BS_C04_S04_V22_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न च भोगविशेषादिविरोधः ।‘एतमानन्दमयमात्मानमनुविश्य न जायते न म्रियते न ह्रसते न वर्धते यथाकामं चरति यथाकामं पिबति यथाकामं रमते यथाकाममुपरमते’ | न च भोगविशेषादिविरोधः ।‘एतमानन्दमयमात्मानमनुविश्य न जायते न म्रियते न ह्रसते न वर्धते यथाकामं चरति यथाकामं पिबति यथाकामं रमते यथाकाममुपरमते’ | ||
इति भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् । | |||
}} | }} | ||
| Line 970: | Line 901: | ||
| id = BS_C04_S04_V22_B4 | | id = BS_C04_S04_V22_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अवृद्धिह्रासरूपत्वं मुक्तानां प्रायिकं भवेत् ।कादाचित्कविशेषस्तु नैव तेषां विषिध्यते’ इति कौर्मे ॥ | ‘अवृद्धिह्रासरूपत्वं मुक्तानां प्रायिकं भवेत् ।कादाचित्कविशेषस्तु नैव तेषां विषिध्यते’ इति कौर्मे ॥ | ||
| Line 979: | Line 909: | ||
| id = BS_C04_S04_V22_B6 | | id = BS_C04_S04_V22_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘प्रवाहतस्तुवृद्धिर्वा ह्रासो वा नैव कुत्रचित् । | ‘प्रवाहतस्तुवृद्धिर्वा ह्रासो वा नैव कुत्रचित् । | ||
नाप्रियं किञ्चिदपि तु मुक्तानां विद्यते क्वचित् ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 989: | Line 918: | ||
| id = BS_C04_S04_V22_B8 | | id = BS_C04_S04_V22_B8 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
कुत एव तु दुःखं स्यात् सुखमेव सदोदितम् । भोगानां तु विशेषे तु वैचित्र्यं लभ्यते क्वचित्’|इति नारायणतन्त्रे ॥ 22 ॥ | कुत एव तु दुःखं स्यात् सुखमेव सदोदितम् । भोगानां तु विशेषे तु वैचित्र्यं लभ्यते क्वचित्’|इति नारायणतन्त्रे ॥ 22 ॥ | ||
| Line 1,041: | Line 969: | ||
| id = BS_C04_S04_V23_B01 | | id = BS_C04_S04_V23_B01 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते’ ,‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 23 ॥ | ‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते’ ,‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 23 ॥ | ||
| Line 1,050: | Line 977: | ||
| id = BS_C04_S04_V23_B02 | | id = BS_C04_S04_V23_B02 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ज्ञानानन्दादिभिः सर्वैर्गुणैः पूर्णाय विष्णवे । | ज्ञानानन्दादिभिः सर्वैर्गुणैः पूर्णाय विष्णवे । | ||
नमोऽस्तु गुरवे नित्यं सर्वथाऽतिप्रियाय मे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,060: | Line 986: | ||
| id = BS_C04_S04_V23_B04 | | id = BS_C04_S04_V23_B04 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | ||
बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । | |||
वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुर्- | |||
मध्वो यत् तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,072: | Line 997: | ||
| id = BS_C04_S04_V23_B08 | | id = BS_C04_S04_V23_B08 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
