Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S14: Difference between revisions
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Revision as of 06:55, 9 April 2026
पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक-श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् ।
यत् पादयोः पतिताश्रुप्रधानो यैः कबरं स्पृष्टं तत्स्त्रियः तत्पदयोः पतितत्वादेव । सविमुक्तकेश्यो न्यकृत ॥ १० ॥
तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्तेसोऽहं रथी नृपतयो यत आमनन्ति ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥
स रथो हयास्ते । तादृशा इत्यर्थः । त इषव इतिवत् ।'सदृशे वा प्रधाने वा कारणे वा तदित्ययम् ।शब्दः सङ्घटते भेदे विद्यमानेऽपि तत्त्वतः। इति ब्रह्मतर्के ।तद्रथहयानां दाहोक्तेः ॥ २१ ॥