Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S24: Difference between revisions
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Revision as of 06:55, 9 April 2026
द्वास्सु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटिमत् ।शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिष्ठितम् ॥ १८ ॥
देहली द्वारबन्धः ॥ १८ ॥
हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम् ।कृत्रिमान् मन्यमानैः स्वानधिरुह्याधिरुह्य च ॥ २० ॥
कृत्रिमान् शोभार्थं कृतान् ॥ २० ॥
अथाऽदर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् ।विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम् ॥ ३० ॥
आदर्शे ददर्श ॥ ३० ॥
तस्मिंन्नलुप्तमहिमा प््रिाययाऽनुषक्तोविद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने ।
उद्गुणपानवीच्यः उत्तमामृतवीचीयुक्तः ॥ ३८ ॥
तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता ।न चाबुद्ध्यत तं कालं पत्याऽऽवीच्येन सङ्गता ॥ ४५ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥
'प्राप्तषोडशवर्षः सन्नावीच्य इति कथ्यते॥ इत्यभिधानम् ॥ ४५ ॥