नित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम । | नित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम । | ||
नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै च विष्णवे ॥ | |||
}} | }} | ||
[[Category:Brahmasutra]] | [[Category:Brahmasutra]] | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
भोगमाहास्मिन् पादे-
सम्पद्याधिकरणम्
ॐ सम्पद्याविहाय स्वेन शब्दात् ॐ ॥ 01-542 ॥
॥ इति सम्पद्याधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘स य एवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन्नात्मनमभिसम्पद्यैतेनात्मना यथाकामं सर्वान् कामाननुभवति’ इति सौपर्णश्रुतिः ।
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति च ।
‘एवं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति’ इति च ।
तत्र तरणं नाम तत्प्राप्तयेऽन्यतरणमेव ।
‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वैतं सेतुमाप्यैतेनैव सेतुना मोदते प्रमोदत आनन्दी भवति’ इति मौद्गल्यश्रुतेः ॥ 01 ॥
मुक्ताधिकरणम्
ॐ मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॐ ॥ 02-543 ॥
॥ इति मुक्ताधिकरणम् ॥ 02 ॥
मुक्त एव चात्रोच्यते ।
‘अहरहरेनमनुप्रविशत्युपसङ्क्रमते च न तत्र मोदते न प्रमोदते न कामाननुभवति बद्धो ह्येष तदा भवत्यथ यदैनं मुक्तोऽनुप्रविशति मोदते च प्रमोदते च कामांश्चैवानुभवति । कामांश्चैवानुभवति’ इति बृहच्छ्रुतौ प्रतिज्ञानात् ॥ 02 ॥
आत्माधिकरणम्
ॐ आत्मा प्रकरणात् ॐ ॥ 03-544 ॥
॥ इति आत्माधिकरणम् (आत्मसम्पद्यधिकरणम्) ॥ 03 ॥
परञ्ज्योतिशब्देन परमात्मैवोच्यते । तत्प्रकरणत्वात् ।
‘परञ्ज्योतिः परं ब्रह्म परमात्मादिका गिरः ।
सर्वत्र हरिमेवैकं ब्रूयुर्नान्यं कथञ्चन’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 03 ॥
अविभागाधिकरणम्
ॐ अविभागेन दृष्टत्वात् ॐ ॥ 04-545 ॥
॥ इति अविभागाधिकरणम् ॥ 04 ॥
ये भोगाः परमात्मना भुज्यन्ते त एव मुक्तैर्भुज्यन्ते ।
‘यानेवाहं श्रुणोमि यान् पश्यामि यान् जिघ्रामि तानेवैत इदं शरीरं विमुच्यानुभवन्ति’ इति दृष्टत्वाच्चतुर्वेदशिखायाम् ।
भविष्यत्पुराणे च –
‘मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्भोगान् लेशतः क्वचित् ।
बहिष्ठान् भुञ्जते नित्यं नानन्दादीन् कथञ्चन’ इति ॥ 04 ॥
चितिमात्राधिकरणम् (ब्रह्माधिकरणम्)
ॐ ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॐ ॥ 05-546 ॥
सर्वदेहपरित्यागेन मुक्ताः सन्तो ब्राह्मेणैव देहेन भोगान् भुञ्जत इति जैमिनिर्मन्यते ।
‘स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा श्रुणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति’
इति माध्यन्दिनायनश्रुतावुपन्यासात् ।
‘आदत्ते हरिहस्तेन हरिदृष्ट्यैव पश्यति ।गच्छेच्च हरिपादेन मुक्तस्यैषा स्थितिर्भवेत्’ इति स्मृतेः ॥
‘गच्छामि विष्णुपादाभ्यां विष्णुदृष्ट्या च दर्शनम् ।’इत्यादि पूर्वस्मरणान्मुक्तस्यैतद्भविष्यति’ इति बृहत्तन्त्रोक्तयुक्तेश्च ॥ 05 ॥
