Bhagavatatatparyanirnaya/C8/S8: Difference between revisions
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Revision as of 07:03, 9 April 2026
श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥
धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदंत्यागः क्वचित् तच्च न मुक्तिकारणम् ।
क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलंक्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः ।
एवं विमृश्याव्यभिचारिसद्गुणंपदं निजैकाश्रयिसद्गुणाश्रयम् ।वव्रे वरं सर्वगुणैरपेक्षितंरमा मुकुन्दं निरपेक्षमीप्सितम् ॥ २२ ॥'अनाद्यनन्तकोलेऽपि विष्णुमेवाश्रिता रमा ।अन्येषां ज्ञापनार्थाय दोषानुक्त्वेतरान् जहौ॥ इति च ॥ १९-२२ ॥
अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः ।स वै भगवतस्साक्षात् विष्णोरंशांशसम्भवः ॥ ३३ ॥
धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् ।तमालोक्यासुरास्सर्वे कलशं चामृताहृतम् ॥ ३४ ॥
लिप्सन्तः सर्ववस्तूनि कलशं तरसाऽहरन् ।नीयमानेऽसुरैस्तस्मिन् कलशेऽमृतभाजने ॥
विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥
॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये अष्टमस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥
'तेषां सत्याच्चालनार्थं हरिर्धन्वन्तरिर्विभुः ।समर्थोऽप्यसुराणां तु स्वहस्तादमुचत्सुधाम्। इति च ॥ ३३-३५ ॥