Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S22: Difference between revisions
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Revision as of 06:55, 9 April 2026
तावत् प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे ।दर्शयामास तं क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद् वपुः ॥ ८ ॥
शब्दविषयं ब्रह्म ॥ ८ ॥
न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषांत्रयोदशारं त्रिशतं षष्ठिपर्व ।
अनन्तच्छिदि अनन्तावयवम् ।'तृतीयोऽतिशयेइति हि महाव्याकरणे ।'मथनान्मिथिलो जातःइत्यादिवच्च ॥ १८ ॥
नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते ।वधाय चासतां यस्त्वं हरेः शक्तिर्हि पालनी ॥ ५० ॥
योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् ।रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लात्मने नमः ॥ ५१ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥
'स्वायम्भुवो मनुश्चैव पृथुश्चैवार्जुनावपि ।ब्रह्मशेषविपा रुद्र इन्द्र ऋष्यादयस्तथा ।विष्ण्वावेशयुताः सर्वे न तु विष्णुस्वरूपकाः॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ ५०,५१ ॥