ॐ चितिमात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॐ ॥ 06-547 ॥
चितिमात्रो देहो मुक्तानां पृथग्विद्यते तेन भुञ्जते ।
सर्वं वा एतदचित् परित्यज्य चिन्मात्र एवैष भवति चिन्मात्र एवावतिष्ठते तामेतां मुक्तिरित्याचक्षते’
इत्युद्दालकश्रुतेश्चिदात्मकत्वादित्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 06 ॥ॐ एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॐ ॥07-548॥
॥ इति चितिमात्राधिकरणम् (ब्रह्माधिकरणम्) ॥ 05 ॥
‘स वा एष एतस्मान्मर्त्याद्विमुक्तश्चिन्मात्रीभवत्यथ तेनैव रूपेणाभिपश्यत्यभिश्रुणोत्यभिमनुतेऽभिविजानाति तामाहुर्मुक्तिः’ इति सौपर्णश्रुतौ चिन्मात्रेणाप्युपन्यासाज्जैमिन्युक्तस्य च भावादुभयत्राप्यविरोधं बादरायणो मन्यते ।
नारायणाध्यात्मे च-
‘मर्त्यं देहं परित्यज्य चितिमात्रात्मदेहिनः ।
चितिमात्रेन्द्रियाश्चैव प्रविष्टा विष्णुमव्ययम् ॥
तदङ्गानुगृहीतैश्च स्वाङ्गैरेव प्रवर्तनम् ।
कुर्वन्ति भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा ॥
यथेष्टं परिवर्तन्ते तस्यैवानुग्रहेरिताः’ इति ॥ 07 ॥सङ्कल्पाधिकरणम्
ॐ सङ्कल्पादेव च तच्च्रुतेः ॐ ॥ 08-549 ॥
॥ इति सङ्कल्पाधिकरणम् ॥ 06 ॥
न तेषां भोगादिषु प्रयत्नापेक्षा ।
‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’ इत्यादिश्रुतेः ॥ 08 ॥
अनन्याधिपतित्वाधिकरणम्
ॐ अत एव चानन्याधिपतिः ॐ ॥ 09-550 ॥
॥ इति अनन्याधिपतित्वाधिकरणम् ॥ 07 ॥
सत्यसङ्कल्पत्वादेव ।
‘परमोऽधिपतिस्तेषां विष्णुरेव न संशयः ।
ब्रह्मादिमानुषान्तानां सर्वेषामविशेषतः ॥
ततः प्राणादिनामान्ताः सर्वेऽपि पतयः क्रमात् ।आचार्याश्चैव सर्वेऽपि यैर्ज्ञानं सुप्रतिष्ठितम् । एतेभ्योऽन्यः पतिर्नैव मुक्तानां नात्र संशयः’ इति वाराहे ॥ 09 ॥
उभयविधभोगाधिकरणम्
ॐ अभावं बादरिराह ह्येवम् ॐ ॥ 10-551 ॥
चिन्मात्रं विनाऽन्यो देहस्तेषां न विद्यत इति बादरिः ।
अशरीरो वाव तदा भवत्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतो याभ्यां ह्येष उन्मथ्यत’ इत्येवं कौण्ठरव्यश्रुतावाह हि ॥ 10 ॥
ॐ भावं जैमिनिर्विकल्पाम्नानात् ॐ ॥ 11-552 ॥
‘स वा एष एवंवित् परमभिपश्यत्यभिशृणोति ज्योतिषैव रूपेण चिता वाऽचिता वा नित्येन वाऽनित्येन वाऽथानन्दी ह्येवैष भवति नानानन्दं कञ्चिदुपस्पृषति’
इत्यौद्दालकश्रुतौ विकल्पाम्नानादन्यदेहस्यापि भावं जैमिनिर्मन्यते ॥ 11 ॥
ॐ द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॐ ॥ 12-553 ॥
यथा द्वादशाहः क्रत्वात्मकः सत्रात्मकश्च भवति । एवं मुक्तभोगो बाह्यशरीरकृतश्चिन्मात्रकृतश्च भवति इति बादरायणो मन्यते ॥ 12 ॥
ॐ तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ॐ ॥ 13-554 ॥
उपपत्तिश्च-
सन्ध्यं स्वप्नः ।‘सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम्’ इति श्रुतेः ॥ 13 ॥
ॐ भावे जाग्रद्वत् ॐ ॥ 14-555 ॥
ब्रह्मवैवर्ते च –
‘स्वप्नस्थानं यथा भोगो विना देहेन युज्यते ।
एवं मुक्तावपि भवेद्विना देहेन भोजनम् ॥
स्वेच्छया वा शरीराणि तेजोरूपाणि कानिचित् ।
स्वीकृत्य जागरितवद्भुक्त्वा त्यागः कदाचन’ इति ॥ 14 ॥
ॐ प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ॐ ॥ 15-556 ॥
शरीरमनुप्रविश्यापि तत्प्रकाशयन्तः पुण्यानेव भोगाननुभवन्ति न तु दुःखादीन् । यथा प्रदीपो दीपिकादिषु प्रविष्टस्तत्स्थं तैलाद्येव भुङ्ते न तु तत्कार्ष्ण्यादि ।
‘तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति’ इति हि दर्शयति ॥ 15 ॥
न च स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति इत्यादिना स्वर्गादिस्थस्यैतदिति वाच्यम् । यतः –
ॐ स्वाप्यायसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ॐ ॥ 16-557 ॥
॥ इति उभयविधभोगाधिकरणम्(अभावाधिकरणम्) ॥ 08 ॥
सुप्तौ मोक्षे वा तदुच्यते । ‘अत्र पिताऽपिता भवत्यनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन’ इत्याद्याविष्कृतत्वात् ॥
ब्रह्मवैवर्ते च-
‘ज्योतिर्मयेषु देहेषु स्वेच्छया विश्वमोक्षिणः ।
भुञ्जते सुसुखान्येव न दुःखादीन् कदाचन ॥
तीर्णा हि सर्वशोकांस्ते पुण्यपापादिवर्जिताः ।
सर्वदोषनिवृत्तास्ते गुणमात्रस्वरूपिणः’ इति ॥ 16 ॥
सर्वकामाधिकरणम् (जगद्व्यापाराधिकरणम्)
ॐ जगद्व्यापारवर्जम् ॐ ॥ 17-558 ॥
‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतःसमभवत्’ इत्युच्यते । तत्र सृष्ट्यादिभ्योऽन्यान् व्यापारानाप्नोति ॥ 17 ॥
ॐ प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ॐ ॥ 18-559 ॥
कुतः ? –
जीवप्रकरणत्वाज्जीवानां तादृक्सामर्थ्यविदूरत्वाच्च । वाराहे च-
‘स्वाधिकानन्दसम्प्राप्तौ सृष्ट्यादिव्यापृतिष्वपि ।
मुक्तानां नैव कामः स्यादन्यान् कामांस्तु भुञ्जते ॥
तद्योग्यता नैव तेषां कदाचित् क्वापि विद्यते ।
न चायोग्यं विमुक्तोऽपि प्राप्नुयान्नच कामयेत्’ इति ॥ 18 ॥
ॐ प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॐ ॥ 19-560 ॥
‘ता यो वेद, स वेद ब्रह्म, सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति’ इति प्रत्यक्षोपदेशाज्जगदैश्वर्यमप्यस्तीति चेन्न ।
आधिकारिकमण्डलाधिपतिर्ब्रह्मा हि तत्रोच्यते ।
गारुडे च-
‘आत्मेत्येव परं देवमुपास्य हरिमव्ययम् ।
केचिदत्रैव मुच्यन्ते नोत्क्रामन्ति कदाचन ॥
अत्रैव च स्थितिस्तेषामन्तरिक्षे तु केचन ।
केचित् स्वर्गे महर्लोके जने तपसि चापरे ॥
केचित् सत्ये महाज्ञान गच्छन्ति क्षीरसागरम् ।
तत्रापि क्रमयोगेन ज्ञानाधिक्यात् समीपगाः ॥
सालोक्यं च सरूपत्वं सामीप्यं योग एव च ।
इमामारभ्य सर्वत्र यावत्सुक्षीरसागरे ॥
पुरुषोऽनन्तशयनः श्रीमन्नारायणाभिधः ।
मानुषा वर्णभेदेन तथैवाश्रमभेदतः ॥
क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः ।
आजानजाः कर्मजाश्च तात्त्विकाश्च प्रजापतिः ॥
रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशस्तेषु चैवोत्तरोत्तराः ।
नित्यानन्दे च भोगे च ज्ञानैश्वर्यगुणेषु च ॥
सर्वे शतगुणोद्रिक्ताः पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् ।
पूज्यन्ते चावरैस्ते तु सर्वपूज्यश्चतुर्मुखः ॥
स्वजगद्व्यापृतिस्तेषां पूर्ववत् समुदीरिता ।
सयुजः परमात्मानं प्रविश्य च बहिर्गताः
चिद्रूपान् प्राकृतांश्चापि विना भोगांस्तु कांश्चन ।
भुञ्जते मुक्तिरेवं ते विस्पष्टं समुदाहृताः’ इति ॥ 19 ॥
ॐ विकारावर्ति च तथाहि दर्शयति ॐ ॥ 20-561 ॥
॥ इति सर्वकामाधिकरणम् (जगद्व्यापाराधिकरणम्) ॥ 09 ॥
विकारावर्तिव्यापारो मुक्तानां न विद्यते । ‘इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते’ इति हि श्रुतिः ।
वाराहे च –
स्वाधिकारेण वर्तन्ते देवा मुक्तावपि स्फुटम् ।
बलिं हरन्ति मुक्ताय विरिञ्चाय तु पूर्ववत् ॥
सब्रह्मकास्तु ते देवा विष्णवे च विशेषतः ।
न विकाराधिकारस्तु मुक्तानामन्य एव तु ।
विकाराधिकृता ज्ञेया ये नियुक्तास्तु विष्णुना’ इति ॥ 20 ॥स्थित्य(एकरूपा)धिकरणम्
ॐ स्थितिमाह दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॐ ॥ 21-562 ॥
‘एतत् साम गायन्नास्ते’ इत्युच्यते ।तत्रानन्दादीनां वृद्धिर्ह्रासश्च न विद्यते। एकप्रकारेणैव सर्वदा स्थितिः ।
‘स एष एतस्मिन् ब्रह्मणि सम्पन्नो न जायते न म्रियते न हीयते न वर्धते स्थित एव सर्वदा भवति दर्शन्नेव ब्रह्म दर्शन्नेवात्मानं तस्यैवं दर्शयतो नापत्तिर्न विपत्तिः’ इत्याह जाबालश्रुतौ ।
‘यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते । न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इति मोक्षधर्मे ॥
विद्वत्प्रत्यक्षात् कारणभावल्लिङ्गाच्च । ब्रह्मवैवर्ते च –
‘न ह्रासो न च वृद्धिर्वा मुक्तानां विद्यते क्वचित् ।
विद्वत्प्रत्यक्षसिद्धत्वात् कारणाभावतोऽनुमा ॥
हरेरुपासना चात्र सदैव सुखरूपिणी ।
न तु साधनभूता सा सिद्धिरेवात्र सा यतः’ इति ॥ 21 ॥
ॐ भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॐ ॥ 22-563 ॥
॥ इति स्थित्य(एकरूपा)धिकरणम् ॥ 10 ॥
न च भोगविशेषादिविरोधः ।‘एतमानन्दमयमात्मानमनुविश्य न जायते न म्रियते न ह्रसते न वर्धते यथाकामं चरति यथाकामं पिबति यथाकामं रमते यथाकाममुपरमते’
इति भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् ।
‘अवृद्धिह्रासरूपत्वं मुक्तानां प्रायिकं भवेत् ।कादाचित्कविशेषस्तु नैव तेषां विषिध्यते’ इति कौर्मे ॥
‘प्रवाहतस्तुवृद्धिर्वा ह्रासो वा नैव कुत्रचित् ।
नाप्रियं किञ्चिदपि तु मुक्तानां विद्यते क्वचित् ॥
कुत एव तु दुःखं स्यात् सुखमेव सदोदितम् । भोगानां तु विशेषे तु वैचित्र्यं लभ्यते क्वचित्’
अनावृत्यधिकरणम्
ॐ अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॐ ॥ 23-564 ॥
॥ इति अनावृत्यधिकरणम् ॥ 11 ॥
॥ इति श्रीमदानन्ददीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ 04-04 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्यं समाप्तम् ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते’ ,‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 23 ॥
ज्ञानानन्दादिभिः सर्वैर्गुणैः पूर्णाय विष्णवे ।
नमोऽस्तु गुरवे नित्यं सर्वथाऽतिप्रियाय मे ॥
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुर्-
मध्वो यत् तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि ॥नित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम ।
नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै च विष्णवे ॥